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Sunday, August 11, 2013

राष्ट्रपति के आदेश का पालन हो

Sun, Aug 11, 2013 at 4:09 PM
उच्चतम न्यायालय में दी जाये हिन्दी में भी कार्य करने की अनुमति 
नई दिल्ली मे हुआ अधिवक्ता परिषद का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन
नई दिल्ली: 11 अगस्त 2013 (राजीव गुप्ता*) विधि शिक्षा और न्याय क्षेत्र में भारतीय भाषाओं की उपयोगिता एवं आवश्यकताओं को रेखांकित करने के उद्देश्य से शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने नई दिल्ली मे दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया.  पहले दिन के इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी. एस. सिरपुरकर ने कहा कि देश मे भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिये. उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोगों को भी एक – दूसरे की भाषा का न केवल सम्मान करना चाहिये अपितु उसे अंगीकार भी करना चाहिये. इसी तरह संस्कृत भाषी कवियों व लेखकों को अपनी बात सरल भाषा में ही व्यक्त करना चाहिये. दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रतियोगिता आयोग के सदस्य एस.एन. धींगरा ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थिति में भाषा को यदि व्यवसाय और रोजगार से जोड दिया जाय तो भाषा का विकास और इसकी उपयोगिता नि:सन्देह संभव है.   अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता डी. भरत कुमार ने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपना वाद और बहस अपनी मातृभाषा में करे. अपनी भाषा में न्याय की गुहार लगाना अनुच्छेद 19 का ही भाग है, जो प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. दूसरे दिन के कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और भारत सरकार के पूर्व सचिव बृज किशोर शर्मा ने कहा कि हिन्दी भारत की राष्ट्र्भाषा है और इसमें किसी भी प्रकार कभी भी कोई मतांतर नही रहा. जो मतांतर रहा वह केवल अंको के प्रयोग को लेकर रहा और कालंतर में निर्णय द्वारा आंग्ल लिपि के अंतर्राष्ट्रीय मानको को स्वीकृत किया गया और वही अनुच्छेद 343 में स्थान पाया. किसी भी अधिनियम के राजभाषा में अनुवाद को अधिकृत अधिनियम मानने हेतु संसद में 1972 में ही अधिनियम पारित कर दिया था, तभी से अधिकृत अनुवाद किसी भी राज्य की राजभाषा में सन्दर्भ हेतु प्रयोग किये जा सकते है. राजभाषा में विधि – पुस्तकों के हेतु उन्होनें कहा कि दंड प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, संपत्ति हस्तांतरण आदि की पुस्तकें हिन्दी एवं सभी राजभाषाओं में उपलब्ध हैं लेकिन संविधान पर हिन्दी में टीका 1950 से लगातार केवल “बसु” की ही उपलब्ध हैं क्योंकि संवैधानिक विषय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में विमर्श किये जाते है जहाँ की अधिकृत भाषा अंग्रेजी है. विधि आयोग के सदस्य बी.एन.त्रिपाठी ने कहा कि भाषा का स्वरूप सर्वप्रथम “बोली” से होता है तथा फिर शब्द व लिपि जुडती है. ऐसे में आज हिन्दी एवं राजभाषाओं को सही शब्दों से समृद्ध करना एक सतत प्रयास एवं प्रक्रिया है जिसके लिये राजभाषाओं में विधि शब्द कोषों की नितांत आवश्यकता है. साथ ही वें स्वयं सरकारी स्तर पर मातृभाषा के विषय को आगे बढायेंगे. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के मीडिया प्रभारी राजीव गुप्ता ने बताया कि इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देश के अनेक राज्यों के उच्च-न्यायालयों के अधिवक्ता इस दो दिवसीय कार्यक्रम में भाग लिया.

समापन समारोह में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने सभा को बताया कि इस दो दिवसीय कार्यक्रम में निम्नलिखित निर्णय लिये गयें हैं :

विधि और न्याय के क्षेत्र में भारतीय के राष्ट्रीय परिसंवाद में में सर्वसम्मति से केन्द्र सरकार से मांग की गई कि -

1.      अंग्रेजी के प्रयोग पर रोक लगाकर केन्द्र में  हिन्दी और राज्यों में उनकी राजभाषा में कारगर कदम उठाये जाय.

2.      मध्य प्रदेश, रजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार (इनके विभाजन स्वरूप उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ) में उच्च न्यायालयों मे हिन्दी के प्रयोग की अनुमति है. इसी प्रकार देश के सभी अन्य राज्यों में उनके उच्च न्यायालयों के कामकाज की भाषा राजभाषा बनायी जाय.

3.      राष्ट्रपति के आदेशानुसार उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी में कार्य करने की भी अनुमति दी जाय.

4.      देश के सभी राज्यों की विधि संबंधी सभी परीक्षाओं तथा न्यायिक सेवा का माध्यम अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और प्रादेशिक भाषाएँ बनायी जाय.

5.      राष्ट्रीय विधि संस्थानो एवं विश्वविद्यालयों में विधि पाठयक्रमों का माध्यम हिन्दी और भारतीय भाषाएँ हो.

6.      सभी न्यायालयों में सभी कार्य राजभाषाओं में हो.

7.      सभी विधान सभाओं में विधि बनाने का कार्य मूलत: राज्य की राजभाषा में हो.

8.      सभी राज्यों में राजभाषा कार्यांवयन समिति का गठन हों.

*राजीव गुप्ता जाने माने युवा पत्रकार भी हैं और इस संगठन/संस्थान के मीडिया प्रभारी भी--उनकी रचनाएं अक्सर पंजाब स्क्रीन और अन्य सहयोगी ऑनलाईन पत्रिकायों में भी अक्सर छपती रहती हैं फोन पर बात करने के लिए उनका सम्पर्क नम्बर है  09811558925

उद्देश्य:भारतीय भाषाओं की उपयोगिता एवं आवश्यकताओं को रेखांकित करना 

Thursday, July 18, 2013

आपदा-उपरांत श्री बद्रीनाथ–यात्रा// राजीव गुप्ता

 Tue, Jul 16, 2013 at 2:52 PM
उस दिन मन्दिर के प्रांगण में मात्र 10-20 लोग ही नजर आ रहे थे
जून मास के मध्य उत्तराखंड में आयी प्राकृतिक आपदा के पश्चात 1 जुलाई को देहरादून से मैंने श्री बद्रीनाथ जाने का कठोर निर्णय लिया. येन-केन प्रकारेण मैं श्री बद्रीनाथ पहुँचने में कामयाब हो गया. तीन दिन और दो रात मै श्री बद्रीनाथ धाम में ही रहा. इस दौरान श्री बद्रीनाथ धाम के दर्शन के साथ-साथ वहाँ के स्थानीय लोगो सहित प्रशासन, सेना, व आई.टी.बी.पी के लोगों से भी मिलना हुआ और उस दैवीय-आपदा के बारे मे चर्चा हुई. एक दिन भगवान बद्री विशाल के धर्माधिकारी श्री भुवन उनियाल मुझे घुमाने ऋषिगंगा की तरफ ले गये. रास्ते में मैने देखा कि कुछ लोग ऋषिगंगा के किनारे ही घर बनाने में लगे हैं. पूछने पर पता चला कि उस दैवीय-आपदा के चलते ये घर बह गये थे. बिल्डिग बायलाज की धज्जियाँ उडाकर बिल्कुल नदी के किनारे उन्हे घर बनाता हुआ देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया. क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा था कि 10 दिन पहले आयी प्राकृतिक आपदा से भी लोगों ने कोई सबक नही लिया. हलाँकि मैने उन लोगों से बात करने की कोशिश किया था पर सफल नही हो पाया. फिर मैं अपने मन में ही बुदबुदाते हुए आगे चला गया. सायंकाल को श्री बद्रीनाथ जी की आरति के नियत समय से कुछ पहले मैं मन्दिर के प्रांगण में पहुँच गया. भारत के करोडों लोग अपनी श्रद्धा के चलते भगवान बद्रीविशाल के दर्शन हेतु आते है. भगवान बद्रीविशाल के कपाट वर्ष में छ: महीने के लिये ही खुलते है. परिणामत: इन दिनों श्री बद्री विशाल के दर्शन हेतु बडी संख्या मे लोग आते है. परंतु उस दिन मुझे मन्दिर के प्रांगण में मात्र 10-20 लोग ही नजर आ रहे थे.
भगवान बद्री विशाल के दर्शन-पश्चात मै वहाँ उपस्थित सहायक-रावल के समीप बैठ गया और उनसे तीन दिन की दैवीय-आपदा पर चर्चा की. उन्होने बताया कि उस दिन मन्दिर के प्रांगण मे ही लोग आ गये थे और भगवान बद्री विशाल से प्रार्थना कर रहे थे. सभी लोग डरे और सहमे हुए थे. भगवान बद्री विशाल की कृपा से तो यहाँ जान-माल की क्षति अधिक नही हुई परंतु उस दैवीय-आपदा के चलते यात्रा बिल्कुल बन्द हो गयी है. भगवान बद्री विशाल की यात्रा पर ही यहाँ की अर्थव्यस्था टिकी हुई है. यात्रा बन्द है तो सब कुछ थम-सा गया है. यहाँ की दुकानों मे ताले लगे हुए है और जो दुकाने खुली भी हैं उन दुकानों पर ग्राहक कोई नही है. परिणामत: यहाँ के लोग बेरोजगार हो गये है. कभी चहल-पहल का केन्द्र रहने वाले पंच-शिला, तप्तकुंड, श्री आदिकेदारेश्वर मन्दिर सहित सब बिल्कुल वीरान पडे थे. बाज़ारों का सूनापन अपना अस्तित्व खोने की कगार पर था. बद्रीविशाल का बस व टैक्सी स्टैंड तो गाडियों से भरे थे पर उन जंग खाये वाहनों के देखकर लग रहा था कि वे सभी वाहन अपने वाहन चालकों की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कैसेटो मे बजती हुई भजनों से गुंजायमान सडके बिल्कुल शांत थी. अलकनन्दा अपनी तेज वेग के चलते कल-कल की आवाज से बद्रीविशाल की प्रांगण मे पसरी शांति को भंग करने की प्रयास कर रही थी. बद्रीविशाल में चारों ओर पसरे सन्नाटे के चलते समय थम-सा गया था. एक तरफ काले-काले मेघ अपनी घनघोर गर्जना से वहाँ बचे हुए लोगों को भयभीत कर रहे थे तो दूसरी तरफ बादलों के मध्य चमकती हुई बिजली अपनी इठलाहट भरी चकाचौंध से हमारी बेबसी का हमें अहसास करा रही थी. बादलों और घनघोर कुहरे के गठबन्धन ने सूर्य को छिपा कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे. प्रकृति के इस रौद्ररूप से डरकर मैं भगवान बद्रीविशाल के प्रांगण मे चला गया. वहाँ जाकर मैने वहाँ के सहायक पुजारी जी से भगवान आदिकेदारेश्वर के बारें में जानना चाहा. वहाँ के सहायक पुजारी जी ने मुझे भगवान आदिकेदारेश्वर के बारे एक कहानी सुनाई कि एक बार भगवान विष्णु के  मन को भगवान शिव-पार्वती का यह स्थान भा गया. उस स्थान को हथियाने हेतु भगवान विष्णु ने एक छल किया. लीलाढूंगी के पास एक अबोध बच्चे का रूप बनाकर जोर – जोर से रोने लगे. भोले बाबा माँ पार्वती के संग कही जा रहे थे, रास्ते में माँ पार्वती ने भोले बाबा से उस रोते हुए बच्चे के बारे में कहा पर भोले बाबा ने उस रोते हुए बच्चे की तरफ ध्यान न देने की बात कही परंतु माँ का हृदय द्रवित हो उठा और वह भोले बाबा से ज़िदकर उस रोते हुए अबोध बच्चे की तरफ गयी और उस बच्चे को गोद में उठाकर अपने आवास (वर्तमान समय का श्री बद्रीनाथ धाम) मे ले जाकर सुला कर भोले बाबा के साथ घूमने के लिये चली गयी. वापस आकर देखा तो उस स्थान के कक्ष का कमरा अन्दर से बन्द मिला. भोले बाबा भगवान विष्णु के इस छल को समझ चुके थे. परिणामत: माँ पार्वती सहित उस स्थान को छोडकर वर्तमान समय के श्री केदारनाथ जाकर अपनी साधना का स्थान बना लिया. तत्पश्चात भगवान बद्रीविशाल की आरती शुरू हो गयी. आरती-पश्चात मैने अगले दिन भारत के अंतिम गाँव माणा जाने का निश्चय किया.  
माणा गाँव
माणा गाँव के पूर्व प्रधान लक्ष्मण सिँह राउत 16 जून को हुई तबाही के मंजर को आज भी याद करके सिहर उठते है. अलकनन्दा के उफान को देखकर एक बार तो उन्हे लगा कि शायद ही अब उनका गाँव बचे, गाँव के सभी लोग अपने-अपने घरों से निकल कर उपर की तरफ भाग कर अपनी-अपनी जान बचाई थी, व्यास गुफा और गणेश गुफा में सैंकडों लोग रात-दिन रूके रहे. तीन दिन बाद जब बारिश कम हुई थी तब कही वो लोग नीचे अपने-अपने घरों में उतरे. माणा गाँव के बच जाने की घटना को श्री सिँह ईश्वरीय चमत्कार ही मानते है. गाँव के सभी लोग तीन बाद अपने-अपने घर वापस तो लौट आये परंतु अब उनका संपर्क केशव प्रयाग के दूसरी तरफ से कट गया था. ध्यान देने योग्य है कि केशव प्रयाग के एक तरफ माणा गाँव है और दूसरी तरफ गाँव वालो के खेत और पालतू पशु रहते हैं. तीन दिनों की मूसलाधार बारिश के चलते नदी के बढे हुए जलस्तर से दोनों ओर को जोडने वाला पुल बह गया था. इसलिये उनका संपर्क कट गया था. यही हालत बद्रीनाथ से जोडने वाले पुल की भी थी. उन तीन दिनों मे इतनी अधिक बारिश हुई, जिससे भू-स्खलन की अधिकता से माणा गाँव को बद्रीनाथ से जोडने वाला पुल भी टूट गया था. स्थानीय लोगों की मदद से उन्होने येन-केन प्रकारेण पैदल आने-जाने हेतु संकरा रास्ता बना लिया था जिसके चलते उन गाँव वालों को तीन दिन बाद बद्रीनाथ के एक गैरसरकारी संस्था के स्थानीय लोगों द्वारा दिया गया खाना नसीब हुआ. उस गैर सरकारी संस्था के बारें में मेरे पूछने पर उन्होने बताया कि उस संस्था के एक आदमी श्री अशोक को मैं जानता हूँ. वो यही बद्रीनाथ धाम में रहते है और वो किसी संघ-परिवार से जुडे हैं, उन्होने यहाँ के सभी पुरोहितों को इकटठा कर वहाँ फसे लगभग 12,500 तीर्थयात्रियों को भोजन कराने की योजना की थी, उनका साथ श्री बद्रीनाथ धाम के सभी पुरोहितों ने भी दिया. श्री बद्रीनाथ धाम में धर्माधिकारी के पद पर नियुक्त श्री भुवन उनियाल ने वहाँ के स्थानीयों लोगो की मदद से वहाँ फँसे तीर्थयात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा नही होने दी. आगे उन्होने हमे बताया कि आपदा के 16 दिन बाद प्रशासन द्वारा 200 परिवार वाले इस गाँव के मात्र 25 परिवारों को राशन दिया गया. जिसमें 5 किलो चावल, 5 किलो आटा और 2 लीटर केरोसिन तेल था. आपदा – उपरांत कई दिनों तक प्रशासन समेत इस क्षेत्र के कांग्रेस पार्टी के विधायक राजू भंडारी कभी नही आयें. बर्फ पडने के समय इस गाँव के लोग गोपेश्वर चले जाते हैं. साथ ही इन गाँव वालों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशुपालन है. ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखंड - स्थित यह भारत का अंतिम गाँव हैं. इसमें लगभग 200 परिवार व लगभग 1000 लोग रहते हैं.  

