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Saturday, February 18, 2012

केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने दिया दीर्घावधि विकास कार्यक्रमों पर जोर

उपकुलपतियों और आईसीएआर निदेशकों के वार्षिक सम्‍मेलन का उद्घाटन
कृषि तथा खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योगों के केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने अनुसंधान और मानव संसाधन योजनाओं के दीर्घावधि विकास कार्यक्रमों के समेकन पर जोर दिया है ताकि कृषि के क्षेत्र में समग्र विकास के लिए सार्वजनिक-नि‍जी क्षेत्र की साझेदारी को सुनिश्चित किया जा सके। श्री पवार ने कृषि विश्‍व विद्यालयों के उपकुलपतियों और आईसीएआर संस्‍थानों के निदेशकों के वार्षिक सम्‍मेलन के उद्घाटन भाषण में यह बात कही। उन्‍होंने कहा कि आईसीएआर संस्‍थानों और राज्‍यों कृषि विश्‍व विद्यालयों को सहक्रिया तंत्र को सशक्‍त बनाना चाहिए, ताकि एक ही प्रकार के कार्यों की पुनरावृति को रोका जा सके और संसाधनों के उचित उपयोग को सुनिश्चित किया जा सके। 
श्री पवार ने कहा कि विश्‍व में खाद्य समस्‍याओं और बढ़ते खाद्य संकट के चलते, वैश्विक स्‍तर पर कृषि अनुसंधान तथा विकास पर बहुत ज्‍यादा जोर दिया जा रहा है, लेकिन भारत में इन चुनौतियों का सामना करने के लिए संसाधनों को निरंतर उन्‍नयन पर जोर दिया जाता है।

कृषि अनुसंधान तथा शिक्षण विभाग की ओर से कृषि विश्‍व विद्यालयों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का उल्‍लेख करते हुए श्री पवार ने राज्‍य सरकारों पर जोर दिया कि कृषि अनुसंधान शिक्षण तथा विस्‍तार कार्यक्रमों में निवेश में वृद्धि की जाए।

इस अवसर पर विशिष्‍ट कृषि वैज्ञानिक तथा इस वर्ष के पदमश्री सम्‍मान से सम्मानित डॉ. के एल चड्डा और डॉ. वीपी सिंह को सम्‍मानित किया गया। समारोह में कृषि राज्‍य मंत्री डॉ. चरणदास महंत भी मौजूद थे। {पत्र सूचना कार्यालय}[17 फरवरी 2012 19:34] 

Monday, February 13, 2012

त्रिपुरा कृषि योजना सफल हुई

कृषि करमन पुरस्‍कार के रूप में मिली त्रिपुरा के योगदान को मान्‍यता
विशेष लेख                                                                          शुभाषीष के चंदा*
सभी तस्वीरें त्रिपुरा के कृषि विभाग से साभार 
कुमुद बिहारी त्रिपुरा के पर्वतीय क्षेत्र में परांपरागत ढंग से झूम खेती करने वाले एक किसान हैं। वह इस साल बहुत खुश हैं क्‍योंकि फसलों की पैदावार दुगुनी हुई है। ऐसा ही एक और रिकार्ड मोहम्‍मद अब्‍दुल गफ्फार ने बनाया है जिन्‍होंने धान की खेती का एसआरआई तरीका अपनाया और अपने खेतों में पहले की 2.3 टन प्रति हेक्‍टेयर की जगह 3.3 टन उपज प्राप्‍त की। यह प्रेरणादायक उदाहरण है जबकि इस समय देश में खेती का परिदृश्‍य इसके उलट है। यह उदाहरण त्रिपुरा कृषि विभाग द्वारा शुरू की गई उस व्‍यापक योजना का नतीजा है जिसके लिए कृषि करमन पुरस्‍कार प्रदान किया गया है। यह खेती की समग्र ऊंची पैदावार के लिए दिया गया है। पुरस्‍कार प्रदान करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने देश में अनाज उत्‍पादन बढ़ाने में राज्‍य के योगदान को मान्‍यता दी।

     सुनने में भले ही यह चमत्‍कार जान पड़े लेकिन ऐसा क्‍यों हो पाया इसका जवाब राज्‍य की दस वर्ष की अवधि वाली उस कृषि योजना में छिपा है जिसे केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित दो कार्यक्रमों से मजबूती मिली है। इन परियोजनाओं के नाम हैं राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी।

राज्‍य में कृषि परिदृश्‍य

     त्रिपुरा में भू-भाग 6 पहाडि़यों का मिला जुला रूप है। इस राज्‍य में मैदानी जमीन कम है और पहाड़ी इलाका ज्‍यादा। एक अनुमान के अनुसार राज्‍य में जो विभिन्‍न प्रकार की जमीनें उपलब्‍ध हैं, उनमें से 4000 वर्ग किलोमीटर पर्वतीय क्षेत्र हैं। 2300 वर्ग किलोमीटर की जमीन टीला यानि पहाडि़यों से बनी है, जबकि घाटी का इलाका 2249 वर्ग किलोमीटर और मैदानी इलाका 2042 वर्ग किलोमीटर है। यहां के अधिकांश किसान गुजारा करने वाले हैं और उनमें से लगभग 96 प्रतिशत किसानों की जोतें 0.5 से 1.25 हेक्‍टेयर रकबे वाली हैं। इन किसानों के बीच फसलों और पैदावार पर निवेश बहुत कम किया जाता है। राज्‍य का बुआई वाला इलाका कुल भू-भाग अर्थात 10,49,169 हेक्‍टेयर का 24 प्रतिशत है जबकि राष्‍ट्रीय आंकडे 43 प्रतिशत हैं।

     राज्‍य में इस समय मुख्‍य रूप से दो प्रकार की फसल व्‍यवस्‍थाएं प्रचलित हैं। पहली है स्थिर खेती जो मैदानी भागों में की जाती है और दूसरा तरीका है चलायमान खेती जो पहाड़ी इलाकों में प्रचलित है। अधिकांश किसान इन्‍हीं दो में से एक तरीका अपनाते है। जहां तक आधुनिक टैक्‍नोलॉजी इस्‍तेमाल करने का सवाल है वे पुराना तरीका पसंद करते हैं जिसके परिणामस्‍वरूप फसलों की उपज बहुत कम होती है। जहां तक खेती के पुराने तरीके का संबंध है, किसानों को उपलब्‍ध जमीन कम होती जा रही है। इसके साथ ही, भारत बंगलादेश सीमा पर कंटीले तार लगाए जाने के कारण भी खेती वाली जमीन का रकबा 27 हजार एकड कम हो गया है। पहाड़ी जमीन कटने से मिट्टी का धीरे-धीरे क्षय होता है जो मैदानी इलाके में काफी ज्‍यादा है। यह सचमुच ही खतरे का कारण बन रहा है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार हर साल बहुत ऊंची जमीन से लगभग तीस लाख टन ऊपरी मिट्टी कटकर बह जाती है।

