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Sunday, December 04, 2022

गुरशरण सिंह नाटय उत्सव का दूसरा दिन

Sunday 4th December 2022 at 06:20 PM

मंच पर साकार हुई 'नटी बिनोदनी' की सच्ची ऐतिहासिक कहानी

19वीं सदी के बंगाल के महान संत रामकृष्ण परमहंस 1884 में उनके नाटक को देखने आए थे। नटी बिनोदिनी, 1994 में बनी एक बंगाली फिल्म थी जिसमें प्रसोनजित चटर्जी और देबश्री राय ने अभिनय किया था। यह फिल्म नटी बिनोदिनी के ऊपर बनाई गयी थी। --सम्पादक 


चंडीगढ़: 4 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::

यह तस्वीर विकिमीडिया कॉमन से 
सुचेतक रंगमंच मोहाली द्वारा हर वर्ष आयोजित होने वाले 'गुरशरण सिंह नाटय उत्सव' के दूसरे दिन बांग्ला रंगमंच की जीवित शहीद नटी बिनोदनी की गाथा प्रस्तुत की गई। यह नाटक बता रहा था कि डेढ़ सदी में कला जगत भी ज्यादा नहीं बदल सका। नाटक 'नटी बिनोदनी' बंगाली थिएटर अभिनेत्री बिनोदनी दासी की आत्मकथा पर आधारित है, जिसे पंजाब कला परिषद और संस्कृति मंत्रालय का सहियोग  प्राप्त था।

यह नाटक नटी बिनोदनी की आत्मकथा और उनके जीवनीकारों की कृतियों पर आधारित था, जिसकी स्क्रिप्ट शब्दीश ने लिखी थी। वह थिएटर में कैसे आई और किन परिस्थितियों में अंधेरी गलियों में खो गई; यह कहानी केवल नाटक का वर्णन करती है।

अनीता शब्दीश, जो नाटक की निर्देशक भी हैं, ने नटी बिनोदनी की मुख्य भूमिका निभाई थी। वह रंगमंच को पूजा मानती हैं; इसलिए वह प्यार को भी ठुकरा देती है और थिएटर कंपनी को बचाने के लिए खुद को अमीरजादे को बेच देती है। तन-मन को निछावर करने वाली इस महिला की पीड़ा संवेदनशील दर्शकों को बार-बार हिलाती है क्योंकि वे देखते हैं कि उसके साथी कलाकार थिएटर कंपनी पर कब्ज़ा करते के लिए किस हद्द तक साजिश रचते हैं। वह उनके सामने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री नहीं, बल्कि एक वेश्या की बेटी है, हालांकि दर्शकों के लिए वह सती सावित्री, सीता और द्रोपती थीं, जिनकी भूमिकाएँ उन्होंने निभाईं। अपने पुरुष साथियों की साजिशें और पुरुष प्रधान रवैये से दुखी नटी बिनोदनी हमेशा के लिए मंच छोड़ देती हैं और गंभीर सवाल उठाते हुए दर्शकों में खो जाती हैं।

इन स्थितियों को एक अभिनेत्री के रूप में निर्देशक अनीता शबदीश ने जीवंत किया। जसवीर सिंह ने तत्कालीन टीम निदेशक गरीश घोष की भूमिका निभाई। वह टीम को बचाने के लिए सहायक कलाकारों के साथ मिलकर काम करता है; नटी बिनोदनी को भीतर से तोड़ने वाली मानसिक यातना की साजिशों में भागीदार बन जाता है, हालाँकि वह बिनोदानी के प्रति सहानुभूति भी रखता है। हरमनपाल सिंह ने राजा बाबू की भूमिका निभाई, जो प्यार तो करता है, लेकिन पत्नी के बजाय एक रखैल मानता है। तेजभान गांधी ने उनके बूढ़े आशक गुरुमुख बाबू की भूमिका निभाई। रमन ढिल्लों ने नटी बिनोदानी की दादी और माँ की भूमिकाएँ निभाईं और मिष्टी ने बिनोदनी के बचपन की भूमिका निभाई, जिसका गुरजीत दिओल के साथ छोटा सा रोल था।

इस नाटक का सेट लख्खा लहरी द्वारा डिजाइन किया गया था, जबकि संगीत दिलखुश थिंद द्वारा रचित था। इसके गाने सलीम सिकंदर और मिनी दिलखुश ने गाए थे।

5 दिसंबर को होगा 'लच्छू कबाड़िया कबरिया': अभिनेता मंच मोहाली की तर्फ से डाॅ. साहिब सिंह दलित समाज के जीवन को प्रस्तुत करने वाला नाटक 'लच्छू कबाड़िया' प्रस्तुत करेंगे।

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Saturday, December 03, 2022

चंडीगढ़ में गुरशरण सिंह नाटय उत्सव का शुभारम्भ

3rd December 2022 at 06:17 PM

 सार्त्र के नाटक "कौन जाने दर्द हमारा" का पंजाबी रूपांतरण "कौन जाने साडी पीड़" 

सार्त्र उन बागियों में से एक थे जिन्होंने कभी किसी पार्टी की सदस्यता स्वीकार नहीं की। उनके दार्शनिक विचार उन नाटकों और उपन्यासों में स्पष्ट रूप से झलकते हैं। उनकी रचनाएं आपको आपके ही आप के एक ऐसे संस्करण से परिचित कराते हैं, जिसका आपने पहले कभी सामना नहीं किया होगा। नाट्य उत्सव के पहले दिन की शुरुआत सार्त्र के नाटक से हुई। इस नाटक की कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। -सम्पादक: 


चंडीगढ़: 3 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::

पंजाब कला भवन के रंधावा ऑडिटोरियम में 19वें गुरशरण सिंह नाट उत्सव की शुरुआत जीन पॉल सार्त्र के एक फ्रांसीसी नाटक से हुई, जिसका पंजाबी रूपान्तर  'कौन जाने साडी पीड' के शब्दीश रूप में किया। यह नाटक पंजाब कला परिषद और संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से किया गया। इस नाटक की मूल पटकथा नस्लवाद से संबंधित है, जिसे एडॉप्टर ने भारतीय संदर्भ में जातिवाद के मुद्दे के संबंध में प्रस्तुत किया है। यह नाटक की पिथ्भूमि रेल में घटित घटना है, जिसमें उच्च जाति के पुरुष अपनी ही जाति की वेश्या से छेड़छाड़ करते है। नाटक की कहानी के अनुसार ट्रेन के उस डिब्बे में दो दलित भी बैठे थे, जिन्हें पुरुषों का व्यवहार पसंद नहीं है। उनमें से एक गुंडों का विरोध करता है और उनके द्वारा गोली मार दी जाती है, जबकि दूसरा ट्रेन से कूदकर भाग जाता है। वह हत्या के मामले का एकमात्र गवाह है, लेकिन हत्यारों ने उस पर ही झूठा आरोप लगाकर पूरे शहर को भड़का कर भीड़ द्वारा उसे मार डाला गया।

यह नाटक रोचक परिस्थितियों में घटित होता है। एक ओर दलित अपनी जान बचाने के लिए वेश्या के सामने गुहार लगाने आ रहा है, दूसरी ओर हत्यारे का कज़न रंजीत गरीब आदमी को अदालत में दोषी ठहराने के लिए झूठे बयान पर हस्ताक्षर करने का सौदा करना चाहता है। जब लवलीन दबाव में झूठे बयान पर हस्ताक्षर करने की अनैतिकता को स्वीकार नहीं करती है, तो रंजीत के मेयर पिता देश के विकास और इसके सबसे बड़े नेता का रूप अपना कर अपने चमत्कारी प्रभाव के तहत हस्ताक्षर प्राप्त कर लेता है। उनका कहना है कि हत्या का आरोपी हरमीत दुनिया के कॉरपोरेट प्रमुखों को टक्कर दे सकता है, हजारों लोगों को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं. यह देशहित में उठाया गया कदम होगा। लवलीन को गलती का एहसास होता है, लेकिन खेल हाथ से निकल जाता है।  

इस नाटक की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि प्रमुख भूमिका निभाने वाले सभी अभिनेताओं ने मनुष्य के आंतरिक चेहरे को प्रकट करने की पूरी कोशिश की। पूजा कठवाल द्वारा अभिनीत इस नाटक की नायिका लवलीन एक वेश्या है, न्याय के प्रति संवेदनशील है और जातिवादी भावनाओं की मार हेठ भी है। इसी तरह रंजीत, जिसे अंशुल द्वारा अभिनीत किया,  वोह जिस्म का भूखा है, अपने कज़न  को बचाने के लिए बड़ी रकम देने को तैयार है; अनुपाओर ना मानने की स्थिति में शारीरिक रूप से धक्का मुक्की भी कर सकता है। इसी तरह 

हरजाप की तर्फ सेअदा किया मेअर का चित्रण है, जिसके पास भोली भाली लवलीन के दिमाग को मोड़ने के लिए एक जादुई जुबान है। इस नाटक के केंद्र में दलित की संक्षिप्त, लेकिन सशक्त भूमिका है। वह अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा है, लेकिन बड़े लोगों पर फायर नहीं कर सकता, क्योंकि वह सोचता है कि परलोक में शस्त्रों से काम नहीं चलेगा, वहां तो ग्रन्थ ही सहारा बन सकते हैं। यह भूमिका भरत शर्मा ने निभाई थी।