माणा गाँव से वापस आकर श्री बद्रीनाथ में तैनात पुलिस उप अधीक्षक सुजीत पवार से मिला और उस गाँव के बारें में चर्चा की. श्री पवार को मैंने बताया कि यदि शासन-प्रशासन समय पर नही सचेत हुआ तो भविष्य में माणा गाँव का अस्तित्व मिट सकता है क्योंकि सरस्वती नदी ने अपना रास्ता बदलना शूरू कर दिया है. पहले वह खेतों के तरफ से बहती थी पर अब नदी में इतना अधिक गाद इकट्ठा हो गया है कि उसने अपना रास्ता बदल कर माणा गाँव की तरफ से बहने लगी है. चूँकि नदी का बहाव बहुत तेज है इसलिये वह गाँव के नीचे की मिट्टी को काटना शूरू कर दिया हैं. उन्हे एक सुझाव देते हुए मैने उनसे निवेदन किया कि यदि सरस्वती नदी के गाद को निकालकर उस गाद से ही गाँव की तरफ एक नदी-तटबंध बना दिया जाय तो शायद माणा गाँव बच जायेगा. सरकार द्वारा आपदा-उपरांत राहत-बचाव के लिये खर्च की जाने वाली राशि को अगर आपदा-पूर्व ही उस राशि को खर्चकर अगर नदी-तटबंध बना दिया जाय तो वहाँ के स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल जायेगा और उस गाँव के सुरक्षा भी हो सकेगी. मेरे इस सुझाव का समर्थन कर नीतिगत फैसला होने की बात कहते हुए उन्होने प्रशासन से चर्चा करने बात कही. साथ ही हमें बताया कि नदी से गाद निकालने हेतु परम्परागत तरीके पर नीतियाँ बहुत कठिन है, इसलिये स्थानीय लोग नदी से गाद नही निकाल पाते है. परिणामत: कई वर्षों में नदी में गाद की अधिकता से नदी अपना रास्ता बदल लेती हैं.
सेना-प्रशासन
उत्तराखंड में आयी प्राकृतिक आपदा से हुई तबाही के चलते राहत-बचाव के कार्य में आई.टी.बी.पी के जवानों की जितनी अधिक तारीफ की जाय वह कम है. आई.टी.बी.पी के एक अफसर श्री राजेश नैंनवाल ने मुझे बताया कि उनके नेतृत्व में आई.टी.बी.पी के दल ने गौरीकुंड जाने का तय किया परंतु उनके दल को वहाँ ले जाने हेतु कोई भी हेलीकाप्टर का पायलट तैयार नही हो रहा था. बहुत प्रयास करने पर वायुसेना के एक पायलट ने उनके दल को सशर्त गौरीकुंड ले जाने के लिये तैयार हुआ. श्री नैनवाल ने वायुसेना के उस पायलट के बात को मान लिया. वह भीड डरी-सहमी और भूख से बौखला चुकी थी इसलिये वायुसेना के उस पायलट को डर था कि कहीं उस भीड के कुछ लोग हेलीकाप्टर को नीचे से पकडकर लटक न जाय. परंतु उस पायलट की सूझबूझ और उसके दिशा- निर्देशानुसार गौरीकुंड में रस्सी के सहारे आई.टी.बी.पी के जवान नीचे उतरकर वहाँ मौज़ूद भीड को काबू में करने हेतु प्रयास शुरू किया. वायुसेना का वह हेलीकाप्टर आई.टी.बी.पी के जवानो को गौरीकुंड मे उतारकर चला गया. श्री नैनवाल ने बताया कि वह मंजर रूह कँपा देने वाला बडा भयावह था. चारों तरफ लाशें ही लाशें बिखरी हुई थी. लोग अपनो के लिये बिलखते हुए खुद अपने जीने की आस छोड चुके थे. परंतु ज्योहि उन लोगों ने आई.टी.बी.पी के जवानों को अपने मध्य पाया उन्हे कुछ जीने का हौसला मिला. आई.टी.बी.पी के जवानों के समझाने-बुझाने पर वहाँ उपस्थित लोगों ने आई.टी.बी.पी  की के टीम के साथ मिलकर उस स्थान पर एक हेलीपैड बनाने का काम शुरू किया और एक टीम पैदल-रास्ता बनाने में जुट गयी. उस भीड के अथक सहयोग से आई.टी.बी.पी के जवानों को हेलीपैड और पैदल रास्ता बनाने में सफलता मिल गयी. तत्पश्चात उस भीड से संपर्क स्थापित हो पाया और उस भीड को गौरीकुंड से निकालने का काम शुरू हुआ. सेना-प्रशासन का आपस में समन्वय की कमी के चलते राहत-बचाव कार्य मे बहुत दिक्कत आ रही थी परंतु वहाँ फँसे हुए लोगो के आत्मबल और संयम ने श्री नैनवाल की टीम को महत्वपूर्ण योगदान दिया. नम आँखों से श्री नैनवाल ने मुझे बताया कि इस प्राकृतिक-आपदा से राह्त-बचाव हेतु जुटे वायुसेना के एक हेलीकाप्टर के दुर्घटनाग्रस्त में आई.टी.बी.पी के कुछ जवान भी शहीद हो गये जो उनके साथ गौरीकुंड जाने वाले दल में शामिल थे.

