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Saturday, November 16, 2019

सराभा के शहीदी दिवस पर सीपीआई ने कराया विशेष आयोजन

आयोजन में व्यक्त की देश में बढ़ रही साप्रदायिक ज़हर पर गहरी चिंता
लुधियाना: 16  नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
करतार सिंह सराभा। आज़ादी के लिए शहादतों का मर्ग दिखने वाला महान योद्धा। छोटी सी उम्र लेकिन कामों का रेकार्ड बहुत बड़ा। रंगीन सपने देखने की उम्र थी। घर परिवार और बजुर्ग माता पिता को संभालने की उम्र थी। इन ज़मीनी हकीकतों के बावजूद करतार सिंह ने सपना भी देखा तो एक अलौकिक सा सपना। हर किसी के बस में नहीं होता घर के सुख आराम को त्याग कर कर देश और देश की जनता के सुख का सपना  देखना। लेकिन सराभा ने सपना देखा-देश को आज़ाद कराने का सपना। सिर्फ सपना ही नहीं देखा बल्कि इसे साकार करने के लिए देश भक्ति की इसी शमा पर हंसते हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी। अपने अपने नाम के आगे गांव सराभा का नाम लगाने वाले सभी लोग काश इस भावना और त्याग को भी अपनी ज़िंदगी में उतार सकें। काश कोई तो हो जो उस रास्ते पर फिर चलने का साहस सके और बता सके कि अभी उन शहीदों के सपने अधूरे हैं। अभी बहुत काम बाकी हैं। अभी रात बाकी है। 
यूं तो आज भी सिंह सराभा का शहीदी दिन बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। बहुत ज़ोर शोर से आयोजन होते हैं। ये आयोजन सरकारी भी होते हैं और गैर सरकारी भी। इन सभी आयोजनों में देश के ठेकेदार बन बैठे सियासतदानों से कोई नहीं पूछता कि आख़िर आप देश पर कुर्बान होने वाले शहीदों को शहीद का दर्जा क्यूं नहीं देते? क्यों बेचते हो उनका नाम और उनकी शहादत? क्यों करते हो उनके नाम पर आडम्बर? अफ़सोस कि वाम दलों ने शहीदों को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए उन दिनों में भी कुछ नहीं किया जब दिल्ली में वाम की तूती बोलती थी और कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत किंग मेकर गिने जाते थे। परिणाम यह हुआ कि शहीदों का नाम एक आडंबर बन कर रह गया। वे लावारिस से हो गए। कोई भी उनके नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्र  महसूस करने लगा। काश शहीदों के नाम का दुरपयोग रोकने के उनके वारिस आगे आएं। दुःख की बता है की ऐसा दुरपयोग हर बार देखने को मिलता है। 
बड़ी हैबोवाल लुधियाना के एक सरकारी स्कूल में तो हद ही हो गयी जब सराभा के नाम पर स्कूलों बच्चों से हुस्न इश्क के गीत संगीत प्रस्तुत कराए गए जिनका देश भक्ति से कोई लेना देना ही नहीं था।  व्यापारी और साम्प्रदायिक सियासतदान इन आयोजनों के मुख्य मेहमान बने होते हैं। इसका मुद्दा कामरेड एम एस भाटिया ने सीपीआई के उस सेमिनार में भी उठाया जो सराभा की याद में आयोजित हुआ।
सीपीआई के पार्टी कार्यालय में हुए इस कार्यक्रम जहां करतार सिंह सराभा को याद किया गया वहीं देश में तेज़ी से बढ़ रहे साप्रदायिक ज़हर वाले माहौल पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जिला इकाई ने आज पार्टी आफिस में शहीद करतार सिंह सराभा का शहीदी दिवस मनाया। इस मौके पर जहां गदर लहर और अन्य शहीदों की चर्चा की गई वहीं अंग्रेज़ सरकार से कई कई बार क्षमा याचना करके रिहा होने वाले लोगों की भी चर्चा हुई। इस मौके पर वीर सावरकर और संघ परिवार को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया। इस श्रद्धांजलि सभा में जिला सचिव डी पी मौड़ के साथ साथ डॉक्टर अरुण मित्रा, रणजीत सिंह, केवल सिंह बनवैत, गुरनाम सिंह सिद्धू, गुलज़ार गोरिया और कई अन्य स्थानीय नेता भी शामिल हुए।
                       --(पंजाब स्क्रीन टीम में  इस कवरेज पर थे-कार्तिका सिंह//एम एस भाटिया//रेक्टर कथूरिया)

Tuesday, September 10, 2019

सोशल थिंकर्स फोरम ने कराया सोसायटी को दो विद्धानों से रूबरू


संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहती है भाजपा सरकार

लुधियाना: 10 सितंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
मार्क्सवादी चिंतक,लेखक व CPI 
की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य 
अनिल राजिमवाले
जानीमानी खोजी पत्रकार और इतिहास
लेखिका सुश्री कृष्णा झा की बहुचर्चित
पुस्तक का कवर  
लुधियाना के बौद्धिक क्षेत्रों में एक नया रंग देखने को मिला। सियासी लोगों की भीड़ में एक ऐसा आयोजन सामने आया जिसमें चर्चा तो राजनीती पर भी हुई लेकिन चर्चा करने वाले दो विद्धान बौद्धिक क्षेत्रों में अलग सी पहचान रखते हैं। एक तो थीं सुश्री कृष्ण झा जिन्होंने अयोध्या विवाद पर बहुत ही चर्चित पुस्तक लिखी थी। दुसरे थे जानेमाने विद्धान अनिल राजिमवाले जिन्होंने जन संघर्षों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इन लोगों ने आशंका जताई कि देश को एक ही रंग में रंगने का जनून बहुत बड़ी गड़बड़ी खड़ी कर देगा। इन्होने साफ़ कहा कि सत्ता पर मौजूद भारतीय जनता पार्टी देश की सभी विभिन्नताओं को समाप्त करने की ताक में है। अलग अलग इलाकों और अलग अलग समुदायों के रीतिरिवाजों के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। 