नाटक का चरमोत्कर्ष लवलीन का बदला है। वह पछतावे की आग में जलती है, जब गुस्साई भीड़ गरीब आदमी की हत्या कर देती है। नाटक का निर्देशन अनीता शबदीश ने किया।

4 दिसंबर को होगी 'नटी बिनोदनी' : गुरशरण सिंह नाट उत्सव के दूसरे दिन 'नटी बिनोदनी' की प्रस्तुति भी सुचेतक रंगमंच की होगी। यह नाटक बंगाली रंगमंच की जीवित शहीद 'नटी बिनोदनी' की आत्मकथा पर आधारित होगा। वह कैसे नाटक की दुनिया में शामिल हुईं और किन परिस्थितियों में उसने हमेशा के लिए मंच छोड़ दिया; यह ही होगी नाटक की कहानी।

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Tuesday, March 08, 2022

विश्व नारी दिवस नट-उत्सव तीसरा दिन

8th March 2022 at 03:16 PM

‘मन मिट्टी दा बोलिया’ नाटक ने ज़ाहर कीं औरत मन की परतें 


चंडीगढ़
: 8 मार्च 2022: (पंजाब स्क्रीन डेस्क)::

सन 1958 में एक फिल्म आई थी साधना। साहिर लुधियानवी साहिब का एक गीत था औरतों की दुर्दशा पर। 

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया

इस गीत को आवाज़ दी थी लता मंगेशकर जी ने और संगीत दिया था एन. दत्त्ता ने। दिल और दिमाग को बुरी तरह झंकझोर देने वाले इस गीत के शब्द समाज के मुंह पर चांटे की तरह लगते महसूस होते थे। इस पर उस समय भी कुछ नेताओं को तो एतराज़ हुआ था लेकिन समाज को फिर भी शर्म  नहीं आई। जिस अत्याचार का साहिर साहिब ज़िक्र करते हैं उसका रंगरूप बदलता रहा। आम्रपाली को सर्वभोग्य और नगरबधू बनाने वाले इस तथाकथित महान समाज का मन उसके साथ अन्याय कर के भी भरा नहीं, रुका नहीं। अन्याय और अत्याचार का सिलसिला लगातार जारी रहा। आज भी जारी है। 

महानता के नारे लगाने वालों ने बस अपनी सुविधा के मुताबिक औरत पर किए जाने वाले अत्याचारों के रंगरूप बदल दिए हैं। महिला के साथ होते अन्याय का असर उसकी मूक संवेदना पर भी पड़ता है। उसकी सोच पर भी पड़ता है। उसके जज़्बातों पर भी पड़ता है और फिर उसकी शख्सियत पर भी पड़ता है। 

अन्याय का शिकार होती औरत जानती है कि वास्तव में यह समाज कितना "महान" है? उसने इतना अत्याचार होने के बावजूद कभी समाज से पर्दा नहीं उठाया क्यूंकि वह जानती है कि पर्दा उठते ही सब कुछ तहस नहस  नहस हो जाएगा। समाज को बचने के लिए, परिवारों ओके बचने के लिए वह अपनी करूपो दृष्टि बनाए रखती है। औरत मन की परतों को साहिर लुधियानवी और शिव बटालवी जैसे महान शायरों के बाद सामने लाने की हिम्मत दिखाई है शब्दीश ने। महिला मन की थाह पाना कभी भी आसान नहीं होता। इस की कृपा कुछ गिनेचुने अधिकारी लोगों पर ही हुआ करती है।  

विश्व नारी दिवस नाट उत्सव के तीसरे दिन सुचेतक रंगमंच मोहाली द्वारा पंजाब कला परिषद के सहयोग से अनीता शब्दीश के निर्देशन में सोलो नाटक 'मन मिट्टी दा बोल्या' का प्रदर्शन किया गया, जिसने नाटक के विभिन्न पात्रों को वही अदा कर रही थी। इस तरह नाटक का मंचन बहुत कठिन भी था। इस तरह की सोलो भूमिका को निभाना आसान नहीं होता। 

पंजाबी कवी और नाटककार शबदीश की 'मन मिट्टी दा बोल्या' उन महिलाओं के जीवन को दर्शाती है, जिनके साथ विभिन्न परिस्थितियों में बलात्कार हुआ है। यह नाटक उपयुक्त नाट्य तकनीकों का उपयोग करते हुए कथा को दृश्य-दर-दृश्य आगे ले जाता है, ताकि अभिनेता मंच पर कहानी के अगले चरित्र के लिए दर्शकों के सामने ही दूसरे किरदार में ढाल सके और वह भी उससे एकदम से जुड़ सकें।  

नाटक एक स्कूली छात्रा की त्रासदी से भी संबंधित है जो अपने ही पिता और दादा की वासना का शिकार हो जाती है और एक शिक्षित महिला कहानी भी है, जो अपने ही घर में एक दोस्त की वासना का शिकार होती है। इसी तरह दलित समाज की एक साधारण महिला है, जो पति के खिलाफ विद्रोह करने की वजह से सड़क पर तो आ जाती है, लेकिन मर्दाना अहंकार को खारिज कर देने की बात प्रवान नहीं करती. 

नाटक पाकिस्तान में बलात्कार पीड़िता मुख्तार माई के संघर्ष की सच्ची कहानी में परिणत होता है, जो एक पिछड़े समाज में बलात्कार महिला द्वारा आत्महत्या की प्रथा को चुनौती देकर संघर्ष का रास्ता चुनती है। इन सभी भूमिकाओं को निभाने के लिए अनीता शब्दीश  एक नाटकीय तकनीक में एक दुपट्टा तब्दील करने का उपयोग करती है।

नाटक की शुरुआत वर्जीनिया वूल्फ के हवाले से एक कविता से होती है, जो एलिजाबेथ के समय के मद्देनजर यूरोपीय समाज के बारे में सवाल उठाती है। यहीं से नाटक भारतीय और पाकिस्तानी जीवन में प्रवेश करता है। नाटक यह सवाल उठाता है कि स्त्री और पुरुष सामाजिक जीवन में एक साथ यात्रा करना शुरू कर देते हैं, फिर क्या कारण है कि सदियों बाद स्त्री ने अपने मन की बात कहने के लिए पुरुष से कलम उठाई। कई घटनाएं जो इस नाटक का हिस्सा हैं, मीडिया की नजरों से दर्द की आवाजें हैं, जिन्हें हमारा 'सम्माननीय समाज' छिपाने की कोशिश करता है। इस तरह कहानी का कोलाज महिला के अस्तित्व के संकट और उसके संघर्ष को परत दर परत उजागर करता है।

नाटक दुनिया भर में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति के बारे में सच्चाई बताता है और हर तरह से गुलामी से पीड़ित महिलाओं की मानसिकता को बदलने के लिए संघर्ष पर केंद्रित है। नाटक का उद्देश्य पश्चिमी पूंजीवादी नारीवाद पर सवाल उठाना भी है, हालांकि इस संबंध में इसे सीधे तौर पर व्यक्त नहीं किया गया है।

इस अवसर पर पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष सुरजीत पातर, पंजाब संगीत नाटक अकादमी के सचिव प्रीतम रूपाल और पंजाब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सरबजीत कौर भी उपस्थित थे।


Sunday, December 12, 2021

भाई मन्ना सिंह का काफिला फिर समझाने आया असली रंगमंच

12th December 2021 at 10:34 PM

गुरशरण सिंह नाट उत्सव के ज़रिये जारी है चेतना जगाने का अभियान 


चंडीगढ़: 12 दिसंबर 2021: (गुरजीत सिंह बिल्ला//कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
गुरुशरण सिंह को ज़्यादातर लोग भाई मन्ना सिंह के नाम से जानते हैं। वही मन्ना सिंह जो अलगाववादी चढ़त के दिनों में भी सच बोलता रहा। जो पुलिस मुकाबलों के दौर में भी सच बोलता रहा। वही मन्ना सिंह जिसने खालिस्तानी आतंक के सामने झुकने से भी इंकार कर दिया। शब्दों और रंगमंच को एक हथियार जिसने उन सभी के साथ एक जंग हर दौर में जारी राखी जो मानवता के दुश्मन थे। न सियासी लीडरों को माफ़ किया न ही गुंडों को और न ही आतंकी संगठनों को। इस सच की मशाल में ही कोई जादू था लोग घरों से निकल कर उसके नाटक देखने आते। युवक और युवतियां उसके काफिले में शामिल होते गए होते गए। कोई महंगा लाइफ स्टाईल भी। बस हाथ पर रोटी और रोटी पर अचार और लंच हो गया। आम लोगों की तरह टेंट सा लगा कर आरज़ी घर बना लेना। वह मशाल आज भी रौशन है अलग अलग नामों से, अलग अलग रूपों में। आज भी मिशन वही है। सच सामने लाना। आज भी निडरता वही है। गुरशरण भा जी के वक्त समस्याएं उस वक्त की थीं आज के नाटकों में आज की समस्याएं हैं। का 

सुचेतक रंगमंच मोहाली ने पंजाब संगीत नाटक अकादमी और चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से पंजाब कला भवन में 18वें गुरशरण सिंह नाट उत्सव के दूसरे दिन का आयोजन किया। लखा लाहिरी के निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। यह बलजीत सिंह के उपन्यास तालाबंदी का नाटकीय पंजाबी रूपांतरण है। यह नाटक भारत सरकार द्वारा कोरोना महामारी के मद्देनजर अचानक हुए लॉकडाउन के दिनों को ब्यान कर रहा था, जब प्रधान मंत्री ने केवल चार घंटे के नोटिस के साथ लॉकडाउन का आदेश जारी किया था।

