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Thursday, November 10, 2016

लुधियाना:लोग पैसे के लिए रहे रात तक परेशान

बैंकों के आगे लगी रही भीड़-स्टाफ भी परेशान रहा-बाजार रहे सुनसान 
लुधियाना: 10 नवम्बर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन)
हफरातफरी के बाद लोग कुछ शांत थे। न उन्हें सिमी के पुलिस मुकाबला की कोई याद थी, न ही पाकिस्तान के हमलों में शहीद हो रहे सेना के जवानों की और न ही जल्द जेब में आने वाले 15-15 लाख रूपये के काले धन की और न ही बढ़ती हुई महंगाई की। बस सभी को एक ही चिंता थी--पैसे की चिंता। जमा करने में फायदा होगा या चेंज करवाने में? इस सवाल को बार बार एक दुसरे से पूछा जा रहा था। 
लोग पैसे की चिंता में थे। जेब खाली थी। बाजार सुनसान से थे। सब को सब जगहों से उधारी नहीं मिल रही थी। छोटे छोटे खर्चे पहाड़ नज़र आ रहे थे। कहीं पर लोग खुद से उलझ रहे थे तो कहीं पर बैंक के स्टाफ और सुरक्षा गार्डों से। जब यह तस्वीर क्लिक की गईं उस समय अँधेरा छा रहा था। सन्ध्या के वक़्त भी लोग बैंक के गेट पर थे। न किसी को पूजा पाठ याद था न ही कोई और ख्याल। किसी ने स्कूल में बच्चों की फीस देनी थी। किसी ने बीमार मरीज़ के लिए फ्रूट या सूप लेना था। ये लोग मध्य वर्गीय थे। इन्होंने सिर्फ बड़े से बड़ा करेंसी नोट यही देखा था और उसे हर आफत का इलाज समझ कर बैंक में सम्भाल दिया था। बैन के एलान ने उनकी नींद उड़ा दी। जिनके पास काला धन था उनकी चिंता कुछ और तरीके से बाहर आई। किसी ने बोरिया भर कर नोट जला दिए और किसी ने सड़क किनारे कूड़े में फेंक दिए। धर्म कर्म की बातों में अग्रणी रहने वाले इस समाज में आफत आने पर भी नहीं सोचा गया कि चलो कुछ फ़ालतू के नोट फेंकने या जलाने की बजाये किसी ज़रूरतमन्द को दान दे दिए जाएँ। इस सारे घटनाक्रम ने साबित कर दिया कि हमारे समाज में बस यही सत्य है----बाप बड़ा न भईया--सबसे बड़ा रुपईया। ऊपर दी गयी तस्वीरों में से एक तस्वीर है सेंटर बैंक आफ इण्डिया के गेट पर मौजूद लोगों की, दूसरी है पंजाब एंड सिंध बैंक की और तीसरी है पंजाब नेशनल बैंक की। यह तीनों शाखाएं लुधियाना के सिविल लाईन एरिया की हैं।  क्या अब भी यह समाज समझेगा कि असली धन यह करेंसी नहीं होती। असली धन उन सच्चे वायदों में छुपा होता है जो चुनावी जुमले नहीं होते। फिलहाल तो यही सच है कि एक बार फिर यही साबित हुआ--बाप बड़ा न भईया--सबसे बड़ा रुपईया। 

Friday, April 22, 2016

जनाब कैफी आज़मी साहिब की एक दुर्लभ रचना-लेनिन-

एक पत्थर से तराशी थी जो तुमने दीवार,
इक खतरनाक शिगाफ़ उसमें नज़र आता है। 
यह वह दर्द है जिसे जनाब कैफी आज़मी साहिब ने बहुत पहले ही महसूस कर लिया था। इस दर्द के कारण ही उनके दिल से निकला--
हादसा कितना कड़ा है कि सर-ए-मंज़िल-ए शौक,
काफिला चाँद गिरोहों में बंटा जाता है। 
अधिकतर कम्युनिस्ट कहनी और करनी के एक रहे। मैंने बहुत से जानेमाने कम्युनिस्ट नेतायों को नज़दीक से देखा। जिनकी चर्चा किसी अलग पोस्ट में जल्द की जाएगी। वे चाहते तो अपनी सात पुश्तों के लिए अपार धन जमा कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद भी सादगी से जीवन व्यतीत किया और उनके परिवारों ने भी। हमेशां मेहनत पर यकीन रखा और जन संघर्षों के लिए हर पल तैयार रहे। इसके बावजूद लाल झंडे की कई पार्टियां बन गईं।  ऐसी हालत में कैफी साहिब के लेनिन को सम्बोधित शब्द बहुत अधिक महत्वपूर्ण बन जाते हैं--
देखते हो तो कोई सुलह की तदबीर करो,
हो सके ज़ख्म रफू जिससे वो तकरीर करो। 
बहुत अच्छा होगा अगर औपचारिक नारेबाजी ुार जन्मदिन मुबारक की जगह लेनिन के जन्म दिन पर सभी वे लोग एकजुट होकर लाल झंडे की लहर को मज़बूत करने का संकल्प करें जिनको किसी भी तरह इस झंडे और इसके मकसद से ज़रा सा भी लगाव है। -- रेक्टर कथूरिया  
आसमां और भी ऊपर को उठा जाता है 
तुमने सौ साल में इंसां  को किया कितना बुलंद। 
*पुश्त पर बाँध दिया था जिन्हें जल्लादों ने, 
फेंकते हैं वही हाथ आज सितारों पे कमन्द। 
                                  देखते हो कि नहीं !
Courtesy Photo 
जगमगा उठी है मेहनत के पसीने से *जबीं,
अब कोई खत, खत-ए -तक़दीर नहीं हो सकता। 
तुमको हर मुल्क की सरहद पे खड़े देखा है,
अब कोई मुल्क हो तसखीर नहीं हो सकता। 
Punjab Screen
खैर हो बाज़ू-ए-कातिल की मगर खैर नहीं!
आज *मकतल में बहुत भीड़ नज़र आती है। 
कर दिया था कभी हल्का सा इशारा जिस *सम्त,
सारी दुनिया उसी *जानिब को मुड़ी जाती है। 
Punjab Screen
हादसा कितना कड़ा है कि सर-ए-मंज़िल-ए शौक,
काफिला चाँद गिरोहों में बंटा जाता है।  
एक पत्थर से तराशी थी जो तुमने दीवार,
इक खतरनाक *शिगाफ़ उसमें नज़र आता है। 
Punjab Screen
देखते हो तो कोई सुलह की तदबीर करो,
हो सके ज़ख्म रफू जिससे वो तकरीर करो। 
*एहद-ए-पे पेचीदा *मसाईल हैं सवा पेचीदा,
उनको सुलझाओ, सहीफा कोई तहरीर करो। 
Punjab Screen
रूहें आवारा हैं दे दो इन्हें *पैकर अपना,
भर दो हर पारा-ए-फौलाद में जौहर अपना। 
रहनुमा फिरते हैं या फिरती हैं बेसर लाशें?
रख दो हर अकड़ी हुई लाश पे तुम सर अपना। 
Punjab Screen
*पुश्त-पीठ, *जबीं-माथा, *मकतल-कत्लगाह, *सम्त-दिशा, *जानिब-तरफ, *एहद-ए-पे पेचीदा-उलझा हुआ समय, *मसाईल-समस्याएं, *शिगाफ़-सेंध/दरार,  *पैकर-जिस्म 