उसके बाद श्री सुजीत पवार जी ने मुझे बताया कि पहाडी क्षेत्र होने के बावजूद वर्तमान समय में भी प्रशासन के पास मात्र एक-दो हेलीकाप्टर ही है. जिसके चलते राहत-बचाव का कार्य समय पर पुरजोर तरीके से करने में बहुत दिक्कत आयी. आये दिन लूट्पाट की जो खबरे मिल रही है उसका प्रमुख कारण यह है कि सेना ने पुलिस-प्रशासन को उस क्षेत्र में जाने ही नही दे रही जिसके चलते लूट्पाट की ये खबरे आ रही है. लूट्पाट को रोकना तो पुलिस-प्रशासन का काम है पर सेना ने उन्हे वहाँ जाने नही दिया इसलिये पुलिस-प्रशासन असहाय है और मौन साधे हुए है. परंतु पुलिस-प्रशासन अपने तरीके से इस संकट की घडी में देशवासियों के साथ खडा रहेगा.        
बी.आर.ओ.
सडक-रास्ते से बद्रीनाथ जाते हुए रूद्रप्रयाग से ही मुझे भू-स्खलन दिखने लगे थे. परिणामत: सडके पूर्णत: क्षतिग्रस्त हो चुकी थी और दोनो तरफ का यातायात ठप था. बी.आर.ओ के जवान अपनी जान ज़ोखिम में डालकर सडक-मार्ग को त्वरित खोलने का प्रयास कर रहे थे. येन-केन-प्रकारेण भू-स्खलन से ध्वस्त हुई सडकों को पारकर  मैं जोशीमठ और फिर बद्रीनाथ पहुँच गया था. बद्रीनाथ धाम से 44 किमी. नीचे जोशीमठ तक वापस मैंने सडक-मार्ग से आने का तय किया. हनुमान चट्टी तक तो भू-स्खलनों से अवरुद्ध सडकों को पारकर मैं पहुँच गया परंतु उसके आगे जाने हेतु अब सडक ही नही थी. आगे का रास्ता पहाडों पर चढकर पार करना था. रास्ते में मिलते लोगो को रास्ता पार करवाते, गिरते-पडते, फिसलते हुए मै लामबगढ के समीप पहुँच गया. सामने अलकनन्दा का रौद्ररूप देखकर मैं भयभीत हो गया था. अलकनन्दा पर लोहे का पुल बना था पर अलकनन्दा के हिलोरों के चलते मै उस पुल पर से भी अलकनन्दा को पार नही कर पा रहा था. उस तरफ खडे बी.आर.ओ के जवान मेरा हौसला बढाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. अंतत: बी.आर.ओ का एक जवान मुझे लेने इस तरफ आया तब जाकर मैने चैन की साँस ली. उस जवान का हाथ पकडे मैने अलकनन्दा पर बने पुल से जाने लगा. ज्योहि मैं पुल के बीचोबीच पहुँचा सहसा मेरी नजर उफनती हुई अलकनन्दा पर पडी और मैं बेसुध – सा हो गया. उस जवान ने मुझे अपनी गोद में उठाकर अलकनन्दा को पार करवा दिया और अपने एक अधिकारी श्री वेल राज टी के पास मुझे ले गया. श्री राज टी ने मुझे पानी पिलाया तब जाकर मेरी जान में जान आयी. थोडी देर पश्चात मैने श्री राज टी सी बात करना आरंभ किया. उन्होने अलकनन्दा पर बने लोहे के उस पुल के बारें बताया कि चंडीगढ से इस पुल को मंगाकर गोविन्दघाट तक पहुँचा दिया गया था. उसके बाद मात्र दो दिनों के भीतर बी.आर.ओ के जवानो ने अपने कंधे पार लादकर इस भारीभरकम लोहे के कल-पुर्जों को जोडकर बना दिया गया. उन्होने मुझे बताया कि इस पुल के बनने से पहले सेना अलकनन्दा के दूसरी तरफ फँसे हुए लोगों को रस्सी के सहारे एक-एक लोगों को खीचकर निकाल रही थी. परंतु इस पुल के निर्मित हो जाने से लगभग 5000 से अधिक लोगों को अलकनन्दा पार करवाया गया. उन सबसे विदा लेकर उसके बाद मैं आगे की तरफ बढने लगा. रास्ते में मैने देखा कि जे.पी का एक पन-बिजली सयंत्र पूरा तबाह हो गया था, जिससे उस कंपनी के करोडों रूपये का नुकसान हो गया था. तत्पश्चात मैं लामबगढ गाँव, जो कि पूरी तरह तबाह हो गया था, पहुँचा. घंटो पैदल चलते हुए पीपलकोटि पहुँचा पर अब गोविन्द घाट जाने के लिये फिर से पहाडी चढना पडा. थकान के मारे मेरी टांग़े अब नही उठ रही थी कि सहसा मैने कुछ दूर पर देखा कि कुछ महिलायें रस्सी से बाँधे पीठ पर एक – एक बोरा लादे आ रही थी. उनकी हिम्मत को देखकर मेरे अन्दर  एक ऊर्जा का संचार हुआ और मैने तेज गति से अपने कदम आगे की तरफ बढा दिये. कुछ देर बाद गोविन्द घाट का सडक पर गडा हुआ एक साईन बोर्ड देखकर मैने राहत की साँस ली. थोडी दूर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बैनर लगे एक ट्रक को देखा. कुछ लोग उस ट्रक से कुछ समान उतार रहे थे. मुझे समझते हुए देर न लगी कि बोरा लादे जिन महिलाओं को मैने रास्ते में देखा था वे इस ट्रक से राहत-सामग्री ले जा रही थी. जब राहत-सामग्री उस ट्रक से उतर गया और गाँव वालों में बँट गया तो उस ट्रक-ड्राईवर से मैने जोशीमठ तक ले जाने के लिये निवेदन किया. उस भले मानुष ने मेरा निवेदन स्वीकार कर लिया और आगे की तरफ जगह न होने के कारण मुझे ट्रक के पिछले हिस्से पर बैठने के लिये कहा. मरता क्या न करता, और मै उस ट्रक से जोशीमठ तक ठिठुरते हुए पहुँच गया.
विकास की अंधी दौड
उत्तराखंड घूमने के पश्चात मुझे लगा कि पिछले दिनों उत्तराखंड में जो प्राकृतिक आपदा आयी उसके लिये मनुष्य और उसकी अति मह्त्वकांक्षा ही जिम्मेदार है. कारण बहुत साफ है कि हमने अपनी निजी सुख-सुविधा और विलासिता के चलते प्रकृति का बडे पैमाने पर दोहन शूरू कर दिया है. जोशीमठ के एक उदाहरण से हम समझने का प्रयास करते है. जोशीमठ के ऊपर औली नामक एक जगह है. वहाँ पर एनटीपीसी लगभग 520 मेगावाट का एक पन-बिजली संयंत्र लगा रही है. परिणामत: औली से लेकर जोशीमठ तक के नीचे से होते हुए विष्णुगाड-धौली परियोजना के तहत एक सुरंग का निर्माण हो रहा है. इसके फलस्वरूप घनी आबादी वाले जोशीमठ का अस्तित्व ही खतरे मे पडने जा रहा है. लोगो के घरों मे दरारें पड चुकी है जिसके चलते जब भी तेज बारिश होती है लोग डरकर सहम जाते है. वहाँ के लोगों ने कई बार विष्णुगाड-धौली परियोजना के विरोध में असफल धरना-प्रदर्शन भी किया परंतु उनकी आवाज़ शासन-प्रशासन के कानों तक नही पहुँची. इसी प्रकार पूरे उत्तराखंड में ही नदियों के पानी को सुरंग में डालकर व पहाडों को खोदकर पन-बिजली – उत्पादन हेतु बिजली के अनेक संयंत्र लगाये जा रहें है. जिससे उत्तराखंड में पारिस्थितिकीय संकट खडा हो गया है. देवप्रयाग में भगीरथी और अलकनन्दा के संगम से गंगा बनती है. परंतु गंगा का हरिद्वार तक नैसर्गिक प्रवाह अब देखना बहुत मुश्किल-सा हो गया है. गंगोत्री से निकल रही भागीरथी नदी के प्रवाह को धरासू तक एक सुरंग में डालने से धरती पर अब वह लुप्त-सी हो गयी है. इस क्षेत्र में लगभग 16 पन-बिजली परियोजनायें बन रही है. कमोबेश यही हालत अलकनन्दा का भी है. परिणामत: हरिद्वार तक गंगा एक नाले की शक्ल में हमे दिखायी पडती है. सरकार की कुमाऊँ के बागेश्वर जिले में भी सरयू नदी को सुरंग में डालने की योजना लगभग पूरी हो चुकी है. एक आँकडे के अनुसार उत्तराखंड जैसे छोटे से राज्य में छोटी-बडी मिलाकर लगभग 558 पन-बिजली परियोजनायें प्रस्तावित हैं. अगर इन सभी परियोजनाओं पर काम शुरू हो गया तो वहाँ के लोगों का बडे पैमाने पर विस्थापन होना तय है, पर वे लोग विस्थापित होकर कहाँ जायेंगे, इसका उत्तर किसी के पास नही है. हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि उत्तराखंड में इतने अधिक बिजली संयंत्र बनने के बाद भी बिजली और पानी का संकट जस का तस ही बना हुआ है. विश्व के कई पर्यावरणविद सरकार को कई बार सचेत कर चुके है कि हिमालय का पर्यावरण बहुत अधिक दबाव नही झेल सकता परंतु सरकार के कानों पर जूँ तक नही रेंगती. पन-बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ अल्मोडा और पिथौरागढ में मैग्नेसाईट व खडिया मिट्टी का भी खनन अवैज्ञानिक तरीके से बखूबी हो रहा है. जिसके चलते हिमालय खोखला होता जा रहा है परिणामत: भू-स्खलन में लगातार वृद्धि हो रही है. नैनीताल में पेडों की अंधाधुंध कटाई के चलते मिट्टी का कटाव बढता ही जा रहा है. ऐसी विषम परिस्थिति में सरकार को विकास हेतु एक वैकल्पिक ठोस नीति चाहिये जो पारिस्थिति-अनकूल हो. ग्लोबलवार्मिंग के चलते भी हिमालय के तापमान मे तेजी से परिवर्तन हो रहा है, जिसे भारत को विश्व समुदाय के समक्ष रखना चाहिये. ग्लोबलवार्मिंग के चलते हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे है. राजेन्द्र पचौरी-रिपोर्ट और पर्यावरण को अब आपस में उलझने की बजाय अब कुछ ठोस कदम उठाने चाहिये. मनुष्यों के स्वार्थों के चलते कहीं ऐसा न हो कि उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा ही उसके लिये एक अभिशाप बन जाय.

करोडों भारतीयों की आस्था को ध्यान में रखते हुए सरकार को केदारनाथ और बद्रीनाथ में आयी आपदा से सबक लेना चाहिये. देश की एकता और अखंडता के प्रतीक चार धामों (बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारका और जगन्नाथ पुरी) की रक्षा हेतु सरकार को उनकी जलवायु और पर्यावरण को ध्यान मे रखते हुए ठोस कदम उठाने चाहिये. देश को चारों धामों को सुरक्षा और व्यवस्था की लिहाज़ से केन्द्र-स्तर पर एक समिति बनाकर चारों धामो के लिये एक-एक उपसमिति का गठन करना चाहिये. इन उपसमितियों को मन्दिर के चाढावों का खर्च करने की स्वतंत्रता होनी चाहिये. साथ ही उन उपसमितियों का गठन सत्ता-प्रभाव से मुक्त होना चाहिये. इन उपसमितियों के सदस्यों का चुनाव देश के संत-समाज से हो जिसमें कि कुछ उस क्षेत्र के जानकार हों, कुछ स्थानीय हो, कुछ धर्माचार्य हो, कुछ पर्यावरण विशेषज्ञ हो, कुछ उद्योगपति हो, कुछ शिक्षाविद व सबसे कम प्रतिशत में प्रशासन समेत देश की सज्जन शक्ति को शामिल किया जाना चाहिये.         
संघ-परिवार
विश्व हिन्दू परिषद, इन्द्रप्रस्थ मीडिया की तरफ से दिल्ली से मैं देहरादून पहुँचा था. देश के वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ व विश्व हिन्दू परिषद के श्री चम्पत राय के सह्योग से मैने एक ज्ञापन तैयार कर उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष समेत केदारनाथ-बद्रीनाथ मन्दिर कमेटी को दिया. उस ज्ञापन में कुल पाँच मांगे रखी गई थी : श्री बद्रीनाथ धाम तथा पवित्र ज्योतिर्लिंग श्री केदारनाथ की मन्दिर-समिति “बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति” से उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल निवेदन करें कि उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के चलते तबाह हुए केदारनाथ के आस-पास के गाँवों को गोद लेकर उनके पुनर्वास की समुचित व्यवस्था में अपना अमूल्य यथायोग्य सहयोग करे, उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा से प्रभावित गाँवों को पूरे वर्ष भर उनकी बुनियादी सुविधाओं (रोटी,कपडा,मकान,शिक्षा और स्वास्थ्य) की चिंता सरकार करें, उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा से प्रभावित गाँवों के निवासियों को यथाशीघ्र रोजगार देने की व्यवस्था सरकार सुनिश्चित करें, इस त्रासदी से सबक लेते हुए सरकार यह सुनिश्चित करें कि विकास के नाम पर प्रकृति से छेडछाड कम से कम हो. साथ ही तीर्थाटन को पर्यटन बनाने से रोका जाय, “श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति” के वर्तमान के 11 सदस्यीय की समिति की संख्या को बढाकर संत-समाज़ के प्रतिनिधियों को इस समिति में सम्मिलित कर इस संख्या को कम से कम 21 सदस्यीय कर दिया जाय. इससे संत-समाज़ व देश में एक सकारात्मक सन्देश जायेगा और इस मन्दिर-कमेटी में सरकार के साथ-साथ संत-समाज का भी सहयोग हो जायेगा जिससे मन्दिर-कमेटी की सक्रियता और प्रतिष्ठा सर्वमान्य हो जायेगी. विश्व हिन्दू परिषद, उत्तराखंड के इन सभी मांगो को उत्तराखंड के महामहिम राज्यपाल ने सहज ही स्वीकार कर लिया व नेता प्रतिपक्ष मन्दिर कमेटी संबंधी विषय़ को विधान सभा में उठाने के लिये हामी भर दी और बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिर समिति ने प्राकृतिक-आपदा की भेँट चढे गाँवों की पुनर्स्थपना हेतु 2 करोड रूपये की राशि स्वीकार की. अंत में मैं देहरादून के संघ – कार्यालय गया. वहाँ मै देहरादून के प्रांत प्रचारक व वहाँ के प्रांतकार्यवाह से देहरादून में आयी प्राकृतिक-आपदा के बारें जानकारी लेते हुए संघ-परिवार की तरफ से चल रहे राहत-बचाव के बारें में जाना. उन्होने मुझे बताया कि केदारनाथ में सेना के जवानों के साथ हेलीपैड बनाने वाले तीन स्वयंसेवक सर्वश्री योगेन्द्र राणा, भूपेन्द्र सिँह और बृजमोहन सिँह बिष्ट थे. आगे उन्होने मुझे बताया कि अबतक लगभग 200 से अधिक ट्रक राहत – सामग्री पहुँचाई जा चुकी है व लगभग 5000 से अधिक संघ के स्वयंसेवक राहत-बचाव हेतु दिन-रात जुटे हुए है. माँ भारती की सेवा में लगे हुए संघ के स्वयंसेवकों बारें मे जानकर मन को बहुत संतुष्टि मिली.    -राजीव गुप्ता, 09811558925  

