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Thursday, February 07, 2013

एक आवाज़ उठेगी तो सौ संग में जुड़ जाएँगी...पूनम

Sun, Jan 27, 2013 at 5:12 PM
जोश और होश दोनों का संदेश देती-पूनम माटिया की कलम
                                                   एक सम्मान समारोह में पूनम 
पूनम और नरेश माटिया 
पूनम माटिया यूं तो काफी लम्बे समय से लेखन में हैं पर इस मामले में उनके छुपे  रुस्तम होने का पता करीब दो वर्ष पूर्व ही चला। इसे आप यूं भी कह सकते हैं कि उनकी कला का यह पक्ष अभी अभी सामने आया। इस लिए पुस्तकों के मामले में वह नवोदित ही गिनी जाती हैं। बहुत पुरानी पर फिर भी नवोदित--है न कमाल ! जैसे जोश और होश का मिलन होने पर जवानी का एक नया ही रंग सामने आता है बिलकुल उसी तरह सामने आई हैं पूनम की रचनायें। हर रचना में एक गहरा अनुभव, एक पैनी दृष्टि, बहुत ही पते का कोई संदेश पर साथ ही किसी पहाड़ी नदी जैसा जोश भी। जब शीत लहर के अंत में  सर्दी जा चुकी होती है लेकिन मौसम पूरी तरह गर्म भी नहीं हुआ लगता उस समय तन मन को अहसास होता है और खुद-ब-खुद होठों लगता से निकलने   है--लो  फिर वसंत आई। पूनम भी  हमारे इस मानव समाज में और कलम की दुनिया में किसी वसंत की तरह आई है। पूनम की रचनायें और जिंदगी का अंदाज़ दोनों मिलकर समाज को स्वस्थ और नैतिक जीवन जीने के सलीके भी सिखाते हैं। पूनम की रचना और पूनम का अंदाज़ स्वस्थ समाज की नींव के निर्माण में भी योगदान डाल रहा है।
साहित्यिक क्षेत्रों और नवोदित रचनाकारों की श्रेणी में दिलशाद गार्डन, दिल्ली की पूनम माटिया (रुस्तगी) भले ही एक नया नाम है परन्तु उनके सम्पूर्ण जीवन पर प्रकाश डाला जाय तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह दिन दूर नहीं है जब यह रचनाकार भी अपने मजबूत विचारों के माध्यम से लेखन क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर  लेगीं । उनकी रचनाओं में सुख-दुख, दूरदृष्टि, समर्पण की भावना, स्नेह और रचनात्मक एवं सकारात्मक सोच की झलक हर जगह देखने मिलती है ।
इन सारी गतिविधियों और लेखन में नई दिशा देने का सारा श्रेय वह अपने पति नरेश माटिया को देती है । जो पेशे से इंजीनियर है । इतना ही नहीं एक चर्चा में उन्होने ने बताया कि वह हरियाणा की रेवाड़ी की रहने वाली है । शहर की चकाचौंध के साथ गांव की मिट्टी की सौंधी महक, ताजी हवा ,रहन सहन आदि का भी पूनम की जिदंगी में काफी महत्वपूर्ण स्थान रहा इसलिए उनकी रचनाओं में स्वतः ही इन सब की झलक भी मिलती है |
"पूनम मटिया" जी , जो विज्ञान और गणित की अध्यपिका हैं पर जिन्हें पढ़ने का शौक था वो  धीरे-धीरे, बढते-बढते लेखन की ओर मुड़ा | उन्होंने अपनी कलम से लिखना शुरू किया और ये देख कर आश्चर्य ज्यादा हुआ कि उनकी रचनायो में गंगा जमुनी संस्कृति का संगम है जबकि उर्दू तो कभी पढ़ी ही नहीं थी वही हिंदी भी सिर्फ माध्यमिक स्कूल तक पढ़ी थी और आज इतनी सुंदर-सुंदर रचनाओ से ‘स्वप्न श्रृंगार’ और  "अरमान" उन्होंने लिख डाली | पूनम माटिया की कविताओ का यथार्थ हम एक बार छू ले, तो उसके बाद इन रचनाओ के नए अर्थ उदघाटित होते हैं | 
राजीव गाँधी अवार्ड प्राप्त करते हुए पूनम का एक  अंदाज़ 
सीधे-सहज शब्दों में जटिल अनुभूतियो की गांठे खुलने का एक अनोखा अनुभव होता है | उनकी कविता में एक नाद है , गीतात्मक संवेदना है , अपनी एक लयात्मक सरंचना है | इन कविताओ में संगीत की एक सूक्ष्म धारा बहती है , रगों में थरथराते लहू जैसी , जिसका सिर्फ अहसास किया जा सकता है | 
ख़ुशी होती है यह जानकर कि उन्हे इतने अल्प काल में ही विभिन्न समूहों की तरफ से सम्मानित भी किया जा चूका है। 
१.सीमापुरी टाइम्स समूह द्वारा प्रायोजित, श्रीप्रकाश जायसवाल  (कोयला मंत्री ) के हाथों से राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड ,२०१२
२.मेहर टाइम्स समूह द्वारा प्रायोजित, श्रीमती अनु टंडन (सांसद) के हाथों से भारत गौरव अवार्ड ,२०१२
३.हम साथ साथ समूह द्वारा प्रायोजित, पंडित सुरेश नीरव जी ,साहित्यकार  के हाथों से सरस्वती सम्मान 
दिल्ली में एक दामिनी का मामला सामने आया तो दर्द के उस तुफान में पूनम भी शामिल रही। उसके दिल से भी एक तड़प निकली--कहने लगी--एक आवाज़ उठेगी तो सौ संग में जुड़ जाएँगी.........!
देश की राजधानी में एक लड़की की अस्मत दागदार ,तार तार हुई है .......ऐसे में कोई कैसे हंस सकता है ........सभी को अपनी शक्ति के अनुसार इस घटना का विरोध करना चाहिए और खासकर एक लेखक और कवी कवि को अपने शब्दों के माध्यम से अपना योगदान देना चाहिए ........
दिल पे अघात हुआ है 
अबला पे अत्याचार  हुआ है 

सियासतदारों की नाक के नीचे 

रक्षा के लिए प्रतिबद्ध 
संविधानी तौर पे कटिबद्ध 
पुलिसकर्मियों की खुली आँखों के सामने 
जन सुविधाओं के चालकों ने 
देश की अस्मत पर कुठाराघात किया है 

ऐसे में हम कैसे रहे शांत 

कैसे न उठाये आवाज़ 
क़ानून को ललकारना होगा 
घ्रणित ,विक्षिप्त मानसिकता को 
जड़ से उखाड़ना होगा 

एक आवाज़ उठेगी तो 

सौ संग में जुड़ जाएँगी 
शायद सरकार के कान पे 
जूँ कोई रेंग जायेगी 

एक आवाज़ उठेगी तो 

सौ संग में जुड़ जाएँगी 
शायद सरकार के कान पे 
जूँ कोई रेंग जायेगी .................................पूनम
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आप पूनम माटिया की कई और नई रचनायों का पठन बस यहां एक क्लिक करके भी कर सकते हैं।

Saturday, September 08, 2012

मौत की क्रूरता: पाबला जी के युवा बेटे को छीना


किस भगवान से मांगें दर्द सहने की शक्ति  
                      साभार चित्र 
ब्लॉग जगत को नए नए अंदाज़ देने, ब्लॉग लेखकों को एक नयी पहचान देने और उन्हें किसी न किसी भने नजदीक लाने में हर पल व्यस्त रहने वाले मित्र बी एस पाबला जी के साथ मौत ने एक क्रूर मजाक किया है। मौत ने उनके युवा बेटे को हमसे हमेशां के लिए छीन लिया है।  भाई रजनीश अली जाकिर जी की पोस्ट से इस दुखद खबर का पता चला। पाबला जी का नम्बर तीन चार बार निकाला पर उनके दुःख को बाँट सकने की हिम्मत मेरी भी नहीं हुई। कभी कभी शब्द भी कितने बेबस से हो जाते हैं। जो दुःख कभी भूल नहीं सकेगा उस दुःख को भूलने की बात कहना----जो असहनीय है उसे सहन  करने का उपदेश देना जीने के लिए---समाज के लिए लाख जरूरी सही पर---केवल खोखली औपचारिकता लगता है। मैंने अपना एकलौता बेटा खोया है---सो इस दर्द का अहसास भी कर सकता हूँ---पर बाँटने में कितना असमर्थ हो गया हूँ---क्योंकि जानता हूँ कि  यह दर्द अकेले ही सहना होगा----सारी उम्र हर पल यह दर्द बना रहेगा ! भगवान् होता तो यह ज़ुल्म नहीं करता----इस लिए किस भगवान् से कहूं की पुत्र नहीं रहा और इस दर्द को सहने की शक्ति एक पिता को दे---जाकिर जी की पोस्ट भी नीचे दी जा रही है ! --रेक्टर कथूरिया 
पाबला जी को पुत्र शोक// जाकिर अली रजनीश जी 
 बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हरदिल अजीज़, ब्‍लॉग शिरोमणि बी.एस.पाबला जी के युवा पुत्र गुरप्रीत का आकस्मिक निधन आज दिनांक 08 सितम्‍बर, 2012 को प्रात: भिलाई में हो गया है। मुझे डॉ0 अरविंद मिश्र जी से यह समाचार मिला, जिसे सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। क्‍योंकि लगभग एक साल पहले गुरप्रीत का एक बड़ा एक्‍सीडेंट भी हो गया था। उस दुर्घटना के बाद गुरप्रीत काफी स्‍वस्‍थ हो गया था। लेकिन आज प्रात: पता नहीं कैसे क्‍या हुआ कि भिलाई के नेहरू नगर इलाके में गुरूप्रीत के साथ एक ट्रेन दुर्घटना हो गयी, जिसमें उसका आकस्मिक निधन हो गया। यह खबर सुनकर ब्‍लॉग जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। मेरी इस सम्‍बंध में भिलाई निवासी ब्‍लॉग संजीव तिवारी और प्रो0 अली से भी बात हुई है। पर मैं इस शोकाकुल समय में पाबला जी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं।

मैं अपनी पत्‍नी श्रीमति अर्शिया अली, हमारे साथी डॉ0 अरविंद मिश्र, श्री रवीन्‍द्र प्रभात एवं लखनऊ के समस्‍त ब्‍लॉगरों की ओर से गुरप्रीत की आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं और ईश्‍वर से विनती करता हूं कि वह पाबला जी और उनके परिवार को इस असह्य दु:ख को सहने की शक्ति प्रदान करे।