पुराने तरीके का सशक्तीकरण 
     उक्‍त बातों को देखते हुए शुरू-शुरू में यहां की चुनौतियां मुश्किल जान पड़ती है। राज्‍य कृषि विभाग को अनाज उत्‍पादन के मामले में आत्‍मनिर्भर बनने की सोचना बड़ी चुनौती हो सकती है। राज्‍य कृषि विभाग ने एक बड़ा कृषि कार्यक्रम शुरू किया है जिसके अनुसार दस वर्षों में 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। 1999-2000 की स्थिति के अनुसार सिर्फ 51 हजार हेक्‍टेयर के लिए सिंचाई सुविधाएं मौजूद थीं। इसी तरह से फसल सघनता वर्तमान 169 प्रतिशत से बढ़ाकर 283 प्रतिशत करने के लिए कई तरह की कोशिशें शुरू की गई हैं। चलायमान खेती के सुधरे तरीके शुरू किए गए हैं ताकि धान की उत्‍पादकता वर्तमान 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर (1999-2000) से बढ़ाया जा सके। इसके अलावा अधिक उपज देने वाली किस्‍मों के धान की खेती शुरू करने से पैदावार कम से कम 3500 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर करने की कोशिशें शुरू की गई हैं। इसके लिए समन्वित कीट प्रबंधन, पौधों को पोषक तत्‍व देने वाले तत्‍वों की खपत बढ़ाना और अजैविक खाद के साथ बॉयो फर्टिलाइजर का इस्‍तेमाल शुरू करने को उच्‍च प्राथमिकता दी जा रही है।

भावी योजना और नया दृष्टिकोण

     हर तरह की मुश्किलों के बावजूद खेती ही आर्थिक रूप से यहां के लोगों के गुजारे के लिए एकमात्र विकल्‍प जान पड़ती है। यह राज्‍य दो प्रकार के भू-भागों से बना है। पहला है- घाटी का इलाका और दूसरा- पहाड़ी क्षेत्र जहां संचार सुविधाएं और उद्योग धंधे लगभग मौजूद नहीं हैं।

     राज्‍य कृषि विभाग ने मुश्किलों का सामना करने के लिए यहां विस्‍तार सेवाएं बढ़ाने, टैक्‍नोलॉजी मुहिम शुरू करने और किसानों को प्रशिक्षण स्‍कूलों तक पहुंचाने, धान की ज्‍यादा उपज देने वाली किस्‍मों की खेती शुरू करने, बॉयो-उर्वरकों का इस्‍तेमाल, जैविक खाद और कृषि आधारित उपकरणों का प्रयोग शुरू करने और किसान क्रेडिट कार्ड स्‍कीम के जरिये लोगों को ऋण सुविधाएं दिलाने की शुरूआत की है। ऐसे समय जब इस राज्‍य के लोगों की 27 हजार एकड़ जमीन सीमा पर कटीले तार लगाने के चलते परती पड़ी रही, राज्‍य सरकार ने वर्ष 2011 में दो लाख टन अधिक अनाज की उपज देखी जिसका कारण कृषि विभाग की चल रही कोशिशें बताया गया। वर्ष 2000 में दस वर्षों के लिए एक योजना तैयार की गई जिसके चलते अनाज उत्‍पादन में बहुत कामयाबी मिली और वर्ष 2010-11 में अनाज उत्‍पादन बढ़कर 7.12 लाख टन हो गया। 1999-2000 में सिर्फ 5.13 लाख टन अनाज की पैदावार हुई थी। लेकिन राज्‍य में वर्ष 2010-11 तक अनाज की लक्षित जरूरत 8.22 लाख टन आकलित की गई है जिसकी तुलना में कमी 1.10 लाख टन रहेगी। इस बीच सिंचाई सुविधाएं भी बढ़ाई गई हैं और अब 1,16,867 हेक्‍टेयर जमीन के लिए सिंचाई सुविधाएं जुटा दी गई हैं। फसल सघनता जहां 1999-2000 में 172 प्रतिशत थी वहीं दस वर्षों में यह बढ़कर 184 प्रतिशत हो गई है। रोचक बात यह है कि पहाड़ी किसानों को जहां झूम वाली जमीन से सिर्फ 600 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की उपज मिली वहीं अब यह हर सीजन दुगुनी फसलें ले सकते हैं। इसके लिए उन्‍हें बॉयो-फर्टिलाइजर और जैविक खाद इस्‍तेमाल करनी पड़ती है।

आरकेवीवाई, एटीएमए एवं भागीदारी संप्रेषण 

राज्‍य ने 2007-08 में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना शुरू की गई थी। इसके चलते इस क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ गया है। राज्‍य सरकार इस योजना को अनाज उत्‍पादन के क्षेत्र में आत्‍मनिर्भर बनने के उद्देश्‍य से एक वरदान मानती है। राज्‍य ने इस प्रोग्राम के पहले चरण के अंतर्गत 41 परियोजनाएं शुरू की है जिनका बुनियादी तौर पर उद्देश्‍य है अनाज का उत्‍पादन और उत्‍पादकता बढ़ाना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत कई प्रमुख योजनाएं शुरू की गई हैं जिनमें एसआरआई तकनीक के जरिये धान की पैदावार बढ़ाना, मिट्टी की शत-प्रतिशत जांच, उन्‍नत किस्‍म के धान की खेती, संकर मक्के की खेती, रेह वाली मिट्टी को ठीकठाक करना, छोटी सिंचाई सुविधाएं, मशीनी खेती, प्रमाणित सब्जियों के बीज उपजाना, ट्रू आलू बीजों को प्रोत्‍साहन देना और आलू की खेती को बढ़ावा देना शामिल है। अभी तक इन सभी परियोजनाओं में राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना पर सबसे ज्‍यादा यानि 177 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है।

किसानों को अधिक उपज देने वाली किस्‍मों को अपनाने के लिए प्रेरित करने, रोगों के कारण फसलों में नुकसान बचाने, मिटृटी की उत्‍पादकता बढ़ाने और कृषि प्रशिक्षण एवं प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के जरिए किसानों को परंपरागत और खेती की नई जानकारी देने को सभी जिलों में महत्‍व दिया गया है। इसके लिए विस्‍तार सेवा का एक व्‍यापक तरीका निकाला गया है और एटीएमए ने विशेषज्ञों की तरफ से खेती के लिए एक प्रभावी, दुतरफा संप्रेषण मॉडल विकसित किया है। इसके जरिए पशुपालन, मछलीपालन और वानिकी के बारे में जानकारी दी जाती है। दूसरी ओर किसानों के लिए प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम तथा खेतों में ग्रुप बैठकों जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी मॉडल के अनुरूप कृषि विभाग ने चालू वित्‍त वर्ष के दौरान एक और कार्यक्रम शुरू किया है जिसे टैक्‍नोलॉजी एक्‍सटेंशन केंपेन कहते हैं। इसमें एक ही छत के नीचे पौधे की रक्षा, जैविक और जैव उर्वरकों का इस्‍तेमाल, मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला और कार्यशाला रखे गए हैं। यह कार्यक्रम पिछले साल नवम्‍बर-दिसम्‍बर से पहले शुरू किया गया जिसके अंतर्गत किसानों को राज्‍य से बाहर ले जाकर ऐसी खेती दिखाई गई। इस प्रकार की हर यात्रा को केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने प्रायोजित किया। 
ऐसी ही एक यात्रा के दौरान एक प्रतिभागी श्री हरेन्‍द्र नाथ खुश नजर आए। उनका कहना था कि इस यात्रा से उन्‍हें बहुत फायदा हुआ है। उन्‍होंने उन कीड़ों को पहचान लिया है जिनसे खेती को फायदा होता है। यात्रा के दौरान उन्‍होंने नये औजार और गहाई मशीने भी देखीं। एक अन्‍य किसान श्री आनंद देबबर्मन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम जारी रहने चाहिए। राज्‍य कृषि विभाग के अधिकारियों ने कहा कि किसानों के लिए ऐसी यात्रा का कार्यक्रम अगले वर्षों भी जारी रखा जायेगा ताकि वह आधुनिक टैक्‍नोलॉजी और जानकारी प्राप्‍त कर सकें। इससे खेती की उत्‍पादकता और किसानों की आमदनी बढ़ेगी, उनकी सोच बदलेगी और वे खेती को व्‍यापार समझकर संभालेंगे। {
पीआईबी}  10-फरवरी-2012 17:17 IST