Sunday, May 19, 2013

आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है

Sat, May 18, 2013 at 11:35 PM
न्याय पाने की भाषायी आज़ादी          --राजीव गुप्ता , 09811558925
स्वतंत्रता पूर्व भारत मे सरकारी समारोहों में ‘गाड सेव द किंग’ या ‘गाड सेव द क़्वीन’ गाया जाता था. पर्ंतु 15 अगस्त 1947 से उसका स्थान ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे’ ने लिया. रातोंरात सभी सरकारी भवनो पर से ‘यूनियन जैक’ झंडा उतारकर तिरंगा झंडा लहरा दिया गया. भारत में स्वतंत्रता का जश्न मनाया गया. भारत को यह स्वतंत्रता लाखो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की कीमत पर मिली थी. पहली बार भारत के लोगों ने आज़ादी का अर्थ समझा था. देश का संविधान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और और राष्ट्रभाषा का बहुत महत्व होता है. इसी महत्ता के चलते देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तय हो गया परंतु बहुभाषी भारत मे राष्ट्रभाषा का चुनाव करने में बहुत समय लगा. देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है. हिन्दी के प्रचलन के चलते हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया गया था.
हिन्दी को राजभाषा का दर्जा
लेखक राजीव गुप्ता 
यह चित्र जय हिंद से साभार 
क्रांतिकारियों के संघर्षो के कारण देश को स्वाधीनता मिली परंतु संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता-पूर्व जुलाई, 1946 में ही हो गया था. 11 दिसम्बर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी सदस्य चुना गया. डा. कैलाश चन्द्र भाटिया ने एक लेख में लिखा है कि संविधान सभा की नियम समिति ने डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता मे 1946 में ही एक निर्णय ले लिया था कि संविधान सभा का कामकाज की हिन्दी या अंग्रेजी ही होगी और यदि कोई सदस्य अपनी मातृभाषा मे भाषण देना चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति से वह अपनी मातृभाषा मे भाषण दे सकता है. फरवरी, 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा के संबंध को उल्लेख नही था. परंतु कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी के अथक प्रयासों से 12,13,14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे राजभाषा के विषय पर चर्चा हुई और 14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मताओं ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया. इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि मे लिखी गई हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप मे अंगीकार किया गया. हलाँकि संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संविधान लागू होने से 15 वर्ष पश्चात तक अर्थात 25 जनवरी 1965 तक अंग्रेजी भाषा को संघ के सभी कार्यों के लिये अंग्रेजी भाषा मे करने की व्यवस्था की गई. साथ यह व्यवस्था भी की गई देश के महामहिम राष्ट्रपति यदि चाहें तो 15 वर्ष की अवधि पूर्व भी यह आदेश दे सकते है कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जा सकता है.    
हिन्दी और राष्ट्रपति के आदेश
राष्ट्रपति का पहला आदेश 27 मई 1952 को विधि-मंत्रालय की अधिसूचना के रूप में और भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ. इस आदेश के अनुसार राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिपत्रों को प्राधिकृत कर दिया गया. राष्ट्रपति का दूसरा आदेश 3 दिसम्बर 1955 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया जिसे संविधान (राजकीय प्रयोजनो के लिये हिन्दी भाषा) आदेश 1955’ के रूप में जाना जाता है. इस आदेश के अनुसार जनता से पत्र-व्यवहार, संसद और प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ, सरकारी संकल्प, राजभाषा को अपनाने वाले राज्यों से पत्र-व्यवहार, संधिय़ाँ व करार जैसे प्रमुख क्रियाकलापों में हिन्दी को अपनाने के लिये कहा गया. इसी आदेश के परिणामस्वरूप विभिन्न मंत्रालयों में हिन्दी-अनुवादकों की नियुक्तियाँ शुरू हुई. उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा कई आदेश जारी किये गये और 1963 में राजभाषा अधिनियम बना.
योग में आशंकाएँ
 यह चित्र शंखनाद से साभार 
हिन्दी-प्रयोग ने लोगों को कई आशंकाओं में डाल दिया. सैन्य-सेवा मे हिन्दी-प्रयोग से लोग सबसे ज्यादा आशंकित थे. उनका मानना था कि सेना के जवानो आदेश या उनके साथ वार्तालाप अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर कैसे उपयोग किया जाय. भाषा के कारण सैनिकों के मनोबलों और देश-सुरक्षा के साथ खिलवाड नही किया जा सकता. इसी प्रकार से हिन्दी-प्रयोग को लेकर लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएँ रही, जिसका कारण लोग मुख्यतया दैनिक कार्यों के निमित्त हिन्दी मे शब्दों की कमी मानते थे. कुछ कमोबेश यही हालत विधि क्षेत्र की भी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में न्यायालयों का अधिकतर कार्य फारसी भाषा में होता था. आज भी हम न्यायालयों के आदेशों मे हम फारसी भाषा का प्रभाव देख सकते हैं. 1836 तक आते-आते फारसी का उपयोग खत्म हो गया और उसका स्थान हिन्दी,अंग्रेजी और उर्दू ने ले लिया. 1950 में देशी रियासतों के भारत में विलय होने तक न्यायालयों का कामकाज़ प्रादेशिक भाषा मे ही होता था. ग्वालियर, पटियाला, बडौदा, जम्मू-कश्मीर हैदराबाद की रियासतें इसका प्रमुख उदाहरण हैं. इतना ही नही भारत की विशालता के चलते ही यहाँ पर कई भाषाई-राज्यों का भी गठन किया गया. और राज्यो को यह अधिकार दिया गया कि वे खुद तय करें कि उनकी राज्यभाषा क्या होगी. सारी परिस्थितियों पर चर्चा के उपरांत यह तय किया गया कि सभी राज्य एक दूसरे राज्य व केन्द्र के साथ राजभाषा में ही पत्र-व्यवहार करें. परंतु यह देश की विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर प्रयास करने के बावज़ूद आज भी राजभाषा सुचारू रूप से देश-स्तर पर संतोषजनक रूप से लागू नही है. आज भी अशिक्षित लोगों को न्यायालय मे न्याय उनकी मातृभाषा में नही मिलता है.
यह चित्र जय हिंद से साभार 
पिछले दिनों कैट (केन्द्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण) से लेकर उच्च न्यायालय तक के दिये हुए फैसलों को पलटते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दी मे आरोपपत्र पाने के अधिकार पर ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने देश के हिन्दी-प्रेमियों की दम तोडती आस पर संजीवनी-बूटी सा असर किया. जिसने आम-जन को अपनी मातृभाषा मे न्याय पाने अधिकार की माँग करने वालों लोगों में एक आस की अलख को जगाया. दरअसल यह मामला मुम्बई के एक नौसेना कर्मी मिथलेश का था, जिसे उच्चाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार व उनका आदेश न मानने पर एक आरोपपत्र दिया गया था. नौसेना कर्मी ने हिन्दी भाषा मे आरोपपत्र की मांग की जिसे विभाग ने खारिज कर दिया. जिससे नौसेना कर्मी ने विभागीय जाँच मे भाग नही लिया. परिणामत: विभाग ने नौसेना कर्मचारी पर कार्यवाही कर सजा के रूप मे उसके वेतनमान मे कटौती कर दी. जिसे नौसेना कर्मचारी ने आरोपपत्र हिन्दी में न मिलने के कारण को आधार बनाते हुए विभागीय जाँच को रद्द करने की माँग की. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात आज भी सर्वोच्च न्यायालय और  अधिकांश उच्च न्यायालयों मे अपनी मातृभाषा मे आरोपी अपना पक्ष नही रख सकता. परिणामत: आरोपी को यह पता ही नही चल पाता कि उसके वकील माननीय न्यायाधीशों के समक्ष क्या तर्क कर रहें है. इसलिये आरोपी अपने आप को ठगा-सा महसूस करते है.
कहने को तो हिन्दी देश की राजभाषा है, परंतु आज भी प्रशासनिक व न्यायालय के कामकाज़ में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है. देश की शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ यही है कि ऐसे मामलों में न्याय के लिये उसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जिस भाषा को आरोपी समझता हो, ताकि कोई भी व्यक्ति तथ्यों को ठीक-ठाक समझकर अपना पक्ष रख सके. अब समय आ गया है कि अब राजभाषा अधिनियम की नये सिरे से समीक्षा की जाये क्योंकि किसी भी स्वतंत्र देश में मातृभाषा में अपना पक्ष रखना और जवाब मांगना किसी भी व्यक्ति का हक होता है.