जनाब कैफी आज़मी साहिब की एक दुर्लभ रचना-लेनिन-

Thursday, March 19, 2015

22 मार्च के सम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन के लिए तैयारियां शिखर पर

Thu, Mar 19, 2015 at 5:29 PM
मज़दूर संगठनों द्धारा जोरदार प्रचार मुहिम जारी
लुधियाना के साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन में पहुंचेंगे बड़ी संख्या में लोग 
लुधियाना:19 मार्च 2015: (*लखविन्दर//पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब व टेक्सटाइल-हौज़री कामगार यूनियन, पंजाब द्वारा साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन की तैयारियाँ बड़े स्तर पर की जा रही हैं। 22 मार्च को लुधियाना में होने वाला यह सम्मेलन नौजवान भारत सभा, पंजाब स्टूडेंटस यूनियन (ललकार), बिगुल मज़दूर दस्ता, कारखाना मज़दूर यूनियन व टेक्सटाइल हौज़री कामगार यूनियन द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। का.म.यू. व टे.हौ.का.यू. की प्रचार टोलियों ने लुधियाना के लोगों में खासकर कारखाना मजदूरों के बीच सघन प्रचार अभियान चलाया जा रहा है। अनेकों नुक्कड़ सभाएँ, मीटिंगें, पैदल व साईकिल मार्च आयोजित किए जा रहे हैं। घर-घर जाकर लोगों को धार्मिक कट्टरपंथियों की लोगों में धार्मिक नफरत का जहर घोल कर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की साजिशों के खिलाफ़ आगे आने का आह्वान किया जा रहा है। हिन्दी-पंजाबी में बड़े पैमाने पर पर्चा बाँटा जा रहा है। शहर में पोस्टर लगाकर सम्मेलन की सूचना लोगों तक पहुँचाई जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इसके बारे में मुहिम चलाई जा रही है। लोगों से इस मुहिम के प्रति काफ़ी समर्थन मिल रहा है और बड़ी संख्या में लोगों के इस सम्मेलन में शामिल होने की अपील है।
    सभी धर्में के कट्टरपंथी लोगों को आपस में लड़ाने की साजिशें बहुत तेज़ कर चुके हैं। हिन्दुत्वी कट्टरपंथी ताकतों का आधार अधिक मज़बूत है इसलिए अल्पसंख्यकों पर अत्यधिक खतरा मँडरा रहा है। साम्प्रदायिकता का नुक्सान सभी धर्मों के लोगों को ही उठाना पड़ता है। अल्पसंख्यक धर्मों के कट्टरपंथी भी हिन्दुत्वी कट्टरपंथियों की काली करतूतों का फायदा उठाकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं। सभी कट्टपंथियों का निशाना एक ही है कि लोगों को आपस में बाँटकर लोगों के निर्मिम आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक शोषण के एजण्डे को आगे बढ़ाया जाए। श्रम कानूनों में गम्भीर मज़दूर विरोधी संशोधन किए जा रहे हैं, लोगों से सरकारी सेहत, शिक्षा, परिवहन, पानी, बिजली आदि सहूलतों बड़े स्तर पर छीनी जा रही हैं, पूँजीपतियों के लिए लोगों खासकर किसानों की जमीन जबरन छीनने के लिए घोर गैरजनवादी कानून बनाए जा रहे हैं, लोगों के संघर्षों को कचलने के लिए काले कानून बनाए जा रहे हैं। जैसे-जैसे पूँजीवादी व्यवस्था का आर्थिक-राजनीतिक संकट बढ़ता जा रहा है और लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती जा रही है वैसे वैसे हुक्मरान धार्मिक कट्टरपंथ को ज्यादा से ज्यादा हवा देने में लगे हुए हैं।
हुक्मरान जनता गुस्से से बहुत डरे हुए हैं और इसलिए जनता के सारे जनवादी अधिकार छीन लेना चाहते हैं। जनवादी अधिकारों का दायरा अधिक से अधिक कम होता जा रहा है और व्यवस्था का फासीवादीकरण बढ़ता जा रहा है। मज़दूरों, मेहनतकशों, नौजवानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों, सास्कृतिकर्मियों, कलाकारों को साम्प्रदायिक फासीवाद के इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए बड़े अन्दोलन की तैयारियाँ करने होंगी। साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई बड़ी कुर्बानियों की माँग करती है। जनवादी-क्रान्तिकारी ताकतों को बेहद सख्त लड़ाई के लिए तैयार होना होगा।
22 मार्च को लुधियाना में किया जा रहा यह सम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरु की 84वीं शहादत वर्षगाँठ को समर्पित है। हमें महान क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा और रास्ता लेकर साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष के मैदान में कूदना होगा। भगतसिंह और उनके साथियों की यह सोच पूरी तरह दरुस्त थी कि लोगों की आर्थिक-राजनीतिक मुद्दों पर बनी एकता ही साम्प्रदायिक ताकतों को धूल चटा सकती है। 22 मार्च का लुधियाना में होने वाला सम्मेलन लोगों में जहाँ साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ आपसी भाईचारा मज़बूत करने का संदेश देगा वहाँ लोगों को पूँजीवादी लूट-शोषण के खिलाफ़ अपने अर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर वर्ग एकता मज़बूत करने का आह्वान भी करेगा।
लखविन्दर-कारखाना मज़दूर यूनियन, पंजाब (रजि.) के अध्यक्ष हैं और उनका फोन नम्बर है - 9646150249