इन लोगों ने कहा कि आर एस एस की शह और सरपरस्ती प्राप्त भाजपा सरकार लोकतंत्र की नृशंस हत्या करके देश भर में एक जैसी संस्कृति लागू करने पर तुली हुई है। यह बात यहाँ सोशल थिंकर्स फोरम की तरफ से कराई गयी एक विचार गोष्ठी में जानीमानी ऐतिहासकार और समाज सेविका सुश्री कृष्णा झा ने कही।  
उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रखा गया था जिसमें सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया।  इसके परिणाम स्वरूप धर्म निरपेक्ष, न्याय, और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना  का संकल्प लिया गया।   देश का संविधान भी इन्हीं आधारों पर ही बनाया गया था और राज्यों को अनेक मामलों में अधिक अधिकार भी दिए।  दबे और कुचले हुए दलित लोगों को भी बहुत सी सुविधाएँ दी गयीं। लेकिन जनसंघ, आर एस एस और इसके सहयोगी संगठनों ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया बल्कि तिरंगे का अपमान किया, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह का केवल विरोध ही नहीं किया बल्कि अंग्रेज़ों का साथ भी दिया। इसी वजह से उनके लिए भारतीय संविधान का कोई महत्व नहीं है। यह सरकार और इसके सहयोगी संगठन संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर देश में एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहते हैं। इस मकसद के लिए यह लोग देश और विदेश के कार्पोटेस्ट के साथ मिल कर देश के आम लोगों का बुरा हाल कर रहे हैं। सरकारी अत्याचार के खिलाफ उठ रहे जन आंदोलनों को दबाने के लिए यूएपीए जैसे कानून लाये जा रहे हैं।  श्रम सुधारों के नाम पर मज़दूर विरोधी और कारपोरेट समर्थक तब्दीलियां की जा रही हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य नीति में परिवर्तन करके कम वेतन वाले लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा  जैसे मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्य वर्गों के मुकाबले में दलितों की तरफ से दी जाने वाली फीसें तीन गुना बढ़ा दी गयी हैं। उच्च शिक्षा के लिए दी जानेवाली ग्रांट को 602 करोड़ रूपये से कम कर के 283 करोड़ रूपये कर दिया गया है।  किसानों का तो और भी बुरा हाल है। इसीलिए आत्महत्यायों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। आज माध्यम वर्ग भी दबाव में है। इन सब से  ध्यान हटाने के लिए हिन्दू मुस्लिम फसाद  कराये जा रहे हैं और जंग की बातें की जा रही हैं। ग्रह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दुओं को तो बसाया जा रहा है लेकिन मुस्लिमों को नज़रबंदी की स्थिति में रखा जायेगा।   इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में 370 इसी इरादे से हटाई गयी है। अमित शाह ने साफ़ शब्दों में कहा है कि अन्य राज्यों में 371 को छेड़ा भी नहीं जायेगा। यह खुलमखुल्ला साम्प्रदायिक पक्षपात का रवैया है। कश्मीर में 80 लाख लोगों के अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।  सभी लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वायत्ता समाप्त की जा रही है। सेना का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जा रहा है।  सैनिक अधिकारीयों से राजनैतिक ब्यान दिलाये जा रहे हैं।इस अवसर जानमाने विद्धान अनिल रजिमवाले ने कहा की इस नाज़ुक घड़ी में सभी प्रगतिशील शक्तियों को एकजुट हो कर इन फासीवादी शक्तियों का मुकाबिला करना होगा वरना देश का भविष्य धुंदला है। इस मौके पर डाक्टर अरुण मित्रा, एम् इस भाटिया, चरण सराभा, एडवोकेट हरिओम जिंदल, शुभदीप कौर, डाक्टर जसविंदर सिंह ने भी बहस में हिस्सा लिया। युवा और छात्र नेता डाक्टर तानिया, डाक्टर विनोद वर्मा, दीपक कुमार, राजीव कुमार, सौरव कुमार, प्रदीप कुमार और ललित कुमार ने अपने विचार व्यक्त किये।

Monday, June 12, 2017

माछीवाड़ा में हुई वाम छात्र संगठन AISF की बैठक

महंगी शिक्षा के पीछे छुपी साज़िशों को किया गया बेनकाब 
माछीवाड़ा: 11 जून 2017: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्री):: More Pics on Facebook
जब भी नए समाज के लिए संघर्ष उठेगा तो माछीवाड़ा के जंगल उस वक़्त की याद दिलाएंगे जब श्री गोबिंद सिंह जी महाराज इस पावन भूमि पर पहुंचे थे। माछीवाड़ा एक ऐसी भूमि जिसका सिख इतिहास के साथ गहरा संबंध है। सरबत्त दा भला के मिशन को सफल बनाने के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है माछीवाड़ा। मित्र प्यारे नूं हाल मुरीद दा कहना... इसी भूमि पर रचा गया शब्द है जिसे सुन कर आज भी दिल और दिमाग उस समय के हालात को बहुत गहन संवेदना से महसूस करने लगता है। More Pics on Facebook
शोषण रहत समाज के निर्माण में लगा शायद ही कोई मानव हो जिसे माछीवाड़ा की भूमि के  जंगलों ने संघर्ष का संकल्प याद कराने की आवाज़ न दी हो। इस बार इस आवाज़ को सुना वामपंथी छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन ने। मीटिंग बहुत अल्प समय के लिए थी लेकिन जब बात चली तो यह मीटिंग भी लम्बे समय तक चली। मीटिंग दुर्गा शक्ति मंदिर के हाल में हुई लेकिन वाम के वरिष्ठ जिला नेता कामरेड रमेश रत्न ने इस पावन भूमि के इतिहास की चर्चा भी शुरू की। वहां मीटिंग में मौजूद छात्रों से चमकौर की गढ़ी और आनंदपुर साहिब के इतिहास से जुड़े सवाल भी पूछे गए। श्री भैणी साहिब से जुड़े इतिहास की भी चर्चा हुई। 
मीटिंग में मुख्य मुद्दा था दिन-ब-दिन महंगी हो रही शिक्षा का। लगातार कम हो रहे सरकारी स्कूलों का। आम जन साधारण को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करने की साज़िश का तांकि गरीब का बच्चा कभी भी अमर बच्चों के सामने चुनौती न बन सके। More Pics on Facebook
वहां विशेर्ष तौर पर पहुंचे डाक्टर अरुण मित्रा ने लार्ड मैकाले और उसकी शिक्षा पद्धति और शिक्षा नीति की भी विस्तृत चर्चा की। डाक्टर मित्रा ने बहुत ही आसान शब्दों में इस क्षेत्र में काम कर रही गहन साज़िशों का पर्दाफाश किया। मीटिंग में मौजूद छात्र छात्राओं ने यह सब कुछ बहुत ही ध्यान से तकरीबन तकरीबन सांस रोक कर सुना।  शिक्षा के क्षेत्र की अहमियत को समझा और इस मामले में हो रही खतरनाक साज़िशों के खतरों को बहुत नज़दीक से महसूस किया।  More Pics on Facebook
इस युवा वर्ग की समझ आ रहा था कि  क्यों हर बार फीसें बढ़ा दी जाती हैं? क्यों आसमान छूने लगती है किताबों की कीमत? क्यों मुश्किल होता जा रहा है आम छात्र का पढ़ना लिखना। 
इस मीटिंग में आर एस एस और वीर सावरकर के इतिहास की भी विस्तृत चर्चा हुई। शहीद भगत सिंह की कुरबानी और वीर सावरकर द्वारा माफ़ी का इतिहास यहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं को आज समझ में आ रहा था। साम्प्रदायिक संगठन क्यों ढून्ढ लेते हैं प्रगतिशील तत्वों के साथ दुश्मनी निभाने का कोई न कोई बहाना यह भी समझ आ रहा था। More Pics on Facebook
कामरेड रमेश रत्न ने छात्र वर्ग को समझाया कि गुरु साहिब की जंग किसी विशेष सम्प्रदाय या धर्म से नहीं थी। उनकी सेना में मुस्लिम वर्ग भी शामिल था।  दूसरी तरह आनंदपुर साहिब का किला घेरने वालों में हिन्दू राजाओं की सेनाएं भी शामिल थी। इस लिए श्री गुरु ग्बिन्द सिंह जी के संघर्ष को हिन्दू-मुस्लिम या सिख मुस्लिम संघर्ष में बाँट कर न देखा जाये। यह शोषण और अन्याय के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष था।
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Monday, November 21, 2016