Friday, May 10, 2013

वंदेमातरम्:धर्म नही देश पहले है//राजीव गुप्ता

Fri, May 10, 2013 at 11:51 AM
संसद यह सुनिश्चित करे:
‘राष्ट्रीय-मानको’ का अपमान किसी भी सूरत-ए-हाल मे सहन नही किया जायेगा
बसपा के माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क  कहते है, ‘यह सच है कि मै सांसद हूँ, पर मुसलमान पहले हूँ. मै इस्लाम के खिलाफ नही जा सकता.  इसलिए मै लोकसभा छोड़कर चला गया. अगर भविष्य में भी ऐसी स्थिति आई तो मैं वही करूंगा, जो आज किया है.’ समाजसेवी श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के वंदेमातरम्-नाद को अभी देश की जनता भूल भी नही पायी होगी कि श्री अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के उसी ‘वंदेमातरम्-नाद’ पर ही विवाद खडा हो गया. दरअसल यह सारा विवाद 8 मई 2013 को खडा हुआ. देश की सबसे बडी पंचायत अर्थात लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने से पहले सदन में 'वंदेमातरम्' की धुन बजायी गई. धुन बजने के दौरान संभल से बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क सदन से उठकर बाहर चले जाते है. लोकसभा अध्यक्षा मीरा कुमार माननीय सांसद के इस कदम पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्हें भविष्य में ऐसा नहीं करने की सख्त चेतावनी देते हुए कहती है कि 'एक माननीय सांसद वंदेमातरम् की धुन बजने के दौरान सदन से बाहर चले गए. मैंने इसका गंभीर संज्ञान लिया है. मैं जानना चाहूंगी कि ऐसा क्यों किया गया. ऐसा आगे कभी भी नहीं होना चाहिए.' राजनेताओ की इस पूरे वाकया पर टिप्प्णियाँ आती है. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भी बर्क के इस व्यवहार से असहमत है. पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मुहम्मद खान जी कहते है कि दुनिया के हर मजहब मे मातृभूमि के प्रति आदर, सम्मान, समर्पण की व्यवस्था है. जो मातृभूमि का आदर नही कर सकता उससे कानून द्वारा कराया जा सकता है. बसपा के माननीय सांसद द्वारा उठाये गये इस अपमानजनक कदम पर कांग्रेस के नेता और देश के विदेश मंत्री श्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि वंदेमातरम् गाना कतई बुरा नही है. उन्होने यह भी कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने भी वंदेमातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप मे स्वीकार कर लिया था. ध्यान देने योग्य है कि 4 नवंबर 2009 को देवबंद मे उलेमाओ ने वंदेमातरम् न गाने का एक प्रस्ताव पारित किया था. जिस पर राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगो ने कडी आपत्ति जताई थी. भारतीय जनता पार्टी के नेता श्री सैयद शाहनवाज हुसैन ने कहा कि सदस्यों को राष्ट्रीय गीत के अपमान का कोई अधिकार नहीं है. परंतु अभी इस गंभीर मुद्दे पर बीएसपी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई. इसके उलट माननीय सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने देश से माफी मांगने की बजाय अपनी हेकडी जमाते हुए ऐसा तर्क दिया है, जिससे विवाद और बढ गया. देश की भावनाये आहत हो रही है.
वंदेमातरम् का इतिहास
डा. भूपेन्द्र नाथ अपनी पुस्तक मे लिखते है कि 1760 मे एक बार भारत मे भयंकर अकाल पडा. उस समय भारत मे ईस्ट इंडिया का राज था और अंग्रेजो के खिलाफ संयासी अपने उद्घोष मे ‘ओम वंदेमातरम्’ कहा करते थे. 1866 के ओडिशा के अकाल को देखकर चिंतित हुए बंकिम चन्द्र ने एक उपन्यास लिखना प्रारंभ किया और 1882 मे उन्होने ‘वंदेमातरम्’ को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ मे शामिल कर लिया. कालांतर मे महर्षि अरविन्द ने वंदेमातरम् को नये-मंत्र की संज्ञा दी. यह पवित्र मंत्र ‘वंदेमातरम्’ कोलकाता मे भारतीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन मे पहली बार गाया गया. 28 दिसंबर, 1896 को कांग्रेस के अधिवेशन मे श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर ने स्वयं ही वंदेमातरम् को संगीतबद्ध कर दिया, और उसी अधिवेशन मे वंदेमातरम् को हर अधिवेशन गाने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. 1905 मे बंग-भंग के आन्दोलन मे वंदेमातरम् नामक इस मंत्र का ऐसा जादू चला कि इसके उद्घोष ने ब्रिटिश सरकार की चूले हिला दी. हालत यह हो गयी थी कि हर वंदेमातरम् बोलने वाले व्यक्ति को ब्रिटिश हुकुमत जेलो मे बन्द कर देती थी. हलाँक 1905 मे बनारस के अधिवेशन मे कुछ विवाद खडा हो गया था, परंतु उस विवाद को सुलझा लिया गया था और श्रीमती सरला देवी चौधरानी जी ने पूरा वंदेमातरम् गाया. 1906 मे जब ब्रिटिश सरकार ने वंदेमातरम् बोलने पर अडचन डालनी चाही तो आनन्द बाज़ार पत्रिका के संपादक श्री मोतीलाल घोष ने यहाँ तक कह दिया था, ‘चाहे गर्दन रहे या न रहे परंतु मैं तो वंदेमातरम् गाउंगा.’ गाँधी जी के 1920 के असह्योग आन्दोलन का प्रमुख नारा यही था. 1922 तक कांग्रेस के हर अधिवेशन मे वंदेमातरम् को गाया जाता रहा. यहाँ तक कि महात्मा गाँधी जी, दक्षिण अफ्रीका से लौटने के लगभग 2 वर्षो तक अपने सभी पत्रो का अंत वंदेमातरम् से ही करते थे. 1 जुलाई 1931 को गाँधी जी ने हरिजन मे भी लिखा, ‘मुझे कभी नही लगा कि वंदेमातरम् हिन्दुओ का गीत है. दक्षिण भारत के राष्ट्र कवि सुब्रह्मण्यम भारती ने खुद लिखा, ‘ आओ इसकी अर्चना करे हम वंदेमातरम्.’ विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक लाला हरदयाल, महर्षि अरविन्द जैसे स्वतंत्रता सेनानियो ने वंदेमातरम्-गान को अंगीकृत किया.
वंदेमातरम् का विरोध
1908 मे मुस्लिम लीग ने अपने अमृतसर अधिवेशन मे सबसे पहले इस वंदेमातरम् – गान का विरोध किया और 1937 तक आते-आते यह उसके एजेंडे का विषय बन गया. कम्युनिष्ट विचारधारा के मानने वालो ने वंदेमातरम्-गान की जगह इंकलाब-जिन्दाबाद को अपनाया. 1923 मे मोहम्मद अली जो कि कांग्रेस के इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे, ने वंदेमातरम् के गान का जोरदार विरोध किया. वंदेमातरम्-गान का विरोध इतना अधिक बढ गया कि कांग्रेस के  हरिपुर अधिवेशन मे वंदेमातरम्-गान पर विचार करने हेतु 4 लोगो की एक समिति बनायी गयी और इस समिति ने यह तय किया कि वंदेमातरम्-गान के पहले 2 पद ही गाये जायेंगे.
स्वतंत्रता-पश्चात
14 अगस्त 1947 की मध्य रात को भी वंदेमातरम् के 2 पद गाये गये. भारतीय संविधान द्वारा वंदेमातरम् को भी राष्ट्रीय गान की तरह राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. परंतु इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वर्तमान के राजनेता वंदेमातरम्-गान को धर्म से जोडकर देखने लगे है जबकि वंदेमातरम्-गान स्वतंत्रता-प्राप्ति का सिद्ध मंत्र था. मई 1965, मे भारत के तीसरे कानून आयोग की 28वीं रिपोर्ट (दि इंडियन ओथ्स एक्ट 1873) पेश की गई, जिसके चेयरमैन जस्टिस जे.एल.कपूर थे. इस रिपोर्ट मे हिन्दू-मुश्लिम दोनो के लिये भारत के शपथ-फार्म मे यह स्पष्ट लिखा गया है कि मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि जो कहूंगा, सच कहूंगा. कुछ इसी तरह की अर्हता-संबंधी बात जन-प्रतिनिधियो के लिये संविधान के अनुच्छेद 84(क) और अनुच्छेद 173 (क) मे तथा संविधान की तीसरी अनुसूची मे यह साफ-साफ लिखा गया है कि “मै, अमुक, जो राज्य सभा (या लोक सभा) का सद्स्य निर्वाचित (या नामनिर्देशित) हुआ हूँ, ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि मै विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा, मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूँ उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करुंगा.”  यही शपथ बहुजन समाजवादी पार्टी के माननीय सांसद श्री शफीकुर्रहमान बर्क जी ने भी ली है. उनके इस अपमानजनक कृत्य से क्या यह मान लिया जाय कि इन्होने विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की झूठी कसम खायी थी, क्योंकि इन्होने अपने इस दंभ के चलते देश की जनता को और उन महान हुतात्माओ को जिन्होने देश को स्वतंत्र कराने हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, को भी लजा दिया. अब समय आ गया है कि संसद यह सुनिश्चित करे कि किसी भी ‘राष्ट्रीय-मानको’ का अपमान किसी भी सूरत-ए-हाल मे सहन नही किया जायेगा.   
- राजीव गुप्ता, 09811558925

Friday, February 08, 2013

कुंभ-इलाहाबाद: पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन

Thu, Feb 7, 2013 at 3:04 PM
विमोचन हुआ संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा कुम्भ में 
कुंभ-इलाहाबाद:कुंभ के पावन  अवसर पर संतो के आशीर्वचन से दिल्ली के युवा लेखक राजीव गुप्ता की पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा  कुम्भ में हुआ। पुस्तक विमोचन के समय मंच पर कांची कामकोटि शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, सर्वश्री अशोक सिंघल, प्रवीण भाई तोगड़िया, दिनेश जी एवं कई संत समाज के धर्माचार्य उपस्थित थे। यह पुस्तक कश्मीर-समस्या, धर्मांतरण, मंहगाई, भ्रष्टाचार, एफडीआई जैसे ज्वलंत विषयों पर राजीव गुप्ता के देश अनेक प्रसिद्ध हिन्दी अखबारों में प्रकाशित समसामयिक लेखों का संग्रह है। राजीव गुप्ता के अनुसार इस पुस्तक का उद्देश्य यह है-पिछले दिनों जयपुर मे संपन्न हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में भारत के गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिन्दे द्वारा मात्र वोट बैंक की राजनीति के चलते 'आतंकवादी' कहकर संघ पर परोक्ष रूप से कुठाराघात करने के परिणामस्वरूप करोड़ो हिन्दुओ के साथ-साथ संघ के स्वयंसेवकों  की जन - भावनाएँ आहत हुई हैं। विहिप के श्री चम्पत राय ने कहा कि नि:स्वार्थ भावना से देश की सेवा करना यही संघ है। मानव की यह प्रवृत्ति अछूत कैसे हो सकती है; अत: संघ अछोत नहीं है। देश का हर युवा यह सोचने पर बाध्य है कि आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी आज देश की जनता भुखमरी, बेरोजगारी, नक्सलवाद, आतंकवाद  जैसी वीभत्स समस्याओं से क्यों जूझ रही है? हर भारतीयों के लिए देश सर्वोपरि ही है तथा वैचारिक मतभेद से लोकतंत्र और मजबूत ही होता है। साथ ही उन्होने यह सवाल भी देश की जनता से पूछा है कि  इससे कांग्रेस सरकार को भला आपत्ति क्यों है; साथ ही  क्या स्वतंत्र भारत में कोई अपनी आवाज नहीं उठा सकता।   
विनोद बंसल
मीडिया प्रमुख, दिल्ली
विहिप12:15

कुंभ-इलाहाबाद: पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन

Thursday, January 31, 2013

देश सर्वोपरि है//राजीव गुप्ता

Wed, Jan 30, 2013 at 11:44 AM
ऐसी विषम परिस्थिति में हिन्दू-आतंकवाद का नाम क्यों ?
देश सर्वोपरि है. विश्व - पटल पर भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का 150वाँ जन्मदिन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रामकृष्ण मिशन के साथ-साथ भारत सरकार भी मना रही है. परन्तु जिस तरह जयपुर के कांग्रेस-चिन्तन शिविर से भारत के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने  "हिन्दू-आतंकवाद" नाम का चुनावी शिगूफा  छेड़ा, सारा देश सकते में आ गया. गृहमंत्री के इस दुर्भाग्यपूर्ण बयान से देश स्तब्ध है.  मात्र सत्ता पाने के लिए विश्व समुदाय के सामने पूरे देश को कलंकित करना कहां तक उचित है ? आतंकवाद को भगवे रंग में रंगकर पहले पी. चिदम्बरम ने भगवा-आतंकवाद का नाम लेकर संघ पर प्रहार  किया, जब इतने से भी इन सत्ता-लोलुप नेताओं का पेट नहीं भरा तो आतंकवाद का वर्गीकरण कर पुन: संघ के साथ -साथ करोड़ो हिन्दुओ पर प्रहार कर दिया.  हमारा आपस मे वैचारिक मतभेद हो सकता है. वैचारिक मतभेद ही लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करता है.  मात्र इन वैचारिक मतभेदों को कारण गृहमंत्री को देश की छवि धूमिल करना कहां तक उचित है ? गृह मंत्री के ऐसे बयान से क्या यह मान लिया  की स्वामी विवेकानंद की 150 जयन्ती मनाना सरकारी  ढोंग से अधिक कुछ नहीं है ? क्योंकि गृहमंत्री के बयान से देश की छवि को गहरा धक्का लगा है.

अब पाकिस्तान के आतंकी गृह मंत्री के बयान से प्रसन्न होकर विश्व समुदाय से भारत को "आतंकवादी देश" घोषित करने की मांग कर रहे है.  अभी तक भारत ने पाकिस्तान को 'आतंकवाद' के विषय पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग - थलग किया हुआ था. परन्तु अब पाकिस्तान विश्व समुदाय के समक्ष यह  बात पूरे जोर - शोर से उठायेगा कि  भारत में जितने भी आतंकवादी हमले हुए है, उसे भारत ने खुद करवाएँ  है, इसकी पुष्टि खुद वहाँ के गृहमंत्री ने की है. पाकिस्तान की करतूतो की वजह से सीमा पर बढ़ा तनाव अभी कम भी नहीं हुआ है, ऐसी विषम परिस्थिति में शिंदे ने हिन्दू - आतंकवाद का नाम क्यों लिया ?  कल तक कांग्रेस ने सुशील कुमार शिंदे के इस बयान को उनके मुंह से गलती से निकलने  की बात कह थी रही थी, परन्तु कांग्रेस के नेता, भारत के विदेश मंत्री जैसे सरीखे लोग तथाकथित "तथ्यों के आधार" पर गृहमंत्री का बचाव करने में कोइ कसर नहीं छोड़ रहे है. अगर गृहमंत्री के तथ्य सही है,  तो उन्हें  दोषियो पर  कार्यवाही करने से रोका किसने है ? सुशील कुमार शिंदे को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कांग्रेस पार्टी के नहीं 'देश' के गृहमंत्री है.

कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता अपना विवेक खो बैठे हैं, परिणामतः बार - बार एक देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के ऊपर अपने शब्दों के माध्यम से कुठाराघात करते रहते है .इनकी आखों पर राजनीति की ऐसी परत चढी है कि समाज को बांटने के लिए संघ को कभी "भगवा आतंकवाद" से संबोधित करते है तो कभी "फासिस्ट-संगठन" की संज्ञा देते हैं .कांग्रेस के नेता हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के दोनों सिद्धांतो पर चलते है .मसलन एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है. दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो .इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर . इसी सिद्धांतों पर चलते हुए कांग्रेसी हर उस व्यक्ति की आड़ में संघ को बदनाम करने कोशिश करते है, जो देशहित की बात करता है.

इसकी आड़ में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लपेटने के चक्कर में हैं, जिसकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते .भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और उसकी मानसिकता बदस्तूर जारी है . इसीलिए कांग्रेसी नेता आतंकवाद को मजहबों में बांटकर इस्लामी, ईसाई आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ कर देश की जनता को भ्रमित करने नाकाम कोशिश करते है .

जो सभ्यता पूरे विश्व के कल्याण का उदघोष करती हो और उस सभ्यता का जोरदार समर्थन करने वाले लोगों को बदनाम करने की साजिश वर्तमान सरकार की नियत को दर्शाता है . भारतीय चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना और भोजन से पूर्व जीव-जंतुओं के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है. ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र तो अब शासन ने भी अपना लिया है.