Tuesday, September 24, 2013

INDIA: सत्ता में सहभागिता का भ्रम-2//--सचिन कुमार जैन

An Article by the Asian Human Rights Commission  Mon, Sep 23, 2013 at 9:06 AM
लोगों ने विरोध किया तो उन्हे राष्ट्र विरोधी और नक्सलवादी कह कर अपराधी करार दिया गया
विकास के नाम पर सरकार के काम लोगों के खिलाफ जा रहे हैं
एक अच्छा शासन व्यावस्था का सूचक है व्यवस्था में समाज की हिस्सेदारी; इस हिस्सेदारी का मतलब यह अहसास बनाए रखना है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं है. सत्ता में लोगों की सहभागिता की वकालत करते समय हम मानते हैं कि समाज को किसी भी गलत व्यवहार के खिलाफ निर्णय लेने का अधिकार भी होगा. उड़ीसा के नियमागिरी क्षेत्र में आदिवासी जिस पहाड़ को पूजते हैं और जिससे उनकी खाद्य और आजीविका सुनिश्चित होती है, बाक्साईट के लिए उस पहाड़ को मिटाने की योजना बन गयी क्योंकि विकास होना है. लोगों ने विरोध किया तो उन्हे राष्ट्र विरोधी और नक्सलवादी कह कर अपराधी करार दिया गया. आखिर में सर्वोच्च न्यायलय ने संविधान की लाज रही और कहा कि ग्राम सभाएं तय करेंगी कि वहाँ खनन होगा या नहीं; आखिर में सभी १२ ग्राम सभाओं ने खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित किया. यह एक उदहारण है कि विकास के नाम पर सरकार के काम लोगों के खिलाफ जा रहे हैं.
वर्ष २००६ में हमारी संसद ने एक और क़ानून बनाया – वन अधिकार क़ानून; यह क़ानून इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसमे सरकार ने माना था कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्याय होता रहा है और उनसे उनके संसाधन छीने जाते रहे हैं. वे हज़ारों साल से जिस जमीन पर रहते हैं, उन जमीनों को पहले अंग्रेजों और बाद में भारत की सरकारों ने कागजों पर गलत नियम – क़ानून बना कर अपने कब्जे में ले लिए और प्राकृतिक अधिकार के बावजूद आदिवासियों और जंगलों में रहने वालों को अतिक्रमणकारी कहा जाने लगा. भारत सरकार ने कहा अब उन्हे जंगल पर अधिकार दिया जायेगा; पर इसके लिए आदिवासी समाज को प्रमाण देकर यह सिद्ध करना था कि कि वह कितने और किस जरूरत के लिए जंगल का उपयोग करता है! जो समाज अपनी ही व्यवस्था में रहता आया हो, जिसमे जंगल या जमीन को निजी संपत्ति न माना हो; उससे कागजी प्रमाणों की मांग की गयी. इसके उलट दूसरी तरफ सरकार के पास हर जिले में हर गांव के बारे में यह जानकारी दस्तावेजी रूप में उपलब्ध है कि संसाधनों का समुदाय कैसा उपयोग करता है? ऐतिहासिक अन्याय से मुक्त करने के मकसद से बनाए गए क़ानून में सरकार ने यह नहीं कहा कि हम उनकी मुक्ति का पहला कदम उठाएंगे और हर दस्तावेज ग्राम सभा को बिना मांगे उपलब्ध करवाएंगे. यही कारण है कि आज भी देश भर में लोगों को केवल ३ प्रतिशत सामुदायिक हक मिल पाए हैं. ऐसे में समावेशी विकास और सहभागिता के मौजूदा चेहरे पर कितना विश्वास किया जाना चाहिए?
भेदभाव अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है. पारंपरिक रूप से दलितों के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक छुआछूत की व्यवस्था बनी रही है. स्कूल में बच्चों के साथ भेदभाव, कुएं पर पानी भरने और दलित व्यक्ति को घोड़ी पर चढ़ कर बारात ले जाने तक की अनुमति नहीं रही. आज भी दलित के पास जमीन है भी तो उस पर ऊँची जाति का कब्ज़ा बरकरार है. इसी श्रृंखला में अब भेदभाव का नया रूप जुड़ गया है. श्योपुर जिले के कराहल विकास खंड के एक गांव में १० बच्चे मध्यान्ह भोजन नहीं करते हैं; वे कहते हैं कि हम किसान है. इसी तरह सीहोर में भी अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे स्कूल का खाना नहीं खाते हैं, क्योंकि दलित महिलाओं का समूह भोजन पकाता है. अब तक ऊँची जातियां दलितों और आदिवासियों को भेदभाव के नाम पर बाहर धकेलती रही हैं; पर अब वे खुद के बहिष्कार की सोची समझी तकनीक के जरिये भेदभाव और ऊँचे-नीचे होने की भावना को बरकरार रखने की दिशा में बढ़ गयी हैं.
इसी दौर में भारत में पंचायतों में महिलों के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी; पर २० सालों के अनुभव बताते हैं कि लोगों को सत्ता सौंपने के मकसद से स्थापित विकेन्द्रीकरण की इस व्यवस्था में उन्हे न तो शक्ति संपन्न बनने के लिए प्रशिक्षण की कोई ठोस व्यवस्था की गयी, न ही उनके संरक्षण की कोई व्यवस्था खड़ी की गयी. सहभागिता के नाम पर महिलाओं, दलित और आदिवासियों को एक तरफ आरक्षण दिया गया, तो वहीँ दूसरी तरफ व्यावस्था ऐसे बुनी गयी कि वंचित समुदायों के ये वंचित प्रतिनिधि ऊँची जातियों, ऊँची जातियों के प्रतिनिधियों और नौकरशाही के नए उपनिवेश बन गए. सरकार की उलझावदार व्यावस्था में अच्छे-अच्छे फँस जाते हैं, वहाँ पंचायत सचिवों को ताकतवर बना दिया गया और उन्होंने नौकरशाही के साथ गठजोड़ करके चुने हुए जनप्रतिनिधियों को ऐसा फंसाया