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Sunday, May 19, 2013

आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है

Sat, May 18, 2013 at 11:35 PM
न्याय पाने की भाषायी आज़ादी          --राजीव गुप्ता , 09811558925
स्वतंत्रता पूर्व भारत मे सरकारी समारोहों में ‘गाड सेव द किंग’ या ‘गाड सेव द क़्वीन’ गाया जाता था. पर्ंतु 15 अगस्त 1947 से उसका स्थान ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे’ ने लिया. रातोंरात सभी सरकारी भवनो पर से ‘यूनियन जैक’ झंडा उतारकर तिरंगा झंडा लहरा दिया गया. भारत में स्वतंत्रता का जश्न मनाया गया. भारत को यह स्वतंत्रता लाखो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की कीमत पर मिली थी. पहली बार भारत के लोगों ने आज़ादी का अर्थ समझा था. देश का संविधान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और और राष्ट्रभाषा का बहुत महत्व होता है. इसी महत्ता के चलते देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तय हो गया परंतु बहुभाषी भारत मे राष्ट्रभाषा का चुनाव करने में बहुत समय लगा. देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है. हिन्दी के प्रचलन के चलते हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया गया था.
हिन्दी को राजभाषा का दर्जा
लेखक राजीव गुप्ता 
यह चित्र जय हिंद से साभार 
क्रांतिकारियों के संघर्षो के कारण देश को स्वाधीनता मिली परंतु संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता-पूर्व जुलाई, 1946 में ही हो गया था. 11 दिसम्बर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी सदस्य चुना गया. डा. कैलाश चन्द्र भाटिया ने एक लेख में लिखा है कि संविधान सभा की नियम समिति ने डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता मे 1946 में ही एक निर्णय ले लिया था कि संविधान सभा का कामकाज की हिन्दी या अंग्रेजी ही होगी और यदि कोई सदस्य अपनी मातृभाषा मे भाषण देना चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति से वह अपनी मातृभाषा मे भाषण दे सकता है. फरवरी, 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा के संबंध को उल्लेख नही था. परंतु कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी के अथक प्रयासों से 12,13,14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे राजभाषा के विषय पर चर्चा हुई और 14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मताओं ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया. इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि मे लिखी गई हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप मे अंगीकार किया गया. हलाँकि संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संविधान लागू होने से 15 वर्ष पश्चात तक अर्थात 25 जनवरी 1965 तक अंग्रेजी भाषा को संघ के सभी कार्यों के लिये अंग्रेजी भाषा मे करने की व्यवस्था की गई. साथ यह व्यवस्था भी की गई देश के महामहिम राष्ट्रपति यदि चाहें तो 15 वर्ष की अवधि पूर्व भी यह आदेश दे सकते है कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जा सकता है.    
हिन्दी और राष्ट्रपति के आदेश
राष्ट्रपति का पहला आदेश 27 मई 1952 को विधि-मंत्रालय की अधिसूचना के रूप में और भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ. इस आदेश के अनुसार राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिपत्रों को प्राधिकृत कर दिया गया. राष्ट्रपति का दूसरा आदेश 3 दिसम्बर 1955 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया जिसे संविधान (राजकीय प्रयोजनो के लिये हिन्दी भाषा) आदेश 1955’ के रूप में जाना जाता है. इस आदेश के अनुसार जनता से पत्र-व्यवहार, संसद और प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ, सरकारी संकल्प, राजभाषा को अपनाने वाले राज्यों से पत्र-व्यवहार, संधिय़ाँ व करार जैसे प्रमुख क्रियाकलापों में हिन्दी को अपनाने के लिये कहा गया. इसी आदेश के परिणामस्वरूप विभिन्न मंत्रालयों में हिन्दी-अनुवादकों की नियुक्तियाँ शुरू हुई. उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा कई आदेश जारी किये गये और 1963 में राजभाषा अधिनियम बना.
योग में आशंकाएँ
 यह चित्र शंखनाद से साभार 
हिन्दी-प्रयोग ने लोगों को कई आशंकाओं में डाल दिया. सैन्य-सेवा मे हिन्दी-प्रयोग से लोग सबसे ज्यादा आशंकित थे. उनका मानना था कि सेना के जवानो आदेश या उनके साथ वार्तालाप अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर कैसे उपयोग किया जाय. भाषा के कारण सैनिकों के मनोबलों और देश-सुरक्षा के साथ खिलवाड नही किया जा सकता. इसी प्रकार से हिन्दी-प्रयोग को लेकर लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएँ रही, जिसका कारण लोग मुख्यतया दैनिक कार्यों के निमित्त हिन्दी मे शब्दों की कमी मानते थे. कुछ कमोबेश यही हालत विधि क्षेत्र की भी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में न्यायालयों का अधिकतर कार्य फारसी भाषा में होता था. आज भी हम न्यायालयों के आदेशों मे हम फारसी भाषा का प्रभाव देख सकते हैं. 1836 तक आते-आते फारसी का उपयोग खत्म हो गया और उसका स्थान हिन्दी,अंग्रेजी और उर्दू ने ले लिया. 1950 में देशी रियासतों के भारत में विलय होने तक न्यायालयों का कामकाज़ प्रादेशिक भाषा मे ही होता था. ग्वालियर, पटियाला, बडौदा, जम्मू-कश्मीर हैदराबाद की रियासतें इसका प्रमुख उदाहरण हैं. इतना ही नही भारत की विशालता के चलते ही यहाँ पर कई भाषाई-राज्यों का भी गठन किया गया. और राज्यो को यह अधिकार दिया गया कि वे खुद तय करें कि उनकी राज्यभाषा क्या होगी. सारी परिस्थितियों पर चर्चा के उपरांत यह तय किया गया कि सभी राज्य एक दूसरे राज्य व केन्द्र के साथ राजभाषा में ही पत्र-व्यवहार करें. परंतु यह देश की विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर प्रयास करने के बावज़ूद आज भी राजभाषा सुचारू रूप से देश-स्तर पर संतोषजनक रूप से लागू नही है. आज भी अशिक्षित लोगों को न्यायालय मे न्याय उनकी मातृभाषा में नही मिलता है.
यह चित्र जय हिंद से साभार 
पिछले दिनों कैट (केन्द्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण) से लेकर उच्च न्यायालय तक के दिये हुए फैसलों को पलटते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दी मे आरोपपत्र पाने के अधिकार पर ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने देश के हिन्दी-प्रेमियों की दम तोडती आस पर संजीवनी-बूटी सा असर किया. जिसने आम-जन को अपनी मातृभाषा मे न्याय पाने अधिकार की माँग करने वालों लोगों में एक आस की अलख को जगाया. दरअसल यह मामला मुम्बई के एक नौसेना कर्मी मिथलेश का था, जिसे उच्चाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार व उनका आदेश न मानने पर एक आरोपपत्र दिया गया था. नौसेना कर्मी ने हिन्दी भाषा मे आरोपपत्र की मांग की जिसे विभाग ने खारिज कर दिया. जिससे नौसेना कर्मी ने विभागीय जाँच मे भाग नही लिया. परिणामत: विभाग ने नौसेना कर्मचारी पर कार्यवाही कर सजा के रूप मे उसके वेतनमान मे कटौती कर दी. जिसे नौसेना कर्मचारी ने आरोपपत्र हिन्दी में न मिलने के कारण को आधार बनाते हुए विभागीय जाँच को रद्द करने की माँग की. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात आज भी सर्वोच्च न्यायालय और  अधिकांश उच्च न्यायालयों मे अपनी मातृभाषा मे आरोपी अपना पक्ष नही रख सकता. परिणामत: आरोपी को यह पता ही नही चल पाता कि उसके वकील माननीय न्यायाधीशों के समक्ष क्या तर्क कर रहें है. इसलिये आरोपी अपने आप को ठगा-सा महसूस करते है.
कहने को तो हिन्दी देश की राजभाषा है, परंतु आज भी प्रशासनिक व न्यायालय के कामकाज़ में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है. देश की शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ यही है कि ऐसे मामलों में न्याय के लिये उसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जिस भाषा को आरोपी समझता हो, ताकि कोई भी व्यक्ति तथ्यों को ठीक-ठाक समझकर अपना पक्ष रख सके. अब समय आ गया है कि अब राजभाषा अधिनियम की नये सिरे से समीक्षा की जाये क्योंकि किसी भी स्वतंत्र देश में मातृभाषा में अपना पक्ष रखना और जवाब मांगना किसी भी व्यक्ति का हक होता है.

Wednesday, December 19, 2012

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता


इन्हे बस अपने–अपने वोट बैंक की चिंता
Tue, Dec 18, 2012 at 9:03 AM
                      यह तस्वीर समय लाईव से साभार 
राज्यसभा द्वारा सोमवार को भारी बहुमत से 117वाँ संविधान विधयेक के पास होते ही पदोन्नति मे आरक्षण विधेयक के पास होने का रास्ता अब साफ हो गया है. अब यह विधेयक लोकसभा मे पेश किया जायेगा. हलांकि इस विषय के चलते भयंकर सर्दी के बीच इन दिनो राजनैतिक गलियारो का तपमान उबल रहा था. परंतु इस विधेयक के चलते यह भी साफ हो गया कि गठबन्धन की इस राजनीति मे कमजोर केन्द्र पर क्षेत्रिय राजनैतिक दल हावी है. अभी एफडीआई का मामला शांत भी नही हुआ था कि अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये पदोन्नति मे आरक्षण के विषय ने जोर पकड लिया. एफडीआई को लागू करवाने मे सपा और बसपा जैसे दोनो दल सरकार के पक्ष मे खडे होकर बहुत ही अहम भूमिका निभायी थी, परंतु अब यही दोनो दल एक-दूसरे के विरोध मे खडे हो गये है. इन दोनो क्षेत्रीय दलो के ऐसे कृत्यो से यह एक सोचनीय विषय बन गया है कि इनके लिये देश का विकास अब कोई महत्वपूर्ण विषय नही है इन्हे बस अपने – अपने वोट बैंक की चिंता है कि कैसे यह सरकार से दलाली करने की स्थिति मे रहे जिससे उन्हे तत्कालीन सरकार से अनवरत लाभ मिलता रहे.
लेखक राजीव गुप्ता 
2014 मे आम चुनाव को ध्यान मे रखकर सभी दलो के मध्य वोटरो को लेकर खींचतान शुरू हो गयी है. उत्तर प्रदेश के इन दोनो क्षेत्रीय दलो के पास अपना – अपना एक तय वोट बैंक है. एक तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी पर अपना विरोध प्रकट करते हुए यूपीए सरकार से अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये आरक्षण पर पांचवी बार संविधान संशोधन हेतु विधेयक लाने हेतु सफल दबाव बनाते हुए एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने दलित वोट बैंक को सुदृढीकरण करने का दाँव चला तो दूसरी तरफ सपा ने उसका जोरदार तरीके से विरोध जता करते हुए कांग्रेस और भाजपा के अगडो-पिछडो के वोट बैंक मे सेन्ध लगाने का प्रयास कर रही है.इस विधेयक के विरोध मे उत्तर प्रदेश के लगभग 18 लाख कर्मचारी हडताल पर चले गये तो समर्थन वाले कर्मचारियो ने अपनी – अपनी कार्यावधि बढाकर और अधिक कार्य करने का निश्चय किया. भाजपा के इस संविधान संशोधन के समर्थन की घोषणा करने के साथ ही उत्तर प्रदेश स्थित उसके मुख्यालय पर भी प्रदर्शन होने लगे. सपा सुप्रीमो ने यह कहकर 18 लाख कर्मचारियो की हडताल को सपा-सरकार ने खत्म कराने से मना कर दिया कि यह आग उत्तर प्रदेश से बाहर जायेगी और अब देश के करोडो लोग हडताल करेंगे. दरअसल मुलायम की नजर अब एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने को राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने की है क्योंकि वो ऐसे ही किसी मुद्दे की तलाश मे है जिससे उन्हे 2014 के आम चुनाव के बाद किसी तीसरे मोर्चे की अगुआई करने का मौका मिले और वे अधिक से अधिक सीटो पर जीत हासिल कर प्रधानमंत्री बनने का दावा ठोंक सके.

मुलायम को अब पता चल चुका है कि दलित वोट बैंक की नौका पर सवार होकर प्रधानमंत्री के पद की उम्मीदवारी नही ठोंकी जा सकती अत: अब उन्होने अपनी वोट बैंक की रणनीति के अंकगणित मे एक कदम आगे बढते हुए अपने “माई” (मुसलमान-यादव) के साथ-साथ अपने साथ अगडॉ-पिछडो को भी साथ लाने की कोशिशे तेज कर दी है. उनकी सरकार द्वारा नाम बदलने के साथ-साथ कांशीराम जयंती और अम्बेडकर निर्वाण दिवस की छुट्टी निरस्त कर दी जिससे दलित-गैर दलित की खाई को और बढा दिया जा सके परिणामत: वो अपना सियासी लाभ ले सकने मे सफल हो जाये. दरअसल यह वैसे ही है जैसे कि चुनाव के समय बिहार मे नीतिश कुमार ने दलित और महादलित के बीच एक भेद खडा किया था ठीक उसी प्रकार मुलायम भी अब समाज मे दलित-गैर दलित के विभाजन खडा कर अपना राजनैतिक अंकगणित ठीक करना चाहते है.

कांग्रेस ने भी राज्यसभा मे यह विधेयक लाकर अपना राजनैतिक हित तो साधने के कोई कसर नही छोडा क्योंकि उसे पता है कि इस विधेयक के माध्यम से वह उत्तर प्रदेश मे मायावती के दलित वोट बैंक मे सेन्ध लगाने के साथ-साथ पूरे देश के दलित वर्गो को रिझाने मे वह कामयाब हो जायेंगी और उसे उनका वोट मिल सकता है. वही देश के सवर्ण-वर्ग को यह भी दिखाना चाहती है कि वह ऐसा कदम मायावती के दबाव मे आकर उठा रही है, साथ ही एफडीआई के मुद्दे पर बसपा से प्राप्त समर्थन की कीमत चुका कर वह बसपा का मुहँ भी बन्द करना चाहती है. भाजपा के लिये थोडी असमंजस की स्थिति जरूर है परंतु वह भी सावधानी बरतते हुए इस विधेयक मे संशोधन लाकर एक मध्य-मार्ग के विकल्प से अपना वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश मे है. दरअसल सपा-बसपा के बीच की इस लडाई की मुख्य वजह यह है कि जहाँ एक तरफ मायावती अपने को दलितो का मसीहा मानती है दूसरी तरफ मुलायम अपने को पिछ्डो का हितैषी मानते है. मायवती के इस कदम से मुख्य धारा मे शामिल होने का कुछ लोगो को जरूर लाभ मिलेगा परंतु उनके इस कदम से कई गुना लोगो के आगे बढने का अवसर कम होगा जिससे समाजिक समरसता तार-तार होने की पूरी संभावना है परिणामत: समाज मे पारस्परिक विद्वेष की भावना ही बढेगी.

समाज के जातिगत विभेद को खत्म करने के लिये ही अंबेडकर साहब ने संविधान मे जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की थी परंतु कालांतर मे उनकी जातिगत आरक्षण की यह व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ गयी. 1990 मे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के निर्णय ने राजनैतिक दलो के राजनैतिक मार्ग को और प्रशस्त किया परिणामत: समूचा उत्तर प्रदेश इन्ही जातीय चुनावी समीकरणो के बीच फंसकर विकास के मार्ग से विमुख हो गया. इन समाजिक - विभेदी नेताओ को अब ध्यान रखना चाहिये कि जातिगत आरक्षण को लेकर आने वाले कुछ दिनो आरक्षण का आधार बदलने की मांग उठने वाली है और जिसका समर्थन देश का हर नागरिक करेगा, क्योंकि जनता अब जातिगत आरक्षण-व्यवस्था से त्रस्त हो चुकी है और वह आर्थिक रूप से कमजोर समाज के व्यक्ति को आरक्षण देने की बात की ही वकालत करेगी.

बहरहाल आरक्षण की इस राजनीति की बिसात पर ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो समय के गर्भ में है, परंतु अब समय आ गया है कि आरक्षण के नाम पर ये राजनैतिक दल अपनी–अपनी राजनैतिक रोटियां सेकना बंद करे और समाज - उत्थान को ध्यान में रखकर फैसले करे ताकि समाज के किसी भी वर्ग को ये ना लगे कि उनसे उन हक छीना गया है और किसी को ये भी ना लगे कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी उन्हें मुख्य धारा में जगह नहीं मिली है. तब वास्तव में आरक्षण का लाभ सही व्यक्ति को मिल पायेगा और जिस उद्देश्य को ध्यान मे रखकर संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी वह सार्थक हो पायेगा.      राजीव गुप्ता(9811558925)

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता

Tuesday, December 04, 2012

राजनीति के भंवर मे एफडीआई

Mon, Dec 3, 2012 at 9:14 PM
यह कैसी जुगाड की राजनीति है ?              राजीव गुप्ता
अपनी जुगाड-राजनीति के लिये प्रसिद्ध यू.पी.ए.-2 सरकार वर्तमान समय मे अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के ऐलान के साथ कि एफडीआई मुद्दे पर संसद मे नियम 184 के तहत चर्चा होगी. परिणामत: एफडीआई पर आखिरकार सरकार का रुख नरम पड़ा और संसद मे गतिरोध टूटा. यू.पी.ए.-2 के अहम सहयोगी सपा, बसपा और डीमके जैसे दलो ने वर्तमान सराकार को बचाने हेतु भले ही सशर्त समर्थन देने की बात की हो परंतु आज़ादी के बाद से सत्ताधारी दलो के पास इससे ज्यादा राजनैतिक दिवालियापन अब तक देखने को नही मिला. यह कैसी जुगाड की राजनीति है कि जो दल सडको पर जनता के हित की बात करते हुए सत्ताधारी दलो की नीतियो का खुलकर विरोध करने हेतु धरना-प्रदर्शन कर अपनी गिरफ्तारी देते है वही दल संसद के अन्दर सत्ता की मलाई खाने हेतु उन्ही सत्ताधारी दलो की सरकार को गिरने से बचाने हेतु उनका संकटमोचन बनकर खडे हो जाते है.

डीएमके ने तो यहाँ तक कह दिया कि  अगर वे एफडीआई के विरोध में वोट करते हैं तो यह यूपीए सरकार के लिए खतरा होगा और बीजेपी के सत्ता में आने से बाबरी मस्जिद जैसी घटनाएं हो सकती हैं. वही सपा और बसपा का तर्क है कि साम्प्रदायिक शक्तियो को सत्ता से दूर रखने हेतु ही वे सरकार के साथ खडी होंगी. जबकि सच्चाई यह है कि अभी पिछले दिनो चार राज्यो आन्ध्र प्रदेश - चारमीनार , असम - कोकराझार, महाराष्ट्र – मुम्बई, उत्तर प्रदेश – फैज़ाबाद, बरेली, कोसीकलाँ मे साम्प्रदायिक दंगे भडके परंतु इन सभी राज्यो मे भाजपा की सरकार न होकर कांग्रेस, एन.सी.पी व सपा जैसे दलो की ही सरकार है. इसके उलटे गुजरात, मध्यप्रदेश, छतीसगढ, झारखंड, गोवा, कर्नाटक, बिहार आदि जिन राज्यो मे भाजपा व उसके समर्थक दलो की सरकार है वहाँ पर इस समय किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक दंगे नही हुए. इन दलो के बयानो को देखते हुए क्या यह मान लिया जाय कि राजनीति मे देश के विकास का मुद्दा अब कोई स्थान नही रखता तथा चर्चा विकास केन्द्रित होने की बजाय सिर्फ साम्प्रदायिकता की आड मे सत्ता लोलुपता के चलते जुगाड-केद्रित ही राजनीति पर होगी.       

