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Wednesday, April 08, 2020

WHO प्रमुख ने कहा, 'कोविड-19 का राजनीतिकरण ना हो'

अगर एकजुट नहीं हुए तो लाशों के ढेर लग जायेंगे 
WHO/Junior Kannah कॉंगो लोकतांत्रिक गणराज्य के बुतेम्बो के दौरे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रमुख टैड्रोस एडहेनॉम घेबरेयेसस
कोविड को राजनीति से अलग ही रखिए//8 अप्रैल 2020//स्वास्थ्य
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टैड्रोस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में दुनिया का एक साथ आना ही एकमात्र विकल्प है और उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।  मंगलवार को संगठन के ख़िलाफ़ उठे आलोचना के स्वरों का जवाब देते हुए संगठन के महानिदेशक टैड्रोस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने बुधवार को कहा कि मेरा संक्षिप्त संदेश है: कृपया कोविड को राजनीति से अलग ही रखिए। 
“इस ख़तरनाक वायरस को हराने में आपके देश की एकता बेहद महत्वपूर्ण होगी।  हम आपको भरोसा दिलाते हैं...ऐसा कोई भी देश जिसके पास बेहतर प्रणाली हो सकती है, वो भी इस एकता के बिना मुश्किल और संकट में होगा। कोविड-19 का इस्तेमाल राजनैतिक फ़ायदे के लिए किए जाने की ज़रूरत नहीं है।”
दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण के अब तक 13 लाख 53 हज़ार से ज़्यादा मामलों की पुष्टि हो चुकी है और 79 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के महानिदेशक ने नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक, धार्मिक और अन्य अवरोधों से परे जाकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया है।  
उन्होंने संकट की इस घड़ी में वैश्विक एकजुटता की आवश्यकता को रेखांकित किया है, और ध्यान दिलाया है कि चेचक को उखाड़ फेंकने के लिए शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ एक साथ आए थे।
“और अब अमेरिका व चीन को साथ आना चाहिए और इस ख़तरनाक दुश्मन से लड़ाई लड़नी चाहिए, और बाक़ी दुनिया को भी इस लड़ाई में एक साथ आना चाहिए।”
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के प्रमुख ने चेतावनी जारी करते हुए कहा कि अगर एकजुट होकर साझा मोर्चा नहीं बनाया गया तो अनेक और लोग इसका शिकार होंगे। 
“अगर हम अपना बर्ताव नहीं सुधारते तो हमारे सामने बहुत सी लाशों का ढेर होगा। जब राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर दरारें होती हैं, तभी यह वायरस सफल होता है।”
महानिदेशक टैड्रोस ने बताया कि चीन के वूहान शहर में दिसंबर 2019 में पहली बार कोरोनावायरस का मामला सामने आने के बाद से उन्हें पिछले तीन महीनों में मौत की धमकियां मिल चुकी हैं और उनके ख़िलाफ़ नस्लवादी टिप्पणियां की गई हैं।
उन्होंने कहा कि वह इस बात की परवाह नहीं करते कि उनके बारे में कोई क्या कहता है. इसके बजाय वो लोगों की ज़िंदगियों को बचाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहेंगे। 
संकट और संकल्प के 100 दिन
चीन के वूहान शहर में नए कोरोनावायरस का पहला मामला सामने आने के गुरुवार को 100 दिन पूरे हुए हैं। “यह चिंतन करना अविश्वसनीय लगता है कि दुनिया में इतने कम समय में कितने नाटकीय ढंग से बदलाव आ गया है।”
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी प्रमुख ने बताया कि उनका संगठन पॉंच प्रमुख क्षेत्रों में दिन-रात कार्य कर रहा है जिसके ज़रिए देशों को तैयारी करने और कार्रवाई को संभव बनाने में मदद दी जा रही है। साथ ही बीमारी से जुड़ी ग़लत सूचनाओं के फैलने (Infodemic) पर लगाम कसने के प्रयास हो रहे हैं। 
वहीं अग्रिम मोर्चे पर जुटे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मेडिकल सामान की आपूर्ति की जा रही है।
उन्होंने बताया कि अब तक 20 लाख निजी बचाव सामग्री इकाइयाँ 133 देशों में भेजी जा चुकी हैं और आने वाले हफ़्तों में 20 लाख उपकरण और भेजे जाएंगे।
“हमने हर क्षेत्र में 126 देशों में दस लाख से ज़्यादा डायग्नोस्टिक टेस्ट भेजे हैं और हम इन उपकरणों की उपलब्धता का और भी इंतज़ाम कर रहे हैं। लेकिन हम जानते हैं कि इससे कहीं ज़्यादा की ज़रूरत है। ये पर्याप्त नहीं है।”
विश्व स्वास्थ्य संगठन और निजी सैक्टर में साझीदार संगठन ज़रूरी मेडिकल सामग्री की आपूर्ति के उत्पादन और वितरण की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस कार्य में इंटरनेशनल चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स और वर्ल्ड इकॉनॉमिक फ़ॉरम का सहयोग मिल रहा है।
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां यूएन कोविड-19 सप्लाई चेन टास्क फ़ोर्स में भी योगदान दे रही है जिसके ज़रिए अन्य लक्ष्यों के अलावा ज़रूरत के अनुरूप आपूर्ति को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। 
महानिदेशक घेबरेयेसस ने बताया कि 130 वैज्ञानिकों, धनराशि मुहैया कराने वालों और विनिर्माताओं ने एक बयान पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें कोविड-19 के ख़िलाफ़ वैक्सीन विकसित करने के काम में तेज़ी लाने के लिए यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के साथ मिलकर काम करने का संकल्प जताया गया है।
उन्होंने कहा कि पिछले 100 दिनों में हमारा अटल संकल्प रहा है कि दुनिया में सभी लोगों की सेवा समानता, वस्तुनिष्ठा और तटस्थता के साथ की जाए. और आने वाले दिनों, हफ़्तों और महीनों में भी इसी बात पर हमारा ध्यान केंद्रित रहेगा।” (संयुक्त राष्ट्र समाचार से साभार)

Sunday, January 19, 2020

जानेमाने राजनीतिज्ञ बीरदविंद्र सिंह पहुंचे जे एन यू

Sunday: 19th January 2020 at 22:26 Whats App
जे एन यू पर हमले के दौरान घायल हुई आईशी घोष के साथ भेंट की
सोशल मीडिया: 19 जनवरी 2020: (सृजनधारा ग्रुप में सरबजीत सिंह)::
हमसे सबूत मांगना महंगा पड़ा उन्हें। 
कागज़ को यूं खंगालना महंगा पड़ा उन्हें। 
शायरा लता ह्या की गाई हुई यह ग़ज़ल आजकल सोशल मीडिया पर भी लगातार लोकप्रिय हो रही है। सीएए के मुद्दे पर विरोध की चिंगारियों को इस ग़ज़ल ने भी खूब हवा दी है। 
फेसबुक और यूट्यूब में भी लगातार लोकप्रिय हो रही इसी ग़ज़ल पर सीएए के समर्थन और विरोध में बहुत से कुमेंट भी आए हैं। इसी बीच पंजाब में भी सी ए ए के विरोध में कई नए आंदोलनों की तैयारियां हैं। इन्ही ख़बरों के चलते जानेमाने राजनीतिज्ञ और लोकप्रिय नेता बीरदविंद्र सिंह ने जे एन यू में जा कर घायल छात्रा आईशी घोष के साथ भेंट की। यह मुलाकात रविवार को हुई। इस तस्वीर को सोशल मीडिया में व्हाटसअप के सृजनधारा ग्रुप में शेयर किया है सरबजीत सिंह (+91 98141 23338) ने। जिस शायरी ने  मौजूदा राजनैतिक घटनाक्रम झलक देने वाली रचनाएं सामने रखीं हैं उन में अब यह ग़ज़ल भी शामिल हो गई है। 
अब देखना है जानेमाने नेता बीर दविंदर सिंह का छात्र नेता आईशी घोष के साथ मुलाकात करना राजनैतिक माहौल छात्र राजनीति पर क्या प्रभाव डालता है। 
  

Thursday, April 24, 2014

गठबंधन की सरकार नीतियों के क्रियान्वयन में बाधक

Thu, Apr 24, 2014 at 12:05 PM
विचारधारा तो साझे में सबसे बड़े घटक की ही चलनी चाहिए -कन्हैया झा  
भोपाल: 24 अप्रैल 2014: इस चुनाव के माहौल में प्रधानमंत्री पर लिखी गयी श्री संजय बारू (लेखक) की पुस्तक बहुत चर्चा में है. लेखक यूपीए-1 के कार्यकाल में श्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे. नब्बे के दशक में श्री मनमोहन सिंह ने वित्त-मंत्री के पद पर कार्य करते हुए देश की अर्थ-व्यवस्था को लाईसेंस-परमिट राज से मुक्त किया था. यूपीए-1 के दौरान अमरीका से नाभिकीय-ऊर्जा के अनुबंध करने के समय भी उन्होनें अदम्य साहस का परिचय दिया था. उनकी ईमानदारी, देशभक्ति, कार्यकुशलता एवं सौम्य स्वभाव के कारण सभी उनका आदर करते हैं. फिर आज उनको लेकर इतना दुष्प्रचार क्यों हो रहा है ?
वास्तव में समस्या के मूल में वह शासन व्यवस्था है, जिसकी कमियाँ पिछले दो दशकों से चली आ रही साझा सरकारों के कारण पूरी तरह से उजागर हुई हैं. यूपीए-1 सरकार वाम-पंथी दलों के सहयोग से बनी थी, जो पूंजीवादी अमरीका को अपना घोर शत्रु मानते हैं. शासन चलाने के लिए कुछ लक्ष्मण-रेखायें तय की गयीं, जिसके लिए दोनों ही ओर से कुछ उदारवादी रुख अपनाए गए थे. देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अणु-ऊर्जा के विकल्प को अपनाने का विचार किया. परंतू सन 1998 के अणु-बम विस्फोट के कारण, अमरीकी पाबंदियों के चलते, विश्व का कोई भी देश भारत को नाभिकीय-ईंधन देने को तैयार नहीं था.  
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह से बहुत प्रभावित थे. सन 2005  में क्रेमलिन में हो रहे एक समारोह में जॉर्ज बुश एवं उनकी पत्नि लौरा अपनी सीट से उठे और श्री मनमोहन सिंह एवं उनकी पत्नि को संबोधित करते हुए उन्होनें कहा:
"लौरा ! तुम भारतीय प्रधानमंत्री से मिलो. तुम जानती हो कि 100 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाला भारत एक प्रजातंत्र है, जिसमें अनेक मतों एवं अनेक भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं. इनकी अर्थ-व्यवस्था भी प्रगति पर है, और यह व्यक्ति इस देश को नेतृत्व दे रहा है."
शुरू में अमरीकी राष्ट्रपति आदर से श्री मनमोहन सिंह को 'सर' कहकर बुलाते थे. बाद में जब श्री बुश भारत आये तो एक दोस्त की तरह से वे श्री मनमोहन सिंह के कंधे पर हाथ रख कर चलते देखे गए थे. इन  दोनों नेताओं के व्यक्तिगत प्रयासों से ही दोनों ही देशों में अनेकों प्रशासनिक बाधाओं के बावजूद नाभिकीय-अनुबंध का प्रारूप संसद की मंजूरी के लिए तैयार था.
भारत ने सन 1974 में पहला परमाणु-बम विस्फोट किया था. तभी से भारत पर नाभिकीय अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर करने का अमरीकी दबाव था. भारत यह हस्ताक्षर नहीं करना चाहता था, क्योंकि वह चीन की ही भांति नाभिकीय अस्त्रों को विकसित करने के अपने विकल्प को कायम रखना चाहता था. इस अनुबंध से अमरीका भारत के लिए एक अपवाद (exception) बना रहा था. इस प्रकार भारत के लिए अपने प्रति पिछले चार दशकों से चले आ रहे भेद-भाव को हमेशा के लिए ख़त्म करने का यह एक सुनहरा मौक़ा था.
इसी बीच वाम-पंथी दलों में नेतृत्व परिवर्तन से पार्टी में कट्टरवादी लोगों का वर्चस्व हो गया. उन्होनें नाभिकीय अनुबंध के विरोध को जनता के समक्ष ले जाने के लिए प्रेस-वार्ता का आयोजन किया, जबकि प्रधानमन्त्री ने इस विषय पर संसद में वक्तव्य दिया था. साथ ही उन्होनें सभी पार्टियों के नेताओं को अपने निवास-स्थान पर बात-चीत के लिए आमंत्रित किया, जहां पर प्रशासनिक अधिकारियों ने अनुबंध का पूरा विवरण उनके सम्मुख रखा. वाम-पंथियों द्वारा मुद्दे को जनता के बीच ले जाने का कोई औचित्य नहीं था.
यह देश विविधताओं से भरा हुआ है. जनता से यह अपेक्षा करना कि वह संसद में किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दे पाएगी, मुश्किल है. साझा सरकार में यदि सभी पार्टियां अपनी विचारधारा पर अड़ी रहेंगी तो शासन नहीं चल सकेगा. विचारधारा तो साझे में सबसे बड़े घटक की ही चलनी चाहिए, क्योंकि सबसे अधिक मत देकर जनता ने उसकी विचारधारा का अनुमोदन किया है. हाँ ! यदि क्रियान्वन में कहीं भ्रष्टाचार होता है तो अवश्य ही ऐसी सरकार को गिरा देनी चाहिए.  

Monday, October 21, 2013

सत्ता का विकेंद्रीकरण

 Kanhaiya Jha                                                                                          Sun, Oct 20, 2013 at 11:05 AM
(शोध छात्र)
Makhanlal Chaturvedi National Journalism and Communication University, Bhopal, Madhya Pradesh
+919958806745, (Delhi) +918962166336 (Bhopal)
Email : kanhaiya@journalist.com
            Facebook : https://www.facebook.com/kanhaiya.jha.5076 

किसी भी विकास का आधार ग्राम इकाई होती है. राज्य सरकारें बड़े आकार के बावजूद ग्राम स्तर पर जन सेवाएँ जैसे बिजली, पानी, अच्छी सड़क - यहाँ तक की आवारा मवेशियों को हटाना, आदि समस्याओं को सुलझाने में भी अक्षम नज़र आती हैं. यह इसलिए क्योंकि ग्राम स्तर पर धन, स्टाफ आदि की व्यवस्था तथा प्रबंध सही नहीं है.
भारत में सदिओं से पंचायतों ने ही स्वायत्त ग्राम इकाईयों द्वारा पूरे देश का शासन चलाया था. गाँव के प्रमुख लोग स्वयं आपस में बैठकर बिना किसी चुनाव के पंचायत का निर्माण कर लेते थे. गांधीजी ने केंद्रीकृत (Centralized) ब्रिटिश संसद प्रणाली को एक "बिना आत्मा की मशीन" कहा था. आज़ादी के पहले की कांग्रेस सरकारों के अनुभव से उनका यह निश्चित मत बना था की सत्ता के केन्द्रीकरण से भ्रष्टाचार बढेगा. इसलिए उन्होंने स्वायत्त ग्राम इकाईयों के आधार पर विकेंद्रीकृत (Decentralized) शासन तंत्र स्थापित करने की बात कही थी. प्रजातंत्र में प्रजा को शासन का अधिकार देकर सशक्त करना चाहिए. पिछले 66 वर्षों  के अनुभव से यह कहा जा सकता है की केवल वोट के अधिकार से प्रजा सशक्त नहीं होती जिससे वह सत्ता की मनमानी को रोक सके.
परंतु संविधान के पार्ट  IV में पंचायतों की भूमिका गांधीजी के "ग्राम स्वराज" से भिन्न रखी गयी. डाक्टर अम्बेडकर के अनुसार गाँवों के जाति-पांति आदि आधारों पर बंटे होने के कारण पंचायतें स्वराज के लिए सक्षम नहीं थी. नेहरूजी ने भी ग्राम पंचायतों की जगह सांसदों एवं विधायकों को ही प्राथमिकता दी.
सन 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवंत राय मेहता कमेटी की सिफारिशों को मानकर त्रिस्तरीय पंचायती राज्य संस्था के गठन को स्वीक्रति दी. शासन के इस तीसरे स्तर पर सबसे नीचे गाँवों में ग्राम-पंचायत तथा नगरों में नगरपालिकाएं एवं वार्ड्स रखे गए. मध्य स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र के लिए ग्राम-समितियां तथा शहरों में नगर निगम अथवा नगर पंचायत को बनाना था. पंचायती राज्य संस्था के शीर्ष पर जिला परिषद् बनाने का प्रावधान था. यह पूरी पंचायती राज संस्था (PRI) राज्य सरकार के नियंत्रण में रखी गयी. सन 1950 के दशक में सभी राज्य सरकारों ने इस व्यवस्था को मान लिया था और पंचायतों को स्थापित करने के लिए क़ानून भी बनाये थे, किन्तु सत्ता का कोई विकेंद्रीकरण नहीं हो सका.
सन 1993 में 73 तथा 74 वें संविधान संशोधन से चुनाव द्वारा पंचायतों के गठन को अनिवार्य किया गया. इस क़ानून में उन्हें विकास तथा सामजिक न्याय के लिए सत्ता एवं जिम्मेवारी देने का प्रावधान था. इसके अलावा संविधान के 11 वें शिडयूल में दिए गए 29 विषयों के क्रियान्वन की जिम्मेवारी भी उन्हीं दी गयी. ब्लाक स्तर पर क्षेत्र के सांसद तथा विधायकों को भी समिति में रखा गया तथा ब्लाक विकास अधिकारी को समिति का प्रशासक बनाया गया. जिला स्तर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के किसी अफसर को पूरी व्यवस्था का प्रशासक बनाया गया.  क़ानून में पंचायत को भी टैक्स आदि लगाने का अधिकार दिया गया.
परंतू पंचायतों के अधिकारों का मामला राज्य सरकारों पर ही छोड़ दिया गया. देश के 15 राज्यों में किये गए एक अध्ययन (EPW: July 5,2003) के अनुसार राज्यों द्वारा पंचायतों को जिम्मेवारियां तो दी गयीं परन्तु सत्ता का उचित हस्तांतरण नहीं किया गया. गोवा में राज्य स्तर पर 50000 प्रशासनिक अधिकारिओं का वेतनमान 250 करोड़ रूपये है. परंतू राज्य की 67 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के शासन के लिए निर्वाचित 188 ग्राम पंचायतों के लिए कर्मचारी बहुत ही कम हैं. यहाँ पर तीन पंचायतों के बीच एक सचिव तैनात किया गया है. इस कारण से टैक्स वसूली, जो की उनका मुख्य कार्य है, वह भी नहीं हो पाता. इस प्रकार संविधान की अवहेलना हो रही है.  
केन्द्रीकरण की जो प्रक्रिया राज्य स्तर पर है वही केंद्र स्तर पर भी आज़ादी के समय से ही चल रही है. सन 1991 में नव-उदारवाद अपनाने के बाद तो इसमें और गति आयी. केंद्र से राज्यों को उनके बजट में सहयोग एक फार्मूले के तहत मिलता है. इस राशि में केंद्र की अपनी महत्वपूर्ण (Flagship) योजनाओं का भी पैसा होता है. 11 वीं पंचवर्षीय योजना में यह राशि बढ़ते-बढ़ते कुल बजट सहयोग के 42  प्रतिशत तक पहुँच गयी थी. केन्द्रीकरण राष्ट्रीय विकास परिषद् में भी केंद्र एवं राज्यों के बीच टकराव का विषय बना रहा है. फिर सरकार द्वारा गठित अनेक कमीशनों ने भी इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की है.

शासन यदि संविधान के अनुसार चले तभी सुशासन कहलायेगा. जब संविधान में पंचायती राज्य संस्थाएँ बनाने के बारे में लिखा है तो केंद्र का यह कर्तव्य बनता है की उन संस्थाओं को एक निश्चित सीमा में बनवाया जाए. यदि कोई राज्य सरकार जान बूझ कर कोताही करती है तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाए. अच्छा तो यह हो की जो विषय केवल केंद्र की लिस्ट में आते हैं उनकी योजनायें भी नीचे के स्तर के सहयोग से बनाई जायें.  

Thursday, September 05, 2013

अमृतसर से किया जा रहा है सौतेला व्यवहार- नवजोत सिंह सिद्धू

Thu, Sep 5, 2013 at 4:47 PM
सारे पंजाब में हुआ विकास पर अमृतसर में नहीं-सिद्धू की सीधी बात 
*वही प्रोजेक्ट अमृतसर के बजाए कहीं अन्य जिलों में तो चालू कर दिए गए, लेकिन अमृतसर में वे प्रोजेक्ट आज भी ज्यों के त्यों पड़े हुए हैं* अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के पैसों से कहीं और विकास कार्य करवाए जा रहे हैं*नगर निगम अमृतसर के पास भी फंड की कमी 
मीडिया के सम्मुख नवजोत सिंह सिद्धू के अलग अलग अंदाज़: सभी तस्वीरें: गजिंद्र सिंह किंग //पंजाब स्क्रीन 
अमृतसर: 5 सितंबर 2013:(गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): करीब डेढ़ वर्ष तक अमृतसर से दूर रहे नवजोत सिंह सिद्धू को गुरु नगरी वापस लौटते ही अमृतसर के समूचे विकास की याद आ गई है। आज अपने निवास स्थान पर की गई प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने गुरु नगरी के विभिन्न विकास कार्यों के न होने और राज्य सरकार की ओर से अमृतसर के लिए फंड न मुहैया कराए जाने को लेकर जहां केंद्र सरकार पर निशाना लगाया, वहीं उन्होंने पंजाब सरकार पर सवालिया निशान खड़े किए। नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा, कि उन्होंने राजनीति सिर्फ मिशन के लिए शुरू की थी और उनके मन में हमेशा यही था कि अमृतसर जहां रोजाना करीब सवा लाख श्रद्धालु नतमस्तक होने के लिए आते हैं, उसे दुनिया के नक्शे में चमकाया जाए ताकि लोग न सिर्फ अमृतसर बल्कि इससे पूरे पंजाब की एक अलग छवि बना कर दूसरों के सामने पेश करें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, कि कई तरह के प्रोजेक्ट जो गुरु नगरी अमृतसर के लिए शुरू हुए थे, पर वही प्रोजेक्ट अमृतसर के बजाए कहीं अन्य जिलों में तो चालू कर दिए गए, लेकिन अमृतसर में वे प्रोजेक्ट आज भी ज्यों के त्यों पड़े हुए हैं।
              सांसद सिद्धू ने कहा, कि अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को गुरु नगरी अमृतसर में विकास कार्य करने चाहिए। लेकिन अमृतसर इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के पैसों से कहीं और विकास कार्य करवाए जा रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू ने अप्रत्यक्ष रूप से पंजाब सरकार पर हमलावर होते हुए कहा कि अमृतसर के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। नगर निगम अमृतसर के पास जरूरी मशीनरी और अन्य साजो-सामान खरीदने के लिए फंड की कमी है, लेकिन उन्हें फंड मुहैया नहीं कराए जा रहे। उनके मुताबिक उनके कई प्रोजेक्ट जैसे सिटी बस सर्विस, सालिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट आदि अधर में पड़े हुए हैं। सिद्धू ने स्पष्ट किया, कि उन्होंने राजनीति मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से सीखी है। चरित्र और नैतिकता के आधार पर उन्होंने केस में सजा होने के बाद इस्तीफा दे दिया था। लेकिन आज उन्हें दुख इस बात का है कि वह अमृतसर के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को भी घेरे में लेते हुए कहा, कि प्रधानमंत्री का संबंध चाहे अमृतसर के साथ हैं, लेकिन अमृतसर के विकास के लिए जब भी उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा, तो उन्हें समय नहीं दिया गया।
             चुनाव से पूर्व होने वाले विकास कार्यों पर सवालिया निशान खड़े करते हुए नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा, कि जब पंजाब में विधानसभा चुनाव होने थे, तो चुनाव से ठीक पहले विकास कार्यों की झड़ी लगा दी गई थी। उस समय फंड की कोई कमी नहीं थी। लेकिन अब जबकि लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, तो फंड की कमी बता कर विकास कार्य नहीं कराए जा रहे हैं। एमपी लैड फंड के पैसे जो उन्होंने इंप्रूवमेंट ट्रस्ट को विकास के लिए दिए थे, उन्हें भी रीलिज नहीं किया जा रहा।

यदि गठबंधन मेरी बलि मांगती है, तो मैं तैयार हूं-नवजोत सिंह सिद्धू

Thursday, August 22, 2013

रक्खड़ पुणिया पर बाबा बकाला में चले सियासी तीर

Wed, Aug 21, 2013 at 7:44 PM
अकाली-भाजपा और कांग्रेस ने जड़े एक-दूसरे पर कई आरोप
                                                                                                                      तस्वीर:गजिंद्र सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन 
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): रक्खड़ पुणिया के मौके पर बाबा बकाला में कांग्रेस पार्टी और अकाली-भाजपा की ओर से सियासी कांफ्रेंस आयोजित की गई। इन कांफ्रेंसों के दौरान सरकार और विपक्ष ने जम कर एक दूसरे पर शब्दी बाण छोड़ें। इस मौके पर कांग्रेस प्रधान प्रताप सिंह बाजवा ने कहा, कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया, कि राज्य सरकार केंद्र सरकार की ओर से भेजे जाने वाले फंडों का दुरुपयोग कर रही है। इसका खुलासा कैग की रिपोर्ट में हुआ है। इसके अलावा उन्होंने यह भी आरोप लगाया, कि राज्य में रेत की काला बाजारी के पीछे उप    मुख्यमंत्री और माल मंत्री का सीधा हाथ है। जिसकी सीबीआई से जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा, कि यदि पंजाब सरकार सीबीआई की जांच नहीं कराती है, तो अदालतों को इस संबंध में आगे आकर सीबीआई की जांच के आदेश देने चाहिए।
         उधर, कांग्रेस के प्रधान प्रताप सिंह बाजवा के आरोपों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, कि पंजाब में रेत की काला बाजारी के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है। उन्होंने कहा, कि केंद्र सरकार ही माइनिंग के लिए इजाजत देती है। इस इजाजत को देने में केंद्र सरकार ने काफी देरी कर दी, जिस कारण यह सब कुछ हुआ। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के हाथ बांध रखे हैं। एक ओर मंडियों में ज्यादा फसल पहुंचने पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि राज्य सरकार मंडियों से फसल नहीं उठा रही है। दूसरी ओर भंडारण के लिए गोदाम बनाने की इजाजत नहीं दी जाती। इसके अलावा उन्होंने कहा, कि उप मुख्यमंत्री और माल मंत्री पर शराब के ठेके की मलकियत के लगाए गए आरोप बेबुनियाद है। उन्होंने कहा, कि बाजवा कहें तो वह आज ही इस मामले में सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में जाकर कसम खाने को भी तैयार हैं।

Sunday, June 23, 2013

‘गठबन्धन की मजबूरी’ पर राजीव गुप्ता

Sat, Jun 22, 2013 at 11:47 PM
सिद्धांत, शिष्टाचार और अवसरवादी-राजनीति
भारत की गठबन्धन-राजनीति के गलियारों मे अक्सर ‘गठबन्धन की मजबूरी’ का जुमला सुनने को मिल ही जाता है. इस जुमले का सहारा लेकर आये दिन राजनेता गंभीरतम बातों की भी हवा निकाल देते है. अब सवाल यह उठता है कि क्या गठबन्धन किसी सिद्धांत पर बनाये जाते है अथवा सत्ता का स्वाद चखने हेतु समझौते किये जाते है ? हमे ध्यान रखना चाहिये कि सिद्धांत और समझौता दो अलग-अलग बाते है. राजनैतिक-समझौते को हम कर्नाटक की राजनीति से समझ सकते है. एक समय में कर्नाटक में भाजपा और जनता दल सेकुलर ने मिलकर चुनाव लडा और दोनो दलों के बीच यह समझौता हुआ कि दोनो दल बारी-बारी से सरकार चलायेंगे. समझौतानुसार एच.डी. देवगौडा के सुपुत्र एच.डी. कुमारस्वामी मुखयमंत्री बने, पर जब भाजपा के यद्दयुरप्पा की मुख्यमंत्री बनने की बारी आयी तो जनता दल सेकुलर ने समझौता तोडकर भाजपा के साथ विश्वासघात करते हुए यद्दयुरप्पा को मुख्यमंत्री बनने से रोक दिया. नीतीश  कुमार की सिद्धांत की नई व्याख्यानुसार सिद्धांत समझने के लिये हमे अभी हाल ही मे राजग से जनता दल यूनाईटेड के अलगाव को देखना चाहिये. नीतीश  कुमार द्वारा राजग से उनके अलगाव का प्रमुख कारण भाजपा का ‘सिद्धांत से भटकाव’ है और उनकी पार्टी सिद्धांतो से समझौता नही कर सकती.
ध्यानदेने योग्य है कि 16 जून को जनता दल (यू) के अध्यक्ष ने सैद्धांतिक आधार पर राजग से अलग होने की घोषणा की थी. इसके चलते नीतीश  कुमार की सरकार ने 19 जून को कांग्रेस, सीपीएम और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से बिहार विधानसभा में विश्वासमत हासिल कर लिया. नीतीश सरकार के पक्ष में 126 वोट और विपक्ष में 24 वोट पडे जबकि भारतीय जनता पार्टी के 91 सदस्यों और लोकजनशक्ति के 1 विधायक ने सदन का वाकआउट किया. नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा मे लगभग आधे घंटे का एक भाषण दिया. यह भाषण इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमे नीतीश कुमार ने सिद्धांत और शिष्टाचार पर बहुत अधिक जोर दिया. राजग के साथ अपने 17 वर्षों के संबंध–विच्छेद पर वो सदन को बता रहे थे कि उन्होने सैद्धांतिक आधार पर राजग से अलग होने का फैसला किया. जनता दल (यू) के नेताओं के अनुसार उनके राजग मे शामिल होने का “सिद्धांत” यही था कि भाजपा पहले अपने एजेंडे में तीन विवादित बातों – राममन्दिर, धारा 370 और एक समान नागरिक संहिता को अलग करे तो वे उसके साथ सरकार बनाने मे सहयोग करेंगे. ऐसा ही हुआ और केन्द्र मे राजग की सरकार बनी. परंतु जनता दल (यू) के राजग से अलग होने पर अब देश भ्रमित हो गया है साथ ही जनता दल (यू) के द्वारा की जा रही ‘सिद्धांत की बातें’ किसी के गले से नही उतर रही. कारण बहुत साफ है कि आज जिन सिद्धांतों की दुहाई जनता दल (यू) दे रहा है उनमें से कौन सा ऐसा सिद्धांत है जिसे भाजपा ने तोडा हो ? भाजपा ने अबतक राजग के एजेंडे से कोई छेडछाड नही की और न ही उसने 2014 के लोकसभा-चुनाव का अपना कोई प्रधानमंत्री-पद का उम्मीदवार घोषित किया. हाँ, इतना जरूर है कि पिछले दिनों भाजपा ने गोवा मे चल रही अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सर्वसम्मति से नरेन्द्र मोदी को चुनाव समिति का अध्यक्ष बना दिया था. पर चुनाव समिति का अध्यक्ष तय करना तो हर राजनीति-पार्टी का अधिकार है. इसपर किसी दूसरे दल को आपत्ति क्यो हो यह बात समझ से परे है. नीतीश  कुमार द्वारा रचित सिद्धांत की परिभाषा वास्तव मे सिद्धांत न होकर सिद्धांत की आड मे एक समझौता मात्र है और अब उन्होने भी जनता दल सेकुलर की तरह समझौता तोडकर बिहार की जनता के उस विश्वास को तोड दिया जिसके लिये बिहार की जनता ने राजग को अपना विश्वासमत दिया था.    
शिष्टाचार
अब यह बात जगजाहिर हो चुकी है कि जनता दल (यू) राजग से किसी सिद्धांत के आधार पर अलग नही हुई अपितु अलगाव के पीछे भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाना नीतीश  कुमार को नगवार गुजरना ही प्रमुख कारण है. जनता दल (यू) का राजग से अलग होते ही भाजपा ने भी नीतीश  कुमार द्वारा वर्ष 2003 मे भुज की एक सभा मे दिये गये भाषण का एक विडियो जारी कर दिया. उस विडियों मे नीतीश  कुमार खुद तत्कालीन वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की जमकर तरीफ करते हुए उन्हे केन्द्र की राजनीति मे आने की वकालत कर रहे हैं. यहाँ हमे यह नही भूलना चाहिये कि वर्ष 2002 मे साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे मे कारसेवकों को जलाने से गोधरा मे साम्प्रदायिक दंगे भडके थे. जब वह वीडियों सार्वजनिक हुआ तो नीतीश  कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होने उस समय ऐसा “शिष्टाचार” के नाते कहा था. पर यह नही बताया कि उस “शिष्टाचार” के चलते उन्होने अपने “सिद्धांतों” से समझौता क्यों किया साथ ही रामविलास पासवान की तरह वे उस समय राजग से अलग क्यों नही हुए ? साथ ही उनकी नजर में यदि अयोध्या के विवादित ढाँचे को ध्वस्त करने के आरोपी लालकृष्ण आडवाणी पंथनिरपेक्ष है तो 2002 के गुजरात दंगो के चलते नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिक कैसे है ? जाहिर सी बात है कि नीतीश  कुमार के सामने ऐसे कई सवाल है जो उनका पीछा हमेशा करते रहेंगे.        .   
अवसरवादी राजनीति
हमे यह कहने मे कोई संकोच नही होना चाहिये कि आज के राजनेता पंथनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता की आड मे अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकते है. दरअसल गठबन्धन के इस दौर में अवसरवादिता की राजनीति करना आज के राजनीतिक दलों की मजबूरी बन गई है. वर्तमान परिदृश्य में नीतीश  कुमार भी इसका अपवाद नही है यह उन्होने राजग से अलग होकर सिद्ध कर दिया. समता पार्टी से जनता दल (यू) तक के सफर मे नीतीश  कुमार ने जार्ज़ फर्नाडीस सहित उन्हे ही सबसे पहले छोडा जिन्होने उनपर विश्वास कर उन्हे चोटी तक पहुँचाया. बिहार मे न्यूनतम मजदूरी के आंकडे देकर नीतीश कुमार बिहार-विकास की बात चाहे जितनी कर ले पर उनकी मंशा अब किसी से छुपी हुई नही है. वास्तविकता यह है कि समावेशी विकास के नाम पर नीतीश कुमार अति पिछडा व महादलित के जातीय समीकरण के चलते राजनीति की बिसात पर अपनी राजनैतिक चाल चलते हुए मुस्लिम वोट को अपनी तरफ खीचना चाहते है और अब उनका ध्यान 2014 के लोकसभा चुनाव से अधिक 2015 के बिहार विधान सभा के चुनाव पर अधिक है.
-          राजीव गुप्ता, 09811558925

Wednesday, December 19, 2012

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता


इन्हे बस अपने–अपने वोट बैंक की चिंता
Tue, Dec 18, 2012 at 9:03 AM
                      यह तस्वीर समय लाईव से साभार 
राज्यसभा द्वारा सोमवार को भारी बहुमत से 117वाँ संविधान विधयेक के पास होते ही पदोन्नति मे आरक्षण विधेयक के पास होने का रास्ता अब साफ हो गया है. अब यह विधेयक लोकसभा मे पेश किया जायेगा. हलांकि इस विषय के चलते भयंकर सर्दी के बीच इन दिनो राजनैतिक गलियारो का तपमान उबल रहा था. परंतु इस विधेयक के चलते यह भी साफ हो गया कि गठबन्धन की इस राजनीति मे कमजोर केन्द्र पर क्षेत्रिय राजनैतिक दल हावी है. अभी एफडीआई का मामला शांत भी नही हुआ था कि अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये पदोन्नति मे आरक्षण के विषय ने जोर पकड लिया. एफडीआई को लागू करवाने मे सपा और बसपा जैसे दोनो दल सरकार के पक्ष मे खडे होकर बहुत ही अहम भूमिका निभायी थी, परंतु अब यही दोनो दल एक-दूसरे के विरोध मे खडे हो गये है. इन दोनो क्षेत्रीय दलो के ऐसे कृत्यो से यह एक सोचनीय विषय बन गया है कि इनके लिये देश का विकास अब कोई महत्वपूर्ण विषय नही है इन्हे बस अपने – अपने वोट बैंक की चिंता है कि कैसे यह सरकार से दलाली करने की स्थिति मे रहे जिससे उन्हे तत्कालीन सरकार से अनवरत लाभ मिलता रहे.
लेखक राजीव गुप्ता 
2014 मे आम चुनाव को ध्यान मे रखकर सभी दलो के मध्य वोटरो को लेकर खींचतान शुरू हो गयी है. उत्तर प्रदेश के इन दोनो क्षेत्रीय दलो के पास अपना – अपना एक तय वोट बैंक है. एक तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी पर अपना विरोध प्रकट करते हुए यूपीए सरकार से अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये आरक्षण पर पांचवी बार संविधान संशोधन हेतु विधेयक लाने हेतु सफल दबाव बनाते हुए एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने दलित वोट बैंक को सुदृढीकरण करने का दाँव चला तो दूसरी तरफ सपा ने उसका जोरदार तरीके से विरोध जता करते हुए कांग्रेस और भाजपा के अगडो-पिछडो के वोट बैंक मे सेन्ध लगाने का प्रयास कर रही है.इस विधेयक के विरोध मे उत्तर प्रदेश के लगभग 18 लाख कर्मचारी हडताल पर चले गये तो समर्थन वाले कर्मचारियो ने अपनी – अपनी कार्यावधि बढाकर और अधिक कार्य करने का निश्चय किया. भाजपा के इस संविधान संशोधन के समर्थन की घोषणा करने के साथ ही उत्तर प्रदेश स्थित उसके मुख्यालय पर भी प्रदर्शन होने लगे. सपा सुप्रीमो ने यह कहकर 18 लाख कर्मचारियो की हडताल को सपा-सरकार ने खत्म कराने से मना कर दिया कि यह आग उत्तर प्रदेश से बाहर जायेगी और अब देश के करोडो लोग हडताल करेंगे. दरअसल मुलायम की नजर अब एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने को राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने की है क्योंकि वो ऐसे ही किसी मुद्दे की तलाश मे है जिससे उन्हे 2014 के आम चुनाव के बाद किसी तीसरे मोर्चे की अगुआई करने का मौका मिले और वे अधिक से अधिक सीटो पर जीत हासिल कर प्रधानमंत्री बनने का दावा ठोंक सके.

मुलायम को अब पता चल चुका है कि दलित वोट बैंक की नौका पर सवार होकर प्रधानमंत्री के पद की उम्मीदवारी नही ठोंकी जा सकती अत: अब उन्होने अपनी वोट बैंक की रणनीति के अंकगणित मे एक कदम आगे बढते हुए अपने “माई” (मुसलमान-यादव) के साथ-साथ अपने साथ अगडॉ-पिछडो को भी साथ लाने की कोशिशे तेज कर दी है. उनकी सरकार द्वारा नाम बदलने के साथ-साथ कांशीराम जयंती और अम्बेडकर निर्वाण दिवस की छुट्टी निरस्त कर दी जिससे दलित-गैर दलित की खाई को और बढा दिया जा सके परिणामत: वो अपना सियासी लाभ ले सकने मे सफल हो जाये. दरअसल यह वैसे ही है जैसे कि चुनाव के समय बिहार मे नीतिश कुमार ने दलित और महादलित के बीच एक भेद खडा किया था ठीक उसी प्रकार मुलायम भी अब समाज मे दलित-गैर दलित के विभाजन खडा कर अपना राजनैतिक अंकगणित ठीक करना चाहते है.

कांग्रेस ने भी राज्यसभा मे यह विधेयक लाकर अपना राजनैतिक हित तो साधने के कोई कसर नही छोडा क्योंकि उसे पता है कि इस विधेयक के माध्यम से वह उत्तर प्रदेश मे मायावती के दलित वोट बैंक मे सेन्ध लगाने के साथ-साथ पूरे देश के दलित वर्गो को रिझाने मे वह कामयाब हो जायेंगी और उसे उनका वोट मिल सकता है. वही देश के सवर्ण-वर्ग को यह भी दिखाना चाहती है कि वह ऐसा कदम मायावती के दबाव मे आकर उठा रही है, साथ ही एफडीआई के मुद्दे पर बसपा से प्राप्त समर्थन की कीमत चुका कर वह बसपा का मुहँ भी बन्द करना चाहती है. भाजपा के लिये थोडी असमंजस की स्थिति जरूर है परंतु वह भी सावधानी बरतते हुए इस विधेयक मे संशोधन लाकर एक मध्य-मार्ग के विकल्प से अपना वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश मे है. दरअसल सपा-बसपा के बीच की इस लडाई की मुख्य वजह यह है कि जहाँ एक तरफ मायावती अपने को दलितो का मसीहा मानती है दूसरी तरफ मुलायम अपने को पिछ्डो का हितैषी मानते है. मायवती के इस कदम से मुख्य धारा मे शामिल होने का कुछ लोगो को जरूर लाभ मिलेगा परंतु उनके इस कदम से कई गुना लोगो के आगे बढने का अवसर कम होगा जिससे समाजिक समरसता तार-तार होने की पूरी संभावना है परिणामत: समाज मे पारस्परिक विद्वेष की भावना ही बढेगी.

समाज के जातिगत विभेद को खत्म करने के लिये ही अंबेडकर साहब ने संविधान मे जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की थी परंतु कालांतर मे उनकी जातिगत आरक्षण की यह व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ गयी. 1990 मे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के निर्णय ने राजनैतिक दलो के राजनैतिक मार्ग को और प्रशस्त किया परिणामत: समूचा उत्तर प्रदेश इन्ही जातीय चुनावी समीकरणो के बीच फंसकर विकास के मार्ग से विमुख हो गया. इन समाजिक - विभेदी नेताओ को अब ध्यान रखना चाहिये कि जातिगत आरक्षण को लेकर आने वाले कुछ दिनो आरक्षण का आधार बदलने की मांग उठने वाली है और जिसका समर्थन देश का हर नागरिक करेगा, क्योंकि जनता अब जातिगत आरक्षण-व्यवस्था से त्रस्त हो चुकी है और वह आर्थिक रूप से कमजोर समाज के व्यक्ति को आरक्षण देने की बात की ही वकालत करेगी.

बहरहाल आरक्षण की इस राजनीति की बिसात पर ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो समय के गर्भ में है, परंतु अब समय आ गया है कि आरक्षण के नाम पर ये राजनैतिक दल अपनी–अपनी राजनैतिक रोटियां सेकना बंद करे और समाज - उत्थान को ध्यान में रखकर फैसले करे ताकि समाज के किसी भी वर्ग को ये ना लगे कि उनसे उन हक छीना गया है और किसी को ये भी ना लगे कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी उन्हें मुख्य धारा में जगह नहीं मिली है. तब वास्तव में आरक्षण का लाभ सही व्यक्ति को मिल पायेगा और जिस उद्देश्य को ध्यान मे रखकर संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी वह सार्थक हो पायेगा.      राजीव गुप्ता(9811558925)

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता