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Monday, October 08, 2012

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान

गाँधी जी की विचारधारा को घर घर ले जाने का संकल्प  
13 अक्टूबर को होगा लुधियाना में बापू गाँधी का श्राद्ध
संकल्प लेते राष्ट्रिय विकास मंच के सदस्य और अन्य लोग 
महात्मा गाँधी का नाम और विचारधारा उनकी शहादत के बाद लगातार और जोर पकडती जा रही है। तेज़ी से से प्रासंगिक हो रहे गाँधी जी के विचार एक बार फिर युवायों को आकर्षित कर रहे हैं। उनके समर्थकों की सख्या भी बढ़ रही है और विरोधियों की भी। चर्चा उनक समर्थक भी उनके विचारों की करते हैं और उनके विरोधी भी। हालत यह है की गाँधी जी का विरोध करने वाले भी उनकी हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे को सीधे सीधे नायक कहने की हालत में नहीं हैं। गत दिनों एक स्कूली छात्रा ने आरती आई के ज़रिये प्रधानमन्त्री कार्यालय से एक सवाल पूछा कि महात्मा गाँधी को बापू गाँधी की उपाधि या नाम किस ने और कब दिया। इस सवाल का जवाब न तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिया और न ही गृह मन्त्रालय ने। आखिर इस बच्ची की तस्वीर, उसका सवाल और सरकार का इस पर टालमटोल का जवाब सब कुछ फेसबुक पर आ गया। राष्ट्र के बापू केसाथ यह कैसा मजाक ? जिस नमक आन्दोलन बापू ने सारी दुनिया हिला दी वही नमक देश में आजादी आ जाने के बाद महंगे भाव पर बिकने लगा। जिस स्वदेशी के नारे ने अँगरेज़ साम्राज्य की नींव हिला दी थी आजादी आ जाने के बाद आज उसी स्वदेशी की नीति को पांवों तले कुचल कर विदेशी कम्पनियों को घुटने टेक कर निमंत्रित किया जा रहा है की आईये और हमें लूटिये। देश के बापू के साथ यह कैसा खिलवाड़ ? सीधे विदेशी निवेश जको एक आवश्यक मुख्य नीती के तौर पर अपना लिया गया है। आज समझ आने लगा है की गाँधी जी ने आजादी आने के बाद कांग्रेस को भंग करने की बात क्यूं कही थी? महात्मा गाँधी का नाम लेने वाले लोग ही गाँधी जी के सपनों को धुल में मिला रहे हैं। हमारा संविधान जिस विचार, नीति और भावना की बात करता है हमारे कदम उस सब के पूरी तरह विपरीत जा रहे हैं। किसी भी तरह नहीं लगता कि  यह गाँधी जे के सपनों या विचारों की आजादी है ! 
राष्ट्रीय  विकास मंच के आयोजन की एक यादगारी तस्वीर  
हालात लगातार नाज़ुक हो रहे हैं। अमन, शांति और सदभावना के पुजारी महात्मा गाँधी को बापू कहने वाले देश में हत्या, साड्फूंक, खूनखराबा, लूटमार, बेईमानी, बलात्कार, भ्रूण हत्या, शोषण, बेरोज़गारी, छूयाछात जैसे कलंक एक आम बात हो चुकी है।  इन अत्यंत गंभीर हालात में राष्ट्रीय विकास मंच ने एक संकल्प लिया है गाँधी जी के विचारों को घर घर तक लेजाने का। इसकी औपचारिक शुरूआत की गयी दो अक्टूबर गाँधी जयंती के दिन। पहले दो छोटे छोटे से कार्यक्रम हुए लुधियाना के गोलबाग में, इसके बाद रखबाग और फिर 1 बजे गाँधी धाम पर हुआ मुख्य समारोह। गुरिंदर सूद, निर्दोष भारद्वाज, हरजीत सिंह नंदा और रवि सोई के मार्गदर्शन और संचालन में संकल्प लिया गया की वे सभी मिल कर छूआछात, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और देश में बढ़ रहे विदेशी के चलन का दत कर विरोध किया जायेगा।  ਇਹਨਾਂ ਅੱਤ ਦੇ ਗੰਭੀਰ ਹਾਲਾਤਾਂ ਵਿੱਚ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਵਿਕਾਸ ਮੰਚ ਨੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫੇਰ ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ ਦੇ ਫਲਸਫੇ ਨੂੰ ਘਰ ਘਰ ਤੱਕ ਲਿਜਾਣ ਦਾ ਬੀੜਾ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। दो अक्टूबर 2012 को शुरू हुआ यह अभियान 30 जनवरी तक जरी रहेगा। इस अभियान के अंतर्गत 13 अक्टूबर 2012 को बापू गाँधी का श्राद्ध भी किया जायेगा। गौरतलब है कि बापू के श्राद्ध का आयोजन किसी भी विचार्धार्क सन्गठन की और से शायद पहली बार किया जा रहा है। उल्लेखनीय है की 13 अक्टूबर 1948 के दिन को ही बापू गाँधी की अस्थियों का विसर्जन भी हुआ था। इस श्राद्ध में भाग लेने के इच्छुक नीचे दिए गए नम्बरों पर सम्पर्क भी कर सकते हैं। 
गुरिंदर सूद:               +91 98881 23786
रवि राज सोई:             +91 98884 92198
ਨਿਰਦੋਸ਼ ਭਾਰਦਵਾਜ :    +91 99884 03850

नीचे दिए गए दो पंजाबी लिंक भी देखें:
1*ਗਾਂਧੀਵਾਦ ਅੱਜ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ–ਮੋਹਿਤ ਸੇਨ


2*13 ਅਕਤੂਬਰ ਨੂੰ ਹੋਵੇਗਾ ਬਾਪੂ ਗਾਂਧੀ ਦਾ ਸ਼ਰਾਧ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿੱਚ 

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान 

Monday, January 30, 2012

राष्ट्रीय विकास मंच ने फिर लिया बापू के मार्ग पर चलने का संकल्प

लुधियाना में अधिकतर नेता भूले राष्ट्रपिता का बलिदान दिवस
लुधियाना// 30 जनवरी// ब्यूरो रिपोर्ट: एक तरफ चुनावी शोर, एक दुसरे से आगे निकलने की होड़, वोट पक्के करने के लिए तरह तरह के हथकंडे और न जाने कितना कुछ. नियमों कानूनों और सख्तीयों के बावजूद गली गली में बही शराब की नदियों और न जाने इस तरह के कितने कुछ में बहुत से लोग, बहुत से दल भूल गए कि आज 30 जनवरी को महात्मा गाँधी जी की पुन्य तिथि भी है. कम से कम आज तो उन्हें याद कर लिया जाये. गौरतलब है कि महात्मा गाँधी जी को आज ही के दिन 1948 में गोली मार कर शहीद कर दिया गया था. हमसे उस महान व्यक्ति को छीन लिया गया था जिसने शांति की ताकत से ही ज़ुल्म और जबर की झुका दिया था.दुनिया की जानी मानी शक्ति के मालिक अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. अभी कुछ ही सप्ताह पूर्व अन्ना हजारे ने एक बार फिर साबित भी किया की अभी भी बापू की फिलासफी और अहिंसा के हथियार में दम है पर फिर भी 

लोग बापू को भूल गए. न तो कोई दल आगे आया और न ही कोई संगठन या नेता.
उस महान पिता के बलिदान दिवस को याद रखने में एक बार फिर पहल दिखाई राष्ट्रीय विकास मंच ने. उल्लेखनीय है कि मंच के राष्ट्रॉय प्रधान गुरिंदर सिंह सूद पुराने गांधीवादी नेता हैं. इस बार भी श्री सूद मंच के पदाधिकारियों, सदस्यों और अपने मित्रों को लेकर माता रानी चोंक स्थित गाँधी धाम पहुंचे और वहां मौजूद राष्ट्रपिता के बुत को बहुत ही स्नेह व सम्मान के साथ दूध से नहलाया. उस पर बहुत ही श्रद्धा से विशेष तौर पर मंगवाए गए फूल अर्पित किये और एक बार फिर संकल्प किया कि देश और समाज में शांति व बराबरी के लिए वे हर सम्भव कदम उठायेंगे लेकिन राष्ट्रपिता की ओर से दिखाए मार्ग पर अडिग रहते हुए. 
इस अवसर पर मंच के राष्ट्रीय महांमंत्री निर्दोष भारद्वाज, भी मौजूद थे और मुस्लिम समुदाय की प्रतिनिधिता करने आये मोहमद नदीम अंसारी भी. राम राज, सिमरजीत सिंह शैरी, हरजीत सिंह नंदा, कर्मजीत सिंह पप्पू, डाक्टर लाल सिंह, शिव राम सरोये, पप्पू सिंह, गुरप्रीत सिंह लवली, गुरमीत सिंह,  राजेश गाँधी, और कई अन्य सक्रिय सदस्य भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए.
 इस अवसर पर गाँधी जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उन्हें शहीद करने वाले नाथू राम गोडसे की सखत शब्दों में निंदा भी की गयी. महात्मा जी के मिशन को याद करते हुए वहां मौजूद गरीबों को चाये और बिस्कुट भी वितरित किये गए.          ### 

Monday, January 24, 2011

गांधी, गोडसे और देश

आज अचानक ही फेसबुक पर एक ऐसी इवेंट का आमंत्रण नज़र आया जिसे देखने के बाद दिल-ओ-दिमाग में बहुत कुछ कौंध गया. एक ऐसा देश जहां महात्मा गांधी की तस्वीर को बहुत सम्मान से करंसी पर भी छापा जाता है, कार्यालयों में भी लटकाया जाता है, कुछ लोग उसे लोग बापू कहते भी नहीं थकते, राष्ट्रपिता का सम्मान भी उसी महात्मा को...अजीब बात है जिसे अहिंसा का देवता कह कर पूजा जाता है उसी के देश में आज आजादी और निर्भयता से चलना मुश्किल हो गया है, कब कोई गोली मार दे, कब कोई छुरा घोंप दे, कब कोई किसी का भ अपहरण कर ले...कुछ भी नहीं कहा जा सकता...आम आदमी पूरी तरह असुरक्षित हो गया है.उस  देश की सरकारें दारू की बिक्री से आमदनी बढ़ाती हैं....और बेचारे बेबस लोग कुछ नहीं कर पाते. जगह जगह मजबूरी और जगह जगह अन्याय....सोच रहा था यह कैसी सन्तान है उस बापू की.....? बात चली थी  फेसबुक पर एक  इवेंट की जिसका ज़िक्र करने से पूर्व आप एक गज़ल पढ़िए जिसे लिखा है मेरठ के नवीन त्यागी ने.  
बर्फ के पन्नो पे लिखकर,इक इबारत आग की। 
फ़िर रहा करता शहर में, मै तिजारत आग की। 
बर्फ से गलते शहर में , ढूँढ़ते जो आशियाँ। 
बांटता मै फ़िर रहा,उनको इमारत आग की। 
ढेर पर बैठा हुआ मै ,लिख रहा तहरीर हूँ। 
ले जाए जिसको चाहिए,जितनी जरूरत आग की। 
तकदीर मे जिनके लिखा है,बस अँधेरा हर तरफ़। 
सिखला रहा करना उन्हें ही,मै इबादत आग की। 
लिखने गजल को जब उठाता,मै कलम को हाथ में। 
लगती उगलने आंच ये,लेके बगावत आग की।
अब लौटते हैं बापू पर. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर. जिन्हें  30 जनवरी 1948 की शाम को गोली मार कर शहीद कर दिया गया. गोली चलाने वाले युवक नाथू राम गौडसे ने वहां ऐ भागने का भी कोई प्रयास नहीं किया और न ही किसी और पर गोली चलाई. साफ़ ज़ाहिर है की उसने यह काम बहुत ही सोच समझ कर और संतुलन में रहते हुए किया होगा. पर ऐसा क्या था कि 80 बरस की उम्र में एक महात्मा को गोली मार दी गयी. मुझे यह सब कुछ आज याद आया इस इवेंट को देख कर जिसका आयोजन किया जा रहा है हिंदुत्व का प्रयास और अन्य सहयोगियों के सहयोग से अंकित Therealscholar और   स्वाति  Kurundwadkar की ओर से. अगर आप  इस इवेंट के बारे में जानना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करें  जिसका नाम है गोडसे शौर्य दिवस लिखा है,"आप सभी राष्ट्रवादी मित्रों से निवेदन है की नाथूराम विनायक गोडसे के शौर्य दिवस पर भारत माता के इस सच्चे सपूत को श्रद्धांजली अर्पित करने के लिए 26 जनवरी से 30 जनवरी तक फेसबुक पर अपने प्रोफाइल के चित्र के स्थान पर इस महापुरुष का चित्र लगायें तथा इस काल खंड (26 से 30 जनवरी तक ) में फेसबुक के अपने सभी मित्रों को इस महान आत्मा के सम्बन्ध में अधिक से अधिक जानकारी अपने लेखों तथा अपनी फेसबुक स्थिति (status)की सहायता से दें तथा इस कथित भारत सरकार द्वारा इस महान देशभक्त के छवि को ख़राब करने के आज तक के समस्त प्रयासों के प्रभाव को समाप्त करने का अपनी शक्ती के अनुसार पूरा प्रयास करें | आप सभी से निवेदन है की अधिक से अधिक मित्रों को राष्ट्रभक्ति के इस महायाग्य में आहुति देने के लिए प्रेरित करें |"
जो लोग गोडसे के विचारों को नहीं जानते उन के लिए यह सब बहुत ही हैरानी की बात हो सकती है. आओ  देखते हैं उन विचारों की एक झलक जिनके चलते एक महात्मा पर गोली चली. आग जैसे ख्यालों को कागज़ पर उतारने वाले नवीन त्यागी अपने ब्लॉग में उन कारणों की चर्चा भी करते हैं.नवीन त्यागी कहते हैं,   "नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही लोगो के मस्तिष्क में एक ही विचार आता है कि गाँधी का हत्यारा। हमारे इतिहास में भी गोडसे का इतिहास एक ही पंक्ति में समाप्त हो जाता है। गोडसे ने गाँधी वध क्यों किया, इसके पीछे क्या कारण रहे , इन बातों का कही भी व्याख्या नही की जाती।"
वह अपने ब्लॉग में आगे कहते हैं ," गोडसे ने गाँधी के वध करने के १५० कारण न्यायालय के समक्ष बताये थे। उन्होंने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वे अपने बयानों को पढ़कर सुनाना चाहते है । अतः उन्होंने वो १५० बयान माइक पर पढ़कर सुनाए। लेकिन कांग्रेस सरकार ने (डर से) नाथूराम गोडसे के गाँधी वध के कारणों पर बैन लगा दिया कि वे बयां भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पायें। गोडसे के उन बयानों में से कुछ बयान क्रमबद्ध रूप में, में लगभग १० भागों में आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। आप स्वं ही विचार कर सकते है कि गोडसे के बयानों पर नेहरू ने क्यो रोक लगाई ?और गाँधी वध उचित था या अनुचित।"
इन कारणों के पहले भाग को पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक करें और दूसरे भाग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. अगर आप इसी विषय पर अंग्रेजी में कुछ पढ़ना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें. आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं, क्या कहना चाहते हैं....इस पर आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा ही. अपने विचार भी प्रेषित करें और मित्रों के विचार भी भेजें व भिजवाएं. --रेक्टर कथूरिया 

Sunday, December 05, 2010

...और अब किताब घोटाला....?

 चित्र साभार:साहित्य शिल्पी   
घोटालों के इस दौर में एक नया मामला सामने आया है किताबों का. यह सब कुछ किसी आम जन साधारण के साथ ही नहीं बलिक देश पर जान न्योछावर करने वाले एक जानेमाने शहीद के परिवार से भी हुआ है और उस शहीद का नाम है सुखदेव. जंग-ऐ आज़ादी के दौरान शहीद-ऐ-आज़म भगत सिंह और राजगुरू के साथ शहादत का जाम पीने वाले इस वीर बहादुर ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि देश आज़ाद होने के बाद शहीदों के साथ यह कुछ भी होगा.
भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाने के लिए अपनी जान पर खेलने वाले इस सपूत के एक वंशज का परिवार आजकल लुधियाना के दुगरी इलाके में पड़ते प्रीत नगर में रहता है. उदासी के आलम में मायूस हुए इस परिवार के मुखिया विशाल कुमार नयीयर बताते हैं कि रिश्ते में शहीद सुखदेव थापर उनके नाना लगते हैं.  विशाल बताते हैं कि उनके माता जी शहीद सुखदेव को ताया जी (ताऊ जी) कहा करते थे. विशाल ने बताया कि एक दिन अचानक ही उनके सामने एक हिंदी अखबार आई जिसमें एक सर्वेक्षण छपा हुआ था.शहीदों पर. बच्चों से शहीदों के बारे में कुछ सवाल पूछे गए थे जो बहुत ही आसान से थे पर जवाब में किसी ने कहा भगत सिंह भारत का पहला प्रधान मन्त्री था और किसी ने कुछ और कहा. इस सर्वेक्षण के मुताबिक़ 81 प्रतिशत से भी अधिक बच्चो ने गलत जवाब दिए. इसे पढ़ कर पूरा परिवार भी उदास हो गया. सोचा एक नया अभियान चलाना होगा.क्रिकेट के खिलाड़ियों और फ़िल्मी दुनिया के सितारों की जानकारी बहुत ही बारीकी से रखने वाले इन बच्चों के दिल और दिमाग में देश के असली नायकों का चेहरा भी बसाना ही होगा.
इस मकसद को लेकर जब विचार विमर्श हुआ तो कुछ मित्रों ने सुझाव दिया कि कोई पुस्तक प्रकाशित की जाये..कोई विचार गोष्ठी  करवाई जाये या कोई डाकुमेंटरी फिल्म बनाई जाये. यह सब विचार अभी  चहल ही रहा था कि विशाल कुमार ने अपने एक मित्र के पास एक पुस्तक देखी जो पंजाबी में थी और उस पुस्तक के कवर पर शहीद सुखदेव थापर की तस्वीर भी छपी हुई थी. उस किताब को ध्यान से देखा गया तो पाता चला कि यह पुस्तक तो मई 2007 में छपी थी और वह भी पूरे दस हज़ार.  हालांकि दस हजार की संख्या भी कोई इतनी ज्यादा नहीं है जितनी इस तरह के मामलों में होनी चाहिए पर अगर दस हजार पुस्तकें भी वितरित हो जायें तो इसका पता हर क्षेत्र में लग जाता है कि हां इस विषय पर कोई पुस्तक प्रकाशित हुई है. जब इस तरह की किताब सरकार रलीज़ करती है तो उसकी बात ही कुछ और हो जाती है. उसके विज्ञापन छपते हैं, कार्यक्रम होते हैं, पचासों बार चर्चा होती है,  अखबारें और टीवी चैनल उसकी खबर घर घर तक पहुंचा देते हैं पर यहां तो बात ही कुछ और थी. न तो इस पुस्तक का अता पता किसी स्कूल कालेज में था और न ही किसी समाजिक संगठन को. मीडिया से जुड़े लोगों ने भी शहीद के परिवार से यही कहा कि उन्होंने इस तरह की कोई किताब कहीं नहीं देखी. सोच विचार के बाद विशाल ने पंजाब सरकार से सम्पर्क किया और सारी बात पूछी. इस पर सूचना और जन सम्पर्क विभाग ने इस बात को स्वीकार किया कि यह किताब प्रकाशित की गई थी और अभी भी मिल सकती है. इस पर विशाल ने पांच हज़ार पुस्तकों की मांग की. वह इस किताब को स्कूलों कालेजों और समाजिक संगठनों में वितरित करना चाहते हैं पर उन्हें कई चक्कर लगाने के बाद मिली केवल 250 किताबें. अब सवाल यह खड़ा होता है अगर यही किताबें बची हैं तो बाकी की 9750  किताबें कहां गयीं ? अगर इनका वितरण हुआ तो कहां पर ? ये किताबें समाज तक पहुंची क्यूं नहीं..? अगर ये किताबें 2007 में छपने के बावजूद अभी तक 2010 में भी गुमनामी के अँधेरे में खोयी हैं तो उन्हें प्रकाशित करने का कोई फायदा..? क्या इससे शहीदों और उनके वंशजों का अपमान नहीं हो रहा...? इस तरह के कई सवाल हैं जिनका जवाब देना बनता है. अब देखना होगा कि इस सब के लिए सरकार ज़िम्मेदार है या फिर कुछ सबंधित अधिकारी.....?    रेक्टर कथूरिया 

Sunday, August 15, 2010

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की एक यादगारी नज्म

 स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष                   पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की एक यादगारी नज्म
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
(ऐ वतन,) करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
विशेष किताब  
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ, जिन में है जूनून, कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में

سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے


ایک سے کرتا نہیں کیوں دوسرا کچھ بات چیت
دیکھتا ھوں میں جسے وہ چپ تیری محفل میں ہے
اے شہید ملک و ملت میں تیرے اوپر نثار
اب تیری ہمت کا چرچہ غیر کی محفل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


وقت آنے دے بتا دیں گے تجہے اے آسمان
ہم ابھی سے کیا بتائیں کیا ہمارے دل میں ہے
کھینج کر لائی ہے سب کو قتل ہونے کی امید
عاشقوں کا آج جمگھٹ کوچئہ قاتل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہے لئے ہتھیار دشمن تاک میں بیٹھا ادھر
اور ہم تیار ھیں سینہ لئے اپنا ادھر
خون سے کھیلیں گے ہولی گر وطن مشکل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہاتھ جن میں ہو جنون کٹتے نہیں تلوار سے
سر جو اٹھ جاتے ہیں وہ جھکتے نہیں للکا ر سے
اور بھڑکے گا جو شعلہ سا ہمارے دل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


ہم جو گھر سے نکلے ہی تھے باندہ کے سر پہ کفن
جان ہتھیلی پر لئے لو، لے چلے ہیں یہ قدم
زندگی تو اپنی مہمان موت کی محفل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے


یوں کھڑا مقتل میں قاتل کہہ رہا ہے بار بار
کیا تمناِ شہادت بھی کِسی کے دِل میں ہے
دل میں طوفانوں کی تولی اور نسوں میں انقلاب
ھوش دشمن کے اڑا دیں گے ھمیں روکو نہ آج
دور رہ پائے جو ہم سے دم کہاں منزل میں ہے


وہ جِسم بھی کیا جِسم ہے جس میں نہ ہو خونِ جنون
طوفانوں سے کیا لڑے جو کشتیِ ساحل میں ہے


سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے
The Urdu Script was used as a base from here, written by Indian(Now Pakistani) poet 
Sarfaroshi Ki Tamanna
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Dekhna hai zor kitna baazu-e-qaatil mein hai
Aye watan, Karta nahin kyun doosree kuch baat-cheet
Dekhta hun main jise woh chup teri mehfil mein hai
Aye shaheed-e-mulk-o-millat main tere oopar nisaar
Ab teri himmat ka charcha gair ki mehfil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Waqt aanay dey bata denge tujhe aye aasman
Hum abhi se kya batayen kya hamare dil mein hai
Kheench kar layee hai sab ko qatl hone ki ummeed
Aashiqon ka aaj jumghat koocha-e-qaatil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Hai liye hathiyaar dushman taak mein baitha udhar
Aur hum taiyyaar hain seena liye apna idhar
Khoon se khelenge holi gar vatan muskhil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Haath jin mein ho junoon katt te nahi talvaar se
Sar jo uth jaate hain voh jhukte nahi lalkaar se
Aur bhadkega jo shola-sa humaare dil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Hum to ghar se nikle hi the baandhkar sar pe kafan
Jaan hatheli par liye lo barh chale hain ye qadam
Zindagi to apni mehmaan maut ki mehfil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Yuun khadaa maqtal mein qaatil kah rahaa hai baar baar'Kya tamannaa-e-shahaadat bhi kisee ke dil mein hai
Dil mein tuufaanon ki toli aur nason mein inqilaab
Hosh dushman ke udaa denge humein roko na aaj
Duur reh paaye jo humse dam kahaan manzil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai
Wo jism bhi kya jism hai jismein na ho khoon-e-junoon
Toofaanon se kya lade jo kashti-e-saahil mein hai
Chup khade hain aaj saare bhai mere khaamosh hain
Na karo to kuch kaho mazhab mera mushkil mein hai
Sarfaroshi ki tamanna ab hamaare dil mein hai.
Dekhna hai zor kitna baazuay qaatil mein hai.
The poem was used in the 1965 Manoj Kumar movie Shaheed on the life of Bhagat Singh. It was again used (with altered lines) as the lyrics for a song in the 2002 Hindi film The Legend of Bhagat Singh. The poem has also been used in the 2006 film Rang de Basanti. The poem is also referenced in abridged form in the 2009 movie Gulaal by Anurag Kashyap. In the 2009 film Gulaal, the following lines were recited by Piyush Mishra:


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां
देखते कि मुल्क सारा यूँ टशन में, थ्रिल में है


आज का लड़का तो कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आज़ादी तो भैया लौंडिया के तिल में है


आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है


हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्डी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है


वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है.


शहीद राम प्रसाद बिस्मिल पर एक विशेष किताब भी प्रकाशित की गयी डायमंड पाकेट बुक्स की तरफ से. जनवरी 2007 में प्रकाशित की गयी 128 पेजों की इस पुस्तक का परिचय देते हुए लेखक भवन सिंह रना ने बहुत ही भावुक शब्दों में लिखा है
 "स्वतंत्रता संग्राम क्रांतिकारियों का संदर्भ आते ही, जो वीर हमारी स्मृति में कौंध जाते हैं, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम अग्रणी है। मध्य प्रदेश ग्वालियर के माता-पिता की संतान के रूप में बिस्मिल मैनपुरी उत्तर प्रदेश में जन्मे जो संभवत: उनकी ननिहाल था, वह पिता के कठोर अनुशासन में पले बढ़े और उन्होंने अनेकों विद्वानों और साधुजन की संगति पाई, लेकिन अंग्रेज सरकार के प्रति विद्रोह की आग जो उनके सीने में एक बार बैठी, वह दिनों दिन धधकती चली गई। इस आग ने उनके देश प्रेम से ओत-प्रोत कवि को जगाया और उत्तरोत्तर देश के अतिरिक्त शेष सब प्रसंगों से विरक्त होते चले गए। यहां तक कि उनके उद्वेग ने उनके प्राणों के प्रति मोह को भी पीछे छोड़ दिया।" 

 "यह सब जानते हैं कि उन्होंने हंसते हुए फांसी का फंदा गले में यह कहते हुए डाल लिया कि अंग्रेज साम्राज्य का विनाश उनकी अंतिम इच्छा है, लेकिन उनका पूरा जीवन वृत्तांत भी सब जानें और विस्मृत न हो, यह भी बहुत जरूरी है क्योंकि देश हर एक युग में रामप्रसाद बिस्मिल मांग सकता है।"
"विश्वास है यह पुस्तक उस आग को जिलाए रखने में भरपूर समर्थ होगी।" 
नोट :  इस विशेष पुस्तक के कवर की तस्वीर ऊपर दी गयी है.


रामप्रसाद बिस्मिल का अंतिम पत्र