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Thursday, July 09, 2015

पूँजीवाद की मुसीबतों के चक्तव्यूह में घिरी पारुल कालिया

मीडिया के सामने रो पड़ी पारुल अपनी दास्तान सुनाते सुनाते 
लुधियाना: छोटी सी उम्र लेकिन दुःख शायद उसकी तक़दीर बन चूका है।  राहत मिलने की उम्मीद में जहाँ भी जाती है वहीँ उस पर शोषण की नज़र पड़नी शुरू हो जाती है। छोटी सी उम्र में ही बड़ी बड़ी मुसीबतों को गले लगा चुकी पारुल कालिया दुगरी थाने के सामने मीडिया को रो रो कर अपनी दास्तान सुना रही थी। किसी न किसी तरह अपने एकलौते बेटे के पालन पोषण में लगी पारुल के लिए अब वही है जीने की उम्मीद। अपने बेटे को पाल कर बड़ा करना ही शायद उसका अब एकमात्र मकसद है। उसकी तरफ जो भी नज़र उठती है गलत इरादे से उठती लगती है। उसके खिलाफ खड़े लोगों में जो चेहरे हैं उनके नाम सुनकर शायद आप भी चौंक जाएं। इन नामों का ज़िक्र बाद में पहले बात करते हैं पारुल के लिए मुसीबत बने हालात की। आम तौर पर घरों में समस्या होती है गरीबी के कारण, लालच के कारण, स्वार्थ के कारण पर यहाँ मामला ही कुछ और है। यह मुद्दा पैदा हुआ है पूँजीवाद के साथ पैदा होती शर्मनाक समस्यायों के साथ। जिस समाज में पैसा ही सब कुछ बन जाये तो भगवान बना पैसा समाज को किस गिरावट तक ले जाता है शायद इसका अनुमान भी न लगाया जा सके। पारुल भी पूंजीवाद के साथ पैदा होती मुसीबतों का ही शिकार हो रही है। पारुल को अपने विदेशी रिश्तेदारों से आता पैसा ही उसके लिए समस्याएं लेकर आया। पारुल को देख कर याद आती हैं जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के एक लम्बे गीत की पंक्तियाँ
कहते हैं जिसे पैसा बच्चो यह चीज़ बड़ी मामूली है 
लेकिन इस पैसे के पीछे सब दुनिया रस्ता भूली है। 
साहिर साहिब ने यह हकीकत दश्कों पहले बयान की थी लेकिन इसने बार बार खुद को साबित किया। पैसे ने दुनिया भर को भटका कर अपने रास्तों से हटा दिया। सभी रिश्ते-नाते, संबंधी एक दुसरे के साथ प्यार या संबन्ध  से नहीं केवल पैसे के नफे नुक्सान से देखने लगे। किसी से बुखार का हाल पूछो तो जवाब मिलता है अभी तो बस चवन्नी आराम आया है।  बारह आना अभी भी तबीयत खराब है। किसी युवा से पूछो तो भाई क्या बनोगे तो जवाब मिलता है--जिसमें चार पैसे बनें। किसी लड़की से पूछ लो कि किस से शादी करोगी तो अक्सर कई लड़कियां खुल कर कहती हैं जो खूब ऐश कराये जिसके पास ढेर सारा पैसा हो। स्कूल की पढ़ाई पूरी करनी हो या कालेज की शिक्षा--पैसा अपना जलवा दिखा रहा है। शिक्षा और काम के बावजूद नौकरी चाहिए तो वहां भी नौकरी दिलवाने का पैसा खर्च करो वो भी एक नंबर में। इलाज कराना हो तो भी पैसा।  मरीज़ अस्पताल में मर जाये तो शव लेने के लिए भी पैसा। शव घर आ जाये तो श्मशान घात वाले भी पैसा मांगते हैं। पैसे की सोच से दूषित हो चुके इस शर्मनाक समाज में आखिर पारुल भी क्या करे?
तलाक के बाद जब पारुल अपने बच्चे को लेकर कुछ चिंतित हुई तो उसकी मौसी ने उसके लिए कुछ पैसे अपनी बहन के पास भेजे। मकसद था परुल के सर की छत बन सके। मौसी चाहती थी कि पारुल उन पैसों से अपना घर खरीद ले। इन पैसों से एक प्लाट भी लिया गया तो आखिर रजिस्ट्री भी होनी थी और पैसे की अदायगी भी। इसी पड़ाव पर आकर सारे मामले ने एक नया मोड़ लिया और पारुल पहुँच गयी दुगरी थाने में अपनी शिकायत लेकर।  
थाने के बाहर उसने मीडिया को बताया कि जब उसने अपने पैसे या रजिस्ट्री वापिस मांगी तो सबंधित डीलर ने उस पर हमला कर दिया। पारुल का आरोप था कि पुलिस ने उसकी सुनवाई नहीं की।  मीडिया ने जब पुलिस से सम्पर्क किया तो पुलिस ने मीडिया के सामने उसकी पूरी सुनवाई की और पूरी सुरक्षा का आश्वासन भी दिया। 
किसी निजी कम्पनी में काम करके अपना गुज़ारा चला रही पारुल परेशान है उन धमकियों से जो उसे राह आते जाते दी जातीं हैं। 
कौन हैं पारुल को धमकियां देने वाले?
कौन है उसके विरोधी? 
कौन है उसका हमदर्द?
क्या बनेगा पारुल कालिया का?
इन सभी सवालों के जवाब आपको मिल सकें हमारी अगली पोस्ट में जिसमें कुरेदा जायेगा पारुल कालिया के लिए खतरा बने लोगों का हर पहलू।
आज पारुल की कहानी देख सुन कर याद आते हैं  ओशो जिन्होंने अमेरिका में जा कर बहुत सफलता से अपना कम्यून चला कर दिखाया था। वहां कोई करंसी नहीं थी लेकिन हर किसी को हर सुविधा उपलब्ध थी। इसकी सफलता देख कर ही पूंजीवादी समाज हिल गया और ओशो की जान का दुश्मन बन बैठा।
पूंजीवादी समाज में पैसे के असंतुलित बटवारे ने ही जन्म दिया जुर्मों को और जुर्मों से भरा समाज बन गया जीने के लिए नरक से भी बदतर। आज लावारिस फिल्म का गीत भी याद आ रहा है-- जिसकी एक पंक्ति थी---यही पैसा तो अपनों से दूर करे है--- . आज पारुल जिस हालात में पहुँच चुकी है उसके लिए पूंजीवादी सिस्टम पूरी तरह ज़िम्मेदार है। आईये इस सितम को बदल कर पारुल जैसी अनगिनत लड़कियों को बचाने का यज्ञ शुरू करें। 

Monday, February 04, 2013

उल्लू का राज खुला

3.02.2013, 15:34
 दर्जनों उल्लुओं के एक्स-रे और सीटी स्कैन्स किए गए
Национальный зоопарк Манагуа Никарагуа карлик сова карлик Бруно Браулио птица птицы
                                                                                                                             फोटो: EPA
उल्लू दिन की रौशनी में देख नहीं सकता लेकिन रात के अँधेरे में उल्लू की शक्ति बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। उल्लू की वचित्र खूबियों की चर्चा अक्सर सुनने में मिलती है। तन्त्र की दुनिया में तो उल्लू को वश में करने के बहुत ही कठिन तरीके भी बताये जाते रहे हैं। लेकिन इस सब के साथ साथ विज्ञान अपना काम करता है। अब विज्ञानं ने उल्लू की गर्दन में हैरानीजनक हद तक पाए जाते  लचीलेपन के राज़ का पता लगा लिया है। रेडियो रूस ने इस सम्बन्ध में एक दिलचस्प खबर दी है।
उल्लू अपनी लचीली गर्दन के लिए मशहूर है और अब वैज्ञानिकों ने इसके कारण का भी पता लगा लिया है। उल्लू किसी भी दिशा में अपनी गर्दन को लगभग पूरा [270 डिग्री तक] घुमा सकता है और खास बात यह है कि ऐसा करने में उल्लू को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। उल्लू की शारीरिक संरचना के अध्ययन के लिए दर्जनों उल्लुओं के एक्स-रे और सीटी स्कैन्स किए गए। इसे लेकर मीडिया में जो कुछ आता रहा उसके  अनुसार उल्लुओं का गर्दन घुमाने का रहस्य अब सुलझ गया है। इस अध्ययन के लिए उल्लू की नसों में रंगीन तरल प्रवाहित कर कृत्रिम रक्त प्रवाह बढ़ाया गया। उल्लू के जबड़े की हड्डी से ठीक नीचे सिर के आधार में स्थित रक्त वाहिकाएं रंगीन तरल के पहुंचने के साथ-साथ लंबी होती गई। यह प्रक्रिया तब तक चली जब तक कि यह रंगीन तरल रक्त भंडार में जमा नहीं हो गया। उल्लू में पाया जाने वाला यह गुण बिल्कुल अनोखा है जबकि मनुष्य में ऐसा नहीं होता है। (रेडियो रूस से साभार) उल्लू का राज खुला

Tuesday, December 25, 2012

भक्ति में शक्ति के आधार पर आगे बढ़ रहा गौरव सग्गी

अभिनय और गायन में फिर लुधियाना की मौजूदगी का अहसास
पंजाबी फिल्मों की बात चले तो जो नाम और चेहरे एकदम जहन में आते है उनमें से एक चेहरा है सरदार भाग सिंह का। चंडीगढ़ के बस स्टैंड से बाहर निकलते ही सडक पार करके उनके घर में जाना किसी वक्त रोज़ की बात हुआ करती थी। वक्त की गर्दिश में फिर यह सिलसिला न चाहते हुए ही लगातार कम होता चला गया। यहाँ रोज़ी रोटी के फ़िक्र में ऐसे सिलसिले अक्सर कम हो जाते हैं। पर उनकी जो बातें अब तक जहन में हैं उनमें से एक है सोमवार। वह सोमवार को उपवास रखते थे। भगवान् शिव में उनकी गहरी आस्था थी। शिव का नटराज रूप उनके ड्राईंग रूम में भी सजा होता। कभी मूड होने पर वह भगवान् शिव और कला की विस्तृत चर्चा भी करते। 
Photo Courtesy:Sara Tariq
इसी तरह गायन और अभिनय के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाली सुलक्षना पंडित भी बहुत अध्यात्मिक थी।सर्दी हो या ओले बरस रहे हों हर रोज़ सुबह पूरे केशों सहित स्नान करना और फिर पूजा पाठ में काफी समय गुज़ारना उनकी दिनचर्या में शामिल था। उनकी आवाज़ में भी जादू सा था और अभिनय में भी। बहुत सी लोकप्रिय फिल्मों में यादगारी भूमिका निभा पाना और फिर फिल्म फेयर एवार्ड भी हासिल कर लेना कोई आसान बात नहीं थी। हालाँकि उनके सामने चुनौती भी सख्त थी और प्रतियोगिता भी। 
दर्शकों के मन में हनुमान जी की छवि बनने के बाद दारा सिंह जी भी धर्म कर्म में बहुत रुचि लेने लगे। शायद यही कारण है कि दर्शक उनमें हनुमान जी को ही देखने लगे। पहले पहले मुझे लगता था की शायद इस तरह के सात्विक किस्म के लोग तामसिक प्रवृतियों से भरी फ़िल्मी दुनिया में सफल नहीं हो सकेंगे। पर इन सबकी सफलता देख कर दुनिया के साथ साथ मैं खुद भी हैरान रह गया। पंजाबी फ़िल्मी दुनिया के महारथी भाग सिंह ने किस तरह अपनी बेटी बरखा को पत्रकारिता की बारीकियों से अवगत करा कर एक कुआलिफाईड पत्रकार बनाया। अभिनय में नई जान डालने 
पठानकोट में गौरव सग्गी के  
भक्ति रस में झूमते भक्त 
वाली अपनी धर्मपत्नी कमला भाग सिंह के साथ किस तरह कदम दर कदम मिला कर कठिन से कठिन रास्तों पर चल कर सफलता की ऊंचाइयों को छुआ यह किसी करामत से कम नहीं। मुझे उनके परिवार के साथ इतय एक एक पल बिना किसी कोशिश के अब तक याद है। भाग सिंह जी का गोरा   रंग और मेहंदी रंगी भूरी दाड़ी कुल मिलकर उनकी शख्सियत बहुत ही आकर्षक लगती रिटायर्मेंट के बाद इस तरह की  सहेज पान तभी संभव होता है जब दिल और दिमाग के ख्याल भी बहुत खूबसूरत हों। ज़िन्दगी के सभी रंगों को उन्हों ने मुस्करा कर समझा। हर मुश्किल को उन्होंने हर बार सुस्वागतम कहा। एक आम इंसान की तरह ज़िंदगी जीते जीते वह अचानक ही अपनी सहजता के कारण खास हो जाते। मुझे याद है एक बार एक फ़िल्मी मेले के आयोजन को लेकर कुछ पत्रकार दोस्तों ने काफी कुछ विरोध में लिखा पर जब वे भाग सिंह जी के सम्पर्क में आये तो उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया। वे समझ गए कि मामले को देखना अपनी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। जादू केवल जादूगर की छड़ी में नहीं शब्दों में भी होता है। बाद में यह विरोध दोस्ती में बदल गया। वे पत्रकार दोस्त दिल्ली से उन्हें मिलने विशेष तौर पर चंडीगढ़ आते।
लुधियाना का गौरव सग्गी 
इसी तरह दारा सिंह जी ने भी धमकियों और चुनौतियों को बहुत ही सहजता से सवीकार करके ज़िन्दगी जीने के नए अदाज़ सिखाये। चंडीगढ़ में दारा स्टूडियो की स्थापना का काम आसान नहीं था। मुझे पता चला कि उन्हें उतनी जगह नहीं मिली जितनी वह चाहते थे। किसी सनसनीखेज़ खबर की चाह में मैंने दारा जी से इसी मुद्दे पर सवाल कर दिया। दारा जी मुझे देखकर मुस्कराए और बहुत ही सहजता से बोले अगर सरकार यह जगह भी न देती तो हम क्या कर लेते? दारा जी जैसे महान लोगों ने जिंदगी को जो सलीके और सबक सिखाये उनकी अहमियत वक्त के साथ साथ लगातार बढती रहेगी। उनके पास बैठ कर, उनसे बातें करके एक नई ऊर्जा का अहसास होता था।
आज अचानक यह सब कुछ मुझे याद आ रहा है एक नए युवा चेहरे को देख कर। लुधियाना का गौरव सग्गी भी फ़िल्मी दुनिया को समर्पित है लेकिन पूरी तरह सात्विक रहते हुए। तकरीबन तकरीबन हर रोज़ उपवास, हर रोज़ पूजा पाठ, हर रात्रि मेडिटेशन। सोने में चाहे आधी रात हो जाये लेकिनउठना वही रात को दो बजे और ठंडे पानी से नहा कर रम जाना पूजा पाठ में। मेडिटेशन, रियाज़ या फिर शूटिंग, रिकार्डिंग या कोई और परफोर्मेंस बस यही है गौरव की दिनचर्या। मैंने कभी गौरव को आम लडकों की तरह इधर उधर आलतू फालतू बातों में नहीं देखा। लुधियाना से मुम्बई और मुम्बई से विदेश तक यही है उसका लाइफ स्टाइल।
कहते हैं धरती गोल भी है बहुत छोटी भी। बस इसी सिद्धांत पर एक बार हमारी मुलाकात पठानकोट में हुई। सुबह मूंह अँधेरे से लेकर देर शाम तक हम एक साथ रहे। यह सब किसी प्रोजेक्ट को लेकर था और इसके बारे में वहां शायद किसी को खबर भी नहीं थी लेकिन हमें वहां बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के जाना पड़ा एक ही आयोजन में। हम सब ने जलपान किया लेकिन गौरव का उपवास था। खाना तो दूर जल या चाये की एक बूँद भी नहीं। अचानक ही मेरे सामने किसी आयोजक ने मंच पर गौरव का नाम अनाऊंस करवा दिया और उसके बाद कमरे में आ कर कहा कि अब आप मंच पर आ जाइये अगली बारी आपकी है। सुन कर मुझे चिंता हुई। मुझे मालूम था कि गौरव ने सुबह से कुछ नहीं खाया। 
चाये या पानी का एक घूँट भी नहीं। मुझे लगा कि शायद यह लड़का कहीं मंच पर गिर न पड़े। इसके साथ ही न वहां गौरव की टीम थी न ह साज़ और संगीत का पर्याप्त प्रबंध। पर गौरव के चेहरे पर न चिंता, न डर, न ही घबराहट। आशंकित मन के साथ कुछ ही पलों के बाद मैं भी पीछे पीछे बाहर बने मंच पर चला गया।वहां मेरे देखते ही देखते गौरव ने भगवान् का नाम लेकर अपना गायन शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में वहां मौजूद सभी लोग पहले तो मस्त हुए फिर उठ कर गौरव के साथ साथ झूमने लगे।मुझे वह दिन अब भी याद आता है तो मुझे फिर फिर हैरानी होने लगती है। सुबह से लेकर रात तक मैंने गौरव पर से आँख नहीं हटाई तां कि वह छुप कर कहीं कुछ खा तो नहीं रहा पर सचमुच उसने सारा दिन कुछ नहीं खाया-पीया। मुझे लगता है कि इस के बावजूद इतनी अच्छी परफारमेंस किसी दैवी शक्ति से ही संभव हो सकी। गौरतलब है की मेडिटेशन करने वालों की कार्यक्षमता अक्सर बढ़ जाती है। मन की शक्ति एकाग्र हो जाने से उनकी योग्यता विकसित होती है।यही कारण है गौरव एक्टिंग में भी काम कर रहा है और गीत संगीत में भी। इसके साथ ही कैमरे की बारीकियों  को भी वह बहुत ही अच्छी तरह से समझता है। अपनी लोकप्रिय एल्बम "रब दा सहारा" में उसने गायन और अभिनय दोनों में अपना जादू दिखाया है। आखिर में एक बात और इस सबके लिए वह अपने पिता अश्विनी सग्गी और माता के आशीर्वाद को ही एक वरदान मानता है।-रेक्टर कथूरिया 


You may contact Gaurav at gauravsaggi@ymail.com
Mobile:(Punjab)  09914301145
Mobile: (Mumbai) 0996 734 049
भक्ति में शक्ति के आधार पर आगे बढ़ रहा गौरव सग्गी 

Saturday, March 03, 2012

भारत निर्माण जन सूचना अभियान

विलुपुरम में आँखों के चैकअप का एक निशुल्क कैम्प
आँखों में जरा सी खराबी आ जाये तो वस् सारी दुनिया अँधेरी सी लगने लगती है लेकिन आँखों का इलाज हर किसी के बस में कहाँ? भारत निर्माण जन सूचना अभियान के अंतर्गत इस बात का भी ख़ास ध्यान रखा गया. इस अभियान के अंतर्गत तीन मार्च 2012 को तमिलनाडू के विलुपुरम  जिले के ओलाकुर इलाके में आँखों के चैक अप का एक निशुल्क कैम्प लगाया गया. (पीआईबी फोटो) 03-March-2012

Friday, March 02, 2012

मामला अरूणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी के सूखने का

"राज्‍य सरकार द्वारा व्‍यक्‍त की गई आशंकाएं असत्‍य और तथ्‍यों से परे
नदी में जल की मात्रा और उसके प्रवाह में बदलाव एक प्राकृतिक क्रियाकलाप 
तस्वीर हमारी आवाज़ से साभार
अरूणाचल प्रदेश के मुख्‍यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार श्री ताको डाबी के वक्‍तव्‍य को उद्धृत करते हुए एक मार्च, 2012 को टाइम्‍स ऑफ इंडिया, दिल्‍ली राजधानी संस्‍करण में ‘ब्रह्मपुत्र ड्राइज अप इन अरूणाचल प्रदेश’ – चाइना मे हैव डाइवर्टेड वाटर, फियर्स स्‍टेट गवर्नमेंट, नामक शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ था। इसमें बताया गया था कि राज्‍य के पूर्वी सियांग जिले के पासी घाट शहर के लोगों ने यह पाया है कि बुधवार को इस नदी के जल स्‍तर में इतनी गिरावट हुई है कि यह अधिकांशत: सूख गया है और यह आशंका भी व्‍यक्‍त की गई है कि हो सकता है कि चीन ने इस नदी के जल का बहाव बदल दिया हो। इस नदी को तिब्‍बत में यार्लोंग सांगपो के नाम से जाना जाता है। ऐसी भी आशंका व्‍यक्‍त की गई है कि किसी प्रकार की बनावटी बाधा के कारण ऐसा हुआ हो। जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा अरूणाचल प्रदेश के राज्‍य सरकार के अधिकारियों के साथ टेलिफोन पर भी बातचीत के दौरान इस बात का पता चला कि यह वक्‍तव्‍य पासीघाट शहर के आसपास नदियों के प्रवाहों के बारे में आम जनता की आशंकाओं पर आधारित हो सकता है।

चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह में संभावित बदलाव के संबंध में राज्‍य सरकार द्वारा व्‍यक्‍त की गई आशंकाएं असत्‍य और तथ्‍यों से परे हैं। नदी में जल की मात्रा और उसके प्रवाह में बदलाव होना एक प्राकृतिक क्रियाकलाप है, जो जल-मौसम विज्ञान से संबंधित और जलवायु से संबंधित विभिन्‍न घटकों पर आधरित है। केंद्रीय जल आयोग देश की सभी प्रमुख नदियों, वर्षा, प्रवाह और तापमान आदि से संबंधित जल विज्ञान संबंधित आंकड़ें को संग्रहित करके उसका विश्लेषण करता है, जिसमें सयांग नदी भी शामिल है।  

भारत सरकार चीन में होने वाली उन सभी प्रकार की गतिविधियों पर निरंतर नजर रख रही है, जो भारत के हितों से जुड़ी हुई है और उनके संरक्षण के लिए आवश्‍यक उपाय भी कर रही है। (पीआईबी) 
02-मार्च-2012 18:43 IST

Thursday, February 23, 2012

वर्चुअल लैब परियोजना शुरू

91 वर्चुअल लेबोरेटरीज:नौ विषयों के सैकड़ो प्रयोग
केन्‍द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने आज वर्चुअल लैब की शुरूआत की। इसमें 91 वर्चुअल लेबोरेटरीज हैं, जिसमें विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के नौ विषयों के सैकड़ो प्रयोग मौजूद हैं। मंत्रालय के सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के जरिये शिक्षा के राष्‍ट्रीय मिशन के अंतर्गत वर्चुअल लैब की मदद से भारत भर में उच्‍च गुणवत्‍ता वाली शिक्षा प्रदान की जा सकती है।
    वर्चुअल लैब का मुख्‍य उद्देश्‍य ग्रेजुएट और अंडर ग्रेजुएट कॉलेज तथा विश्वविद्यालय के छात्रों को उनकी जरूरत के मुताबिक वर्ल्‍ड वाइड वेब, स्‍टैंडर्ड कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट संपर्क का इस्‍तेमाल करते हुए वर्चुअल लैब से प्रयोग करने की क्षमता प्रदान करना है। वर्चुअल लैब देश में कीमती उपकरणों को अन्‍य छात्रों के साथ बांटने की भी इजाजत देता है। यह ग्रामीण इलाकों में छात्रों के लिए बेहत उपयोगी साबित होगी।
    भारत में करीब 300 विभागीय प्रमुखों, प्राध्‍यापकों और 152 संस्‍थानों के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया है। 20 से ज्‍याद नोडल केन्‍द्र बनाये गए हैं। वर्चुअल लैब का प्रथम चरण अप्रैल, 2009 में शुरू हुआ था। इस चरण के दौरान करीब 20 लैब तैयार किये गए। इसका मुख्‍य चरण अप्रैल, 2010 में शुरू हुआ। अब तक 80 से ज्‍यादा वर्चुअल लैब तैयार किये जा चुके हैं और देश के विभिन्‍न भागों में इनका ट्रायल चल रहा है।
    परियोजना के अंतर्गत दो तरह के वर्चुअल लैब तैयार किये गए हैं। सिम्‍युलेशन आधारित वर्चुअल लैब में प्रयोग गणितीय इक्‍वेशन का इस्‍तेमाल करते हुए किये जाते हैं। सिम्‍युलेशन हाई एण्‍ड सर्वर पर किये जाते हैं और इसके नतीजे इंटरनेट पर छात्रों को बता दिये जाते हैं।
    रिमोर्ट ट्रिगर्ड वर्चुअल लैब का इस्‍तेमाल करते हुए प्रयोग दूर से किये जाते हैं। इसके नतीजे छात्रों को इंटरनेट पर बता दिये जाते हैं। 
सभी वर्जुअल लैब तक एक साझा वेबसाइट www.vlab.co.in के जरिये पहुंचा जा सकता है।
     यह वर्चुअल लैब उन इंजीनि‍यरिंग कॉलेज छात्रों के बहुत उपयोगी होगी जिनकी पहुंच अच्छी लैब सुविधाओं तक नहीं है। इससे 10वीं कक्षा के जिज्ञासु छात्रों को विभिन्न संस्थानों में उच्चतर शिक्षा, अनुसंधानों के लिए प्रेरित किया जा सकेगा और वह इन विषयों से संबंधित शिक्षण संसाधनों से लाभ उठा सकेंगे।
     वर्तमान में 769 प्रयोगों को सम्मिलित करते हुए 85 वर्चुअल लैबों को विकसित किया जा चुका है। इन वर्चुअल लैबों के ज्ञान को प्रसारित करने के लिए संपूर्ण भारत में प्रशिक्षण और कार्यशालों का आयोजन किया गया है। विभिन्न विषयों और इस ज्ञान के व्यापक प्रसार के लिए वर्चुअल लैबों के विकास के लिए आगामी प्रयास भी जारी रहेंगे।
     वर्चुअल लैबों के विकास के लिए एक समानांतर मंच का भी सृजन किया गया है जो वर्चुअल लैबों की देख-रेख में संकायों की सहायता करेगा। यह मंच बहुत से सहयोगी संस्थानों द्वारा विकसित 825 प्रयोगों की मेजबानी कर चुका है। समानांतर मंच छात्रों की प्रगति की निगरानी के लिए शिक्षकों और संस्थागत सामग्री बदलाव हेतु मदद भी प्रदान करेगा।
     वर्चुअल लैबों में छात्रों की रूचि उत्साहवर्धक रही है। वर्चुअल लैब की साइड पर पिछले छह महीनों में ही 233,570 साइट विजिट और 1,034,443 पेज विजिट किये गये हैं। इसकी साइट पर भारत, अमरीका, मलेशिया, फिलीपींस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया,कनाडा, जर्मनी, और पाकिस्तान से विजिटर्स प्रतिमाह करीब 100 जीबी का उपयोग करते हैं और 134 देशों के 4500 से ज्यादा यूजर्स ने साइट पर अपना रजिस्ट्रेशन कराया है।{पत्र सूचना कार्यालय}(23-फरवरी-2012 20:46 IST)


