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Sunday, August 11, 2013

भारतीय सड़क कांग्रेस की 200वीं मध्यावधि परिषद बैठक प्रारंभ

11-अगस्त-2013 18:03 IST
श्री सर्वे सत्यनारायण ने जारी किये सड़क क्षेत्र के लिए पांच दस्तावेज 
भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) की 200वीं मध्यावधि परिषद बैठक आज यहां शुरु हुई। तीन दिन तक चलने वाली इस बैठक का उद्घाटन करते हुए सड़क परिवहन और राजमार्ग राज्यमंत्री श्री सर्वे सत्यनारायण ने सड़क क्षेत्र में सरकार के प्रयासों में सहायता देने के लिए भारतीय सड़क कांग्रेस के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि आईआरसी द्वारा तैयार किए गए दिशा-निर्देशों, व्यवहार संहिता और नियमावली की बदौलत सरकार सड़क क्षेत्र में विश्व का सबसे बड़ा कार्यक्रम प्रारंभ करने में सफल हुई है। भारतीय सड़क कांग्रेस ने सड़क क्षेत्र के समक्ष आने वाले विभिन्न मुद्दों के समाधान में समयानुकूल सहायता उपलब्ध कराई है। मंत्री ने इस अवसर पर पांच महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए। ये इस प्रकार हैं:- 

1. आईआरसी: 113-2013 ‘‘नरम अवभूमि पर जिओसिंथेटिक री-इनफोर्स्ड् एम्बैंकमेंट्स के डिजाइन और निर्माण के लिए दिशा निर्देश।’’ 

2. आईआरसी: 114-2013 ‘‘ रिजिड पेवमेंट में सिलिका फ्यूम के इस्तेमाल के लिए दिशा निर्देश।’’ 

3. आईआरसी: एसपी: 46-2013 ‘‘फाइबर री-इन्फोर्स्ड कंकरीट पेवमेंट्स के डिजाइन और निर्माण के लिए दिशा निर्देश।’’ 

4. आईआरसी: एसपी: 50-2013 ‘‘शहरी जल निकासी के लिए दिशा निर्देश।’’ 

5. आईआरसी: एसपी: 97-2013 ‘‘सड़क कार्यों के लिए कम्पैक्शन उपकरण के बारे में दिशा निर्देश।’’ 

इन दस्तावेज से सड़क निर्माण गतिविधियों में उत्सर्जित सामग्री के इस्तेमाल में मदद मिलेगी और सड़क निर्माण गतिविधियों में सिविल एजेंसियों को समस्याओं के पर्यावरण अनुकूल समाधान खोजने और आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य प्रौद्योगिकी के उन्नयन में भी सहायता मिलेगी। 

इससे पहले, आईआरसी के अध्यक्ष श्री सी. कंडासामी, जो सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारत सरकार में महानिदेशक, (सड़क विकास) और विशेष सचिव भी हैं, ने आशा प्रकट की कि एक्सप्रेस मार्गों के लिए नियमावली को जल्दी ही अंतिम रूप दिया जाएगा, जो अनुबंध समझौते का हिस्सा होगी और उसका पालन अनिवार्य होगा। 

भारतीय सड़क कांग्रेस की स्थापना 1934 में तत्कालीन भारत सरकार द्वारा की गई थी। यह इस क्षेत्र में सबसे पुराना और शीर्ष संगठन है। इसका मुख्य उद्देश्य सड़क क्षेत्र के बारे में आयोजना, डिजाइन, निर्माण, प्रचालन एवं रख रखाव से संबंधित सभी मामलों में अनुभव, विशेषज्ञता और विचारों का नियमित पूल प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना है। 

सड़क क्षेत्र के इस शीर्ष संगठन की मध्यावधि परिषद बैठक पहली बार नई दिल्ली में हो रही है। पिछली बैठक तमिलनाडु सरकार के निमंत्रण पर कोयम्बटूर में आयोजित की गई थी और अगली बैठक असम सरकार के निमंत्रण पर गुवाहाटी में आयोजित की जाएगी। 

वि. कासोटिया/देवेश/संगीता/राजीव/बेसरा-5432

Saturday, August 10, 2013

आधी सदी में भारत ने खो दी अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ

1961 में बोली जाती थीं भारत में 1100 भाषाएँ 
                                                     Photo: EPA
मामला बेहद गंभीर है और इसकी खबर दी है रेडियो रूस ने जिसका शीर्षक है-आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त। रेडिओ ने पूरी ज़िम्मेदारी से तथ्यों का हवाला देते हुए बताया है कि भारत के एक शोध संस्थान 'भाषा' जिसे 'भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र' भी कहा जाता है, के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आधी सदी में भारत ने अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ खो दी हैं।
इस क्षेत्र के एक शोधकर्ता गणेश देवी के अनुसार, सन् 1961 में भारत में 1100 भाषाएँ बोली जाती थीं लेकिन अब उनमें से 220 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। ये भाषाएँ सपेरों, ज्योतिषियों, स्वदेशी चिकित्सकों द्वारा बोली जाती थीं। भारत की 3-4 प्रतिशत जनसंख्या, यानी लगभग पाँच करोड़ लोग ऐसी भाषाएँ बोल सकते थे।
भारत में दो भाषाओं, हिन्दी और अंग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है जबकि 22 अन्य भाषाओं का देश के राज्यों में सरकारी भाषा के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