खुद कमाओ खुद खाओ यह प्रकृति है , दूसरा कमाए तुम छीन कर खाओ यह विकृति है और खुद कमाओ दूसरे को खिलाओ यह भारतीय संस्कृति है .परन्तु तथाकथित वैश्वीकरण अर्थात ग्लोब्लाईजेशन के इस दौर में अपने को अधिक आधुनिक कहलाने की होड़ के चक्कर में व्यक्ति जब अपनी  पहचान,  अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपने मूल्यों तथा  अपनी संस्कृति से समझौता करने को आतुर हो तो ऐसे विकट समय में अपने देश की ध्वजा-पताका थामे अगर कोई भारत में भारतीयता की बात करता हो तो उसे बदनाम करने के लए तरह - तरह के हथकंडे अपनाये जाते है .क्या स्वतंत्र भारत में भारतीयता की बात करना गुनाह है ?

आज भारत अनेक आतंरिक कलहों से जूझ रहा है .देश में कही नक्सलवाद , आतंकवाद अपने चरम पर है तो असम समेत अनेक राज्यो मे साम्प्रदायिक दंगे हो रहे है. बंग्लादेशी घुसपैठ सबको विदित ही है .कृषि - प्रधान कहलाने वाले देश में  कृषक आत्महत्या को मजबूर हो रहा है . राजनैतिक पार्टियाँ बस अपने स्वार्थ-पूर्ति में ही लगी रहती है कोई पार्टी जाति के नाम पर वोट मांगती है तो कोई किसी विशेष समुदाय को लाभ पहुचाने के लिए उन्हें कोटे के लोटे से अफीम चटाने का काम करती है . राजनेताओं पर राजनीति का ऐसा खुमार चढ़ा है कि वे अपनी सस्ती राजनीति चमकाने के चक्कर में देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आते . जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी दिल्ली में खुले आम देश की अखंडता को चुनौती देकर चले जाते है और किसी के कानो पर जूं तक नहीं रेंगती .  आज भ्रष्टाचार का हर तरफ बोलबाला है, परन्तु बावजूद इसके, सरकार को इस समस्या से ज्यादा चिंता इस बात की है, कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले के पीछे कही संघ तो नहीं है . क्या संघ के लोग इस देश के नागरिक नहीं है ? क्या संघ के लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते ? संघ अछूत  है क्या ? किसी प्रसिद्ध चिन्तक ने कहा है  कि जो कौमें अपने पूर्वजों को भुला देती है, वो ज्यादा दिन तक नहीं चलती है .
-राजीव गुप्ता                                              देश सर्वोपरि है//राजीव गुप्ता

Saturday, January 12, 2013

आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Fri, Jan 11, 2013 at 11:03 PM
खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे नरेन्द्र
तस्वीर ओशो टीचिंग से साभार 
11 सितम्बर, 1893 ई. को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन मे भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. मे कलकत्ते (कोलकाता) के शिमलापल्ली नामक मोहल्ले के निवासी श्री विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर हुआ. बचपन का इनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था तथा ये अपने माता-पिता की छठ्वी संतान थे. बच्चो की प्राथमिक पाठशाला माता की गोद ही होती है और उस पाठशाला मे अध्यापन उसकी माता द्वारा ही किया जाता है. माता की उस शिक्षा का प्रभाव बच्चे के मस्तिष्क पर अजीवन रहता है. इस बात को नरेन्द्रनाथ की माँ भलिभाँति जानतीं थी. अत: उन्होने नरेन्द्रनाथ को सुसंस्कारित करने मे कोई कसर नही छोडी. वे नरेन्द्रनाथ को बाल्यवस्था से ही रामायण और महाभारत की कथाये सुनाया करती थी. अगर कोई साधु उनके द्वार पर भिक्षा माँगने आ जाता तो नरेन्द्रनाथ की माँ नरेन्द्रनाथ को साथ मे लेकर उस साधु का यथोचित सेवा-सत्कार कर अपने सामर्थ्यानुसार उन्हे भिक्षा देती थी. माँ के इस कृत्य ने नरेन्द्रनाथ के मन पर अमिट छाप छोडी. पढाई मे प्रखर होने के साथ – साथ ये खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे. गायन कला के चलते ही नवम्बर, 1881 को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर पर इनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई. नरेन्द्रनाथ की गायन कला से प्रभावित होकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इन्हे दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण दिया और कालांतर मे नरेन्द्रनाथ उनके शिष्य बने. परंतु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को नरेन्द्रनाथ ने अपना गुरु तब तक नही माना जब तक उन्होने उनकी उत्कंठा के चलते उनका भगवान से साक्षात्कार नही करवा दिया.  
नारी चिंतन
न्यूयार्क मे भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जबतक वहाँ का समाज स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर प्रत्येक मानव मे मानवता का दर्शन नही करता और यह नही सोचता कि स्त्री-पुरुष दोनो एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी है तबतक वहाँ की स्त्रियो का वास्तविक रूप से उत्थान नही हो सकता. मात्र बौद्धिक और अक्षर ज्ञान से ही मानव का कल्याण संभव नही है. अपितु मानव – कल्याण हेतु बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के साथ – साथ उसकी अध्यात्मकिता और नीतिमत्ता की उन्नति भी अत्यंत आवश्यक है. भारत की नारियाँ भले ही बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के स्तर पर अमेरिका की नारियो से पीछे हो परंतु वे सदैव अपने शील की रक्षा के साथ-साथ एक चरित्रवान जीवनायपन करते हुए अपने पवित्र आचार-विचार और हृदय की पवित्रता के माध्यम से अध्यात्म के सहारे मानव-कल्याण के पथ पर अग्रेसित होती है. स्वामी जी ने अपने भाषण मे वहाँ के प्रेमाचार के विषय पर कहा कि अगर वे विवाहेच्छुक होते तो अमेरिका के अन्य नवयुवको की भाँति सैकडो बार प्रेमाचार के आडम्बर की अपेक्षा बिना किसी आडम्बर के किसी एक के प्रियपात्र बन चुके होते है. अमेरिका मे बढते तलाको की संख्या पर चिंतित होकर उन्होने वहाँ बताया कि भारतीय समाज मे यह सर्व-शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपने पति-पत्नी के अलावा अन्य सभी को मातृवत-पुत्रवत की नजर से देखे. अमेरिका मे स्त्री भोगवादी मानसिकता के केन्द्र-बिन्दु मे वास करती है परंतु भारत मे स्त्री सदैव से पूज्या रही है. इसी भारतीय-चिंतन के चलते भारत मे तलाको की संख्या अमेरिका के अपेक्षाकृत नगण्य है. 
  व्यक्तित्व विकास

राजीव गुप्ता-9811558925
व्यक्तित्व विकास की शिक्षा पर स्वामी जी का मानना था कि व्यक्ति का व्यक्तित्व असरदार होना चाहिये. व्यक्ति जिसके भी सम्पर्क मे आये उस पर उसके ग़ुणो की, उसकी बुद्धि की तथा उसके आचरण का जबरदस्त हो यह हर व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिये क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्थान दो-तिहाई भाग मे होता है और मात्र एक-तिहाई भाग मे ही बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द का स्थान रहता है. हमारा कर्म हमारे व्यक्तित्व का बाह्य अभिव्यक्ति मात्र ही है. अत: हमारी सम्पूर्ण शिक्षा और सारे अध्ययनो का एकमेव लक्ष्य हमारे व्यक्तित्व को गढते हुए उसे और अनवरत निखारना ही है. व्यक्तित्व की महत्ता हम इसी बात से लगा सकते है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व जिस पर भी पडता है उसे कार्यशील बना देता है. व्यक्तित्व पर एक उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने यहाँ तक कहा कि दार्शनिक मात्र बुद्धि पर असर करता है अपितु एक धर्मसंस्थापको का असर सम्पूर्ण समाज पर पडता है जिससे सारा देश तक हिल जाता है. मनुष्य को पूर्णता को प्राप्त होना ही उसके जीवन उद्देश्य होना चाहिये. मनुष्य मे अच्छी – बुरी स्वभाविकत: दोनो वृत्तियाँ होती है. समयानुसार व्यक्ति द्वारा उसके अन्दर की बुराईयो को कम करने की कोशिश करना ही उसे पूर्णता की ओर अग्रसित करता है.
शिक्षा
शिकागो से भारत वापस लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. स्वामी विवेकानन्द ने एक सभा मे शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का आधार धर्म होना चाहिये और उसका केन्द्र बिन्दु “चरित्र-निर्माण” ही होना चाहिये. धर्म से उनका तात्पर्य मात्र पूजा-पद्धति ही नही था अपितु “जीवन जीने की कला” था जिसकी पुष्टि उन्होने विचार-शक्ति का महत्व, कर्म का परिणाम और भाग्य के निर्माण इत्यादि जैसे विभिन्न विषयो पर अपने विचार रखकर किया. स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि हम जैसे सोचते है वैसे ही बन जाते है क्योंकि विचार सजीव होते है परिणामत: वाणी की अपेक्षाकृत उनका अधिकतम प्रभाव सदैव हमारे जीवन पर पडता रहता है. अत: हमे अपने विचारो के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये.

स्वामी विवेकानन्द शिक्षा हेतु किसी भी प्रकार के दंड देने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था कि जिस प्रकार प्रताडित करके गधे को घोडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार किसी भी प्रकार की प्रताडना से हम उसे अक्षर ज्ञान तो दे सकते है पर हम उसे शिक्षित नही बना सकते. इसलिये उन्होने शिक्षित बनाने हेतु ठोक-प्रणाली का खुलकर विरोध किया और उनका मानना था कि  शिक्षा के माध्यम से मानसिक बल, चरित्र-निर्माण और बुद्धि का विकास होता है, इतना ही नही “मन की एकाग्रता” ही शिक्षा का सार है और शिक्षा के माध्यम से मिले सारे प्रशिक्षणो का उद्देश्य व्यक्ति-विकास ही है.

किसी भी देश की उन्नति मे वहाँ के शिक्षित-प्रतिशत की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. क्योंकि देश की उन्नति का अनुपात और जन-समुदाय के शिक्षित का अनुपात सदैव परस्पर निर्भर होते है. भारतवर्ष के पिछडेपन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कुछ चन्द लोगो ने शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमा रखा है. गाँवो मे शिक्षा-रूपी दीपक का प्रकाश अभी भी धूमिल ही है. अत: यदि किसी अभाववश विद्यालय मे विद्यार्थी न पहुँच पाये तो विद्यालय को स्वयम उन अभावाग्रस्त विद्यार्थियो के पास पहुँचकर उनकी मातृभाषा मे ही उन्हे शिक्षा देनी चाहिये. इसके साथ- साथ शिक्षा मे संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा का स्थान विशिष्ट होना चाहिये. संस्कृत भाषा मात्र वेदो-उपनिषदो की भाषा बनकर न रहकर जाय अत: इसके प्रचार-प्रसार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा पर केवल ब्राह्मण विशेष का अधिकार न होकर अपितु सभी सभी लोगो का समान अधिकार है. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यही है कि वह व्यक्ति को स्वामी बनाये परिणामत: वह सदैव एक स्वामी की तरह कार्य करे न कि किसी भी प्रकार के गुलाम की तरह.
-राजीव गुप्ता (9811558925
आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Wednesday, December 19, 2012