वर्चुअल लैबों की सूची के लिए यहां क्लिक करें। 

एक थी मधुबाला

जिसके नाम पर न कोई एवार्ड न कोई सम्मान
अजीब इतिफाक है कि मधुबाला का जन्म हुआ 14 फरवरी, 1933 को दिल्ली में उस दिन; अब जिसे लोग वैलेंटायींनज़ डे कह के प्रेम सताह की शुरूयात करते हैं प्रेम का रास्ता अत्यंत सांकरा और दुर्गम होता है मधुबाला पर फिल्माया वह गीत तो बहुत लोग जोश्से सुनते हैं जब प्यार किया तो दर्नाक्य पर जब प्रेम कि बात सामने आती है तो बहुत से लोग दुबक जाते हैं  शायद वे भूल जाते हैं कि  इसी फिल्म में एक गीत और भी था कवाली के रूप में......तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे. गीत के बाद जब जीत हार का फैसला सुनाया जाता है तो उसे पता चलता है कि उसके हिस्से में तो कांटें आये हैं पर वह घबराती नहीं और कहती है...काँटों को मुरझाने का डर नहीं होता  मधुबाला ने इसे सारी उम्र निभाया भी. इसके बावजूद जमाने ने कुछ कम नहीं की छोटी सी उम्र में ही यादगारी फिल्में देकर जाने वाली मधुबाला को इस दुनिया ने एक भी सम्मान नहीं दिया

उसका निधन हो मगाया उसकी फिल्में बाद में भी चलती रहीं पर सम्मान एक भी तो नहीं. मधुबाला 23 फरवरी, 1969 को यह दुनिया छोड़ गयी  अपने अभिनय में एक आदर्श भारतीय नारी की खूबियों को जीवंत करने वाली मधुबाला का अंदाज़ बस देखते ही बनता था चेहरे द्वारा भावाभियक्ति तथा नज़ाक़त उनकी प्रमुख विशेषता रही उनके अभिनय प्रतिभा,व्यक्तित्व और खूबसूरती को देख कर यही कहा जाता है कि वह भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे महान अभिनेत्री है। वास्तव मे हिन्दी फ़िल्मों के समीक्षक अगर मधुबाला के अभिनय काल को 'स्वर्ण युग' की संज्ञा से सम्मानित करते हैं तो यह एक हकीकत है और 
उन लोगों के मूंह पर एक तमांचा भी जो कहते हैं कि मधुबाला को अभिनय के कारण नहीं खून्सूरती के कारण फिल्में मिलती थीं। मधुबाला, हृदय रोग से पीड़ित थीं इसका पता तो बहुत पहले बचपन में ही चल गया था लेकिन 1950  मे नियमित होने वाले स्वास्थ्य परीक्षण मे इस मामले कि गंभीरता और नाज़ुक स्थिति का भी चल गया था। सब कुछ मालूम होने के बावजूद मधुबाला मुस्कराती रहती. यह उसकी हिम्मत थी कि वह मौत कि आगोश में भी ज़िन्दगी कि बातें कर सकती थी. पर मुस्कराहट के परदे में सब कुछ कब छुपता है. एक दिन जब हालात बदतर हो गये तो ये छुप ना सका। कभी-कभी फ़िल्मो के सेट पर ही उनका तबीयत बुरी तरह खराब हो जाती थी। खून कि उलटी आने पर भी पूरी तरह सहज हो के जी लेना वास्तव में कितना असहज रहा होगा ? स्वस्थ्य बिगड़ चूका था. चिकित्सा के लिये जब वह लंदन गयी तो डाक्टरों ने उनकी सर्जरी करने से मना कर दिया क्योंकि उन्हे डर था कि वो सर्जरी के दौरान मर जायेंगीं। जिन्दगी के अन्तिम 9 साल उन्हे बिस्तर पर ही बिताने पड़े। 23 फ़रवरी 1969 को बीमारी की वजह से हुए ज़बरदस्त हार्ट अटैक के कारण उनका स्वर्गवास हो गया। 
उसके नाम पर बहुत बड़ी बड़ी सफल फिल्मों के नाम हैं, लोग हैं, बैनर हैं पर अवार्ड नहीं है. सम्मान के इस मामले पर उसके चाहने वाले ही एक दिन आगे आकर फिल्म जगत कि इस गलती को सुधरेंगे. (कार्तिक सिंह//फीचर डेस्क)  

Monday, February 13, 2012

त्रिपुरा कृषि योजना सफल हुई

कृषि करमन पुरस्‍कार के रूप में मिली त्रिपुरा के योगदान को मान्‍यता
विशेष लेख                                                                          शुभाषीष के चंदा*
सभी तस्वीरें त्रिपुरा के कृषि विभाग से साभार 
कुमुद बिहारी त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र में परांपरागत ढंग से झूम खेती करने वाले एक किसान हैं। वह इस साल बहुत खुश हैं क्‍योंकि फसलों की पैदावार दुगुनी हुई है। ऐसा ही एक और रिकार्ड मोहम्‍मद अब्‍दुल गफ्फार ने बनाया है जिन्‍होंने धान की खेती का एसआरआई तरीका अपनाया और अपने खेतों में पहले की 2.3 टन प्रति हेक्‍टेयर की जगह 3.3 टन उपज प्राप्‍त की। यह प्रेरणादायक उदाहरण है जबकि इस समय देश में खेती का परिदृश्‍य इसके उलट है। यह उदाहरण त्रिपुरा कृषि विभाग द्वारा शुरू की गई उस व्‍यापक योजना का नतीजा है जिसके लिए कृषि करमन पुरस्‍कार प्रदान किया गया है। यह खेती की समग्र ऊंची पैदावार के लिए दिया गया है। पुरस्‍कार प्रदान करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने देश में अनाज उत्‍पादन बढ़ाने में राज्‍य के योगदान को मान्‍यता दी।

     सुनने में भले ही यह चमत्‍कार जान पड़े लेकिन ऐसा क्‍यों हो पाया इसका जवाब राज्‍य की दस वर्ष की अवधि वाली उस कृषि योजना में छिपा है जिसे केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित दो कार्यक्रमों से मजबूती मिली है। इन परियोजनाओं के नाम हैं राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी।

राज्‍य में कृषि परिदृश्‍य

     त्रिपुरा में भू-भाग 6 पहाडि़यों का मिला जुला रूप है। इस राज्‍य में मैदानी जमीन कम है और पहाड़ी इलाका ज्‍यादा। एक अनुमान के अनुसार राज्‍य में जो विभिन्‍न प्रकार की जमीनें उपलब्‍ध हैं, उनमें से 4000 वर्ग किलोमीटर पर्वतीय क्षेत्र हैं। 2300 वर्ग किलोमीटर की जमीन टीला यानि पहाडि़यों से बनी है, जबकि घाटी का इलाका 2249 वर्ग किलोमीटर और मैदानी इलाका 2042 वर्ग किलोमीटर है। यहां के अधिकांश किसान गुजारा करने वाले हैं और उनमें से लगभग 96 प्रतिशत किसानों की जोतें 0.5 से 1.25 हेक्‍टेयर रकबे वाली हैं। इन किसानों के बीच फसलों और पैदावार पर निवेश बहुत कम किया जाता है। राज्‍य का बुआई वाला इलाका कुल भू-भाग अर्थात 10,49,169 हेक्‍टेयर का 24 प्रतिशत है जबकि राष्‍ट्रीय आंकडे 43 प्रतिशत हैं।