आधी सदी में भारत की 200 से अधिक भाषाएँ विलुप्त

आधी सदी में भारत ने खो दी अपनी 200 से अधिक स्वदेशी भाषाएँ 

Thursday, May 09, 2013

हिमाचल में एक और हादसा: ब्यास में गिरी बस

38 मौतों की आशंका:नशा, मोबाईल और अन्जानता ने ली जानें?
शिमला, 8 मई। पहाड़ी इलाकों में जहाँ एक एक कदम फूंक फूंक कर रखना पड़ता है वहां एक और  हादसे के कारण शोक का माहौल व्याप्त हो गया है। कुल्लू के निकट झिड़ी में बुधवार को एक निजी बस के ब्यास नदी में गिर जाने के कारण लगभग 40 लोगों के मारे जाने की आशंका है। डूबने वालों में से 33 के शव बरामद कर लिये गये हैं खोज का काम अभी जारी है। इस बार भी मारे गए लोगों में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों की संख्या भी काफी है। अशोका ट्रैवल्स की यह बस (एचपी 66-1538) कुल्लू से आनी जा रही थी। हालांकि दुर्घटना के कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है। इस तरह के हादसों में अक्सर होने वाली लापरवाहियों की ओर एक बार फिर स्पष्ट संकेत मिला है इस हादसे से। आरम्भिक पूछताछ के दौरान पता चला है कि दुर्घटना के समय बस को चालक की जगह कोई और चला रहा था। गौरतलब है कि पहाड़ी इलाकों में अच्छे अच्छे जानकार अभ्यस्त ड्राईवर भी बेहद ध्यान से गाड़ी चलते हैं। लेकिन जब इस सीट पर स्टेयरिंग का नियन्त्रण किसी अन्जान, प्रशिक्षु या कम अभ्यस्त के हाथों में हो तो ऐसी दुर्घटना को कौन रोक सकता है?  
चालीस लोगों से जुड़े परिवारों में शोक व्याप्त करने वाले इस हादसे के सम्बन्ध में प्राप्त आरम्भिक जानकारी के अनुसार सवारियों से खचाखच भरी यह बस कुल्लू बस अड्डे से दोपहर सवा दो बजे के करीब रवाना हुई थी। इस में सवार लोग नहीं जानते थे कि वे मौत की आगोश में जा रहे हैं। करीब 18-20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद ही यह दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जिस स्थान पर यह बस गिरी है वहां नदी में पानी काफी गहरा था। बस नदी में गिरते ही उल्टी हो गई। उल्टी पड़ी इस बस में फंसे लोगों को बाहर निकालने में भारी दिक्कत आई। केवल पांच-छह लोग ही किसी तरह से बस से बाहर निकल पाए। ज्यादातर लोगों की मौत पानी के भीतर दम घुटने की वजह से हुई। कुछ शव पानी के बहाव में बह गए वहीं अधिकतर शव आखिर तक बस के भीतर ही फंसे रहे। पानी में बहे शवों का पता लगाने के लिए प्रशासन ने ब्यास नदी में पंडोह बांध तक अलर्ट घोषित कर दिया है। शवों को खोजने के प्रयास किए जा रहे हैं। पता चला है कि बस में क्षमता से अधिक यात्री सवार थे। इस तरह ओवरलोड हुई बस सीधे उफनती ब्यास नदी में जा गिरी। जिस कारण कुछ लोगों को वहां पर मौजूद राफ्टिंग कंपनी के राफ्टरों ने बचा लिया। बचाव कार्य करीब दो घंटा देरी से शुरू हुआ।  गौरतलब है कि आनी में जिला स्तरीय मेले का आयोजन चल रहा है जिसके चलते आनी की ओर जाने वाले लोगों की संख्या अधिक थी। बताया जाता है कि बस में 50 से लेकर 60 लोग सवार थे। दुर्घटना में घायल धीरज नामक एक युवक ने मीडिया को बताया कि इस बार भी दुर्घटना के समय बस काफी तेज गति से चल रही थी। इस तरह के हादसों में तेज़ रफ्तारी अक्सर होती है। दुर्घटना के समय घटना स्थल पर मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार चालक काफी लापरवाही से बस चला रहा था। हालांकि जिस स्थान पर बस गिरी है वहां सड़क काफी चौड़ी है। यह भी कहा जा रहा है कि बस को चला रहा व्यक्ति शायद नशे में था और दुर्घटना के समय वह मोबाइल पर बात भी कर रहा था। सामने से आ रही एक गाड़ी को देखकर वह अचानक बस पर से नियंत्रण खो बैठा और बस नीचे जा गिरी। दुर्घटना के समय बस के चालक ने पहले ही छलांग मार दी। चालक अभी भी फरार है। पुलिस ने दुर्घटना को लेकर मामला दर्ज कर लिया है।  दुर्घटनाग्रस्त स्थल हालांकि मंडी जिले में है लेकिन कुल्लू से नजदीक होने के कारण कुल्लू  जिला प्रशासन ने राहत कार्यों को अंजाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुर्घटना की सूचना मिलते ही कुल्लू के जिला उपायुक्त शरव नेगी बचाव दल के साथ दुर्घटनास्थल पर पहुंच गए। प्रशासन ने बस को निकालने के लिए सबसे पहले क्रेन का इंतजाम किया। दो क्रेन एनएचपीसी से मंगाई गई और एक क्रेन एक निजी ठेकेदार से ली गई। इस दौरान यहां नदी में रिवर राफ्टिंग का व्यवसाय करने वाले युवकों ने बस में फंसे लोगों को निकालने में प्रशासन की भारी मदद की।  
गौरतलब है कि दुर्घटनाग्रस्त हुई बस में दो पत्रकार भी सवार थे। इनमें से बंसी नामक एक पत्रकार जहां लापता है वहीं दिलीप नामक दूसरे पत्रकार को भी चोटें आई हैं। कुल्लू के जिला उपायुक्त शरव नेगी ने संपर्क साधे जाने पर मीडिया को बताया कि सभी घायलों का इलाज किया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि तत्काल राहत के तौर पर सरकार की तरफ से घायलों और मृतकों के परिवार वालों को आवश्यक सहायता राशि भी उपलब्ध कराई गई है। अर्थात वह सब जरी है जो अक्सर हादसे के बाद होता है। 
इस दर्दनाक हादसे में 16 लोग घायल भी हुए हैं। जिनमें 6 लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है। सड़क हादसे में घायल लोगों में लैहणू राम पुत्र लाल चंद (23) दोहरानाला, 41वर्षीय ध्यान सिंह पुत्र पोशू निवासी जवाड़, धीरज (25) पुत्र अशरफी लाल बरेली, ज्ञान चंद पुत्र सीता राम गांधीनगर, राहुल पुत्र दिले राम नगवाईं, नाथू राम जमोट खोखण, दलीप कांगड़ा आदि शामिल है। प्रशासन की ओर से घायलों को फौरी राहत के तौर पर पांच हजार व मृतकों के परिजनों को 15 हजार रुपये की सहायता राशि उपलब्ध करवाई गई है। घायलों को निकलने में आईटीबीपी और होम गार्ड के जवानों ने भी सराहनीय कार्य किया। आस पास के लोग भी सहयोगी रहे. अब देखना है की इस हादसे के बाद भी कुछ ऐसे कदम उठाये जाते हैं या नहीं जो इन हादसों को रोक सकें। 