बेटी की शादी का कार्ड दिखाने पर भी बैंक से नहीं मिला ढाई लाख रुपया

नोटबन्दी से वाम ट्रेड यूनियन नेता डीपी मौड़ भी परेशान 
लुधियाना: 20 नवम्बर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
भारतीय समाज में बेटी का विवाह एक बहुत बड़ा यज्ञ मन जाता है। इस मकसद के लिए परिवारिक सदस्य बेटी का जन्म होते ही धन संचय आरम्भ कर देते हैं कर देते हैं। बेटी को पढ़ाया लिखाया जाता है और विवाह की उम्र होने पर उसे योग्य वर देख कर विदा कर दिया जाता है। इस अवसर पर अक्सर कर्ज़ भी लिए जाते हैं। इस तरह किसी न किसी तरह इस रस्म को पूरा  कर दिया जाता है। बाबुल की दुआएं लेती जा की धुन में डोली विदा हो जाती है किसी अनजान अज्ञात घर को कर बनाने संवारने के लिए। मोदी सरकार की बिना तैयारी की गई नोटबन्दी जहां बहुत सी जानें ले ली हैं वहीँ बहुत सी शादियों में भी रुकावटें खड़ी क्र दी हैं। इनमें बहुत सी शादियां बेटियों की हैं। कुछ ऐसा ही देखने को मिला पक्खोवाल रोड स्थित ग्रीन फील्ड में जहाँ पीएयू में लम्बे समय तक लोकप्रिय मुलाज़िम नेता रहे डी पी मौड़ के घर में 23 नवम्बर 2016 को बेटी की शादी है लेकिन बैंक ने उनका ही धन उनको देने  से इन्कार कर दिया है। जैसे तैसे दोस्तों से उधारी पकड़ कर काम चला रहे श्री मौड़ ने अपना दुःख मीडिया के सामने भी व्यक्त किया। उन्होंने आशंका भी व्यक्त की कि लोगों को गुमराह करके थोपी गई नोटबन्दी भी कहीं इस सरकार का नया जुमला ही न हो। 

आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के स्टेट वाइस प्रेजिडेंट डीपी मौड़ ने कहा कि 23 नवंबर को उनकी बेटी की शादी है, मगर बैंक ने उन्हें पैसे देने से इंकार कर दिया है। जिसके चलते उनके सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई है। 

एक मीडिया वार्ता में उन्होंने कहा कि सरकार ने एटीएम से पैसे निकालने की लिमिट दो हजार रुपये रखी है। इतनी राशि से किसी भी परिवार का गुजारा होना संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि बैंक  उनकी बेटी के विवाह का कार्ड देखने के वाबजूद केवल 24 हज़ार रूपये ही उनको दिए हैं। जो पैसे उन्होंने 8 नवम्बर से पहले निकाल लिए थे वे सभी 500 और हज़ार रुपयों के रूप में थे जो अब काला धन बना दिए गए हैं।  गरीब लोग पैसे बदलवाने के लिए सारा दिन बैंकों की लाइन में लगे रहते हैं। अमीर लोग बैंक कर्मचारियों से मिलीभगत करके अपना कैश बदलवा रहे हैं। इसकी वजह से जरूरतमंद लोग अपने ही खाते से पैसे नहीं निकलवा पा रहे। जो इस बात का सबूत है कि सरकार गरीबों को तंग करके अमीरों को मालामाल कर रही है। उनके साथ मौजूद तिलक राज कूनरा ने भी अपने घर शादी कार्ड दिखाया। इस अवसर पर लड़की के नज़दीकी रिश्तेदार प्रेम चंद गोयल ने कहा कि वह मानवाधिकार के तहत सरकार पर केस भी दायर करेंगे। इस अवसर पर केवल सिंह बनवैत, डॉ. अरुण मित्रा, रणधीर सिंह और रामाधार सिंह भी मौजूद रहे।
भाकपा नेता डाक्टर अरुण मित्रा ने कहा कि नोटबन्दी का कालेधन से कोई लेना देना नहीं। यह एलान गरीबों की मेहनत से की गई की गई कमाई पर साज़िशाना हमला है और यह रकम माल्या और अम्बानी-अडानी जैसे अमीरों की तिजौरियां भरने के लिए  जानी है। उन्होंने इस मामले से सबंधित कई बारीकियों की चर्चा करते हुए पूछा कहाँ से आएगा  काला धन?