22 नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र की हंगामेदार शुरुआत के बीच तृणमूल कांग्रेस द्वारा पेश किया गया अविश्वास प्रस्ताव जरूरी समर्थन न मिल पाने की वजह से लोकसभा में भले ही गिर गया. परंतु  पूंजी निवेश के नाम पर एफडीआई का फैसला अब उसके गले की फांस बन चुका है. एफडीआई पर सरकार के फैसले के विरोध मे जहाँ 4-5 दिसम्बर को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के चलते व्यापारी सडको पर उतरेंगे तो वही इस गम्भीर विषय पर राजनैतिक पंडित संसद मे बहस कर वोटिंग करगे. संप्रग सरकार खुदरा व्यापार में सीधे विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध करने वाले दलों को जोड़-तोड़कर जुगाड से उन्हे अपने साथ कर संसद में बहुमत जुटाने में अगर सफल हो भी जाती है तो माकपा महासचिव प्रकाश करात के अनुसार वाम दल उसे लागू करने के लिए फेमा में संशोधन के समय भी मत विभाजन पर जोर देगा. उनके अनुसार केंद्र की संप्रग सरकार अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देने के बाद अब वह संसद में बहुमत जुटाने के लिए इसका विरोध करने वाले दलों को जोड़ने-तोड़ने में लगी है. सपा नेता राम गोपाल यादव के अनुसार अगर सरकार एफडीआई का मुद्दा राज्यसभा में लाती है तो वे उसके खिलाफ मतदान करेंगे परंतु लोकसभा मे सपा सरकार के साथ खडी रहेगी. कृषि मंत्री शरद पवार के अनुसार भारत मे बहुब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का स्वागत है और इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा. दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के अनुसार बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लागू करना गरीबों के खिलाफ अपराध है. एक तरफ प्रधानमंत्री द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बडी कंपनियों के उतरने से प्रत्येक वर्ष एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा पर हकीकत यह है कि इसके कारण करीब पांच करोड़ लोगों की आजीविका छिन जाएगी. इसका ताज़ा उदाहरण यह भी है कि  अमेरिका और मेक्सिको जैसे देशों में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति दिया जाना विफल  साबित हुई. इन राजनैतिक पंडितो के मंतव्यो से यही लगता है कि अब बिसात बिछ चुकी है और इनके बीच चल रहे शह और मात के खेल के बीच आम जनता पिसकर मात्र तमासबीन बनी हुई है.

इसका एक पहलू और भी है कि  अगर हम कुछ दिनो पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये "शहीदी वाले" वक्तव्य पर ध्यान दे  जिसमे उन्होने कहा था कि “जाना होगा तो लडते-लडते जायेंगे”  तो पायेंगे कि महँगाई, भ्रष्टाचार जैसे गम्भीर आरोपो से घिरी सरकार अब अपनी छवि सुधारने मे लग गयी है. उसके पास सरकार चलाने के लिये जुगाड से पर्याप्त संख्या बल है और अगर कभी उस संख्या बल में कोई कमी आई तो उसके पास आर्थिक पैकेज और सीबीआई रूपी ऐसी कुंजी है जिसकी बदौलत वह किसी भी दल को समर्थन देने के लिए मजबूर कर सकती है. अगर इतने में भी बात न बनी और मध्यावधि चुनाव हो भी गए तो कांग्रेस जनता को यह दिखाने के लिए हमने अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तो की थी पर इन राजनैतिक दलों ने आर्थिक सुधार नहीं होने दिया का ऐसा भंवरजाल बुना जायगा कि आम-जनता उसमे खुद फंस जायेगी.

इस समय भारत की जनता के सम्मुख राजनैतिक दलों की विश्वसनीयता ही सवालो के घेरे में है और वह इन सब उठापटक के बीच मौन होकर स्थिति को भांप रही है. सरकार बेनकाब हो चुकी है और महँगाई की मार से आम जनता त्राहि - त्राहि कर रही है.  आम आदमी जो छोटे - मोटे व्यापार से अभी तक अपना परिवार पाल रहा था सरकार ने अपने एफडीआई के  फैसले से उसको बेरोजगार करने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार है. सरकार को यह ध्यान रखना चाहिये कि विदेश निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश मे व्यापार करने के लिये ही आयेंगी अत: वे अपने मुनाफे के बारे मे ही सोचेंगी.

भारत जैसा देश जहां की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो , आर्थिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु आर्थिक सुधार भारतीयों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा न कि विदेशियों के हितो को ध्यान में रखकर.  ऐसे मे सरकार किसके इशारे पर और किसको खुश करने के लिये और क्या छुपाने के लिए आर्थिक सुधार के नाम पर इतनी जल्दबाजी में इतने विरोधे के बावजूद  इतने बड़े - बड़े फैसले ले रही है असली मुद्दा यह है. राजनेता तो राजनीति करते ही है परन्तु परेशानी तो आम जनता को ही होती है ऐसे में भला आम जनता जाये तो कहाँ जाये.
--राजीव गुप्ता, 9811558925

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राजनीति के भंवर मे एफडीआई

Sunday, March 04, 2012

हर दूसरे-तीसरे महीने मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा

भारत को तेल-आधारित अर्थव्यवस्था का विकल्प सोचना ही होगा
अब यह कहना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णतः  कच्चे तेल पर आधारित हो चुकी है बिलकुल भी अतिश्योक्ति नहीं होगा ! मशीनीकरण के इस आधुनिक युग में लगभग सभी उत्पादन-क्षेत्र ऊर्जा-आधारित है ! भारत में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत "पेट्रोलियम पदार्थ" है ! "पंचलाईट" से लेकर सुपरसोनिक हवाई जहाज़ और अंतरिक्षयान तक लगभग सभी उपकरणों में ईंधन के रूप में पेट्रोलियम पदार्थ का ही उपयोग होता है जिसका सरोकार समाज के हर तबके से है ! इसलिए हम कह सकते है कि वर्तमान समय में तेल रूपी "विश्व-मोहिनी" से प्रभावित होकर महंगाई "सुरसा"  की भांति अपना मुंह दिन-प्रतिदिन फैलाकर बढ़ाये जा रही है ! जिसकी मार से आम आदमी त्रस्त है, और सरकार विश्व-पटल पर तेल के दामों में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड लेती है ! परन्तु जबसे यूंपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है आये हर दूसरे-तीसरे महीने निजी कम्पनियाँ मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा किये जा रही है ! ज्ञातव्य है कि पिछले साल पेट्रोल के दामों मे लगभग आठ रूपये से भी अधिक तक का इजाफा किया गया ! इसका कारण निजी कम्पनियाँ  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की लगातार बढ़ती हुई  कीमत बताती हैं ! गौरतलब है कि वर्तमान में कच्चे तेल की कीमत १२१ यूएस डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक है ! अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे के भी मुख्यतः कई  कारण हैं जैसे चीन और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में तेल की मांग में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी, तेल - उत्पादक देशो जैसे अरब देश, लीबिया आदि में हो रही राजनैतिक अस्थिरता और वहां उपजे जन असंतोष , तेल-भण्डार में हो रही निरंतर कमी, सटोरियों का दबदबा इत्यादि ! 
अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है कि मांग और आपूर्ति का समीकरण ही किसी भी वस्तु के  मूल्य को प्रभावित करता है ! दुनिया के लगभग सभी देश अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से रखने के लिए कच्चे तेल पर निर्भर है ! कच्चे तेल की मांग में लगातार जिस अनुपात में इजाफा हो रहा है उस अनुपात में आपूर्ति में इजाफा न होना तेल-मूल्यों की लपटों को गगनचुम्बी बना रहा है ! परन्तु तेल-आपूर्ति बढाकर इस समस्या से तात्कालिक निजात पाया जा सकता है जैसा कि भारत ने जून २०११ में करके दिखाया था ! ज्ञातव्य है कि २५ जून २०११ से अगले तीन दिनों तक भारत ने तेल-आपूर्ति को बढ़ा दिया था जिससे कि तेल के दामों में कुछ गिरावट आई थी हालाँकि बाद में कीमत फिर से उछल गयी थी ! परन्तु तेल-इतिहास यह कहता है कि मात्र तेल-आपूर्ति से इस गगनचुम्बी आग पर दीर्घकालीन के लिए निजात पाना संभव नहीं है ! इसलिए हमें तेल की मांग पर भी अंकुश लगाना ही होगा !  २००८ के बाद एक ऐसा समय भी आया था जब तेल-मूल्य घटकर ३० डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था ! यह चमत्कार कोई रातोरात नहीं हो गया था ! तेल-मूल्य को नीचे लाने में मुख्यतः यूरोप और अमेरिका की आर्थिक मंदी जिम्मेदार थी ! आर्थिक मंदी होने के कारण उन देशों में करों की बिक्री कम हो गयी, दूसरे देशों से आने वाली वस्तुओं की खरीदारी भी कम हो गयी और  जहाजो ने भी उड़ान भरना कम कर दिया था ! परन्तु अब पुनः एक बार फिर से तेल की मांग जोरो पर है ! जनवरी २०१२ को लन्दन में आयोजित  "मेना, MENA अर्थात मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका" आधारित दो दिवसीय सेमीनार में ओपेक - सेक्रेटरी जनरल ने बताया कि कच्चे तेल की वैश्विक मांग २०११ में ८८ मिलियन बैरल / प्रतिदिन थी जिसके २०१५ तक ९३ मिलियन बैरल / प्रतिदिन , २०३५ तक ११० मिलियन बैरल / प्रतिदिन तक बढ़ने की सम्भावना है !  अगर मांग की इसी अनुपात में तेल - उत्पादन और उसकी आपूर्ति नहीं की गयी तो आने वाले समय में एक बार फिर समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी !

लेखक:राजीव गुप्ता  
ईरान जैसा देश जहां पेट्रोलियम - पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है उसने भी ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाकर समूचे विश्व को अचम्भित कर दिया ! ज्ञातव्य है कि अभी हाल ही में कुछ दिनों पूर्व ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका के लाख विरोध के बाद आगे बढ़ाते हुए नाभिकीय - ऊर्जा से विद्युत् उत्पादन के लिए ईरान के राष्ट्रपति ने परमाणु-सयंत्र का उद्घाटन किया और विश्व को दिखाने के लिए उसका टेलीकास्ट भी कराया ! इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों इटली, फ्रांस, स्‍पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल को तेल बेचने से भी मना कर दिया ! गौरतलब है कि इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है ! तेल न मिलने से इन देशो के अर्थव्यवस्था और ख़राब होगी ! अमेरिका की भी अर्थव्यवस्था पहले से ख़राब है ! अमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है ! समूचा विश्व मुख्यतः विकसित देश तेल पर अपना आधिपत्य ज़माने के लिए किस हद तक संघर्षरत है इसका अंदाजा उनकी विदेश नीति को देखकर लगाया जा सकता है ! वैसे तो तेल पर आधिपत्य को लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही कई देशों के बीच होड़ लग गयी थी !
अमरीका  अपनी नजर काकेशिया और कैस्पियन इलाके के तेल भण्डार रूस , ईरान, ईराक तथा सोवियत संघ के विखंडित हिस्सों में जो बड़े पैमाने पर मौजूद थे पर गडाए हुए था ! इसकी पुष्टि अभी हाल ही में हुए एक घटनाचक्र से लगाया जा सकता है ! गौरतलब है कि अमरीका ने अपनी  सैन्य कार्यवाही में लादेन और तालिबान के कट्टर हिस्से को ख़त्म कर और वहां अपनी मनमाफिक सरकार स्थापित किया जिससे अमेरिका न केवल अपने तात्कालिक लक्ष्य को पूरा किया अपितु उसके दूरगामी लक्ष्य यानी अफगानिस्तान के माध्यम से यूरेशियाई - ह्रदय क्षेत्र अर्थात तेल निर्यातक क्षमता वाले छोटे-छोटे  देशों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी बना ली ! इसलिए अमेरिका अब उज्बेकिस्तान, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान इजराइल तथा पश्चिमी देशों के साथ मिलकर  एशिया के चारो शक्तिशाली देश जिसमे रूस, चीन, भारत और ईरान शामिल है के विरुद्ध समीकरण बनाने में जुट गया है ! शंघाई-५ ( रूस, चीन, ताजिकिस्तान, कज़ाकिस्तान, और किरगिस्तान ) की स्थापना तथा इस समूह की ईरान के साथ मित्रता और ईराक के प्रति सहानुभूति एवं भारत-रूस की बढ़ती मित्रता ने अमेरिका के समीकरण-संतुलन को असंतुलित कर दिया ! अपने समीकरण को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने उज्बेकिस्तान से रक्षा-संधि कर ली ! इस प्रकार दुनिया के अब सभी देश अपनी विदेश नीति को तेल-केन्द्रित कर रहे है ! भविष्य में भारत की विदेश नीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह कहना मुश्किल है परन्तु संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को तेल-आधारित से मुक्त करना होगा तथा उसका विकल्प खोजना ही होगा !  राजीव गुप्ता, (98115-58925)

Sunday, February 12, 2012

बाजार, तकनीकी और नैतिक पतन // राजीव गुप्ता

"वेलेंटाइन-डे" के नजदीक आते-आते "कंडोम और व्याग्रा" की विक्री क्यूं बढ़ जाती है?
जयप्रकाश नारायण  ने अपनी एक पुस्तक "समाजवाद से सर्वोदय की ओर" में लिखा है कि "विज्ञानं ने अखिल विश्व को सिकोड़कर एक पड़ोस बना दिया है !" इस बात की सत्यता एवं प्रामाणिकता वर्तमान परिदृश्य की भौतिकता के आधुनिक दौर में हुए तकनीकी विकास को देखकर लगाया जा सकता है ! मसलन देश - विदेश में. घट रही घटनाओ को टी.वी. रिमोट की एक बटन दबाकर देखा जा सकता है तो वही सैकड़ो मील की दूरी मात्र कुछ घंटो में तय की जा सकती है ! पहले संवाद का जरिया "पत्र" होते थे परन्तु  जल्दी ही इसका स्थान "सचल दूरभाष" अर्थात "मोबाईल फोन" ने ले लिया ! मोबाईल कम्पनियाँ लोगों को लुभाने के लिए तरह - तरह के " न्यू माडल" बाजार में उतार दिए है ! मसलन थ्री जी, फोर जी के माध्यम से न केवल सिर्फ "बातें" की जा सकती है अपितु अब तो एक-दूसरे से "फेस - टू - फेस" देखकर बात की जा सकती है ! आजकल के इन दूरभाषों को यदि "छोटा संगणक" अर्थात "मिनी कंप्यूटर" की  संज्ञा दी जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ! जिसकी मदद से  गेम खेलने के साथ-साथ गाने सुनने से लेकर घंटो की फ़िल्में तक देखा जा सकता है !  इसका प्रत्यक्ष उदहारण है - राजस्थान सरकार के पूर्व मंत्री की करतूतें एवं कर्नाटक की विधानसभा ! 
चित्र साभार: जयपुर.को 
ज्ञातव्य है जोधपुर की भंवरीदेवी के लापता होने और हफ्तों तक सरकार की खामोशी से नाराज राजस्थान हाईकोर्ट की  फटकार से राजस्थान सरकार की सुस्ती दूर हुई तथा जाट नेता महिपाल मदेरणा को बर्खास्त कर दिया गया और तीन महीने बाद गिरफ्तार कर लिया गया ! 1992 के अजमेर के अश्लील फोटो ब्लैकमेल कांड में युवक कांग्रेस के तत्कालीन जिला अध्यक्ष फारूख चिश्ती को सजा सुनाते समय कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “ये घिनौनेपन और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है ! आपराधिकता का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले !”  कर्नाटक की विधानसभा में "ब्लू फिल्म" देखने के चलते कृष्णा पालेमर, लक्ष्मण सावदी और सीसी पाटिल  को इस्तीफ़ा देना पड़ा ! एन .डी. तिवारी के "पैत्रिक-जाँच" को लेकर कोर्ट का आदेश किसी से छुपा हुआ नहीं है !
बाजार  और सेक्स  के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़  दिया है  !  फिल्म, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनल  मुद्रित माध्यमों  अर्थात "एडवरटाइजमेंट"  पर ही निर्भर  है ! प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है ! यह कहना गलत ना होगा कि आज मनुष्य बाजारू संस्कृति का खिलौना मात्र बनकर रह गया है ! जो कि  शरीर कम ढंकने, उघाड़ने या ओढ़ने पर जोर देता है ! और तो और  आजकल "कलंक" की भी मार्केटिंग होती है  क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं ! सदियों से चला आ रहा "देह बाजार" भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है ! अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है ! 
आज मानव बाजारवाद का इतना ग़ुलाम हो गया है कि उसकी रोज-मर्रा की सारी आवश्यकताएं "बाजार निश्चित" करता है ! मसलन उसे क्या पहनना है , कैसी गाडी चाहिए आदि - आदि ! त्योहारों का ऐसा बाजारीकरण किया जाता है कि मनुष्य उसके चक्रव्यह में फंसकर खरीदारी कर ही लेता है ! यहाँ तक कि मानवीय - भावनाओं का भी मूल्यांकन बाजार ही करता है यह कहना कदापि अनुचित न होगा ! इसी बाजारीकरण के चलते मानव ने अपना नैतिक आधार खो दिया है ! परिणामतः समाज में "सहनशीलता" की कमी हो गयी है ! मसलन "प्रेमिका के मना कर देने पर उसके प्रेमी ने उसे बदनाम करने के लिए उसकी आपत्तिजनक तस्वीर अथवा तकनीकी का उपयोग कर शारीरिक सम्बन्ध का एम्.एम्.एस. बनाकर उसे इन्टरनेट पर डाल दिया "  ऐसे समाचारों से समाचार पत्र आये दिन भरे होते है ! एक अखबार ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए यहाँ तक लिखा कि "वेलेंटाइन - डे" के नजदीक आते - आते "कंडोम और वायग्रा" की विक्री बढ़ जाती है ! जो कि "सामाजिक विकृति" की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है ! आज इन्टरनेट पर आसानी से उपलब्ध "बेड-रूम के अन्तरंग पलों" की सामग्री किसी से भी छुपी हुई नहीं है जिसे लेकर अभी हाल में ही कोर्ट ने भी कड़ा एतराज जताते हुए ऐसी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने का नोटिस दिया था !
राजीव गुप्ता (लेखक)
केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही  जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है ! भोग और कामोपभोग से तृप्ति  उसे कभी नहीं मिलती है !  संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है ! कहावत भी है - ‘सब्र का फल मीठा होता है !’ इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो  भागता है सुगंध के लिए परन्तु  अतृप्त हो कर थक जाता है  ! सुगंध स्वयं उसके भीतर है ! उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है ! देह तो एक चारदीवारी है,  एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है  ! भवन को अस्तित्व मान लेना भ्रांति है ,  और भवन  पर पेंट कर,  रंग-रोगन कर उसे चमका लेना भी क्षणिक आनंद भर मात्र  है ! उससे दुनिया जहान को भरमा लेना भी कुछ देर का खेल तमाशा है ! भवन  को गिरना है आज नहीं तो कल , यही  शाश्वत सत्य है ! इसलिए बाजार , तकनीकी और नैतिक मूल्यों का सामंजस्य ही वर्तमान समय की दरकार है यह हम सबको मिलकर सोचना होगा !                                                             

Wednesday, January 11, 2012

प्रवासी भारतीय दिवस – संकल्‍पना और साक्षात् के 10 वर्ष

प्रवासी भारतीय दिवस:56 देशों के प्रतिनिधियों ने  लि‍या भाग
वि‍शेष लेख                                                                                       राकेश बी. दुबे*
प्रवासी  भारतीय दिवस पर जयपुर राजस्थान में वेबसाईट लांच करते हुए प्रधान मंत्री डा.मनमोहन सिंह  उनके साथ त्रिनडाड और टोबेंगो की प्रधान मंत्री सुश्री कमला प्रसाद बिसेसर, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, मुख्य म्न्त्रिअशिक गहलोत और ओवरसीज़ भारतीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री व्यालार रवि भी नजर आ रहे हैं.
08 जनवरी, 2012 को भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीय दिवस-2012 का उद्घाटन किया । प्रवासी भारतीय दिवसों की श्रृंखला में यह दसवां कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में त्रिनीडाड एवं टोबैगो की प्रधानमंत्री श्रीमती कमला प्रसाद बिसेसर मुख्‍य अतिथि थीं ।  09 जनवरी, 2012 को भारत की राष्‍ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने, दुनियां भर में अपने-अपने क्षेत्र में उल्‍लेखनीय उपलब्‍धियां प्राप्‍त करने वाले भारतीय मूल के 14 व्‍यक्‍तियों को प्रवासी भारतीय सम्‍मान से अलंकृत किया । इस वर्ष प्रवासी भारतीय दिवस में 56 देशों के 1500 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लि‍या। प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ भारत के जुड़ाव के इस अनूठे कार्यक्रम की संकल्‍पना किसने की, किन-किन रास्‍तों से गुजरकर वर्ष 2003 में प्रवासी भारतीय दिवस की शुरूआत हुई, इन बातों की जानकारी के लिए इतिहास पर एक सरसरी नज़र डाल लेना अभीष्‍ट होगा ।  

     प्रवास की संकल्‍पना, प्राचीन सभ्‍यताओं के समय से ही अस्‍तित्‍व में है । वैदिक सभ्‍यता से लेकर 18वीं शताब्‍दी तक इसका स्‍वरूप भारत में प्राय: ज्ञानार्जन के लिए, लोक कल्‍याण के लिए और धार्मिक अभिप्रायों से किए जाने वाले प्रवास का रहा है । बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद सम्राट अशोक ने ईसा-पूर्व तीसरी शताब्‍दी में अपने पुत्र एवं पुत्री को धार्मिक अभिप्राय से प्रवास पर भेजा था । दक्षिण भारत के राजेन्‍द्र चोल जैसे शक्‍तिशाली सम्राटों ने सुदूर पूर्व के देशों (वर्तमान मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि) तक अपनी नौसेनाओं को भेजकर राजनैतिक-आर्थिक संबंध स्‍थापित किए जो अभी तक विद्यमान हैं । अल बरूनी, मेगस्‍थनीज, मार्को पोलो, ह्वेन सांग, इब्‍न बतूता आदि ने अरब एवं यूरोपीय देशों से आकर भारत में प्रवास किया था ।  मध्‍य एशिया के देशों से आए तुर्क, हूण, पठान, उज्‍बेक आदि का भारत में आगमन तो आक्रमणकारियों के रूप में हुआ था लेकिन वे बाद में यहीं के होकर रह गए और इस प्रकार वे भी भारत में अन्‍य देशों के प्रवासी ही माने जाएंगे । हजारों वर्ष तक भारतीय सभ्‍यता का अरब देशों एवं चीन, इंडोनेशिया, बर्मा, कम्‍बोडिया आदि देशों के साथ प्रत्‍यक्ष और यूरोपीय देशों के साथ अप्रत्‍यक्ष सम्‍पर्क/संबंध रहा है ।

     व्‍यापारिक उद्देश्‍यों के लिए बड़े पैमाने पर प्रब्रजन एवं प्रवास की शुरुआत 16वीं शताब्‍दी में हुई । वॉस्‍को डि गामा, कोलम्‍बस, पेदरो अलवरेस कबराल आदि जैसे महान नाविकों ने भारत, अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों का समुद्री सम्‍पर्क यूरोपीय देशों से जोड़कर प्रवास के नए रास्‍ते खोल दिए । भारत के तटवर्ती प्रदेशों से व्‍यापारियों ने अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ संबंध बनाना शुरू किया । गुजराती व्‍यापारियों ने वर्तमान केन्‍या, उगांडा, जिम्‍बाबवे, जाम्‍बिया, दक्षिण अफ्रीका में अठारहवीं शताब्‍दी में अपने कदम रखे । इन्‍हीं में से एक व्‍यापारी दादा अब्‍दुल्‍ला सेठ के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में महात्‍मा गांधी ने मई, 1893 में नटाल प्रान्‍त में पदार्पण किया । रंगभेद नीति के साथ उनका संघर्ष और प्रवासी भारतीय समुदाय के सम्‍मान की उनकी लड़ाई सर्वविदित है । अहिंसा और सत्‍याग्रह के सर्वथा नवीन साधनों से प्राप्‍त सफलता से वे जन-जन के मानस में प्रतिष्‍ठित हो गए । वर्ष 1915 की 09 जनवरी को वे भारत वापस लौटे और 22 वर्ष के प्रवास के बाद लौटे इस महान आत्‍मा से प्रेरणा लेकर इस दिवस को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है ।  

     दरअसल, प्रवासी भारतीयों के साथ भारत का औपचारिक संबंध तो था लेकिन एक निकटवर्ती, घनिष्‍ठ और आत्‍मिक जुड़ाव की आवश्‍यकता बहुत समय से महसूस की जा रही थी । नवम्बर, 1977 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक समारोह में तत्‍कालीन विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि दूर-दराज के देशों में बसे भारतवंशियों के साथ हमें अपना नाता और प्रगाढ़ करना होगा और कि भारत, इन प्रवासियों की सेवाओं, त्‍याग और संघर्ष को किसी प्रकार नहीं भूल सकता । प्रवासी भारतीयों के साथ अपने जुड़ाव को प्रगाढ़ करने के लिए किस प्रकार की नीतियां बनाई जाएं, कौन से साधन अपनाए जाएं और किस प्रकार का तंत्र तैयार किया जाए, इस पर चर्चा होती रही और फलस्‍वरूप 18 अगस्‍त, 2000 को विधिवेत्‍ता, संस्‍कृति कर्मी, कवि, राजनयिक एवं राजनेता डॉ लक्ष्‍मीमल्‍ल सिंघवी की अध्‍यक्षता में एक समिति का गठन विदेश मंत्रालय ने किया । इस समिति में पूर्व विदेश राज्‍यमंत्री श्री आर.एल. भाटिया, पूर्व राजनयिक श्री जे. आर. हिरेमथ, अन्‍तर-राष्‍ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्री बालेश्‍वर अग्रवाल और राजनयिक श्री जे.सी शर्मा शामिल थे । समिति ने 20 से अधिक देशों का प्रत्‍यक्ष दौरा करके, विश्‍व भर के यथा-संभव अधिकतम प्रवासी भारतीय संगठनों से, पूर्व राजनयिकों से बातचीत करके और अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव के आधार 19 दिसम्‍बर, 2001 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को दी जिसमें, अन्‍य बातों के साथ-साथ प्रवासी भारतीय दिवस 09 जनवरी को मनाए जाने और प्रति वर्ष प्रवासी भारतीय सम्‍मान दिए जाने की सिफारिशें भी शामिल थीं ।

     समिति ने पाया कि 19वीं शताब्‍दी में भारत में अंग्रेजी शासन के चलते, नए अवसरों की तलाश में और आर्थिक कारणों से बड़े पैमाने पर लोग दूसरे देशों में प्रवास पर गए । इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ब्रिटेन की संसद ने जब वर्ष 1833-34 में गुलामी प्रथा को समाप्‍त कर दिया और दुनियां भर में फैले उनके साम्राज्‍य को मजदूरों का अभाव सताने लगा तो गुलामी की एक नई तरकीब निकाली गई जिसे शर्तबंदी (अंग्रेजी में अग्रीमेंट- जिसका अपभ्रंश रूप गिरमिट पड़ गया) कहा गया । इसमें अधिकतम पांच वर्ष के अग्रीमेंट पर कामगारों को त्रिनीडाड एवं टोबैगो, गयाना, सूरीनाम, मॉरीशस और फीजी जैसे देशों में ले जाया गया । इन गिरमिटिया मजदूरों का जीवन, गुलामों से किसी प्रकार बेहतर नहीं था । प्रवासियों की दूसरी खेप, भारत की आजादी के बाद, पेशेवर कार्मिकों के रूप में अमेरिका, ब्रिटेन तथा कनाडा जैसे विकसित देशों में और इसके समानांतर एक धारा, तेल-समृद्ध खाड़ी देशों में कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों के रूप में गई । वर्ष 1970 के बाद, उच्‍च कुशल एवं पेशेवर लोग, आगे की पढ़ाई के लिए या वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों पर काम करने के लिए गए । इस प्रकार, भारत के प्रवासी समुदाय में आज की स्‍थिति में लगभग 25 लाख लोग शामिल हैं और दुनियां में चीन ही संभवत: एकमात्र ऐसा देश है जिसका प्रवासी समुदाय, भारत जैसा विविध और विशाल है ।

     चीन की आर्थिक प्रगति में प्रवासी चीनियों के भारी योगदान को देखते हुए, प्रवासी भारतीयों के भारत से आत्‍मिक/आध्‍यात्‍मिक/सामाजिक जुड़ाव को देखते हुए और पश्‍चिम के देशों में अपनी कड़ी मेहनत के बल पर आर्थिक समृद्धि प्राप्‍त कर लेने पर अपनी मातृभूमि के प्रति कुछ करने की आकांक्षा से साक्षात्‍कार करते हुए समिति ने पुरजोर सिफारिश की कि इस विशाल प्रवासी भारतीय समुदाय से लाभ उठाने से पहले हमें उनकी समस्‍याओं एवं चिंताओं का समाधान करना होगा जैसे कि-  

1.      खाड़ी देशों में जाने वाले श्रमिकों के साथ भारत में भर्ती कंपनियां धोखाधड़ी करती हैं। 
2.      काम के दौरान मालिकों द्वारा उनके पासपोर्ट अपने कब्‍जे में ले लिए जाते हैं, उन्‍हें पूरी मजदूरी नहीं दी जाती है, उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता है, उनका दैहिक शोषण किया जाता है ।
3.      भारतीय दूतावासों से उन्‍हें पर्याप्‍त मदद नहीं मिलती है । भारत में उनके परिवारी जनों की सुरक्षा नहीं की जाती है ।
4.      भारत लौटने पर उन्‍हें कस्‍टम अधिकारियों द्वारा परेशान किया जाता है ।
5.      अन्‍य देशों की नागरिकता गृहण कर चुके भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों को भारत आगमन के लिए विदेशियों की तरह वीसा लेना पड़ता है ।
6.      प्रवासियों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, आर्थिक चिंताओं के समाधान के लिए भारत में उन्‍हें बहुत भटकना पड़ता है ।
7.      पूर्वी अफ्रीकी देशों में,  फीजी में तथा अन्‍य देशों में भी भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों के सामने राजनैतिक/सामाजिक/जातीय आधार पर संकट आने की स्‍थिति में उनकी सहायता के भारत को आगे आना चाहिए, अनिवासी भारतीयों को भारत में मताधिकार होना चाहिए, आदि आदि ।
भारत सरकार ने इन समस्‍याओं के समाधान के लिए इन 10 वर्षों में कई उल्‍लेखनीय कदम उठाए हैं- 
1.      खाड़ी देशों में या अन्‍यत्र भी, आपत्‍ति में आए साधनहीन प्रवासियों की सहायता के लिए 43 देशों में भारतीय समुदाय कल्‍याण कोष की स्‍थापना की गई है । इसमें अन्‍य के साथ-साथ, मुसीबतज़दा मजदूरों/घरेलू नौकर/नौकरानियों को रहने-खाने की व्‍यवस्‍था, सरकारी खर्च पर उन्‍हें भारत पहुंचाने की सुविधा और दुर्भाग्‍यवश मौत हो जाने पर पार्थिव शरीर को भारत लाया जाना शामिल है ।
2.      भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों को भारत की यात्रा के लिए लम्‍बी अवधि का एकमुश्‍त वीसा एवं रहने की अवधि में छूट प्रदान करने वाला पीआईओ कार्ड दिया गया । बाद में इसका नवीकृत रूप ओसीआई कार्ड दिया जा रहा है । इससे भारतीय मूल के व्‍यक्‍ति लंबी अवधि तक बिना वीजा के भारत आ-जा सकते हैं । यह योजना वर्ष 2005 से लागू है और अब तक 8 लाख से अधिक ओसीआई कार्ड जारी किए जा चुके हैं ।  
3.      सैकड़ों वर्ष पूर्व गए प्रवासियों की चौथी-पांचवीं पीढ़ी अपने पैतृक स्‍थान की खोज में बहुत परेशानियों का सामना करती थी । इसके लिए वर्ष 2008 से ट्रेसिंग द रूट्स नाम की योजना चलाई जा रही है ।
4.      प्रवासी भारतीयों की युवा पीढ़ी को आधुनिक भारत का साक्षात्‍कार कराने के लिए ‘भारत को जानो’ (know India program) चलाया जा रहा है । अलग-अलग राज्‍यों के सहयोग से चलाई जाने वाली योजना में 18 से 26 वर्ष के युवाओं को भारत की प्रायोजित यात्रा कराई जाती है । अब तक 17 यात्रा-कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं जिनमें पांच सौ से अधिक युवा हिस्‍सा ले चुके हैं ।  
5.      युवा पीढ़ी को भारत में उपलब्‍ध उच्‍च स्‍तरीय शिक्षा की सुविधा देने के लिए, उच्‍च शिक्षा संस्‍थानों में उनके लिए स्‍थान आरक्षित किए गए हैं और प्रति वर्ष 100 विद्यार्थियों को 5000 अमेरिकी डॉलर प्रति विद्यार्थी की दर से छात्रवृत्‍ति दी जाती है । अलग से पीआईओ विश्‍वविद्यालय स्‍थापित किए जाने की योजना पर काम चल रहा है ।
6.      ओवरसीज इंडियन यूथ क्‍लब, स्‍टडी इंडिया प्रोग्राम,  आदि के द्वारा नई पीढ़ी को भारत से जोड़ने का काम किया जा रहा है ।
7.      वर्ष 2003 से लगातार प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन 7 से 9 जनवरी तक किया जाता है जिसमें भारत के प्रधान मंत्री, राष्‍ट्रपति, कई केन्‍द्रीय मंत्री, राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री तथा मंत्रालयों/विभागों के उच्‍चाधिकारी शामिल होते हैं । प्रवासी भारतीय दिवस, एक उल्‍लेखनीय आयोजन बन गया है । अब तक दिल्‍ली में 6 और मुंबई, हैदराबाद, चैन्‍नई और जयपुर में एक-एक प्रवासी भारतीय दिवस आयोजित किए जा चुके हैं । औसतन 1500 से 1800 प्रतिनिधि इन आयोजनों में प्रति वर्ष हिस्‍सा लेते हैं ।
8.      लघु प्रवासी दिवसों की योजना शुरू की गई है । अब तक न्‍यूयॉर्क, सिंगापुर और कनाडा में ऐसे लघु प्रवासी दिवस मनाए गए हैं । अगला दिवस, दुबई में आयोजित किया जाएगा ।
9.      अपने-अपने प्रवास के देश में उल्‍लेखनीय सफलताएं प्राप्‍त करने वाले, मानव सेवा के क्षेत्र के काम करने वाले तथा भारत का नाम रोशन करने वाले व्‍यक्‍तियों/संस्‍थाओं को प्रति वर्ष राष्‍ट्रपति द्वारा सम्‍मानित किया जाता है । वर्ष 2012 तक 133 व्‍यक्‍तियों एवं 03 संस्‍थाओं को उनकी उपलब्‍धियों/सेवाओं के लिए सम्‍मानित किया जा चुका है ।
10.  अनिवासी भारतीयों द्वारा भारतीय महिलाओं से विवाह के बाद विदेश ले जाकर उन्‍हें परेशान किए जाने की घटनाओं को देखते हुए, प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय द्वारा एक विशेष प्रकोष्‍ठ का गठन करके तथा अलग-अलग देशों के महिला संगठनों की सहायता से परित्‍यक्‍त/सताई गई महिलाओं की सहायतार्थ कदम उठाए जा रहे हैं।

     इतना सब होने के बावजूद, अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है । अनिवासी/प्रवासी भारतीयों को ओसीआई कार्ड प्राप्‍त करने में, भारत में छूट गई अपनी अचल सम्‍पत्‍तियों की सुरक्षा में, यहां चलने वाले मुकदमों में बार-बार पेश होने में, चैरिटी के कार्यों हेतु उचित चैनल उपलब्‍ध न होने के रूप में, उच्‍च स्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं स्‍थापित करने में स्‍थानीय स्‍वीकृतियां आसानी से उपलब्‍ध होने में, उचित पारिश्रमिक और आसान सेवा शर्तें न होने के कारण उत्‍कृष्‍ट शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्‍थानों में अपनी सेवाएं देने में अड़चनों/समस्‍याओं का सामना करना पड़ रहा है । परन्‍तु इतना तय है कि प्रवासी भारतीयों के साथ एक सक्रिय एवं व्‍यापक संपर्क/संबंध/सहयोग के कार्यक्रम के रूप में वर्ष 2003 से प्रारम्‍भ, प्रवासी भारतीय दिवस ने हमें एक रास्‍ता दिखाया है । हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि यह कार्यक्रम, केवल एक आर्थिक गतिविधि बनकर न रह जाए अपितु इसका सरोकार, प्रवासी भारतीयों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक एवं भावनात्‍मक चिंताओं से भी बना रहे ।  

  इसके लिए न केवल प्रवासी भारतीय समुदाय की विशालता, विविधता और उपलब्‍धियों को भी भारतीय जनता के सामने रखना होगा और उनकी समस्‍याओं, भारत से उनकी अपेक्षाओं को भी समझना होगा बल्‍कि अपने नीतिगत ढांचे में और बदलाव लाकर, प्रवासियों के प्रति अनुकूल वातावरण बनाकर, उनकी सेवाओं का लाभ उठाते हुए, उनके भारत के साथ गहरे अनुराग को सराहा जाना होगा ।           ..............

Monday, December 19, 2011

पत्रकार पर कातिलाना हमले का मामला गरमाया

हमलावरों को पकड़ने की मांग ने पकड़ा जोर 
प्रशासन को दिया 72 घंटे का अल्टीमेटम   
     गजिंदर सिंह किंग की ख़ास  रिपोर्ट  
अमृतसर// 18  दिसम्बर, 2011// 
दैनिक जागरण के पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले के विरोध में आज अमृतसर के पत्रकार सड़कों पर उतरे और पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह पर हमला करने वालों के लोगों की गिरफ्तारी की मांग की और साथ ही उन्होंने अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर को एक मांग-पत्र भी दिया
     अमृतसर में दैनिक जागरण अखबार के पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर बीती रात कुछ अज्ञात लोगों ने जान लेवा हमला कर दिया, पत्रकार महिंदर पाल सिंह जब आपने घर वापस जा रहां था, तब कोर्ट रोड पर कुछ अज्ञात लोगों ने उन के सिर पर तेज धार हथियार से वार किया, उस के बाद महिंदर पाल सिंह पर गोलियां चला दी, जिस के चलते एक गोली मोहिंदर पाल सिंह के पैर पर लगी, महिंदर पाल सिंह दैनिक जागरण अखबार में बतौर चीफ क्राइम रिपोटर के पद काम करता है, वहीँ गोली लगने के बाद मोहिंदर पाल सिंह को अमृतसर के ई, एम, सी हस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहाँ उन की हालत नाज़ुक बनी है, वहीँ इस मौके पर घटना स्थल पर पहुंचे अमृतसर पंजाब पुलिस के ए, डी, सी, पी बलजीत सिंह रंधावा का कहना है, कि यह मामला उन के सामने आया है, कि आज रात को 9 बजे के करीब जब वह आपने घर जा रहा था, तब उन पर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया है और आज सुबह से ही उन को धमकी भरे फ़ोन भी आ रहे थे, जिस की जांच की जा रही है, उन्होंने कहा, कि  पुलिस ने एक विशेष टीम बना कर छापे-मारी शुरू कर दी है और जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार किया जायेगा
     लोक तन्त्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारो ने सडको पर उतार कर पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले के की पत्रकार समुदाय ने इस की घोर निंदा की और पत्रकारों ने काले रिबन लगा कर पैदल रोष मार्च प्रोटेस्ट सर्कट हाउस से निकाल कर अमृतसर के डिप्टी कमिश्र्नर के घर तक निकाल कर पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह के गुनहगारों को गिरफ्तार करने की मांग की और पत्रकार महिंदर पाल सिंह को सरकारी सहायता देना, पत्रकारों की सुरक्षा को यकीनी बनाना और 72 घंटे के अन्दर सरकार अपराधियों को गिरफ्तार करने का मांग-पत्र दिया, इस दौरान सीनियर पत्रकारों ने पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले की निंदा करते हुए कहा, कि पुलिस प्रशासन ने अभी तक उन हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया है, जिन्होंने यह हमला करवाया और किया है उन्होंने कहा, कि प्रशासन को चाहिए वह जल्द से जल्द उन हमलावारो को गिरफ्तार करे और जिस तरह से अपराधी बे-लगाम हो रहे है, वह चिंता की विषय बना हुआ है, उन्हीने मांग की, कि किसी तरह से पत्रकारों की सुरक्षा को यकीनी बनाया जाये और जिस के चलते वह प्रशासन को 72 घंटे का समय देते है
     वहीँ इस मौके पर पत्रकारों ने अमृतसर के डिप्टी कमिश्र्नर को एक मांग-पत्र दिया,  साथ ही इस मौके पर डिप्टी कमिश्नर ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा, कि यह एक बुरी घटना है और इस के चलते एक विशेष एस,आई,टी (Speacial Investigation Team) का गठन किया गया है और इस मांग-पत्र को सरकार तक पहुंचा दिया जाएगा, ताकि उन अपराधियों को गिरफ्तार किया जा सके
    फिलहाल अब देखना यह होगा, कि आने वाले 72 घंटो में प्रशासन क्या भूमिका अदा करता है और पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह के गुनहगारों को पकड़ने में कितना कारगर साबित होता है