लेखक-पीआईबी अगरतला में मीडिया एंड कम्‍युनिकेशन ऑफिसर हैं

Sunday, January 29, 2012

लड़ाई और तेज करने की घोषणा

आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है 
यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है 
विस्थापन और गैरबराबरी के खिलाफ अभियान हुआ और तेज़
*बिहार और झारखण्ड का लोकशक्ति अभियान का तीसरा चरण पूरा
*पहले पुराना हिसाब साफ़ करो! फिर नए की बात करो!
बोकारो, जनवरी २९ : उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आँध्रप्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार होते हुए लोक शक्ति अभियान की टीम कल रांची पहुंची और उसके बाद आज सुबह मैथन पहुंची और शाम को बोकारो में दुन्गिबाग बाज़ार में हॉकर्स लोगों के बीच आम सभा की | रांची से १८ किलो. मीटर दूर काके रोड नगली में IIM रांची के लिए आदिवासी किसानो की ली जा रही ज़मीन के खिलाफ और देर शाम रांची में जगन्नाथपुर चौक पर HEC की ज़मीन पर अतिक्रमण के नाम पर तोड़े गए घरों के खिलाफ बड़ी आम सभा की गयी | किसी अध्यादेश के बिना किसानों की जमीन गैर तरीके से शासन की कब्जेदारी के खिलाफ़ एक बड़ी सभा आयोजित की गयी है

मेधा पाटकर ने नांगली में होने वाले विस्थापितों और डी वी सी के ५५ साल से विस्थापित आदिवासियों से कहा कि, आदिवासीयों के लिए बिहार से विभाजित होकर नवगठित राज्य झारखण्ड में अगर आदिवासियों को एक आदिवासी मुख्यमंत्री इस तरह से उजाड़ने में लगा हो तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है | आई. आई. एम् के लिए जबरन २२७ एकड जमीन पर सेकडों अर्द्सेनिक बलों को तैनात कर जमीन के मालिक किसानों को बेदखल करना और प्रताड़ित करना धिक्कार योग्य है | गोबर बीनने पर प्रतिबन्ध शर्मनाक है | जिस तरह से आदिवासियों के हितार्थ पेशा कानून अनुपालन समिति के संगठनकर्ताओं को १०७ की नोटिस देकर न्यायलय में जबाब तलन करना और उसी दिन उनके धान कटे खेतों पर अर्द्सैनिक बलों को तैनात करना गैरबराबरी एवम आदिवासी द्रोही कदम है |

अर्जुन मुंडा जी आदिवासियों मुख्यमंत्री है तो आपसे आदिवासियों के उद्धार की अपेक्षा थी लेकिन बंदूक और अर्द्सैनिक बलों की ताकत पर आदिवासीयों को खेत से खदेड़ने बाले मुख्यमंत्री को हम सेनापति कहेंगे मुख्यमंत्री नहीं | आज सरकार सबसे बड़ी जमीदार हो गयी है | विश्वविद्यालय, फैक्ट्री, खदान, हर चीज़ के लिए जमीन ली जा रही है | ये सब अंग्रेजों ने भी नहीं किया था | उस समय के राज्यों ने नहीं किया | भूमिअधिग्रहण में उस समय जबरदस्ती नहीं थी | एक तरफ़ा दंगा हो रहा है | अर्जुन मुंडा आदिवासी नहीं रहे राज नेता हो गये है | आज झारखण्ड में करीब तीस लाख से ज्यादा विस्थापित लोग हैं तो अगर उनको सरकार नहीं बसा सकती तो लोगों को उजाड़ने का हक़ और चेहरा कैसे रखती है | किस मुँह से यहाँ के नेता और केंद्र की सरकार लोगों की ज़मीन पर बुलडोजर चलाती है | उन्हें पहले पुराना हिसाब चुकता करना होगा तब जाकर कोई और बात होगी | डी वी सी के विस्थापितों को पहले न्याय देना होगा तब जाकर आगे कोई और बात होगी |

पेसा कानून अनुपालन समिति में शामिल झारखण्ड की सामाजिक कार्यकर्त्ता दयामणि बरला ने कहा की नगड़ी में बंदूक की ताकत से जमीन अधिग्रहण की पूरी तैयारी गैर क़ानूनी है | नगड़ी में जमीन बचाने की लड़ाई पूरे झारखण्ड की लड़ाई हो गयी है और इसे पूरे देश की समर्थन चाहिये | एक किसान को कुछ पैसा देकर १० किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रही है | बोकारो इलेक्ट्रो कम्पनी कर रही है यही जिंदल कंपनी कर रही है माफिया ठेकेदरों को देने के लिए जमीन है गरीबों को देने के लिए नहीं है | दयामनी ने कहा कि यह नगड़ी की ही नहीं, झारखण्ड की ही नहीं पूरे भारत की लड़ाई नहीं है | हम अपने पूर्वजों की एक इंच जमीन नहीं देंगे |

नगड़ी की शांतिदेवी ने कहा, इस जमीन से हमने दो बच्चे पैदा किया है, उनका पालन – पोषण किया और आज सरकार कहती है की १९५७ में इसका अधिग्रहण हो गया, हम गैरकानूनी हैं तो मैं पूछती हूँ की फिर किस मुहँ से सरकार ने अहुमको आज तक मालगुजारी वसूल किया | बताये हमको सरकार | नगड़ी की जमीन १९५७ से १९५८ में ९०० रूपये प्रति एकड के हिसाब से ली जानी थी २२ आदमीयों ने मुआवजा लिया था बाकी किसी ने नहीं लिया | आज सरकार उसी पैसे को १०% ब्याय की दर जोड़ कर मुआवजा देने की बात की जा रही है | यह सरासर गलत और गैरकानूनी है | अगर धारा ४, ६, ९, ११, कुछ भी नहीं लगी तो सरकार को कैसे यह हक़ बनता है कि वोह कोई भी काम शुरू करे इन ज़मीनों पर |

मैथन बाँध के विस्थापितों की लड़ाई, दिल्ली में अक्टूबर माह में ८ दिन के धरने के बाद, जिसमे मेधा पाटकर, स्वामी अग्निवेश, राजिंदर सच्चर, कुलदीप नय्यर और अन्य गणमान्य लोगों ने हस्तक्षेप किया था, ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है. उर्जा मंत्री शुशील कुमार शिंदे से मुलाकात के बाद २८ दिसम्बर को डी वी सी के चेयरमन के साथ स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थता में वार्ता हुई | मामले को एक धक्का तो मिला है लेकिन न्याय नहीं मिला है, घटवार आदिवासी महासभा के सलाहकार रामश्रय सिंह ने बी एस के कॉलेज के मैदान में आयोजित मीटिंग में कहा |