गगन (नवदीप क्लेर ), एक युवा सिख, और सादिया (अरविंदर कौर), एक मुस्लिम लड़की, दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुश्किल में पड़ जाते हैं, जब ट्रेनें अचानक चलना बंद कर देती हैं। युवक को अपने घर पंजाब और लड़की को हैदराबाद जाना था। वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाती है, एक स्मार्ट लड़की है, लेकिन बहुत घबराई हुई है, क्योंकि उसके माता-पिता को उसकी चिंताओं के कारण उसके घर से लगातार फोन आ रहे हैं। इस महानगर में काम करने वाला संवेदनशील युवक स्थिति को समझता है और उसे अपने फ्लैट में जाने के लिए कहता है। कोई अन्य विकल्प न होने पर वह साथ जाने के लिए सहमत हो जाती है। हिंदू पत्रकार दोस्त साहिल (तुषार सिंह) की मदद से युवा सिख उस को फ्लैट में ले जाता है। वे दोनों अपने आत्मविश्वास से निपटते हैं क्योंकि दोनों के घर वाले परेशान हैं। इस तरह नाटक अपनी नाटकीयता की ओर बढ़ता है।

दोनों अलग-अलग धर्मों के हैं, युवा हैं और एक ही छत के नीचे रहते हैं और परेशान माता-पिता बार-बार फोन करते हैं। दो परिवारों के बीच कलह उत्पन्न हो जाती है। वे अपने माता-पिता को समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे पारंपरिक सोच और धार्मिक मान्यताओं की दीवार के सामने बेबस हैं। नाटक प्रेम भावना, सहानुभूति और आत्मीयता से संबंधित है, कोरोना काल के दौरान गरीबों की दुर्दशा का वर्णन करता है, और राजनीति के साथ तालमेल बिठाता है। एक ओर अशांत परिवारों के निर्देश हैं तो दूसरी ओर दोनों का परस्पर सहयोग, स्वभाव, प्रतिभा, बौद्धिक स्तर एक दूसरे के प्रति मौन आध्यात्मिक प्रेम की ओर बढ़ता है। वे परोक्ष रूप से एक-दूसरे के सामने अपनी बात रखते भी हैं, लेकिन खुलकर बोलने से भी बचते हैं। रिश्ता अपने चरमोत्कर्ष तक पहुँचने से पहले ही लॉकडाउन समाप्त हो जाता है, और दोनों अलग हो जाते हैं, जिससे बहुत सारी सामाजिक-राजनीतिक सच्चाई का पता चलता है। इस भावनात्मक मोड़ पर समाप्त होने वाला नाटक दर्शकों के दिलों में सवालों की झड़ी लगा देता है।

कुल मिला कर जागृति लाने का अभियान आज भी जारी है। बेरोज़गारी, महंगाई और अन्य समस्यायों  को आज भी उसी तरह बेनकाब किया जा रहा है जैसे भाई मन्ना सिंह किया करते थे। आप इनको एक बार देखने ज़रूर आएं आप इनके जादू से बच नहीं सकेंगे। 

Saturday, December 11, 2021

किसान आंदोलन की जीत पर रंगमंच वाले भी हर्षोउल्लास में

फतेह दिवस समारोह के साथ 18वां गुरशरण सिंह नाट उत्सव शुरू


चंडीगढ़
: 11 दिसंबर 2021: (गुरजीत सिंह बिल्ला//कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::

आज़ादी आने के बाद विकास हुआ भी और इसके दावे भी अक्सर किए गए लेकिन इस विकास की कोई ख़ास राहत आम साधारण नागरिक तक नहीं पहुंच सकी। इनकी खबर लेने अगर कभी कभार नेता लोग आते भी तो बस उसी वक्त जब उन्हें वोट लेने होते। इस कड़वी हाकिल्कत को सरदार गुरुशरण सिंह उर्फ़ भाई मन्ना सिंह जी ने बहुत पहले ही बेनकाब करना शुरू क्र दिया था। उनके साथ काम करने वाले अक्सर उन्हें भा जी कह कर पुकारते। इस तरह यह देश सम्पन्न लोगों के लिए विकास लेन वाला देश बना चला गया जहां गरीब के लिए रोज़गार, सेहत और शिक्षा तक भी गारंटी से आरक्षित न हो सकी। इस बदहाली, मजबूरी और बेबसी को गुरशरण भा जी अक्सर अपनी थिएटर टीम के ज़रिए सामने लाते। उन्हें धमकियां भी मिलीं, दबाव भी पड़े और लालच भी दिए गए लेकिन वह कभी भी डगमगाए नहीं। उन्हें जानने वालों में से किसी ने उन्हें कभी भी कमज़ोर पड़ते न देखा। सरकारें भी उनके निशाने पर रहीं, सियासतदान भी और आतंकी संगठन भी। आखिरी सांस तक वह जनता के लिए समर्पित रहे। उनके बाद उनका काफिला उन्हीं के मिशन को आगे बढ़ा रहा है। 11th December 2021 at 07:46 PM

पंजाब संगीत नाटक अकादमी और चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से सुचेतक रंगमंच मोहाली द्वारा आयोजित 18वां 'गुरशरण सिंह नाट उत्सव-2021' किसान आंदोलन की जीत के जश्न के साथ शुरू हुआ, जिस को भारतीय किसानों ने धैर्य के साथ लड़ा गया था। पहले दिन पंजाब कला भवन के प्रांगण में भावी संघर्षों के लिए उत्साहपूर्ण स्वर में संक्षिप्त बातचीत और क्रांतिकारी गीत और संगीत का प्रदर्शन किया गया। ये प्रस्तुतियां सुचेतक स्कूल ऑफ एक्टिंग के कलाकारों ने हरजाप सिंह के मार्गदर्शन में दीं। इस जश्न में दुनिया की इकलौती अलगोजा वादक अनुप्रीत कौर ने संगीत के रंग को और गहरा किया. इसके बाद सुचेतक थिएटर मोहाली ने अपना कॉमेडी नाटक ‘ऐदां ता फिर ऐदां ही सही’ किया, जो इतालवी नाटककार डारियो फो के नाटक का पंजाबी रूपांतरण था।

इस नाटक की कहानी एक निम्न मध्यवर्गीय कॉलोनी में घटित होती है, जहां बढ़ती महंगाई और घटती कमाई से तंग आकर महिलाएं कॉरपोरेट का सामान लूटती हैं। कहानी दो महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। लच्छमी (अनीता शबदीश), जो नाटक में मुख्य भूमिका निभा रही है, लूटपाट में शामिल है, लेकिन वह अपनी दोस्त मालती (सहर) को सच बताने से बच रही है, जबकि वह सच्चाई का पता लगाने के लिए दृढ़ है। तरह-तरह के बहाने बनाने के बाद, लच्छमी सच्चाई का खुलासा करती है और लूट को आधा करने के लिए तैयार हो जाती है। तभी पुलिस आ जाती है। उनके पास अपनी लूट को छिपाने के लिए भी जगह नहीं है। लच्छमी कोट के बटन को किसी ऐसी ही मालती के गले में लटकाकर बंद कर देती है। इस तरह शुरू होता है गर्भवती होने का ढोंग, जो अंत तक चलता है।

पुलिस से डरने वाली महिलाओं के सामने पति का आदर्श भी होता है। वे अपने नामों का उसी तरह अभ्यास करते हैं जैसे गौरव और आदर्श के अर्थ। वे दोनों एक ही कारखाने में काम करते हैं और यूनियन के कर्मचारी भी हैं और मांगों के लिए प्रस्ताव पारित करना पर्याप्त मानते हैं। इसके विपरीत, ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने समान काम के लिए समान वेतन के लिए संघर्ष किया है; वह भी ऐसे समय में जब पुरुष संघ के नेता अनशन समाप्त करने के लिए हड़ताल पर जोर दे रहे थे। इस तरह नाटक संघों को तीखे संघर्ष के पाठ की ओर ले जाता है और अंत में पुरुष भी 'इतना सही' की ओर बढ़ते हैं।

इस नाटक में हवलदार (भारत शर्मा) और इंस्पेक्टर (अरमान संधू) की भी अहम भूमिका है। तलाशी के दौरान सिपाही भी क्रांतिकारी की तरह बात करता है, जबकि इंस्पेक्टर सिर में चोट लगने के कारण अर्ध-चेतना की स्थिति में भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की धमकी देता रहता है, लेकिन अंत में रीढ़ की हड्डी को सीधा करने के लिए बुलाने की हद तक पहुंच जाता है। इस तरह नाटक सभी वर्गों के आम लोगों तक संदेश पहुँचाकर अपने चरम पर पहुँच जाता है।

कल होगा ड्रामा 'लॉक डाउन'

12 दिसंबर को सार्थक रंगमंच पटियाला ने डॉ. लाखा लाहिड़ी के निर्देशन में 'लॉक डाउन' प्रस्तुत किया जाएगा। नाटक एक युवा सिख और एक मुस्लिम लड़की के दिलों में पैदा हुए प्यार की कहानी कहता है, जो भारत में कोरोना लॉकडाउन के दौरान अचानक मिले थे।

Wednesday, March 04, 2020

लुधियाना शाहीन बाग में राणा सोढी की टीम ने किया नाटक का मंचन

4th Mar 2020 at 4:02 PM
कलाकारों के आने से भरा सीएए के खिलाफ आंदोलन में नया जोश 
लुधियाना: 4 मार्च 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो//सहयोग पीपुल्स मीडिया लिंक)::
शहीन बाग प्रदर्शन के आज 22वें दिन बस्ती जोधेवाल नजदीक कबीर नगर से हकीम मुहम्मद इस्राफिल, हाजी बशीर, हाजी सागुल, सदरे आलम, मुहम्मद जाबिर, मुहम्मद अबुल रब, मुहम्मद निसार की अध्यक्षता मेंं बड़ी संख्या में लोगों का जत्था पहुंचा। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा नागरिकता कानून बनाए जाने के बाद लगातार देशभर में शाहीन बाग आंदोलन चल रहा है जहां से रोज अलग-अलग धर्मों और संस्थाओं के लोग अपने अपने तौर तरीकों से विरोध दर्ज करवा रहे हैं। 
आज यहां शाहीन बाग में प्रगति कला केंद्र लांदडा फिल्लौर की तरफ की तरफ से एक नाटक का मंचन कर के मोदी सरकार की पोल खोली गई। नाटक मंडली के प्रधान राणा सोढ़ी और सिमरन क्रांति की टीम ने केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कानून पर कटाक्ष करते हुए 1 घंटे का नुकड नाटक पेश किया जिसमें कलाकारों ने पागलों के किरदार में राजनीति और समाज में फैली हुई बुराइयों पर कटाक्ष किया। 
नाटक मंचन में अमृता क्रांति, जसप्रीत कुमार, रविंदरा प्रकाश भारतीय, इशमीत, सोनिया, गगनदीप, अजीत कुमार, गरीब दास, चंद्रप्रकाश आदि ने अभिनय किया। आज शाहीन बाग में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के रिसर्च के विद्यार्थी रविंदरा प्रकाश भारतीय ने संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र की मोदी सरकार सिर्फ देश भर के लोगों के साथ खिलवाड़ नहीं कर रही बल्कि माननीय प्रधानमंत्री जी अपने संसदीय क्षेत्र में भी साल के 365 दिन धारा 144 लगवा कर रखते हैं, ताकि कोई भी संस्था या व्यक्ति सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ना करें। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र को दबाने की कोशिश है जो कि देश के संविधान के खिलाफ है। 
भारतीय ने कहा कि धर्म के नाम पर नागरिकता देने वाली भाजपा सरकार को शायद पता नहीं कि देश में शरणार्थियों को पहले से ही नागरिकता मिलती आ रही है। उन्होंने कहा कि जिस देश को 2020 में हर व्यक्ति को रोजगार देने की बात कही गई थी वहां रोजगार कि बजाए लोग दंगों का सामना कर रहे है। इस काले कानून के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन में अब तक पचास के करीब लोगों की हत्या एक ऐसा घाव है जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा। प्रकाश भारतीय ने कहा कि मोदी सरकार में बैठे हुए लोग यह समझ रहे हैं कि सरकारी तंत्र और बल के द्वारा इस आंदोलन को दबाया जा सकता है यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। अब तक हुए प्रमुख आंदोलनों को कोई एक देश तो क्या विश्व की कोई भी सरकार दबा नहीं सकी है। उन्होंने कहा कि एन.आर.सी. और एन.पी.आर. देशभर के लोगों के साथ किया जाने वाला सरकारी धोखा है, अगर यह अमल में आया तो देशभर के सभी धर्मों के लोग एक दफा चौंक जाएंगे।  बेचैनी पैदा होगी उसको संभालना सरकार के बस में नहीं होगा। 
प्रकाश भारतीय ने कहा कि देश भर में शाहीन बाग आंदोलनों का विरोध सिर्फ और सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं इसे किसी भी धर्म के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए यह देश के संविधान को बचाने के लिए आंदोलन है। आज नेशनल हुमन राइट कमेटी के विजय कुमार, प्रोफेसर हरदयाल सिंह, मुहम्मद मुस्तकीम अहरार, प्रधान डॉ. अब्दुल रहमान कुंदनपुरी ने संबोधन किया।  
आंदोलन जारी बढ़ रहा है लेकिन अब देखना है कि लुधियाना का शाहीन बाग़ आंदोलन  कौन सा नया रुख अख्तियार करता है क्यूंकि पंजाब सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख का ऐलान नहीं किया है। अप्रैल महीने में शुरू होने वाले एनपीआर अभियान में राज्य सरकार के कर्मचारी भाग लेंगें या नहीं? अभी तक इस सवाल को लेकर पंजाब सरकार का स्पष्ट रंग सामने नहीं आया। इसी बीच लुधियाना का शाहीन बाग़ आंदोलन पूरे जोश के साथ जारी है। 

Friday, April 26, 2019

SCD कालेज के खिलाफ दर्ज FIR को लेकर सेमिनार 27 अप्रैल को

लोक सुरक्षा मंच ने तोड़ी माहौल में छायी ख़ामोशी 
विवादित नाटक "म्यूज़ियम....." के किसी पुराने मंचन का एक दृश्य 
लुधियाना: 26 अप्रैल 2019: (पंजाब स्क्रीन सांस्कृतिक डेस्क)::    
सतीश चंद्र हवन राजकीय  कालेज में खेले गए नाटक को लेकर उठा विवाद गहराता जा रहा है। कालेज के स्टाफ की सहम भरी खामोशी ने इसके रहस्य और भी गंभीर बना दिया है। गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले कालेज के स्टाफ ने एक तफोंफोन वार्ता में कहा था कि जब तक इस मुद्दे को उठाने संगठन बजरंग दल क्षमा मांगता तब तक सुलह की कोई बात नहीं हो सकती। लेकिन जब उन्हें यही बात कैमरे के सामने रेकार्ड करने को कहा गया तो स्टाफ ने टालमटोल का रवैया अपना लिया। गौरतलब है कि यह नाटक देश भर में कई कई बार खेला जा चुका  है।   पंजाब में भी इसके कई शो हो चुके हैं। इस नाटक के जिन डायलॉग्स पर एतराज़ उठाया गया है उससे मिलते जुलते डायलॉग राज कुमार संतोषी की फिल्म "लज्जा" में भी हैं। इस नाटक के मंचन का समर्थन करने वालों का कहना है कि इस नाटक का मंचन केवल यह दर्शाना था कि महिलाओं के साथ अन्याय आज से नहीं बल्कि युगों युगों से जारी है। सीता माता और द्रोपदी भी इससे बच नहीं सकी। अब जिस युग को आधुनिक कहा जाता है उसमें तो यह सिलसिला बंद होना चाहिए! लेकिन महिलाओं के अधिकारों की बात इस मंचन पर  ऐतराज़ उठने के बाद एक विवादित मुद्दा बन गई। दिलचस्प बात है कि सत्ता लोलुप सियासत के माहौल में कोई भी बड़ा राजनीतिक दल या समाजिक संगठन इस बात पर नहीं बोला।  वाम दलों और बुद्धिजीवियों ने इस ऐतराज़ को अड़े हाथों लिया और कहा चुनावी माहौल में इसे उठाने का मकसद एक ही है की हिन्दुत्वी संगठनों के पास अब जनता के पास जाने का कोई मुद्दा नहीं बचा। दूसरी तरफ बजरंग दल ने 24 अप्रैल को इसी मुद्दे को लेकर फिर से रोष प्रदर्शन का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो सका। सुना है उसी दिन कालेज में चंडीगढ़ से शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी भी आए थे।  लगा था दोनों तरफ के कुछ लोगों को बिठा कर सुलह करवा दी जाये गई लेकिन ऐसी कोई बात नहीं बन सकी। बजरंग दल इस बात पर अड़ा है कि ऍफ़ आई आर में जिन लोगों का नाम है उन्हें गरिफ्तार किया जाए। इस सारी स्थिति में एक चुप्पी सी छा गयी। अक्सर सबसे ज़्यादा बोलने वाले लोग भी खामोश हो गए। जिनका बोलना ज़रूरी था वे भी चुप्प हो गए। बोल रहा था तो केवल बजरंग दल। खुद को सेकुलर कहने वाले खफा थे कि अगर कांग्रेस के शासन में भी हमारे नाटकों को मुद्दा बना कर ऍफ़ आई आर दर्ज होती है तो यह चिंतनीय बात है। अगर सरकार अकाली भाजपा की होती तब क्या हुआ होता! डाक्टर अरुण मित्रा और उनके साथियों  ने इस मुद्दे को लेकर लोक सुरक्षा मंच की तरफ से मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरेंद्र सिंह को एक पत्र भी लिखा। ख़ामोशी की इस हालत में कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहिब का शेयर याद आने लगा: 
कुछ लोग...जो ख़ामोश हैं ये सोच रहे हैं
सच बोलेंगे जब सच के ज़रा दाम बढ़ेंगे
इस चुप्पी को तोडा है लोक सुरक्षा मंच ने। इसी मुद्दे पर एक सेमिनार करवाने का एलान करके। सेमिनार की जगह सर्कट हाऊस थी लेकिन उन्होंने एन वक़्त पर मना कर दिया। शायद उन पर भी कोई दबाव काम कर रहा हो। इसके बाद सेमिनार की जगह बदली गयी। नयी जगह थी शहीद करनैल सिंह ईसड़ू भवन। अब्दुल्ला पर बस्ती में आते इंदिरा नगर में स्थित एक विशेष इमारत। सेमिनार का वक़्त होगा बाद दोपहर तीन बजे। इससे पहले जमहूरी अधिकार सभा भी खुल कर सामने आ चुकी है।   
अब देखना है कि इस सेमिनार में अपना सेकुलरिज़्म साबित करने कौन कौन पहुंचता है और कौन कौन बहानेबाज़ी करता है। 