Monday, December 12, 2011

धोखों के बाद भी इरादे बुलंद हैं..//...राजीव गुप्ता

इंटरनेट की दुनिया को नियंत्रण करने की नाकाम कोशिश
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को ही छीनने का  कुकृत्य
Photo courtesy UN Multimedia
जब आप सच्चे दिल से किसी चीज को पाने का दृढ निश्चय कर लेते हैं तथा उसे पाने के लिए अपना कदम आगे बढ़ा देते हैं तो सबसे पहले आपकी दृढ़ता को ईश्वर द्वारा अनेकों कसौटियों पर परखा जाता हैं और अगर आप उन कसौटियों पर खरे उतर जाते है तो पूरी कायनात आपके साथ कदम से कदम मिलाकर एक ऐसे अभेद्य कारवां का निर्माण कर देती है जिसे भेदने की कोशिश कर रहे विरोधी मुंह की खा जाते हैं या यूँ कहे कि उनका हर तीखा वार मीठा बन कर उन पर ही उल्टा पड़ जाता है ! वर्तमान समय में जन लोकपाल की लड़ाई लड़ रहे श्री अन्ना हजारे-टीम ने इस बात को सिद्ध कर दिया हैं !
सरकार द्वारा बार- बार उन पर आक्रमण होता है, उनके पर कतरने की नाकाम कोशिश सरकार द्वारा होती रहती है! रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के ऊपर पुलिसिया कार्यवाही के बाद  १६ अगस्त, 2011 को किस प्रकार सरकार के वकील मंत्रियों के दमन-चक्र द्वारा आन्दोलन को कुचलने का दुस्साहस किया गया जनता अभी इसे ठीक से भूली भी नहीं थी कि दूर-संचार मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने एस.एम्.एस भेजने की सीमा तय कर और  इंटरनेट की दुनिया को नियंत्रण करने की नाकाम कोशिश कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को ही छीनने का जो कुकृत्य किया गया तथा स्थाई समिति की रिपोर्ट के माध्यम से सरकार द्वारा जनता को धोखा देकर जो वादा-खिलाफी की गयी उन सब बातों का जबाब देने के लिए  ११ दिसंबर , २०११ को जंतर-मंतर पर उमड़ा जन सैलाब सरकार की चूलें हिलाने के लिए काफी था  ! 

इस बार अन्ना - टीम ने अपनी रणनीति में थोडा बदल कर राजनैतिक पार्टियों को भी संवाद के लिए अपने मंच पर बुलाकर एक स्वस्थ लोकतंत्र की मर्यादा को बरकरार रखा जो कि स्वागत योग्य है ! कुछ मुद्दों को छोड़कर लगभग वहां पर उपस्थित सभी राजनैतिक दलों ने अन्ना-टीम की हाँ में हाँ मिलाते हुए  एक सशक्त लोकपाल लाने का आश्वासन दिया जो कि अन्ना-टीम के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ! जनता दल यूनाइटेड को छोड़कर बीजेपी समेत लगभग सभी राजनीतक दलों ने एक सुर में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कही , वही ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाने पर लगभग सहमति दिखी परन्तु सिटीजन चार्टर , सीबीआई और न्यायपालिका को लोकपाल के अंतर्गत लाने पर थोडा मतभेद भी था जो कि बाद में ख़त्म हो सकता है !  

टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल के अनुसार 'स्टैंडिंग कमिटी में 30 सदस्य हैं !  2 सदस्यों ने कभी इसमें हिस्सा नहीं लिया !  16 सदस्य इससे असहमत हैं, इसलिए इस रिपोर्ट को सिर्फ 12 सदस्यों की सहमति हासिल है !  7 कांग्रेस के हैं, इसके अलावा लालू प्रसाद यादव, अमर सिंह और मायावती की बीएसपी के सदस्य हैं ! ' उन्होंने कहा, 'इस रिपोर्ट की यही विश्वसनीयता है !' परन्तु यहाँ मुद्दा विश्वसनीयता का नहीं अपितु सरकार की नियति का है क्योंकि परेशानी तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब सरकार  अपने किये हुए वादे से मुकर जाय क्योंकि मामला यहाँ जन - भावना का है ! इतिहास साक्षी है कि जब सत्ता के मद में चूर सरकार अपनी हठधर्मिता से  जन - भावनाओं को अनसुना कर उसे बार - बार आहत करती है तो निश्चित रूप से वो अपनी कब्र खोद लेती है ! आपातकालीन के समय श्री जय प्रकाश ने रामलीला मैदान से सरकार को ललकार कहा था कि " सिंहासन खाली करो कि जनता आती है " क्योंकि उस समय सत्ता के मद में अंधी सरकार को संसद और सड़क के शोर में फर्क नहीं दिखाई पड़ रहा था ! सरकार को यही एहसास दिलाने के लिए जनता - जनार्दन ने जंतर - मंतर से एक बार फिर आगे के आन्दोलन के लिए हुंकार भरी ! 

लोकतंत्र की बुनियादी आदर्श के मुताबिक कोई भी सरकार स्वयं  सत्ता का स्रोत न होकर जनता के निर्णय को असली जामा पहनाने वाली अर्थात  कानून बनाने  वाली एक अधिकृत संस्था मात्र है इससे ज्यादा कुछ नहीं ! यह कहना सत्य है कि राज्य नागरिक समाज से ही बनता है ! इसलिए मूल तो नागरिक समाज ही है और राज्य नागरिक - समाज को चलाने  की व्यवस्था मात्र ! परन्तु सत्ता में बैठे उन लोगों को यह बात नहीं समझ आती !  मै सत्ता में बैठे लोगों से यह पूछना चाहता हूँ कि जब  हर दफ्तर लूट का अड्डा बन गया हो  , हर सरकारी काम बिना घूस  ( अभी हाल में ही मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर निगम के एक चपरासी के निवास से बरामद लगभग चार करोड़ की संपत्ति इसका ताजा उदहारण है ) के न हो सकता हो , बड़ी रिश्वत, बड़ा कमीशन, और बड़ा हिस्सा टैक्स चोरी  का अगर देश की सीमा से बाहर जाता हो  या देश के काले तहखानों में छुपा कर  रख दिया जाता हो  तो क्या देश के नागरिकों को यह अधिकार नहीं कि वो जनता के प्रतिनिधियों से यह सवाल करे या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाये तथा देश के बाहर गए काले धन को  वापस लाने एवं उसे राष्ट्र सम्पति घोषित करने की मांग करे  ? क्या यह सच नहीं है आज नगर पंचायत से लेकर संसद तक लोकतंत्र नहीं लूटतंत्र बन गया है ? 

यह बात खुद कई राजनेता भी मान चुके है योजनाओं का पूरा पैसा कभी भी जनता के पास नहीं पहुंचता और तो और संसद में नोट के बदले वोट और यहाँ तक कि पैसे लेकर बदले में  संसद में प्रश्न  तक पूछा जाता है ! भ्रष्टाचार का सरकार को और क्या प्रमाण चाहिए ? मुझे लगता है सरकार नीतियों में नहीं अपनी नीयत  पर ज्यादा  ध्यान दे !    जब - जब लोकतंत्र की नैतिक शक्ति का चीर-हरण होगा तब तब जनता अपनी आवाज उठाती रहेगी, चाहे प्रतिनिधि कोई भी हो ! मुझे किसी की कही हुई पंक्तियाँ याद आती हैं  कि -
"सुविधाओं में बिके हुए लोग, कोहनियों पर टिके हुए लोग !
     बरगद की बात करते है
गमलों में उगे हुए लोग !!"
राजीव गुप्ता (लेखक)
 9811558925 
भारत का यह दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद बहुत से दूरदर्शी राजनेताओं की उपस्थिति के बावजूद सत्ताधारी वो बने जिनका आम जनता से दूर - दूर तक कोई सरोकार नहीं था ! परिणामतः आज तक हम उनकी अदूरदर्शिता के द्वारा लिए गए भारत - विकास के निर्णय से हो रहे असंतुलित विकास को भुगत रहे हैं जिससे आज भारत दो भागों  अर्थात ग्रामीण और शहरी भारत में बंट गया है ! जिसे श्री अन्ना हजारे  ने जंतर-मंतर के अपने सांकेतिक धरने के माध्यम से सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात कर अर्थात ग्राम-संसद की बात की जिसकी वकालत गांधी जी ने बहुत पहले ही की थी जो कि स्वागत योग्य है ! इसके साथ - साथ चुनाव सुधार की तरफ उनके  आन्दोलन का अगला कदम होगा ! इन सब उठापटक के  बीच सरकार अब अपनी हठधर्मिता छोड़कर देश के भले के बारे में सोचे और जनता से किये हुए अपनों वादों को पूरा करने की हिम्मत दिखाए तो शायद देश जापान से भी कई गुना ज्यादा तरक्की कर सकता हैं और जनता भी उनके वादा-खिलाफी को भूल जायेगी !


नोट:आप को यह लेख कैसा लगा? आप इस विषय पर क्या सोचते हैं?अपने विचारों को शब्द दीजिये और उन्हें तुरंत प्रेषित कीजिये. अगर आप इन विचारों का विरोध भी कर रहे हैं तो भी उन्हें सम्मान के साथ प्रकाशित किया जायेगा लेकिन अपना नाम, पता, इमेल आईडी और फोन सम्पर्क लिखना मत भूलिए.रचना भेजने के लिए हमारा पता है: punjabscreen@gmail.com

Tuesday, December 06, 2011

सिख कौम के लिए अमूल्य सेवाएँ करने पर सम्मान

पंथ रत्तन/फख़रे-कौम से सम्मानित हुए स.प्रकाश सिंह बादल
         अमृतसर//5 दिसम्बर//गजिंदर सिंह किंग

श्री  अकाल तख्त साहिब की तरफ से आज पंजाब के मुख्य मंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल को सिख कौम के लिए अमूल्य सेवाएँ करने पर आज  पंथ रत्तन फख़रे-कौम से  सम्मानित  किया गया, जिस के तहत पांच सिख साहिबान की हजुरी में श्री अकाल तख़्त साहिब की तरफ से पंजाब के मुख्य मंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल को पंथ रतन फख़रे -ए-कौम से नवाज़ा गया.    
        सिख सियासत और धर्म में आपनी मुख्य भूमिका निभाने वाले पंजाब के मुख्य मंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल को आज अमृतसर में सच्च्खंड श्री हरि मंदिर में श्री अकाल तख्त साहिब में  पंथ रतन फख़रे -ए-कौम से  सन्मानित किया गया. इस मौके पर पांच सिख साहिबान की हजुरी में यह सम्मान सरदार प्रकाश सिंह बादल को दिया गया. पंथ रतन फख़रे-ए-कौम से सम्मान से पहले शब्द कीर्तन गायन और अरदास करने के बाद जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब ने कौम के नाम सन्देश पढ़ कर सुनाया. इस अवसर पर पंजाब के मुख्य मंत्री  सरदार प्रकाश सिंह बादल को पंथ रतन फख़रे-ए-कौम से  सम्मानित किया गया. पंथ रतन और फख़रे-ए-कौम का ऐतिहासिक सम्मान हासिल करने के बाद सरदार प्रकाश सिंह बादल ने कहा, कि यह उन के लिए सब से बड़ा दिन और ज़िन्दगी का सब से बड़ा इनाम है जो आज उन को मिला है. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि कभी मैने जिन्दगी में सोचा भी नहीं था कि यह सम्मान मुझ को मिलेगा. उन्होंने इस के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और श्री अकाल तख्त साहिब का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने यह सन्मान आज दिया है, उन्होंने कहा, कि जो आज तक सिख कौम के लिए मैने किया है और आने वाले समय में और काम करते रहेंगे और यह सम्मान प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति के द्वारा दिए गए सम्मान से भी ऊपर है 
        वहीँ इस मौके पर जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह का कहना है कि श्री अकाल तख्त साहिब पहले भी कई लोगों को सन्मान दे चूका है, जिन्हूने पंथ के लिए महत्वपूर्ण काम किए है और इस कड़ी के  चलते आज श्री अकाल तख्त साहिब में यह सम्मान सरदार परकाश सिंह बादल को दिया है.उन्होंने कहा कि उस का मुख्य मकसद यह है कि पिछले काफी समय से सरदार प्रकाश सिंह बादल ने सिख कौम के लिए कई यादगारे बनवाई है और जिस के चलते यह सम्मान दिया गया है और वह आने वाले समय में भी सिख कौम के लिए ऐसे काम करते रहेंगे साथ ही उन्होंने कहा कि जो पिछले कुछ समय से पगड़ी विवाद पैदा हुआ है उस को हल करने और प्रोफ़ेसर  दविंदर पाल सिंह भुल्लर की रिहाई के लिए वह काम करेंगे और जो कई एनी ऐतिहासिक काम होने वाले है वह उन को पूरा करेंगे.      
         फिलहाल इस सम्मान के साथ आज सिख इतिहास के साथ एक नया अध्याय जुड़ गया है, जहाँ एक मुख्य मंत्री को यह सन्मान मिला है, अब देखना यह होगा, कि आने वाले समय में सिख कौम के लिए सरदार प्रकाश सिंह बादल कौन-कौन से प्रयास करते है.

Monday, December 05, 2011

गिरते घर, मरते लोग....//...राजीव गुप्ता

किस विभाग की लापरवाही से हुआ ये अनाधिकृत निर्माण?
मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में "मकान" की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है ! हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि सिर ढकने के लिए एक छत  अर्थात उसका  " अपना आशियाना "  हो जहां उसका परिवार प्रफ्फुलित एवं पल्लवित हो और इसी की  जद्दोजेहद में मनुष्य अपने जीवन की अधिकतम आयु लगा देता है , परन्तु जब यही आशियाना चाहे कारण कोई भी हो उसके अपनों की जान पर बन आये तो स्वाभाविकतः वह टूट जायेगा ! कुछ ऐसा ही हादसा वेस्ट दिल्ली के उत्तम नगर में रहने वाले गगन पाठक के परिवार के साथ हुआ !  गौरतलब है कि शनिवार (2 दिसंबर , 2011 ) की सुबह अचानक चार मंजिला मकान के भरभराकर गिर जाने से लगभग चार लोग मौत की नींद में सो गए जिसमे से तीन लोग ( माँ , पत्नी और बेटी ) तो गगन पाठक के परिवार के ही थे,  और लगभग दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए ! ललिता पार्क ( 15   नवम्बर, 2011 , पूर्वी दिल्ली ) और चांदनी महल ( 27 सितम्बर, 2011 , दरिया गंज ) के बिल्डिंग - हादसों के बाद यह तीसरा बड़ा हादसा था ! अब फिर से वही सरकार का स्क्रिपटिड ड्रामा शुरू हो जायेगा नेताओं का दौरा होगा , मृतकों के परिजनों से हमदर्दी, मुआवजे का ऐलान, विजिलेंस जांच के आदेश, इंजिनियरों का सस्पेंशन, दोषियों को कड़ी सजा का आश्वासन और भविष्य में ऐसी घटना न होने देने का संकल्प आदि - आदि ! 

एम्.सी.डी की वेबसाइड पर जारी सूची के अनुसार  27  मई 2010  से लेकर 2 दिसंबर  2011  तक लगभग 190 ऐसी कॉलोनियां है  जो कि अनधिकृत रूप से बनायीं गयी हैं ! दिल्ली जो कि भारत की राजधानी है , अगर फिर भी अनाधिकृत कौलिनायों का निर्माण हुआ है / हो रहा है , यह इतना मत्वपूर्ण विषय नहीं है , असली मुद्दा यह है कि किस विभाग की लापरवाही से ये अनाधिकृत निर्माण हुआ है / हो रहा है ?  लोगों का तर्क है कि एमसीडी नक्शा पास नहीं करती पर हमें तो रहने के लिए मकान चाहिए , इसलिए हमें रिश्वत देने से भी कोई परहेज नहीं है ! वही एमसीडी का कहना है कि हमने कड़े नियम बनाए हैं लेकिन पुलिस इस व्यवस्था को घूस लेकर खराब कर रही है !  हम तो अवैध निर्माण गिराना चाहते हैं लेकिन पुलिस हमारा साथ ही नहीं देती ! अगर पीडब्ल्यूडी या डीडीए की कमी से कहीं अवैध निर्माण हुआ है तो झट से एमसीडी में सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता कांग्रेस -  सरकार के खिलाफ  मोर्चा खोल देते हैं परन्तु अगर इससे उल्टा होता है अर्थात ललिता पार्क या चांदनी महल में कोई मकान गिरता है तो फिर दिल्ली सरकार और केंद्र के कांग्रेसी नेता एमसीडी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं ! अर्थात लाशों पर भी राजनेता अपनी राजनीति चमकाने से गुरेज नहीं करते ! 

एक जगह मैंने पढ़ा है कि 1977 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले ईस्ट दिल्ली के वेलकम इलाके में सरकारी जमीन पर  रातों-रात सैकड़ों झुग्गियां एक साथ बसा दी गईं थी क्योंकि मामला वोट का था ! विरोध करने वाले विरोध करते रह गए वह कॉलोनी वहां हमेशा के लिए बसनी थी और बस गई !  यह तो मात्र एक उदहारण है ! दिल्ली में जाने कितने ऐसे उदहारण  मिल जायेंगे , जहां वोट की राजनीति के चलते कॉलोनियां हमेशा के लिए बसा दी जाती है ! ऐसी अवैध कॉलोनियों को बसाना और फिर पास कराना कोई नया काम नहीं है ! इस धंधे में पहले राजनेता उन्हें अपनी जीत के लिए बसाते है फिर उनसे  "नोट" लेकर अपना मुआवजा ऐठ लेते है ! ऐसी अवैध कॉलोनियों में बिजली से लेकर पानी तक  अर्थात लगभग आवश्यक सारी सुविधाएँ भी मिल ही जाती है ! नोट और वोट का  यह ऐसा मिश्रण होता है कि क्या मजाल कोई कुछ बोल दे ! एक बार कॉलोनी बस गई तो बस गई ,  फिर कोर्ट से लेकर सबके सब बेबस हो जाते हैं हालाँकि हाई कोर्ट ने कुछ साल पहले निर्देश दिया था कि ऐसी कॉलोनियों में किसी प्रकार की कोई नागरिक सुविधाएं न दी जाएं  , परन्तु मानवता की आड़ लेकर सब काम हो गया ! कॉलोनियों को सुविधाएं  दी गयी और उनके पास कराने का प्रस्ताव भी लाया गया  ! और तो और लगभग 1218 कॉलोनियों को तो प्रविजनल सर्टिफिकेट दे दिया गया है !
राजीव गुप्ता (लेखक) 
हमें यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि कुछ कमियां नियमों में ही हैं जिसके चलते अवैध निर्माण के लिए लोग मजबूर भी हैं ! मसलन दिल्ली में 1958 में जो बिल्डिंग बायलॉज बने थे, आज भी उन्हीं पर अमल किया जाता है , जबकि यहाँ की जनसँख्या अब दुगने से भी ज्यादा हो गयी है ! कुछ कमेटियां जरूर बनीं पर  उनकी रिपोर्ट कभी लागू ही नहीं हो पायीं क्योंकि 1977 में 600 से ज्यादा जिन कॉलोनियों को पास किया गया  आज तक उनके नक्शे पास नहीं होते क्योंकि बायलॉज इसकी इजाजत नहीं देते ! चांदनी चौक जैसे इलाको में जहां के भवन सैकड़ो वर्ष पहले मिट्टी के ईंट - गारों से बने थे आज उनकी हालत जर्जर हो चुकी है , ऐसे इलाकों के बारे में एक बार अब पुनः सोचना ही होगा ! राजधानी होने के नाते वर्ष भर में लाखों लोग दिल्ली बसने / रोजगार की तलाश में आतें है जिससे सभी प्रकार की व्यवस्था बनाये रखने में दिक्कत तो होगी परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली का प्रशासन और राजनेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और लोग मरते रहे ! दिल्ली - पुलिस जिसकी पूरे देश भर में  मिशाल दी जाती हो , ऐसे में धडल्ले से अनाधिकृत रूप से निर्माण होना अपने आप में ही प्रश्न चिन्ह तो  खड़ा करता ही है ! इन सभी कमियों के बावजूद चाहे वह आम जनता की हो अथवा प्रशासन की सबको नोट और वोट की राजनीति से ऊपर उठकर इस समस्यां का समाधान खोजना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि अब ऐसे बिल्डिंग हादसे दिल्ली में न हो  और गगन पाठक जैसा कोई अपना परिवार खोये !   
मोबाईल सम्पर्क: 9811558925