     राज्‍य में इस समय मुख्‍य रूप से दो प्रकार की फसल व्‍यवस्‍थाएं प्रचलित हैं। पहली है स्थिर खेती जो मैदानी भागों में की जाती है और दूसरा तरीका है चलायमान खेती जो पहाड़ी इलाकों में प्रचलित है। अधिकांश किसान इन्‍हीं दो में से एक तरीका अपनाते है। जहां तक आधुनिक टैक्‍नोलॉजी इस्‍तेमाल करने का सवाल है वे पुराना तरीका पसंद करते हैं जिसके परिणामस्‍वरूप फसलों की उपज बहुत कम होती है। जहां तक खेती के पुराने तरीके का संबंध है, किसानों को उपलब्‍ध जमीन कम होती जा रही है। इसके साथ ही, भारत बंगलादेश सीमा पर कंटीले तार लगाए जाने के कारण भी खेती वाली जमीन का रकबा 27 हजार एकड कम हो गया है। पहाड़ी जमीन कटने से मिट्टी का धीरे-धीरे क्षय होता है जो मैदानी इलाके में काफी ज्‍यादा है। यह सचमुच ही खतरे का कारण बन रहा है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार हर साल बहुत ऊंची जमीन से लगभग तीस लाख टन ऊपरी मिट्टी कटकर बह जाती है।

पुराने तरीके का सशक्तीकरण 
     उक्‍त बातों को देखते हुए शुरू-शुरू में यहां की चुनौतियां मुश्किल जान पड़ती है। राज्‍य कृषि विभाग को अनाज उत्‍पादन के मामले में आत्‍मनिर्भर बनने की सोचना बड़ी चुनौती हो सकती है। राज्‍य कृषि विभाग ने एक बड़ा कृषि कार्यक्रम शुरू किया है जिसके अनुसार दस वर्षों में 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। 1999-2000 की स्थिति के अनुसार सिर्फ 51 हजार हेक्‍टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं मौजूद थीं। इसी तरह से फसल सघनता वर्तमान 169 प्रतिशत से बढ़ाकर 283 प्रतिशत करने के लिए कई तरह की कोशिशें शुरू की गई हैं। चलायमान खेती के सुधरे तरीके शुरू किए गए हैं ताकि धान की उत्‍पादकता वर्तमान 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर (1999-2000) से बढ़ाया जा सके। इसके अलावा अधिक उपज देने वाली किस्‍मों के धान की खेती शुरू करने से पैदावार कम से कम 3500 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर करने की कोशिशें शुरू की गई हैं। इसके लिए समन्वित कीट प्रबंधन, पौधों को पोषक तत्‍व देने वाले तत्‍वों की खपत बढ़ाना और अजैविक खाद के साथ बॉयो फर्टिलाइजर का इस्‍तेमाल शुरू करने को उच्‍च प्राथमिकता दी जा रही है।

भावी योजना और नया दृष्टिकोण

     हर तरह की मुश्किलों के बावजूद खेती ही आर्थिक रूप से यहां के लोगों के गुजारे के लिए एकमात्र विकल्‍प जान पड़ती है। यह राज्‍य दो प्रकार के भू-भागों से बना है। पहला है- घाटी का इलाका और दूसरा- पहाड़ी क्षेत्र जहां संचार सुविधाएं और उद्योग धंधे लगभग मौजूद नहीं हैं।

     राज्‍य कृषि विभाग ने मुश्किलों का सामना करने के लिए यहां विस्‍तार सेवाएं बढ़ाने, टैक्‍नोलॉजी मुहिम शुरू करने और किसानों को प्रशिक्षण स्‍कूलों तक पहुंचाने, धान की ज्‍यादा उपज देने वाली किस्‍मों की खेती शुरू करने, बॉयो-उर्वरकों का इस्‍तेमाल, जैविक खाद और कृषि आधारित उपकरणों का प्रयोग शुरू करने और किसान क्रेडिट कार्ड स्‍कीम के जरिये लोगों को ऋण सुविधाएं दिलाने की शुरूआत की है। ऐसे समय जब इस राज्‍य के लोगों की 27 हजार एकड़ जमीन सीमा पर कटीले तार लगाने के चलते परती पड़ी रही, राज्‍य सरकार ने वर्ष 2011 में दो लाख टन अधिक अनाज की उपज देखी जिसका कारण कृषि विभाग की चल रही कोशिशें बताया गया। वर्ष 2000 में दस वर्षों के लिए एक योजना तैयार की गई जिसके चलते अनाज उत्‍पादन में बहुत कामयाबी मिली और वर्ष 2010-11 में अनाज उत्‍पादन बढ़कर 7.12 लाख टन हो गया। 1999-2000 में सिर्फ 5.13 लाख टन अनाज की पैदावार हुई थी। लेकिन राज्‍य में वर्ष 2010-11 तक अनाज की लक्षित जरूरत 8.22 लाख टन आकलित की गई है जिसकी तुलना में कमी 1.10 लाख टन रहेगी। इस बीच सिंचाई सुविधाएं भी बढ़ाई गई हैं और अब 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं जुटा दी गई हैं। फसल सघनता जहां 1999-2000 में 172 प्रतिशत थी वहीं दस वर्षों में यह बढ़कर 184 प्रतिशत हो गई है। रोचक बात यह है कि पहाड़ी किसानों को जहां झूम वाली जमीन से सिर्फ 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की उपज मिली वहीं अब यह हर सीजन दुगुनी फसलें ले सकते हैं। इसके लिए उन्‍हें बॉयो-फर्टिलाइजर और जैविक खाद इस्‍तेमाल करनी पड़ती है।

आरकेवीवाई, एटीएमए एवं भागीदारी संप्रेषण 

राज्‍य ने 2007-08 में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना शुरू की गई थी। इसके चलते इस क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ गया है। राज्‍य सरकार इस योजना को अनाज उत्‍पादन के क्षेत्र में आत्‍मनिर्भर बनने के उद्देश्‍य से एक वरदान मानती है। राज्‍य ने इस प्रोग्राम के पहले चरण के अंतर्गत 41 परियोजनाएं शुरू की है जिनका बुनियादी तौर पर उद्देश्‍य है अनाज का उत्‍पादन और उत्‍पादकता बढ़ाना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत कई प्रमुख योजनाएं शुरू की गई हैं जिनमें एसआरआई तकनीक के जरिये धान की पैदावार बढ़ाना, मिट्टी की शत-प्रतिशत जांच, उन्‍नत किस्‍म के धान की खेती, संकर मक्के की खेती, रेह वाली मिट्टी को ठीकठाक करना, छोटी सिंचाई सुविधाएं, मशीनी खेती, प्रमाणित सब्जियों के बीज उपजाना, ट्रू आलू बीजों को प्रोत्‍साहन देना और आलू की खेती को बढ़ावा देना शामिल है। अभी तक इन सभी परियोजनाओं में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना पर सबसे ज्‍यादा यानि 177 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

किसानों को अधिक उपज देने वाली किस्‍मों को अपनाने के लिए प्रेरित करने, रोगों के कारण फसलों में नुकसान बचाने, मिटृटी की उत्‍पादकता बढ़ाने और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के जरिए किसानों को परंपरागत और खेती की नई जानकारी देने को सभी जिलों में महत्‍व दिया गया है। इसके लिए विस्‍तार सेवा का एक व्‍यापक तरीका निकाला गया है और एटीएमए ने विशेषज्ञों की तरफ से खेती के लिए एक प्रभावी, दुतरफा संप्रेषण मॉडल विकसित किया है। इसके जरिए पशुपालन, मछलीपालन और वानिकी के बारे में जानकारी दी जाती है। दूसरी ओर किसानों के लिए प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम तथा खेतों में ग्रुप बैठकों जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी मॉडल के अनुरूप कृषि विभाग ने चालू वित्‍त वर्ष के दौरान एक और कार्यक्रम शुरू किया है जिसे टैक्‍नोलॉजी एक्‍सटेंशन केंपेन कहते हैं। इसमें एक ही छत के नीचे पौधे की रक्षा, जैविक और जैव उर्वरकों का इस्‍तेमाल, मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला और कार्यशाला रखे गए हैं। यह कार्यक्रम पिछले साल नवम्‍बर-दिसम्‍बर से पहले शुरू किया गया जिसके अंतर्गत किसानों को राज्‍य से बाहर ले जाकर ऐसी खेती दिखाई गई। इस प्रकार की हर यात्रा को केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने प्रायोजित किया। 
ऐसी ही एक यात्रा के दौरान एक प्रतिभागी श्री हरेन्‍द्र नाथ खुश नजर आए। उनका कहना था कि इस यात्रा से उन्‍हें बहुत फायदा हुआ है। उन्‍होंने उन कीड़ों को पहचान लिया है जिनसे खेती को फायदा होता है। यात्रा के दौरान उन्‍होंने नये औजार और गहाई मशीने भी देखीं। एक अन्‍य किसान श्री आनंद देबबर्मन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम जारी रहने चाहिए। राज्‍य कृषि विभाग के अधिकारियों ने कहा कि किसानों के लिए ऐसी यात्रा का कार्यक्रम अगले वर्षों भी जारी रखा जायेगा ताकि वह आधुनिक टैक्‍नोलॉजी और जानकारी प्राप्‍त कर सकें। इससे खेती की उत्‍पादकता और किसानों की आमदनी बढ़ेगी, उनकी सोच बदलेगी और वे खेती को व्‍यापार समझकर संभालेंगे। {
पीआईबी}  10-फरवरी-2012 17:17 IST

लेखक-पीआईबी अगरतला में मीडिया एंड कम्‍युनिकेशन ऑफिसर हैं

Sunday, February 12, 2012

बाजार, तकनीकी और नैतिक पतन // राजीव गुप्ता

"वेलेंटाइन-डे" के नजदीक आते-आते "कंडोम और व्याग्रा" की विक्री क्यूं बढ़ जाती है?
जयप्रकाश नारायण  ने अपनी एक पुस्तक "समाजवाद से सर्वोदय की ओर" में लिखा है कि "विज्ञानं ने अखिल विश्व को सिकोड़कर एक पड़ोस बना दिया है !" इस बात की सत्यता एवं प्रामाणिकता वर्तमान परिदृश्य की भौतिकता के आधुनिक दौर में हुए तकनीकी विकास को देखकर लगाया जा सकता है ! मसलन देश - विदेश में. घट रही घटनाओ को टी.वी. रिमोट की एक बटन दबाकर देखा जा सकता है तो वही सैकड़ो मील की दूरी मात्र कुछ घंटो में तय की जा सकती है ! पहले संवाद का जरिया "पत्र" होते थे परन्तु  जल्दी ही इसका स्थान "सचल दूरभाष" अर्थात "मोबाईल फोन" ने ले लिया ! मोबाईल कम्पनियाँ लोगों को लुभाने के लिए तरह - तरह के " न्यू माडल" बाजार में उतार दिए है ! मसलन थ्री जी, फोर जी के माध्यम से न केवल सिर्फ "बातें" की जा सकती है अपितु अब तो एक-दूसरे से "फेस - टू - फेस" देखकर बात की जा सकती है ! आजकल के इन दूरभाषों को यदि "छोटा संगणक" अर्थात "मिनी कंप्यूटर" की  संज्ञा दी जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ! जिसकी मदद से  गेम खेलने के साथ-साथ गाने सुनने से लेकर घंटो की फ़िल्में तक देखा जा सकता है !  इसका प्रत्यक्ष उदहारण है - राजस्थान सरकार के पूर्व मंत्री की करतूतें एवं कर्नाटक की विधानसभा ! 
चित्र साभार: जयपुर.को 
ज्ञातव्य है जोधपुर की भंवरीदेवी के लापता होने और हफ्तों तक सरकार की खामोशी से नाराज राजस्थान हाईकोर्ट की  फटकार से राजस्थान सरकार की सुस्ती दूर हुई तथा जाट नेता महिपाल मदेरणा को बर्खास्त कर दिया गया और तीन महीने बाद गिरफ्तार कर लिया गया ! 1992 के अजमेर के अश्लील फोटो ब्लैकमेल कांड में युवक कांग्रेस के तत्कालीन जिला अध्यक्ष फारूख चिश्ती को सजा सुनाते समय कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि “ये घिनौनेपन और नैतिक पतन की पराकाष्ठा है ! आपराधिकता का ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले !”  कर्नाटक की विधानसभा में "ब्लू फिल्म" देखने के चलते कृष्णा पालेमर, लक्ष्मण सावदी और सीसी पाटिल  को इस्तीफ़ा देना पड़ा ! एन .डी. तिवारी के "पैत्रिक-जाँच" को लेकर कोर्ट का आदेश किसी से छुपा हुआ नहीं है !
बाजार  और सेक्स  के समन्वय से जो अर्थशास्त्र बनता है उसने सारे नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़  दिया है  !  फिल्म, इंटरनेट, मोबाइल, टीवी चैनल  मुद्रित माध्यमों  अर्थात "एडवरटाइजमेंट"  पर ही निर्भर  है ! प्रिंट मीडिया जो पहले अपने दैहिक विमर्शों के लिए ‘प्लेबाय’ या ‘डेबोनियर’ तक सीमित था, अब दैनिक अखबारों से लेकर हर पत्र-पत्रिका में अपनी जगह बना चुका है ! यह कहना गलत ना होगा कि आज मनुष्य बाजारू संस्कृति का खिलौना मात्र बनकर रह गया है ! जो कि  शरीर कम ढंकने, उघाड़ने या ओढ़ने पर जोर देता है ! और तो और  आजकल "कलंक" की भी मार्केटिंग होती है  क्योंकि यह समय कह रहा है कि दाग अच्छे हैं ! सदियों से चला आ रहा "देह बाजार" भी नए तरीके से अपने रास्ते बना रहा है ! अब यह देह की बाधाएं हटा रहा है, जो सदैव से गोपन रहा उसको अब ओपन कर रहा है ! 
आज मानव बाजारवाद का इतना ग़ुलाम हो गया है कि उसकी रोज-मर्रा की सारी आवश्यकताएं "बाजार निश्चित" करता है ! मसलन उसे क्या पहनना है , कैसी गाडी चाहिए आदि - आदि ! त्योहारों का ऐसा बाजारीकरण किया जाता है कि मनुष्य उसके चक्रव्यह में फंसकर खरीदारी कर ही लेता है ! यहाँ तक कि मानवीय - भावनाओं का भी मूल्यांकन बाजार ही करता है यह कहना कदापि अनुचित न होगा ! इसी बाजारीकरण के चलते मानव ने अपना नैतिक आधार खो दिया है ! परिणामतः समाज में "सहनशीलता" की कमी हो गयी है ! मसलन "प्रेमिका के मना कर देने पर उसके प्रेमी ने उसे बदनाम करने के लिए उसकी आपत्तिजनक तस्वीर अथवा तकनीकी का उपयोग कर शारीरिक सम्बन्ध का एम्.एम्.एस. बनाकर उसे इन्टरनेट पर डाल दिया "  ऐसे समाचारों से समाचार पत्र आये दिन भरे होते है ! एक अखबार ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए यहाँ तक लिखा कि "वेलेंटाइन - डे" के नजदीक आते - आते "कंडोम और वायग्रा" की विक्री बढ़ जाती है ! जो कि "सामाजिक विकृति" की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है ! आज इन्टरनेट पर आसानी से उपलब्ध "बेड-रूम के अन्तरंग पलों" की सामग्री किसी से भी छुपी हुई नहीं है जिसे लेकर अभी हाल में ही कोर्ट ने भी कड़ा एतराज जताते हुए ऐसी आपत्तिजनक सामग्री को हटाने का नोटिस दिया था !
राजीव गुप्ता (लेखक)
केवल अपने लिए भोग करने वाला मानव तो पशु के समान शीघ्र ही  जीवन समाप्ति की ओर पहुंच जाता है ! भोग और कामोपभोग से तृप्ति  उसे कभी नहीं मिलती है !  संयम सदैव ही सभी समाजों में शक्ति का पर्याय माना जाता रहा है ! कहावत भी है - ‘सब्र का फल मीठा होता है !’ इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य की दशा एक कस्तूरी मृग जैसी हो गयी है, जो  भागता है सुगंध के लिए परन्तु  अतृप्त हो कर थक जाता है  ! सुगंध स्वयं उसके भीतर है ! उसका आत्म उसके आनंद का केन्द्र है ! देह तो एक चारदीवारी है,  एक भवन है, जिसमें उसका अस्तित्व आत्मा के रूप में मौजूद है  ! भवन को अस्तित्व मान लेना भ्रांति है ,  और भवन  पर पेंट कर,  रंग-रोगन कर उसे चमका लेना भी क्षणिक आनंद भर मात्र  है ! उससे दुनिया जहान को भरमा लेना भी कुछ देर का खेल तमाशा है ! भवन  को गिरना है आज नहीं तो कल , यही  शाश्वत सत्य है ! इसलिए बाजार , तकनीकी और नैतिक मूल्यों का सामंजस्य ही वर्तमान समय की दरकार है यह हम सबको मिलकर सोचना होगा !                                                             

Wednesday, February 08, 2012

भारत की वन स्थिति रिपोर्ट-2011 जारी

उपग्रह चित्रों के आधार पर तैयार किए गए आंकलन
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में सचिव श्री टी. चटर्जी 07 फरवरी 2012 को नई दिल्ली में भारत की वन स्थिति रिपोर्ट-2011 जारी करते हुए जिसे भारतीय वन सर्वेक्षण देहरादून की ओर से प्रकाशित किया गया है (पी.आई.बी. फोटो}
भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा वर्ष 1987 से देश में वन क्षेत्र के बारे में हर दूसरे वर्ष आंकलन रिपोर्ट श्रृंखला का प्रकाशन किया जाता है। भारत की वन स्थिति रिपोर्ट को देश के वन संसाधन का आधिकारिक आंकलन माना जाता है।