Sunday, January 06, 2013

सिक्किम की सुगंध-टेमी चाय

03-जनवरी-2013 14:58 IST
दुनिया भर के चाय प्रेमियों का दिल जीत लिया 
टेमी चाय पर विशेष लेख                                                         * खगेन्‍द्रमणि प्रधान
                                                                                                                                  Courtesy Photo
आकर्षक और भव्‍य माउंट कंचन ज़ोंगा की पृ‍ष्‍ठभूमि में तीस्‍ता नदी की सुहावनी समीर के साथ सिक्किम हर सुबह टेमी चाय का आनंद लेता है। 4500 से 6,316 फुट की ऊंचाई पर फैली ढलान वाली 180 हेक्‍टेयर भूमि में टेमी चाय के बागान हैं, जहां बहुत ही बढ़िया परम्‍परागत चाय की पैदावार होती है, जिसकी चाय के कदरदान तारीफ करते नहीं थकते।
    टेमी चाय बागान की स्‍थापना सिक्किम के पूर्व नरेश चोग्‍याल के शासनकाल में 1969 में हुई थी और बड़े पैमाने पर इसका उत्‍पादन 1977 में शुरू हुआ। चाय बागान के रोजमर्रा के काम-काज को व्‍यवस्थित रखने के लिए 1974 में चाय बोर्ड की स्‍थापना की गई और बाद में यह सिक्किम सरकार के अंतर्गत उद्योग विभाग की सहायक कम्‍पनी बन गई। टेमी चाय से जहां एक ओर 4 हजार से अधिक श्रमिकों और 30 कर्मचारियों को सीधे रोजगार मिलता है, वहीं यह कम्‍पनी सरकारी क्षेत्र में रोजगार प्रदान करने वाली एक बड़ी कम्‍पनी बन गई है।
    हल्‍की ढलान वाली यह भूमि तेंदोंग पर्वत श्रृंखला से शुरू होती है। 30-50 प्रतिशत ढलान वाली दुम्‍मट मिट्टी की यह भूमि चाय बागान के लिए बहुत ही उपयुक्‍त है और यहां साल में लगभग 100 टन चाय की पैदावार होती है। यदि बड़े चाय बागानों से मुकाबला किया जाए, तो यह पैदावार बहुत ज्‍यादा नहीं है, लेकिन इसकी गुणवत्‍ता और सुगंध ने भारत और दुनिया भर के चाय प्रेमियों का दिल जीत लिया है।
    टेमी चाय बागान में पैदा हुई चाय को ''टेमी चाय'' जैसे कई ब्रांड नामों से पैक किया जाता है, जो सबसे बढ़िया क्‍वालिटी की चाय होती है, जिसमें सुनहरी फूलों जैसी नारंगी झलक वाली बढि़या काली चाय होती है। इसके बाद दूसरी बढ़िया चाय का लोकप्रिय ब्रांड नाम है 'सिक्किम सोलजा' और उसके बाद 'मिस्‍टीक चाय' और 'कंचनजंगा' चाय का नाम आता है। इसे 'ऑर्थोडोक्‍स डस्‍ट टी' के नाम से बेचा जाता है। चाय की लगभग 70 प्रतिशत पैदावार अधिकृत दलाल के माध्‍यम से कोलकाता में सार्वजनिक नीलामी से बेची जाती है और बा‍की की चाय के रिटेल (खुदरा बिक्री के लिए) पैकेट बनाए जाते हैं और स्‍थानीय बाजार में बेचे जाते हैं।
    चाय बागान की भूमि की भौगोलिक स्थिति और चाय के पौधों को जैविक खाद से पोषित करने से इस चाय बागान में पैदा होने वाली चाय के पत्‍तों की कीमत और सुगंध और बढ़ जाती है।
    टेमी चाय बागान ने स्विटज़रलैंड की बाजार नियंत्रण से संबंधित संस्‍था-आईएमओ  के निर्देशों का पालन किया और पर्यवेक्षण की अवधि पूरी होने के बाद आईएमओ इंडिया ने, जो आईएमओ स्विटज़रलैंड का सदस्‍य समूह है, 2008 में टेमी चाय बागान को 100 प्रतिशत ऑर्गेनिक का प्रमाण पत्र दिया। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली के अंतर्गत भी यह आईएसओ-22,000 मानक के अनुसार एचएसीसीपी द्वारा भी परमाणीकृत चाय बागान है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि बाजार पहुंचने वाला उत्‍पाद उत्‍तम गुणवत्‍ता वाला है। यह भी उल्‍लेखनीय है कि टेमी चाय बागान को लगातार दो वर्षों से भारतीय चाय बोर्ड ने भी अखिल भारतीय गुणवत्‍ता पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया है।
    चाय उत्‍पादन की पूरी प्रक्रिया को परंपरागत से ऑर्गेनिक में बदलने से न केवल इसके लिए अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में मांग बढ़ी है, बल्कि सिक्किम जाने वाले पर्यटक भी बड़ी संख्‍या में इसकी मांग करते हैं। चाय की ऑर्गेनिक खेती के लिए जैविक खाद और वर्मिन-कम्‍पोस्‍ट खाद, नीम और अरंण्‍डी की बट्टियों के रूप में कीटनाशक भी उपलब्‍ध होते हैं। चाय बागान के पास लगभग 100 एकड़ वन भूमि भी है, जिससे बड़ी मात्रा में चाय बागान के लिए जैविक खाद-पदार्थों की पूर्ति हो जाती है, जो इसे आवश्‍यक संसाधनों की दृष्टि से आत्‍मनिर्भर बनाता है।
    खेती में रासायनिक खादों के इस्‍तेमाल को छोड़कर पैदावार के ऑर्गेनिक तरीके अपनाने से न केवल टेमी चाय बागान की उत्‍पादन लागत कम हुई है, बल्कि हानिकारक रसायनों से मुक्‍त ऑर्गेनिक पैदावार को पसंद करने वालों का एक बहुत बड़ा बाजार भी मिल गया है। टेमी चाय बोर्ड को अपनी सफलता पर गर्व है और वह सरकारी राजस्‍व में भी पर्याप्‍त योगदान दे रहा है।
    जर्मनी, ब्रिटेन, अमरीका और जापान टेमी चाय के प्रमुख खरीददार हैं। ग्रीन टी की बढ़ती मांग को देखते हुए इसमें विविधता लाने के कई प्रयास किए जा रहे है और इसकी कीमत बढ़ाने के लिए अधिक आकर्षक डिज़ाइन वाले पैकेट तैयार किए जा रहे हैं। इसके अलावा सिक्किम की इस चाय के लिए विदेशी बाजार में सीधे खरीददार बनाने के भी प्रयास किए जा रहे हैं। चाय बोर्ड ने कनाडा और जापान को ऑर्गेनिक चाय के छोटे पैकेट सीधे निर्यात करना भी शुरू कर दिया है, जहां इसके लिए स्‍पर्धात्‍मक और आकर्षक दाम मिल रहे हैं।
    चाय बागान के विस्‍तार के लिए उपयुक्‍त भूमि न मिलने से इसके क्षेत्र का विस्‍तार नहीं हो पा रहा है। लेकिन टेमी चाय बागान छोटे किसानों और उत्पादकों को बढ़िया पौध और अन्‍य तकनीकी जानकारी की सहायता उपलब्‍ध करा रहा है। बागान की नर्सरी में बढ़िया पौध तैयार की जाती है, जिसका वितरण राज्‍य के छोटे चाय बागानों की सहकारिताओं में किया जाता है।
    हालांकि टेमी चाय चाय पारखियों की उम्‍मीदों पर खरी उतरी है, फिर भी चाय बागान की जलवायु संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए यहां अधिक कीमत वाली और बढि़या चाय पत्‍तों वाली पैदावार की अभी भी गुंजायश है।
            (PIB)       (पत्र सूचना कार्यालय विशेष लेख)सिक्किम की सुगंध-टेमी चाय
*फ्रीलांस पत्रकार
नोट: लेखक द्वारा इस लेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार आवश्‍यक नहीं कि पत्र सूचना कार्यालय के विचारों से मेल खाते हों।

 सिक्किम स्क्रीन में भी देखें 
  
मीणा/राजगोपाल/लक्ष्‍मी-03

Thursday, January 03, 2013

वि‍यतनाम के साथ संबंधों को मजबूत बनाने पर जोर

03-जनवरी-2013 19:17 IST
'पूरब की ओर देखो नीति‍' का एक स्‍तंभ है वि‍यतनाम
 हम अपनी रणनीति‍क साझेदारी को आगे बढ़ाने के लि‍ए तैयार-पर्यटन मंत्री के. चि‍रंजीवी 
केंद्रीय पर्यटन मंत्री श्री के. चि‍रंजीवी ने कहा कि‍ वि‍यतनाम भारत की 'पूरब की ओर देखो नीति‍' का एक स्‍तंभ है और भारत वि‍यतनाम के साथ द्वि‍पक्षीय और आसि‍यान कार्यक्रम- दोनों तरफ से संबंधों को मजबूत बनाने के काम को उच्‍च प्राथमि‍कता देता है। हनोई स्‍थि‍त भारतीय दूतावास की ओर से व्‍यापार और नि‍वेश वि‍षय पर आयोजि‍त एक वि‍चारगोष्‍ठी को संबोधि‍त करते हुए मंत्री महोदय ने कहा कि‍ हम अपनी रणनीति‍क साझेदारी को आगे बढ़ाने के लि‍ए तैयार है, जो वि‍शेषकर आर्थि‍क, वाणि‍ज्‍यि‍क, रक्षा और सुरक्षा, वैज्ञानि‍क और तकनीकी‍ तथा सांस्‍कृति‍क क्षेत्रों से जुड़ हैं। इस आयोजन में वि‍यतनाम का उद्योग और व्‍यापार मंत्रालय तथा वि‍यतनाम चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स एण्‍ड इंडस्‍ट्री सहयोगी था। मंत्री महोदय ने कहा कि‍ वर्ष 2015 तक आसि‍यान-भारत व्‍यापार के लि‍ए 100 अरब अमरि‍की डॉलर का लक्ष्‍य रखा गया है। 

