खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे नरेन्द्र
तस्वीर ओशो टीचिंग से साभार |
नारी चिंतन
न्यूयार्क मे भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जबतक वहाँ का समाज स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर प्रत्येक मानव मे मानवता का दर्शन नही करता और यह नही सोचता कि स्त्री-पुरुष दोनो एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी है तबतक वहाँ की स्त्रियो का वास्तविक रूप से उत्थान नही हो सकता. मात्र बौद्धिक और अक्षर ज्ञान से ही मानव का कल्याण संभव नही है. अपितु मानव – कल्याण हेतु बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के साथ – साथ उसकी अध्यात्मकिता और नीतिमत्ता की उन्नति भी अत्यंत आवश्यक है. भारत की नारियाँ भले ही बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के स्तर पर अमेरिका की नारियो से पीछे हो परंतु वे सदैव अपने शील की रक्षा के साथ-साथ एक चरित्रवान जीवनायपन करते हुए अपने पवित्र आचार-विचार और हृदय की पवित्रता के माध्यम से अध्यात्म के सहारे मानव-कल्याण के पथ पर अग्रेसित होती है. स्वामी जी ने अपने भाषण मे वहाँ के प्रेमाचार के विषय पर कहा कि अगर वे विवाहेच्छुक होते तो अमेरिका के अन्य नवयुवको की भाँति सैकडो बार प्रेमाचार के आडम्बर की अपेक्षा बिना किसी आडम्बर के किसी एक के प्रियपात्र बन चुके होते है. अमेरिका मे बढते तलाको की संख्या पर चिंतित होकर उन्होने वहाँ बताया कि भारतीय समाज मे यह सर्व-शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपने पति-पत्नी के अलावा अन्य सभी को मातृवत-पुत्रवत की नजर से देखे. अमेरिका मे स्त्री भोगवादी मानसिकता के केन्द्र-बिन्दु मे वास करती है परंतु भारत मे स्त्री सदैव से पूज्या रही है. इसी भारतीय-चिंतन के चलते भारत मे तलाको की संख्या अमेरिका के अपेक्षाकृत नगण्य है.
व्यक्तित्व विकास
राजीव गुप्ता-9811558925 |
शिक्षा
शिकागो से भारत वापस लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. स्वामी विवेकानन्द ने एक सभा मे शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का आधार धर्म होना चाहिये और उसका केन्द्र बिन्दु “चरित्र-निर्माण” ही होना चाहिये. धर्म से उनका तात्पर्य मात्र पूजा-पद्धति ही नही था अपितु “जीवन जीने की कला” था जिसकी पुष्टि उन्होने विचार-शक्ति का महत्व, कर्म का परिणाम और भाग्य के निर्माण इत्यादि जैसे विभिन्न विषयो पर अपने विचार रखकर किया. स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि हम जैसे सोचते है वैसे ही बन जाते है क्योंकि विचार सजीव होते है परिणामत: वाणी की अपेक्षाकृत उनका अधिकतम प्रभाव सदैव हमारे जीवन पर पडता रहता है. अत: हमे अपने विचारो के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये.
स्वामी विवेकानन्द शिक्षा हेतु किसी भी प्रकार के दंड देने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था कि जिस प्रकार प्रताडित करके गधे को घोडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार किसी भी प्रकार की प्रताडना से हम उसे अक्षर ज्ञान तो दे सकते है पर हम उसे शिक्षित नही बना सकते. इसलिये उन्होने शिक्षित बनाने हेतु ठोक-प्रणाली का खुलकर विरोध किया और उनका मानना था कि शिक्षा के माध्यम से मानसिक बल, चरित्र-निर्माण और बुद्धि का विकास होता है, इतना ही नही “मन की एकाग्रता” ही शिक्षा का सार है और शिक्षा के माध्यम से मिले सारे प्रशिक्षणो का उद्देश्य व्यक्ति-विकास ही है.
किसी भी देश की उन्नति मे वहाँ के शिक्षित-प्रतिशत की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. क्योंकि देश की उन्नति का अनुपात और जन-समुदाय के शिक्षित का अनुपात सदैव परस्पर निर्भर होते है. भारतवर्ष के पिछडेपन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कुछ चन्द लोगो ने शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमा रखा है. गाँवो मे शिक्षा-रूपी दीपक का प्रकाश अभी भी धूमिल ही है. अत: यदि किसी अभाववश विद्यालय मे विद्यार्थी न पहुँच पाये तो विद्यालय को स्वयम उन अभावाग्रस्त विद्यार्थियो के पास पहुँचकर उनकी मातृभाषा मे ही उन्हे शिक्षा देनी चाहिये. इसके साथ- साथ शिक्षा मे संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा का स्थान विशिष्ट होना चाहिये. संस्कृत भाषा मात्र वेदो-उपनिषदो की भाषा बनकर न रहकर जाय अत: इसके प्रचार-प्रसार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा पर केवल ब्राह्मण विशेष का अधिकार न होकर अपितु सभी सभी लोगो का समान अधिकार है. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यही है कि वह व्यक्ति को स्वामी बनाये परिणामत: वह सदैव एक स्वामी की तरह कार्य करे न कि किसी भी प्रकार के गुलाम की तरह.
-राजीव गुप्ता (9811558925) आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता
1 comment:
नत नमण श्रद्धांजली नरेंदर नाथ दत्त जी
शिकागो के मैक्रोमिक भवन को आते जाते मस्तक स्यम ही मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है शिकागो के दीवान एवेन्यू के महात्मा गाँधी मार्ग पर महात्मा गांधी जी के आठ फीट कांसे की मूर्ती पर अपने भारत के ही नहीं बहुत से अमरीकी भी श्रद्धा से फूल चढ़ाते और नत मस्तक करते देखे हैं
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