स्वामी अग्निवेश ने सभा को संबोधित करते हुए कहा की देश में आज भीषण समस्या है, विकास के नाम पर चरों ओर लूट मची है | इस पूरी विकास प्रक्रिया में आदिवासी, दलित, शोषित और वंचित समाज के लोगों के साथ और भी अन्याय हो रहा है | आज़ादी के बाद की विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों ने सबसे बड़ा बलिदान दिया है | डी वी सी परियोजना उनमे से एक है | आज भी ९,००० परिवारों को वायदे के मुताबिक नौकरी और मुआवजा नहीं मिला है | लेकिन प्रबंधन यह दावा करता है की उन्होंने दे दिया | यह तो वक्त ही बताएगा जब आदिवासी महासभा के लोगों के दावे सरकारी आंकड़ों को झूठा करके दिखा देंगे | सरकार को चहिये की इनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है और न्याय करे | इन्हें हर सुख सुविधा मुहया कराये |
पिछले साल २०११ के अप्रैल महीने में रांची उच्च न्यालय के आदेश के मुताबिक पूरे झारखण्ड के शहरों में एक जबरदस्त विस्थापन का दौर चला जिसमे हजारों घर तोड़े गए | रांची में इस्लामनगर और अन्य कई बस्तियों में घर तोड़े गए | सदमे से करीब आठ लोगों के मौत हो गयी, क्योंकि उनके जीवन के कमाई धूमें मिला डी गयी थी | कारण : ये सभी बस्तियां सरकारी ज़मीन या पब्लिक सेक्टर कंपनी जैसे एच ई सी की ज़मीन पर काबिज थे |

सिद्धेश्वर सिंह, बस्ती बचाओ संघर्ष समिति, रांची के अध्यक्ष ने कहा जब एच ई सी ने लोगो को जगह जगह से लाकर मजदूरी के तौर पर काम दिया और इन ज़मीनों पर बसाया था तब सरकार कहाँ थी | आज वही लोग कैसे अतिक्रमणकारी हो गए | इन बस्तियों में रहने वाले ८० % लोग आदिवासी हैं, मजदूर हैं, झारखंडी हैं, उनका हक़ है इस धरती पर वे अपनी जान दे देंगे लेकिन अपनी जीविका और घर नहीं टूटने देंगे |

निजाम अंसारी, राष्ट्रीय हौकर्स फेडरेशन, बोकारो के समन्वयक ने कहा की उस दौरान रांची के साथ साथ बोकारो में बस्तियां तोड़ी गयी, लोगों की जीविका खतम की गयी | मेहनतकश मजदूर वर्ग पूरे शहर को सेवाएं देते हैं और अपने खून पसीने की कमाई से अपना परिवार चलते हैं, क्या इस नयी आर्थिक व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह नहीं है | उनका इस आर्थिक व्यवस्था में स्थान तय करना होगा |

पूरे दो दिन के झारखण्ड दौरे के बाद लोकशक्ति अभियान ने यह एलान किया की विस्थापन और बढती गैरबराबरी के खिलाफ आगामी बजट सत्र के दौरान एक विशाल जन संसद का आयोजन १९ से २३ मार्च को किया जाएगा जिसमे देश के विभिन्न जन संगठन अपने अपने झंडे और बन्नेर के नीचे सरकार को एक कड़ी चुनौती देंगे | लोकशक्ति अभियान का यह तीसरा चरण आज समाप्त हुआ |

अभियान का चौथा चरण ६ मार्च को मुंबई में लोक मंच के कार्यक्रम के साथ होगा | ७ मार्च

को बेलगांव, ८ और ९ मार्च को गोवा, १० मार्च को पुणे, ११ मार्च को औरंगाबाद, १२ मार्च को नागपुर में कार्यक्रम होंगे | १३ मार्च को देश के विभिन्न जन संगठनों एक तैयारी बैठक नागपुर में आयोजित की जायेगी जिसमे बजट सत्र के दौरान होने वाले कार्यक्रम की वृहद योजना तैयार की जायेगी |

लोकशक्ति अभियान के लिए
राजेंद्र रवि, नागेश त्रिपाठी, अमिताव मित्र, मधुरेश कुमार

Thursday, January 12, 2012

नारि‍यल तोड़ने की कला का प्रशिक्षण

सफलता की एक और नयी कहानी                                                  सुधा एस नंबूदरी*
नारि‍यल का खोया हुआ गौरव लौटाया
वि‍श्‍व पर्यटन मानचि‍त्र पर केरल 'ईश्‍वर का प्रदेश' के साथ-साथ नारि‍यल वृक्षों की भूमि‍के नाम से भी अंकित है। लेकि‍न कुछ समय से कई नारि‍यल कि‍सानों ने अन्‍य लाभकारी फसलों की खेती करना शुरू कर दि‍या है। इसके पीछे अन्‍य कारणों के साथ एक प्रमुख कारण यह है कि‍नारि‍यल के पेड़ों पर नारि‍यल तोड़ने के लि‍ए चढ़ने वालों की कमी है। कुछ समय पहले नारि‍यल तोड़ने का काम समाज के एक स्‍तर तक सीमि‍त था लेकि‍न आज के युवाओं के मध्‍य वर्गीय जीवन शैली के प्रति‍आकर्षण तथा कम खतरे एवं ज्‍यादा सम्‍मान वाली नौकरि‍यों के प्रति‍झुकाव के कारण केरल में इस समय नारि‍यल तोड़ने वाले वि‍लुप्‍तप्राय प्रजाति‍की श्रेणी में शामि‍ल होने वाले हैं। अगर आप उन्‍हें खोजने नि‍कलें, तो पहले तो वे मि‍लेंगे नहीं, अगर कोई एक मि‍लता भी है तो वह ऊंची रकम की मांग करेगा और अवैज्ञानि‍क तरीके से वे नारि‍यल तोड़ने का काम करेगा। शुक्र है कि‍नारि‍यल वि‍कास बोर्ड ने एक पहल की जि‍सके अंतर्गत बोर्ड ने युवाओं, प्रौढ व्‍यक्‍ति‍यों और महि‍लाओं को नारि‍यल पेड़ों पर चढ़कर नारि‍यल तोड़ने की कला सि‍खाना शुरू कि‍या है और बोर्ड ने अपनी वेबसाइट पर इन लोगों के संपर्क वि‍वरण भी उपलब्‍ध कराए हैं।
     हालांकि‍कृषि‍के कि‍सी भी क्षेत्र में इस समय श्रम की कमी एक सामान्‍य घटना है। नारि‍यल वि‍कास बोर्ड के अध्‍यक्ष ने बताया कि‍नारि‍यल तोड़ने, पेड़ों की देखभाल, क्राउन क्‍लीनिंग और हारवेस्‍टिंग आदि‍के लि‍ए कुशल श्रम की आवश्‍यकता होती है। इस क्षेत्र में इस आधारभूत समस्‍या को देखते हुए बोर्ड ने 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' नाम से एक नई पहल की है। इस चुनौती को हासि‍ल करने के लि‍ए बोर्ड की मदद हेतु केरल कृषि‍वि‍श्‍ववि‍द्यालय, कृषि‍वि‍ज्ञान केन्‍द्र और कुछ गैर-सरकारी संगठन आगे आए। वि‍स्‍तृत वि‍चार-वि‍मर्श एवं योजना के पश्‍चात 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' प्रशि‍क्षण कार्यक्रम सही रास्‍ते पर है। बोर्ड का यह प्रशि‍क्षण कार्यक्रम 17 अगस्‍त, 2011 में शुरू हुआ और पहले चरण में केरल राज्‍य के 11 जि‍लों में यह कार्य करेगा। इस समय कुल 2651 प्रशि‍क्षि‍त पोशाकधारी 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' कार्य कर रहे हैं, जि‍नमें 118 महि‍लाएं भी शामि‍ल हैं। 6 दि‍न के इस कार्यक्रम में योग, सुरक्षा, आर्थि‍क सुरक्षा, संप्रेषण की कला, नारि‍यल की खेती, नारि‍यल में लगने वाले रोगों की रोकथाम आदि‍के प्रशि‍क्षण के साथ-साथ बोर्ड प्रशि‍क्षार्थी को दैनि‍क भत्‍ता, पेड़ों पर चढ़ने की मशीन और दो पोशाकें मुफ्त में देता है। बोर्ड ने इन 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्रों' के लि‍ए शुल्‍क का मानकीकरण कि‍या है जि‍समें 10 रुपये सामान्‍य पेड़ों (40 फुट ऊंचा) के लि‍ए और अन्‍य सभी ऊंचे पेड़ों के लि‍ए 15 रुपये का शुल्‍क तय है। इस तरह एक मेहनतकश प्रशि‍क्षु एक साल में तीन लाख रुपये तक कमा सकता है। बोर्ड का लक्ष्‍य इस साल पांच हजार 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' तैयार करना है। हालांकि‍बोर्ड उन पारंपरि‍क नारि‍यल तोड़ने वालों की भी मदद करना चाहता है जो 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' बनना चाहते हैं। लक्षद्वीप के भी 102 लोग प्रशि‍क्षण पा चुके हैं।