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता


इन्हे बस अपने–अपने वोट बैंक की चिंता
Tue, Dec 18, 2012 at 9:03 AM
                      यह तस्वीर समय लाईव से साभार 
राज्यसभा द्वारा सोमवार को भारी बहुमत से 117वाँ संविधान विधयेक के पास होते ही पदोन्नति मे आरक्षण विधेयक के पास होने का रास्ता अब साफ हो गया है. अब यह विधेयक लोकसभा मे पेश किया जायेगा. हलांकि इस विषय के चलते भयंकर सर्दी के बीच इन दिनो राजनैतिक गलियारो का तपमान उबल रहा था. परंतु इस विधेयक के चलते यह भी साफ हो गया कि गठबन्धन की इस राजनीति मे कमजोर केन्द्र पर क्षेत्रिय राजनैतिक दल हावी है. अभी एफडीआई का मामला शांत भी नही हुआ था कि अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये पदोन्नति मे आरक्षण के विषय ने जोर पकड लिया. एफडीआई को लागू करवाने मे सपा और बसपा जैसे दोनो दल सरकार के पक्ष मे खडे होकर बहुत ही अहम भूमिका निभायी थी, परंतु अब यही दोनो दल एक-दूसरे के विरोध मे खडे हो गये है. इन दोनो क्षेत्रीय दलो के ऐसे कृत्यो से यह एक सोचनीय विषय बन गया है कि इनके लिये देश का विकास अब कोई महत्वपूर्ण विषय नही है इन्हे बस अपने – अपने वोट बैंक की चिंता है कि कैसे यह सरकार से दलाली करने की स्थिति मे रहे जिससे उन्हे तत्कालीन सरकार से अनवरत लाभ मिलता रहे.
लेखक राजीव गुप्ता 
2014 मे आम चुनाव को ध्यान मे रखकर सभी दलो के मध्य वोटरो को लेकर खींचतान शुरू हो गयी है. उत्तर प्रदेश के इन दोनो क्षेत्रीय दलो के पास अपना – अपना एक तय वोट बैंक है. एक तरफ बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्यसभा अध्यक्ष हामिद अंसारी पर अपना विरोध प्रकट करते हुए यूपीए सरकार से अनुसूचित जाति एव जनजाति के लिये आरक्षण पर पांचवी बार संविधान संशोधन हेतु विधेयक लाने हेतु सफल दबाव बनाते हुए एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने दलित वोट बैंक को सुदृढीकरण करने का दाँव चला तो दूसरी तरफ सपा ने उसका जोरदार तरीके से विरोध जता करते हुए कांग्रेस और भाजपा के अगडो-पिछडो के वोट बैंक मे सेन्ध लगाने का प्रयास कर रही है.इस विधेयक के विरोध मे उत्तर प्रदेश के लगभग 18 लाख कर्मचारी हडताल पर चले गये तो समर्थन वाले कर्मचारियो ने अपनी – अपनी कार्यावधि बढाकर और अधिक कार्य करने का निश्चय किया. भाजपा के इस संविधान संशोधन के समर्थन की घोषणा करने के साथ ही उत्तर प्रदेश स्थित उसके मुख्यालय पर भी प्रदर्शन होने लगे. सपा सुप्रीमो ने यह कहकर 18 लाख कर्मचारियो की हडताल को सपा-सरकार ने खत्म कराने से मना कर दिया कि यह आग उत्तर प्रदेश से बाहर जायेगी और अब देश के करोडो लोग हडताल करेंगे. दरअसल मुलायम की नजर अब एफडीआई मुद्दे से हुई अपने दल की धूमिल छवि को सुधारते हुए अपने को राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने की है क्योंकि वो ऐसे ही किसी मुद्दे की तलाश मे है जिससे उन्हे 2014 के आम चुनाव के बाद किसी तीसरे मोर्चे की अगुआई करने का मौका मिले और वे अधिक से अधिक सीटो पर जीत हासिल कर प्रधानमंत्री बनने का दावा ठोंक सके.

मुलायम को अब पता चल चुका है कि दलित वोट बैंक की नौका पर सवार होकर प्रधानमंत्री के पद की उम्मीदवारी नही ठोंकी जा सकती अत: अब उन्होने अपनी वोट बैंक की रणनीति के अंकगणित मे एक कदम आगे बढते हुए अपने “माई” (मुसलमान-यादव) के साथ-साथ अपने साथ अगडॉ-पिछडो को भी साथ लाने की कोशिशे तेज कर दी है. उनकी सरकार द्वारा नाम बदलने के साथ-साथ कांशीराम जयंती और अम्बेडकर निर्वाण दिवस की छुट्टी निरस्त कर दी जिससे दलित-गैर दलित की खाई को और बढा दिया जा सके परिणामत: वो अपना सियासी लाभ ले सकने मे सफल हो जाये. दरअसल यह वैसे ही है जैसे कि चुनाव के समय बिहार मे नीतिश कुमार ने दलित और महादलित के बीच एक भेद खडा किया था ठीक उसी प्रकार मुलायम भी अब समाज मे दलित-गैर दलित के विभाजन खडा कर अपना राजनैतिक अंकगणित ठीक करना चाहते है.

कांग्रेस ने भी राज्यसभा मे यह विधेयक लाकर अपना राजनैतिक हित तो साधने के कोई कसर नही छोडा क्योंकि उसे पता है कि इस विधेयक के माध्यम से वह उत्तर प्रदेश मे मायावती के दलित वोट बैंक मे सेन्ध लगाने के साथ-साथ पूरे देश के दलित वर्गो को रिझाने मे वह कामयाब हो जायेंगी और उसे उनका वोट मिल सकता है. वही देश के सवर्ण-वर्ग को यह भी दिखाना चाहती है कि वह ऐसा कदम मायावती के दबाव मे आकर उठा रही है, साथ ही एफडीआई के मुद्दे पर बसपा से प्राप्त समर्थन की कीमत चुका कर वह बसपा का मुहँ भी बन्द करना चाहती है. भाजपा के लिये थोडी असमंजस की स्थिति जरूर है परंतु वह भी सावधानी बरतते हुए इस विधेयक मे संशोधन लाकर एक मध्य-मार्ग के विकल्प से अपना वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश मे है. दरअसल सपा-बसपा के बीच की इस लडाई की मुख्य वजह यह है कि जहाँ एक तरफ मायावती अपने को दलितो का मसीहा मानती है दूसरी तरफ मुलायम अपने को पिछ्डो का हितैषी मानते है. मायवती के इस कदम से मुख्य धारा मे शामिल होने का कुछ लोगो को जरूर लाभ मिलेगा परंतु उनके इस कदम से कई गुना लोगो के आगे बढने का अवसर कम होगा जिससे समाजिक समरसता तार-तार होने की पूरी संभावना है परिणामत: समाज मे पारस्परिक विद्वेष की भावना ही बढेगी.

समाज के जातिगत विभेद को खत्म करने के लिये ही अंबेडकर साहब ने संविधान मे जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की थी परंतु कालांतर मे उनकी जातिगत आरक्षण की यह व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ गयी. 1990 मे मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के निर्णय ने राजनैतिक दलो के राजनैतिक मार्ग को और प्रशस्त किया परिणामत: समूचा उत्तर प्रदेश इन्ही जातीय चुनावी समीकरणो के बीच फंसकर विकास के मार्ग से विमुख हो गया. इन समाजिक - विभेदी नेताओ को अब ध्यान रखना चाहिये कि जातिगत आरक्षण को लेकर आने वाले कुछ दिनो आरक्षण का आधार बदलने की मांग उठने वाली है और जिसका समर्थन देश का हर नागरिक करेगा, क्योंकि जनता अब जातिगत आरक्षण-व्यवस्था से त्रस्त हो चुकी है और वह आर्थिक रूप से कमजोर समाज के व्यक्ति को आरक्षण देने की बात की ही वकालत करेगी.

बहरहाल आरक्षण की इस राजनीति की बिसात पर ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो समय के गर्भ में है, परंतु अब समय आ गया है कि आरक्षण के नाम पर ये राजनैतिक दल अपनी–अपनी राजनैतिक रोटियां सेकना बंद करे और समाज - उत्थान को ध्यान में रखकर फैसले करे ताकि समाज के किसी भी वर्ग को ये ना लगे कि उनसे उन हक छीना गया है और किसी को ये भी ना लगे कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी उन्हें मुख्य धारा में जगह नहीं मिली है. तब वास्तव में आरक्षण का लाभ सही व्यक्ति को मिल पायेगा और जिस उद्देश्य को ध्यान मे रखकर संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी वह सार्थक हो पायेगा.      राजीव गुप्ता(9811558925)

आरक्षण पर राजनीति//राजीव गुप्ता

Tuesday, December 04, 2012

राजनीति के भंवर मे एफडीआई

Mon, Dec 3, 2012 at 9:14 PM
यह कैसी जुगाड की राजनीति है ?              राजीव गुप्ता
अपनी जुगाड-राजनीति के लिये प्रसिद्ध यू.पी.ए.-2 सरकार वर्तमान समय मे अपने कार्यकाल के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के ऐलान के साथ कि एफडीआई मुद्दे पर संसद मे नियम 184 के तहत चर्चा होगी. परिणामत: एफडीआई पर आखिरकार सरकार का रुख नरम पड़ा और संसद मे गतिरोध टूटा. यू.पी.ए.-2 के अहम सहयोगी सपा, बसपा और डीमके जैसे दलो ने वर्तमान सराकार को बचाने हेतु भले ही सशर्त समर्थन देने की बात की हो परंतु आज़ादी के बाद से सत्ताधारी दलो के पास इससे ज्यादा राजनैतिक दिवालियापन अब तक देखने को नही मिला. यह कैसी जुगाड की राजनीति है कि जो दल सडको पर जनता के हित की बात करते हुए सत्ताधारी दलो की नीतियो का खुलकर विरोध करने हेतु धरना-प्रदर्शन कर अपनी गिरफ्तारी देते है वही दल संसद के अन्दर सत्ता की मलाई खाने हेतु उन्ही सत्ताधारी दलो की सरकार को गिरने से बचाने हेतु उनका संकटमोचन बनकर खडे हो जाते है.

डीएमके ने तो यहाँ तक कह दिया कि  अगर वे एफडीआई के विरोध में वोट करते हैं तो यह यूपीए सरकार के लिए खतरा होगा और बीजेपी के सत्ता में आने से बाबरी मस्जिद जैसी घटनाएं हो सकती हैं. वही सपा और बसपा का तर्क है कि साम्प्रदायिक शक्तियो को सत्ता से दूर रखने हेतु ही वे सरकार के साथ खडी होंगी. जबकि सच्चाई यह है कि अभी पिछले दिनो चार राज्यो आन्ध्र प्रदेश - चारमीनार , असम - कोकराझार, महाराष्ट्र – मुम्बई, उत्तर प्रदेश – फैज़ाबाद, बरेली, कोसीकलाँ मे साम्प्रदायिक दंगे भडके परंतु इन सभी राज्यो मे भाजपा की सरकार न होकर कांग्रेस, एन.सी.पी व सपा जैसे दलो की ही सरकार है. इसके उलटे गुजरात, मध्यप्रदेश, छतीसगढ, झारखंड, गोवा, कर्नाटक, बिहार आदि जिन राज्यो मे भाजपा व उसके समर्थक दलो की सरकार है वहाँ पर इस समय किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक दंगे नही हुए. इन दलो के बयानो को देखते हुए क्या यह मान लिया जाय कि राजनीति मे देश के विकास का मुद्दा अब कोई स्थान नही रखता तथा चर्चा विकास केन्द्रित होने की बजाय सिर्फ साम्प्रदायिकता की आड मे सत्ता लोलुपता के चलते जुगाड-केद्रित ही राजनीति पर होगी.       

22 नवंबर से शुरू हुए शीतकालीन सत्र की हंगामेदार शुरुआत के बीच तृणमूल कांग्रेस द्वारा पेश किया गया अविश्वास प्रस्ताव जरूरी समर्थन न मिल पाने की वजह से लोकसभा में भले ही गिर गया. परंतु  पूंजी निवेश के नाम पर एफडीआई का फैसला अब उसके गले की फांस बन चुका है. एफडीआई पर सरकार के फैसले के विरोध मे जहाँ 4-5 दिसम्बर को राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के चलते व्यापारी सडको पर उतरेंगे तो वही इस गम्भीर विषय पर राजनैतिक पंडित संसद मे बहस कर वोटिंग करगे. संप्रग सरकार खुदरा व्यापार में सीधे विदेशी निवेश (एफडीआई) का विरोध करने वाले दलों को जोड़-तोड़कर जुगाड से उन्हे अपने साथ कर संसद में बहुमत जुटाने में अगर सफल हो भी जाती है तो माकपा महासचिव प्रकाश करात के अनुसार वाम दल उसे लागू करने के लिए फेमा में संशोधन के समय भी मत विभाजन पर जोर देगा. उनके अनुसार केंद्र की संप्रग सरकार अमेरिका और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति देने के बाद अब वह संसद में बहुमत जुटाने के लिए इसका विरोध करने वाले दलों को जोड़ने-तोड़ने में लगी है. सपा नेता राम गोपाल यादव के अनुसार अगर सरकार एफडीआई का मुद्दा राज्यसभा में लाती है तो वे उसके खिलाफ मतदान करेंगे परंतु लोकसभा मे सपा सरकार के साथ खडी रहेगी. कृषि मंत्री शरद पवार के अनुसार भारत मे बहुब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का स्वागत है और इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा. दूसरी तरफ पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के अनुसार बहु ब्रांड खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लागू करना गरीबों के खिलाफ अपराध है. एक तरफ प्रधानमंत्री द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि खुदरा व्यापार के क्षेत्र में बडी कंपनियों के उतरने से प्रत्येक वर्ष एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा पर हकीकत यह है कि इसके कारण करीब पांच करोड़ लोगों की आजीविका छिन जाएगी. इसका ताज़ा उदाहरण यह भी है कि  अमेरिका और मेक्सिको जैसे देशों में खुदरा व्यापार के क्षेत्र में एफडीआई की अनुमति दिया जाना विफल  साबित हुई. इन राजनैतिक पंडितो के मंतव्यो से यही लगता है कि अब बिसात बिछ चुकी है और इनके बीच चल रहे शह और मात के खेल के बीच आम जनता पिसकर मात्र तमासबीन बनी हुई है.