Tuesday, April 23, 2019

नाटक पर विवाद और तेज़-बजरंग दल का धरना प्रदर्शन 24 को

कालेज पर धरने के बाद भाई बाला चौंक जाम करने की घोषणा 
लुधियाना: 23 अप्रैल 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
बजरंग दल निरंतर गुस्से में है। उसका रोष थमा नहीं। समझौते और गुप्त वार्ताओं से स्पष्ट इंकार करते हुए बजरंगी युवा कहते हैं न हम बिकेंगे न ही झुकेंगे। जब तक धर्म का अपमान रुक नहीं जाता तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा। "पंजाब स्क्रीन" के साथ बात करते हुए बजरंग दल के नेता चेतन मल्होत्रा कहते हैं कि हमारे साथ केवल हमारा धर्म और हमारी आस्था है। हम उसी की शक्ति से चल रहे हैं। यही शक्ति हमें विजयश्री दिलाएगी।  
सतीश चंद्र धवन राजकीय कालेज में खेले गए नाटक "म्यूज़ियम" विवाद को ले कर कल 24 अप्रैल 2019 बुधवार को बजरंग दल और उनके सहयोगियों का रोष धरना और प्रदर्शन सुबह दस बजे एस सी डी राजकीय कालेज के गेट पर होगा। यह जानकारी चेतन मल्होत्रा ने एक वाट्सअप संदेश में दी। इसी बीच विश्व हिन्दू परिषद ने मामला दर्ज करने में सहयोग देने वालों का आभार भी व्यक्त किया है। 
बजरंग दल और अन्य सहयोगियों का कहना है कि इसका मकसद हिन्दू धर्म के देवी देवताओं का अपमान करने कराने वालों को सलाखों के पीछे भेजना है।  जब तक ग्रिफ्तारियाँ नहीं हम चैन से नहीं बैठेंगे। बजरंग दल का कहना है कि पुलिस द्धारा दोषियो को बचाया जा रहा है और पुलिस अभी तक उनकी गिरफ्तारी नही कर रही। हम इस ढील को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। 
यह धरना प्रदर्शन सुबह दस बजे शुरू होगा और बाद में सभी बजरंगी अपने अन्य सहयोगियों के साथ भाई बाला चौंक की तरफ मार्च करेंगे। वहां पहुंच कर भाईवाला चोक ब्लॉक किया जायेगा। 

Monday, April 15, 2019

एक ऐसा नाटक जिसमें नहीं था एक भी डायलॉग

बिना किसी भाषा के दिखा रहा था ज़िन्दगी की तस्वीर को 
लुधियाना: 14 अप्रैल 2019: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन)::
कभी बहुत पहले वर्ष 1955 में एक फिल्म आई थी--बारादरी। उसमें खुमार बारबंकवी साहिब का लिखा एक गीत बहुत मक़बूल हुआ था--
तसवीर बनाता हूँ, तसवीर नहीं बनती, तसवीर नहीं बनती 
एक ख्वाब सा देखा है, ताबीर नहीं बनती, तसवीर नहीं बनती। 

लोकप्रिय होने के बावजूद समझा जाता है कि यह गीत शायद सिर्फ उसी फिल्म तक सीमित था और 1955 को गुज़रे तो अब बहुत देर हो गई। कहा जाता है कि यह गीत भी बहुत पुराना हो गया लेकिन वास्तव में इस गीत का सच आज भी बिलकुल नया है। हम सब की ज़िन्दगी का सच। हमसे आज भी तस्वीर नहीं बनती। ख्वाब तो हम भी बहुत देखते हैं लेकिन ताबीर नहीं बनती। सारी सारी ज़िंदगी गुज़र जाती है सपनों को बुनते हुए लेकिन सब सपने टूट जाते हैं। सारी सारी उम्र हम मेहनत मुशक़्क़त जरते हैं लेकिन दाल रोटी का जुगाड़ नहीं बनता। ज़िन्दगी में प्रेम आता है लेकिन हम उसे भी गंवा बैठते हैं। न तो कोई बात बन पाती है, न ही ज़िंदगी और पूरी उम्र इसी तरह नाकामियों का दंश झेलते हुए गुज़र जाती है। और हम गीत गा गा कर खुद को तसल्लियाँ दे लेते हैं--
बर्बादियों का सोग मनाना फ़िज़ूल था-
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया!
हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया!
यह न समझना कि यह हालत केवल उनकी है जिनके पास पैसे की कमी है। जिनके पास बहुत पैसा है उनका जीवन भी बेहद खोखला है। वे कभी उसे शराब में डुबाते हैं और कभी शबाब में लेकिन कड़वा सत्य फिर भी वही रहता है--तस्वीर बनाता हूँ---तस्वीर नहीं बनती। 
इस सच को कभी राजकपूर साहिब ने दिखाया था-मेरा नाम जोकर में। उन्हें बहुत सदमा भी लगा क्यूंकि उनकी एक शानदार फिल्म नाकाम हो गई थी।  लगा था कि शायद उस युग के दर्शक समझदार नहीं थे। लेकिन हालत आज भी यही है। 
पंजाबी भवन के बलराज साहनी ओपन एयर थिएटर में पंजाब स्क्रीन टीम को बेहद हैरानी हुई कि यहाँ इतने ज़्यादा दर्शक कैसे मौजूद हैं। हैरानी थी कि इतने दर्शक तो सपना चौधरी की इवेंट में भी मौजूद नहीं थे। उस संख्या को देख कर उम्मीद जगी की शायद हम समझदार हो रहे हैं। 
उस रात को एक नाटक का मंचन था। नाम था--सी फॉर क्लाऊन। इसे खेला गया था बिहाईव थिएटर एसोसिएशन (रजि.) की तरफ से। नाटक में एक भी डायलॉग नहीं था। शायद ऐसी कोई भाषा भी नहीं जिसे हम नाम दे सकें। जैसे हम पूर्व में रहें या पश्चिम में। उत्तर में रहें या दक्षिण में। हमारे दुःख सुख एक जैसे होते हैं। हमारी भाषा एक नहीं होती लेकिन फिर भी हम सब समझ जाते हैं। हम दुसरे का दुःख देख कर नज़र अंदाज़ भी करते हैं--मज़ाक भी उड़ाते हैं और कभी कभी दुःख को बांटते भी हैं। बिना किसी भाषा  को जाने। कभी कभी तो हम वो सब भी सुन लेते हैं जिसे किसी ने कहा ही नहीं होता। इसी तरह वह सब भी कहते रहते हैं जिसे कभी सुना ही नहीं जाता। शायद यही होती है संवेदना के जाग जाने की चरम स्थिति जो हमें मानवता से परिचित करवाती है। इसके बावजूद ज़िन्दगी एक शोरगुल रह जाती है। एक ऐसा शोर जो शायद दुनिया के हर कोने में मौजूद होगा। हर भाषा में मौजूद होगा। वही शोर पंजाबी भवन में खेले गए नाटक की भाषा थी। हो हो-हा हा। अदाकारों के एक्शन इस शोर का अर्थ समझाते हैं। ज़िंदगी की तरह आखिर में बात इस नाटक में भी रोटी पर आ जाती है। रोटी एक और भूख से बिलबिलाते कलाकार अनेक। नाटक का निदेशक सिकंदर यहाँ कमाल के अंदाज़ में एंट्री करता है। आँखों ही आँखों में उस एक रोटी को अच्छी तरह से नापने तोलने के बाद वह एक एक टुकड़ा हर कलाकार के मुँह में डालता जाता है। एक मां की तरह। 
इसका अहसास तब होता है जब इप्टा के पुराने सदस्य प्रदीप शर्मा नाटक के अंत में कलाकारों को हौंसला देते हैं और कहते हैं कि थिएटर ही कलाकारों की मां होती है और कोई भी संतान अपनी मां को छोड़ कर कभी नहीं जा सकती। कहीं नहीं जा सकती। उन्होंने समाज को भी आह्वान किया कि वह कलाकारों की सहायता के लिए आगे आये। यही अपील कुछ अन्य कलाकारों ने भी की। 