आमीन, सुम्‍मा आमीन। 


Tuesday, June 26, 2012

आपातकाल पर श्री एल के अडवाणी

भारतीय इतिहास का सर्वाधिक अंधकारपूर्ण कालखंड 
भारत की स्वतंत्रता के छह दशकों में दो तिथियाँ ऐसी हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता है और ये दोनों जून 1975 से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक है12 जून। सभी राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डालते हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में इंदिरा कांग्रेस की भारी पराजय हुई। दूसरा, उसी दिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के लोकसभा में चुने जाने को निरस्त कर दिया और इसके साथ ही चुनावों में भ्रष्टाचार फैलाने के आधार पर उन्हें छह वर्षों के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया 
दूसरी तिथि है25 जून। लोकतंत्र-प्रेमियों के लिए यह तिथि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे काले दिवसों में से एक के रूप में याद रखी जाएगी। इस दुर्भाग्यपूर्ण तिथि से घटनाओं की ऐसी शृंखला चल पड़ी, जिसने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तानाशाही में परिवर्तित कर दिया।
दिल्ली में जून के महीने में सबसे अधिक गरमी होती है। अतएव जब दल-बदल के विरुध्द प्रस्तावित कानून से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति ने बगीचों के शहर बंगलौर, जो कि ग्रीष्मकाल में भी अपनी शीतल-सुखद जलवायु के लिए विख्यात है, में 26-27 जून को अपनी बैठक करने का निर्णय लिया तो मुझे काफी प्रसन्नता हुई। हम दोनोंअटलजी और मैंइस समिति के सदस्य थे, जिसके कांग्रेस (ओ) के नेता श्याम नंदन मिश्र भी सदस्य थे। हालाँकि, जब 25 जून की सुबह मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर बंगलौर जानेवाले विमान पर सवार हुआ तो मुझे इस बात का जरा भी खयाल नहीं था कि यह यात्रा दो वर्ष लंबी अवधि के लिए मेरे 'निर्वासन' की शुरुआत है।
लोकसभा के अधिकारियों ने बंगलौर हवाई अड्डे पर मेरे सहयात्री मिश्र और मेरी अगवानी की। राज्य विधानसभा के विशाल भवन के पास स्थित विधायक निवास पर हमें ले जाया गया। अटलजी एक दिन पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे।
26 जून को सुबह 7.30 बजे मेरे पास जनसंघ के स्थानीय कार्यालय से एक फोन आया। दिल्ली से जनसंघ के सचिव रामभाऊ गोडबोले का एक अत्यावश्यक संदेश था। वे कह रहे थे कि मध्य रात्रि के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी जारी है। पुलिस शीघ्र ही अटलजी और आपको गिरफ्तार करने के लिए पहुँचने वाली होगी।
पुलिस हम लोगों को गिरफ्तार करने के लिए सुबह 10.00 बजे आ पहुँची। प्रख्यात समाजवादी नेता मधु दंडवते भी एक अन्य संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए बंगलौर में मौजूद थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। हम चारों को बंगलौर सेंट्रल जेल ले जाया गया।
जेल
हम लोगों को आमने-सामने स्थित दो बड़े आकार के कमरों में रखा गया। श्याम बाबू और दंडवते एक कमरे में थे तथा अटलजी और मैं दूसरे कमरे में। हम लोग जल्द ही वहाँ के अनुकूल हो गए। जेल अधिकारियों ने हमें खाना पकाने के बरतन, चीनी मिट्टी के बरतन, खाद्य सामग्रीअन्न और सब्जी दिए, जैसाकि कारागार नियमावली में विनिर्देश था। अटलजी ने स्वेच्छया खाना पकाने की देखभाल करना स्वीकार किया। 'लोकसभा हू'ज हू' में उनकी रुचियों के अंतर्गत 'खाना पकाना' दिया गया है। वे जो खाना पकाते थे, वह सादा किंतु संपूर्ण आहार होता था।
बंगलौर जेल में मुझे अपने जीवन का एक विरल वरदान जो प्राप्त हुआ, वह अकेलापन, और इसका तात्पर्य थाइसका अच्छा उपयोग करना। एक अच्छे पुस्तकालय और शांत अध्ययन-कक्ष के अलावा जेल में एक बैडमिंटन कोर्ट एवं टेबल टेनिस हॉल था, जहाँ मैं नियमित रूप से खेलता था। असल में जयंत, जो कि अब एक शीर्ष टेबल टेनिस खिलाड़ी है, ने सर्वप्रथम इस खेल के प्रति रुचि उस समय विकसित की, जब वह कमला और प्रतिभा के साथ पहली बार मुझसे बंगलौर जेल में मिलने आया था। चूँकि मेरे कई साथी कैदी कर्नाटक से थे, मैंने कन्नड़ सीखना शुरू कर दिया और समाचार-पत्रों की मुख्य खबर पढ़ने और कुछ प्रारंभिक वाक्य बोलने में काफी प्रगति कर ली। समय बिताने का मेरा सर्वप्रिय साधन निश्चित रूप से पुस्तकें और पुस्तकालय था।
जेल के दौरान मेरे सुखद क्षण वे होते थे, जब मुझे या तो कमला या मेरे बच्चों द्वारा लिखे पत्र प्राप्त होते थे अथवा वे मुझसे मिलने बंगलौर आते थे। मुझे पता चला कि अध्यापिका अकसर प्रतिभा और जयंत से पूछती थी'पापा वापस आए?' मेरे बच्चों को यह कहते हुए बहुत कष्ट होता था'नहीं, अभी नहीं।' मुझे अपने कारावास का कभी कोई पछतावा नहीं हुआ, चूँकि यह लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुकाया जानेवाला अनिवार्य मूल्य था। फिर भी, कोई भी ऐसी बात जो मेरे बच्चों को कष्ट दे, मुझे क्षोभ से भर देती थी।
भारतीय इतिहास के सर्वाधिक अंधकारपूर्ण कालखंड की समाप्तिवर्ष 1976 के अस्त होते-होते इस बात के संकेत बढ़ने लगे थे कि आपातकालीन सूर्य भी अस्त होगा।
इंदिरा गांधी की अलोकप्रियता देश में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जा रही थी। उनका एकमात्र समर्थक सोवियत संघ और कम्युनिस्ट गुट के कठपुतली शासक थे।
16 जनवरी को मैंने डायरी में लिखा'इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुख खबर है कि लोकसभा चुनाव मार्च के अंत अथवा अप्रैल के आरंभ में होंगे और इस संबंध में औपचारिक घोषणा संसद् के अगले सत्र के आरंभ में की जाएगी।' इसके दो दिन पश्चात् 18 जनवरी, 1976 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग किए जाने की घोषणा की।
डायरी में मेरी आखिरी टिप्पणी, जो 18 जनवरी को मेरे स्वतंत्र होने से कुछ पहले लिखी गई थी, इसप्रकार हैदोपहर में लगभग 1.30 बजे जेल अधीक्षक छबलाणी मेरे कमरे में आए और कहा कि एक वायरलेस संदेश दिल्ली से आया है, जो मेरे कारावास को समाप्त करने के संबंध में है.......
चुनावों की घोषणा और जनता पार्टी का जन्म
बंगलौर में एक दिन व्यतीत करने के बाद मैं मद्रास (अब चेन्नई) चला गया, जहाँ से मैंने 20 जनवरी को दिल्ली के लिए उड़ान भरी। कमला और बच्चे रेलगाड़ी से घर लौटे। इस समय तक अटलजी भी रिहा हो चुके थे। इससे पहले उन्हें दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में भेज दिया गया था, जहाँ वे स्लिप डिस्क ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य-लाभ कर रहे थे। मोरारजी भाई को तावडू (हरियाणा) के कारावास से मुक्त किया गया। तीन दिन बाद 23 जनवरी को इंदिरा गांधी ने मार्च में चुनाव कराए जाने की घोषणा की। इस घोषणा के बाद कई अन्य राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया।
देश में राजनीतिक घटनाक्रम बिजली की-सी तेजी से बदला। जिस दिन नए चुनावों की घोषणा हुई उसी दिन जयप्रकाशजी ने जनता पार्टी के निर्माण की घोषणा की और अट्ठाईस सदस्यीय एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बनाई, जिसमें मोरारजी देसाई को अध्यक्ष और चरण सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके सदस्य चार दलोंजनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल से थे, जिन्होंने विलय के बाद एक नए दल को जन्म दिया। मधु लिमये, रामधन और सुरेंद्र मोहन के साथ मैं इसके चार महासचिवों में से एक था।
जनता पार्टी के जन्म से देश में राजनीतिक स्थितियाँ बदल गईं। ऐसा लगता था कि यह एक विशाल और हितैषी शक्ति है, जो भारत को उन्नीस महीने के निरंकुश शासन से मुक्ति दिलाएगी। हालाँकि चुनाव होने में अभी कुछ सप्ताह शेष थे और लोगों को अभी आपातकाल पर अपना फैसला देना था, लेकिन हवा में तानाशाही पर लोकतंत्र की विजय की तरंग घुल गई थी। मुझे लगता था कि भारत एक नाटकीय कायांतरण के शीर्ष पर खड़ा है, जो एक युग के समापन और एक नए युग के उदय का संकेत है। इसकी तुलना तीन दशक पूर्व वर्ष 1947 में भारत द्वारा पारगमन के संबंध में किए गए अनुभव से की जा सकती थी। निश्चित रूप से भारत में यह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम विजयी हुआ था।
लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए बहुत कम समय बचा था, जो कि 16 मार्च को होने अधिसूचित थे। जनता पार्टी को चुनाव प्रचार के आरंभ से ही कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। हमारा झंडा और चुनाव-चिह्न नए थे, इसलिए मतदाता इसे कम जानते थे। इसके विपरीत, लोग कांग्रेस के चुनाव-चिह्न चरखा से भली-भाँति परिचित थे। हमारी पार्टी के पास संसाधनों का अभाव था, जबकि कांग्रेस के पास अपार धन था। कांग्रेस के पास सरकार-नियंत्रित मीडिया भी था। चूँकि आपातकाल अभी भी औपचारिक रूप से लागू था, लोग आमतौर पर डरे और सशंकित थे। वे खुले तौर पर इस बात पर चर्चा करने को तैयार नहीं थे कि वे अपना वोट किसे देंगे। लेकिन यह सच है कि जनता पार्टी की चुनाव सभाओं में काफी भीड़ जुटती थी; किंतु आरंभिक दिनों में कांग्र्रेस-विरोधी लहर का कोई संकेत नजर नहीं आता था। वास्तव में कांग्रेस के झंडे गाँवों और कस्बों दोनों में जनता पार्टी से बहुत अधिक संख्या में लगे थे।
फिर भी हवा में बदलाव का एक झोंका आ रहा था। एक निर्वाचक भूकंप के पूर्व कंपन का अनुभव हो रहा था।
यह स्पष्ट रूप से सिध्द हो गया, जब 20 मार्च को चुनाव परिणाम घोषित हुए।कांग्रेस स्वतंत्रता के बाद पहली बार पराजित हुई। जनता पार्टी को 542 सदस्यीय सदन में 295 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला। कांग्रेस की सूची मात्र 154 सीटों तक सीमित रह गई। सत्ताधारी दल के लिए यह पराजय उस समय और शर्मनाक हो गई, जब यह खबर फैली कि इंदिरा गांधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए हैं। ये दोनों उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र थे।
आपातकाल आधिकारिक रूप से 23 मार्च, 1977 को समाप्त हो गया। इसके साथ ही भारतीय गणतंत्र के इतिहास की सर्वाधिक अंधकारपूर्ण अवधि का अंत हो गया।
  (ब्लॉग से साभार)

Monday, February 13, 2012

अधूरे छूट गए बरबादियों पर लिखने के कई अहम प्रोजेक्ट

चला गया पहाड़ का प्रेमचंद-विद्यासागर नौटियाल नहीं रहे
-शिवप्रसाद जोशी के शब्दों में श्रद्धा सुमन   

अपनी कहानियों और अपने उपन्यासों से एक ठेठ ग्रामीण जीवन की व्यथा और यातना को स्वर देने वाले अग्रणी कथाकार उपन्यासकार विद्यासागर नौटियाल नहीं रहे. इस साल सितंबर में वो 79 वर्ष के हो जाते. विद्यासागर नौटियाल हिंदी में मोहन राकेश कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की त्रयी के बाहर उन गिनेचुने रचनाकारों में थे जिन्होंने एक रोमानी पैनेपन के साथ आंचलिक अंधेरो को पाठकों के सामने पेश किया. उनकी टिहरी की कहानियां, हिंदी में बेजोड़ मानी जाती हैं. वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल मानते हैं कि उनकी रचनाओं में प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा का सार्थक विस्तार मिलता है.
विद्यासागर नौटियाल ने कम्युनिस्ट आंदोलन और टिहरी में सामंतशाही विरोधी आंदोलन में भाग लिया. वो अपने इलाक़े के प्रति इस क़िस्म के अगाध और अनिर्वचनीय प्रेम से बंधे रहे कि उनकी हर रचना उसी ऊबड़ख़ाबड़ और बदक़िस्मती और ज़ुल्मोसितम के शिकार भूगोल में भटकती रही. विद्यासागर नौटियाल पहाड़ की स्त्रियों और दलितों के जीवन, पहाड़ के पाखंडो और विस्थापन जैसे सवालों से हमेशा बात करते रहने वाली एक भटकती रूह सरीखे थे.
फट जा पंचधार, उत्तर बायां हैं, झुंड से बिछुड़ा, बाग़ी टिहरी गाए जा, भीम अकेला, मोहन गाता जाएगा और सूरज सबका है जैसी रचनाएं अपने शीर्षकों में जितना कौतुहल और ड्रामा और संघर्ष, वेदना और उल्लास के जो शेड्स दिखाती हैं वे अपने पाठ में उतने ही बड़े अंधेरों उजालों और उतराइयों और चढ़ाइयों की व्यापक दास्तानें हैं. उनकी भाषा हिंदी के शोरोगुल के बीच एक नई भाषा है. उसमें पहाड़ की रंगतें थीं, वहां की छवियां और उसमें एक निराली किस्म की आधुनिकता है. 

विद्यासागर नौटियाल हिंदी में एक ख़ामोश किनारे के लेखक रहे हैं. उन्हें पहल सम्मान मिला था, वो आयोजन देहरादून में ही हुआ था. और वरिष्ठ हिंदी लेखक ज्ञानरंजन और बाक़ी सहयोगी रचनाकार देहरादून में ही जुटे थे. विद्यासागर नौटियाल ने इस पुरस्कार पर बहुत गहरी ख़ुशी और तसल्ली ज़ाहिर की थी. ख़राब स्वास्थ्य के बीच दिल्ली में उन्हें पिछले दिनों पहला श्रीलाल शुक्ल स्मृति पुरस्कार मिला था. 

विद्यासागर नौटियाल की आलोचना अक़्सर इसलिए की जाती थी कि वो एक ही जगह के बारे में बार बार लिखते हैं. वे दोहराते हैं. इसके जवाब में नौटियाल ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक के साथ बातचीत में कहा था कि उनकी रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि वहां दोहराव की गुंजायश नहीं है. उनके मुताबिक मेरा वो इलाक़ा छोटा भले ही है लेकिन वो ज़ुल्म संघर्ष और किसान समाज के एक दौर की अहम जानकारियां बताता है. वहां कथाएं भरी पड़ी हैं. वे पुराने कहे जा रहे मूल्य अभी लोगों ने जाने ही कहां है. उस पुरानेपन की गाथा कहने वाला भी कोई होना चाहिए. सागर के मुताबिक वो वही हो सकते हैं. सागरजी ने इस बातचीत में ये भी कहा था कि नए लेखक मुझे अपने साथ लेकर चलें. हिंदी साहित्य में मैं पुरानी पीढ़ी में गिना नहीं जाता हूं. 

विद्यासागर नौटियाल एक बड़े महाआख्यान क़िस्म के नॉवल की तैयारी कर रहे थे. उनके मस्तिष्क में उसकी रूपरेखा बनी थी. वो भूमंडलीकरण और विकास के नए तनावों और अपने उन वंचित लोगों की उलझनों और मुश्किलों को जोड़कर कुछ नया काम करना चाहते थे. वे बहुत सक्रिय लेखक थे. और ये सक्रियता इसलिए भी असाधारण थी कि तीस साल के लंबे विराम के बाद आई थी. 60 से 90 तक. वो टिहरी बांध से हुई विभिन्न बरबादियों पर लिखना चाहते थे. 

उत्तराखंड बनने के बाद सत्ता राजनीति की मारकाट को उन्होंने गहरी वितृष्णा से देखा. उनका कहना था कि बड़े माफ़िया की जगह छोटे माफ़िया ने ले ली. यही हुआ यहां. “बिराळा बाघ अर कताल्डा नाग.”
  कबाड़ख़ाना से साभार 

Sunday, January 29, 2012

लड़ाई और तेज करने की घोषणा

आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है 
यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है 
विस्थापन और गैरबराबरी के खिलाफ अभियान हुआ और तेज़
*बिहार और झारखण्ड का लोकशक्ति अभियान का तीसरा चरण पूरा
*पहले पुराना हिसाब साफ़ करो! फिर नए की बात करो!
बोकारो, जनवरी २९ : उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आँध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार होते हुए लोक शक्ति अभियान की टीम कल रांची पहुंची और उसके बाद आज सुबह मैथन पहुंची और शाम को बोकारो में दुन्गिबाग बाज़ार में हॉकर्स लोगों के बीच आम सभा की | रांची से १८ किलो. मीटर दूर काके रोड नगली में IIM रांची के लिए आदिवासी किसानो की ली जा रही ज़मीन के खिलाफ और देर शाम रांची में जगन्नाथपुर चौक पर HEC की ज़मीन पर अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए घरों के खिलाफ बड़ी आम सभा की गयी | किसी अध्यादेश के बिना किसानों की जमीन गैर तरीके से शासन की कब्जेदारी के खिलाफ़ एक बड़ी सभा आयोजित की गयी है

मेधा पाटकर ने नांगली में होने वाले विस्थापितों और डी वी सी के ५५ साल से विस्थापित आदिवासियों से कहा कि, आदिवासीयों के लिए बिहार से विभाजित होकर नवगठित राज्य झारखण्ड में अगर आदिवासियों को एक आदिवासी मुख्यमंत्री इस तरह से उजाड़ने में लगा हो तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है | आई. आई. एम् के लिए जबरन २२७ एकड जमीन पर सेकडों अर्द्सेनिक बलों को तैनात कर जमीन के मालिक किसानों को बेदखल करना और प्रताड़ित करना धिक्कार योग्य है | गोबर बीनने पर प्रतिबन्ध शर्मनाक है | जिस तरह से आदिवासियों के हितार्थ पेशा कानून अनुपालन समिति के संगठनकर्ताओं को १०७ की नोटिस देकर न्यायलय में जबाब तलन करना और उसी दिन उनके धान कटे खेतों पर अर्द्सैनिक बलों को तैनात करना गैरबराबरी एवम आदिवासी द्रोही कदम है |

अर्जुन मुंडा जी आदिवासियों मुख्यमंत्री है तो आपसे आदिवासियों के उद्धार की अपेक्षा थी लेकिन बंदूक और अर्द्सैनिक बलों की ताकत पर आदिवासीयों को खेत से खदेड़ने बाले मुख्यमंत्री को हम सेनापति कहेंगे मुख्यमंत्री नहीं | आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है | विश्वविद्यालय, फैक्ट्री, खदान, हर चीज़ के लिए जमीन ली जा रही है | ये सब अंग्रेजों ने भी नहीं किया था | उस समय के राज्यों ने नहीं किया | भूमिअधिग्रहण में उस समय जबरदस्ती नहीं थी | एक तरफ़ा दंगा हो रहा है | अर्जुन मुंडा आदिवासी नहीं रहे राज नेता हो गये है | आज झारखण्ड में करीब तीस लाख से ज्यादा विस्थापित लोग हैं तो अगर उनको सरकार नहीं बसा सकती तो लोगों को उजाड़ने का हक़ और चेहरा कैसे रखती है | किस मुँह से यहाँ के नेता और केंद्र की सरकार लोगों की ज़मीन पर बुलडोजर चलाती है | उन्हें पहले पुराना हिसाब चुकता करना होगा तब जाकर कोई और बात होगी | डी वी सी के विस्थापितों को पहले न्याय देना होगा तब जाकर आगे कोई और बात होगी |

पेसा कानून अनुपालन समिति में शामिल झारखण्ड की सामाजिक कार्यकर्त्ता दयामणि बरला ने कहा की नगड़ी में बंदूक की ताकत से जमीन अधिग्रहण की पूरी तैयारी गैर क़ानूनी है | नगड़ी में जमीन बचाने की लड़ाई पूरे झारखण्ड की लड़ाई हो गयी है और इसे पूरे देश की समर्थन चाहिये | एक किसान को कुछ पैसा देकर १० किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रही है | बोकारो इलेक्ट्रो कम्पनी कर रही है यही जिंदल कंपनी कर रही है माफिया ठेकेदरों को देने के लिए जमीन है गरीबों को देने के लिए नहीं है | दयामनी ने कहा कि यह नगड़ी की ही नहीं, झारखण्ड की ही नहीं पूरे भारत की लड़ाई नहीं है | हम अपने पूर्वजों की एक इंच जमीन नहीं देंगे |

नगड़ी की शांतिदेवी ने कहा, इस जमीन से हमने दो बच्चे पैदा किया है, उनका पालन – पोषण किया और आज सरकार कहती है की १९५७ में इसका अधिग्रहण हो गया, हम गैरकानूनी हैं तो मैं पूछती हूँ की फिर किस मुहँ से सरकार ने अहुमको आज तक मालगुजारी वसूल किया | बताये हमको सरकार | नगड़ी की जमीन १९५७ से १९५८ में ९०० रूपये प्रति एकड के हिसाब से ली जानी थी २२ आदमीयों ने मुआवजा लिया था बाकी किसी ने नहीं लिया | आज सरकार उसी पैसे को १०% ब्याय की दर जोड़ कर मुआवजा देने की बात की जा रही है | यह सरासर गलत और गैरकानूनी है | अगर धारा ४, ६, ९, ११, कुछ भी नहीं लगी तो सरकार को कैसे यह हक़ बनता है कि वोह कोई भी काम शुरू करे इन ज़मीनों पर |

मैथन बाँध के विस्थापितों की लड़ाई, दिल्ली में अक्टूबर माह में ८ दिन के धरने के बाद, जिसमे मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, राजिंदर सच्चर, कुलदीप नय्यर और अन्य गणमान्य लोगों ने हस्तक्षेप किया था, ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है. उर्जा मंत्री शुशील कुमार शिंदे से मुलाकात के बाद २८ दिसम्बर को डी वी सी के चेयरमन के साथ स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थता में वार्ता हुई | मामले को एक धक्का तो मिला है लेकिन न्याय नहीं मिला है, घटवार आदिवासी महासभा के सलाहकार रामश्रय सिंह ने बी एस के कॉलेज के मैदान में आयोजित मीटिंग में कहा |