Sunday, October 23, 2016

कन्हैया ने दी जाह्नवी को शुभकामनाएं और विरोध करने वालों को धन्यवाद

पंजाब का वाम छात्र आंदोलन अब फिर छू  सकता है नई शिखरें 
लुधियाना: 23 अक्टूबर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कन्हैया कुमार को खुली बहस की चुनौती देने वाली जाह्नवी को कन्हैया कुमार ने शुभ कामनाएं दी हैं। इसके साथ ही उन्होंने विरोध करने वाले वकीलों को भी धन्यवाद किया और कहा कि यह सांस्कृतिक लोग हैं और कानून के दायरे में रहते हुए अपने अधिकार का प्रयोग क्र रहे हैं। यहाँ मीडिया से एक भेंट वार्ता के दौरान उस छात्रा  के सलाह भी दी कि अगर उसे डिबेट करनी है तो इस देश के नेतायों से डिबेट करनी चाहिए, इस देश के राष्ट्र अध्यक्षों से डिबेट करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि डिबेट के लिए डिबेट अच्छी बात है लेकिन अगर यह राजनीतिक स्टंटबाजी हो तो गलत है। गौरतलब है कि यह छात्रा कई  बार कन्हैया को खुली बहस की चुनौती दे चुकी है। 
अब जबकि देश पर बहुत सी स्वदेशी और विदेशी ईस्ट इंडिया कम्पनियां जोर पकड़ रही है उस समय कन्हैया कुमार का यह कहना कि  ले के रहेंगे आज़ादी एक ऐसा नारा बन के उभरा है जिसके साथ हाल के अधिकतर युवा साथ साथ गाने लगे थे ले के रहेंगे आज़ादी। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्य्क्ष कन्हैया कुमार ने यहां एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार देश में शिक्षा का निजीकरण करने पर तुली हुई है। इसी कारण वह सरकारी शिक्षण संस्थानों को नुकसान पहुंचा रही है। इससे पहले कन्हैया के यहां पहुंचने पर उनका विरोध किया गया। वकीलों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया अौर उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने से रोकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उनको हटा दिया। कन्हैया की एक झलक पाने को लोग यहाँ बेकरार थे। कन्हैया एक क्रांति का प्रतीक बन कर यहाँ पहुंचे। 
यहां पंजाब साहित्य अकादमी परिसर में 'शिक्षा और रोजगार' विषय पर आयोजित सेमीनार में कन्हैया कुमार ने मोदी सरकार की शिक्षा नीति पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश के सरकारी व पब्लिक सेक्टर के शिक्षण संस्थानों का निजीकरण करने की साजिश की जा रही है। यह देश के लिए खतरनाक है और शिक्षा का व्यावसायिक करण का प्रयास है। उन्होंने विमान से 2500  सेरुपयों में सफर की बात उठाते हुए भी कहा कि जो गरीब लोग 25 रुपयों में रेल से सफर करते हैं उनके लिए मोदी जी के पास क्या योजना है? अच्छे दिनों की चर्चा करते हुए कन्हैया ने कहा कि मोदी जी का मित्र 30 रूपये किलो दाल खरीद कर महंगे भाव बेच दे क्या यही हैं अच्छे दिन?
छात्र-छात्राओं के बीच आये कन्हैया कुमार की मौजूदगी एक जादू की तरह असर कर रही थी। उनके साथ सेल्फी लेने वालों की एक होड़ लगी थी। पंजाब में आतंकवाद से संघर्ष के दौरान दम तोड़ चुकी वाम छात्र लहर में एक नया जोश नज़र आया। मुद्दत के बाद भाकपा समर्थक छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन (ए आई एस एफ) के झंडे पंजाब में नज़र आए। कन्हैया के लुधियाना आने से इस ऐतिहासिक संगठन की मौजूदगी का अहसास तीव्रता से सामने आया है जो इस चुनावी मौसम में वाम विरोधियों के लिए खतरे की घण्टी है। करीब एक वर्ष के अंदर अंदर तैयार किया गया यह छात्र केडर पूरी तरह से अनुशासित और सक्रिय। इसकी सक्रियता उन लोगों को कड़ा जवाब है जो मीडिया के सामने भी यह कहते नहीं थकते कि कमरेडटॉ अब खत्म हो चुके हैं।
सेमिनार में लोगों की संख्या किसी रैली की तरह थी। मौजूदगी रजिस्टर पर हस्ताक्षर कराये जा रहे थे। एक नज़र देखा तो संख्या 700 के करीब थी। हाल के अंदर भी भीड़ थी और बाहर भी। शायद पहली बार इस हाल को कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा भरा देखा।  
सेमिनार में कन्हैया कुमार ने कहा कि मोदी सरकार युवाओं को रोज़गार देने में अक्षम रही है। नरेंद्र मोदी ने इस बारे मे बढ़चढ़ कर बातें की थीं और दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन 1.35 लाख लोगों को ही रोजगार मिले हैं। सरकार युवाआें और जनता को भ्रमित करने में ही लगी रहती है।
कन्हैया ने कहा कि मोदी सरकार का मुख्य उद्देश्य शिक्षा से पैसा कमाना है, न कि लोगों को शिक्षित करना। यह हालत घातक है और गरीब युवाओं के साथ अन्याया है। कन्हैया ने कहा कि देश में भगत सिंह को पिस्तौल और बम चलाने वाले के रूप में प्रदर्शित किया गया है, जबकि वह एक विचारक थे। लेकिन उनके इस पहलू को नहीं उभारा गया। कन्हैया कुमार ने सामंतवाद और पूंजीवाद से आज़ादी पर जोर दिया। उन्होेंने इसके लिए लाेगों खासकर युवाओं और बुद्धिजीवियों से आगे आने की अपील की।
सेमीनार का आयोजन पंजाबी साहित्य अकादमी में सोशल थिंकर फोरम के सहयोग से किया गया। इससे पहले वकीलों ने कन्हैया का पुतला फूंका ओर उनको कार्यक्रम में शामिल नहीं होने देने का एलान किया। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे वकीलों को गिरफ्तार कर लिया।
इसी बीच पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉक्टर सुखदे सिंह सिरसा, महासचिव सुरजीत सिंह और मुख्य वक्ता प्रिंसिपल तरसेम बाहिया ने कहा कि साहित्य अकादमी कीतरफ से इस आयोजन का प्रयास बहुत आवश्यक था क्योंकि पंजाब के शैक्षणिक, बौद्धिक और नैतिक क्षेत्रों में गरावट आ रही थी। उन्होंने स्पष्ट किया की पंजाबी भवन में पहले भी इस तरह के आवश्यक जन मुद्दों पर आयोजन होते रहे हैं। 

Tuesday, October 04, 2016

आज देश में युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है- हम युद्ध के खिलाफ हैं

हम सर्जिकल ऑपरेशन में नहीं निदान में भरोसा करते हैं
इंदौर: 2 अक्टूबर 2016: (प्रदीप शर्मा//पंजाब स्क्रीन):
मानव से मानव के रिश्ते को और मज़बूत बनाता हुआ इप्टा का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन आज रात समाप्त हो जायेगा। हिन्दोस्तान के अलग अलग स्थानों के दर्द को यहाँ इप्टा मंच पर एक दुसरे के साथ बाँटने और फिर उस दर्द को संघर्ष की एक ऊर्जा में बदलते हुए हम फिर अपने अपने घरों की तरफ रवाना हो जाएंगे। हम  हमारा  हमारी विचारधारा हमें जोड़े रखेगी।  हम क्रांति की शमा को रौशन रखेंगे।
सम्मेलन प्रथम अक्टूबर को स्थानीय आनन्द मोहन माथुर सभागृह में बेहद उत्साह से शुरू हुआ।शुरूआत पारम्परिक रूप से झंडे साथ हुई। झंडोत्तोलन इंदौर के सुपरिचित संस्कृति कर्मी औए पूर्व सांसद होमी दाजी की पत्नी ने किया। इसके बाद भिलाई इप्टा ने मणिमय मुखर्जी के संगीत निर्देशन में एक जनगीत 'हमने ली कसम' की प्रस्तुति दी। यह केवल एक गीत नहीं था--सचमुच में भी हमारी कसम थी। 

उत्साहित सदस्यों को सुवाग्त्म कहते हुए मप्र इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया ने  यादगारी पर स्वागतीय भाषण दिया। इप्टा के महासचिव राकेश ने कहा की चार्ली चैपलिन कहा करते थे कि कला जनता के नाम एक प्रेम पत्र है। हमने इसमें यह जोड़ने की हिमाकत की कि यह शाषकों के  विरुद्ध,  साम्राज्यवाद के विरुद्ध, शोषण और असमानता के विरुद्ध अभियोग पत्र भी है। उन्होंने कहा कि आज देश में युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। हम युद्ध के खिलाफ हैं क्योंकि युद्ध समस्याओं की समाप्ति नहीं शुरुआत है। हम भगत सिंह की विरासत को लेकर चलते हैं। एक समय उन्हें भी आतंकवादी कहा गया था। हम अपने सांस्कृतिक औजारों से उनकी लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे। हम युद्ध और आतंकवाद से एक साथ लड़ेंगे।


इसके इसके पश्चात् इप्टा के पूर्व अध्यक्ष ए. के.हंगल, पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी, पंडित रविशंकर, ओ. एन करूप, कामरेड ए. बी. बर्धन, रवि नागर, जुगल किशोर, जोहरा सहगल महाश्वेता देवी, राजेन्द्र यादव, रविन्द्र कालिया, नेल्सन मण्डेला, पीट सीगर, आर के लक्ष्मण, मन्नाडे, भूपेन हजारिका, जसपाल भट्टी, सतपाल डांग आदि दिवंगत साथियो-कलाकारों और अन्य जन नेताओं को श्रद्धांजलि दी गई।


 यादगारी फिल्म "गर्म हवा" के लिए चर्चित फिल्मकार और इप्टा के उपाध्यक्ष साथी एम. एस. सथ्यू ने उद्घाटन भाषण देते हुए कहा कि वे 1960 में इप्टा में आए जब वे मुम्बई इप्टा की रिहर्सल देखा करते थे।


मौजूदा हालात का ज़िक्र करते हुए उन्होंने  कहा कि लड़ना आसान है पर शांति से बर्ताव करना मुश्किल है। टेकनोलॉजी के उपयोग से अब लड़ाई और भी आसान हो गयी है है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह गांधी का देश है। आज की सरकार शान्ति के आवरण को फाड़कर फेंक रही है। इस नाज़ुक हालत में हमारी जिम्मेदारी बड़ी है। समाजवाद सबको बराबरी का मौका देता है, इसलिए हमें साम्प्रदायिकता के साथ-साथ जातिवाद से भी लड़ना है।  थिएटर दुनिया को बदल नहीं सकता पर यह इसके लिए प्रेरित कर सकता है।


उन्होंने गिला भी किया कि मुझे उद्घाटन भाषण देने के लिए बुलाया गया। अच्छा होता कि मुझे भाषण देने के बदले नाटक करने के लिए बुलाया गया होता तो मैं अपनी बात बेहतर ढंग से रख पता


विचारधारा को आगे बढ़ते हुए राजेन्द्र राजन, महासचिव, प्रलेस  ने कहा कि जब इप्टा का गठन नहीं हुआ था तब भी सांस्कृतिक जागरण का काम हम करते थे। प्रेमचन्द रंगशाला को मुक्त करने के लिए एक लम्बी लड़ाई हमने बिहार में लड़ी। लाठियाँ भी खाईं। लड़ाई की इस विरासत से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। हम सर्जिकल ऑपरेशन में नहीं निदान में भरोसा करते हैं। प्रलेस दिशा देने का काम करता है। इस धारा को कुंद करने के प्रयास पिछले दिनों खूब हुआ। हम उनके लिए एक बेहतर दुनिया चाहते हैं जो भूखे सोते हैं। निश्चय ही उसमें अम्बानी अडानी शामिल नहीं हैं। हम एनजीओ कल्चर के विरुद्ध हैं। अनुदान कला के धार को भोंथरा कर रहा है। इप्टा और प्रलेस को मिलकर इन चुनौतियों का सामना करना है। लेखक और कलाकार को संगठित होकर लड़ाई लड़नी है। जब कबीर कहते थे कि 'दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै' तो वह दरअसल उनका रोना नहीं होता था। वह विद्रोह का आह्वान करते थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि लडाई के गीत अब भी रचे जाएंगे और यह काम इप्टा के साथी ही कर सकते हैं। निश्चय ही यह काम अब और ज़ोर से होगा। इसके बाद अशोक नगर इप्टा द्वारा वामिक जौनपुरी का एक जनगीत "जब भी नाव चलती है" प्रस्तुत किया गया ।


इसके बाद बारी आई उन महान लोगों को याद  जिन्होंने  इप्टा को मज़बूत किया तांकि  मज़बूत। साथी शमीम फैजी ने कामरेड बर्धन को याद करते हुए कहा कि वे ही मुझे इस आंदोलन में  लेकर आए। मुझ जैसे कई युवा उनके ही कारण आंदोलन से जुड़े। वे सही मायनो में बहु-आयामी थे। अनेक आंदोलनों से जुड़े। साढ़े ग्यारह साल जेल में रहे। कोई 3 साल भूमिगत रहे। वे विचारों को बेहद सरल भाषा में रखते थे। वे आर्ट और कल्चर के साथ भी उतनी ही शिद्दत से जुड़े थे, जितने अन्य संघर्षो से। इसीलिए इप्टा से उनका जुड़ाव समझ में आता है। इसके सम्मेलनों में शिरकत की बागडोर मुझे सौंपते हुए हुए उन्होंने एक बार विनोद में कहा की मैं संस्कृति की बागडोर एक गैर सांस्कृतिक आदमी को सौंप रहा हूँ। साथी शमीम के वक्तव्य के बाद ए. बी. बर्धन के भाषण का एक अंश परदे पर दिखाया गया और उत्पल बेनर्जी ने फैज की एक नज्म 'हम देखेंगे' का गायन किया।


इस अवसर पर इप्टा के पूर्व महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी को याद करते हुए राकेश ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दोस्त, एक साथी की चर्चा इस तरह से करनी होगी। बकौल दुष्यंत,"उखड़ गया है एक बाजू जबसे, और ज़्यादा वज़्न उठाता हूँ। अब ये दायित्व हम पर है कि उनकी अनुपस्थिति में ज्यादा जिम्मेदारी से काम करें। सन 57 में दिल्ली में पूर्व गठित इप्टा का आखिरी सम्मेलन हुआ था और 60 में इप्टा बिखर गई। 85 में हम आगरा में मिले और कैफ़ी के नेतृत्व में ये कारवां जितेंद्र ने आगे बढ़ाया। बकौल राजेन्द्र यादव वे बड़े कथाकार हो सकते थे, वे बड़े अनुवादक हो सकते थे पर उन्होंने इप्टा के संघठन का जिम्मा चुना। इप्टा दरअसल उन्हें घुट्टी में मिली थी। राकेश के वक्तव्य के बाद जितेंद्र जी पर फ़िल्म दिखाई गयी, जिसका निर्माण दिलीप रघुवंशी ने किया है।

विनीत तिवारी के संक्षिप्त परिचय के बादव्अंधविस्वास निर्मूलन समिति, सांगली, महाराष्ट्र ने एक नाटक का मंचन किया। सोचने की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राजसत्ता के लिए खतरा होती है, इस बात को रेखांकित करते हुए नाटककारों ने कहा, तुम गोली चलाओगे, हम एक कविता लिखेंगे। तुम गोले दागोगे, हम एक नाटक खेलेंगे! इसी बीच हुए संघ के हमले की सभी ने निंदा की। पंजाब में भी जब यह खबर पहुंची  तो पंजाब में भी इसका तीखा विरोध हुआ। बहुत से संगठनों ने इस हमले की सख्त निंदा की।  

Tuesday, February 16, 2016

JNU: कौन है गद्दार? कौन है अफजल गुरू?

11 फरवरी 2016
 हम बोलने की आजादी के पक्ष में खड़े होंगे
तिरंगा को तो इन्होंने कभी माना ही नहीं, भगवा झंडा भी नहीं मानेंगे
हम हैं इस देश के और इस मिट्टी से प्यार करते हैं।  इस देश में जो 80 फीसदी गरीब जनता है, हम उसके लिए लड़ते हैं. हमारे लिए यही देशहित है। 

हमें पूरा भरोसा है बाबा साहेब (आंबेडकर) के ऊपर।  हमें पूरा भरोसा है अपने देश के संविधान के ऊपर और हम इस बात को पूरी मजबूती के साथ कहना चाहते हैं कि इस देश के संविधान पर अगर कोई उंगली उठाएगा.. चाहे वो उंगली संघियों की हो, चाहे वो उंगली किसी की भी हो, उस उंगली को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। 

हम संविधान में भरोसा करते हैं लेकिन जो संविधान झंडेवालान और नागपुर में पढ़ाया जाता है, उस संविधान पर हमको कोई भरोसा नहीं। 

ये बड़े शर्म की बात है, ये बड़े दुख की बात है कि आज ABVP अपने मीडिया सहयोगियों से पूरे मामले को डायल्यूट कर रहा है। 

कल ABVP के ज्वाइंट सेक्रेटरी ने कहा कि हम फेलोशिप के लिए लड़ते हैं। कितना घिनौना लगता है ये सुन करके। 

इनकी सरकार मैडम ‘मनु’ स्मृति ईरानी फेलोशिप को खत्म करती हैं….और कहती हैं कि हम फेलोशिप के लिए लड़ते हैं! इनकी सरकार ने उच्च शिक्षा के बजट में 17 फीसदी कटौती की है। उससे हमारा होस्टल हमें पिछले चार सालों में नहीं बना। उससे हमें वाईफाई आज तक नहीं मिला और एक बस दिया BHEL ने तो उसमें तेल डालने के लिए प्रशासन के पास पैसा नहीं है। 
ABVP के लोग रोलर के सामने जाकर देवानंद की तरह तस्वीर खिंचवा कर कहते हैं कि हम होस्टल बनवा रहे हैं। 

हम वाईफाई करवा रहे हैं। हम फेलोशिप बढ़वा रहे हैं। इनकी पोलपट्टी खुल जाएगी साथियों, अगर इस देश में बुनियादी सवाल पर चर्चा होगी और मुझे गर्व है JNU का छात्र होने पर क्योंकि हम बुनियादी सवाल पर चर्चा करते हैं। 

(सुब्रमण्यम) स्वामी कहता है कि JNU में जेहादी रहते हैं।  कहता है कि JNU के लोग हिंसा फैलाते हैं। 

कौन है? …मैं JNU से चुनौती देता हूं RSS के विचारकों को. उसे बुलाओ और करो हमारे साथ बहस।  हम करना चाहते हैं हिंसा की अवधारणा पर बहस। हम सवाल खड़ा करना चाहते हैं। ABVP के उस दावे पर।  ABVP के मंच से कहता है बेशरम …कि खून से तिलक करेंगे, गोलियों से आरती। किसका खून बहाना चाहते हो इस मुल्क में तुम। 

क्या चाहते हो इस मुल्क में तुम। तुमने गोलियां चलाई हैं। अंग्रेजों के साथ मिलकर इस देश की आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों पर गोलियां चलाई हैं। 

मुल्क के अंदर गरीब जब अपनी रोटी की बात करता है, जब भूखमरी से मर रहे लोग अपने हक की बात करते हैं…तो तुम उन पर गोली चलाते हो. तुमने गोली चलाई है इस मुल्क में मुसलमानों के ऊपर। तुमने गोली चलाई है इस मुल्क में जब महिलाएं अपने अधिकार की बात करती हैं तो तुम कहते हो पांचों उंगली बराबर नहीं हो सकती। महिलाओं को सीता की तरह रहना चाहिए और सीता की तरह अग्निपरीक्षा देनी चाहिए। 

मैं कहना चाहता हूं इन संघियों को। लानत है तुम्हारी सरकार पर। चुनौती है केंद्र सरकार को…कि आज रोहित (वेमुला) के मामले में जो किया है, वो JNU में हम नहीं होने देंगे। कोई रोहित अपनी जान नहीं गंवाएगा।  रोहित ने जो अपनी कुर्बानी दी है, उस कुर्बानी को हम याद रखेंगे। हम बोलने की आजादी के पक्ष में खड़े होंगे। 