इस वि‍चारगोष्‍ठी में पीपुल्‍स कमि‍टी ऑफ डानांग के वाइस चैयरमैन श्री फुंग टान वीएट, वि‍यतनाम चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स एण्‍ड इंडस्‍ट्री के वाइस चैयरमैन श्री हुवांग वॉन डुंग, वि‍यतनाम नेशनल टूरि‍ज्‍म के चैयरमैन श्री नगुऐन वॉन ट्वान और लगभग 150 वि‍यतनामी कंपनि‍यों के प्रति‍नि‍धि‍यों ने भाग लि‍या। (PIB
वि‍यतनाम के साथ संबंधों को मजबूत बनाने पर जोर 
***
वि‍.कासोटि‍या/सुधीर/सुजीत-37

Monday, October 08, 2012

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान

गाँधी जी की विचारधारा को घर घर ले जाने का संकल्प  
13 अक्टूबर को होगा लुधियाना में बापू गाँधी का श्राद्ध
संकल्प लेते राष्ट्रिय विकास मंच के सदस्य और अन्य लोग 
महात्मा गाँधी का नाम और विचारधारा उनकी शहादत के बाद लगातार और जोर पकडती जा रही है। तेज़ी से से प्रासंगिक हो रहे गाँधी जी के विचार एक बार फिर युवायों को आकर्षित कर रहे हैं। उनके समर्थकों की सख्या भी बढ़ रही है और विरोधियों की भी। चर्चा उनक समर्थक भी उनके विचारों की करते हैं और उनके विरोधी भी। हालत यह है की गाँधी जी का विरोध करने वाले भी उनकी हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे को सीधे सीधे नायक कहने की हालत में नहीं हैं। गत दिनों एक स्कूली छात्रा ने आरती आई के ज़रिये प्रधानमन्त्री कार्यालय से एक सवाल पूछा कि महात्मा गाँधी को बापू गाँधी की उपाधि या नाम किस ने और कब दिया। इस सवाल का जवाब न तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिया और न ही गृह मन्त्रालय ने। आखिर इस बच्ची की तस्वीर, उसका सवाल और सरकार का इस पर टालमटोल का जवाब सब कुछ फेसबुक पर आ गया। राष्ट्र के बापू केसाथ यह कैसा मजाक ? जिस नमक आन्दोलन बापू ने सारी दुनिया हिला दी वही नमक देश में आजादी आ जाने के बाद महंगे भाव पर बिकने लगा। जिस स्वदेशी के नारे ने अँगरेज़ साम्राज्य की नींव हिला दी थी आजादी आ जाने के बाद आज उसी स्वदेशी की नीति को पांवों तले कुचल कर विदेशी कम्पनियों को घुटने टेक कर निमंत्रित किया जा रहा है की आईये और हमें लूटिये। देश के बापू के साथ यह कैसा खिलवाड़ ? सीधे विदेशी निवेश जको एक आवश्यक मुख्य नीती के तौर पर अपना लिया गया है। आज समझ आने लगा है की गाँधी जी ने आजादी आने के बाद कांग्रेस को भंग करने की बात क्यूं कही थी? महात्मा गाँधी का नाम लेने वाले लोग ही गाँधी जी के सपनों को धुल में मिला रहे हैं। हमारा संविधान जिस विचार, नीति और भावना की बात करता है हमारे कदम उस सब के पूरी तरह विपरीत जा रहे हैं। किसी भी तरह नहीं लगता कि  यह गाँधी जे के सपनों या विचारों की आजादी है ! 
राष्ट्रीय  विकास मंच के आयोजन की एक यादगारी तस्वीर  
हालात लगातार नाज़ुक हो रहे हैं। अमन, शांति और सदभावना के पुजारी महात्मा गाँधी को बापू कहने वाले देश में हत्या, साड्फूंक, खूनखराबा, लूटमार, बेईमानी, बलात्कार, भ्रूण हत्या, शोषण, बेरोज़गारी, छूयाछात जैसे कलंक एक आम बात हो चुकी है।  इन अत्यंत गंभीर हालात में राष्ट्रीय विकास मंच ने एक संकल्प लिया है गाँधी जी के विचारों को घर घर तक लेजाने का। इसकी औपचारिक शुरूआत की गयी दो अक्टूबर गाँधी जयंती के दिन। पहले दो छोटे छोटे से कार्यक्रम हुए लुधियाना के गोलबाग में, इसके बाद रखबाग और फिर 1 बजे गाँधी धाम पर हुआ मुख्य समारोह। गुरिंदर सूद, निर्दोष भारद्वाज, हरजीत सिंह नंदा और रवि सोई के मार्गदर्शन और संचालन में संकल्प लिया गया की वे सभी मिल कर छूआछात, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और देश में बढ़ रहे विदेशी के चलन का दत कर विरोध किया जायेगा।  ਇਹਨਾਂ ਅੱਤ ਦੇ ਗੰਭੀਰ ਹਾਲਾਤਾਂ ਵਿੱਚ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਵਿਕਾਸ ਮੰਚ ਨੇ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫੇਰ ਮਹਾਤਮਾ ਗਾਂਧੀ ਦੇ ਫਲਸਫੇ ਨੂੰ ਘਰ ਘਰ ਤੱਕ ਲਿਜਾਣ ਦਾ ਬੀੜਾ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ। दो अक्टूबर 2012 को शुरू हुआ यह अभियान 30 जनवरी तक जरी रहेगा। इस अभियान के अंतर्गत 13 अक्टूबर 2012 को बापू गाँधी का श्राद्ध भी किया जायेगा। गौरतलब है कि बापू के श्राद्ध का आयोजन किसी भी विचार्धार्क सन्गठन की और से शायद पहली बार किया जा रहा है। उल्लेखनीय है की 13 अक्टूबर 1948 के दिन को ही बापू गाँधी की अस्थियों का विसर्जन भी हुआ था। इस श्राद्ध में भाग लेने के इच्छुक नीचे दिए गए नम्बरों पर सम्पर्क भी कर सकते हैं। 
गुरिंदर सूद:               +91 98881 23786
रवि राज सोई:             +91 98884 92198
ਨਿਰਦੋਸ਼ ਭਾਰਦਵਾਜ :    +91 99884 03850

नीचे दिए गए दो पंजाबी लिंक भी देखें:
1*ਗਾਂਧੀਵਾਦ ਅੱਜ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਚ–ਮੋਹਿਤ ਸੇਨ


2*13 ਅਕਤੂਬਰ ਨੂੰ ਹੋਵੇਗਾ ਬਾਪੂ ਗਾਂਧੀ ਦਾ ਸ਼ਰਾਧ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿੱਚ 

राष्ट्रिय विकास मंच ने किया एक और अहम एलान 

Wednesday, August 15, 2012

स्वतंत्रता-दिवस की सार्थकता //राजीव गुप्ता

लगभग 60%  जनसँख्या  गरीबी में अपना जीवनयापन कर रही है
                                                                                                                                             साभार तस्वीर 
15 अगस्त 1945 को जापान के आत्मसमर्पण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध हिरोशिमा और नागासाकी के त्रासदी के रूप में कलंक लेकर समाप्त तो हुआ परन्तु जापान पिछले वर्ष आये भूकंप और सूनामी जैसी त्रासदी के बाद भी बिना अपने मूल्यों से समझौता किये राष्ट्रभक्ति, अपनी ईमानदारी और कठिन परिश्रम के आधार पर अखिल विश्व के मानस पटल पर लगभग हर क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ता हुआ नित्य-प्रतिदिन आगे बढ़ता जा रहा है. ठीक दो वर्ष बाद 15 अगस्त 1947 को भारतवर्ष ने अपने को रणबांकुरों के बलिदानों की सहायता से एक खंडित-रूप में अंग्रेजों की बेड़ियों से स्वाधीन करने से लेकर अब तक भारत ने कई क्षेत्रो में को अपनी उपलब्धियों के चलते अपना लोहा मनवाने के लिए पूरे विश्व को विवश कर दिया.
भारत ने लंबी दूरी के बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र अग्नि-5 का परीक्षण किया जिसकी मारक-क्षमता चीन के बीजिंग तक की दूरी तक है और अरिहंत नामक पनडुब्बी का विकास किया  जो कि परमाणु ऊर्जा से चलती है तथा पानी के अन्दर असीमित समय तक रह सकती है और साथ ही सागरिका जैसी मिसाइलो को छोड़ने में भी सक्षम है को अपनी नौ सेना में शामिल कर अपनी सामरिक शक्ति में कई गुना वृद्धि किया तो वहीं रिसैट-1 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण कर दिखाया जिससे बादल वाले मौसम में भी तस्वीर ली जा सकती है. भारत अपने भुवन" नामक तकनीकी के माध्यम से गूगल अर्थ तक को पीछे छोड़ दिया है. इस तकनीकी के माध्यम से दुनिया भर की सैटेलाईट तस्वीर बहुत बेहतर तरीके से जिसकी गुणवत्ता गूगल अर्थ की गुणवत्ता से कई गुना बेहतर है.
अपने पहले मानवरहित चंद्रयान-1 के माध्यम से चन्द्रमा की धरती पर तिरंगे साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के साथ ही  भारत विश्व का चौथा देश बन गया. इतना ही नहीं चिकित्सा क्षेत्र में नैनोटेक्नोलॉजी के माध्यम से हमारे देश ने गत कुछ समय में असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं परिणामतः कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का भी इलाज संभव हो गया है.  भारत हर वर्ष एक नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसकी वजह से पूरा विश्व भारत को उभरती हुई महाशक्ति के रूप में मान्यता देने को मजबूर हुआ है. टीम इंडिया ने विश्व कप क्रिकेट 2011 पर कब्जा जमाया तो भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स और फॉर्मूला वन रेस का आयोजन कर दुनिया में अपना परचम लहरा दिया.
परन्तु भारत की इन उपलब्धियों के बावजूद इसका एक दूसरा रूप भी है. भारत की लगभग 70 प्रतिशत जनता अभी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ग्रामीण भारत से सम्बन्ध रखती  है.  भारत में हुई हरित क्रांति के इतने साल बाद भी हम नई खेती के तरीको को मात्र 20 - 25  प्रतिशत खेतो तक ही ले जा पायें है . आज भी भारतीय - सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी) में  कृषि का  लगभग 15  प्रतिशत  का योगदान है .  बावजूद इसके भारत की आधी  से ज्यादा एनएसएसओ के ताजा आंकड़ो के आधार पर लगभग 60%  जनसँख्या  गरीबी में अपना जीवनयापन कर रही है . देश का कुल 40 प्रतिशत हिस्सा सिंचित/असिंचित है . इन क्षेत्रो के किसान पूर्णतः मानसून पर निर्भर है . आज भी किसान जोखिम उठाकर बीज, खाद, सिंचाई इत्यादि के लिए कर्ज लेने को मजबूर है ऐसे में अगर फसल की पैदावार संतोषजनक न हुई आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है .
भारत में किसानो की वर्तमान स्थिति बद से बदत्तर है . जिसे सुधारने के लिए सरकार को और प्रयास करना चाहिए . इसी के मद्देनजर किसानो की इस स्थिति से निपटने हेतु पंजाब के राज्यपाल शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में गत वर्ष अक्टूबर में एक कमेटी बनायीं गयी थी जो शीघ्र ही सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपेगी . इन सब उठापटक के बीच इसका एक  दूसरा पहलू यह भी है कि सीमित संसाधन के बीच यह देश इतनी बड़ी आबादी को कैसे बुनियादी जरूरतों को उपलब्ध करवाए यह अपने आपमें एक बड़ा सवाल है जिसके लिए आये दिन मनरेगा जैसी  विभिन्न सरकारी योजनाये बनकर घोटालो की भेट चढ़ जाती है और भारत - सरकार देश से गरीबी खत्म करने के खोखले दावे करती रहती है .
सिर्फ इतना ही नहीं भारत में स्वास्थ्य - सेवा तो भगवान भरोसे ही है अगर ऐसा माना जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी . एक तरफ जहा हमारी सरकार चिकित्सा - पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती  है तो वही देश का दूसरा पक्ष कुछ और ही बयान करता है जिसका अंदाज़ा हम आये दिन देश के विभिन्न भागो से आये राजधानी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के आगे जमा भीड़ को देखकर लगा सकते है जहाँ एक छोटी बीमारी की इलाज के लिए ग्रामीण इलाके के लोगों को दिल्ली - स्थित एम्स आना पड़ता है . एक आकडे के मुताबिक आजादी के इतने वर्षों के बाद भी इलाज़ के अभाव में प्रसव - काल में 1000 मे 110 महिलाये दम तोड़ देती है . ध्यान देने योग्य है कि यूएनएफपीए के कार्यकारी निदेशक ने प्रसव  स्वास्थ्य सेवा पर चिंतित होते हुए कहा है कि विश्व भर में प्रतिदिन लगभग 800 से अधिक महिलाये प्रसव  के समय दम तोड़ देती है . भारत में आज भी एक हजार बच्चो  में से 46 बच्चे काल के शिकार हो  जाते है और 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते है .
भारत को अब मैकाले – शिक्षा नीति को भारत-सापेक्ष बनाना नितांत आवश्यक है क्योंकि प्राचीन भारतीय शिक्षा दर्शन का परचम विश्व में कभी लहराया था. प्राचीन भारत का शिक्षा-दर्शन की शिक्षा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए थी. इनका क्रमिक विकास ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य था. मोक्ष जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य था और यही शिक्षा का भी अन्तिम लक्ष्य था. प्राचीन काल में जीवन-दर्शन ने शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया था. जीवन की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का प्रभाव शिक्षा दर्शन पर भी पड़ा था. उस काल के शिक्षकों, ऋषियों आदि ने चित्त-वृत्ति-निरोध को शिक्षा का उद्देश्य माना था. शिक्षा का लक्ष्य यह भी था कि आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो. किन्तु इसका यह भी अर्थ नहीं था कि लोकोपयोगी शिक्षा का आभाव था. प्रथमत: लोकोपयोगी शिक्षा परिवार में, परिवार के मध्यम से ही सम्पन्न हो जाती थीं. वंश की परंपरायें थीं और ये परम्परायें पिता से पुत्र को हस्तान्तरित होती रहती थीं.
प्राचीन युग की प्रधानता होने से राजनीति में हिंसा और शत्रुता, द्वेष और ईर्ष्या, परिग्रह और स्वार्थ का बहुल्य न होकर, प्रेम, सदाचार त्याग और अपरिग्रह महत्वपूर्ण थे. उदात्त भावनायें बलवती थीं. दिव्य सिद्धान्त जीवन के मार्गदर्शक थे. सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति प्रधान नहीं था, अपितु वह परिवार और समाज के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करने को तत्पर था. उदात्त वृत्ति की सीमा सम्पूर्ण वसुधा थी. जीवन का आदर्श ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ था. भौतिकवादिता को छोड़ व्यवसायों के क्षेत्र में प्रतियोगिता नहीं के बराबर थीं. सभी के लिए काम उपलब्ध था. सभी की आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती थीं. भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार और  काले  -धन जैसी सुरसा रूपी बीमारी को खत्म करके तथा तंत्र-व्यवस्था को भारतीय - सापेक्ष कर एकांगी-विकास की बजाय समुचित-विकास पर ध्यान देना चाहिए ताकि एक खुशहाल और समृद्ध भारत का सपना साकार हो सके और हर भारतीय स्वतंत्रता की सार्थकता को समझ सकें.    

 - राजीव गुप्ता, लेखक,  9811558925
 पंजाब स्क्रीन में भी देखें 
दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास

Wednesday, August 08, 2012

हत्यारों के बाद चोरों ने भी दी पुलिस को चुनौती

लुधियाना के गहन भीडभाड वाले पोश इलाके घुमार मण्डी में चोरी चोरों ने घड़ियों की दुकान पर किया हाथ साफ़....पुलिस जांच जारी  
लुधियाना के पोश इलाके घुमार मंडी में तीस लाख की घड़ियाँ चोरी होने की खबर से सनसनी फ़ैल गई है. यह चोरी इंडो वाच नामक दूकान पर हुयी जहाँ अच्छे अच्छे ब्रांड की महंगी घड़ियाँ बिकती हैं. सख्त निगरानी के इस क्षेत्र में सी सी टी वी कैमरे भी लगे हैं लेकिन फिर भी चोरों ने यहाँ भुत ही सफाई से हाथ साफ़ कर लिया.
 लुधियाना की घुमार मंडी एक आधुनिक कारोबारी केंद्र बन चुय्की हैं . चौड़े बाज़ार और घनता घर के बाद लुधियाना की शोपिंग को एक नया रंग रूप इसी घुमार मंडी से मिला. यहाँ हुई  एक बड़ी चोरी ने सब के होश उड़ा दिए हैं. करीब तीस लाख की यह चोरी इंडो वाच नामक दूकान पर हुई.

 इंडो वाच के शोरूम मालिक विजय कुमार  बहुत ही घबराहट में मीडिया को बताया अंदाज़न २५ तीस लाख के माल की चोरी हुई है. तिजौरी में कुछ हजार रुपयों का कैश भी था पर ज्यादा नुक्सान कीमती और महंगे ब्रांड की घड़ियाँ चोरी होने से हुआ.घड़ियों की इतनी बड़ी चोरी से सारा बाज़ार सन्न रह गया. गौरतलब है की शो रूम का शटर बस थोडा सा ही मुदा हुआ था. पहली नजर से देख कर दीवार में कोई दरार सी भी नज़र नहीं नाती. न जाने इतने छोटे से रास्ते में से चोर कैसे अंदर गया होगा और फिर माल लेकर कैसे बाहर निकला होगा.
पुलिस ने मौके पर पह्गुंच कर पूरी बारीकी से जाँच शुरू कर दी है. सी टी वी कैमरे के फुटेज पर नज़रें गधा कर बैठे पुलिस टीम के सदस्य हर चेहरे को गौर से देख रहे हैं. इसके साथ ही उन्ग्ल्कियों के निशाँ लेने का काम भी बहुत ही ज़िम्मेदारी से पूरा किया जा रहा है. पुलिस के साथ महिला जांच अधिकारी भी थे. पुलिस का कहना है कि जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा.
मौके पर तयनात पुलिस अधिकारी ने बताया के मामले के जाँच जारी है और उसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा.
इस चोरी के बाद बड़े शोपिंग केन्द्रों की सुरक्षा पर पैदा हुए सवालों पर फिर से से गंभीरता के साथ विचर आवश्यक हो गया है. कुल मिला कर हत्या हो या चोरी, लूट हो या तस्करी....मुजरिमों का होंसला बढ़ते जाना पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है. इसे रोकने के लिए पूरे समाज को पुलिस से सहयोग करना ही चाहिए. रेक्टर कथूरिया  

Sunday, July 22, 2012

मामला पंजाब के विकास का //बिजली पानी ज़रूरी या मैट्रो ?

मैट्रो की बजाय लोगों को पीने का पानी दें बादल:
  विकास की बातों को परनीत कौर ने लिया आड़े हाथों  
राजपुरा, 21 जुलाई: कांग्रेस पार्टी की सांसद केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री महारानी परनीत कौर ने पंजाब में विकास की लम्बी चौड़ी बातें करने वालों को आड़े हाथों लिया है।  एक शोक सभा के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि सच बात तो यज है कि पंजाब में जो थोडी-बहुत सरकार चल रही है, वह केन्द्र सरकार की सहायता की वजह से ही चल रही है। पंजाब में मैट्रो चलाने के बड़े-बड़े दावे करने वालों का यह हाल है कि यह सारकार लोगों को पीने के लिए साफ-सुथरा पानी भी उपलब्ध नहीं करा सके। 
पंजाब की हालत पर यह विचार केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री महारानी परनीत कौर ने राजपुरा में कांग्रेस कार्यकर्ता नरिन्दर सोनी के पिता बलराज सोनी की मौत के बाद रस्म पगडी के मौके पर पहुंचने के बाद मीडिया   से बातचीत के दौरान रखे।  मौजूदा अकाली-भाजपा सरकार को बिल्कुल फेल सरकार बताते हुए उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों को बिजली की कोई कमी न आने देने वालों का यह हाल है कि लोगों को भारी बिजली कटों के चलते काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बिजली न दे सकने के बाद सरकार ने बिजली के दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर दी है, जिससे महंगाई और बढ़ जायेगी। पटियाला की कई कालोनियों में सीवरेज की पाइपें फट जाने से सीवरेज का गंंदा पानी पीने के पानी में मिल जाने से कई कालोनियों के लोग बीमार हो गये हैं।  पटियाला में गराीबों के लिये बना एक मात्र अस्पताल का यह हाल है कि बैड आदि पर चादरें नहीं हैं, केन्द्र सरकार ने  पिछले समय में आठ करोड़ रुपया अस्पताल के लिये दिया था, उसमें से सिर्फ 30 लाख रुपया खर्च किया  है वह भी पता नहीं कहांं खर्च किया है। सरकार से जो कार्य नहीं होता वह केन्द्र के जिम्मे मढ़ देते हैं। कांग्रेसी नेता दीपइन्द्र सिंह ढिल्लों द्वारा कांग्रेस को छोड़कर अकाली दल में शामिल होने के सवाल पर महरानी परनीत कौर ने कहा कि ढिल्लों द्वारा कांग्रेस पार्टी छोडऩे का मुझे बहुत दु:ख है। जिला पटियाला के एकमात्र जंक्शन स्टेशन पर लोगों की लम्बे समय से चली आ रही मांग, जरूरी यात्री गाडिय़ों का ठहराव नहीं करवा सकने के सवाल को अपने चिर परिचित अंदाज़ से टालते हुए उन्होंने कहा कि मैंने कई बार कोशिश की है, शायद कोई तकनीकी दिक्कत होगी। उन्होंने आश्वासन दिया की वह अपनी कोशिश जारी रखेंगी।

Monday, July 16, 2012

हिन्दू उत्थान परिषद की और से एक और अर्थपूर्ण प्रयास

शहीदों के परिवारों को सम्मानित करने का एलान
लुधियाना: समाज को एक स्वस्थ दिशा देते हुए हिंदू उत्थान परिषद की तरफ से स्वतंत्रता दिवस पर एक और आयोजन किया जा रहा है। इस शुभ अवसर पर भारत माता पूजन व स्वतंत्रता से पूर्व स्वतंत्रता संग्राम व स्वतंत्रता के बाद देश की एकता व अखंडता के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों को नमन भी किया जायेगा और उनके परिवारों का सम्मान भी होगा। संगठन की तरफ से भारत माता का पूजन करने के लिए राज्य स्तरीय समारोह का आयोजन 15 अगस्त को स्थानीय गुरुनानक देव भवन में होगा। समारोह में शहीदों के परिवारों को विशेष रूप से सम्मानित भी किया जाएगा। उक्त जानकारी हिंदू उत्थान परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद जैन ने स्थानीय तालाब मंदिर में परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी को संबोधित करते हुए दी। समारोह की तैयारियों की जानकारी देते हुए श्री जैन ने बताया कि कार्यक्रम के प्रबंध सुचारू रुप से चलाने के लिए 11 सदस्यीय कमेटी का गठन भी किया गया है। सुनील खन्ना को कमेटी का संयोजक व सुरेश अग्रवाल व संजय शर्मा को कमेटी का सह संयोजक नियुक्त किया गया है। परिषद के राष्ट्रीय महासचिव कुंवर रंजन सिंह ने बताया कि राज्य स्तरीय समारोह में भारत पूजन के बाद भ्रूण हत्या व नशे की रोकथाम के लिए दो लघु नाटकों का मंचन भी किया जाएगा। समारोह में आजादी से पूर्व व आजादी के बाद देश की एकता व अखंडता के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों के परिवारों को सम्मानित किया जाएगा। इस अवसर पर कई अन्य विशेष लोगों के साथ साथ विनोद जैन, कुंवर रंजन सिंह, बाल कृष्ण वर्मा, सुनील खन्ना, प्रमोद बाबा, सोहन लाल गर्ग, मुकेश भार्गव, महावीर प्रसाद, राकेश शर्मा, गोपाल कृष्ण शर्मा, ओम प्रकाश वर्मा, देव नारायण, मोहित वर्मा, बिट्टू तिवारी व संतान के कई और  भी सदस्य भी मौजूद थे। गौरतलब है की हिन्दू उत्थान परिषद धर्म शास्त्रों में बताये गए मार्ग पर चलते हुए पूरे समाज को समृद्ध व् शक्तिशाली बनाने के लिए दृढ संकल्प है।

Monday, April 02, 2012

संशोधित रेल किराए 01 अप्रैल से लागू

रेल में महंगी यात्रा हुई और महंगी
ट्रेन की एसी-प्रथम श्रेणी, एसी-2टियर, एक्‍जीक्‍यूटिव क्‍लास और प्रथम श्रेणी में यात्रा के लिए के संशोधित किराए 01 अप्रैल, 2012 से लागू हो गए हैं। अन्‍य श्रेणियों में यात्रा किराए में कोई संशोधन नहीं किया गया है। ऊपर दी गई श्रेणियों में संशोधित किराया भारतीय रेलवे की सभी प्रकार की ट्रेनों पर लागू होगा। 
संशोधित किराया उन टिकटों पर भी लागू होगा जो 01 अप्रैल, 2012 के बाद यात्रा करने के लिए पहले ही जारी किए जा चुके हैं। यदि टिकट किराए में संशोधन से पहले वाली दरों पर जारी किया गया है तो इसके अंतर को यात्रियों से ट्रेन में टीटीई या बुकिंग आफिस यात्रा से पहले वसूलेगा। जनता की सूचना के लिए टिकट की संशोधित दरें स्‍टेशन पर लगा दी गयी हैं और रेलवे कर्मचारियों को उपलब्‍ध कराई गई हैं। यात्री किराए की संशोधित दरों की समय सारणी रेल मंत्रालय की वेबसाइट Indianrailways.gov.in पर भी देखी जा सकती है। (पीआईबी) 02-अप्रैल-2012 12:17 IST

Tuesday, March 27, 2012

गंगा सेवा मिशन अब लुधियाना में भी हुआ सक्रिय

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है
केवल धर्म शास्त्र ही नहीं फ़िल्मी दुनिया के लोग भी कल कल बहती पावन गंगा जी की धारा के सामने नतमस्तक होते रहे हैं. पूरे समाज के लोग गंगा जी से प्रभावित होते भी रहे हैं और दूसरों को प्रभावित करते भी रहे. कभी जमाना था जब देश के बच्चे बच्चे की जुबान पर बस यही गीत हुआ करता था...हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है. एक भारतीय होने की बस यही पहचान काफी थी. गंगा जी के देश का वासी होना बस यही गर्व काफी था. दुनिया के सामने सर उठा कर चलने के लिए बस यही प्रमाणपत्र पर्याप्त था किसी और चीज़ की ज़रुरत महसूस भी नहीं होती थी. गंगा जी के दर्शन सारी चिंता को दूर कर देते, गंगा स्नान से तन मन के सारे ताप दूर हो जाते. लोग प्रेम की दुनिया में भी उतरते तो बस यही कामना करते गंगा मैया में जब तक ये पानी रहे मेरे सज्जना तेरी जिंदगानी रहे.....!
लोगों के दिल से बस यही आवाज़ निकलती..गंगा तेरा पानी अमृत कल कल बहता जाए. पर यह सुखद हकीकत जल्द ही सपना बनने लगी. हालात बदलने लगे. देश को शक्ति व प्रेरणा देने वाले स्रोतों पर वार करने की साजिशें सफल होने लगी. गंगा जी के पावन शीतल जल को नकार कर बोतल में बंद पानी बेचने के कारोबार खड़े होने लगे. स्विमिंग पूल में नहाने की संस्कृति ने ऐसा सर उठाया कि  लोग माँ गंगा जी के पावन आँचल से ही दूर होने लगे. गंगा स्नान बस व्रत त्योहारों की बात बनने  लगा. लोग गंगा और यमुना से जुड़े सम्बन्धों को तेज़ी से भूलने लगे. जब जब भी घर में गंगा जल आता तो बच्चे पूछते यह क्या है? यह क्यूं है?  इससे से क्या होने वाला है?
जमाना ऐसा बदला और हालत बेहद तेज़ी से बिगड़ने लगी. देश के दुश्मनों की साजिश और देश के सपूतों की अज्ञानता कि गंगा जी की शक्ति को समाप्त  करने के कुप्रयास होने लगे. देश के कलमकारों ने, फिल्मकारों ने वक्त पर आगाह भी किया और तडप कर कहा...राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते धोते. पर न पाप रुका और न ही पाप में लगे लोग. देश ऐसा सोया कि न अपनी सुध रही और न ही गंगा जी की. देश का जल, देश की वायु, देश का अन्न, देश का मन सब कुछ प्रदूषित होता चला गया पर देश के कर्णधार सोते रहे सोते रहे. देश कि युवा शक्ति को गंगा जी कि पावन धारा से तोड़ कर नशे कि धारा में डुबोने कि सुनियोजित साजिशें सफल होने लगीं. गंगा पुत्र निगमानन्द जी का बलिदान भी इन्हें जगाने में नाकाम रहा. गंगा यमुना से भावुक तौर पर टूटा भारतीय मानव पूरी तरह भावहीन होता गया, कारोबारी बनता गया और धर्म व संस्कारों से पूरी तरह टूटने लगा. आज अगर अश्लीलता बढ़ रही है, भाई भाई पर वार कर रहा है, पिता पुत्री से सम्बन्ध बना रहा है तो इसके गहरे अर्थ यहाँ भी जुड़े हैं. गंगा जी कि पावन धरा से टूट कर, पर्यादा को भूल कर यही होने वाला था. गंगा यमुना छूटी तो स्नेह भी छूट गया और भावना भी. पवित्रता का वह अहसास भी और मंजिलें पाने का वह असीम जोश भी.
अप्रैल 1985 में शुरू हुए गंगा एक्शन प्लान पर 1200 करोड़ रूपये खर्च हुए पर समस्या हल होने कि बजाये लगातार गंभीर होती चली गई. लेकिन इन सरे प्रयासों में बहुत कुछ ऐसा भी हुआ जिसे उल्लेखनीय कहा जा सकता है.गंगा बचायो अभियान से जुड़े लोगों और संगठनों में गंगा सेवा मिशन भी है. स्वामी आंनद स्वरूप जी कहते हैं गंगा सिर्फ नदी नहीं एक संस्कृति है। गंगा से लगाव उनका बचपन से है। गंगा की लहरों ने उन्हें सदैव आकर्षित किया है। यही कारण है कि उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश गिरिधर मालवीय के साथ इलाहाबाद में वर्ष 1998 में गंगा समर्पण संस्थान के माध्यम से गंगा की पवित्रता के लिए काम शुरू किया। मालवीय इसके अध्यक्ष थे। इसके पूर्व महामंडलेश्वर स्वामी महेश्वरानंद ने हरिद्वार कुंभ 1998 में जब गंगा में कुत्ते की लाश देखी तो आहत होकर कहा, गंगा के लिए कुछ करो। बाद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की प्रेरणा से तो इस संकल्प ने अभियान का रूप ले लिया। शुरू में गंगा सेवा अभियान के माध्यम से इलाहाबाद, पटना, हरिद्वार, रामपुर आदि स्थानों पर सम्मेलन आयोजित किए गए। गंगा सेवा मिशन की स्थापना के बाद अभियान में तेजी आई। 26 दिसंबर 2010 को काशी से गंगा की पवित्रता के लिए एक बड़ी यात्रा शुरू हुई। इसमें बड़ी संख्या में संत और गृहस्थ शामिल हुए। इस यात्रा की समाप्ति मथुरा में हुई। वहां गोवर्धन पीठ में स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती की अध्यक्षता में बड़ा सम्मेलन हुआ। इसके बाद हरियाणा के परहवा में शिवशक्ति महायज्ञ हुआ। 
इस सारे अभियान की अंतरात्मा से जुड़े स्वामी आनन्द स्वरूप जी आजकल लुधियाना में है. नवरात्र के शुभ अवसर पर गंगा सेवा मिशन की अलख जगाते हुए स्वामी इस मुद्दे के सभी पहलूयों  पर विस्तार से जानकारी दे रहे है तन की लोगों में जागरूकता आ सके. उनके इस मिशन में बहुत से लोग शामिल हैं लेकिन ठाकुर परिबार का नाम लेना आवश्यक है. युवा मन और जोश के साथ आरती ठाकुर भी इस मिशन को सफल बनाने में जुटी है और आरती का परिवार भी.--रेक्टर कथूरिया सहयोग: आरती ठाकुर  

Thursday, March 22, 2012

मन्‍नार के कांसे की चमक

300 परिवार अब भी बनाते हैं भटि़टयों में कांसे के उत्‍पाद

विशेष लेख                                                                               * पल्‍लवी चिन्‍या
                                                                                                                                                    Photo Courtesy: Munnar.org
केरल का छोटा सा कस्‍बा मन्‍नार ऊपर से देखने पर खामोशी की चादर में लिपटा नजर आता है । लेकिन जैसे ही आप इस कस्‍बे की प्राकृतिक छटा को गहराई से निहारते हुए कस्‍बे में जाते हैं तो खामोशी की सारी चादरें धीरे-धीरे उतरने लगती हैं। कांसे की झनझनाहट, वेल्डिंग और मशीनों की आवाजें आपके कानों तक पहुंचकर संभवत: आपकी दिलचस्‍पी को चरम पर पहुंचा देती हैं। जैसे-जैसे आप आवाज के स्रोत की ओर बढ़ेंगे तो आप वहां सदियों से मौजूद परंपरा के तहत अनेक तरह से ढलाई किए जा रहे कांसे के उत्‍पादों की चमक-दमक से आश्‍चर्यचकित रह जाएंगे। 


मन्‍नार अलप्‍पुझा जिले की ग्राम पंचायत है जिसकी विशेष पहचान उस परंपरा की रक्षा करना और बढ़ावा देना है जो कई सदियों से वहां विद़यमान है। इस कस्‍बे में लगभग 300 परिवार अपनी भटि़टयों में बनाए जा रहे कांसे के उत्‍पादों की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। कांसा टिन और कापर का मिश्रण है। इस धातु पर जब चोट की जाती है तो उसमें से गूंजने वाली विशेष ध्‍वनि निकलती है इसलिए यह धातु विभिन्‍न रूपों और आकार की धार्मिक शिल्‍पकृतियां खासतौर से शानदार दिए बनाने की शिल्‍पकला के लिए उत्‍कृष्‍ट माध्‍यम उपलब्‍ध कराने के साथ-साथ घरेलू बर्तन बनाने के लिए भी बेहतरीन है। मन्‍नार में पारंपरिक भटि़टयों की शोभा देखते ही बनती है। इसके साथ ही वहां कम आधुनिक कारखाने भी हैं जो हाल के वर्षों में ही अस्तित्‍व में आए हैं और कांसे की वस्‍तुएं बना रहे हैं। वर्षों से ये खूबसूरत शिल्‍पकार अरब सागर के पार तक इस छोटे से कस्‍बे के शिल्‍प की शौहरत फैला चुके हैं तथा दुनिया के विभिन्‍न भागों के बाजारों में जगह बना चुके हैं। 


कोच्चि में प्रमुख पर्यटन स्‍थलों में से एक दुनिया का सबसे बड़ा वारपू (पारपंरिक बर्तन जो आमतौर पर पयासम या खीर बनाने के काम आता है) है जो ज्‍यू टाउन में पुरानी चीजों की दुकान में रखा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह मन्‍नार में बनाया गया था। इसे बनाने में एक वर्ष से अधिक समय लगा था। 100 कारीगरों ने इसे अंतिम रूप दिया। 3250 किलोग्राम के इस वारपू का व्‍यास 12 फुट है तथा इसमें 10,000 लीटर पानी भरा जा सकता हैा इसे राजन अलक्‍कल ने बनवाया था। श्री राजन का परिवार पांच पीढि़यों से कांसे के बर्तन और उत्‍पाद बनाने के काम में लगा है। 17 कर्मचारियों की टीम के साथ काम करने वाला यह परिवार कांसे के पारंपरिक उत्‍पादों का कारोबार करता है जिसमें उरुली (चौड़े मुंह का बर्तन), निलाविलक्‍कु (दीपक), किंडी (फुहारे की तरह का घड़ा) और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां, पोप की मूर्तियां, मंदिरों के लिए नारायण गुरू की मूर्तियां, चर्चों एवं संग्रहालयों के लिए मूर्तियां शामिल हैं और देशभर में भेजी जाती हैं। नई दिल्‍ली में इन्दिरा गांधी संग्रहालय में प्रदर्शित अल विलक्‍कु (1001 दीपक) राजन की कार्यशाला में ही बना है। 


इस छोटे से कस्‍बे के शिल्‍पकारों ने वर्षों से न सिर्फ पारपंरिक उत्‍पाद बनाने के लिए नई प्रौद़योगिकी अपनाई बल्कि इसे श्री अनंत कृष्‍ण आचार्य जैसे नए क्षेत्रों में भी फैलाया जो अपने अला या भट़टी में लोहे के डब्‍बे बनाते हैं। सरकार की सहायता से कांसे के बर्तन और चीजें बनाने की पारंपरिक कला ने कुटीर उद़योग का स्‍थान ले लिया है। मन्‍नार ने वर्षों से जो अनुपम दर्जा हासिल किया है वह कुछ असाधारण शिल्‍पकारों की मेहनत का नतीजा है। उनमें चेटि़टकुलांगारा देवी मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा दीपक, शिमला में मोहन नगर मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी घंटी, नई दिल्‍ली में कैथेड़्रल चर्च में दुनिया की सबसे बड़ी चर्च की घंटी तथा अब चेन्‍नई में संग्रहालय में रखी जीवन एवं ज्ञान के प्रसिद्ध वृक्ष की प्रतिकृति शामिल हैं। (पीआईबी) 21-मार्च-2012 19:10 IST