स्वामी अग्निवेश ने सभा को संबोधित करते हुए कहा की देश में आज भीषण समस्या है, विकास के नाम पर चरों ओर लूट मची है | इस पूरी विकास प्रक्रिया में आदिवासी, दलित, शोषित और वंचित समाज के लोगों के साथ और भी अन्याय हो रहा है | आज़ादी के बाद की विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों ने सबसे बड़ा बलिदान दिया है | डी वी सी परियोजना उनमे से एक है | आज भी ९,००० परिवारों को वायदे के मुताबिक नौकरी और मुआवजा नहीं मिला है | लेकिन प्रबंधन यह दावा करता है की उन्होंने दे दिया | यह तो वक्त ही बताएगा जब आदिवासी महासभा के लोगों के दावे सरकारी आंकड़ों को झूठा करके दिखा देंगे | सरकार को चहिये की इनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है और न्याय करे | इन्हें हर सुख सुविधा मुहया कराये |
पिछले साल २०११ के अप्रैल महीने में रांची उच्च न्यालय के आदेश के मुताबिक पूरे झारखण्ड के शहरों में एक जबरदस्त विस्थापन का दौर चला जिसमे हजारों घर तोड़े गए | रांची में इस्लामनगर और अन्य कई बस्तियों में घर तोड़े गए | सदमे से करीब आठ लोगों के मौत हो गयी, क्योंकि उनके जीवन के कमाई धूमें मिला डी गयी थी | कारण : ये सभी बस्तियां सरकारी ज़मीन या पब्लिक सेक्टर कंपनी जैसे एच ई सी की ज़मीन पर काबिज थे |

सिद्धेश्वर सिंह, बस्ती बचाओ संघर्ष समिति, रांची के अध्यक्ष ने कहा जब एच ई सी ने लोगो को जगह जगह से लाकर मजदूरी के तौर पर काम दिया और इन ज़मीनों पर बसाया था तब सरकार कहाँ थी | आज वही लोग कैसे अतिक्रमणकारी हो गए | इन बस्तियों में रहने वाले ८० % लोग आदिवासी हैं, मजदूर हैं, झारखंडी हैं, उनका हक़ है इस धरती पर वे अपनी जान दे देंगे लेकिन अपनी जीविका और घर नहीं टूटने देंगे |

निजाम अंसारी, राष्ट्रीय हौकर्स फेडरेशन, बोकारो के समन्वयक ने कहा की उस दौरान रांची के साथ साथ बोकारो में बस्तियां तोड़ी गयी, लोगों की जीविका खतम की गयी | मेहनतकश मजदूर वर्ग पूरे शहर को सेवाएं देते हैं और अपने खून पसीने की कमाई से अपना परिवार चलते हैं, क्या इस नयी आर्थिक व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह नहीं है | उनका इस आर्थिक व्यवस्था में स्थान तय करना होगा |

पूरे दो दिन के झारखण्ड दौरे के बाद लोकशक्ति अभियान ने यह एलान किया की विस्थापन और बढती गैरबराबरी के खिलाफ आगामी बजट सत्र के दौरान एक विशाल जन संसद का आयोजन १९ से २३ मार्च को किया जाएगा जिसमे देश के विभिन्न जन संगठन अपने अपने झंडे और बन्नेर के नीचे सरकार को एक कड़ी चुनौती देंगे | लोकशक्ति अभियान का यह तीसरा चरण आज समाप्त हुआ |

अभियान का चौथा चरण ६ मार्च को मुंबई में लोक मंच के कार्यक्रम के साथ होगा | ७ मार्च

को बेलगांव, ८ और ९ मार्च को गोवा, १० मार्च को पुणे, ११ मार्च को औरंगाबाद, १२ मार्च को नागपुर में कार्यक्रम होंगे | १३ मार्च को देश के विभिन्न जन संगठनों एक तैयारी बैठक नागपुर में आयोजित की जायेगी जिसमे बजट सत्र के दौरान होने वाले कार्यक्रम की वृहद योजना तैयार की जायेगी |

लोकशक्ति अभियान के लिए
राजेंद्र रवि, नागेश त्रिपाठी, अमिताव मित्र, मधुरेश कुमार

Saturday, January 28, 2012

कडवी हकीकतों के रूबरू कराते सादगी भरे शब्द

गाँधी के गुजरात से मेहुल मकवाना की एक कविता 
जैसे मेरे पास भी एक योनि है…सोनी सोरी
जज साहब,
मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी है !
सिर्फ बचपन में फोड़े दीपावली के पटाखों की कसम,
आज तक कभी छुआ भी नहीं है बन्दुक को !
हा, घर में मटन-चिकन काटने इस्तेमाल होता,
थोडा सा बड़ा चाकू चलाने का महावरा है मुझे !
लेकिन मैंने कभी तलवार नहीं उठाई है हाथ में !
में तो कब्बडी भी मुश्किल से खेल पानेवाला बंदा हूँ,
मल्ल युद्द्द या फिर कलैरीपट्टू की तो बात कहा ?
प्राचीन या आधुनिक कोई मार्शल आर्ट नहीं आती है मुझे !
में तो शष्त्र और शाष्त्र दोनों के ज्ञान से विमुख हूं !
यह तक की लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी भी पड़ोसी से मांगता हूँ !

लेकिन मेरे पास दो हाथ है जज साहब,
महनत से खुरदुरे बने ये दोनों हाथ मेरे अपने है !
पता नहीं क्यों लेकिन जब से मैंने यह सुना है,
मेरे दोनों हाथो में आ रही है बहुत खुजली !
खुजला खुजला के लाल कर दिए है मेने हाथ अपने !

और मेरे पास दो पैर है जज साहब !
बिना चप्पल के काँटों पे चल जाये और आंच भी न आये
एसे ये दोनों पैर, मेरे अपने है जज साहब !
और जब से मेंने सुना है
की दंतेवाडा कि आदिवासी शिक्षक सोनी सोरी की योनि में
पुलिसियों ने पत्थर भरे थे,
पता नहीं क्यों में बार बार उछाल रहा हु अपने पैर हवा में !
और खींच रहा हूं सर के बाल अपने !
जैसे मेरे पास भी एक योनि है और कुछ पैदा ही रहा हो उस से !

हा, मेरा एक सर भी है जज साहब,
हर १५ अगस्त और २६ जनवरी के दिन,
बड़े गर्व और प्यार दुलार से तिरंगे को झुकनेवाला
यह सर मेरा अपना है जज साहब !
गाँधी के गुजरात से हूं इसलिए
बचपन से ही शांति प्रिय सर है मेरा !
और सच कहू तो में चाहता भी हूं कि वो शांति प्रिय रहे !
लेकिन सिर्फ चाहने से क्या होता है ?

क्या छत्तीसगढ़ का हर आदिवासी,
पैदा होते हर बच्चे को नक्सली बनाना चाहता है ?
नहीं ना ? पर उसके चाहने से क्या होता है ?
में तो यह कहता हु की उसके ना चाहने से भी क्या होता है ?
जैसे की आज में नहीं चाहता हु फिर भी ...
मेरा सर पृथ्वी की गति से भी ज्यादा जोर से घूम रहा है !
सर हो रहा है सरफिरा जज साहब,
इससे पहले की सर मेरा फट जाये बारूद बनकर,
इससे पहले की मेरा खुद का सर निगल ले हाथ पैर मेरे ,
इससे पहले की सोनी की योनि से निकले पत्थर लोहा बन जाए,
और ठोक दे लोकतंत्र के पिछवाड़े में कोई ओर कील बड़ी,
आप इस चक्रव्यूह को तोड़ दो जज साहब !
रोक लो आप इसे !
इस बिखरते आदिवासी मोती को पिरो लो अपनी सभ्यता के धागे में !
वेसे मेरे साल तेंतीस होने को आये लेकिन,
मैंने कभी कारतूस नहीं देखी !
कभी नहीं छुआ है बन्दुक को ,
नहीं चलाई है तलवार कभी !
और ना ही खुद में पाया है
कोई जुनून सरफरोशी का कभी !
– मेहुल मकवाना, अहमदाबाद, गुजरात
94276 32132 and 84012 93496



Monday, November 07, 2011

मन और प्रकृति के रंगों को कैमरे में संजोती सम्वेदना गौतमी

टेकनिक से ज्यादा उन पलों को देखने का नज़रिया 

Samvedna:I am still unknown to myself, searching my identity 
कैमरा सही हाथों में हो और उसे  सही वक्त पर इशारा मिल जाये तो वह इतिहास रच देता है. बेजान से पलों में जान देता है. एक छोटी सी क्लिक ऐसे दस्तावेज़ बना देती है जिन्हें देख कर पत्थर दिल गुनाहगारों के कलेजे भी काँप जाते हैं. एक तस्वीर और उसमें कैद हुए कुछ गुज़र चुके पल दिल को झंक्झौर देते हैं, दिमाग को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. कहते हैं की गुज़रा हुआ जमाना, आता नहीं दोबारा...पर कैमरा उस गुज़रे हुए जमाने को भी एक बार फिरसजीव कर देता है. गुजर चुके वक्त की इन तस्वीरों को देख कर दिल की धडकन कभी तेज़ हो जाती है और कभी बढ़ जाती है. आज हम उस कैमरे की बात कराहे हैं जो उसके हाथों में रहा जिस का नाम है सम्वेदना और स्वभाव है अत्यंत सम्वेदनशील. वह प्रकृति से बातें करती है.  जब उसे आशा नजर आती है तो वह उस उम्मीद को अपने कैमरे में बंद कर लेती है, जब निराशा महसूस होती है तो वह उसे भी अपने कैमरे में संजो लेती है औए जब ख़ुशी महसूस होती है तो उन पलों को भी हमेशां के लिए अमर बना देती है. और जिस कैमरे  की बात आज हम कर रहे हैं वह रहा है सम्वेदना के हाथों में. अपने नाम की ही तरह सम्वेदनशील और मर्मस्पर्शी  इस फोटोग्राफर  संवेदना गौतमी, एक सृजनशील फोटोग्राफर हैं.उदीयमान हैं, पर उनके कैमरा की नज़र में पैनापन तथा सोच में बुद्धिमत्ता की झलक उन्हें भीड़ से अलग पहचान देती है. उम्र मात्र  26 साल , शिक्षा में एम बी. ए. यह युवा फोटोग्राफर फ़िलहाल चेन्नई में रहती हैं. उनका ब्लॉग 'माई पेज' में प्रकाशित उनकी फोटोग्राफी से ही उनके कला निपुणता का पता चलता है. हर फोटो के साथ चुने हुए शब्दों का इस्तेमाल का प्रयोग दर्शक को अभिभूत करने के लिए काफी है. 