कि विकेन्द्रीकरण की सोच पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया. कुल मिला कर बात यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को सरकार ने क्रियान्वयन के काम में जुटा दिया, अंतिम निर्णय लेने के अधिकार नौकरशाही को दे दिए और ऐसा माहौल बनाया कि पंचायत में जन-सहभागिता का मतलब समुदाय में बिखराव हो गया. मध्यप्रदेश की ग्रामपंचायत अपने सचिव (जिसे लोग मंत्री कहते हैं) को नहीं हटा सकती है न शिक्षक को नहीं हटा सकती है. उन्हे यह अधिकार दिया गया है कि वे सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के हितग्राहियों का चयन करें; वे २० पात्र लोगों का चयन करते हैं पर सरकार १० लोगों को पेंशन देती है; इससे लोगों के मन में भी पंचायत व्यवस्था के खिलाफ अविश्वास पैदा होता है. जैसे भारत की सरकार और संसद में किसी भी मांग को खारिज करने के कारण नहीं बताए जाते हैं, वैसे ही पंचायत में भी यह किसी को पता नहीं चलता है कि उन्हे समय पर मजदूरी क्यों नहीं मिल रही है या उनके स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं है? बस लोगों को चुपचाप स्थिति को "जहाँ है जैसी है" के सिद्धांत पर ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने की बाध्यता है. यही उनकी राज्य के प्रति जिम्मेदारी है.
राजनीतिक व्यवस्था में सहभागिता सुनिश्चित किये बिना लोकतंत्र में सहभागिता आयेगा; यह कल्पना करना बेमानी है. वर्ष २०१३ में जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं; वहाँ चुनावी प्रक्रियाएं इस बात से तय होती हैं कि किस विधान सभा क्षेत्र में कितने दलित, कितने आदिवासी, कितने मुसलमान और कितने पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं. इसी आधार पर उम्मीदवारी तय होती है. फिर यह देखा जाता है कि जैन, अग्रवाल या यादव कितने हैं!! इन आधारों पर संपन्न होने वाले चुनावों के बाद जो व्यवस्था बनेगी क्या वह समग्र समाज की सहभागिता की पक्षधर होगी?
दो साल पहले भारत की वृद्धि दर ९ प्रतिशत सालाना थी. इस साल अनुमान था कि यह ५.५ प्रतिशत रहेगी, पर अप्रैल २०१३ की पहली तिमाही में वृद्धि दर ४.४ प्रतिशत रही. पिछले कुछ सालों में हमने खूब आर्थिक विकास किया क्योंकि तब हम अपने संसाधनों (खनिज़, जंगल, नदियों और श्रम) का एकसाथ बेतरतीब शोषण कर रहे थे, उन्हे बेंच रहे थे. इससे खूब पैसा आ गया. हज़ारों लाखों साल में इन संसाधनों से संपन्न हुए थे. हमरे विकासकार इन संसाधनों को एक ही बार में उपयोग में ले आना कहते हैं. आप एक कोयला या बाक्साईट निकाल सकते हैं; फिर जब २० से ३० सालों में यह खत्म हो जायेगा तो क्या करेंगे? समाज, खास तौर पर आदिवासी समाज इस लूट का विरोध करता रहा है. वह जानता है कि प्रकृति और इंसान का विकास एक दूसरे पर निर्भर है; परन्तु संसाधनों के शोषण आधारित विकास को लागू करने के लिए सत्ता ने हर तरह के हथियारों का उपयोग किया. अब विकास के बीस सालों के बाद चमक का तारा टूटने लगा क्योंकि सरकार के एजेंडे में प्रकृति का संरक्षण रहा ही नहीं. अगस्त २०१३ में वित्तमंत्री ने इसे साबित भी कर दिया. उन्होंने अर्थव्यवस्था को फिर से विकास की पटरी पर लाने के लिए संसद के सामने १० बिंदुओं की एक कार्ययोजना रखी.; उसमे समाज की प्राथमिकताओं और सहभागिता का कोई जिक्र ही नहीं था. कुछ मामलों में (जैसे नियमागिरी में आदिवासियों के हक) सर्वोच्च न्यायालय की सक्रीय भूमिका को सरकार विकास की राह में रोड़ा मानती है. यानी सरकार आश्वस्त है कि आर्थिक विकास तो बिना सहभागिता के ही होगा; सहभागिता में तो लोग योजना बनायेंगे, प्राथमिकताएं भी वे ही तय करेंगे और निगरानी भी उन्ही की होगी; इससे जिस तबके के हितों को हमारी सरकारें संरक्षित करना चाहती हैं, उनका विकास तो हो ही नहीं पायेगा.
छत्तीसगढ़ में ग्राम सभाओं ने तय किया कि वे इस बात के पक्ष में नहीं हैं कि प्राकृतिक संसाधन कंपनियों और माफियाओं को लूटने के लिए सौंप दिए जाएँ. वे सरकार की विकास की परिभाषा को खारिज कर रहे थे. यदि सहभागिता एक मूल्य है तो उन्हे इसका अधिकार दिया जाना चाहिए था. पर इसके उलट सत्ता ने उनके खिलाफ बंदूकें तान दीं और ६०० गांवों के लोगों को अपनी जगह से बेदखल करके शरणार्थी बना दिया गया. इस व्यवस्था में सहभागिता का सिद्धांत कहाँ लागू होगा?
शासन व्यवस्था का मौजूदा चरित्र ही ऐसा है कि वह लोगों की सहभागिता को पचा ही नहीं सकती. चूँकि लोकतंत्र में सहभागिता का जिक्र होना जरूरी है इसलिए वह इसका भ्रम पैदा कर देती है. इसमे देश का बजट बनाते समय वित्तमंत्री जी कंपनियों और उद्योगपतियों के संगठनों के मंच पर जाकर उनकी बात को सुनते और समझते हैं; पर किसानों, महिलाओं, मजदूरों, आदिवासिओं और दलितों के खुले मंचों पर उन्हे जाने की हिम्मत नहीं होती. अभी सहभागिता का मतलब सत्ता में निर्णायक हिस्सेदारी नहीं है.

