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Tuesday, February 17, 2015

अरविन्द बाबू दिल्ली का सिंहासन कोई फूलों की सेज नहीं


Tue, Feb 17, 2015 at 8:23 AM
इंदिरा सरकार को नसबंदी ले डूबी और मोरार जी को नशाबंदी     -मनीराम शर्मा एक शराब निर्माता ने 6 करोड़ रूपये खर्च करके मोराजी सरकार गिरा दी थी 
केजरीवाल जी आपने  जनता को काफी कुछ मुफ्त में देने और भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वादा  किया है | लोकपाल कानून तो आपके दायरे में ही नहीं है और  इस कानून से भी जनता का कितना  भला हो सकता है मैं नहीं जानता किन्तु यह अवश्य जानता हूँ कि राजस्थान में लोकायुक्त कानून 40 से अधिक वर्षों से बना हुआ है और वहां कितना भ्रष्टाचार है  आप जानते ही होंगे | कानून तो जनता को भ्रमित करने के लिए बुना जाने वाला वह मकडजाल है जिसमें जनता को मछली की तरह फंसाया जा सके | दिल्ली सरकार तो एक स्थानीय निकाय से अधिक कुछ भी नहीं  है  जिसके पास बिजली, पानी , सफाई, परिवहन आदि मुद्दे ही हैं  और वे भी केंद्र सरकार के रहमोकरम   पर निर्भर  है | उसके पास न न्यायालय है न पुलिस .. फिर भ्रष्टाचारियों को कौन पकड़ेगा  ..कौन दंड देगा ..   फिर ...आपके पास तो वही सरकारी मशीनरी –उपकरण हैं जो आज तक थे | पूर्व में  जो मुख्य सचिव आपको मिले थे वे  शीला दीक्षित सरकार में स्कूलों में  कंप्यूटर घोटाले में मुख्य भूमिका निभाने वालों में से एक थे | क्या आप  कोई अधिकारी विदेशों से आयात करेंगे ? स्मरण रहे जंग खाए हुए और  भोंथरे औजारों से युद्ध नहीं जीता जा सकता | जनता के लिए सबसे बड़ा सरदर्द दिल्ली पुलिस ही है जिसमें 100  तो बलात्कार के आरोपी कार्यरत हैं | पुलिस और प्रशासनिक पद तो सरकारों में लगभग नीलाम होते हैं जो ऊँची बोली लगाने वाले को मिलते हैं | आपके पास अपना स्वतंत्र कौनसा तंत्र है ? आपके सदस्यों में भी एक तिहाई दागी हैं | जिस समुदाय विशेष का आपको समर्थन मिला है, आंकड़े बताते हैं कि वे भी  आम भारतीय से 24% अधिक अपराधी हैं | आपकी पार्टी पर यह भी आरोप है कि उत्तराखंड के बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए इकठा किया गया चन्दा भी आपने उनको नहीं दिया है |  शीला दीक्षित के घोटालों की फाइलें आपके पास काफी लम्बे अरसे से हैं किन्तु आपने उन पर कोई कार्यवाही नहीं की –शायद  अब राजनीतिक लाभ मिल सके | आपने पहले गडकरी पर आरोप लगाए औए बाद में उनसे माफ़ी मांगी |

जनता पर आपको कर लगाने के बहुत ही सीमित अधिकार हैं | पिछलीबार  जब हाई कोर्ट की  फीस बढाई गयी थी उसे भी दिल्ली सरकार के दायरे से बाहर मानकर उसे निरस्त कर दिया था | अब नए वर्ष से जीएसटी  लागू हो रहा है –केंद्र का सिकंजा कसेगा , राज्यों की मुश्किलें और बढ़ जायेंगी | इस वर्ष व्यापार और उद्योग लगभग ठप हैं, कर संग्रहण  मात्र  आधा ही हो  पाया है | ऐसी स्थिति में राज्य  कर और केंद्र से मिलने वाली राशि में कटौती ही होगी फिर आपके इन वादों का क्या होगा | जनता आपके  इन लुभावने भाषणों को कितने दिनों तक सुनेगी ? जनता को भाषण नहीं राशन चाहिए अब तक तो आपको भी पता लग गया होगा | जहां तक  केंद्र से सहयोग मिलने का प्रश्न है सो शीला दीक्षित भी केंद्र  को कोसती रहती थी जबकि केंद्र में उनकी ही पार्टी का शासन था | केंद्र में अब तो आपका कोई विशेष हस्तक्षेप भी नहीं है |

आम नागरिक इस देश में स्वभावतः बेईमान नहीं है और उनको बेईमान बनाने का श्रेय भी राजनेताओं को ही जाता है | एक भूखे द्वारा अपने पेट की  भूख मिटाने और ऐश के लिए चोरी करने में अंतर होता है | मेरा अनुभव है कि वर्षा व फसल अच्छी   होने पर खेत  में रास्ते पर  पड़े फलों को भी यहाँ कोई नहीं उठाता है | वैसे भी 20000 रुपये महीना या अधिक कमाने वाले इस देश में मात्र 3% लोग ही हैं और उनमें से भी 70% तो संगठित क्षेत्र के कर्मचारी हैं | देश की 70% जनसंख्या सब्सिडी से मिलने वाले अन्न से अपना पेट भरती है | इस क्षुद्र राजनीति के परिवेश में में आप क्या कुछ  कर पाएंगे?  न्यायाधीश जगमोहन लाला सिन्हा जब इंदिराजी के विरुद्ध निर्णय देने वाले थे तो उनकी जान को भी ख़तरा था और मजबूरन  निर्णय उनको स्वयं ही टाइप करना पडा था | इंदिरा सरकार को नसबंदी ले डूबी और मोरारजी को नशाबंदी |   एक शराब निर्माता ने 6 करोड़ रूपये खर्च करके मोराजी सरकार गिरा दी थी और चरणसिंह जी प्रधान मंत्री बने थे  किन्तु वे तो जांच आयोग  और कमिटी की फाइलों में ही उलझकर रह गए , कभी संसद के दर्शन भी नहीं कर पाए और वे सारी जांचें भी धरी रह गयी थी |

Sunday, January 26, 2014

मानवाधिकारों की चर्चा कर रहे हैं मनीराम शर्मा अपने विशेष आलेख में

Sun, Jan 26, 2014 at 8:35 AM
उचित विश्राम व समय पर भोजनादि भी मानवाधिकार हैं
आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08/09/2010 से 10/09/2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व  लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था|  दिनांक  08/09/2010 को  श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा , श्री कनकजी  और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके  घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जोकि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता है| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने  महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े  और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह  जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया|  उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियों भी दी|  
उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया जो आगे आयकर महानिदेशक (अनुसंधान ) को भेज दिया गया | अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18/04/2011 को सुना गया| 
आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने  शिकायत में वर्णित आरोपों  दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया|  शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से  भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार , विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   
सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया  जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की  जा सकती  लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी  चाहिए|
आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08/09/2010 को प्रात: 9:30 बजे  शुरू और दिनांक 10/09/2010 को  रात्रि 9.20 बजे  पर संपन्न हुई  है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा  धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी  श्री सौरभ कुमार  ने दर्ज किया है कि उससे  खाताबहियाँ  आदि पेश  करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है| 

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 9.9.10 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के  बुनियादी मानव अधिकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता  है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए  और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए था| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा / या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानव अधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक ​​कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित  नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि  बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही  जारी रखते  हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक  मुआवजा पाने का अधिकारी  है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन  माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|


हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक स्वयम ने यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की  एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|   

Thursday, December 19, 2013

भारत के समस्त शासनाध्यक्षों से विनम्र अनुरोध//मनीराम शर्मा

Thu, Dec 19, 2013 at 9:09 PM
भारत में मात्र 25% पुलिस बल ही थानों में जनता की सेवा के लिए
मान्यवर,
पुलिस बल की तैनाती–कानून-व्यवस्था तथा अनुसन्धान एवं दोषसिद्धि
आप इस तथ्य से अवागत होंगे कि अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 256 और भारत में 130 पुलिस है जबकि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुणे मामले दर्ज होते हैं| फिर भी भारत में प्रति लाख जनसंख्या 56 केन्द्रीय पुलिस बल इसके अतिरिक्त हैं| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 5806 मुकदमे दायर होते हैं जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है| तदनुसार भारत में प्रति लाख जनसंख्या 68 मात्र पुलिस होना पर्याप्त है| किन्तु भारत में मात्र 25% पुलिस बल ही थानों में जनता की सेवा के लिए तैनात है और शेष बल लाइन आदि में तैनात है जिसमें से एक बड़ा भाग अंग्रेजी शासनकाल से ही विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, वसूली करने आदि में लग जाता है|


भारत में अंग्रेज, जनता पर अत्याचार कर उनका शोषण करने और ब्रिटेन के राज कोष को धन से भरने के लिए आये थे अत: उनकी सुरक्षा को खतरे का अनुमान तो लगाया जा सकता है| किन्तु जनतन्त्र में शासन की बागडोर जनप्रिय, सेवाभावी और साफ़ छवि वाले लोगों के हाथों में होती है अत: अपवादों को छोड़ते हुए उनकी सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं हो सकता| फिर भी इन राजपुरुषों की सुरक्षा को लोकतंत्र में भी कोई ख़तरा होता है तो उसके लिए उनका आचरण ही अधिक जिम्मेदार है|   

पुलिस अपनी बची खुची ऊर्जा व समय  का उपयोग अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है| वर्ष भर में देश में लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं व देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं| राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार भी देश में गत तीन वर्षों में कम से कम 3,668 अवैध गिरफ्तारियां हुई हैं| यह आंकडा तो मात्र रिपोर्ट किये गए मामले ही बताता है जो वास्तविकता का मात्र 5% ही है| इसमें राज्य आयोगों और बिना रिपोर्ट हुए/दबाये गए आंकड़े जोड़ दिए जाएं तो स्थिति भयावह नजर आती है|     

दुखद तथ्य है कि अपनी सुरक्षा के लिए, जिस पुलिस पर देश की जनता पूरा खर्च कर रही उसका उसे मात्र 25% प्रतिफल ही मिल रहा है और न केवल आम नागरिक की सुरक्षा के साथ समझौता किया जा रहा है बल्कि अनुसंधान में देरी का लाभ दोषियों को मिल रहा है| आपराधिक मामलों में 10-15 वर्ष मात्र अनुसंधान में आम तौर पर लगना इस दोषपूर्ण तैनाती नीति की ही परिणति है| अत: अब नीति बनायी जाए की कुल पुलिस बल का कम से कम आधा भाग जनता की सेवा में पुलिस थानों में तैनात किया जाए ताकि जनता कि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके, अपराधियों को शीघ्र दंड मिल सके और उन पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके|

यदाकदा किसी संवेदनशील मामले में न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अनुसंधान का आदेश दिया जाता है तो भी बयान हैड कांस्टेबल ही लेता और वही रिपोर्ट बनाता है| वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तो वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर मात्र हस्ताक्षर ही करते हैं और बयान लेने कहीं बाहर नहीं जाते हैं| मात्र हस्ताक्षर करने के लिए देश की गरीब जनता की जेब से इतना भारी वेतन और सुविधाएं देना किस प्रकार न्यायोचित है|   

पुलिस तो जनता की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में कार्य करने वाला बल है जिसका कार्यालयों में कोई कार्य नहीं है| सभी स्तर के पुलिस अधिकारियों को कार्यक्षेत्र में भेजा जाना चाहिए और उन्हें, अपवादों को छोड़कर, हमेशा ही चलायमान ड्यूटी पर रखा जाना चाहिए| आज संचार के उन्नत साधन हैं अत: आवश्यकता होने पर किसी भी पुलिस अधिकारी से कभी भी संपर्क किया जा सकता है और पुलिस चलायमान ड्यूटी पर होते हुए भी कार्यालय का कामकाज देख सकती है| पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश हो को वे पुलिस थानों के कार्यालय की बजाय जनता से संपर्क कर निरीक्षण रिपोर्ट बनाएं|

सादर ,   
भवनिष्ठ                                                                            
मनीराम शर्मा                                                        दिनांक 19 .12 .13 
एडवोकेट
नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर-331403
जिला-चुरू(राज)