और…छोड़ दो पाकिस्तान की बात और बांग्लादेश की बात। हम कहते हैं दुनिया के गरीबों एक हो। दुनिया के मजदूरों एक हो। दुनिया की मानवता जिंदाबाद। भारत की मानवता जिंदाबाद। जो इस मानवता के खिलाफ खड़ा है, हम उसको आज पहचान चुके हैं। 

एक सवाल…अंतिम सवाल पूछकर मैं अपनी बात को खत्म करूंगा।   कौन हैं ये लोग, जो आज इस स्थिति में हैं कि अपने शरीर में बम बांध कर हत्या करने को तैयार हैं। 

अगर ये सवाल यूनिवर्सिटी में नहीं उठेगा तो फिर मुझे नहीं लगता कि यूनिवर्सिटी होने का कोई मतलब है. दोस्तों, बहुत गंभीर परिस्थिति है। 

किसी भी सवाल पर JNU में कोई किसी भी हिंसा का, किसी भी आतंकवादी का, किसी भी आतंकी घटना का, किसी देशविरोधी गतिविधि का समर्थन नहीं करता। 

कड़े शब्दों में एकबार फिर से। जो कुछ लोग, अज्ञात लोगों ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए हैं, JNU छात्रसंघ उसकी कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है। 

सवाल पूछना चाहते हैं JNU प्रशासन से कि आप किसके लिए काम करते हैं? किसके साथ काम करते हैं और किस आधार पर काम करते हैं?

ये बात आज बिल्कुल साफ होनी चाहिए…कि JNU प्रशासन पहले परमिशन देता है, फिर नागपुर से फोन आने के बाद परमिशन वापस लेता है। 

ये जो परमिशन लेने देने की प्रक्रिया है, ये उसी तरह से तेज हो गई है इस मुल्क में…जैसे फेलोशिप को लेने और देने की प्रक्रिया है। हमारा सवाल है JNU चांसलर से…कि पोस्टर लगा था JNU में।  पर्चे आए थे मेस में। 

अगर दिक्कत थी तो JNU प्रशासन पहले परमिशन नहीं देता। अगर परमिशन दिया …तो किसके कहने परमिशन कैंसिल किया? ये सवाल JNU प्रशासन साफ करे।  ये सवाल आज हम इनसे पूछना चाहते हैं।  साथ ही साथ…. ये जो लोग हैं, इनकी सच्चाई जान लीजिए। 

इनसे नफरत मत कीजिएगा क्योंकि हम लोग नफरत कर नहीं सकते हैं। इनसे…मुझे बहुत ही दया भाव है इनके प्रति। 

ये इतने उछल रहे हैं…क्यों? इनको लगता है जैसे गजेंद्र चौहान को बिठाया है, वैसे हर जगह चौहान, दीवान, फरमान ये जारी कर देंगे. चौहान, दीवान और फरमान की बदौलत ये हर जगह नौकरी पाते रहेंगे.

इसीलिए ये जब जोर से ‘भारत माता की जय’ चिल्लाएं…तो समझ लीजिए परसों इनका इंटरव्यू DU में होने वाला है. नौकरी लगेगी, देशभक्ति पीछे छूट जाएगी. नौकरी लगेगी, फिर भारत माता का कोई ख्याल नहीं। 

नौकरी लगेगी…तिरंगा को तो इन्होंने कभी माना ही नहीं, भगवा झंडा भी नहीं मानेंगे। मैं सवाल करना चाहता हूं…ये कैसी देशभक्ति है?

अगर एक मालिक अपने नौकर से सही बर्ताव नहीं करता, अगर किसान अपने मजदूर से सही बर्ताव नहीं करता, अगर पूंजीपति अपने कर्मचारियों से सही बर्ताव नहीं करता और ये जो अलग अलग चैनल के लोग हैं  जो पत्रकार काम करते हैं 15-15 हजार रुपए में. इनका जो CEO है , वो इनसे ठीक से बर्ताव नहीं करते हैं। 

वो कैसे करते हैं देशभक्ति? कैसे ? वो सारी देशभक्ति भारत-पाकिस्तान के मैच पर खत्म कर देते हैं। इसीलिए जब सड़क पर निकलते हैं तो केले वाले के साथ बदतमीजी से बात करते हैं। 

केला वाला कहता है – साहब, 40 रुपए दर्जन. कहते हैं- भाग. तुमलोग लूट रहे हो. 30 का दे दो. केला वाला जिस दिन पलट कर बोला देगा कि तुम सबसे बड़े लुटेरे हो, करोड़ों लूट रहे हो…तो कह देंगे कि ये देशद्रोही है। 

मैं आप तमाम JNU के लोगों से कहना चाहता हूं…कि अभी चुनाव होगा मार्च में तब ABVP के लोग ओम का झंडा लगाकर आपके पास आएंगे. उनसे पूछिएगा- हम देशद्रोही हैं .जेहादी आतंकवादी हैं, हमारा वोट लेकर तुम भी देशद्रोही हो जाओ। ये उनसे जरूर पूछिएगा। तब ये कहेंगे- नहीं, नहीं आप लोग नहीं हैं। वो कुछ लोग हैं। 

हम कहेंगे कि वो कुछ लोग थे, ये बात तो तुमने मीडिया में नहीं कही थी। तुम्हारा वाइस चांसलर नहीं बोला और तुम्हारा रजिस्ट्रार भी नहीं बोल रहा है और वो कुछ लोग भी तो कह रहे हैं कि हमने पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा नहीं लगाया। 

वो कुछ लोग भी तो कह रहे हैं कि हम आतंकवाद के पक्ष में नहीं हैं। वो कुछ लोग भी तो कह रहे हैं कि हमें परमिशन देकर हमारा परमिशन कैंसिल कर दिया। ये हमारे प्रजातांत्रिक अधिकारों के ऊपर हमला है। 

वो कुछ लोग हैं जो ये कह रहे हैं कि अगर इस देश के अंदर कहीं लड़ाई लड़ी जा रही है तो उसके समर्थन में हम खड़े होंगे। 

इतनी बात इनके पल्ले पड़ने वाली नहीं है लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि यहां जो इतने लोग इतने शॉर्ट नोटिस पर आए हैं, उनके पल्ले पड़ रहा है और वो लोग इस कैंपस में एक-एक छात्र के पास जाएंगे और बताएंगे कि ABVP इस देश को तोड़ रहा है. बल्कि JNU को तोड़ रहा है. हम JNU को टूटने नहीं देंगे.

JNU जिंदाबाद था. JNU जिंदाबाद रहेगा. इस देश के अंदर जितने भी संघर्ष हो रहे हैं, उन संघर्षों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेगा। 

क्या कन्हैया का गुनाह बस इतना कि वह AISF से जुड़ा है?

Saturday, April 25, 2015

ज़हरीले अन्न के घातक दौर में राह दिखा रहा है KVM

खेती विरासत मिश्न साकार कर रहा है अपने आँगन में अपनी खेती का सपना
लुधियाना: 25 अप्रैल 2015:(रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
एक पुरानी कहावत है-जैसा अन्न  वैसा मन लेकिन जो अन्न हमें मिल  रहा है वह तन और मन दोनों  के लिए विषाक्त है। जीने के लिए मिल रहा आवश्यक अन्न भी प्रदूषित, जल भी प्रदूषित हवा भी ज़हरीली। जीने के मौलिक अधिकारों से हम लगातार वंचित हो रहे हैं।  बिमारियों  लगाकर जीना हमारी नियति बना दी गयी है। विकास के दावों की हकीकत का खोखलापन आम जन साधारण के जीवन   को एक एक नज़र देखते स्पष्ट जाता है। इस संकट में क्या किया जाये, कैसे ज़िंदा रहा जाये और कैसे बचाया जाये खुद को और अपने परिवार को। 
इस गंभीर विषय पर चर्चा के लिए आज एक विशेष आयोजन हुआ खेती विरासत मिशन की ओर से। इंजीनियर गुरवंत सिंह और केवीएम  संयोजक राजीव गुप्ता की देख रेख में आयोजित इस कार्यक्रम में   खेती विरासत मिशन  सुरक्षित अन्न को एक अभियान बनाने वाले उमेन्द्र दत्त मुख्य मेहमान थे।
आज महंगाई के इस युग और कम स्थान के अल्प व आधुनिक ज़माने में अपने आंगन को एक लघु खेत बनाने का सपना  कैसे साकार किया जाये इस पर विशेष चर्चा हुई। इस चर्चा में  कामरेड रमेश रत्न, मेवा सिंह कुलार, जालंधर  प्रसिद्ध विद्धान पत्रकार सतनाम  चाना और  कई अन्य प्रमुख लोग भी मौजूद थे।
मुख्य मेहमान उमेन्द्र  दत्त ने सीडी के ज़रिये इस नई  सुरक्षित खेती की तकनीक के संबंध में विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम  में मौजूद लोगों ने अपने सवाल पूछे और उमेन्द्र दत्त और अन्य विद्धानों ने उनके बारीकी से जवाब दिए।

Monday, August 19, 2013

ऋषि नगर की लडकी से छेड़छाड़ का मामला गर्माया

लोगों का दबाव बनने पर घटना के 41 दिनों बाद दर्ज हुआ मामला

देश के अलग अलग हिस्सों में लडकियों के खिलाफ समाज विरोधी तत्वों की बढती हुई हरकतों के बावजूद पुलिस अपनी कार्यशाली को सुधरने का नाम नहीं ले रही। इस का ताज़ा मामला देखने को मिला लुधियाना में जहाँ ऋषि नगर की एक कालेज छात्र मोनिका (काल्पनिक नाम) के साथ छेड़छाड़ करने व अपशब्द बोलने के मामले में 41 दिनों के बाद मामला दर्ज किया।  यह सब भी तब सम्भव हुआ जब महिला संगठनों, राजनीतिक दलों और समाजिक कार्यकर्तायों ने इस मकसद के लिए एकजुट हो कर अपना दबाव बनाया। आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर छात्रा और उसका परिवार पहले दिन से ही रोष व्यक्त कर रहे हैं पर पुलिस करवाई करने की बजाये एक तरह से आरोपियों का साथ देते चल रही थी। जब पीडिती लडकी के परिवार ने इस सारे मामले की सूचना पुलिस को दी थी तो पुलिस ने लडकी के मां-बाप को ही ठाणे बंद कर दिया और मनमर्जी के समझौते का दबाव बनाया। गौर तलब है की छेड़छाड़ करने वाले आरोपी छेड़छाड़ के बाद लडकी के घर में घुस कर पूरे परिवार की पिटाई भी कर गए थे। निराश करने वाले इस पूरे घटनाक्रम के बावजूद लडकी कानून में आस्था रखते हुए डटी रही और कई समाजिक संगठन उसके साथ आ मिले और आखिर 41 दिनों के बाद मामला दर्ज हुआ। मामला तो दर्ज हुआ पर इस पुलसिया ढंग तरीकों से आहत लडकी का दिल पुलिस से टूट गया यह बात लडकी ने मीडिया को भी बताई। 

           लडकी ने आहत पर दृढ़ स्वर में मीडिया के सामने अपना रोष भी व्यक्त किया है। छात्रा ने आरोप लगाया कि बीते दिनों कुछ लोग नशे की हालत में उसके घर आ गए थे। उसके बाद उन्होंने घर में घुसकर उसके के साथ छेड़छाड़ की और उसके माता-पिता को पीटा भी। जिसके बाद छात्रा ने इसकी शिकायत पीएयू थाना पुलिस से कर दी। लेकिन पुलिस ने छात्रा की शिकायत पर मामला दर्ज करने की बजाए सिर्फ मारपीट का मामला दर्ज कर दिया है। ऋषि नगर स्थित चांद कालोनी निवासी मोनिका (काल्पनिक नाम) बीएससी की छात्रा है। उसने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने 9 जुलाई को उसके घर में घुसकर उसके साथ छेड़छाड़ की और उसके बाद उसके माता-पिता के साथ मारपीट भी की। रेखा ने इसकी शिकायत पुलिस से कर दी। मोनिका ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसकी माता की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज कर दिया, लेकिन पुलिस ने उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की। पीडिता ने मांग की है कि आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। इस मामले के दर्ज होने से इलाका निवासियों में एक बार फिर यह आशा बंधी है की अगर लोग एकजुट हो जायें तो जीत दूर नहीं रहती। 
         ठंडे बसते में फेंक दिए गए इस मामले को भी दोबारा खुलवाने में भाकपा नेता डाक्टर अरुण मित्रा, कामरेड गुरनाम सिद्धु, कामरेड रणधीर सिंह, पंजाब स्त्री सभा की नेता मैडम गुरुचरण कौर कोचर और जीत कुमारी, वर्किंग महिला फोरम की आयोजक डाक्टर नरजीत कौर और कई अन्य समाजिक नेतायों ने आगे बढ़ कर मोर्चा सम्भाला तब कहीं ४१ दिनों के बाद मामला दर्ज हुआ।
अब देखना है कि पुलिस आरोपियों के खिलाफ क्या एक्शन लेती है?

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