  इस श्रृंखला में बारहवीं रिपोर्ट है। यह अक्तूबर 2008-मार्च 2009 के दौरान दर्ज किए गए उपग्रह के आंकड़ों पर आधारित है। 23.5 मीटर के रिजॉल्यूशन और एक हेक्टेयर के न्यूनतम मापक क्षेत्र के साथ देश में निर्मित आईआरएस-पी6-एलआईएसएस III सेंसर के जरिए आंकड़े एकत्र किए गए हैं। उपग्रह चित्रों के आधार पर तैयार किए गए आंकलनों को एफएसआई कर्मचारियों द्वारा कार्यान्वित श्रमसाध्य जमीनी सच्चाईयों का समर्थन प्राप्त है। मौजूदा रिपोर्ट में दर्ज बदलाव, दो वर्ष पूर्व भारत की वन स्थिति रिपोर्ट के तहत दर्ज उपग्रह आंकड़ों के संदर्भ में है। पहाडी जिलों, जनजातीय जिलों और पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में वन और समुदायों के विशेष रिश्तों को ध्यान में रखते हुए इन क्षेत्रों में वन दायरे पर विशेष ध्यान दिया गया है।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में सचिव श्री टी. चटर्जी ने आज राष्ट्रीय राजधानी में भारत की वन स्थिति रिपोर्ट-2011 जारी की। मौजूदा आंकलनों के अनुसार देश में वन और वृक्ष क्षेत्र 78.29 मिलियन हेक्टेयर है, जो देश के भैगोलिक क्षेत्र का 23.81 प्रतिशत है। 2009 के आंकलनों की तुलना में, व्याख्यात्मक बदलावों को ध्यान में रखने के पश्चात देश के वन क्षेत्र में 367 वर्ग कि.मी. की कमी हुई है। 15 राज्यों ने सकल 500 वर्ग कि.मी. वन क्षेत्र की वृद्धि दर्ज की है जिसमें 100 वर्ग कि.मी. वन क्षेत्र वृद्धि के साथ पंजाब शीर्ष पर है। 12 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों (खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्य) ने 867 वर्ग कि.मी तक की कमी दर्ज की है। आंध्रप्रदेश में 281 वर्ग कि.मी. के वन क्षेत्र की कमी यूकेलिप्टस और अन्य मसालों के परिपक्व रोपण वाली खेती के कारण हुई। पूर्वोत्तर के वन क्षेत्र में कमी खास तौर यहां पर खेती के बदलावों के कारण हुई है। 77,700 वर्ग कि.मी. के साथ मध्यप्रदेश में वन क्षेत्र सर्वाधिक है इसके पश्चात 67,410 वर्ग कि.मी. के साथ अरुणाचल प्रदेश का स्थान है। कुल भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार वन क्षेत्र प्रतिशत के संदर्भ में 90.68 प्रतिशत के साथ मिजोरम शीर्ष पर है इसके पश्चात 84.56 प्रतिशत के साथ लक्षद्वीप का स्थान है। वन से बाहर भारत के वन और पेडों की कुल वृद्धिरत मात्रा का आंकलन 6047.15 मिलियन क्यूबिक मीटर किया गया है यानि रिकॉर्ड किए गए वन क्षेत्र के भीतर 4498.73 और इसके बाहर 1548.42 मिलियन क्यूबिक मीटर का क्षेत्र है।

भारत की वन स्थिति रिपोर्ट-2011 में वन क्षेत्र, वृक्ष-क्षेत्र, मैनग्रोव तथा वनों के भीतर और बाहर वृद्धिरत स्टॉक जैसी नियमित विशिष्टताएं हैं। हालांकि इसमें तीन नवीन अध्यायों को जोड़ा गया है जो वनों के बारे में मौजूदा राष्ट्रीय और वैश्विक दृष्टिकोण के संदर्भ में विशेष तौर पर महत्वपूर्ण है। इसमें बांस संसाधनों का विस्तृत आंकलन, एनएटीसीओएम परियोजना के तहत भारत के जंगलों के आंकड़ों के स्टॉक पर आधारित लकड़ी के उत्पादन-उपभोग का आंकलन शामिल है। ग्रामीण/जनजातीय अर्थव्यवस्था और उनकी आजीविका पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इस वजह से आशा है कि उत्पादन और उपभोग अध्य्यन इस क्षेत्र में सूचना के अभाव को पूरा कर देगा। यह अध्य्यन औद्योगिक लकडी, इमारती लकडी और ईंधन की लकडी के संदर्भ में वन के बाहर वृक्षों के महत्व को रेखांकित करता है। इन तीनों अध्यायों को शामिल करना भारत की वन स्थिति रिपोर्ट-2011 को पिछले संस्करणों की तुलना में और अधिक उन्नत बनाता है। {
पी.आई.बी.}07 फरवरी 2012....20:52    ***

Saturday, February 04, 2012

एमसीए-21 प्रणाली - समग्र ई- प्रशासन परियोजना

तस्वीर:एसटीक्यूसी से साभार  
कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने हाल ही में ई- प्रशासन पहल के अधीन कई कदम उठाए हैं। इसका एक मात्र उद्देश्‍य हित धारकों की डाटाबेस तक पहुंच को सुविधा जनक बनाना है, जो उनके लिए अपना कारोबार और बढ़ाने के लिए अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण होगा। यह डाटाबेस खास कर हित धारकों द्वारा कारपोरेट जगत को स्‍वीकृत और जारी अग्रिम राशि के प्रति शुल्‍क के सृजन से संबंधित है। 
एमसीए और एमसीए-21 पोर्टल का पुनर्निर्माण
·  पुनर्निर्मित पोर्टल एमसीए-21 पहली बार खोलने वाले उपयोगकर्ता के लिए अधिक हितैषी और व्‍याख्‍यात्‍मक है।
·  पोर्टल एमसीए-21 का अत्‍यधिक प्रयोग में आने वाली कार्यात्मकताओं से सम्‍बन्धित अनुभागों को परिभाषित किया है और उपयोगकर्ता की सहायता के लिए विस्‍तृत उपाय-वार प्रक्रिया परिभाषित की गई है।
·  एमसीए-21 पोर्टल की कार्यात्‍मकताओं से सुपरिचित उपयोगकर्ताओं को सभी अनुभागों के अंदर त्‍वरित संपर्क प्रदान किया गया है।
·  निवेशकों के हितों की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए 'निवेशक सेवा' नामक एक विशेष व्‍यवस्‍था भी की गई है।
·  इस व्‍यवस्‍था में निवेश शिक्षा संरक्षण कोष (आईईपीएफ) जैसी सभी सम्‍बद्ध वेबसाइटों के साथ संपर्क है, जो निवेशकों के हितों की सुरक्षा में सहायता करता है।
समूचे भारत के लिए इलेक्‍ट्रोनिक स्‍टैम्पिंग का अधिदेश

·  एमसीए-21 प्रणाली के जरिये ई-स्‍टैम्पिंग की व्‍यवस्‍था सभी राज्‍यों और संघ शासित प्रदेशों के लिए अधिदेश कर दी गई है।
प्रकिया द्वारा सीधे (एसटीपी) मोड के अधीन विशिष्‍ट ई-फॉर्मों को संसाधित करना।
यह कंपनी रजिस्‍ट्रार के उपयोगिता द्वारा संसाधित नहीं किया जाएगा

·  शेयरों के आबंटन की वापसी से संबंधित फॉर्म-2 और फॉर्म-3
·  किसी मौजूदा कंपनी द्वारा पंजीकृत कार्यालय में परिवर्तन के लिए फॉर्म-18
·  किसी मौजूदा कंपनी द्वारा निदेशक आदि में परिवर्तन संबंधी ब्‍योरे के लिए फॉर्म-32
·  शुल्‍क (देरी के लिए क्षमा को छोड़कर अन्‍य मामले) के संबंध में फॉर्म-8 और 17
·  किसी नयी कंपनी द्वारा नाम उपलब्‍ध कराने के लिए फॉर्म-1ए (इसमें नाम उपलब्‍ध कराने से सम्‍बन्धित दिशा-निर्देश भी शामिल हैं)
विशिष्‍ट कंपनियों को निष्क्रिय कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक  लगाना
·  जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और बेलेंसशीट लगातार तीन वर्ष तक जमा नहीं कराई उन कंपनियों को एक अलग वर्ग-डोरमेंट (निष्क्रिय) कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों को अपना ई-फाइलिंग जमा करने से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे फाइलिंग में दोष को दूर नहीं कर लेतीं।
विशिष्‍ट कंपनियों को दोषी कंपनियां अंकित करना और उनके ई-फाइलिंग पर रोक लगाना
·  जिन कंपनियों ने अपनी वार्षिक रिटर्न और/या बेलेंस‍शीट एक वर्ष या अधिक अवधि के लिए जमा नहीं की उन्‍हें दोषी कंपनियां अंकित किया गया है। इस प्रकार की कंपनियों और उनके निदेशकों को ई-फाइलिंग से रोक दिया जाता है, जब तक कि वे रिटर्न फाइल करने में दोष को दूर नहीं कर लेते।
शिकायत पर नजर रखने की विस्‍तृत व्‍यवस्‍था का कार्यान्‍वयन
·  एमसीए-21 हित धारकों के लिए एमसीए-21 प्रणाली में शिकायत पर नजर रखने की एक विस्‍तृत प्रणाली लागू की गई है। उपयोगकर्ता उसी के जरिये शिकायतें, मामले, प्रश्‍न, सुझाव दे सकते हैं और उन्‍हें उसके लिए एक विशिष्‍ट संदर्भ टिकट दिया जाता है। वे संदर्भ टिकट का प्रयोग करके शिकायत की पूर्ति की स्थिति जान सकते हैं।
प्रणाली के अधीन प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर
·  पहले की व्‍यवस्‍था के अनुसार कंपनी रजिस्‍ट्रार के अधिकारी विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर हस्‍ताक्षर करके उसे कंपनी को डाक द्वारा भेजते थे। अब एमसीए-21 प्रणाली के अधीन विभिन्‍न प्रमाण पत्रों पर डिजिटल हस्‍ताक्षर की प्रक्रिया शुरू की गई है। इसमें अब हाथ से कोई काम नहीं किया जाता और फिर डिजिटल तरीके से हस्‍ताक्षरित प्रमाण पत्रों को ई-मेल के जरिये कंपनी को भेजा जाता है और पुष्टि के लिए एमसीए-21 एफओ पोर्टल को भी उपलब्‍ध कराया जाता है।
डायरेक्‍टर आइडेंटिफिकेशन नम्‍बर (डीआईएन) के आबंटन की प्रक्रिया को कागज-मुक्‍त और ऑन-लाइन बनाया गया, और डीआईएन-डीपीआईएन को जोड़ा गया
·  एमसीए द्वारा डीआईएन के आबंटन की प्रक्रिया को पूरी तरह कागज-मुक्‍त बना दिया गया है। यह स्‍थूल रूप में सबूत दाखिल करने की आवश्‍यकता को समाप्‍त करने के लिए किया गया है और इसके स्‍थान पर इसे स्‍वयं डीआईएन आवेदन को स्‍कैन किया जा सकता है। इसके अलावा सभी भारतीय निदेशकों के लिए आयकर पैन उपलब्‍ध करना अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही कार्यरत व्यवसायी के प्रमाण पत्र पर आधारित व्‍यवस्‍था द्वारा डीआईएन आवेदन-पत्र को संसाधित किया जाता है।
·  कंपनी अधिनियम के अधीन डीआईएन के आबंटन और एलएलपी अधिनियम के तहत डीपीआईएन के आबंटन के लिए एमसीए के पास अलग- अलग व्‍यवस्‍थाएं हैं। अब एमसीए ने दोनों व्‍यवस्‍थाओं को जोड़ कर डीआईएन के रूप में एक-समान पहचान बना दी है।
अन्य सरकारी विभागों के साथ समन्वय - आयकर और ट्रेडमार्क
संयुक्त सेवाओं के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में विभिन्न विभागों के साथ समन्वय किया गया-

·   निदेशकों आदि के विवरणों का सत्यापन करने के लिए आयकर प्रणाली के साथ उनके अपने-अपने आयकर पैन ब्यौरे को जोड़ना।
·   आंतरिक (कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालय) और बाहरी हितधारकों (कंपनी, व्यावसायी) के टीएमआर डाटा बेस पर ढूंढने की सुविधा प्रदान करने के लिए ट्रेडमार्क प्रणाली के साथ जोड़ना।
कारपोरेट खाते खोलने के लिए बैंकों के साथ समन्वय
·  विभिन्न बैंकों के साथ समन्वय की प्रक्रिया में एमसीए ने कारपोरेटों के लिए एमसीए-21 प्रणाली के जरिये बैंक खाता खोलने के लिए एक सुविधा शुरू की है। कंपनी को एमसी प्रणाली पर इलैक्ट्रोनिक फार्म और कुछ ब्यौरे भरने होते हैं, कंपनी के बारे में दस्तावेज संबद्ध बैंक को एमसीए -21 प्रणाली के जरिये भेजें जाते हैं।
अदायगियां करने के लिए एनईएफटी विकल्प की शुरूआत
·  पहले एमसीए-21 अदायगियां क्रेडिट कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और स्थूल चालान के जरिये करने की अनुमति थी। इंटरनेट बैंकिंग केवल पांच बैंकों तक सीमित है। अदायगी प्रक्रिया में होने वाली देरी से उत्पन्न असुविधा को समाप्त करने के लिए एमसीए ने एमसीए फीस की अदायगी एनईएफटी अर्थात राष्ट्रीय इलैक्ट्रोनिक कोष हस्तांतरण मोड के जरिये शुरू किया है। इस विकल्प के जरिये हितधारक एससीए-21 फीस की अदायगी किसी भी बैंक के जरिये, जो एनईएफटी की अनुमति देता हो, कर सकते हैं।
स्थूल चालान मोड के जरिये अदायगी पर रोक
·  स्कूल विकल्प (बैंक की खिड़की पर चालान के जरिये अदायगी) के जरिये एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं के लिए अदायगी की सुविधा पर, पचास हजार रुपये के समकक्ष अथवा उससे अधिक राशि के मामले में रोक लगा दी गई है।
विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करने के लिए एक्सबीआरएल लागू-
·  विशिष्ठ वर्ग की कंपनियों द्वारा एक्सटेंसीबल बिजनेस रिपोर्टिंग लैंग्वेज (एक्सबीआरएल) द्वारा वित्तीय विवरण दाखिल करना एमसीए-21प्रणाली में कार्यान्वित किया गया है। इस प्रणाली में वित्तीय विवरणों को एमसीए एक्सबीआरएल टेक्सोनोमी के साथ जोड़ना होता है। एमसीए-21 प्रणाली ने हितधारकों को एक्सबीआरएल दस्तावेज दाखिल करने से पहले सत्यापित करने के लिए एक सुविधा प्रदान की है। इसके अतिरिक्त एक्सबीआरएल दस्तावेजों को पढ़ने वाली मशीन एमसीए -21 प्रणाली के जरिये दस्तावेजों को मनुष्य द्वारा पढ़े जाने योग्य बना देती है।
त्वरित कार्यात्मकता का चिन्ह
·  पहले एमसीए प्रयोगकर्ता द्वारा किसी कार्य वस्तु को संसाधित करने में उस कार्य वस्तु को तात्कालिक चिन्हित करने की सुविधा थी और वह इसे एफआईएफओ प्रक्रिया द्वारा करता था। तथापि अधिक पारदर्शिता लाने के लिए यह कार्यात्मकता रोक दी गयी है। अब कार्य वस्तु उनके द्वारा भरे जाने के क्रम से संसाधित की जाएगी।

वापसी प्रक्रिया की शुरूआत
·  किसी हितधारक द्वारा एमसीए-21 की विभिन्न सेवाओं का लाभ उठाने के लिए गलती से दी गई फीस की वापसी के लिए एमसीए-21 में पहले कोई व्यवस्था नहीं की। मंत्रालय ने अब विशिष्ट सेवाओं के लिए अदा की गई वैधानिक फीस को वापस करने का निर्णय लिया है। हितधारक द्वारा रिफंड के लिए नया ई-फार्म भरना होगा  और उनकी संसाधित होने पर रिफंड का अनुरोध स्वीकार या अस्वीकार किया जाएगा।
·  एमसीए -21 की फीस का रिफंड जिन मामलों में उपलब्ध है वे हैं : (क) बहुअदायगियां का फार्म एक और पांच (ख) गलत अदागियां और (ग) ज्यादा अदायगी।
·  रिफंड प्रक्रिया विशिष्ट सेवाओं/ई फार्म जैसे दस्तावेजों का सार्वजनिक निरीक्षण, सत्यापित प्रतियों का अनुरोध हस्तांतरण दस्तावेजों के लिए अदायगी, स्टाम्प ड्यूटी फीस (डी श्रंखला एसआरएन), आईईपीएफ अदायगी, एसटीपी फार्म, डीआईएन ई फार्म आदि पर लागू नहीं होती। (पी.आई.बी)
((02-फरवरी-2012)