About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. The author could be contacted at sachin.vikassamvad@gmail.comTelephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

This is second and concluding part of a 2 part article on illusion of participation in Indian democracy.

INDIA: सत्ता में सहभागिता का भ्रम -1//सचिन कुमार जैन

Sunday, August 11, 2013

टेक्सटाइल-हौजरी मज़दूरों ने की मज़दूर पंचायत

 Sun, Aug 11, 2013 at 7:14 PM
सैंकड़ों मज़दूरों ने लिया श्रम कानून लागू करवाने के लिए संघर्ष का प्रण
लुधियाना। 11 अगस्त 2013 (विश्वनाथ*) आज टेक्सटाइल-हौकारी कामगार यूनियन के आह्वान पर मकादूरों ने चण्डीगड़ रोड पर स्थित पुडा(गलाडा) मैदान में मकादूर पंचायत की। इस में शहर के सैकड़ों मकादूरों ने भाग लेकर अपने माँग-मसलों पर चर्चा की। मकादूर नेताओं ने शहर में कारखानों के अन्दर मकादूरों के हो रहे शोषण के बारे में बोलते हुए कहा कि श्रम कानूनों के अतर्गत सुविधाएँ देना तो दुर की बात मालिक तो वर्षों से काम कर रही बड़ी मकादूर आबादी को कारखाने के अन्दर काम करने का एक पक्का प्रमाण तक नहीं देते हैं। अगर मकादूर श्रम विभाग के पास शिकायत लेकर जाते हैं तो उस पर कोई कारवाही नहीं होती। मालिकों ओर श्रम विभाग के इस रुख के प्रति मकादूरों में भारी आक्रोश है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष महँगाई बेहद बढ़ चुकी है। जिसके चलते मकादूरों के लिए परिवार का पेट भरना भी कठिन हो गया है, और मकादूर 12-12, 14-14 घंटे बिना किसी साप्ताहिक छुट्टी के काम करने को मकाबूर हैं। दूसरी तरफ कारखाना मालिकों के ऐशो-आराम में कमी नहीं हुई। उनकी फैक्ट्रियों, गाडिय़ों और बंगलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। लेकिन फिर भी कारखाना मालिक मकादूरों के वेतन व पीस रेट बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए ही मकादूरों को मकाबूर होकर संघर्ष का मार्ग अपनाना पड़ा है।
टेक्सटाइल-हौकारी कमागार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से शहर में टेक्सटाइल-हौकारी मकादूरों ने अपना संगठन बना कर संघर्ष का मार्ग चुना है। संगठन के दम पर पिछले तीन वर्षों से कुछ कारखानों  में मकादूरों ने कुछ अधिकार भी हासिल किए हैं। लेकिन जो भी हासिल किया है वह कुछ कारखानों में ही लागु हुआ है और बहुत सीमित है। श्रम कानून लागू करवाने के लिए शहर के मकादूरों का एक मकाबूत संगठन बनाना आज समय की माँग है। संगठन का जनवादी ढाँचा और फैसलों-फण्डों के सम्बन्ध में पारदर्शिता अपना कर ही संगठन को ठीक ढंग से चलाया जा सकता है। इसलिए ही संगठन ने सामूहिक फैसले लेने के लिए मकादूर पंचायत बुलाने की परम्परा शुरू की है।
मकादूर पंचायत में यूनियन कमेटी की तरफ से घनश्याम, गोपाल, हीरामन, विश्वनाथ आदि के इलावा अलग-अलग कारखानों से आए मकादूरों ने अपने काम के हलातों के बारे में चर्चा की और साथ ही यूनियन समिति की तरफ से प्रस्तावित गई माँगों को ठीक कहा और इन माँगों को हासिल करने के लिए जी-जान लगा देने का भी प्रण लिया। वक्ताओं ने कहा कि अगर आज हक-अधिकारों के लिए हम आवाज नहीं उठाते तो आने वाली नस्लों को 18-18 घंटे काम करने के लिए मकाबूर किया जाएगा।
मकादूर पंचायत में इन माँगों पर चर्चा की गई - बढ़ी महँगाई के हिसाब से इस वक्त लागू पीस रेटों और वेतन पर 30 प्रतीशत की वृद्धि की जाए, 10 या 10 से ज्यादा मकादूरों वाले कारखानों में सभी मकादूरों का ई.एस.आई. कार्ड बनाया जाए, सभी मकादूरों को 8.33 प्रतीशत की दर से सालाना बोनस दिया जाए, 20 या 20 से ज्यादा मकादूरों वाले कारखानों में सभी मकादूरों का ई.पी.एफ. चालू किया जाए, वेतन सहित सालाना छुट्टियाँ दी जाएँ और 1 मई की अन्तरराष्ट्रीय छुट्टी लागू की जाए, सभी मकादूरों के फैक्ट्री पहचान-पत्र बनाए जाएँ, रात को काम चलते समय कारखानों को ताला लगाया जाना बन्द किया जाए इसकी जगह पर चौंकीदार का प्रबन्ध किया जाए, कारखानों में साफ पीने का पानी, साफ टायल्ट-बाथरूम और आराम करने के लिए कमरे का प्रबन्ध किया जाए, वेतन और एडवांस 7 व 22 तारीख को दिया जाए और दिन के समय दिया जाए तांकि रात को होने वाली छीना-झपटी से बचाव हो सके, औरत मकादूरों को पुरूष मकादूरों के बराबर काम का बराबर वेतन दिया जाए, बच्चों समेत काम पर आने वाली स्त्री मकादूरों के बच्चों की देखभाल के लिए फैक्ट्रियों में शिशु-घर और प्रशिक्षित आया का प्रबन्ध किया जाए, शहर के बाहर स्थित कारखानों में मकादूरों को काम पर लेकर जाने और छोडऩे के लिए मालिक बसों आदि का प्रबन्ध करें, कारखानों में मकादूरों की सुरक्षा का पूर्ण प्रबन्ध किया जाए और हादसा होने की सूरत में उचित मुआवजे की गारण्टी की जाए, मकादूरों को संगठन बनाने का संविधानिक अधिकार दिया जाए, मकादूर अगुवाओं को गैरकानूनी तौर पर काम से निकाला जाना बन्द किया जाए और इन माँगोंसमेत सभी श्रम कानून लागू किए जाएँ। इन माँगों पर चर्चा के दौरान आए सुझावों पर विचार करके युनियन कमेटी एक माँग-पत्रक तैयार करके कारखाना मालिकों और श्रम विभाग को सौंपेगी। एक सप्ताह के अन्दर-अन्दर अगर मालिकों ने माँगे नहीं मानी तो यूनियन संघर्ष का मार्ग अपनाएगी।
मंच संचालन साथी ताज मोहम्मद ने किया। मकादूरों ने काोर-शोर से नाहरे लगाकर पंचायत का समाप्ण किया और एक हफते बाद फिर से एकत्र होने की सहमती बनी जिस में संघर्ष की कार्य-योजना तय की जाएगी।
*विश्वनाथ टेक्सटाइल-हौजरी कामगार युनियन, पंजाब के महासचिव हैं। 
उनसे सम्पर्क का नम्बर है: फोन नं:-9888655663

Monday, March 25, 2013

शहादत दिवस पर लुधियाना में भी हुआ जलसे का आयोजन

समाजवादी भारत के निर्माण  से ही गरीबों की जिन्दगी बेहतर बन सकेगी
इंकलाबी शहीदों के सपनों को साकार कर के हो होगा समाजवादी भारत का निर्माण 
लुधियाना: 24 मार्च। (रेक्टर कथूरिया)  शहीदों के विचारों को उलझाने और शहीदों के सपनों को धुंधलाने की अनगिनत कुचेष्टायों के बावजूद आम जनता पर शहीदों के विचारों का रंग जोर पकड़ रहा है। अश्लीलता की आंधी, गुंडागर्दी का ज़ोर और साम्प्रदायिकता के बहकावे शहीदों के विचारों का तूफ़ान रोक नहीं सके। इस बार शहीदों को याद करने के आयोजन केवल 23 मार्च तक सीमित नहीं रहे बल्कि बहुत पहले से शुरू होकर बाद तक भी जारी रहे। लुधियाना की पुडा ग्राऊंड में हुआ आयोजन भी इसी  सिलसिले की ही एक कड़ी था। जलसे के रूप में हुए इस आयोजन के ज़रिये स्पष्ट कहा गया कि ‘‘जिस आज़ादी की जंग में हिस्सा लेते हुए शहीद भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू ने भरी जवानी में फाँसी का फन्दा चूमा था वह आज़ादी अभी नहीं आई है। भगतसिंह और उनके साथियों का मकसद एक ऐसे भारत का निर्माण था जिसमें हर व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके, जहाँ रोटी-कपड़ा-मकान से लेकर स्वास्थ्य, आराम, मनोरंजन आदि सभी बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें। जहाँ हर किसी को शिक्षा हासिल हो सके, हर हाथ को रोजगार मिल सके।’’
यह शब्द आज पुडा मैदान में भारत के महान क्रान्तिकारी शहीदों को समर्पित शहादत दिवस जलसे में टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के नेता राजविन्दर ने कही। उन्होंने कहा कि भगतसिंह और उनके साथियों ने बार बार यह चेतावनी दी थी कि सिर्फ अंग्रेजी गुलामी से छुटकारा हासिल कर लेने से ही भारत के करोड़ों श्रमिकों की जिन्दगी में बुनियादी तबदीली आने वाली नहीं है। उन्होंने अनेकों बार यह स्पष्ट किया था कि सामन्ती-पूँजीवादी व्यवस्था की जगह जब तक समाजवादी आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था स्थापित नहीं हो जाती तब तक साधारण जनता की आजादी नहीं आ सकेगी। 
नौजवान भारत सभा के कनवीनर छिन्दरपाल ने इस विशाल जन जलसे को संबोधित करते हुए कहा कि आज नौजवान गन्दी, अश्लील संस्कृति व नशों में डुबो दिए गए हैं। यह इतिहास का बेहद अन्धकारमय दौर है। हमें भगतसिंह के कहे अनुसार आज के गतिरोधित दौर में इन्सानियत की रूह में नयी स्पीरिट पैदा करने के लिए जोरदार कोशिशें करनी होंगी। उन्होंने सभी इंकलाबपसंद, तबदीली पसंद युवाओं-श्रमिकों को शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के सपनों के भारत के निर्माण के लिए आगे आने का आह्वान किया।
जलसे को सम्बोधित करते हुए कारखाना मकादूर यूनियन के कनवीनर लखविन्दर ने कहा कि आज विश्व पूँजीवादी व्यवस्था अतिरिक्त उत्पादन के अटल और असाध्य संकट में बुरी तरह से घिरा हुआ है। मुनाफे की अन्धी दौड़ की वजह से पैदा हुए इस संकट का सारा बोझ जिस तरह पिछले समय में हुक्मरान मेहनतकश जनता पर डालते आए हैं, वही अब भी हो रहा है और भविष्य में यह हमला और बड़े स्तर पर होगा। इसकी वजह से आने वाले दिनों में महँगाई, छँटनियाँ, तालाबन्दियाँ, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी तेकाी से बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी हुक्मरान जनता के सम्भावित प्रतिरोध आन्दोलनों को कुचलने के लिए धर्म, जाति, इलाके, राष्ट्र, देश आादि के जरिए जनता में फूट डालने, ध्यान असल मुद्दों से भटकाने आदि साजिशें तेका कर चुके हैं। जनता को इन सभी साजिशों को नाकाम करते हुए विशाल व जुझारू आन्दोलन संगठित करने होंगे।
तर्कशील शमशेर नूरपुरी ने जादू के ट्रिक पेश किए और लोगों के सामने यह बात स्पष्ट की कि विभिन्न पाखण्डियों द्वारा दैवी शक्तियों के मालिक होने के किए जाते दावे पूरी तरह झूठ हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि दैवी शक्तियाँ हाथ की सफाई से अधिक और कुछ नहीं होतीं। लोगों को इनके झाँसों में नहीं आना चाहिए और विज्ञान से अगुवाई लेनी चाहिए।
राजविन्दर और साथियों ने क्रान्तिकारी गीतों के जरिए इंकलाबी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन के ताज मुहम्मद ने क्रान्तिकारी कविताएँ पेश कीं।
मंच संचालन लखविन्दर ने किया। अमर शहीदों का संग्राम जारी रखने का संकल्प लेते हुए गगनभेदी नारों के साथ शहादत दिवस जलसे का समापन हुआ।   

कारखाना मकादूर यूनियन, के संयोजक लखविन्दर से सम्पर्क करने के लिए मोबाईल नम्बर-9646150249 

मऊ फिल्म उत्सव: सफ़र का पांचवां पड़ाव

Sun, Mar 24, 2013 at 11:04 PM
चले चलो कि वोह मंजिल अभी नहीं आई---

एक वक्त था जब नया दौर, मदर इण्डिया, जागते रहो, मजदूर, नमक हराम जैसी फिल्मों ने एक नी चेतना के प्रचार प्रसार में अपना योगदान दिया था। यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चला था की जन विरोधी शक्तियों ने सिनेमा को अपना हथियार बना कर जनता पर वार किया। इसके परिणाम बहुत घातक भी निकले पर जल्द ही जन शक्तियां सम्भल गई। सफदर हाशमी की शहादत ने इसमें एक नी जान डाली। पंजाब में भाई मन्ना सिंह के नाम से जाने जाते गुरशरण सिंह जी ने मोर्चा सम्भाला---जो उनका देहांत होने के बाद भी जोर शोर से जारी है। अब एक अच्छी खबर आई है अयोध्या से जहाँ मऊ फिल्म उत्सव:जरी है। जन सिनेमा के सफ़र का पांचवां पड़ाव जारी है। आज इस आयोजन का अंतिम दिन है।

गौरतलब है कि अयोध्या फिल सोसायटी के बाद मऊ फिल्म सोसायटी का गठन 2008 के एक सम्मेलन के दौरान हुई बातचीत के चलते हुआ, जब साथी अरविन्द ने इस दिशा में सक्रिय कदम उठाते हुए 23 मार्च 2009 को अन्य साथियों के साथ मिलकर अपने गांव साहूपुर में पहला मऊ फिल्म उत्सव आयोजित किया। इस तरीके से मऊ फिल्म उत्सव की शुरुआत हुई। यह आयोजन शाम को शुरू होकर देर रात तक चलता है जिसमें सार्थक फिल्मों के जरिये आम लोगों से संवाद कायम करने की कोशिश की जाती है। पहले फिल्म उत्सव के दौरान आनंद पटवर्धन की फिल्म 'जंग और अमन' के प्रदर्शन के दौरान साझी विरासत के दुश्मनों ने पत्थरबाज़ी की थी जिससे हमें और ताकत मिली व अपने अभियान में हमारा विश्वास मज़बूत होता गया।
मऊ का अपनी साझी विरासत का शानदार इतिहास रहा है, लेकिन साम्प्ररदायिक ताकतें यहां की आबोहवा में मज़हबी ज़हर घोलने की साजिश में लगातार लगी रहती हैं। इन तमाम अवरोधों के बावजूद गांवों से शुरू हुआ यह सफर लगातार आगे बढ़ता जा रहा है और आज यह अपने पांचवें साल में प्रवेश कर गया है। गांव में उत्सव की पुरानी परम्परा को सहेजते हुए इस बार मऊ जिले के देवकली, पतिला और सलाहाबाद में तीन दिवसीय आयोजन इतिहास का गवाह बनने जा रहा है, जहां 'शहादत से शहादत तक' नामक आयोजन 23 से 25 मार्च 2013 के बीच सफलता पूर्वक जारी है। यह तीन दिवसीय आयोजन शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के शहादत दिवस से गणेश शंकर विद्यार्थी के शहादत दिवस तक हो रहा है। इस बार का फिल्म उत्सव समर्पित है इरोम शर्मिला को जो आज के इस लोकतन्त्र पर एक बहुत बढ़ा सवाल बन उभरी है। अपनी महानता के ढोल पीटने वालों की पोल खोलती इरोम शर्मिला। सत्ता और राजनीती की हकीकत को बेनकाब करती इरोम शर्मिला के अथक संघर्ष को है। 

मऊ फिल्म उत्सव में शामिल होने के लिए देश भर से हमारे पास हर रोज़ फोन आ रहे हैं जिससे हमारा हौसला बढ़ा है। हम आप सभी को खुले दिल से आमंत्रित करते हैं। बहुत से लोग समय पर पता न लग पाने के कारण इसमें शामिल नहीं हो पाए। पर इन सभी ने अपनी प्रसन्नता भी व्यक्त की और शुभ कामनाएं भी भेजीं। 

इस ढांचे को और बेहतर बनाने की ज़रूरत है। अपने ऊर्जावान और उत्साही साथियों की मदद से यह कारवां अपने शुरुआती तेवर के साथ दिन-ब-दिन आगे बढ़ता जा रहा है। इस सफ़र से जुड़ने के लिए हमें और नये साथियों की ज़रूरत है। उनका रास्ता खुला हुआ है, वे जब और जैसे आएं, हम उनका तहेदिल से स्वागत करते हैं। उम्मीद है की इस बार का आयोजन इस जन सिनेमा के काफिले को और विशाल करेगा। आयी हम सभी मिलजुल कर चलें। याद रखें और लगातार सबको याद दिलाते जायें---
चले चलो कि वोह मंजिल अभी नहीं आई----


प्रदर्शित फिल्में
Tales from the Margins/Kavita Joshi/23 min
 AFSPA,1958/Haobam Paban Kumar/76 min
 Inqilab/Gauhar Raza/40 min
 Jai Bim Comrade/Anand Patwardhan/199 min
 Children of Heaven/Majid Majidi/ 89 min
 Gaon Chodab Nahin/KP Sasi/5:18 sec

Garm Hava/ MS Sathyu/146 min
 Bawandar/Jag Mundhra/125 min
 India Untouched/Stalin K/108 min

Friday, October 12, 2012

15 अक्तूबर को डी.सी.दफ़्तर पर धरना-प्रदर्शन

मकसद: बेहतर रिहायशी प्रबंधों के के अधिकार की मांग 
पाँच हज़ार से अधिक लोगों के हस्ताक्षरों सहित सौपा जाएगा माँगपत्र
विकास के दावों के बीच देखें...किस तरह जिंदा हैं लोग....कैसे शर्मिंदा हैं लोग ....!

लुधियाना 12 अक्तूबर, 2012:(*विमला सक्करवाल)- लुधियाना के फोकल प्वाइंट फेज़-4 में स्थित मज़दूरों की बस्ती राजीव गांधी कालोनी के लोगों ने बुरी रिहायशी हालतों के प्रति प्रशासन की बेरुख़ी से तंग आकर संघर्ष का रास्ता पकडऩे का ऐलान कर दिया है। राजीव गांधी कालोनी के लोग गलियों पक्की कराने, सीवरेज निकासी के उचित प्रबंध, साफ़-सफ़ाई, साफ़ पानी की नियमित सप्लाई, बिजली सम्बन्धित शिकायतों के निपटारे के उचित प्रबंध समेत अनेकों माँगों के लिए 15 अक्तूबर (सोमवार) को कारख़ाना मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में डी.सी. दफ़्तर, लुधियाना पर सुबह 10 बजे धरना देकर रोष प्रदर्शन करेंगे और पाँच हज़ार से अधिक हस्ताक्षरों वाला माँग पत्र डी.सी. लुधियाना को सौंपा जायेगा। धरने की तैयारियाँ ज़ोर शोर के साथ चल रही हैं। एक पर्चा प्रकाशत किया गया है जो कारख़ाना मज़दूर यूनियन के कार्यकर्ता बस्ती में मज़दूरों के कमरे कमरे जा कर बाँट रहे हैं, उनसे माँग पत्र पर हस्ताक्षर करवा रहे हैं और धरने में शामिल होने की अपील कर रहे हैं। माँग पत्र पर अब तक 4758 लोगों के हस्ताक्षर हो चुके हैं।
कारख़ाना मज़दूर यूनियन के संचालक लखविन्दर ने बताया कि गरीबी की जि़ंदगी काटने पर मजबूर इस कालोनी के निवासियों के रिहायशी हालातों की भयंकरता को शब्दों मेंा बयान कर पाना संभव नहीं है। इस कालोनी के सभी निवासी गरीब मज़दूर हैं। उब्बड़-खाबड़ कच्ची गलियाँ, सीवरेज निकासी की उचित व्यवस्था नहीं, गंदे पखाने, चारों तरफ़ कूड़े-गन्दगी-बदबू -मच्छर-मक्खियों का साम्राज्य, पानी की बेहद कम स्पलाई, पीने के लिए दूषित पानी - यह हालत है मज़दूरों की इस बस्ती की। ऐसी हालत में लोगों की सेहत का हाल क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना कोई कठिन नहीं है। इसके अलावा बिजली महकमे से लोग अलग से दुखी हैं। बिजली की खऱाबी ठीक करवानी हो, बिल ज़्यादा आने की शिकायत हल करवानी हो, नया मीटर लगवाना हो - बिजली विभाग के अधिकारी मज़दूरों से सीधे मुँह बात नहीं करते। गलियों में रात के समय के लिए रौशनी का कोई प्रबंध नहीं है। बिजली की 14000 हाईवोलटेज तारें घरों की छतों के बिलकुल ऊपर से गुजरती हैं जिससे हमेशा हादसें होते रहते हैं। राजीव गांधी कालोनी के आस-पास जीवन नगर, शेरपुर, ग्यासपुरा आदि विशाल गरीब आबादी वाले इलाकों के लिए नज़दीक में कोई सरकारी हस्पताल या डिस्पेंसरी नहीं है। राजीव गांधी कालोनी के मज़दूरों की माँग है कि इलाको में सरकारी हस्पताल खोला जाये। औद्योगिक मज़दूरों के लिए खोली गई ई.एस.आई. डिस्पेंसरी का विस्तार किया जाये। पिछले महीने 30 सितम्बर को कालोनी निवासियों की हुई लोग पंचायत में प्रशासन के खि़लाफ़ संघर्ष छेडऩे के ऐलान के बाद यह फ़ैसला किया गया था कि 15 अक्तूबर को डी. सी. दफ़्तर में हजारों कालोनी निवासियों के हस्ताक्षर करवा कर रोषपूर्ण धरना-प्रदर्शन करके माँग पत्र सौंपा जाये। उन्होंने कहा वैसे तो पंजाब सरकार ने लुधियाना शहर के विकास के लिए 3561 रुपए की परियोजना का ऐलान किया है परन्तु राजीव गांधी कालोनी सहित समेत लुधियाना के अलग-अलग गरीब इलाकों के विकास के लिए सरकार कब कदम उठाएगी? उन्होंने कहा कि लुधियाना की बहुसंख्यक आबादी मज़दूरों की है इसलिए सरकार को सब से अधिक ध्यान उनके जीवन के हालात सुधारने की तरफ देना चाहिए। राजीव गांधी कालोनी के बारे में उन्होंने कहा कि यदि सरकार 3561 करोड़ रुपए का कुछ हिस्सा भी इस कालोनी के विकास पर लगा दे तो कालोनी की कायापलट हो सकती है। लखविन्दर ने कहा कि कारख़ाना मज़दूर यूनियन शहर के सभी इंसाफ़पसंद संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों समेत सभी इंसाफ़पसंद लोगों को उनके समर्थन में आने की अपील करती है।

*विमला सक्करवाल कारख़ाना मज़दूर यूनियन संचालन समिति की सक्रिय सदस्य
सम्पर्क: मकादूर यूनियन,मकादूर पुस्तकालय, राजीव गाँधी कालोनी, 
फोकल प्वाइण्ट-4, लुधियाना।  
फोन- 96461-50249                                                                                                      15 अक्तूबर को डी.सी.दफ़्तर पर धरना-प्रदर्शन