इसका एक पहलू और भी है कि  अगर हम कुछ दिनो पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये "शहीदी वाले" वक्तव्य पर ध्यान दे  जिसमे उन्होने कहा था कि “जाना होगा तो लडते-लडते जायेंगे”  तो पायेंगे कि महँगाई, भ्रष्टाचार जैसे गम्भीर आरोपो से घिरी सरकार अब अपनी छवि सुधारने मे लग गयी है. उसके पास सरकार चलाने के लिये जुगाड से पर्याप्त संख्या बल है और अगर कभी उस संख्या बल में कोई कमी आई तो उसके पास आर्थिक पैकेज और सीबीआई रूपी ऐसी कुंजी है जिसकी बदौलत वह किसी भी दल को समर्थन देने के लिए मजबूर कर सकती है. अगर इतने में भी बात न बनी और मध्यावधि चुनाव हो भी गए तो कांग्रेस जनता को यह दिखाने के लिए हमने अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने की कोशिश तो की थी पर इन राजनैतिक दलों ने आर्थिक सुधार नहीं होने दिया का ऐसा भंवरजाल बुना जायगा कि आम-जनता उसमे खुद फंस जायेगी.

इस समय भारत की जनता के सम्मुख राजनैतिक दलों की विश्वसनीयता ही सवालो के घेरे में है और वह इन सब उठापटक के बीच मौन होकर स्थिति को भांप रही है. सरकार बेनकाब हो चुकी है और महँगाई की मार से आम जनता त्राहि - त्राहि कर रही है.  आम आदमी जो छोटे - मोटे व्यापार से अभी तक अपना परिवार पाल रहा था सरकार ने अपने एफडीआई के  फैसले से उसको बेरोजगार करने का पुख्ता इंतजाम कर लिया है क्योंकि खुदरे व्यापार से सीधे आम जनता का सरोकार है. सरकार को यह ध्यान रखना चाहिये कि विदेश निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां हमारे देश मे व्यापार करने के लिये ही आयेंगी अत: वे अपने मुनाफे के बारे मे ही सोचेंगी.

भारत जैसा देश जहां की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो , आर्थिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है परन्तु आर्थिक सुधार भारतीयों के हितों को ध्यान में रखकर करना होगा न कि विदेशियों के हितो को ध्यान में रखकर.  ऐसे मे सरकार किसके इशारे पर और किसको खुश करने के लिये और क्या छुपाने के लिए आर्थिक सुधार के नाम पर इतनी जल्दबाजी में इतने विरोधे के बावजूद  इतने बड़े - बड़े फैसले ले रही है असली मुद्दा यह है. राजनेता तो राजनीति करते ही है परन्तु परेशानी तो आम जनता को ही होती है ऐसे में भला आम जनता जाये तो कहाँ जाये.
--राजीव गुप्ता, 9811558925

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राजनीति के भंवर मे एफडीआई

Wednesday, August 15, 2012

स्वतंत्रता-दिवस की सार्थकता //राजीव गुप्ता

लगभग 60%  जनसँख्या  गरीबी में अपना जीवनयापन कर रही है
                                                                                                                                             साभार तस्वीर 
15 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध हिरोशिमा और नागासाकी के त्रासदी के रूप में कलंक लेकर समाप्त तो हुआ परन्तु जापान पिछले वर्ष आये भूकंप और सूनामी जैसी त्रासदी के बाद भी बिना अपने मूल्यों से समझौता किये राष्ट्रभक्ति, अपनी ईमानदारी और कठिन परिश्रम के आधार पर अखिल विश्व के मानस पटल पर लगभग हर क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ता हुआ नित्य-प्रतिदिन आगे बढ़ता जा रहा है. ठीक दो वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को भारतवर्ष ने अपने को रणबांकुरों के बलिदानों की सहायता से एक खंडित-रूप में अंग्रेजों की बेड़ियों से स्वाधीन करने से लेकर अब तक भारत ने कई क्षेत्रो में को अपनी उपलब्धियों के चलते अपना लोहा मनवाने के लिए पूरे विश्व को विवश कर दिया.
भारत ने लंबी दूरी के बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र अग्नि-5 का परीक्षण किया जिसकी मारक-क्षमता चीन के बीजिंग तक की दूरी तक है और अरिहंत नामक पनडुब्बी का विकास किया  जो कि परमाणु ऊर्जा से चलती है तथा पानी के अन्दर असीमित समय तक रह सकती है और साथ ही सागरिका जैसी मिसाइलो को छोड़ने में भी सक्षम है को अपनी नौ सेना में शामिल कर अपनी सामरिक शक्ति में कई गुना वृद्धि किया तो वहीं रिसैट-1 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण कर दिखाया जिससे बादल वाले मौसम में भी तस्वीर ली जा सकती है. भारत अपने भुवन" नामक तकनीकी के माध्यम से गूगल अर्थ तक को पीछे छोड़ दिया है. इस तकनीकी के माध्यम से दुनिया भर की सैटेलाईट तस्वीर बहुत बेहतर तरीके से जिसकी गुणवत्ता गूगल अर्थ की गुणवत्ता से कई गुना बेहतर है.
अपने पहले मानवरहित चंद्रयान-1 के माध्यम से चन्द्रमा की धरती पर तिरंगे साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ ही  भारत विश्व का चौथा देश बन गया. इतना ही नहीं चिकित्सा क्षेत्र में नैनोटेक्नोलॉजी के माध्यम से हमारे देश ने गत कुछ समय में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं परिणामतः कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का भी इलाज संभव हो गया है.  भारत हर वर्ष एक नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसकी वजह से पूरा विश्व भारत को उभरती हुई महाशक्ति के रूप में मान्यता देने को मजबूर हुआ है. टीम इंडिया ने विश्व कप क्रिकेट 2011 पर कब्जा जमाया तो भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स और फॉर्मूला वन रेस का आयोजन कर दुनिया में अपना परचम लहरा दिया.
परन्तु भारत की इन उपलब्धियों के बावजूद इसका एक दूसरा रूप भी है. भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनता अभी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण भारत से सम्बन्ध रखती  है.  भारत में हुई हरित क्रांति के इतने साल बाद भी हम नई खेती के तरीको को मात्र 20 - 25  प्रतिशत खेतो तक ही ले जा पायें है . आज भी भारतीय - सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी) में  कृषि का  लगभग 15  प्रतिशत  का योगदान है .  बावजूद इसके भारत की आधी  से ज्यादा एनएसएसओ के ताजा आंकड़ो के आधार पर लगभग 60%  जनसँख्या  गरीबी में अपना जीवनयापन कर रही है . देश का कुल 40 प्रतिशत हिस्सा सिंचित/असिंचित है . इन क्षेत्रो के किसान पूर्णतः मानसून पर निर्भर है . आज भी किसान जोखिम उठाकर बीज, खाद, सिंचाई इत्यादि के लिए कर्ज लेने को मजबूर है ऐसे में अगर फसल की पैदावार संतोषजनक न हुई आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है .
भारत में किसानो की वर्तमान स्थिति बद से बदत्तर है . जिसे सुधारने के लिए सरकार को और प्रयास करना चाहिए . इसी के मद्देनजर किसानो की इस स्थिति से निपटने हेतु पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में गत वर्ष अक्टूबर में एक कमेटी बनायीं गयी थी जो शीघ्र ही सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपेगी . इन सब उठापटक के बीच इसका एक  दूसरा पहलू यह भी है कि सीमित संसाधन के बीच यह देश इतनी बड़ी आबादी को कैसे बुनियादी जरूरतों को उपलब्ध करवाए यह अपने आपमें एक बड़ा सवाल है जिसके लिए आये दिन मनरेगा जैसी  विभिन्न सरकारी योजनाये बनकर घोटालो की भेट चढ़ जाती है और भारत - सरकार देश से गरीबी खत्म करने के खोखले दावे करती रहती है .
सिर्फ इतना ही नहीं भारत में स्वास्थ्य - सेवा तो भगवान भरोसे ही है अगर ऐसा माना जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी . एक तरफ जहा हमारी सरकार चिकित्सा - पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती  है तो वही देश का दूसरा पक्ष कुछ और ही बयान करता है जिसका अंदाज़ा हम आये दिन देश के विभिन्न भागो से आये राजधानी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के आगे जमा भीड़ को देखकर लगा सकते है जहाँ एक छोटी बीमारी की इलाज के लिए ग्रामीण इलाके के लोगों को दिल्ली - स्थित एम्स आना पड़ता है . एक आकडे के मुताबिक आजादी के इतने वर्षों के बाद भी इलाज़ के अभाव में प्रसव - काल में 1000 मे 110 महिलाये दम तोड़ देती है . ध्यान देने योग्य है कि यूएनएफपीए के कार्यकारी निदेशक ने प्रसव  स्वास्थ्य सेवा पर चिंतित होते हुए कहा है कि विश्व भर में प्रतिदिन लगभग 800 से अधिक महिलाये प्रसव  के समय दम तोड़ देती है . भारत में आज भी एक हजार बच्चो  में से 46 बच्चे काल के शिकार हो  जाते है और 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते है .
भारत को अब मैकाले – शिक्षा नीति को भारत-सापेक्ष बनाना नितांत आवश्यक है क्योंकि प्राचीन भारतीय शिक्षा दर्शन का परचम विश्व में कभी लहराया था. प्राचीन भारत का शिक्षा-दर्शन की शिक्षा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए थी. इनका क्रमिक विकास ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य था. मोक्ष जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य था और यही शिक्षा का भी अन्तिम लक्ष्य था. प्राचीन काल में जीवन-दर्शन ने शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया था. जीवन की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का प्रभाव शिक्षा दर्शन पर भी पड़ा था. उस काल के शिक्षकों, ऋषियों आदि ने चित्त-वृत्ति-निरोध को शिक्षा का उद्देश्य माना था. शिक्षा का लक्ष्य यह भी था कि आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो. किन्तु इसका यह भी अर्थ नहीं था कि लोकोपयोगी शिक्षा का आभाव था. प्रथमत: लोकोपयोगी शिक्षा परिवार में, परिवार के मध्यम से ही सम्पन्न हो जाती थीं. वंश की परंपरायें थीं और ये परम्परायें पिता से पुत्र को हस्तान्तरित होती रहती थीं.
प्राचीन युग की प्रधानता होने से राजनीति में हिंसा और शत्रुता, द्वेष और ईर्ष्या, परिग्रह और स्वार्थ का बहुल्य न होकर, प्रेम, सदाचार त्याग और अपरिग्रह महत्वपूर्ण थे. उदात्त भावनायें बलवती थीं. दिव्य सिद्धान्त जीवन के मार्गदर्शक थे. सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति प्रधान नहीं था, अपितु वह परिवार और समाज के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करने को तत्पर था. उदात्त वृत्ति की सीमा सम्पूर्ण वसुधा थी. जीवन का आदर्श ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ था. भौतिकवादिता को छोड़ व्यवसायों के क्षेत्र में प्रतियोगिता नहीं के बराबर थीं. सभी के लिए काम उपलब्ध था. सभी की आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती थीं. भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार और  काले  -धन जैसी सुरसा रूपी बीमारी को खत्म करके तथा तंत्र-व्यवस्था को भारतीय - सापेक्ष कर एकांगी-विकास की बजाय समुचित-विकास पर ध्यान देना चाहिए ताकि एक खुशहाल और समृद्ध भारत का सपना साकार हो सके और हर भारतीय स्वतंत्रता की सार्थकता को समझ सकें.    

 - राजीव गुप्ता, लेखक,  9811558925
 पंजाब स्क्रीन में भी देखें 
दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास