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Saturday, December 22, 2018

इस तरह हुआ था नामधारी गुरुतागद्दी के सम्बन्ध में रहस्यमय खुलासा

Dec 21, 2018, 2:07 PM
21 दिसंबर: जब श्री जीवन नगर में कायम हुई थी त्याग की मिसाल 
21 दिसंबर 2012 को त्याग का अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जब श्री जीवन नगर, सिरसा में हजारों की संख्या में नामधारी संगत एकत्रित हुई पर माहौल शोकपूर्ण था क्योंकि मौका था सतगुरु जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि देने का, जिन्होंने 13 दिसंबर 2012 को देह रूपी चोले को त्यागा था। 
श्रद्धा सुमन अर्पित करने का यह आयोजन ठाकुर दलीप सिंह जी और उनकी संगत की तरफ से किया गया था क्यूंकि श्री भैणी साहिब में रहने वाले ठाकुर उदय सिंह, जगतार सिंह आदि ने सतगुरु जगजीत सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् भैणी साहिब पर कब्ज़ा करके पुलिस और प्राइवेट सेक्योरिटी लगवाकर पूरी तरह से प्रतिबंध लगवा दिया कि यहाँ संगत के आलावा चाहे कोई भी ऐरा-गैरा तो आ सकता है पर ठाकुर उदय सिंह के बड़े भ्राता ठाकुर दलीप और अपने सगे माता बेबे दलीप कौर को भैणी साहिब के अंदर आने की सख्त मनाही थी। यहाँ तक कि सतगुरु जी के अंतिम संस्कार के समय भी ठाकुर दलीप सिंह जी को अंदर आने की इजाजत नहीं मिली और अपनी मर्जी से अगले गुरु का चुनाव भी कर लिया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए श्री जीवन नगर की संगत और सतगुरु जगजीत सिंह जी के बड़े सपुत्र श्री ठाकुर दलीप सिंह जी की तरफ से श्री जीवन नगर इलाके में श्रद्धांजलि समागम करना पड़ा। इस समागम ने इस बात को साबित कर दिया कि जहाँ ठाकुर दलीप सिंह जी त्याग की मूरत हैं वहीं ठाकुर उदय सिंह प्रॉपर्टी और गद्दी के अभिलाषी हैं। 
                       इस समागम में एकत्रित संगत बहुत वैरागमयी अवस्था में थी क्योंकि संगत को सतगुरु जगजीत सिंह जी का बिछड़ना बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इस श्रद्धांजलि समागम में बहुत बड़ा खुलासा हुआ। यह खुलासा किया डॉक्टर इक़बाल सिंह जी ने जो सतगुरु जगजीत सिंह जी के निजी डॉक्टर रहे। वह  आयुर्वैदिक, फिजियोथेरेपी, एक्यूपंचर  आदि तरीकों से सतगुरु जी की सेवा करते थे। 
                     इस ऐतिहासिक आयोजन को सम्बोधन करते हुए डॉक्टर इक़बाल सिंह ने गुरुता गद्दी को लेकर एक बहुत बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 29 जनवरी 2012 को जब वह सतगुरु जगजीत सिंह जी के पास अकेले बैठे उनकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर रहे थे तो सतगुरु जी ने उनसे कहा कि मैंने तुम्हे एक बात बतानी है पर तुम मुझे वायदा करो कि यह बात किसी को पता न चले। तुमने अभी किसी से कुछ नहीं बताना। फिर किसी कपड़े में लपेटा हुआ समान मुझे थमाते हुए कहा कि जब मैं यह शरीर त्याग दूंगा तो यह अमानत बड़े बेटे दलीप सिंह जी को देनी है और सारी संगत  को यह बात बतानी है कि मेरे बाद दलीप सिंह जी को ही अपना गुरु मानें। डॉ साहिब ने वह अमानत संगत के सामने  खोल  के दिखाई।  इसमें कुछ वस्त्र के अलावा एक दस्तार, एक नारियल, पांच पैसे तांबे के व एक आसन था। डॉक्टर साहिब ने ठाकुर दलीप सिंह जी के चरणों में यह अमानत लेने की विनती की। उनके साथ सतगुरु जगजीत सिंह जी के निजी सेवक दीदार सिंह और पंथ के सिरमौर सूबा साहिबान भी खड़े थे। उन सभी ने भी विनती कि सतगुरु जी के हुक्म अनुसार अब आप जी ही पंथ की बागडोर सम्भालो और उन्हें दुविधा से बाहर निकालें। यह सारा दृश्य देख-सुन कर निराश हुई संगत को थोड़ी राहत मिली और सारा पंडाल जैकारों से गूंज उठा और कितनी देर गूंजता रहा। फिर एक आशा भरी नज़र से संगत ने जैसे ही ठाकुर दलीप सिंह जी की तरफ देखा तो सभी दंग रह गए। जब ठाकुर दलीप सिंह जी ने बड़ी ही शालीनता और विनम्रता से सतगुरु जी की भेजी हुई अमानत ले कर अपने मस्तक से लगाई फिर बहुत ही सम्मान से माता चंद कौर जी की तस्वीर के आगे रख दी। आप ने संगत को सम्बोधित करते हुए कहा कि एक तरफ मेरे छोटे भाई गद्दी पर बैठे हैं दूसरी तरफ मैं गद्दी को अपना कर पंथ को विभाजित नहीं करना चाहता। मैंने पंथ को जोड़ना है। तोड़ना नहीं है। इसके आलावा इस समय माता जी पंथ की सर्वोच्च हस्ती हैं। मैंने उनके आगे यह अमानत रख दी है और मैं चाहता हूँ कि जब तक हमारी आपसी एकता नहीं हो जाती तब तक आप सभी लोग माता जी को गुरु रूप में स्वीकार करें क्योंकि माता जी सभी के लिए सम्मानीय हैं और सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी भी हैं। इस पर संगत को हौंसला नहीं हो रहा था। संगत तो इस तरह तड़प रही थी जैसे पानी के बिना मछली। पर ठाकुर दलीप सिंह जी अपने वचन पर अटल रहे और त्याग का वह महान सबूत दिया जो बेमिसाल था और वह त्याग था केवल पंथ की एकता के लिए। 
                 इसके आलावा आपके द्धारा आज भी जो प्रयत्न किए जा रहे हैं उन्हें देखकर यही प्रतीत होता है कि वे इस महान पंथक-एकता के साथ-साथ आपसी एकता व् सौहार्द्य को बढ़ावा देने के लिए निरंतर यत्नशील हैं।                                                 रिपोर्ट:: प्रितपाल सिंह खालसा--7814545781 प्रेषक:राजपाल कौर

Sunday, December 09, 2018

राम मन्दिर कानून से नहीं-शक्ति से बनेगा-ठाकुर दलीप सिंह का संदेश

9 December 2018 को 19:28 बजे किया गया (WTM by RPK)
अब श्रीराम तंबू में न रहे-भव्य मंदिर शीघ्र बने:महन्त रामदास
जालन्धर: 9 दिसम्बर 2018: (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
अरविंदर सिंह द्धारा दिल्ली से प्राप्त तस्वीर संदेश 
अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के भव्य निर्माण के लिए कोई कानून बन सकता है तो ठीक नहीं तो बिना कानून ही बनवा दीजिए क्योंकि जब श्रीराम मन्दिर गिराया था तो किस कानून के अधीन गिराया था जो बिना कानून गिराया हो वह बिना कानून ही बनेगा। सरकार गिरे या बचे कोई भी हालात बनें लेकिन भव्य निर्माण श्रीराम जन्मभूमि पर अवश्य बनना चाहिए हमारी नामधारी संगत पूर्णरूप से आपके साथ है। क्योंकि कानून कमजोरों के लिये होता शक्तिशालियों के लिये कोई कानून नहीं होता उक्त संदेश नामधारी समाज से सत्गुरू दलीप सिंह जी महाराज द्वारा भेजा गया था जिसे संत पलविन्द्र सिंह ने आज शक्तिपीठ श्री देवी तालाब मन्दिर परिसर में आयोजित विराट धर्म सम्मेलन के दौरान पढ़कर सुनाया। संत पलविन्द्र सिंह ने कहा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 625 रियासतों को जबरदस्ती भारत में शामिल किया था वह किस कानून के अधीन किया था। इस प्रकार के महान कार्य किसी कानून के अधीन नहीं होते सरकार जो करती है वही कानून होता है। अभी मथुरा में भगवान श्री राम जी का मन्दिर और काशी में विश्वानाथ मन्दिर भी बनाना है। यह कब बनेंगे इसका सीधा स्पष्ट उत्तर है कि यदि आप सोचते हैं कि मुस्लमानों को सहिमत करके मन्दिर बनाएंगे तो वह संभव नहीं। उन्होंने केन्द्र सरकार को आग्रह किया कि वह 31 दिसम्बर से पहले श्रीराम भव्य मन्दिर बनवा दें आपकी सरकार का जो हाल हो उसकी चिंता न करें वरना अगली सरकार बनानी मुश्किल हो जायेगी। 
संदेश में यह भी कहा गया कि हरिमन्दिर साहिब पर भारतीय फौज का आक्रमण किस कानून के अधीन हुआ था। कांग्रेस के समय में इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात किस कानून के अधीन सिखों का कत्लेआम हुआ था इसलिए स्पष्ट है कि कानून वहीं होता है जो सरकार देती है। 

उन्होंने कहा कि हम नामधारी राष्ट्रवादी है भारतीय संस्कृति को मानते हैं व उसके रक्षक हैं इसलिए भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये भव्य राममन्दिर श्रीराम जन्मभूमि पर अवश्य बनना चाहिए।
महामण्डलेश्वर रामेश्वरदास (हरिद्वार) ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हमारी भारतीय संस्कृति की आस्था आस्मिता व गौरव हैं और भारत में श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में भव्य मन्दिर न बनना हमें लज्जा दिलाने वाला है आज जरूरत अपनी शक्ति, सामर्थ को पहचाने की है। हिन्दू समाज लम्बे समय से श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिये संघर्षरत हैं। वर्तमान आंदोलन भी 30 वर्षों से चलाया जा रहा है। हिन्दू समाज चाहता है कि अयोध्या में भव्य राम मन्दिर बनें इससे जुड़ी सभी बाधाएं दूर हो लेकिन यह प्रतिक्षा अब लंबी हो चुकी है। 2010 में उच्चन्यायलय ने जो फैसला दिया था वह 2011 से सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और जब न्यायालय से पूछा गया कि अब इसकी सुनवाई कब होगी तो कहा गया कि हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। कब सुनना है यह न्यायालय का अपना अधिकार है लेकिन न्यायालय के इस जवाब से हिन्दू समाज अपने आप को अपमानित महसूस कर रहा है और यह बात समस्त हिन्दू समाज के लिये आश्चर्यजनक व वेदनापूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय को पूर्णविचार करना चाहिए यहां समाज को न्यायालय का वहीं न्यायालय को सामान्य समाज की भावनाओं का भी सम्मान करना चाहिए। यदि न्यायालय की प्राथिमकताएं बाधा बनती हैं तो सरकार को इस संबंध में उचित अध्यादेश लाना चाहिए ताकि सपष्ट हो सके कि कौन है जो हिन्दू समाज की अवहेलना कर रहा है। फिर हिन्दू निर्णय करेगा कि उसे सत्ता किसके हाथों में देनी है। 
उत्तर क्षेत्र धर्म जागरण प्रमुख राकेश कुमार ने कहा कि वर्तमान में हिन्दुओं को बांटकर अपनी राजनीति चमकाने का कार्य हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि हिन्दू अब जागृत हो रहा है। अब इनको अलग-अलग जाति साम्प्रदाएं में बांटने वाले बाज़ आएं अब भारत देश पर वहीं राज करेगा जो हिन्दू समाज का सम्मान करेगा। किसी धर्म विशेष को खुश करने की नीति रखने वाले या तो राजनीति करना छोड़ जाएं अन्यथा अब जागृत हिन्दू समाज अपने निर्णय अपनी संस्कृति व समथ्र्य के अनुरूप लेकर देश को सही ढंग से चलाने के लिये भी सक्षम है। श्री राकेश जी ने कहा कि 100 करोड़ हिन्दुओं की अवहेलना करके देश की सत्ता संभालने का दम भरने वाले सभी धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक दल अपनी कार्यविधि में समयानुकुल सुधार कर लें वरना अब हिन्दू समाज उन्हें माफ करने वाला नहीं है।
इस अवसर पर धार्मिक, संकीर्तिण व पवित्र मंत्रोच्चारण के साथ गणेश वंदना व श्रीराम स्तुति के पश्चात वहां उपस्थित सभी राम भक्तों ने अयोध्या में भव्य मन्दिर निर्माण का शंखनाध करते हुए अपना सक्रिय सहयोग करने का प्रण लिया। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के स्वामी सच्चदानंद, महामण्डलेश्वर 1008 महंत गंगा दास, महन्त रामदास,  व पूज्य संत समाज, बुद्धिजीवियों ने श्रीराम मंदिर के इतिहासिक व पौराणिक महत्व व वर्तमान दौर में उसकी सार्थकता की जानकारी देते हुए सभी रामभक्तों को इस पुनित कार्य में अपनी सक्रिय अहूति देने के लिये प्रेरित किया। 
बरागी आश्रम श्री राम मंदिर के 108 महंत रामदास ने कहा कि अब श्रीराम तंबू में न रहे, श्रीराम का भव्य मंदिर शीघ्र बनें इसके लिये संयुक्त प्रयास होना चाहिए अब इस विषय पर कोई भी राजनीति स्वीकार्य नहीं है। 
इस अवसर पर असंख्य रामभक्तों ने रामल्ला हम आएँगे, मन्दिर भव्य बनाएंगे। बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का। श्री राम हमारे प्राण हैं, मन्दिर में देरी अपमान है। मन्दिर बनने वाला है, इतिहास बदलने वाला है। हर घर भगवा छाएगा, श्रीराम राज फिर आएगा। एक ही नारा, एक ही नाम, जय श्री राम, जय श्री राम। रामल्ला के वास्ते, खाली करदो रास्ते। जन्मभूमि के काम न आए, वो बेकार जवानी है। लाठी गोली खाएंगे, मन्दिर भव्य बनाएंगे। जिस हिन्दू का खून खोले, वो खून नहीं पानी है के गगनचूंबी उद्घोष कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद पंजाब के अर्चकमण्डल के अध्यक्ष पंडित एस.के. शास्त्री, राज गुरू पंडित अशोक मोदगिल, महंत मथुरादास, महंत राज किशोर, महंत कमलेश, दिव्य ज्योति जागृत संस्थान (नूरमहल) से स्वामी सज्जनानंद, स्वामी हरिवल्लभानंद, स्वामी नरेशानंद, स्वामी तरुणेशानंद, राष्ट्रीय संत पंडित दीन दयाल शास्त्री (अध्यक्ष विश्व मानव कल्याण मिशन), महन्त बीलराम दास , महन्त राज किशोर, महन्त सिया शरण दास, महन्त कमलेश दास, महन्त केशव दास, महन्त पवन दास,  महन्त परमेश्वारदास, महन्त श्रवण दास, महन्त बलरामदास, स्वामी धर्म विवेक जी, महन्त अशोक कुमार, काठगढ़ नवांशहर से स्वामी दयाल दास, संत बिहारी दास, संत गोपाल दास, संत सत्य नारायण, बाबा पाल जी नागी, नामधारी संत दया सिंह , संत दर्शन सिंह , संत अमरीक सिंह, संत तेजिन्द्र सिंह, संत पलविन्द्र सिंह, संत गुरूमुख सिंह, संत दर्शन सिंह, संत रणवीर सिंह, संत गुरमीत सिंह, संत सेवा राम व अन्य तपस्वी, साधक व धर्म प्रेमी उपस्थित रहे। 
श्रीराम मंदिर न्यास समिति, जालन्धर इकाई से कोई सवाल हो तो सम्पर्क नंबर है:98140-71007

Saturday, November 03, 2018

जालंधर स्कूल के छात्र वर्ग ने कुंग-फु में दिखाए जौहर

मार्शल आर्ट को हर घर तक पहुंचने का संकल्प 
जालंधर:3 नवम्बर 2018:(राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
जालंधर विदियक सोसायटी की ओर से चल रहे जालंधर स्कूल गदाईपुर के छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण  विकास के लिए किए जा रहे प्रयास बच्चों की सफलता में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। यह प्रयास बच्चों को ज़िंदगी की बुलंदियां छूने की ओर अग्रसर करने में भी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। एक छोटे से गांव में रहने वाले साधारण से परिवारों के बच्चे खास कर लड़कियाँ मार्शल आर्ट के सभी खेलो को करने में सक्षम हो गई हैं। अब इन छात्र छात्रों ने स्टेट लेवल प्रतियोगिता तक पहुँच कर भी अपनी प्रतिभा दिखाई है। इन बच्चों ने  गोल्ड, सिल्वर और कांस्य पदक भी हासिल किए हैं। इनको कोचिंग देने और अभ्यास कराने में प्रवीण जी और मोहम्मद हैदर ने सक्रिय भूमिका निभाई है। इन कोच साहिबानों की मेहनत से जालंधर स्कूल गदाईपुर के दस बच्चों ने पदक और सर्टिफिकेट  हासिल किए हैं। इन परिणामों में लावण्या तीन फाइटों के मुकाबले के बाद प्रथम रही और स्वर्ण-पदक हासिल किया।  इसी तरह चुटुन ,हर्ष,नितेश ,चंदन और आदित्या ने सिल्वर पदक प्राप्त करके नाम रौशन किया। बरुन, भूमिका, आसिफ और अमन ने कांस्य पदक हासिल करके नई संभावनाओं का संकेत दिया। आज स्कूल में विजेता बच्चों को सारे स्टाफ की तरफ से बधाई दी गई और मुख्याध्यापिका राजपाल कौर ने बच्चों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ कर जीत हासिल करने की प्रेरणा दी। इस मौके पर मैडम मीनाक्षी, जसवीर कौर, संदीप कौर, सोनम, सेसा श्रेष्ठा, संगीता, मीना कुमारी, राधा, नीलम पाल और शिवानी हाजिर थी।   

Friday, August 24, 2018

जालंधर के गांवों में डेंगू बचाव जागरूकता अभियान

गांव रंधावा मसंदा और गुदाईपुर पहुंची में पहुंची वैन 
जालंधर: 24 अगस्त 2018: (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
पंजाब सरकार द्वारा डेंगू के प्रति आम नागरिक को जागरूक करने के लिए चलाई जा रही जागरूकता वैन एस.एम.ओ करतारपुर के निर्देशानुसार आज गांव रंधावा मसंदा और गुदाईपुर पहुंची । वैन की अगुवाई पी.एच.सी रंधावा मसंदा के एम.ओ डॉ.परमजीत कौर और ए.एम.ओ डॉ.हेमंत मल्होत्रा ने की । उनके द्वारा लोगो और विद्यार्थियों को डेंगू के कारण, लक्षण और उससे बचाव के बारे में जागरूक किया गया । वैन में एल.ई.डी पर डेंगू जागरूकता संदेश चलाए गए । इस मौके सरपंच मोहिंदर लाल, एस.आई केवल भंगू, इंदरजीत कुमार, रघुवीर कौर, उर्मिल गिल, ज्योति, नीतू, रमनदीप, राज रानी, सुनीता, वंदना, अश्विनी कुमार, राजिंदर आदि हाजिर थे।

Monday, August 06, 2018

जालंधर में माइग्रेटरी पोलियो मुहिम की शुरूआत

हाई रिस्क इलाकों को दी गयी पहल
जालंधर: 5 अगस्त 2018: (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::  
बदलते मौसम में अलग तरह की कई तरह की बीमारियां घेर लेती हैं। इनका मुकाबिला करने के साथ जागरूक समाजसेवी और स्वास्थ्य अधिकारी अन्य प्रोजेक्टों को लेकर भी सतर्क और सरगर्म रहते हैं। जालंधर में माइग्रेटरी पोलियो मुहिम इसी तरह की शानदार मिसाल है। 
आज एस.एम.ओ करतारपुर डॉ.हरदेव सिंह के निर्देशानुसार ए.एम.ओ डॉ.हेमंत मल्होत्रा की अगुवाई में पी.एच.सी रंधावा मसंदा के अधीन क्षेत्र में माइग्रेटरी पोलियो मुहिम की शुरूआत समाज सेवक परविंदर सिंह, मैडम राजपाल कौर और जरनैल सिंह रंधावा द्वारा की गई। डॉ.हेमंत मल्होत्रा ने बताया कि 5 से 8 अगस्त तक चलने वाली इस मुहिम में उनकी टीमो द्वारा जालंधर के हाई रिस्क एरिया गुदाईपुर, राजा गार्डन, उद्योग नगर, स्वर्ण पार्क और रंधावा मसंदा के साथ लगते गांवो में 0 से 5 साल तक के लगभग 2500 बच्चों को दो बूंद पोलियो दवा की पिलाई जाएगी। इस मौके एस.आई इंदरजीत सिंह, एल.एच.वी उर्मिल गिल, ज्योति सुमन, नीतू, रमनदीप, सरबजीत, गुरबख्श, राज रानी, मंजीत, रीना, सुनीता, पूनम आदि हाजिर थे ।

Saturday, July 07, 2018

भावी पीढ़ी को सही दिशा-निर्देश देने के लिए गुरमत सम्मेलन

Jul 7, 2018, 5:32 PM
आयोजन का मकसद अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा 
जालंधर: 7 जुलाई 2018: (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
हमारा समाज और देश तभी तरक्की की राह पर आगे बढ़ सकते हैं ,जब हमारी भावी पीढ़ी अच्छे आदर्श ,संस्कार और गुरमत विचारों को अपने जीवन मेँ धारण करे। नामधारी गुरु ,सतगुरु जगजीत सिंह जी ने 1963 ईस्वी में बच्चों के सर्वोतोन्मुखी विकास के लिए गुरमत विद्यक सम्मेलन का आयोजन करवाया था जो कि वर्तमान समय में सतगुरु दलीप सिंह जी के सुयोग्य नेतृत्व में निरन्तर चल रहा है। यह विशेष रूप से गर्मियों की छुटियों में करवाया जाता है। इस गुरमत विद्यक सम्मेलन का सिलेबस गुरमत विद्यक सिद्धान्तों तथा अच्छे संस्कारों के मुताबिक निर्धारित किया जाता है। फिर देश-विदेश में अलग-अलग स्थानों पर इसका आयोजन करवा कर बच्चों के बीच अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं। जैसे कि नाम-सिमरन प्रतियोगिता ,भाषण ,कविता प्रतियोगता ,अरदास ,गुरबाणी-कंठ प्रतियोगता ,दस्तार प्रतियोगता ,सिक्ख इतिहास से संबन्धित प्रश्न-उत्तर प्रतियोगता ,सवाल-जवाब प्रतियोगता इसके अलावा चित्रकारी ,खेल ,पौष्टिक आहार बनाने तथा संगीत प्रतियोगता आदि उनको अलग-अलग ग्रुपों में बांटकर करवाई जाती हैं। इस तरह अलग-अलग प्रकार से मुकाबले करवाए जाते हैं ताकि बच्चों का अच्छी बातें सीखने के साथ-साथ थोड़ा मनोरंजन भी हो जाये,इसके साथ ही सिखलाई कैम्प भी लगाए जाते हैं।इस समागम का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सिक्ख धर्म की परम्पराओं के साथ जोड़कर ,अपनी महान विरासत से ज्ञात करवाना है। इसके अलावा उनमें अच्छे संस्कार ,समाज-सेवा तथा देशभक्ति जैसे जज्बे पैदा करने के लिए सिखलाई कैम्प भी लगाए जाते हैं।सम्मेलन में भाग लेने वाले विद्यार्थी की उम्र 4-5 साल से लेकर 24-25 साल तक होती है।विजेता शिक्षार्थियों को उनका हौंसला बढ़ाने के लिए इनाम भी दिए जाते हैं ,इसके इलावा इस सम्मेलन भाग लेने वाले प्रत्येक शिक्षार्थी को कुछ इनाम अवश्य ही दिया जाता है ताकि कोई बच्चा निराश न हो। इस साल 2018 के गुरमत विद्यक सम्मेलन देश के अलग-अलग स्थानों जैसे कि जालंधर के कई इलाकों के अलावा, श्री जीवन नगर(हरियाणा),चंडीगढ़ ,बीड भमारसी (पटियाला),मंडी (हिमाँचल-प्रदेश),अमृतसर ,दिल्ली ,दसूहा ,लुधियाना आदि कई स्थानों पर आयोजित किया गया,जो कि 10 जून से लेकर 5 जुलाई तक चलता रहा। यह आयोजन श्री सतगुरु दलीप सिंह जी तथा माता गुरमीत कौर जी की कृपा और निर्देशानुसार,विश्व-नौजवान नामधारी विद्यक जत्थे के प्रधान तथा जालंधर विद्यक सोसाइटी के चेयरमैन पलविंदर सिंह की अगवाई तथा उनकी टीम के सहयोग से सम्पन्न हुआ।इसमें मुख्य रूप से मास्टर सुखविंदर सिंह जी ,प्रिंसिपल हरमनप्रीत सिंह जी ,मुख्त्यार सिंह जी ,सुखदेव सिंह जी ,सुखराज सिंह जी ,गुरमुख सिंह जी ,सूबा अमरीक सिंह जी ,रत्न सिंह जी (प्रधान यूथ अकाली दल मोहाली),सरबजीत सिंह भिंडर ,प्रधान हजारा सिंह जी ,प्रधान अरविंदर सिंह जी ,जसवीर सैनी जी ,हरदीप सिंह राजा ,प्रधान गुरमेल सिंह बराड़,जसवंत सिंह सोनू ,सुरैन सिंह जी ,बूटा सिंह जी ,निर्मल सिंह वां,लाल सिंह जी और अध्यापिका भगवंत  कौर जी ,अध्यापिका रुपिन्दर कौर जी,परमजीत कौर ,सतनाम कौर ,सिमरजीत कौर ,हरविंदर कौर बीड़,रमनदीप कौर ,दर्शन कौर जी ,संदीप कौर जी तथा मुख्याध्यापिका राजपाल कौर आदि शामिल थे।

Thursday, June 21, 2018

पी.ए.पी.ग्राउंड जालंधर में भी मनाया गया जिला स्तरीय योग दिवस

Jun 21, 2018, 1:56 PM
मानसिक तनाव को केवल योग और सात्विक आहार ही दूर कर सकता है
जालंधर: 21 जून (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
पी.एच.सी.रंधावा मसंदा के ए.एम.ओ.डॉक्टर हेमन्त मल्होत्रा ने जानकारी देते हुए बताया कि डायरेक्टर आयुर्वेद पंजाब डॉ.राकेश शर्मा के निर्देशानुसार पी.ए.पी ग्राउंड जालंधर में जिला आयुर्वेदिक अफसर डॉ.सम्राट विक्रम सहगल की अगुवाई में जिला स्तरीय योग दिवस मनाया गया । मुख्य मेहमान आई.पी.एस कमांडेंट पी.ए.पी श्री पवन कुमार उप्पल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की । सम्बोधित करते हुए श्री उप्पल ने सभी को निरोग रहने के लिए योग अपनाने को कहा । इस मौके डॉ.सम्राट ने अपने सम्बोधन में कहा कि आजकल बढ़ते हुए मानसिक तनाव को केवल योग और सात्विक आहार ही दूर कर सकता है। डॉ.अविनाश, डॉ.हेमंत मल्होत्रा, डॉ.रुपाली कोहली, डॉ.सुखदेव, डॉ.योगेश, डॉ.मनु हल्लन, डॉ.रितिका, डॉ.नीरज बाला और उपवैध मदन लाल द्वारा 1200 के लगभग उपस्थित पी.ए.पी और जिला आयुर्वेदिक विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों के इलावा आम जन को योगा प्रोटोकॉल के अनुसार योग अभ्यास करवाया गया । कमांडेंट श्री पवन उप्पल और जिला आयुर्वेदिक अफसर डॉ.सम्राट ने पी.ए.पी में 4 जून से योग सीखा रही जिला आयुर्वेदिक विभाग की टीम डॉ.अविनाश, डॉ.हेमंत मल्होत्रा, डॉ.रुपाली कोहली, डॉ.सुखदेव, डॉ.योगेश, डॉ.मनु हल्लन, डॉ.रितिका और डॉ.नीरज बाला को उनके अतुलनीय कार्य के लिए प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर सन्मानित भी किया । इस मौके गणमान्य व्यक्तियों में सीनियर फिजिशियन डॉ.सुरिंदर कल्याण, डॉ.चेतन मेहता, डॉ.अमित सिधू, डी.एस.पी सुखविंदर सिंह, इंस्पेक्टर बाज सिंह, एस.आई गुरपाल सिंह, एस.आई रशपाल, एस.आई राजेश, एस.आई वेद प्रकाश, एस.आई कुलविंदर सिंह, ए.एस.आई रविंदर, ए.एस.आई कंवलजीत हाजिर थे।

Friday, May 19, 2017

""ठाकुर दलीप सिंह जी की कृपा से ठीक हो गया दिल का सुराख"

Fri, May 19, 2017 at 10:33 AM
जालंधर की प्रिंसिपल राजपाल कौर ने किया सभी सबूत पास होने का दावा 
बच्ची प्रेम कौर और उसके माता पिता करणबीर सिंह और राजिंदर कौर 
जालंधर: 19 मई 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
आजकल नवजन्मे या छोटे बच्चों के दिल में सुराख होने की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा ही कुछ हुआ जम्मू के एक नामधारी परिवार के साथ। इस परिवार की बच्ची के दिल में भी सुराख था। जालंधर की प्रिंसिपल राजपाल कौर ने दावा किया है कि यह सुराख ठाकुर दलीप सिंह जी की कृप से बिना किसी इलाज के ठीक हो गया है। उनकी भेजी रिपोर्ट हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। इस रिपोर्ट पर आपके विचारों की भी इंतज़ार रहेगी।-सम्पादक 
राजपाल कौर की रिपोर्ट:::
सतगुरु शब्द सत्य और गुरु के सुमेल से बना है। जो अज्ञान के अन्धेरे से ज्ञान के प्रकाश की तरफ ले चले तथा जो शिष्यों को सच की राह दिखाये उसे सतगुरु कहते हैं। गुरबाणी में भी लिखा है "सति पुरखु जिनि जानिआ सतगुरु तिस का नाउ" तथा "सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा, तिस दा बुरा किउ होई"---क्योंकि ऐसे सतगुरु रूप संसार में सभी का कल्याण करने के लिए तथा सदमार्ग दिखाने के लिए ही आते हैं और जो सच्चे मन से सतगुरु जी के चरणों से जुड़ जाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।                       
सतगुरु की कृपा से असम्भव काम भी हो जाते हैं सम्भव 
इस बच्ची के दिल में था सुराख 
वर्तमान समय में नामधारी प्रमुख सतगुरु दलीप सिंह जी, जो विनम्रता तथा त्याग की मूरत हैं, अपने अलौकिक रूप से सबका मन मोह लेते हैं तथा शरण आये हुए पर अपनी कृपा - मेहर करते हैं। ऐसे अनेक अलौकिक कृपाओं को मैने देखा-सुना भी है तथा अनुभव भी किया है, उनमें से केवल एक का ही जिक्र करने जा रही हूँ, जो वाकई सभी को अचंभित कर देने वाली है कि ऐसे कलयुग के समय में भी सतगुरु की कृपा से तथा नाम जपने से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। जम्मू के कृष्णानगर में रहने वाले कुलदीप सिंह जी ने मुझसे मुलाकात होने पर अपनी आपबीती वार्ता के बारे में बताया ,उनके साथ उनका परिवार; उनकी पत्नी सुखविंदर कौर, बेटा करणबीर सिंह, बहु रजिन्दर कौर तथा उनकी पोती प्रेम कौर भी थे। उन्होंने बताया की जब उनकी पोती प्रेम कौर जब केवल दो महीने की ही थी तो वह बहुत बीमार रहती थी, उन्होंने उसे जम्मू के डॉक्टर सी.डी.गुप्ता से चेक करवाया तो उन्होंने बताया की आपकी पोती के दिल में सुराख़ है और इसका अभी कोई इलाज नहीं हो सकता ,जब आपकी बच्ची पाँच साल की हो जाएगी तो एक नई तकनीक द्वारा, जिसमें पैर का मांस काट कर वहां लगा कर ऑपरेट किया जा सकता है या फिर धीरे-धीरे बड़े होने पर भर सकता है। सारे परिवार वाले बहुत निराश हुए और सोच में पड़ गए कि अब क्या किया जाये क्योंकि वो मासूम बच्ची दिल में सुराख़ होने की वजह से उसे बुखार भी अक्सर हो जाया करता था तथा उसके शरीर का उचित विकास भी नहीं हो रहा था।लेकिन निराशा और दुःख में तो केवल परमात्मा ही पुकार सुन सकते है उनकी भी पुकार सुनी गई और उन्हें अपने आराध्य गुरु, सतगुरु दलीप सिंह जी के दर्शन करने का मौका मिला, उन्होंने दर्शन करके सतगुरु जी के चरणों में विनती करके अपनी पोती की हालत के बारे में बताया। सतगुरु जी ने बड़े ध्यान से सारी बात सुनी, फिर बचन किया कि बच्ची की माता उसे अपनी गोद में लेकर पांच मिनट प्रतिदिन नाम सिमरन करे और ऐसा लगातार चालीस दिन तक करे, वे सत्यवचन कहकर, सतगुरु जी को नमस्कार कर घर आ गए और उनकी बहु ने बताया की ऐसा उसने लगातार करना शुरू कर दिया और चालीस दिन के बाद बच्ची की हालत में सुधार आना शुरू हो गया और उसका  ग्रोथ (विकास) होना भी शुरू हो गया, बुखार आना भी धीरे-धीरे बंद हो गया। उसके बाद वे थोड़ा निश्चिंत हो गए और दुबारा टैस्ट कराने भी नहीं गए क्योंकि उन्हें अपने गुरु पर पूरा भरोसा था फिर भी उन्होंने सभी की तसल्ली करवाने के लिए लगभग दो साल बाद बच्ची का टैस्ट करवाने के लिए उसी डॉक्टर के पास दुबारा  गए तथा जब डॉक्टर ने टैस्ट कर लिए तो वे हैरान हो गए कि बच्ची बिल्कुल ठीक थी ,उसके दिल में कोई सुराख़ नहीं था। डॉक्टर के पूछने पर कि आपने कोई इलाज करवाया था, बच्ची नॉर्मल कैसे हो गई तो कुलदीप सिंह जी ने उन्हें सारी बात बताई कि कैसे सतगुरु जी की आज्ञा से, नाम जपने से उनकी बच्ची ठीक हो गई। गुरबाणी में भी लिखा है" सरब रोग का अउखदु नामु" पर जो इसे श्रद्धा से मानता है वही इसका लाभ प्राप्त कर सकता है, सतगुरु जी के बचनों को जीवन में श्रद्धापूर्वक अपनाकर ही खुशियाँ प्राप्त की जा सकती है। डॉक्टर ने उन्हें रिपोर्ट भी दिखाई और वे ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस आ गए। उन्होंने मुझे भी दोनों रिपोर्टे दिखाई पहली वाली और बाद वाली भी। मैं भी उनके बचन सुनकर धन्य हो गई। मेरे मुँह से केवल यही शब्द निकले ;धन्य सतगुरु जी और धन्य हैं उनके सिक्ख! जो श्रद्धा से उनके बताये मार्ग पर चलकर उनके कृपा-पात्र बन जाते हैं। जम्मू में रहने वाले कुलदीप सिंह जी ने मुझसे मुलाकात होने पर अपनी आपबीती वार्ता के बारे में बताया, उनके साथ उनका परिवार; उनकी पत्नी सुखविंदर कौर, बेटा करणबीर सिंह, बहु रजिन्दर कौर तथा उनकी पोती प्रेम कौर भी थे। उन्होंने बताया की जब उनकी पोती प्रेम कौर जब केवल दो महीने की ही थी तो वह बहुत बीमार रहती थी, उन्होंने उसे जम्मू के डॉक्टर सी.डी.गुप्ता से चेक करवाया तो उन्होंने बताया की आपकी पोती के दिल में सुराख़ है और इसका अभी कोई इलाज नहीं हो सकता, जब आपकी बच्ची पाँच साल की हो जाएगी तो एक नई तकनीक द्वारा, जिसमें पैर का मांस काट कर वहां लगा कर ऑपरेट किया जा सकता है या फिर धीरे-धीरे बड़े होने पर भर सकता है। सारे परिवार वाले बहुत निराश हुए और सोच में पड़ गए कि अब क्या किया जाये क्योंकि वो मासूम बच्ची दिल में सुराख़ होने की वजह से उसे बुखार भी अक्सर हो जाया करता था तथा उसके शरीर का उचित विकास भी नहीं हो रहा था।लेकिन निराशा और दुःख में तो केवल परमात्मा ही पुकार सुन सकते है उनकी भी पुकार सुनी गई और उन्हें अपने आराध्य गुरु, सतगुरु दलीप सिंह जी के दर्शन करने का मौका मिला, उन्होंने दर्शन करके सतगुरु जी के चरणों में विनती करके अपनी पोती की हालत के बारे में बताया। सतगुरु जी ने बड़े ध्यान से सारी बात सुनी, फिर बचन किया कि बच्ची की माता उसे अपनी गोद में लेकर पांच मिनट प्रतिदिन नाम सिमरन करे और ऐसा लगातार चालीस दिन तक करे, वे सत्यवचन कहकर, सतगुरु जी को नमस्कार कर घर आ गए और उनकी बहु ने बताया की ऐसा उसने लगातार करना शुरू कर दिया और चालीस दिन के बाद बच्ची की हालत में सुधार आना शुरू हो गया और उसका  ग्रोथ (विकास ) होना भी शुरू हो गया ,बुखार आना भी धीरे-धीरे बंद हो गया। उसके बाद वे थोड़ा निश्चिंत हो गए और दुबारा टैस्ट कराने भी नहीं गए क्योंकि उन्हें अपने गुरु पर पूरा भरोसा था फिर भी उन्होंने सभी की तसल्ली करवाने के लिए लगभग दो साल बाद बच्ची का टैस्ट करवाने के लिए उसी डॉक्टर के पास दुबारा  गए तथा जब डॉक्टर ने टैस्ट कर लिए तो वे हैरान हो गए कि बच्ची बिल्कुल ठीक थी, उसके दिल में कोई सुराख़ नहीं था। डॉक्टर के पूछने पर कि आपने कोई इलाज करवाया था , बच्ची नॉर्मल कैसे हो गई तो कुलदीप सिंह जी ने उन्हें सारी बात बताई कि कैसे सतगुरु जी की आज्ञा से, नाम जपने से उनकी बच्ची ठीक हो गई। गुरबाणी में भी लिखा है"सरब रोग का अउखदु नामु " पर जो इसे श्रद्धा से मानता है वही इसका लाभ प्राप्त कर सकता है, सतगुरु जी के बचनों को जीवन में श्रद्धापूर्वक अपनाकर ही खुशियाँ प्राप्त की जा सकती है। डॉक्टर ने उन्हें रिपोर्ट भी दिखाई और वे ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस आ गए। उन्होंने मुझे भी दोनों रिपोर्टे दिखाई पहली वाली और बाद वाली भी। मैं भी उनके बचन सुनकर धन्य हो गई। मेरे मुँह से केवल यही शब्द निकले ;धन्य सतगुरु जी और धन्य हैं उनके सिक्ख! जो श्रद्धा से उनके बताये मार्ग पर चलकर उनके कृपा-पात्र बन जाते हैं। 

Sunday, October 02, 2016

जप-प्रयोग का आँखों देखा दृश्य-प्रिंसिपल राजपाल कौर (जालंधर)


अमन ,शांति व एकता के लिए चल रहा वार्षिक नामधारी कार्यक्रम  
चालीस दिनों का सालाना जप-प्रयोग (नाम-सिमरन)जो की नामधारी सम्प्रदा के सदगुरु, सदगुरु प्रताप सिंह जी द्वारा 1920 ईस्वी में एक भादो से लेकर अश्विन मास तक देश में अमन ,शांति और सर्वत्र के भले के लिए शुरू किया गया था। उसके बाद निरन्तर यह नियम चलता रहा वर्तमान समय में भी एकता और विनम्रता के पुंज श्री सतगुरु दलीप सिंह जी द्वारा इसे सार्थक रूप देते हुए इस साल 2016 में भी चालीस दिनों का जप-प्रयोग शुरू किया गया है।यह जप प्रयोग नामधारियों के दूसरे प्रमुख तीर्थ स्थान श्री जीवन नगर (हरियाणा) में 20 भादों 2073  से 29 आश्विन 2073 मुताबिक 4 सितम्बर 2016 से 14 अक्टूबर 2016 तक चलेगा। इसमें सुबह से शाम तक लगभग 8 घण्टे नाम -सिमरन,कथा -कीर्तन आदि का प्रवाह चलता रहता है। इस समय दौरान सिक्ख अमृत वेले अर्थात ब्रह्ममुहूर्त में लगभग 2 बजे जाग कर सतगुरु जी के अनमोल खजाने का तो आनंद प्राप्त करता ही है ,साथ ही साथ सात्विक आहार और सादे पहरावे को अपनाते हुए, नाम सिमरन और सेवा करते हुए सारा दिन सतगुरु के रंग में ही रंगा रहता है और अपने आपको ज्यादा स्वस्थ महसूस करता है। विशेष बात यह है कि यहाँ संगत की सेहत को भी ध्यान में रखते हुए सुबह के नाम सिमरन के बाद योगा भी करवाई जाती है,फिर गिलोय की शरदाई छकाई जाती है, उसके उपरान्त देसी घी से तैयार अमृतमयी लंगर भी छकाया जाता है। 
            मुझे पहले दिन 4 सितम्बर 2016 ,दिन रविवार को जप-प्रयोग की आरम्भता में शामिल होने का मौका मिला। इस बार, हर बार से कुछ भिन्न ,अदभुत ही नज़ारा देखने को मिला,जिस का आँखों देखा विवरण इस तरह है--सुचना मुताबिक कि इस बार प्रयोग बीर -मंदिर की जगह ,श्री सतगुरु प्रताप सिंह सरोवर पर है। हम वहां पहुँच गए। सुबह का तीन बजे का समय था। चारो तरफ कुदरती नज़ारों के साथ मौसम भी सुहावना था। सुबह -सुबह पैदल और गाड़ियों पर आने वाली संगत का उमड़ता हुआ दृश्य था। हम मुख्य दरवाजे से अंदर आये तो वहां जोड़े (जूते) रखने वाले और चरण धुलाने वाले सेवादार हाजिर थे। फिर हम आगे बढ़े तो और भी सुन्दर दृश्य था। जहाँ से सीढ़ियों से उतर कर नीचे की ओर जाते हैं ,वहाँ एक तरफ श्री सतगुरु प्रताप सिंह जी की तस्वीर आसान पर सुशोभित थी ,दूसरी तरफ श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की तस्वीर सुशोभित थी। (उल्लेखनी है कि यह स्थान इन गुरु साहिबानों का तप स्थान रहा है और लोग यहाँ स्नान कर के  नीरोग तो होते ही हैं, उनकी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं) वहाँ सीढ़ियों के सामने ही स्टेज सजी हुई थी जहाँ एक तरफ आसा की वार का कीर्तन हो रहा था तथा दूसरी तरफ फूलों से सुशोभित आसन पर श्री सतगुरु दलीप सिंह जी विराजमान थे। सामने, सरोवर के चारों तरफ ऊपर व् नीचे की ओर बैठी हुई संगत,हंसों के झुण्ड की तरह नज़र आ रही थी। सरोवर के चारो तरफ रंग-बिरंगी लाइटें लगी हुई थी जो रंग -बिरंगे सितारों की तरह चमक रही थीं। इन लाइटों की परछाई जब जल में पड़ रही थी तो और भी अद्भुत दृश्य लग रहा था। बीच में सरोवर का जल ,आस -पास सितारों जैसी रोशनी, सामने स्टेज पर शोभायमान सतगुरु जी,आस-पास बैठी अन्य संत -जन,चारो तरफ सफ़ेद कपड़ों में सुशोभित संगत हंसो के झुण्ड की तरह नज़र आ रही थी। स्वर्गलोक जैसा नज़ारा प्रतीत हो रहा था। ऐसा लग रह था मानो इस पवित्र सरोवर से हँस हीरे मोती-चुगने के लिए आये हों।जैसा कि गुरबाणी में अंकित है,"सरवर हंस तुरे ही मेला, खसमै एवै भाना। सरवर अन्दर हीरा मोती एह हँसा दा खाना।"वास्तव में सतगुरु के बनाये हंसो का आहार भी कीमती ही होता है। फिर सरोवर के किनारे समाधी में बैठे मेरे मन में यह विचार आया कि आज  हम पर सतगुरु जी ने कितनी कृपा की है हम कितने भाग्यशाली हैं कि जहाँ हमारे गुरु साहिबानों ने इतनी तपस्या की आज हमें भी मौका मिला है यहाँ बैठने का कितना आनंद है यहाँ !पवित्र सरोवर की छोह प्राप्त कर आती हुई ठंडी हवा,जो केवल तन को ही नहीं अंतर्मन को भी शीतल कर रही थी। सचमुच में बहुत राहत मिल रही थी। इस तरह हम ब्रह्ममुहूर्त का आनंद प्राप्त करते हुए लगभग डेढ़ घंटे 4 से 5:30 बजे तक समाधी में लीन रहने की कोशिश की। उसके बाद 5 :30 से 6 :30 बजे तक आसा जी की वार का कीर्तन हुआ। फिर श्री सतगुरु दलीप सिंह जी ने साध-संगत के कल्याण के लिए अनमोल प्रवचन किए। आप जी संगत को इन चालीस दिनों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए समाधी लगाकर, अपनी ज्ञानेन्द्रियों को नियन्त्रित कर ,सतगुरु जी के चरणों में अपना मन लगाने का तरीका बताया। इसके अलावा इन चालीस दिनों में ज्यादा से ज्यादा मौन रहकर अर्थात बातें कम करने,गुरबाणी के फरमान ;"अलप आहार सुलप की निद्रा"के अनुसार अल्प आहार करने, प्रेमाभक्ति मार्ग को अपनाने ,अपने गुरु साहिबानों को याद रखने तथा सरोवर के पास बैठ कर भक्ति करने के महत्व को भी बताया। बाद में अरदास हुई तथा कड़ाह प्रसाद वितरित किया गया। 
                         इस तरह इस महान कुम्भ जप-प्रयोग की शुरुआत हुई जिसका भोग 29 अश्विन मुताबिक 14 अक्टूबर को सुबह (अमृत वेले) होगा।अन्तिम तीन दिन 12 ,13 तथा 14 अक्टूबर को विशाल समागम होगा।   --प्रिंसिपल राजपाल कौर (जालंधर)

Monday, September 12, 2016

इस समय माता जी को ही निर्विवाद हो कर माथा टेका जा सकता है

उनको सद्गुरु रूप में स्वीकार कर पंथ को टूटने से बचा सकते हैं
नामधारी पंथ के पूजनीय श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी श्री माता चंद कौर जी का नाम उसी श्रेणी में आता है,जिन माताओं की देवियों के रूप में पूजा की जाती है तथा गुरबाणी में भी उन्हें धन्यता योग्य स्थान प्राप्त है जैसे 
धन्नु सु वंसु  धन्नु सु पिता धन्नु सु माता जिनि जन जणे।। (११३५ )  

धनु जननी जिनि जाइिआ धन्नु पिता परधानु।।  (३२ )  आदि। 
           श्री माता चंद कौर जी द्धारा पंथ व गरीबों और दुखियों की सेवा व सहायता की। श्री सतगुरु जी के पावन चरणों में रहते हुए देश की आज़ादी के बाद बेघर हुए लोगों के इलाकों में बसाने, आबाद करने तथा उन्हें उन्नति के शिखर तक पहुँचाने में आप जी ने सतगुरु जी के साथ मुख्य भूमिका निभाई। आप दिन रात पंथ की सेवा में लगे रहते। माता जी सर्वगुण सम्पन्न थीं।  

       आप जी की  महानता का परिचय श्री ठाकुर दलीप सिंह जी के बचनों तथा उन तस्वीरों से मिलता है जो स्वयं आप जी ने अपनी अलौकिक फोटोग्राफी से तैयार कर उन्हें सेवा के प्रत्यक्ष स्वरुप, शांत मूरत तथा जगत माता आदि उपनामों से सम्बोधित कर सभी  नामधारी परिवारों में सप्रेम भेंट स्वरुप दी। इसके साथ ही ऐसे पूजनीक माता जी की निन्दा करने से भी वर्जित किया था। संभव है कि उस समय भी कुछ मनमुख लोग माता जी की निंदा करते होंगे।
   
            उसके बाद दिसंबर 2012 में नामधारी पंथ के मुखी  श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद नामधारी पंथ में कुछ दरारें आती देख पंथ को एकजुट करने के लिए श्री ठाकुर दलीप सिंह जी ने यह निर्णय लिया कि इस समय माता जी ही केवल पंथ की सर्वोच्च हस्ती हैं जहाँ बिना किसी विवाद के माथा टेका जा सकता है और पंथ इकट्ठा हो सकता है। हम उनको सद्गुरु रूप में स्वीकार कर पंथ को टूटने से बचा सकते हैं और केवल कहा ही नहीं बल्कि श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के गुरुद्धारा साहिब श्री जीवन नगर में हो रहे श्रद्धांजली समारोह के दौरान श्री माता  चंद  कौर जी की तस्वीर को सतगुरु जगजीत सिंह जी की तस्वीर के साथ सुशोभित कर पहले आप नमस्कार की फिर सारी संगत को नमस्कार  करने तथा अरदास में उनका नाम शामिल कर के अरदास करने का हुक्म किया। ऐसे समय में श्री ठाकुर दलीप सिंह जी  ने सद्गुरु जगजीत सिंह जी की ओर से उनके सेवक डॉ. इक़बाल सिंह जी द्धारा भेजे गए गद्दी के उत्तराधिकारी होने के हक़ को त्याग कर दूर दृष्टि  से ये सोचा कि इस परिस्थिति में केवल माता जी के चरणों में सीस झुका कर ही सारा पंथ इक्कठा हो सकता है। और ऐसा ऐलान आप जी ने कोई निजी स्वार्थ के लिए नहीं अपितु  पंथ की भलाई के लिए किया।  

        संगत के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था क्योंकि माता जी तो पहले से ही महान हस्ती श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी होने के नाते सभी की पूजनीय थीं। पर पता नहीं संगत क्यों दुविधा में पड़ गई और संगत ने उनके आदेश का पूरी तरह से पालन नहीं किया। और कई लोग आप जी से वाद-विवाद करने लग गये क्योंकि कई मतलब परस्त तथा स्वार्थी लोगों को शायद यह खतरा पैदा हो गया कि यदि माता जी गुरुगद्दी पर बिराजमान हो गये तो वे गुरुघर की सम्पति पर कब्ज़ा कैसे करेंगे और भैणी साहिब में रहने वाले कुछ कब्जाधारी लोगों ने तो बहुत टीका टिप्पणी की। वे कहने लगे कि ये कौनसा नया काम है? एक स्त्री कैसे गुरु बन सकती है?जबकि गुरबाणी में सतगुरु के अनेक लक्षण लिखे हैं पर ऐसा कहीं नहीं लिखा कि एक स्त्री गुरु नहीं बन सकती। और इस तरह माता जी को गुरु रूप में स्वीकार नहीं किया। पर उनकी इस मनमत से पंथ का कई तरह से नुकसान हुआ। पंथ का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पंजाब की धरती पर माता जी की हत्या का कलंक लग गया और हमने अपने पूज्य माता जी को खो दिया।
काश! समूह नामधारी संगत ने श्री ठाकुर दलीप सिंह जी का आदेश मान कर माता चंद कौर जी को गुरु रूप में स्वीकार कर लिया होता। यदि माता जी सतगुरु रूप में बिराजमान होते तो नामधारी पंथ को ऐसी संकट की घड़ी ना देखनी पड़ती। हम उनके पावन सानिध्य का आनंद ले रहे होते और समाज व देश के लिए महान मिसालें कायम करने वाला नामधारी पंथ आज इस कगार पर असमंजस में ना खड़ा होता।  
 पर इस समय दौरान ही सिक्ख पंथ के निरंकारी समुदाय में ऐसा ही उदाहरण देखने को मिला जिसने पंथक हितैषी नामधारी समुदाय को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि नामधारियों ने माता जी को गुरु मानने का ऐलान कर शुरुआत तो की पर इसका लाभ नही उठा सके। इसका लाभ उनके निरंकारी भाइयों ने प्राप्त कर लिया। क्योंकि निरंकारी समुदाय ने  नामधारी पंथ के मुखी श्री ठाकुर दलीप सिंह जी द्वारा सर्वप्रथम शुरू की जाने वाली परंपरा को अपना कर इतिहास में एक नई मिशाल कायम की है। उन्होंने मई 2016 में अपने पंथ के मुखी बाबा हरदेव सिंह जी के ब्रह्मलीन हो जाने के पश्चात् ज्यादा दुविधा में न पड़ कर उनकी धर्मपत्नी माता सविंदर कौर जी को गुरु रूप में स्वीकार कर सराहनीय कार्य किया है। माता सविंदर कौर जी ने पंथ को उसी तरह सहेज लिया तथा सारा पंथ उनके समक्ष नतमस्तक है। इसके अलावा पंथ में किसी प्रकार का विवाद नहीं उठा और पंथ उन्नति की राह पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने सभी के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया उन लोगों को भी प्रेरणा दी है जो कहते थे कि एक स्त्री कैसे गुरु बन सकती है ? अतः आज भी उन लोगों को नारी शक्ति के अस्तित्व को पहचानने की जरूरत है जिन्हें पूजनीय स्थान देने पर हमेशा लाभ ही होता है नुकसान नहीं। महर्षि मनु जी ने संस्कृत के एक श्लोक में ठीक ही कहा है......         "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र फ़ला: क्रिया: ।।"   

अर्थात जहाँ स्त्रियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। जहाँ ये नहीं पूजी जाती वहां सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं। 


    प्रिंसीपल राजपाल कौर , 90231-50008 , Email : rajpal16773@gmail.com 

Wednesday, August 24, 2016

जानिए क्यों मना रहे हैं नामधारी बड़े पैमाने पर जन्माष्टमी का मेला

क्या यह जंग का ऐलान है माता चंद कौर के हत्यारों के खिलाफ?
लुधियाना: 23 अगस्त 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
जब भगवान कृष्ण का जन्म हुआ उस समय मां देवकी और पिता वासुदेव कारागार में था। भगवान कृष्ण का जन्म उस भविष्वाणी के सच होने का ज़बरदस्त संकेत था जिसके अंतर्गत कहा जाता है--जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। हालात का दुखद संयोग देखिये। मां देवकी को अगर कारागार में डाला गया था तो इधर नामधारी सम्प्रदाय की माता चंद कौर को दिन दिहाड़े भैणी साहिब जैसी किलेबन्द सुरक्षा में गोलियों से भून दिया गया। अभी तक हत्यारों का पता नहीं चला। रोष प्रदर्शन हुए, धरने दिए गए, ज्ञापन दिए गए लेकिन जांच आगे नहीं सरकी। इस हालात में नामधारी सम्प्रदाय के एक प्रभावशाली गुट की तरफ से जन्माष्टमीका मेला बहुत गहरे संकेत दे रहा है। क्या किसी कंस के वध का ऐलान तो नहीं होने वाला?
नामधारी संगत भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी के प्रकाश पर्व के संबंध में हिंदू सिक्ख एकता को समर्पित विशाल कार्यक्रम 28 अगस्त को न्यू दाना मंडी नजदीक बाईपास में करवा रही है। यह सारा आयोजन सतगुरु ठाकुर दिलीप सिंह जी की हजूरी में होगा। ठाकुर दलीप सिंह की तरफ से कुम्भ के मेले में बिना किसी सुरक्षा के आम श्रद्धालु की तरह जाना, गोविन्द गौधाम में जा कर नतमस्तक होना, समाज के सभी वर्गों को एकजुट होने का सन्देश देना और उन लोगों के गले लगाना जिनको समाज अछूत, गरीब और पिछड़ा हुआ मानता है--वास्तव में एक क्रांति के आरम्भ की घोषणा महसूस होती है। 
गद्दी और जायदाद छोड़ कर हर पल संगत के साथ हरिचर्चा में बिताना उनके त्याग को भी दर्शा रहा है और भविष्य की रणनीति को भी। गौरतलब है कि ठाकुर दलीप सिंह जी के समर्थकों के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि सतिगुरु जगजीत सिंह जी ने गद्दी वास्तव में किसको सौंपी थी। जिस व्यक्ति को सतिगुरु जगजीत सिंह जी ने अपना शरीर छोड़ने  नारियल और अन्य आवश्यक सन्देश दिया था वह व्यक्ति अभी मौजूद है। अगर संगत ने ज़ोर दिया तो उसे भी सभी के सामने लाया जा सकता है। नामधारी सम्प्रदाय को गुरु नानक के झंडे तले लाना भी उनकी दूरअन्देशी को बताता है। उनका नारा बहुत अर्थपूर्ण है--
गुरु नानक दे सिख हां;
असीं सारे इक हाँ। 
इसके साथ एक और नारा है--
पन्थ पाड़ना पाप है;
एकता विच प्रताप है। 
इसी बीच प्रमुख सिख नेतायों के साथ उनकी मुलाकातें भी बहुत गहरा इशारा दे रही हैं। इन नारों के बाद अब जन्माष्टमी मनाने का ऐलान इस एकता को सिर्फ सिखों तक नहीं बल्कि समाज के सभी वर्गों तक लेकर जाने का संकेत भी है। इस कार्यक्रम में नामधारियों के साथ साथ बहुत से गैर नामधारी समर्थक भी बढ़ चढ़ कर शामिल हो सकते हैं क्योंकि समाज को जोड़ने के इस अभियान को बहुत से संगठनों ने सहयोग और समर्थन दिया है। 
समागम की जानकारी देते हुए नामधारी दरबार के सेक्रेटरी संत नवतेज सिंह नामधारी ने बताया कि श्री ठाकुर दिलीप सिंह जी की अध्यक्षता में करवाये जा रहे समागम नामधारी संप्रदाय के लिए पहल है। उन्होंनें बताया कि इस तरह के समागम करवाने से आपसी प्यार बढ़ता है। वही नामधारी संगत लुधियाना के प्रधान हरभजन सिंह ने बताया कि इस समागम को लेकर संगतों में काफी उत्साह है। समागम में नामधारी पंथ के उच्च कोटि के विद्यवान जत्थेदार शामिल होंगे। इस मौके पर दर्शन सिंह, हरविंदर सिंह नामधारी, बलविंदर सिंह दुगरी, डॉ सुखदेव सिंह, गुरमेल बराड़, जसविंदर सिंह बग्गा, गुरदीप सिंह, जसवंत सिंह, जसवंत सोनू, निर्मल सिंह, राजवंत सिंह, मिल्खा, सिंह, जसपाल सिंह, सुरजीत सिंह, अरविदंर लाडी मौजूद रहे। अब देखना है कि इस कार्यक्रम के बाद नामधारी सम्प्रदाय की अगली रणनीति क्या होगी क्योंकि अभी तो त्योहारी सीज़न की शुरुआत ही हुई है।  

Wednesday, July 27, 2016

"काश ! नामधारी पंथ ने भी माता जी को गुरु मान लिया होता।"

निरंकारी समुदाय ने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया
हमारे महान देश भारत  की गौरवमयी सभ्यता के अनुसार जहाँ महान अवतारों जैसे भगवान् श्री विष्णु जी , भगवान् श्री रामचन्द्र जी , श्री सतगुरु नानक देव जी , श्री सतगुरु गोबिन्द सिंह जी आदि की आराधना की जाती है वहीँ लक्ष्मी माता , दुर्गा माता ,सीता माता जैसी देवीयों तथा देवी स्वरूप माताओं को भी पूजनीय स्थान दिया जाता है। श्री सतगुरु गोबिन्द सिंह जी ने तो माता साहिब देवां जी को समूचे खालसा पंथ की माता होने का मान बक्शा तथा गुरबाणी में भी माताओं  को बार बार धन्य कहा है। जैसे :- 
धन्नु सु वंसु  धन्नु सु पिता धन्नु सु माता जिनि जन जणे।। (११३५ )  
धनु जननी जिनि जाइिआ धन्नु पिता परधानु।।  (३२ )
धनि धनि तू माता  देवकी। जिह गृह रमईआ कवलापती।। २।। (९८८  )  
इसी तरह नामधारी पंथ के मुखी श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी शांतमूरत श्री माता चंद कौर जी का नाम भी इसी श्रेणी में आता है। जिन्होंने अपना सारा जीवन पंथ की सेवा में ही बिता दिया। उन्होंने श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के पावन चरणों में रह कर देश की आज़ादी के बाद लोगों को इलाकों को बसाने , आबाद करने तथा उन्हें उन्नति के शिखर तक पहुँचाने में माता जी ने सतगुरु जी के साथ मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने श्री सतगुरु राम सिंह जी द्धारा चलाये हुए सदाव्रत लंगर की सेवा के अलावा तीखी धूप में अपने सिरों पर टोकरियां उठा कर तथा अपने हाथों से बजरी आदि कूटकर गुरु घर की इमारतों की उसारी करवाई। अनेक गरीबों तथा दुखियो की सेवा की। श्री सतगुरु जी द्वारा चलाये गए सवा लाख पाठों को सम्पूर्ण करवाया आदि। 
ऐसी महान हस्ती सर्व गुण सम्पन्न थीं माता जी।  श्री ठाकुर दलीप सिंह जी ने उनकी महानता का वर्णन अपनी अलौकिक फोटोग्राफी से माता जी की मनमोहक तस्वीरें तैयार कर के उसमें दर्शाया था तथा उन्हें सेवा के प्रत्य्क्ष स्वरुप, शांत मूरत, जगत माता आदि उपनामों से सम्बोधित कर सभी नामधारी परिवारों में सप्रेम भेंट स्वरुप दी। इसके साथ ही ऐसे पूजनीक माता जी की निन्दा करने से भी वर्जित किया था। संभव है कि उस समय भी कुछ मनमुख लोग माता जी की निंदा करते होंगे। उसके बाद दिसंबर २०१२ में नामधारी पंथ के मुखी  श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद पंथ में कुछ दरारें आती देख पंथ को एकजुट करने के लिए श्री ठाकुर दलीप सिंह जी ने यह निर्णय लिया कि इस समय माता जी ही पंथ की सर्वोच्च हस्ती हैं हम उनको सद्गुरु रूप में स्वीकार कर पंथ को टूटने से बचा सकते हैं और केवल कहा ही नहीं बल्कि श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के गुरुद्धारा श्री जीवन नगर में हो रहे श्रद्धांजली समारोह के दौरान श्री माता  चंद  कौर जी की तस्वीर को सतगुरु जगजीत सिंह जी की तस्वीर के साथ सुशोभित कर सारी संगत को नमस्कार  करने तथा अरदास में उनका नाम शामिल कर के अरदास करने का हुक्म किया। ऐसे समय में श्री ठाकुर दलीप सिंह जी  ने सद्गुरु जगजीत सिंह जी की ओर से उनके सेवक डॉ. इक़बाल सिंह जी द्धारा भेजे गए गद्दी के उत्तराधिकारी होने के हक़ को त्याग कर दूरदृष्टि से ये सोचा कि इस परिस्थिति में केवल माता जी के चरणों में सीस झुका कर ही सारा पंथ इक्कठा हो सकता है। संगत के लिए ये सब कोई मुश्किल काम नहीं था क्योंकि श्री माता चंद कौर जी तो पहले से ही महान हस्ती श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी होने के नाते पूजनीय थी और श्री ठाकुर दलीप सिंह जी को माता जी से पूरी आशा थी कि वे पंथ को बिखरने से , टूटने से बचा लेंगी क्योंकि वे ऐसे महान प्रयास पहले भी कर चुकी थी।
पर सारी संगत ने इनके हुकम का पूरी तरह पालन नहीं किया, वे असमंजस में पड़ गए वे ठाकुर दलीप सिंह जी से वाद विवाद करने लग गए।क्योंकि कई मतलबपरस्त तथा स्वार्थी लोगों को शायद यह खतरा पैदा हो गया कि यदि माता जी गुरुगद्दी पर बिराजमान हो गये तो वे गुरुघर की सम्पति पर कब्ज़ा कैसे करेंगे।भैणी साहिब में रहने वाले ठाकुर उदय सिंह,संत जगतार सिंघ तथा हंसपाल आदि ने तो इस बात पर बहुत टीका-टिप्पणी की।वे कहने लगे कि एक स्त्री गुरु कैसे हो सकती है ? ये तो नामुमकिन है। जबकि गुरबाणी में सतगुरु के अनेक लक्षण लिखे हैं पर ऐसा कहीं नहीं लिखा कि एक स्त्री गुरु नहीं बन सकती।पर हमेशा कुछ स्वार्थी और लालची लोग अपने स्वार्थ के लिए समाज की हानि करते आये हैं और यहाँ भी यही परिणाम हुआ कि पंथ का बहुत नुकसान हुआ पंथ गुटों में बंट गया और एकता के इच्छुक माता जी को पंथ की महान सेवा करते हुए अपना बलिदान देना पड़ा। काश ! नामधारी समुदाय ने माता जी को सतगुरु रूप में स्वीकारा होता। माता जी एक सद्गुरु रूप में बिराजमान होते तो हमें ऐसी संकट की घड़ी ना देखनी पड़ती। हम उनके पावन सानिध्य का आनंद ले रहे होते और समाज व देश के लिए महान मिसालें कायम करने वाला नामधारी पंथ आज इस कगार पर असमंजस में ना खड़ा होता।
पर इसके साथ ही हम ये बात भी बड़े गर्व से बताना चाहते हैं कि सन 2012 में श्री ठाकुर दलीप सिंह जी ने नामधारी पंथ की एकता को कायम रखने के लिए श्री माता चंद कौर जी को गुरु मानने के लिए जो हुक्म नामधारी संगत को दिया था उसका अनुसरण करते हुए निरंकारी समुदाय ने अपने समुदाय के मुखी बाबा हरदेव सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनकी धर्मपत्नी माता  सविंदर कौर जी को गुरु रूप में स्वीकार कर एक सराहनीय कार्य कर इतिहास में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने ऐसा ऐलान कर आज उन लोगों को भी प्रेरणा दी है, जो कहते थे कि एक स्त्री कैसे गुरु बन सकती है ? , ऐसा हो ही नहीं सकता। इसलिए  आज भी उन लोगों को नारी शक्ति के आस्तित्व को पहचानने की जरुरत है जो कभी भी किसी भी रूप में आ कर समाज में एक नया परिवर्तन ला सकती है। 
"कोमल है कमजोर नहीं तू , शक्ति का नाम नारी है,
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे  हारी है।"     
    राजपाल कौर , 
   मुख्य सचिव , जालंधर विद्याक सोसाइटी ,जालंधर। 
   Contact at: 90231-50008  Email : rajpal16773@gmail.com