Monday, January 21, 2019

नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार रात 8 बजे मुंबई में

शिवाजी नाट्य मंदिर में मंचित होगा मंजुल भारद्वाज का लिखा नाटक 
लुधियाना//मुम्बई: 21 जनवरी 2019: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
पहले सिनेमा--फिर फ़िल्में और उसके बाद केबल का प्रचलन। तकनीकी विकास के इस दौर ने सबसे बुरा असर डाला मंच की कला पर। नाटकों का का मंचन कम से कम होता चला गया। नाटक को आंदोलन का रूप देने वाले "इप्टा" जैसे संगठन गुमनामी के दायरे में सिमटते चले गए। उनका अस्तित्व केवल उनके राष्ट्रिय आयोजनों या उन पर होने वाले हमलों की खबरों से ही महसूस होता। तकरीबन तकरीबन यही हाल "जन नाटय मंच" का भी हुआ। सुबह से लेकर रात केवल दाल रोटी  उलझा दिए गए समाज में सबसे अधिक शिकार बने नाटकों की दुनिया के कलाकार, लेखक, निदेशक और अन्य तकनीकी स्टाफ के सदस्य। राजनैतिक दलों के शिकंजे ने भी नाटकों के अभियान को लुप्त जैसा ही कर दिया।  इक्का दुक्का कलाकारों ने नाटकों केमाभियाँ को जीवंत रखने की कोशिश भी की लेकिन उन्हें दर्शक नहीं मिले। ऐसे में उभर कर सामने आए मंजुल भारद्धाज। कुछ बातों का संकल्प- की तीखी आलोचना भी लेकिन साथ ही साथ रंगमंच को फिर से हर दिल तक ले जाने का प्रयास भी।  इसी प्रयास के अंतर्गत हो रहा है "राजगति" का मंचन।   
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” अभ्यासक एवम् शुभचिन्तक आयोजित नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे “शिवाजी नाट्य मंदिर” दादर(पश्चिम), मुंबई में मंचित होगा! सुप्रसिद्ध रंग चिन्तक मंजुल भारद्धाज लिखित और निर्देशित नाटक “राजगति” समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
मंचन का विवरण इस प्रकार है:
कब : 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे
कहाँ : “शिवाजी नाट्य मंदिर”, दादर(पश्चिम), मुंबई
कलाकार:अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर, कोमल खामकर, तुषार म्हस्के,स्वाति वाघ,हृषिकेश पाटिल,प्रियंका काम्बले,प्रसाद खामकर और सचिन गाडेकर।
अवधि :120 मिनट
नाटक 'राजगति', : “नाटक राजगति ‘सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति’ की गति है. राजनीति को पवित्र नीति मानता है.राजनीति गंदी नहीं है के भ्रम को तोड़कर राजनीति में जन सहभागिता की अपील करता है. ‘मेरा राजनीति से क्या लेना देना’ आम जन की इस अवधारणा को दिशा देता. आम जन लोकतन्त्र का प्रहरी है. प्रहरी है तो आम जन का सीधे सीधे राजनीति से सम्बन्ध है.समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
नाटक “राजगति” क्यों ?
हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना को जगाएं ,ताकि आत्महीनता का भाव ध्वस्त हो और ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।
पंजाब में नाटय को समर्पित कुछ विशेष लोग 
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन विगत 26 वर्षों से फाशीवादी शक्तियों से जूझ रहा है। भूमंडलीकरण और फाशीवादी ताकतें ‘स्वराज और समता’ के विचार को ध्वस्त कर समाज में विकार पैदा करती हैं जिससे पूरा समाज ‘आत्महीनता’ से ग्रसित होकर हिंसा से लैस हो जाता है. हिंसा मानवता को नष्ट करती है और मनुष्य में ‘इंसानियत’ का भाव जगाती है कला. कला जो मनुष्य को मनुष्यता का बोध कराए...कला जो मनुष्य को इंसान बनाए! “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”... एक चौथाई सदी यानी 26 वर्षों से सतत सरकारी, गैर सरकारी, कॉर्पोरेटफंडिंग या किसी भी देशी विदेशी अनुदान से परे. सरकार के 300 से 1000 करोड़ के अनुमानित संस्कृति संवर्धन बजट के बरक्स ‘दर्शक’ सहभागिता पर खड़ा है हमारा रंग आन्दोलन.. मुंबई से मणिपुर तक!
लेखक –निर्देशक : रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज रंग दर्शन थिएटर ऑफ रेलेवेंस' के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने नाट्य सिद्धांत "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।  अब तक 28 से अधिक नाटकों का लेखन—निर्देशन तथा अभिनेता के रूप में 16000 से ज्यादा बार राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं!
दर्शक सहयोग और सहभागिता से आयोजित इस मंचन में आपके सक्रिय सहयोग और सहभागिता की अपेक्षा !
अच्छा हो यदि इस नाटक का मंचन देश के सभी भागों में हो सके। इस मकसद के लिए स्थानीय नाटय मंडलियों को एक प्रोफेशनल सोच सामने रखते हुए आगे आना हगा तांकि नाटय  मंडलियों के कलाकारों का आवश्यक खर्चा भी निकल सके। 
लुधियाना में डाक्टर अरुण मित्रा, पत्रकार एम एस भाटिया, मैडम सपनदीप कौर, त्रिलोचन सिंह और इप्टा से जुड़े पुराने कलाकार प्रदीप शर्मा भी सक्रिय  हैं।  चंडीगढ़-मोहाली में प्रगतिशील लेखक कंवर, अमन भोगल, संजीवन सिंह, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला में इंद्रजीत रूपोवालिया, मोगा में विक्की माहेश्वरी सहित बहुत से लोग सक्रिय हैं। अच्छा हो एक ज़ोरदार हल्ला जन विरोधी साज़िशों पर बोला जा सके। शायद सआदत हसन मंटो और सफदर हाशमी की अंतरात्मा को इससे शांति मिल सके। 

Wednesday, November 02, 2016

एक ख़ास डॉक्टर ने दोहराया समाज सुधार का संकल्प

नाटकों के ज़रिये समाज का अँधेरा दूर करने का हिम्मतवर प्रयोग 
लुधियाना: 2 नवम्बर 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): 
समाज और समाज की सोच को बदलने की भावना हर किसी के मन में पैदा ही नहीं होती।  इसके लिए भी प्रकृति चुनाव करती है किसी ख़ास व्यक्ति का जिसका आत्मबल बलवान हो और जीवनशैली जन भलाई से भरी हुई। इस बार प्रकृति ने चुनाव किया है हर व्यक्ति को आंखों के दीपक देने में जुटे डॉक्टर रमेश मेहता का। डॉक्टर रमेश का मानना है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा भी मानसिक तौर पर अँधा हो चुका है। बेटियों का अपमान, भ्रूण हत्या, नशाखोरी और रेप जैसे कुकृत्य कोई समझदार व्यक्ति कर ही नहीं सकता। राह जाती लड़कियों पर तेज़ाब फेंकना, उन्हें ज़िंदा जलाना, बहु को दहेज के लिए तंग करना किसी ऐसे अंधे व्यक्ति का ही काम हो सकता है जिसे अपने स्वार्थ के सिवा कुछ और नहीं दिखता।  जो पूरी तरह सम्वेदनहीन हो चुका है जैसे कि  कोई पत्थर हो। 
इस अंधे समाज को भी आंखें देने का संकल्प डॉक्टर रमेश ने किया हाल ही में। इस मकसद के लिए वह अपने चिकित्सा औज़ारों के साथ साथ अब कलम को भी हथियार बना रहे हैं। उन्होंने मीडिया से भी इस मकसद के लिए सहयोग माँगा है। उन्होंने एक ड्रामा लिखा "पुनरजोत का विवाह" जो कि बेहद लोकप्रिय हो रहा है। अब रविवार 6 नवम्बर 2016 को इसका मंचन होगा गाँव बद्दोवाल में जहाँ बाबा जसपाल सिंह की देखरेख में भाई घनईया चैरिटेबल अस्पताल की तरफ से बहुत सी ज़रूरतमन्द लड़कियों के सामूहिक विबाह एक साथ किये जाएंगे जिनकी संख्या 100 से ऊपर भी हो सकती है।   
यह जानकारी डॉक्टर रमेश ने आज पंजाबी भवन में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में दी। इस अवसर पर इस नाटक की सह निर्देशिका सपनदीप कौर  भी अपनी टीम के साथ मौजूद थीं। सपनदीप कौर ने कहा कि जनता को जगाना अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक कर्तव्य है। सपनदीप कौर ने पाश की एक प्रसिद्ध कविता के कुछ अंश भी पढ़े। भाई घनईया चैरिटेबल अस्पताल की तरफ से गुरप्रीत सिंह भी विशेष तौर पर पहुंचे। 
गौरतलब है कि डॉक्टर ऐस एन सेवक की सरपरस्ती में हो रहे इस नाटक के मंचन की मांग लगातार बढ़ रही है। नवांशहर से आने वाली जागो भी इस आयोजन का विशेष आकर्षण होगी। यह जागो भ्रूण हत्या की बुराई को कम करने के लिए निकाली जा रही है। 

Sunday, September 04, 2016

मधुबनी में इप्टा का विशेष आयोजन 5 सितम्बर को

कला है जीवन का संग्राम--जन शक्ति को  लाल सलाम लाल सलाम
आम इन्सान के लिए  ज़िन्दगी हमेशां एक नई चुनौती बन कर सामने आई किसी न किसी नई मुसीबत की तरह। बहुत से लोग हिम्मत हार जाते।  हालात के सामने घुटने टेक देते। मौत से भी भयंकर हालात की आंख में आँख डाल कर मुस्कराना सिखाने वालों इप्टा का नाम गर्व से लिया जाता है। वह 25 मई 1943 का एक यादगारी दिन था जब मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इप्टा की स्थापना के अवसर की अध्यक्षता की और आह्वान किया, “लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग़ से काम करने वाले आओ और स्वंय को आज़ादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो”। 
 जिन की अंतरात्मा अभी भी ज़िंदा है और जाग रही है उनको प्रो. हीरेन मुखर्जी की आवाज़ आज भी सुनाई दे रही है। उनको साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी साहिब की नज़्में बार बार बुलाती हैं। उनको बलराज साहनी आज भी प्रेरणा देते हैं। 
भारतीय जननाट्य संघ (ईप्टा) मधुबनी … दिनांक 05-09-2016 को…
सभागार आर० के० कॉलेज मधुबनी में
समय 10 बजे पूर्वाहन से दिन के 03 बजे तक
शिक्षक दिवस समारोह सह मधुबनी नगर सम्मेलन करेगी…
आप सभी जो समाज के प्रति वैज्ञानिक नजरिया रखतें हैं सादर आमंत्रित है…
आप चाहें तो निमन्त्रण पत्रों पर दर्ज फोन नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं। 
निमंत्रण पत्र को बड़ा करके देखने के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें। 

Wednesday, February 05, 2014

लुधियाना को अलविदा कह देगी करमो//समाप्र समारोह आज

दर्शकों से मिला रेकॉर्डतोड़ उत्साह         --Wed, Feb 5, 2014 at 6:26 PM
लुधियाना, 5 फरवरी 2011: ( सतपाल सोनी//पंजाब स्क्रीन) :
लुधियाना वासी अपनी दिनभर की व्यस्तता से फुर्सत में पंजाब की सांस्कृति और देश के कोने कोने से आए कलाकारों की प्रतिभा को करमो कार्यक्रम के जरिए देखने के लिए भारी संख्या में उपस्थित हो रहे हैं। भारत के सूचना एव प्रसारण मंत्रराला द्वारा करवाया जा रहा यह कार्यक्रम अपना सभ्याचार व देश की प्रतिभा को परिचित कराने के अलावा एक भरपूर मनोरंजन का भी साधन सिद्ध हो रहा है जिसमें प्रत्येक कलाकार अपनी-अपनी कला का लोहा मनवा रहा है।
इस कार्यक्रम के डायरैक्टर बलजीत सिंह ने बताया कि लुधियाना वासी अपने कामों से समय निकालकर शाम को टीवी के आगे बैठने की बजाए करमो कार्यक्रम को देखने के लिए न्यू शिमलापुरी के दुशहरा ग्राऊंड में अपने-अपने परिवार सहत पहुंच रहे हैं, जिससे वहां पर काफी चहल पहल हो जाती हैं और लोगों द्वारा इस कार्यक्रम की काफी सराहना की जा रही है। क्योंकि इस प्रोग्राम के जरिए पंजाब के इतिहास को नाटकी रूपांत्रण में दिखाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि लुधियानवीयों के लिए भरपूर अवसर है कि बिना किसे टिक्ट से चलाए जा रहे इस कार्यक्रम के लिए सिरफ आज का दिन ही बचा है इसलिए आज के दिन भी सबको इस कार्यक्रम का पूरा लाभ उठाना चाहिए। 
उन्होंने शहर वासियों एवे अविभावकों से अपील की कि वह अपने और अपने बच्चों के लिए शाम को समय निकालें और उन्हें सांस्कृतिक शिक्षा से जोड़े और उनके मनोरंजन में भी वृद्धि करें।  क्योंकि ऐसे कार्यक्रम के जरिए हमें अपनी सास्कृति और कलाकारों की प्रतिभा देखने को मिलती है, जो छात्र वर्ग के लिए भविष्य में काफी लाभदायक होती है।  2 फरवरी से रोजाना शास को 6:30 बजे से शुरू हुए प्रोग्राम के आखिरी दिन भी उन्होंने लोगों को भारी संख्या में पहुंचने की अपील की।

Monday, May 20, 2013

जिंदगी लाईव के साथ जुड़े कई और लोग

जीत जायेंगे हम:जारी है थैलेसीमिया के साथ मासूमों की जंग 
कार्यक्रम था उन मासूम बच्चों का जिन्हें खून की एक एक बूँद के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। किसी एक आध दिन के लिए नहीं बल्कि जीवन भर। इनमें करीब करीब सभी धर्मों, मजहबों और वर्गों के बच्चे हैं। जिस बात को पीर पैगंबर एक अरसे से कह रहे हैं उसी बात को ये मासूम बच्चे अपनी जान जोखिम में डाल कर साबित कर रहे हैं चीर के देखो खून का रंग है लाल फिर कैसे हो गया कोई हिन्दू कोई मुस्ल्मान। प्रकृति की इस एकता के साथ साथ यह बच्चे प्रकृति की भिन्नता को भी दिखा रहे हैं कि यूं तो सबके खून का रंग लाल ही होता है लेकिन उसका ग्रुप एक नहीं होता। खून और शरीर के इस विज्ञान की जिन गहरी गहरी बातों को लोग पूरी पूरी उम्र नहीं समझ पाते उन बातों को यह छोटे छोटे बच्चे अपने शरीर पर सहन करके भी देख लेते हैं। इन्हें डाक्टरी भाषा के कई कठिन शब्द आसानी से याद हो जाते हैं। हर बार अर्थात एक, दो या तीन हफ्तों के अंतराल के बाद जब इन्हें खून चढाया जाता है तो इंजेक्शन की सूई जिसे देख कर कई बार बड़ों बड़ों की चीख निकल जाती है उसे ये लोग कई कई घंटों तक लगवाये रहते हैं। कितना दर्द होता होगा आप अनुमान नहीं लगा सकते लेकिन ये लोग फिर भी कहते हैं-जिंदगी हर कदम इक नई जंग है----सिर्फ कहते ही नहीं--सचमुच इस जंग को लड़ते भी हैं। एक बहादुर योद्धा की तरह इस जंग की हर चुनौती का सामना भी करते हैं और गीत की अगली पंक्ति गुनगुनाते हैं--जीत जायेंगे हम तू अगर संग है----और जानते हैं इनका वो संग,वो साथी कौन है?- हर वही बच्चा जिसे थैलासीमीय है वह इनका संगी साथी है, इनका दोस्त है--इनका रिश्तेदार है, इनका भाई है--इनकी बहन है---रिश्तों के कई नाम हो सकते हैं पर ये वहां भी निभाते हैं जहाँ इनका कोई कुछ नहीं लगता। रविवार १ मई २ ३ की शाम इन सभी बच्चों को यहाँ साथ लेकर आई थी  जिंदगी लाईव संस्था। केवल १ महीनों में बहुत से थैलासीमिक बच्चों को ढूँढना, उन्हें सहायता प्रदान करना, एकजुट करना और इस मंच तक लाना यह सब किसी भी तरह आसान नहीं था पर जिंदगी लाईव ने फिर भी सब कर दिखाया--और वह भी बिना किसी सरकारी सहायता के। अगर सरकार  साथ होती तो सफलता की रफ़्तार और भी तेज़ हो गई होती। कुल मिला कर यह कार्यक्रम एक नई घोषणा थी--एक नए सफर की शुरुआत थी। औपचारिक आरम्भ हुआ गायत्री मन्त्र से और इसके बाद सबसे पहला गीत उन बच्चों की तरफ से था जिनका हर कदम खतरे में--हर सांस खतरे में---लेकिन फिर भी होठों पर गीत स्वागत करते हैं हम।

इस सुरीले गीत के बाद मंच पर बुलाया गया सी एम सी अस्पताल के डाक्टर जॉन को। उन्होंने एक सलाईड शो की सहायता  से थैलासीमीया की बारीकियों को समझाया। इसका इतिहास--आज और भविष्य पर हो रहे काम। मंच से बताया गया कि डाक्टर जॉन की देख रेख में बी एम टी  अर्थात बॉन मेरो ट्रांसप्लांट के १ केस हुए जिनमें से १ सफल रहे. अर्थात अब उन्हें बार बार खून चढ़वाने की कोई आवश्यकता नहीं रही। इसी तरह फिर कुछ आईटमें प्रस्तुत की इन मासूम बच्चों ने जिन्हें मजबूर या बेबस समझा जाता है।  इन बच्चों ने दिखाया कि हम किसी से कम नहीं। इनके हर कदम में जिंदगी की बात थी, सुर और संगीत से सधे हुए कदम रात के घन अँधेरे में भी रौशनी की बात कर रहे थे--जीत की बात कर रहे थे। दुःख और दर्द से सराबोर होकर भी खुशियों की बात कर रहे थे। जीत के गीत गा रहे थे।
इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस क्षेत्र की जानी मानी शख्सियत डाक्टर प्रवीन सोबती ने भी इस आयोजन के लिए प्रबंधकों को बधाई दी और इसे एक उपलब्धी बताया। उन्होंने बी एम टी के मामले में आ रही कुछ ठोस उलझनों की बात भी की तांकि इस मुद्दे पर भी विचार हो सके।
इस अवसर पर अन्य बहुत से प्रमुख लोगों के अलाव सुख सोहित सिंह भी मौजूद थे. वही सुख सोहित जिन्हें थैलसॆमॆइय था लेकिन उन्होंने इसकी चुनौती को स्वीकार किय…अब वफ़ रक्षा विभाग पुणे में एक महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त हैं। आम जवानों से ज्यादा जोश, दिआम्ग में तेज़ रफ्तारी से आते कुछ वशेष विचार---वह मंच से उतर कर एक एक बच्चे के पास गये। उन्हें उनके निशाने की याद दिलाने---उन्हें यह बताने कि अगर मैं ऐसा कर सकता हूँ तो आप क्यूं नहीं? 
दिलचस्प बात थी कि दो चार घड़ियों के लिए बस शक्ल दिखने वाले नेता लोगों ने भी इस कार्यक्रम के लिए बहुत वक्त निकाला बिलकुल इस तरह जैसे यह उनका अपना कार्यक्रम हो। जाने माने नेता मदनलाल बग्गा काफी सक्रिय दिखे। एम एल ए सिमरजीत सिंह बैंस ने इस नेक काम के लिए ५  हजार रूपये देने की घोषणा की। भारतीय जनता पार्टी पंजाब के प्रधान कमल शर्मा और जिला प्रधान  प्रवीन बांसल कार्यक्रम में आखिर तक बैठे रहे। हर मासूम बच्चे को अपनी आँखों ही आँखों से आशीर्वाद देते हुए, उनके कर्य्क्ल्र्मोन को पूरे ध्यान से देखते हुए, और उनकी इस हिम्मत पर उन्हें शाबाश देते हुए उन्होंने आश्वासन भी दिया कि वह इस मुद्दे की बात को सरकार के दरबार तक भी पहुँचायेंगे। उन्होंने जानेमाने शायर दुशिअंत कुमार की कुछ पंक्तियाँ भी कहीं-
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं;
मेरा मकसद तो है यह सूरत बदलनी चाहिए!
मेरे  सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही;
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए!
अब देखना है कि थैलेसीमिया की विकराल सूरते-हाल को बदलने के लिए जिंदगी लाईव ने जो शुरूआत की है उसे और सफल बनाने के लिए सरकार और समाज के अन्य वर्ग कब आगे आते हैं ! --रेक्टर कथूरिया (सहयोग-अमन कुमार मल्होत्रा) --पंजाब स्क्रीन 

Monday, January 21, 2013

स्तास नामिन और "दस अवतार"


भारतीय संस्कृति और कला से मोहित हैं-स्तास नामिन
                                                           कोलाज व्यास आफ रशिया 
कई दशक पूर्व जाने माने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी शख्सीयत राज कपूर साहिब की एक फिल्म का एक गीत बहुत लोक प्रिय हुआ था 
मेरा जूता है जापानी 
ये पतलून इंगलिस्तानी 
सर पे लाल टोपी रूसी 
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी 
फिल्म श्री420 के इस गीत को लिखा था शैलेन्द्र ने और संगीत दिया था शंकर-जयकिशन ने।  गीत संगीत की दुनिया में एक यादगारी छाप छोड़ने वाले जनाब मुकेश साहिब की आवाज़ में जब गीत  दुनिया के सामने आया तो सबके दिल में उतर गया।  आज भी लोग इसे  गुनगुनाते अक्सर सुने जा सकते हैं। इस गीत की  भावना को इतनी मुद्दत के बाद याद दिलाया है रेडियो रूस ने अपनी एक खबर में। खबर है स्तास नामिन और "दस अवतार" की।  रेडियो रूस के मुताबिक स्तास नामिन-एक प्रसिद्ध रूसी रॉक संगीतकार, कलाकार, फोटोग्राफर और थिएटर तथा फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने भारतीय विषय पर एक नाटक तैयार करने का संकल्प किया है। स्तास नामिन का कहना है कि वह भारतीय संस्कृति और कला से मोहित हैं। स्तास नामिन ने कहा-

आप यह सुकर हैरान होंगे कि मुझे भारत से प्यार विगत शताब्दी के आठवें दशक में तब हुआ जब मैंने "बीटल्स" का संगीत सुना। बाद में मैं प्रामाणिक भारतीय कला के संपर्क में आया। तब हमारे देश में भारत से कई संगीत कलाकार आए थे। भारत के परंपरागत वाद्ययंत्रों की सुंदरता और विशिष्टता ने मेरा मन मोह लिया। मैं उन भारतीय संगीत कलाकारों से मिला और भारतीय वाद्ययंत्रों के बारे में जानकारी हासिल की। सितार का तो में दीवाना हो गया और मैंने संकल्प किया कि भारत जाकर सितार वादन की शिक्षा पाऊँगा।

भारत जाने से पहले स्तास नामिन और उसकी संगीत मंडली ने लगभग आधी दुनिया की यात्राएँ कीं और अपने कई दिलचस्प कार्यक्रम प्रस्तुत किए। उन्होंने अस्सी के दशक में मास्को में आयोजित नशीले पदार्थों के विरुद्ध एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय रॉक संगीत त्योहार में भाग लिया था। उसके बाद उन्होंने विभिन्न देशों के संगीतकारों के साथ मिलकर ब्रिटेन के कई नगरों में अपने संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वह कुछ समय के लिए अमरीका में भी रहे। वहाँ वह संगीत संस्कृति का ज्ञान हासिल करने के प्रयास करते रहे। वहाँ ही उन्होंने सितार ख़रीदा और भारतीय संगीतकारों से सितार वादन सीखना शुरू किया। उसके बाद उन्होंने सितार के साथ अपने संगीत कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू किया और इस साल उन्होंने भारत का दर्शन भी किया। वहाँ उन्होंने भारत के बारे में कुछ दस्तावेज़ी फिल्में बनाईं। उनमें से एक फिल्म वाराणसी और वहाँ आनेवाले तीर्थयात्रियों के बारे में है। स्तास नामिन की यह फिल्म हाल ही में मास्को स्थित भारत के सांस्कृतिक केंद्र में दिखाई गई जो दर्शकों को बहुत पसंद आई। इस फ़िलाम के लिए संगीत भी स्तास नामिन ने स्वयं ही रचा है।

मास्को में स्तास नामिन का अपना एक थीएटर भी है। इस थीएटर में रूसी चैम्बर संगीत, रॉक ओपेरा और संगीत नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसा लगता है कि यह रूसी फिल्म निर्माता और संगीतकार अपने थिएटर को एक नया रंग देना चाहते हैं। स्तास नामिन ने बताया कि अपने थीएटर में एक भारतीय महाकाव्य पर आधारित संगीत नाटक प्रस्तुत करने की उनकी योजना है। उन्होंने कहा-

हमारे नए संगीत नाटक का नाम होगा- "दस अवतार"। यह भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार धारण करने की कहानी होगी जिसका वर्णन प्राचीन पुराणों में किया गया है। यह एक संगीत और नृत्य प्रस्तुति होगी। इसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य होगा। हम रूसी दर्शकों को भारतीय महाकाव्य की विलक्षण झलकियाँ दिखानी चाहते हैं ताकि दर्शक अद्वितीय भारतीय कला और संस्कृति की मूल परंपराओं को अच्छी तरह से समझ सकें।

स्तास नामिन के संगीत नाटक "दस अवतार" में भाग लेने के लिए भारतीय संगीत कलाकारों को आमंत्रित किया गया है और इसमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूसी कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा। उम्मीद है कि यह संगीत नाटक अगले वर्ष के पूर्वार्ध में प्रस्तुत किया जाएगा।(
रेडियो रूस से साभार)
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Friday, January 06, 2012

11 से 20 जनवरी तक होगा अंतर्राष्ट्रीय नाटकों का मंचन

गुरु की नगरी अमृतसर में  14वें नाटक मेले का आयोजन  
         गजिंदर सिंह किंग//अमृतसर//6 जनवरी 2012 

देश के सबसे बड़े एक्टिंग स्कूल नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एन.एस.डी.) के तत्वाधान में गुरु नगरी अमृतसर में 11 जनवरी से 20 जनवरी के बीच 14वें थियेटर फेस्टिवल के दौरान अफ्रीका, पोलैंड, जापान, इटली, पाकिस्तान से भी कलाकार नाटकों का मंचन करेंगे, भारत रंग महोत्सव के दौरान 19 नाटकों का मंचन होगा.
        देश के सबसे बड़े एक्टिंग स्कूल नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एन,एस,डी) के तत्वाधान में गुरु नगरी अमृतसर में अफ्रीका, पोलैंड, जापान, इटली, पाकिस्तान के कलाकार 14वें थियेटर फेस्टिवल के दौरान नाटकों का मंचन 11 जनवरी से 20 जनवरी के बीच विरसा विहार व पंजाब नाटशाला में करेंगे, जब कि देश के कई नामी-गिरामी कलाकार नाटक महोत्सव में हिस्सा लेंगे, इस महोत्सव में मुबंई, दिल्ली, लखनऊ, चेन्नई, इंफाल, कोलकाता इत्यादि शहरों की प्रमुख नाटक हस्तियां भाग लेंगी, इन नाटकों का मंचन शाम पांच बजे विरसा विहार व शाम सात बजे से पंजाब नाटशाला में होगा, रोजाना दो नाटकों का मंचन होगा, यह जानकारी प्रेस वार्ता दौरान देश के सबसे बड़े एक्टिंग स्कूल नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एन.एस.डी.) की डायरेक्टर डा. अनुराधा कपूर व सुरेश भारद्वाज के अतिरिक्त केवल धालीवाल (नाटक कार) ने दी. डा. अनुराधा कपूर ने बताया, कि एन.एस.डी. का यह 14वां अंतरराष्ट्रीय थियेटर महोत्सव है, जिसमें कई देशों के कलाकार हिस्सा ले रहे हैं, यह नाटक पहले दिल्ली में होंगे उसके बाद 11 जनवरी से 20 जनवरी के बीच इन नाटकों का मंचन विरसा विहार व पंजाब नाटशाला में किया जाएगा. इस महोत्सव में अफ्रीका, पोलैंड, जापान, इटली, पाकिस्तान से भी कलाकार नाटकों का मंचन करेंगे, जबकि देश के कई नामी-गिरामी कलाकार नाटक महोत्सव में हिस्सा लेंगे, इस महोत्सव में मुबंई, दिल्ली, लखनऊ, चेन्नई, इंफाल, कोलकाता आदि शहरों की प्रमुख नाटक हस्तियां हिस्सा लेंगी.