Nobody can go back and start a new beginning, but anyone can start today and make a new ending
उनका एक ब्लोगिंग है, जिसमे कसाईओं के हाट में पशुओं का खरीद-ओ-फ़रोख्त का दृश्य को इस अंदाज से पेश किया गया है:

अर्थात कोई भी लौट कर नयी शुरूयात तो नहीं कर सकता लेकिन  कोई भी आज से अभी से एक नयी शुरूयात करके एक नए अंत की रचना अवश्य कर सकता है. 
दूसरा ब्लोगिंग Lost Bud में एक बाल-श्रमिक को लकड़ी का काम करते हुए दिखाया गया है जिसके साथ उद्धृत है मार्क ट्वैन का कथन: Lord save us all from... a hope tree that has lost the faculty of putting out blossoms. जोड़ दिया गया है. हर ब्लोगिंग के साथ इस तरह शब्दों का इस्तेमाल हर फोटोग्राफ को एक अलग स्तर पर ले जाता है, जहाँ फोटोग्राफी की टेकनिक से ज्यादा उसको देखने का नज़रिया ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाता है.
 Lord save us all from... a hope tree that has lost the faculty of putting out blossoms. ~Mark Twain
किन्तु केवल शब्दों का प्रयोग ही नहीं , कभी अन-कहे ही, उनके फोटोग्राफ,बिना वाक्यों का इस्तेमाल से भी बहुत कुछ कह जाते हैं. सम्प्रति उनके पोस्ट किया हुआ ब्लोगिंग Three Moods of Nature में प्रकृति के एक ही रूप में तीन अलग अलग मानविक मूडज़ को ढूंड पाना, वह भी बिना कोई वाक्य बोले, एक अजब कला पारदर्शिता है, जो दर्शकों को मंत्र मुग्ध किये बिना नहीं छोड़ता है.
यह उदीयमान ब्लोगर तथा फोटोग्राफर भारत के जानीमानी नारीवादी लेखिका सरोजिनी साहू तथा ओडिया के सुप्रसिद्ध लेखक जगदीश महंती की सुपुत्री हैं. संवेदना अपने सॉफ्टवेर इंजीनियर पति नरेन्द्र पटनायक तथा एक पुत्र के साथ चेन्नई में रहती हैं.  
संवेदना अपने ब्लॉग में अपना परिचय एक nonsense thinker के रूप में देती है और दावा करती है की उसे बहुत कुछ अभी सीखना है. उसकी भाषा में: I am still unknown to myself, searching my identity  अर्थात 
अभी तक मैं खुद भी अपने आप को नहीं जानती, तलाश कर रही हूँ अपनी पहचान हालत तो हम सभी की यही है की हमसे अधिकतर अपने आप को भी नहीं जानते.....पर बहुत ही कम लोग हैं जो इस हकीकत को जान पाते हैं महसूस कर पाते हैं और उन लोगों की संख्या तो और भी कम है जो अपने जीवन काल में ही अपनी खुद की तलाश शुरू कर पाते हैं....हमें ख़ुशी है की सम्वेदना गौतमी उन कुछ बहुत ही थोड़े से कीमती लोगों में से एक है. आपको सम्वेदना का ब्लॉग कैसा लगा, तस्वीरें कैसी लगी अवश्य बताएं. आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी. --रेक्टर कथूरिया 

Sunday, September 04, 2011

आदमी के लिए औरत रही चौसर क्यूं है !


कुछ पाठकों को कुछ पुरानी पोस्टें ढूँढने में दिक्कत होती है. यहां नयी पोस्टों के साथ कुछ पुरानी पोस्टें भी दी जा रही हैं.  उम्मीद है की आप इन्हें पसंद करेंगे. जिन लोगों ने पुरानी पोस्टें नहीं पढ़ी उनेक लिए यह एक यादगारी अहसास होगा.

मीडिया पर छाई अन्ना की जीत 

Thursday, June 16, 2011

इलाज के बहाने जहर दिया जाता रहा निगमानंद को ?

 तुमने उस देशभगत निगमानंद को मार डाला
कहा जाता है की स्वामी निगमानंद की तबीयत बिगड़ने पर जब उन्हें हॉस्पिटल लाया गया था , तो उन्हें  जहर दिया गया था | उनके पेराकारों का तो यहाँ तक कहना है की हॉस्पिटल के अन्दर इलाज के बहाने उनको जहर दिया जाता रहा और उनकी बिगड़ रही हालत को लोगों से छुपाया गया | ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार उनको अपने रास्ते का काँटा समझ रहे उद्योगपतियों की दासी बन जाए | अपने आपको पार्टी विद डिफरेंस कहने वाली बीजेपी की सरकार ने गंगा को प्रदूषित कर रहे उद्योगपतियों और हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार का खुलकर साथ दिया है | राजनेताओं को तो गंदगी फैलाने वाले थैलीशाहों के वोट भी चाहियें और नोट भी , इसलिए वो स्वामी निगमानंद जैसों का साथ देने की बजाए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों और थैलीशाहों का साथ देते रहेंगे | हम सबका फ़र्ज़ बनता है की हम इस नेक काम को करने में अपना हिस्सा डालें , जिसके लिए उन्होंने अपनी कुर्बानी दी |गंगा के प्रदूषित हो रहे पानी के इलावा सभी नदियों को प्रदूषित होने से बचाना होगा  .- रोशन सुचान 
9 दिनों के अनशन की नोटंकी वाले रामदेव और शहीद होने वाले निगमानंद एक ही हॉस्पिटल में
निगमानंद नहीं रहे , गंगा को बचाने की मांग को लेकर 68 दिनों तक अनशन करने के बाद स्वामी निगमानंद की मौत हो गई। उनका स्वामी होने का उतना महत्व नहीं था , जितना एक जनहितैषी किरदार का मनुष्य बनकर मानवता की भलाई में अपनी क़ुरबानी देने का है |  वे उसी  हॉस्पिटल में भर्ती थे, जहां बाबा रामदेव भी भर्ती थे । इससे पहले भी स्वामी निगमानंद जी ने क्रमवार 73 दिन , 68 दिन के इलावा लोहारीनागपाला जल विद्युत परियोजना को रद्द करने की मांग को लेकर भी अनशन किया था। ये बात सही है की जहां टी |आर| पी| है वहां मीडिया और जहां वोट हैं वहां राजनेता | याद रहे की सिर्फ 9 दिनों का अनशन करने वाले रामदेव का हाल जानने के लिए देशभर का मीडिया और हाई प्रोफाइल संत व नेता वहां जमावड़ा लगाए रहे, लेकिन कोमा की हालत में जीवन-मृत्यु से जूझ रहे निस्वार्थ योगी निगमानंद की किसी ने खबर नहीं ली , शाएद इसलिए की उन्होंने कोई स्टंट नहीं किया और रविवार की रात उनकी गुमनाम मौत हो गई। भारतीय समाज में जिस गंगा को गंगा माता कहकर पूजा जाता है , वो उस गंगा में डाली जा रही गंदगी के विरोधी थे | जो आवाज़ उन्होंने उठाई वो किसी ने नहीं सुनी और तब स्वामी ने कहा की जब तक गंगा में डाली जा रही गंदगी को बंद नहीं किया जाता ,  तब तक वो अनाज का एक दाना भी नहीं खायेंगे और वो मरणव्रत पर बैठ गये | कई उद्योगपति तो मान गये पर बीजेपी सरकार तक सीधी पहुंच रखने वाला हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार नहीं मान रहा था और सरकार की पीठ पर सवार होकर वो अपनी जिद पर अड़ा रहा , हारकर स्वामी ने मोर्चा लगा लिया और अपनी जान देकर शहीद हो गये | कहा जाता है की स्वामी निगमानंद की तबीयत बिगड़ने पर जब उन्हें हॉस्पिटल लाया गया था , तो उन्हें  जहर दिया गया था | उनके पेराकारों का तो यहाँ तक कहना है की हॉस्पिटल के अन्दर इलाज के बहाने उनको जहर दिया जाता रहा और उनकी बिगड़ रही हालत को लोगों से छुपाया गया | ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार उनको अपने रास्ते का काँटा समझ रहे उद्योगपतियों की दासी बन जाए | अपने आपको पार्टी विद डिफरेंस कहने वाली बीजेपी की सरकार ने गंगा को प्रदूषित कर रहे उद्योगपतियों और हिमालयन स्टोन क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार का खुलकर साथ दिया है | स्वामी शिवानंद ने राज्य की बीजेपी सरकार पर उद्योगपतियों , और उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर इस युवा संन्यासी को जहर देकर मारने का आरोप लगाया है तथा पोस्टमार्टम  एम्स से करवाने की मांग की है | रही बात प्रदूषण की तो भारत में जल स्त्रोतों का प्रदूषण बढ़ रहा है , अगर प्रदूषण इसी तरह से बढता रहा तो हमारी अगली पीढियां अपने जन्म के साथ ही रोगों को लेकर पैदा होंगी , जिनका इलाज करना आसान नहीं होगा |  ये हमारी सबकी जिम्मेदारी होनी चाहिए पर इन कामों को करने के लिए कोई निगमानंद या संत सींचेवाल जैसे ही सामने आते हैं | राजनेताओं को तो गंदगी फैलाने वाले थैलीशाहों के वोट भी चाहियें और नोट भी , इसलिए वो स्वामी निगमानंद जैसों का साथ देने की बजाए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों और थैलीशाहों का साथ देते रहेंगे | 
रोशन सुचान
ले दे कर बात रही मीडिया की तो उनको भी रामदेव जैसे ड्रामेबाजों की खबर ज्यादा अहम लगती है और भारत के भविष्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले जिक्र के काबिल ही नहीं लगते | ये भी हमारे समाज का दुखांत ही है की कोई दल भी इन कामों के लिए अपनी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा | जिस मकसद के लिए निगमानंद ने अपनी बली दी , वो अकेले उनकी नही पूरे समाज की समस्या थी | हम सबका फ़र्ज़ बनता है की हम इस नेक काम को करने में अपना हिस्सा डालें , जिसके लिए उन्होंने अपनी कुर्बानी दी |  शहीद स्वामी को सच्ची श्रधांजली है की गंगा के प्रदूषित हो रहे पानी के इलावा सभी नदियों को प्रदूषित होने से बचाना होगा | वहीं 68 दिनों के अनशन के बावजूद निगमानंद से बातचीत न करने तथा उद्योगपतियों और उच्च पदों पर बैठे लोगों के इशारे पर संन्यासी को जहर देकर मारने के आरोपों से विवादों में घिरी बीजेपी सरकार की जांच करवानी होगी - रोशन सुचान (दो टूक से साभार) 

Tuesday, June 14, 2011

हम सब क्रांति के प्रति जबाबदेह हैं--चे ग्वेरा

चे ग्वेरा की क्रांति की व्याख्या- फिदेल कास्त्रो
सन् 1965 के दौरान चे ग्वेरा के गायब हो जाने को लेकर तरह-तरह की अंफवाहें उड़ाई जा रही थीं। इस तरह की भ्रमपूर्ण और गलत खबरों को जानबूझकर हवा दी जा रही थी, जिसमें क्रांतिकारी दस्तों में फूट पड़ जाए। इन अफवाहपूर्ण खबरों में दावा किया जाता था कि फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा के बीच विद्यमान राजनीतिक समझदारी का अंत हो गया है, यह कि कास्त्रो ने चे पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, उन्हें निर्वासित कर दिया गया है, या कि चे की हत्या की जा चुकी है। जानबूझकर पूर्वोक्त किस्म के विभ्रमों को सप्रयास फैलाया जा रहा था। 
28 सितंबर 1965 को आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए फिदेल कास्त्रो ने घोषणा की कि कुछ ही दिनों में वह चे ग्वेरा के उस पत्र को सार्वजनिक करेंगे जिसे चे ने क्यूबा छोड़ने से बिलकुल पहले लिखा था। इसी सभा में कास्त्रो ने कहा, ੋआने वाले अवसर पर हम जनता को कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के बारे में बताएंगे।ੋ कास्त्रो ने इसके आगे कहा कि शत्रु इस मामले में एक बहुत बड़ी साजिश का अनुमान कर रहा है और ढेरों भ्रम फैला रहा है कि वे यहां हैं, कि वे वहां हैं, वे जिंदा हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। इस समय वे भ्रमित हैं और लगातार भ्रमों की ही खोज कर रहे हैं। वे कपटपूर्ण बातें बना रहे हैं। हम कामरेड अर्नेस्टो चे ग्वेरा के एक दस्तावेज को आपके सामने लाना चाहते हैं, जिसमें उन्होंने अपनी अनुपस्थिति के बारे में बताया है, उसकी व्याख्या की है। लेकिन जैसा मैंने आपको पहले ही बताया कि इसके लिए एक पूरी बैठक की आवश्यकता होगी (अभी की आवाजें)। अभी नहीं, क्योंकि मैं यहां वह दस्तावेज नहीं लाया हूं। वैसे मैंने यह घोषणा साधारण रूप में ही की है||||जैसा मैंने आपको बताया कि उस अवसर पर हम (चे) के उस दस्तावेज को पढ़ेंगे और कुछ मुद्दों पर चर्चा भी करेंगे। कास्त्रो द्वारा इंगित बैठक से तात्पर्य क्यूबाई कम्युनिस्ट पार्टी की नव गठित केंद्रीय समिति के साथ आयोजित बैठक से था, जिसका सार्वजनिक रूप से सीधा प्रसारण हुआ। पार्टी की इस नव गठित केंद्रीय समिति में स्पष्ट रूप से चे ग्वेरा का नाम नहीं था। इस तथ्य को फिदेल कास्त्रो ने अपने 3 अक्टूबर 1965 को दिए गए भाषण में स्पष्ट किया। इस सभा में श्रोताओं के रूप में ग्वेरा का परिवार भी उपस्थित था।पार्टी की हमारी केंद्रीय समिति से एक खास व्यक्ति अनुस्थित है जिसमें सभी आवश्यक वरीयताएं और गुण विद्यमान हैं। लेकिन उस व्यक्ति का नाम पार्टी की केंद्रीय समिति के घोषित सदस्यों में नहीं है। शत्रु इसमें सक्षम है कि वह इस विषय में कोई इंद्रजालिक कल्पना कर ले। लेकिन इन भ्रमों को उत्पन्न करने की कोशिशें करते हुए शत्रु थक चुका है, वह संशय और अनिश्चितता उत्पन्न करने की अपनी कोशिशों से परेशान हो चुका है और इस सबका हमने बहुत धैर्यपूर्वक इंतजार किया है क्योंकि ऐसे समय पर इंतजार करना आवश्यक था।यह अंतर क्रांतिकारियों और प्रति-क्रांतिकारियों, साम्राज्यवादियों और क्रांतिकारियों के बीच का है। क्रांतिकारी जानते हैं कि इंतजार किस तरह से किया जाता है। हम जानते हैं कि किस तरह से धैर्य रखा जाता है। हम कभी निराश नहीं होते हैं। जबकि प्रतिक्रियावादी, प्रति-क्रांतिकारी हमेशा निराशा की स्थिति में ही रहते हैं, सतत उद्विग्नता के शिकार रहते हैं और निरंतर झूठ बोलते रहते हैं। और यह सब भी वे अत्यंत छिछले और घृणित तरीके से ही करते हैं।आप उन यांकी सीनेटरों और अधिकारियों की लिखी चीजें पढ़ें, तब स्वयं से प्रश्न करेंਸ जो व्यक्ति अपने सहयोगियों के साथ संतुलित बरताव नहीं कर पा रहा है वह कांग्रेस में क्या करता होगाੈ इनमें से कुछ तो सर्वोच्च स्तर की मूर्खता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। ये लोग विस्मयकारी ढंग से झूठ बोलने की आदत से ग्रस्त हैं। सच मायने में वे झूठ बोले बिना जीवित ही नहीं रह सकते हैं। वे सचाई से भयग्रस्त रहते हैं। वही, यदि क्रांतिकारी सरकार एक बात कहती है, तो आगे भी वही बात कहती है। जबकि शत्रु इसमें तीव्रता देखते हैं, भयावहता देखते हैं, और सबसे बड़ी बात कि वे इस सबके पीछे एक योजना, षडयंत्र देखते हैं! यह सब कितना हास्यास्पद है! वे किस डर में जीते हैं! और इस सबको देखकर आप कह सकते हैं ਯ क्या वे इसी पर विश्वास करते हैं क्या वे जो कहते हैं उन पर विश्वास करते हैंੈ क्या वे अपनी ही कही बातों पर विश्वास करने की आवश्यकता महसूस करते हैंੈ क्या वे उन सब बातों पर विश्वास किए बिना जीते हैं जिन्हें वह दिन-प्रतिदिन कहते रहते हैंੈ या वे इसीलिए सब कुछ कहते हैं कि उस पर विश्वास नहीं किया जाए.
इस विषय में कुछ भी कहना मुश्किल है। असल में चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों के मस्तिष्क में क्या है कौन सा डर है जो उन्हें हर चीज भयग्रस्त कर देती है या किसी भी चीज से उन्हें तीव्र, लड़ाकू और आतंककारी योजना का ही आभास होता रहता हैੈ वे बिलकुल नहीं जानते कि साफ हाथों और सचाई से लड़ाई करने से बेहतर कोई और तकरीब या रणनीति नहीं होती। क्योंकि यही वे हथियार हैं जो आत्मविश्वास पैदा करते हैं, विश्वास बढ़ाते हैं, सुरक्षा, गरिमा और नैतिकता को बढ़ाते और प्रसारित करते हैं। और हम क्रांतिकारी शत्रुओं को पराजित करने, उन्हें नेस्तनाबूत करने के लिए इन्हीं हथियारों का प्रयोग करते हैं।
झूठ! क्या आज तक किसी ने क्रांतिकारियों के मुंह से झूठ सुना हैੈ झूठ वह हथियार है जो कभी भी क्रांतिकारियों की मदद नहीं कर सकता है। और किसी भी गंभीर, अच्छे क्रांतिकारी के लिए इस बेहूदे हथियार की कभी कोई आवश्यकता भी नहीं रही है। उनका हथियार तर्क होता है, नैतिकता होता है, सचाई होता है, एक विचार की रक्षा करना होता है, एक प्रस्ताव होता है, एक पक्ष (पोजीशन) ग्रहण करना होता है।ੋ
संक्षेप में, हमारे विरोधियों द्वारा प्रयुक्त नैतिकता संबंधी नियमावली वास्तविकता में दयनीय है। इस तरह भविष्यवक्ता, पंडित, क्यूबाई मामलों के विशेषज्ञ नियमित रूप से काम कर रहे हैं कि सामने आ पड़ी इस पहेली को सुलझाया जा सके। क्या चे ग्वेरा की मृत्यु हो चुकी है क्या अर्नेस्टो चे ग्वेरा बीमार हैं क्या अर्नेस्टो चे ग्वेरा के क्यूबा से मतभेद उत्पन्न हो चुके हैंੈ और भी इसी तरह के ढेरों बेहूदा कयास। स्वाभाविक रूप से यहां के लोगों का विश्वास मजबूत है। यहां लोग विश्वास करते हैं। लेकिन शत्रु इसी तरह की चीजों का प्रयोग करता है, विशेषकर बाहर रहकर वह भ्रम फैलाते हैं। वे हमारे ऊपर मिथ्यापवाद करते हैं। यहां, क्यूबा के विषय में उनका कहना है कि यहां एक विध्वसंक, भयावह कम्युनिस्ट शासन है। बिना कोई सबूत छोड़े लोग यहां से गायब हो रहे हैं। बिना कारण बताए उन्हें निर्वासित किया जा रहा है। और जब लोगों ने उन सबकी अनुपस्थिति को रेखांकित किया, तब हमने कहा कि हम उन्हें उचित समय पर वह सब बताएंगे। इसका मतलब इंतजार करने का कोई कारण था।
हम साम्राज्यवादी शक्तियों की घेरेबंदी में रहते और काम करते हैं। यह विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है। इतने लंबे समय तक वियतनामी लोगों के ऊपर यांकी साम्राज्यवाद के आपराधिक बम गिरते रहे, हम नहीं कह सकते कि हम सामान्य परिस्थितियों में हैं। स्थिति ऐसी है कि 1,00,000 से अधिक यांकी सैनिक मुक्ति आंदोलन का दमन करने के लिए भूमि पर उतर चुके हैं। अब साम्राज्यवादी भूमि के सैनिक एक गणतंत्र में, जिसे अन्य गणतंत्रों के समान अधिकार प्राप्त है, वे सैनिक उसकी सार्वभौमिकता को नष्ट कर रहे हैं। यह स्थिति डोमनिक गणतंत्र की तरह है। तात्पर्य यह है कि विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है। जब हमारे देश घिरे हुए हैं, तब साम्राज्यवादी भाड़े के टट्टू और नियोजित आतंकवादी कार्रवाइयां बेहूदे तरीके से की जा रही हैंਸ जैसे कि सिएरा एरेनजाजू (निष्काषित किए गए प्रति-क्रांतिकारियों द्वारा स्पेनी व्यापारिक जहाज पर आक्रमण) के मामले में हुआ। उस समय साम्राज्यवादी धमकाते थे कि वे लैटिन अमरीका या विश्व के किसी भी देश में हस्तक्षेप कर सकते हैं। तात्पर्य सीधा है कि हम सामान्य परिस्थितियों में नहीं रह रहे हैं। हम क्रांतिकारी कभी सामान्य परिस्थितियों में नहीं रह पाते हैं। बावजूद इसके, उस समय जब हम भूमिगत रूप से बाटिस्टा की तानाशाही का मुकाबला कर रहे थे, तब भी हमने संघर्ष के नियमों का पालन किया। इसी तरह, जब इस देश में क्रांतिकारी सरकार की स्थापना हो गई, विश्व को इसे वास्तविक रूप में स्वीकार करना चाहिए था। लेकिन ऐसी स्थिति में भी हमने (तब भी) संघर्ष के नियमों का उल्लंघन नहीं किया। इसका सीधा मतलब है कि विश्व सामान्य परिस्थितियों में नहीं है।
इसकी व्याख्या के लिए मैं अर्नेस्टो चे ग्वेरा के हस्तलिखित-टाइप पत्र को पढ़ने जा रहा हूं, जो सारे मामले की स्वयं ही व्याख्या करता है। मुझे विस्मय होगा यदि मुझे अपनी मित्रता और साथीपन को बताने की आवश्यकता हो कि कैसे इस मित्रता की शुरुआत हुई और यह किन परिस्थितियों में इसका विकास हुआ।मुझे लगता है कि इसकी आवश्यकता नहीं। मैं स्वयं को उनके पत्र को पढ़ने तक ही सीमित रखूंगा।
मैं इसे पढ़ता हूं ਯ हवाना|||||ੋ इसमें कोई तारीख नहीं पड़ी है, क्योंकि इस पत्र के विषय में उद्देश्य था कि उसे किसी उचित अवसर पर पढ़ा जाए। लेकिन ध्यान रहे कि यह इसी साल के अप्रैल की पहली तारीख को प्राप्त हुआ था। आज से बिलकुल छह महीने और दो दिन पहले। मैं इसे पढ़ना शुरू करता हूं।
हवाना
कृषि वर्ष
फिदेल ਯ
इस क्षण मैं कई चीजें याद कर रहा हूं। वह क्षण जब मैं तुमसे (क्यूबाई क्रांतिकारी) मारिया एंटोनियो के घर पर पहली बार मिला था। उसी समय तुमने मुझसे साथ काम करने का प्रस्ताव दिया था। शुरुआती तैयारियों के दौरान ढेरों समस्याएं और तनावपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ा। एक दिन वे वापस आए और पूछा कि मौत के मामले में किसको जिम्मेदार ठहराया जाए, और वास्तव में इस सबकी जिम्मेदारी किसके ऊपर है। बाद में हमने इस सचाई को जाना कि क्रांति (यदि यह वास्तविक हो) में या तो व्यक्ति जीता है या फिर उसकी मृत्यु होती है। हमारे कई साथी हमें विजय के रास्ते पर छोड़कर आंख मूंद कर चले गए।
आज ये सारी चीजें कम नाटकीय प्रतीत होती हैं क्योंकि हम अधिक परिपक्व हो चुके हैं। लेकिन घटनाएं तो स्वयं को दोहराती हैं। मुझे प्रतीत होता है कि क्यूबाई क्रांति के साथ संबध्द मैंने अपने कर्तव्य को पूरा कर दिया है। और अब मैं तुमसे विदा कहता हूं। सभी साथियों को और तुम्हारे आदमियों को, जो अब मेरे हैं, विदा कहता हूं। अब मैं औपचारिक रूप से पार्टी की नेतृत्व स्थिति के साथ मंत्रीपद और कमांडर के ओहदे से भी त्यागपत्र देता हूं। इसके साथ ही साथ मैं क्यूबाई नागरिकता से भी त्यागपत्र देता हूं। इसके साथ क्यूबा के प्रति मेरा कोई विधिक दायित्व शेष नहीं रह गया है। लेकिन अब दायित्व कुछ प्रकृति का हो गया है। एक ऐसी प्रकृति का दायित्व जिसे उस तरह से नहीं तोड़ा जा सकता है जिस तरह किसी पद के साथ संलग्न दायित्व से पृथक हुआ जाता है।
अपने पिछले जीवन को याद करते हुए मुझे विश्वास है कि मैंने पर्याप्त एकलयता और समर्पण के साथ क्रांतिकारी कार्यों और उसकी विजय में योगदान किया है। केवल मेरी पहली गंभीर असफलता ने तुम्हारे ऊपर मेरे विश्वास को बढ़ा दिया है। सिएरा मनेस्ट्रा के पहले क्षण से ही नेतृत्व और क्रांतिकारिता के तुम्हारे गुण को शीघ्रता से नहीं सीख पाया हूं।
वास्तव में मैं यहां बहुत ही भव्य और गरिमामय दिनों में रहा हूं। कैरेबियन (मिसाइल) संकट के बुरे समय में भी तुम्हारी तरफ से तुम्हारे लोगों के जुड़ाव को तीव्रता से महसूस करता रहा हूं। उन दिनों को याद करते हुए कहता हूं कि ऐसा शायद ही कभी हुआ हो, जब किसी नेतृत्वकर्ता ने तुम्हारी तरह की बुध्दिमत्ता का प्रदर्शन किया हो। मैं स्वयं पर गर्व करता हूं कि मैंने तुम्हारा अनुकरण किया। बिना किसी झिझक के तुम्हारे प्रति यह आस्था इसके साथ जुड़े खतरों का आकलन करते हुए और सिध्दांतों पर आस्था रखते हुए थी।संसार के कई अन्य देश भी मेरे साधारण प्रयासों की उपेक्षा कर रहे हैं। मैं उन दायित्वों को पूरा कर सकता हूं, जिन्हें तुमने अस्वीकृत किया है। जाहिर सी बात है कि तुम्हारी जिम्मेदारी क्यूबाई प्रमुख के रूप में है। इस कारण हम दोनों के अलग होने का समय आ गया है।
मैं जानता हूं कि वह अवसर गम और खुशी दोनों का है। मैं अपनी सबसे शुध्दतम आशाएं निर्माता और अपने आत्मियों में सबसे प्रिय के प्रति छोड़े जाता हूं। साथ ही एक ऐसे व्यक्ति से दूर हो रहा हूं, जिसने मुझे एक पुत्र की तरह प्यार किया है। सच में, यह बात मेरी भावनाओं पर एक जख्म की तरह है। मैं एक नए युध्द क्षेत्र की ओर इस विश्वास के साथ जा रहा हूं कि तुम मेरा मार्गदर्शन करोगे। मेरे लोगों की भावनाएं किसी पवित्र कर्तव्य को पूरा करने और साम्राज्यवाद के प्रति लड़ने के लिए विद्यमान हैं। यह आश्वासन सभी आंतरिक घावों और चोटों से बढ़कर है।
मैं एक बार पुनਯ दोहराता हूं कि अब उदाहरणों के सिवा क्यूबा के प्रति मैं अपनी समस्त जिम्मेदारी से मुक्त होता हूं। लेकिन यह याद रखना कि यदि मेरा अंतिम समय किसी दूसरी धरती-आकाश के नीचे आता है, निश्चित रूप से मेरा अंतिम विचार तुमतुम्हारे लोगों के बारे में ही होगा। मैं तुम्हारी शिक्षाओं और तुम्हारे द्वारा दिए गए उदाहरण के लिए तुम्हें शुक्रिया अदा करता हूं। और मैं कोशिश करूंगा कि मैं अपने कार्यों को अंतिम परिणाम तक पहुंचा सकूं।
हमारी क्रांति की विदेश नीति के लिए मुझे हमेशा याद किया जाएगा, शायद आगे भी। मैं जहां भी रहूंगा, क्यूबाई क्रांतिकारी होने के दायित्व का निर्वाह करूंगा, और इसी गरिमा के अनुरूप व्यवहार भी करूंगा। मुझे खेद है कि मैं अपने बीवी-बच्चों के लिए कुछ भी नहीं छोड़कर जा रहा हूं। लेकिन मैं इस स्थिति में भी खुश हूं। मुझे उनके लिए इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए कि राज्य उन्हें रहने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध करा दे और पर्याप्त शिक्षा दिला दे। तुमसे और अपने लोगों से कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं, लेकिन मुझे महसूस होता है कि वे अनावश्यक हैं। शब्द सब कुछ नहीं व्यक्त कर सकते हैं, जिनकी हम उनसे अपेक्षा करते हैं। और मैं नहीं सोचता कि अनावश्यक ही ढेरों पृष्ठ रंगे जाएं।
विजय की ओर आगे हमेशा! मृत्यु या जन्मभूमि! मैं अपने समस्त क्रांतिकारी उत्साह के साथ तुम्हारा आलिंगन करता हूं। चे| जो लोग क्रांतिकारियों के विषय में कहते हैं, और विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी व्यक्ति ठंडे, असंवेदनशील और भावनाहीन व्यक्ति होते हैं, उनके लिए यह पत्र सभी किस्म की भावनाओं, संवेदनाओं के साथ परिपूर्णता का उदाहरण होगा। कॉमरेड यह कोई जिम्मेदारी नहीं ,जिसका हमसे जुड़ाव हो ‍।हम सब क्रांति के प्रति जबाबदेह हैं।और यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम अपनी सर्वोच्च क्षमता के साथ क्रांतिकारी आंदोलन का समर्थन और सहयोग करें। हम इस जिम्मेदारी इसके परिणाम और इसके साथ जुड़े खतरों का भी अहसास करते हैं। हम इन सात वर्षों से अधिक के समय में यहां साम्राज्यवादी शक्तियों की उपस्थिति को अच्छी तरह समझ गए हैं। साथ ही इस बात को भी अच्छी तरह से समझ गए हैं कि यहां किस तरह लोगों का शोषण किया जाता है और उन्हें किस चरह उपनिवेशित किया जाता है। हम इन विद्यमान खतरों के साथ आगे बढ़ेंगे और लगातार क्रांति के दायित्व को निभाते रहेंगे।

इस कर्तव्य को पूरा करना हमारी जिम्मेदारी है और कामरेड चे ग्वेरा की पूर्वोक्त भावनाओं के प्रति अत्यधिक सम्मान है। यह आदर स्वतंत्रता और अधिकार के प्रति है। वह सच्ची स्वतंत्रता हैउनकी स्वतंत्रता नहीं, जो हमें बेड़ियों में कसना चाहते हैं, बल्कि उन लोगों की स्वतंत्रता है जिन्होंने गुलामी की जंजीरों के विरुध्द बंदूकें उठाई हैं।
मि|(राष्ट्रपति) जॉनसन, हमारी क्रांति एक अन्य तरह की स्वतंत्रता का दावा करती है! और वह जो क्यूबा छोड़कर साम्राज्यवादियों के साथ रहने के लिए जाना चाहते हैं, वह लोग जो साम्राज्यवादियों के लिए काम करने कांगो और वियतनाम जाना चाहते हैं, वे यह सब कर सकते हैं। सभी जानते हैं कि साम्राज्यवादियों की ओर से नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों की ओर से जब भी लड़ाई के लिए आवश्यकता होती है, इस देश के प्रत्येक नागरिक ने कभी इनकार नहीं किया है।
यह एक स्वतंत्र देश है मि| जॉनसन, सभी के लिए स्वतंत्र ! और वह मात्र एक पत्र नहीं था, इसके अलावा हमारे पास अन्य साथियों के पत्र और शुभकामनाएं आ चुकी हैं। ये पत्र ੋमेरे बच्चों के लिएੋ या ੋमेरे माता-पिता के लिएੋ हैं। हम इन सभी पत्रों को उनसे संबंधित रिश्तेदारों और साथियों को देंगे। लेकिन इसके बावजूद हम उनसे यह अनुरोध भी करेंगे कि वे इन पत्रों को क्रांति को समर्पित कर दें, क्योंकि हमें विश्वास है कि ये दस्तावेज इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे इतिहास का हिस्सा बनेंगे।
मुझे विश्वास है कि अब सभी चीजों की व्याख्या हो गई है। यहां हमें यही सब बताना था। बाकी को शत्रुओं की चिंताओं के लिए छोड़ देते हैं। हमारे सामने पर्याप्त लक्ष्य हैं, कई कार्य हैं जिन्हें पूरा करना है। अपने देशवासियों और विश्व के प्रति कई कर्तव्यों को निभाना है, और हम सब उसे पूरा करेंगे। (दो टूक से  साभार

Monday, June 13, 2011

जून, 1975 और जून, 2011 // लालकृष्ण आडवाणी


भारतीय जनसंघ एवं भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्‍यक्ष। भारत के उप
 प्रधानमंत्री एवं केन्‍द्रीय गृहमंत्री रहे। राजनैतिक शुचिता के प्रबल पक्षधर।  
प्रखर बौद्धिक क्षमता के धनी एवं बृहद जनाधार वाले करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व।
 वर्तमान में भाजपा संसदीय दल के अध्‍यक्ष एवं लोकसभा सांसद।
हस्तरेखा विशेषज्ञ, ज्योतिषियों इत्यादि के प्रति मेरा सदैव अविश्वास रहा है। राजनीति में ऐसे अनेक हैं जो अपने विश्वस्त ज्योतिषी की सलाह के बिना किसी नए प्रोजेक्ट को शुरु करने से हिचकते हैं।
मैं अक्सर एक ऐसे अवसर का स्मरण करता हूं जब मेरा यह अविश्वास बुरी तरह से हिल गया।
1970 के दशक में हमारी पार्टी (तब जनसंघ) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक प्रतिष्ठित पेशेवर ज्योतिषी डा. वसंत कुमार पंडित थे। वे मुंबई से थे (तब बम्बई)। वह पार्टी के प्रतिबध्द कार्यकर्ताओं में से थे जो कश्मीर के पूर्ण विलय के आंदोलन और आपातकाल के विरुध्द आन्दोलन सहित चौदह बार जेल गए थे। पार्टी में काम करते-करते पहले वह बंबई शहर जनसंघ और बाद में महाराष्ट्र प्रदेश जनसंघ के अध्यक्ष बने।
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गत् सप्ताह लखनऊ में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक हई। पार्टी अध्यक्ष श्री गडकरी ने 4 जून की शाम को मुझे समापन भाषण करने को कहा। मैंने अपने भाषण की शुरुआत इस टिप्पणी से की कि जून 1975 भारतीय राजनीति में कभी भी न भुलाये जा सकने वाले महीने के रुप में याद रहेगा। और मैंने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या जून 2011 भी हम सबके लिए ऐसा ही न भुलाये जा सकने वाला महीना बनने जा रहा है।
जून, 1975 में एक के बाद एक दो बड़ी घटनाएं घटीं।
11 जून को गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित हुए। तब तक गुजरात कांग्रेस का अभेद्य दुर्ग था। लेकिन श्री मोरारजी देसाई के मार्गदर्शन में संयुक्त विपक्ष ने इस दुर्ग को धराशायी किया और राज्य विधानसभा में सफलता पाई।
उसके अगले दिन की घटना कांग्रेस पर बिजली गिरने समान थी। श्रीमती इंदिरा गांधी के विरुध्द दायर चुनाव याचिका के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने रायबरेली से उनका चुनाव रद्द कर दिया और भ्रष्ट चुनावी आचरण के आधार पर 6 वर्षों तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी।
इन दो घटनाओं ने स्वभाविक रुप से सभी गैर-कांग्रेसी क्षेत्रों में एक किस्म का आशावाद भर दिया। वस्तुत: इसी माहौल में हमारी पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक गुजरात विधानसभाई चुनावों की गणना के तत्काल बाद 15,16 तथा 17 जून को माऊण्ट आबू में हुई।
दूसरे दिन दोपहर के भोजन के पश्चात मैंने यूं ही वसंत कुमार से पूछा ”पण्डितजी, आपके नक्षत्र आगे के लिए क्या बोल रहे हैं? ”1976 की शुरुआत में लोकसभाई चुनाव होने थे। गुजरात के आधार पर मेरा राजनैतिक अनुमान मुझे 1976 के प्रति आशावादी बना रहा था। उनके उत्तर ने मुझे झकझोर दिया और साथ ही मेरे आशावाद को भी।
उन्होंने कहा ”आडवाणीजी, सच में मैं भी नहीं समझ पा रहा हूं, अपने स्वयं के अनुमान से जो मैं देख रहा हूं वे बताते हैं कि हम दो साल के वनवास की ओर बढ़ रहे हैं।”
दस दिन बाद 26 जून को प्रधानमंत्री ने आपातकाल की घोषणा कर दी।
वसंत कुमार की भविष्यवाणी के अनुरुप आपातकाल 21 महीने रहा !
वास्तव में यह दो वर्षीय वनवास ही सिध्द हुआ!
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सन् 2002 में अपने वर्तमान निवास स्थान 30, पृथ्वीराज रोड पर आने से पहले 32 वर्षों तक मैं C1/6, पण्डारा पार्क में रहा (1970 में जब से मैं पहली बार संसद के लिए चुना गया)। मेरे एकदम पडोस में टण्डन बंधु रहते थे: (जिनमें से एक गोपाल टण्डन, सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रुप में मेरे विशेष सहायक थे तो दूसरे बिशन टण्डन आपातकाल के दौरान श्रीमती गांधी के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव थे)।
बिशन टण्डन की पुस्तक ”पीएमओ डायरी” एक ऐसा दस्तावेज है जो बताता है कि तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों – न्यायाधीश हेगड़े, न्यायाधीश शेलट और न्यायाधीश ग्रोवर-की वरिष्ठता को नजरअंदाज करना एक सुनियोजित प्रपंच था जिसका उद्देश्य मुख्य रुप से न्यायाधीश हेगड़े को मुख्य न्यायाधीश बनने से रोकना तथा उनके स्थान पर ए.एन.रे को बैठाना था। प्रधानमंत्री इसकी इच्छुक थीं कि यह सुनिश्चित हो जाए कि यदि उच्च न्यायालय उनके विरुध्द चुनाव याचिका स्वीकार कर भी ले तो सर्वोच्च न्यायालय उसे ठुकरा सके। यह संभव तो हुआ मगर आपातकाल के बाद, क्योंकि संविधान में किये गये संशोधनों और कानूनों ने वरिष्ठता के उल्लंघन को निरर्थक बना दिया।
11-12 जून की दोनों घटनाओं के बाद विपक्ष कुछ गिरफ्तारियां इत्यादि की उम्मीद तो कर रहा था। लेकिन हम में से किसी ने अप्रत्याशित आपातकाल जैसे की उम्मीद नहीं की थी -जिसमें मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप, युध्द की तुलना में भी ज्यादा कठोर, यहां तक कि संसदीय बहसों की रिपोर्ट पर भी सेंसरशिप लोकनायक जयप्रकाश, मोरारजी भाई देसाई, वाजपेयीजी, और चन्द्रशेखरजी जैसे नेताओं को कारावास, सभी प्रमुख विपक्षी सांसदों तथा एक लाख से ऊपर विपक्षी कार्यकर्ताओं को बन्दी बनाना शामिल था।
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5 जून की सुबह चेन्नई में वेणु श्रीनिवासन (टीवीएस) की सुपुत्री का एन.आर नारायणमूर्ति (इंफोसिस) के सुपुत्र से विवाह का निमत्रंण मुझे मिला था। 4 जून को मैं दिल्ली पहुंचा और अपनी सुपुत्री प्रतिभा के साथ लगभग अर्ध्दरात्रि को चेन्नई।
इसके कुछ घंटे बाद प्रतिभा ने मुझे जगाया और टीवी खोलने को कहा और रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के भक्तों – पुरुषों, महिलाओं और बच्चों – पर हो रहे हमले को देखने को कहा। मैंने टीवी खोला और वास्तव में दिख रहे दृश्य रोंगटे खड़े कर देने वाले थे।
अगली सुबह हमारी स्थानीय ईकाई द्वारा आयोजित संवाददाता सम्मेलन में मैंने कहा: वहां जनरल डायर की बंदूकें और गोलियां नहीं थीं लेकिन महिलाओं और बच्चों पर होने वाले अत्याचारों ने जालियांवाला बाग कांड की याद ताजा करा दी।
अपने संवाददाता सम्मेलन में मैंने एक बार ताजा घटनाओं और 1975 में होने वाली घटनाओं के बीच साम्य की ओर ध्यान दिलाया।
एक बदनाम सरकार ही अपने कुकृत्यों का बचाव क्रुध्द जनमत के सामने करने में असमर्थ सिध्द होती है और एक हताश नेतृत्व ही इसी ढंग से व्यवहार करता हैं। मैंने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि वे सरकार को संसद का आपात सत्र बुलाने हेतु कहें जिसमें तीन मुद्दों पर विचार किया जा सके: एक के बाद एक आए सामने आए घोटाले, विदेशों में ले जाए गये काले धन को वापस लाना और शांतिपूर्ण लोगों पर बरपा कहर। मैंने पुलिस को इस व्यवहार को ‘नंगा फासिज्म‘ करार दिया ।
पहले जब अन्ना हजारे ने लोकपाल मुद्दा उठाया तो उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के साथ जोड़ दिया गया। इन दिनों बाबा रामदेव के आंदोलन को भी आरएसएस के साथ प्रायोजित बताया जा रहा है। किसी को भी नहीं भूलना चाहिए कि जब जयप्रकाश नारायण आपातकाल विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे तब उन्हें भी इस तरह के स्वर सुनने को मिले थे।
इस सन्दर्भ में मुझे ‘हिन्दू‘ के ‘बिजनेस लाइन‘ का यह सम्पादकीय बहुत महत्वपूर्ण लगा। ”डू पीपुल मैटर” शीर्षक से प्रकाशित इसका शुरुआती पैराग्राफ इस प्रकार है:
”पिछले आठ सप्ताहों से हजारे – रामदेव के अभियानों के अनवरत दबाव में फंसी सरकार हताशा में भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान हटाने के उद्देश्य से एक के बाद एक गलती कर रही है। लोगों के मन में यह मुख्य धारणा बन गई है कि भ्रष्ट को बचाने के लिए यह सरकार किसी भी हद तक जा सकती है। गलतियां तो अच्छे ढंग से लिपिबध्द हैं लेकिन सीधे-सादे तर्क अब सामने हैं। पहला कि सिविल सोसाइटी के नागरिकों को विधायी एजेण्डा हथियाने की अनुमति नहीं दी जी सकती; दूसरा कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पीछे आरएसएस है। दूसरे तर्क को यदि पहले लें तो अवश्य पूछा जा सकता है: मान लीजिए यदि यह सत्य भी है कि आंदोलन के पीछे आरएसएस है, तो क्या इससे यह गैरकानूनी हो जाता है? क्यों सरकार भ्रष्टाचार से ध्यान हटाकर आरएसएस की ओर ले जा रही है? यदि आरएसएस के स्वयंसेवक भूकम्प या बाढ़ में सहायता करते हैं तो उनकी सहायता को सरकार अस्वीकार कर देगी? अत: बिन्दू यह नहीं है कि कौन क्या कर रहा है अपितु यह है कि क्या करना चाहिए। और यह स्पष्ट रुप से सरकार को अस्थिर करने के प्रयास” जैसी आपातकाल की शब्दावली का प्रयोग कर रहा है" (प्रवक्ता से साभार