     नारि‍यल तोड़ने के कार्य में शर्म महसूस करने के कारणों पर नारि‍यल वि‍कास बोर्ड वि‍स्तृत अध्‍ययन कर रहा है। इसके बड़े कारणों में व्‍यावसायि‍क जोखि‍म एक महत्‍वपूर्ण कारण पता चला है। इसको देखते हुए बोर्ड ने यूनाइटेड इंडि‍या इन्‍श्‍योरेंस कंपनी के साथ नारि‍यल पेड़ों पर चढ़ने वालों के लि‍ए जोखि‍म बीमा उपलब्‍ध कराने की एक योजना आरंभ की है। केरा सुरक्षा बीमा नाम से यह योजना केरल, कर्नाटक, तमि‍लनाडु, आंध्र प्रदेश और पुद्दूचेरी में लागू की जा चुकी है। बीमा कि‍स्‍त का 75 प्रति‍शत बोर्ड देगा जबकि‍पेड़ पर चढ़ने वालों को मात्र 25 प्रति‍शत खर्च वहन करना होगा। नारि‍यल पेड़ पर चढ़ने वाले बीमाकृत व्‍यक्‍ति‍को दुर्घटना में मौत, अधि‍कतम शारीरि‍क क्षति‍, स्‍थायी आंशि‍क क्षति‍, अस्‍पताल के खर्चे, साप्‍ताहि‍क मुआवजा और मृत्‍यु के मामलों में अंति‍म संस्‍कार के खर्चे आदि‍पर कुल 1,16,750 रुपए अधि‍कतम लाभ मि‍ल सकेंगे। प्रति‍व्‍यक्‍ति‍146 रुपये (सभी कर सहि‍त) की कि‍स्‍त तय की गयी है। लेकि‍न अगर 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' का बीमा बोर्ड द्वारा कराया जाता है तो सौ प्रति‍शत बीमा का भार बोर्ड ही उठाएगा। उन्‍हें प्रशि‍क्षण के पहले दि‍न से ही बीमा लाभ मि‍लना शुरू हो जाएगा। 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' परि‍योजना नारि‍यल क्षेत्र के खो चुके वैभव को वापस लाने के लि‍ए बोर्ड की पहल है। यह प्रशि‍क्षण कार्यक्रम बेरोजगार युवाओं को उनके अपने क्षेत्र में ही एक बेहतर आय और आजीवि‍का उपलब्‍ध कराने का अवसर है। श्री जोस ने बताया कि‍यदि‍कोई व्‍यक्‍ति‍इच्‍छुक एवं मेहनती है, तो वह नि‍श्‍चि‍त तौर पर सरकारी या प्राइवेट कर्मचारी की तरह कमाई कर सकता है। उन्‍होंने बताया कि‍यदि‍नारि‍यल क्षेत्र में यह पहल सफल होती है तो अन्‍य कृषि‍फसलों में भी ऐसी शुरूआत की जा सकती है।

     पालक्‍काड़ के एक प्रशिक्षणार्थी 51 वर्षीय श्री थंकामनी का कहना है कि‍उन्‍होंने एक माह पहले पल्‍लकड़ में प्रशि‍क्षण लि‍या, जि‍ससे उन्‍हें उनके सीमि‍त समय में ही 4000 रुपए महीने की अति‍रि‍क्‍त आय हुई। वह एक नि‍जी संस्‍था में कार्य करते हैं जहां से उन्‍हें प्रति‍माह 4200 रुपए की आमदनी होती है। वह प्रशि‍क्षण और उसमें मि‍ली मशीन से काफी प्रभावि‍त हैं और उन्‍होंने अपने कई मि‍त्रों को भी इस प्रशि‍क्षण में शामि‍ल होने का सुझाव दि‍या है। उन्‍होंने बताया कि‍मशीन वाकई में काफी अच्‍छी है, जि‍ससे पेड़ पर चढ़ने में थकान का पता ही नहीं चलता। प्रशिक्षण ले चुके एक अन्‍य व्‍यक्ति श्री थम्‍पी वी ए 15,000 रुपए पर एक पूर्णकालि‍क नौकरी पा चुके हैं। वह और अधि‍क काम के लि‍ए पहुंच आसान बनाने हेतु दोपहि‍या वाहन खरीदने की योजना बना रहे हैं। उन्‍होंने बताया कि‍उनकी काफी मांग है जि‍न्‍हें वह पूरा नहीं कर पा रहे हैं। यह महज एक खबर नहीं है। यह कहने की आवश्‍यकता नहीं है कि‍इससे महज नारि‍यल पेड़ मि‍त्रों का वि‍कास हो रहा है बल्‍कि‍नारि‍यल वि‍कास बोर्ड के नि‍देशक भी यह वि‍श्‍वास करते हैं कि‍इससे नारि‍यल क्षेत्र का खो चुका गौरव भी वापस आएगा।       ***

* मीडिया एवं संचार अधिकारी, पत्र सूचना कार्यालय, कोचीन

Saturday, November 26, 2011

कहीं ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं ?

सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा...लेखक:राजीव गुप्ता
जब खाने-पीने की चीजों के दामों में आग लग जाय और रसोई के चूल्हे की आग गैस सिलेंडर महंगा होने से बुझ जाय , सरकार के मंत्री के घोटालो के चलते पूरी सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हो , विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश में लाने के लिए सरकार टालमटोल का रवैया अपनाये तो ऐसे में जनता में आक्रोश पैदा होना लाजमी है! अगर सरकार अब भी न चेती तो कही हालात नियंत्रण से बाहर न हो जाय जिसका आगाज़ एक शख्स  ने वर्तमान कृषि मंत्री शरद पवार जी पर थप्पड़ मार कर अपने आक्रोश का इजहार तो कर दिया जो कि बहुत ही निंदनीय है परन्तु सरकार को अब जागना ही होगा अन्यथा कही ये हालात और भड़क कर बेकाबू न हो जाय !  

फ़्रांस की 1756 की क्रांति का इतिहास साक्षी है , जो कि कोई सुनियोजित न होकर जनता के आक्रोश का परिणाम थी !  जब जनता किंग लुईस के शासन में महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान होकर सडको पर उतरी और तो पूरे राजघराने को ही मौत के घाट उतारते हुए अपने साथियों को ब्रूस्सील ( Brusseel ) जेल को तोड़कर बाहर निकाल कर क्रांति  की शुरुआत की ! परिणामतः वहां  लोकतंत्र  के साथ - साथ  तीन नए शब्द  Liberty , Equality ,  Fraternity  अस्तित्व में आये ! वास्तव में उस समय राजघराने का जनता की तकलीफों से कोई सरोकार नहीं था ! इसका अंदाजा हम उस समय की महारानी मेरिया एंटोनियो के उस वक्तव्य से लगा सकते है जिसमे उन्होंने भूखमरी और महंगाई से बेहाल जनता से कहा था कि " अगर ब्रेड नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते !"
ऐसी ही एक और क्रांति सोवियत संघ में भी हुई थी ! जिसका परिणाम वहां की जारशाही का अंत के रूप में हुआ था ! कारण लगभग वहां भी वही थे जो कि फ़्रांस में थे जैसे खाने-पीने की वस्तुओं का आकाल , भ्रष्टाचार में डूबी सत्ता और सत्ता के द्वारा जनता के अधिकारों का दमन ! सोवियत संघ में लोकतंत्र तो नहीं आया परन्तु वहां कम्युनिस्टों  की सरकार बनीं!
जब अर्थव्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर हो , मंहगाई के साथ - साथ बेरोजगारी दिन - प्रतिदिन बढ़ रही हो , और सरकार अपनी दमनकारी एवं गलत नीतियों से जनता की आवाज को दबाने कोशिश कर रही हो तो जनता सडको पर उतरकर अपना आक्रोश प्रकट करने लग जाती है और यदि समय रहते हालात को न संभाला गया तो यही जनता भयंकर रूप लेकर सत्ताधारियों को सत्ता से बेदखल करने से पीछे भी नहीं हटती जिसका गवाह इतिहास के साथ साथ अभी हाल हे में हुए कुछ देशों के घटनाचक्र है ! सत्ता - परिवर्तन करने के लिए लोग अपने शासक गद्दाफी का अंत करने से भी पीछे नहीं हटे ! एक तरफ  कभी अमेरिका और ब्रिटेन के लोग आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के चलते प्रदर्शन करते है तो वही दूसरी तरफ मिस्र की जनता सड़कों पर है, जिसके चलते  मिस्र आज भी सुलग रहा है !
आंकड़ो की बजीगीरी सरकार चाहे जितनी कर ले पर वास्तविकता इससे कही परे है ! बाज़ार में रुपये की कीमत लगातार गिर रही है अर्थात विदेशी निवेशक लगातार घरेलू शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे है ! गौरतलब है कि रुपये की कीमत गिरने का मतलब विदेशी भुगतान का बढ़ जाना है अर्थात पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें और बढ़ेगी ही जिससे कि अन्य वस्तुओ की कीमतों में भी इजाफा होगा ! महंगाई को सरकार पता नहीं क्यों आम आदमी की समस्या नहीं मानना चाहती ? एक तरफ जहां हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री दुनिया के माने हुए अर्थशास्त्री है, 
राजीव गुप्ता(लेखक)
विदेशों में जाकर आर्थिक संकट से उबरने की सलाह देते है और अपने देश में मंहगाई से आम आदमी का कचूमर निकाल कर कहते है कि हमारे पास कोई जादू की छडी नहीं है तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री जी महंगाई कम होने की तारीख पर तारीख देते रहते है जैसे कि कोई अदालतीये कार्यवाही में तारीख दे रहे हो !
उदारवादी आर्थिक नीतियों का फायदा सीधे - सीधे पूंजीपतियों को ही होता है और आम आदमी महंगाई के बोझ - तले पिस जाता है !  अब असली मुद्दा यह है कि आम आदमी जाये  तो कहा जाये ? ऐसे में जनता में सरकार के प्रति आक्रोश  तो लाज़मी ही है ! जनता का यह आक्रोश कोई विकराल रूप ले ले उससे पहले सरकार को आत्मचिंतन कर इस सुरसा रूपी महंगाई की बीमारी से जनता को निजात दिलाना ही होगा, क्योंकि एक बार राम मनोहर लोहिया जी  ने भी कहा था कि  जिंदा कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं किया करती है , ऐसे में मुझे लगता है  कि कही ये थप्पड़ किसी क्रांति का आगाज़ तो नहीं है !   



आपको राजीव गुप्ता जी का यह यह लेख कैसा लगा, आप इस विषय पर क्या सोचते हैं, क्या कहना चाहते हैं, इसे खान तक उचित मानते हैं...इस तरह के सभी मुद्दों पर आपके विचारों का इंतजार बना रहेगा. आज़ादी के इतने दशकों बाद अगर आम आदमी का नेतायों के प्रति यह रवाया बन गया है तो इसके लिए वास्तव में ज़िम्मेदार  कौन है ? आप इस सारे मामले पर अपने विचारों को शब्द दीजिये लेकिन
सब कुछ सलीके से कहिये. विचारों के साथ आपका पूरा पता, इमेल पता , फोन नम्बर और तस्वीर अवश्यक है.आपके विचारों को भी प्रकाशित किया जायेगा.आप चाहेंगे तो आपका नाम पता गुप्त भी रखा जायेगा
. -रेक्टर कथूरिया     
        

Friday, November 25, 2011

देश भर के किसान पांच जनवरी को कर देगे रेल की सेवा ठप

12 राज्यों से आये किसानों ने किया आर्थिक नाकाबंदी का ऐलान
अमृतसर//25 नवम्बर//गजिंदर सिंह किंग
भारतीय किसान यूनियान द्वारा आज अमृतसर की पवित्र धरती पर देश भर के किसानो ने आपनी मांगो को लेकर एक विशाल रैली की गई, जिस में किसानो ने ऐलान किया, कि केंद्र सरकार ने किसानो की मांगे तुरंत नही मानी, तो देश के किसान द्वारा सामाजिक और आर्थिक नाका-बंदी की जाएगी, यह बात भारतीय किसान यूनियान के प्रधान और राष्ट्रीय को- ओंडिरेटर सरदार अजमेर सिंह लखोवाल ने हजारो की गिनती में रैली में शामिल हुए किसानो को संबोधित करते हुए नारों की गूंज में ऐलान किया, कि देश भर के किसान पांच जनवरी को सारे देश में रेल की सेवा ठप कर देगे
      आज अमृतसर में भगता वाली मंडी में हरे रंग की पगडीया और टोपी पहने कर भारतीय किसान यूनियान द्वारा भारतीय किसान यूनियान के प्रधान और राष्ट्रीय को- ओंडिरेटर सरदार अजमेर सिंह लखोवाल की  आगुवाई में देश भर के किसानो की मांगो को लेकर एक विशाल रैली का आयोजन किया गया, जिस में बारह राज्यों  के प्रधान अपने किसानो समेत विशाल रैली में शामिल हुए, उनकी मांग है, कि किसानो की फसलो का दाम प्रोफ़ेसर स्वामी नाथन की रिपोर्ट मुताबिक़ दिए जाए, किसानो और गाँव के मजदूरो को रखवे-करन के घेरे में लिया जाए, विधिया आधारे और नौकरी में अलग कोटा फिक्स किया जाए, किसान और मजदूरो को साठ साल बाद पेंशन लागू की जाए, खाद और बीज में किसानो को सबसिडी दी जाए और खादों को सरकारी कंट्रोल नीचे लेकर आना चाहिए, विधवा किसान औरतो को पांच हजार रूपए पेंशन लागू करना, सीमा पार खेती करने वालो किसानो को पांच हजार रूपए एकड़ सहायता दी जाए, जानवर द्वारा किसानो की फसलो के नुक्सान को रोकने के प्रबंध होने चाहिए, खराब मौसम में किसान की फसलो का नुक्सान का पूरा मुआवजा दिया जाए, देश की अलग-अलग हालातो मुताबिक़ राज्यों को आधिक अधिकार दिए जाए और पंजाब के दरियायी पानी संबंधी राईपेरीआन एक्ट अनुसार मामला हल होना चाहिए, इस दौरान भारतीय किसान यूनियान के प्रधान और राष्ट्रीय को- ओंडिरेटर सरदार अजमेर सिंह लखोवाल और भारतीय किसान यूनियान के राष्ट्रीय प्रमुख राकेश टिकेत में किसानो की मांगो बारे जानकारी देते हुए बताया, कि केंद्र सरकार किसानो की मांगो और देश की अलग-अलग हालातो मुताबिक़ राज्यों को आधिक अधिकार देने के बारे देश के प्रधान मत्री के साथ कई बार बात हो चुकी है, लेकिन शून्य नतीजा होने के कारण आज आपने सघर्ष को ऐलान करना पड़ रहा है, कि अगर किसानो की मांगे नही मानी गई तो पांच तारीख को पुरे देश के अन्दर रेल रोको आन्दोलन किया जाए गा

Saturday, October 29, 2011

17 किसान जत्थेबंदियो ने किया प्रदेश भर में रेल रोको आन्दोलन

किसान आज देशभर में आत्महत्या करने पर मजबूर 
  अमृतसर//29 अक्टूबर//गजिंदर सिंह किंग
पंजाब में आज 17 किसान जत्थेबंदियो ने प्रदेश भर में रेल रोको आन्दोलन किया, जिस के तहत किसानो ने आपनी मांगो को ले कर पंजाब में तीन घंटे रेल यातायात को रोका, वहीँ किसानो ने रेल लाइनों पर बैठ कर धरना और प्रदर्शन देश की केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ किया
         अमृतसर स्टेशन पर आज 17 किसान जत्थेबंदियो ने आपनी मांगो को ले कर रेल लाइनों पर बैठ कर धरना और प्रदर्शन देश की केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ किया, वह किसान जो की पूरे देश के पेट भरते है, लेकिन आज यह किसान बढ़ती हुई महंगाई और सरकार की अनदेखी का शिकार हुआ है, जिस के चलते वह आज सड़कों पर उतर कर रेल लाइनों पर आ गया है,, दरअसल इन की मांग है, कि बढ़ती महंगाई ने इन का किसानी से मुनाफा खत्म कर दिया है और जीना मुश्किल हो गया है. 

किसान आज देश में आत्महत्या करने पर मजबूर हो गया है, वहीँ इन की मांग है, कि किसानी में इस्तेमाल होने वाली खादों के ऊपर से सरकार ने आपनी सब्सडी खत्म कर दी है, जिस के कारण इन खादों के दाम तीन गुना हो गए है, साथ ही पिछले कुछ समय में जो देश में महंगाई बढ़ी है, उस हिसाब से उन की फसलों के समर्थन मूल्य नहीं बढ़े, जिस कारण वह आज यहाँ पर प्रदर्शन करने के लिए मजबूर है, साथ ही उन का कहना है, कि जो केंद्र सरकार ने उन को 4 % की ब्याज दर से कर्जा देने की मांग की थी, वह उस को पूरा नहीं कर रही और जो राज्य सरकार गोबिंदपुरा में 91 एकड़ ज़मीन सरकार वापिस नहीं कर सके, जिस के चलते वह आज यहाँ पर प्रदर्शन कर रहे है, आज सरकार जो मंडियों में आपनी फसल देने आते है तो सरकार उस फसल की लिफ्टिंग तक करवाने में असमर्थ है और आज वह यह सन्देश देश की राज्य सरकार और केंद्र सरकार को दे रहे है, जिस के चलते उन्होंने पूरे पंजाब में 1 बजे से ले कर 4 बजे तक रेल रोको आन्दोलन किया है और अगर उन की मांग को न माना गया, तो वह इस प्रदर्शन को और तेज करेंगे 
वहीँ इस मौके पर पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच यहाँ पुलिस भी मौजूद थी, अमृतसर के ए,डी,सी,पी-2 नरेश शर्मा का कहना है, कि आज पूरे पंजाब में किसान अपनी मांगों को ले कर प्रदर्शन कर रहे है, जिस के तहत वह आज तीन घंटे का रेल रोको आन्दोलन के तहत अमृतसर स्टेशन पर रेल लाइनों पर बैठे है और यहाँ पर पुलिस के द्वारा कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किये गए है, ताकि यहाँ पर किसी तरह का कोई नुक्सान न हो सके 
       फिलहाल महंगाई के डंक ने आज इन किसानो को रेल लाइनों पर आने को मजबूर कर दिया है, अब देखना यह होगा, कि किसानों के इस दर्द को सरकार कितनी गभ्भीरता से लेती है, जिस से की देश का पेट भरने वाला किसान भर पेट रोटी खा सकेगा

Thursday, October 20, 2011

अमृतसर में किया गया एक विशेष किसान मेले का आयोजन

किसानों के लिए वरदान साबित होते हैं इस तरह के मेले 
अमृतसर // 19 अक्टूबर // गजिंदर सिंह किंग 
अमृतसर में आज किसान मेले का आयोजन किया गया, जिस का उदघाटन अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर रजत अग्रवाल ने किया, वहीँ किसानो ने बहु-गिनती में भाग लिया और किसानो को आधुनिक तकनीकों से जागरूक  करवाया गया साथ ही किसानों को खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनों के बारे में जानकारी दी गयी.
प्रदेश में किसानी को बढावा देने और उन को आधुनिक तकनीक के बारे में जागरूक करने के लिए अमृतसर के गुरु नानक भवन में एक विशेष किसान मेले का आयोजन किया गया, जिस में किसानो को खेती के धंधे में इस्तेमाल होने वाली खाद और इस में इस्तेमाल होने वाले मशीनों के बारे में जागरूक किया गया, वहीँ इस मौके किस खेती के लिए किस बीज का इस्तेमाल करना चाहिय और फसल को बीमारी लगने से किस प्रकार बचाया जाना चाहिय इस बारे में जानकारी दी गयी.साथ ही कई विशेष स्टाल लगाये गए जहाँ की किसानी के समय इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयां के छिडकाव के बारे में बताया गया, साथ  ही  यहाँ  पर  एक  विशेष  स्टाल  के  द्वारा नई खाद और कीट-नाशाक दवाओ  के बारे में बताया गया और वहीँ इस मौके पर बागबानी विभाग की तरफ से एक विशेष आयोजन किया गया. 
इस मौके पर बागबानी विभाग के इंचार्ज लछमन सिंह का कहना है, कि इस में एक विशेष काउंटर किसानो को बागबानी के क्षेत्र में किस तरह आगे आना चाहिय, इस बारे में जागरूक किया जा रहा है और बागबानी की क्या स्कीम सरकार दे रही है, उस के बारे में उन्होंने बताया, कि जो नई तकनीक बागबानी विभाग में आयी है वह बताई जा रही है और साथ ही विशेष नेट हाउस की खेती के बारे में बताया जा रहा है और सरकार के द्वारा दी जा रही सब्सडी के बारे में किसानों को भी बताया जा रहा है.
इस किसान मेले में यहाँ आए किसानो ने मेले बारे जानकारी देते हे बताया, कि यह एक अच्छा प्रयास है और इन को यहाँ आ कर नयी-नयी तकनीक के बारे में पता चल रहा है और जो यहाँ पर नयी चीजें देखने को मिली है,  वह इस का प्रयोग करेंगे साथ ही यह प्रोत्साहन से किसानो को लाभ मिल रहा है और हमे खेती के नए तरीकों के बारे में भी पता चल रहा है.
किसान मेले में अलग-अलग कंपनीओ द्वारा विशेष लगाए गए स्टाल के अधिकारीओ ने इस मेले बारे जानकारी देते हुए बताया, कि इस किसान मेले से हमे बहुत फायदा होता है और किसानो के लिए किसानी को बढावा देने और उन को आधुनिक तकनीक मशीने बनाई जाती है, जिससे किसानो को खेती के धंधे में लाभ दायक सिद्ध होती है और हम हर किसान मेले में आपने स्टाल लगा कर किसानो  को नई आधुनिक तकनीक बारे जानकारी देते है और इस से किसान  को फायदा होता है. 
      इस किसान मेले में  किसानो को जागरुक करने के लिए एक सम्मेलन किया गया, जिस में अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर  रजत अग्रवाल ने विशेष रूप से भाग लिया और कई बड़े खेती  के विशेषको ने यहाँ पर किसानो को किसानी को बढावा देने और उन को आधुनिक तकनीक के बारे में जागरूक करने के लिए आपने विचार दिए.
इस मौके पर अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर  रजत अग्रवाल में इस मेले की जानकारी देते हुए बताया, कि इस किसान मेले से किसानो को काफी फायदा मिलेगा, क्यों कि इस मेले में नवीनतम तकनीकों के बारे में किसानो को बताया जा रहा है और साथ ही पराली को आग न लगाने के लिए एक विशेष मशीन यहाँ पर किसानो के लिए लाई गयी है, जिस से कि वह आपनी पराली को आग न लगाये और खेत को बचा सके, साथ ही एक किसान खेती के साथ क्या सहायक धंधे कर सकता है उस बारे में भी बताया  गया 

Saturday, October 15, 2011

अमृतसर लाहौर मार्ग पर किसानो ने दिया धरना


29 अक्टूबर को पंजाब में 3 घंटे रेल रोको आन्दोलन
   अमृतसर 14 अक्टूबर:(गजिंदर सिंह किंग):  
अमृतसर में आज देश की सरहद पर दिल्ली लाहौर मार्ग पर किसान संघर्ष कमेटी द्वारा आपनी मांगो को लेकर राष्ट्रीय राज्य मार्ग पर दो घंटे का जाम कर बढ़ती महंगाई में किसानी का धंधा नुक्सान दायक सिद्ध होने के विरुद्ध में धरना प्रदर्शन किया गया.
देश में बढ़ती महंगाई का असर अब इस देश के अन्नदाता किसानो पर भी पड़ रहा हैवहीँ देश के लोगों का पेटभरने वाले किसान भी अब इस महंगाई की मार के नीचे  गए हैवहीँ आज पंजाब संघर्ष कमेटी द्वारा आज सरहद पर अमृतसर लाहौर मार्ग पर धरना प्रदर्शन कर किसानो ने टोल प्लाज़ा के सामने दो घंटे तक सड़क जाम कर देश की केंद्र सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी कर यह ही नहीं आर्मी की गाड़ियों को भी रोका गयायहाँ तक क़ि दिल्ली-लाहौर से  रही बस भी इस धरने के कारण एक घंटा देरी से वाघा सीमा पर पहुच सकीवहीँ इस मौके परपंजाब संघर्ष कमेटी के प्रधान सतनाम सिंह पन्नू ने आपने प्रदर्शन बारे जानकारी देते हुए बतायाक़ि आज यह प्रदर्शन सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ हैक्योंक़ि यह आज उन की मज़बूरी हैक़ि वह आज यह प्रदर्शन कररहे हैउन्होंने बतायाक़ि जो खाद की कीमतें एक साल में ढाई गुना बढ़ गई हैखों क़ि सरकार ने खाद कम्पनीयों का निजीकरण कर दिया गया है. 

यही कारण है कि उन की लागत बहुत बढ़ गयी हैजिस कारण आज उन के लिए काफीमुश्किल हो गयी हैसाथ ही जो धान के एम.एस.पी. जो कि महज 20 पैसे किलो बढ़ाया हैउस को 300 रूपए प्रति किलो करना चाहिएसाथ ही उन का कहना हैक़ि जो पार्लियामेंट में सवामिनाथान कमेटी की रिपोर्ट जो 2006 से बाकी पडीहैउस को लागू किया जाना चाहिएउन्होंने बतायाक़ि जो गोबिंदपुर में किसानो की जगह पर कब्ज़ा किया जा रहा है,वह गलत है और जो पार्लियामेंट में जो ज़मीन आदि गृहन का क़ानून पास हुआ हैउस के आधार पर ज़मीन लेनी चाहिए.

पंजाब संघर्ष कमेटी के प्रधान सतनाम सिंह पन्नू ने अपनी मांगो के बारे कहाक़ि अगर सरकार ने उन कीमांगे  मानी तो वह 17 किसान जत्थेबंदियाँ 29 अक्टूबर को पंजाब में 3 घंटे रेल रोको आन्दोलन करेंगे औरफिर भी उन की मांग  मानी गयीतो वह २२ नवम्बर से पूरे पंजाब में पक्का धरना लगायेंगेफिलहाल इसकिसानो के आक्रोश से यह बात साफ़ साबित होती हैक़ि महंगाई की मार से अब किसान भी अछूते नहीं रहे है,जिस के चलते वह आज सड़कों पर धरना प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए है 
      फिलहाल अब देखना होगाक़ि सरकार इन की मांगो को कितनी जल्दी मानती हैजिस से की देश का पेटभरने वाला यह किसान खेती में काम कर सके