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Thursday, July 09, 2015

पूँजीवाद की मुसीबतों के चक्तव्यूह में घिरी पारुल कालिया

मीडिया के सामने रो पड़ी पारुल अपनी दास्तान सुनाते सुनाते 
लुधियाना: छोटी सी उम्र लेकिन दुःख शायद उसकी तक़दीर बन चूका है।  राहत मिलने की उम्मीद में जहाँ भी जाती है वहीँ उस पर शोषण की नज़र पड़नी शुरू हो जाती है। छोटी सी उम्र में ही बड़ी बड़ी मुसीबतों को गले लगा चुकी पारुल कालिया दुगरी थाने के सामने मीडिया को रो रो कर अपनी दास्तान सुना रही थी। किसी न किसी तरह अपने एकलौते बेटे के पालन पोषण में लगी पारुल के लिए अब वही है जीने की उम्मीद। अपने बेटे को पाल कर बड़ा करना ही शायद उसका अब एकमात्र मकसद है। उसकी तरफ जो भी नज़र उठती है गलत इरादे से उठती लगती है। उसके खिलाफ खड़े लोगों में जो चेहरे हैं उनके नाम सुनकर शायद आप भी चौंक जाएं। इन नामों का ज़िक्र बाद में पहले बात करते हैं पारुल के लिए मुसीबत बने हालात की। आम तौर पर घरों में समस्या होती है गरीबी के कारण, लालच के कारण, स्वार्थ के कारण पर यहाँ मामला ही कुछ और है। यह मुद्दा पैदा हुआ है पूँजीवाद के साथ पैदा होती शर्मनाक समस्यायों के साथ। जिस समाज में पैसा ही सब कुछ बन जाये तो भगवान बना पैसा समाज को किस गिरावट तक ले जाता है शायद इसका अनुमान भी न लगाया जा सके। पारुल भी पूंजीवाद के साथ पैदा होती मुसीबतों का ही शिकार हो रही है। पारुल को अपने विदेशी रिश्तेदारों से आता पैसा ही उसके लिए समस्याएं लेकर आया। पारुल को देख कर याद आती हैं जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के एक लम्बे गीत की पंक्तियाँ
कहते हैं जिसे पैसा बच्चो यह चीज़ बड़ी मामूली है 
लेकिन इस पैसे के पीछे सब दुनिया रस्ता भूली है। 
साहिर साहिब ने यह हकीकत दश्कों पहले बयान की थी लेकिन इसने बार बार खुद को साबित किया। पैसे ने दुनिया भर को भटका कर अपने रास्तों से हटा दिया। सभी रिश्ते-नाते, संबंधी एक दुसरे के साथ प्यार या संबन्ध  से नहीं केवल पैसे के नफे नुक्सान से देखने लगे। किसी से बुखार का हाल पूछो तो जवाब मिलता है अभी तो बस चवन्नी आराम आया है।  बारह आना अभी भी तबीयत खराब है। किसी युवा से पूछो तो भाई क्या बनोगे तो जवाब मिलता है--जिसमें चार पैसे बनें। किसी लड़की से पूछ लो कि किस से शादी करोगी तो अक्सर कई लड़कियां खुल कर कहती हैं जो खूब ऐश कराये जिसके पास ढेर सारा पैसा हो। स्कूल की पढ़ाई पूरी करनी हो या कालेज की शिक्षा--पैसा अपना जलवा दिखा रहा है। शिक्षा और काम के बावजूद नौकरी चाहिए तो वहां भी नौकरी दिलवाने का पैसा खर्च करो वो भी एक नंबर में। इलाज कराना हो तो भी पैसा।  मरीज़ अस्पताल में मर जाये तो शव लेने के लिए भी पैसा। शव घर आ जाये तो श्मशान घात वाले भी पैसा मांगते हैं। पैसे की सोच से दूषित हो चुके इस शर्मनाक समाज में आखिर पारुल भी क्या करे?
तलाक के बाद जब पारुल अपने बच्चे को लेकर कुछ चिंतित हुई तो उसकी मौसी ने उसके लिए कुछ पैसे अपनी बहन के पास भेजे। मकसद था परुल के सर की छत बन सके। मौसी चाहती थी कि पारुल उन पैसों से अपना घर खरीद ले। इन पैसों से एक प्लाट भी लिया गया तो आखिर रजिस्ट्री भी होनी थी और पैसे की अदायगी भी। इसी पड़ाव पर आकर सारे मामले ने एक नया मोड़ लिया और पारुल पहुँच गयी दुगरी थाने में अपनी शिकायत लेकर।  
थाने के बाहर उसने मीडिया को बताया कि जब उसने अपने पैसे या रजिस्ट्री वापिस मांगी तो सबंधित डीलर ने उस पर हमला कर दिया। पारुल का आरोप था कि पुलिस ने उसकी सुनवाई नहीं की।  मीडिया ने जब पुलिस से सम्पर्क किया तो पुलिस ने मीडिया के सामने उसकी पूरी सुनवाई की और पूरी सुरक्षा का आश्वासन भी दिया। 
किसी निजी कम्पनी में काम करके अपना गुज़ारा चला रही पारुल परेशान है उन धमकियों से जो उसे राह आते जाते दी जातीं हैं। 
कौन हैं पारुल को धमकियां देने वाले?
कौन है उसके विरोधी? 
कौन है उसका हमदर्द?
क्या बनेगा पारुल कालिया का?
इन सभी सवालों के जवाब आपको मिल सकें हमारी अगली पोस्ट में जिसमें कुरेदा जायेगा पारुल कालिया के लिए खतरा बने लोगों का हर पहलू।
आज पारुल की कहानी देख सुन कर याद आते हैं  ओशो जिन्होंने अमेरिका में जा कर बहुत सफलता से अपना कम्यून चला कर दिखाया था। वहां कोई करंसी नहीं थी लेकिन हर किसी को हर सुविधा उपलब्ध थी। इसकी सफलता देख कर ही पूंजीवादी समाज हिल गया और ओशो की जान का दुश्मन बन बैठा।
पूंजीवादी समाज में पैसे के असंतुलित बटवारे ने ही जन्म दिया जुर्मों को और जुर्मों से भरा समाज बन गया जीने के लिए नरक से भी बदतर। आज लावारिस फिल्म का गीत भी याद आ रहा है-- जिसकी एक पंक्ति थी---यही पैसा तो अपनों से दूर करे है--- . आज पारुल जिस हालात में पहुँच चुकी है उसके लिए पूंजीवादी सिस्टम पूरी तरह ज़िम्मेदार है। आईये इस सितम को बदल कर पारुल जैसी अनगिनत लड़कियों को बचाने का यज्ञ शुरू करें। 

Saturday, September 08, 2012

मौत की क्रूरता: पाबला जी के युवा बेटे को छीना


किस भगवान से मांगें दर्द सहने की शक्ति  
                      साभार चित्र 
ब्लॉग जगत को नए नए अंदाज़ देने, ब्लॉग लेखकों को एक नयी पहचान देने और उन्हें किसी न किसी भने नजदीक लाने में हर पल व्यस्त रहने वाले मित्र बी एस पाबला जी के साथ मौत ने एक क्रूर मजाक किया है। मौत ने उनके युवा बेटे को हमसे हमेशां के लिए छीन लिया है।  भाई रजनीश अली जाकिर जी की पोस्ट से इस दुखद खबर का पता चला। पाबला जी का नम्बर तीन चार बार निकाला पर उनके दुःख को बाँट सकने की हिम्मत मेरी भी नहीं हुई। कभी कभी शब्द भी कितने बेबस से हो जाते हैं। जो दुःख कभी भूल नहीं सकेगा उस दुःख को भूलने की बात कहना----जो असहनीय है उसे सहन  करने का उपदेश देना जीने के लिए---समाज के लिए लाख जरूरी सही पर---केवल खोखली औपचारिकता लगता है। मैंने अपना एकलौता बेटा खोया है---सो इस दर्द का अहसास भी कर सकता हूँ---पर बाँटने में कितना असमर्थ हो गया हूँ---क्योंकि जानता हूँ कि  यह दर्द अकेले ही सहना होगा----सारी उम्र हर पल यह दर्द बना रहेगा ! भगवान् होता तो यह ज़ुल्म नहीं करता----इस लिए किस भगवान् से कहूं की पुत्र नहीं रहा और इस दर्द को सहने की शक्ति एक पिता को दे---जाकिर जी की पोस्ट भी नीचे दी जा रही है ! --रेक्टर कथूरिया 
पाबला जी को पुत्र शोक// जाकिर अली रजनीश जी 
 बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हरदिल अजीज़, ब्‍लॉग शिरोमणि बी.एस.पाबला जी के युवा पुत्र गुरप्रीत का आकस्मिक निधन आज दिनांक 08 सितम्‍बर, 2012 को प्रात: भिलाई में हो गया है। मुझे डॉ0 अरविंद मिश्र जी से यह समाचार मिला, जिसे सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। क्‍योंकि लगभग एक साल पहले गुरप्रीत का एक बड़ा एक्‍सीडेंट भी हो गया था। उस दुर्घटना के बाद गुरप्रीत काफी स्‍वस्‍थ हो गया था। लेकिन आज प्रात: पता नहीं कैसे क्‍या हुआ कि भिलाई के नेहरू नगर इलाके में गुरूप्रीत के साथ एक ट्रेन दुर्घटना हो गयी, जिसमें उसका आकस्मिक निधन हो गया। यह खबर सुनकर ब्‍लॉग जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। मेरी इस सम्‍बंध में भिलाई निवासी ब्‍लॉग संजीव तिवारी और प्रो0 अली से भी बात हुई है। पर मैं इस शोकाकुल समय में पाबला जी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं।

मैं अपनी पत्‍नी श्रीमति अर्शिया अली, हमारे साथी डॉ0 अरविंद मिश्र, श्री रवीन्‍द्र प्रभात एवं लखनऊ के समस्‍त ब्‍लॉगरों की ओर से गुरप्रीत की आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं और ईश्‍वर से विनती करता हूं कि वह पाबला जी और उनके परिवार को इस असह्य दु:ख को सहने की शक्ति प्रदान करे।


आमीन, सुम्‍मा आमीन। 


Saturday, March 10, 2012

डी डी जैन कालेज में भी दीक्षांत समारोह आयोजित

388 छात्रों को मिलीं डिग्रियां: डा. सी.एस.मीना थे मुख्य मेहमान


साधना जब सफल होती है और उसे मान्यता मिलती है तो साधना मार्ग में आये हुए सभी कष्ट भूल जाते हैं और दिलो दिमाग में रह जाती है एक ख़ुशी जिसकी बराबरी दुनिया के किसी भी सुख सुविधा में सम्भव ही नहीं होती. यह ख़ुशी व्यक्ति के अंग अंग से बोलती है. इस ख़ुशी की चमक आज फिर दिखाई दी लुधियाना में उन चात्रयों के चेहरों पर जिन्हें आज उच्च शिक्षा की डिग्री मिली. 
शिक्षा के क्षेत्र में एक अलग स्थान रखने वाले देवकी देवी जैन मैमोरियल कालेज फार विमेन की कन्वोकेशन आज बहुत ही उत्साह, हर्षो उल्लास और पारंपरिक जोशो खरोश से सम्पन्न हुयी. छात्रायों के चेहरे पर एक चमक थी, उपलब्धी की, एक अलौकिक सी दिखने वाली ख़ुशी थी जो बता रही थी उनकी मेहनत और शिक्षा साधना की पूरी कहानी. विश्व विधालय अनुदान  आयोग के संयुक्त सचिव  डाक्टर सी .एस.मीना इस यादगारी अवसर पर मुख्य मेहमान थे. 
कालेज के चेयरमैन हीरा लाल जैन, अध्यक्ष केदार नाथ जैन, वरिशाथ उपाध्यक्ष राज कुमार जैन और शांति सरूप जैन, प्रबन्धक कमेरी के सचिव बिपिन जैन, मैनेजर सुरिन्दर कुमार जैन और अफिशिएटिंग प्रिंसिपल सुरिन्दर दूया भी इस अवसर मर मौजूद रहे. 
प्रिंसिपल मैडम ने जहाँ कालेज की खूबियों और उपलब्धियों की चर्चा की वहां चात्रयों और उनके माता पिता की प्रेरणा और मेहनत  को भी सराहा. उनहोंने इस अवसर पर अपने उन सहयोगियों को भी बहुत ही स्नेह और समान से याद किया जो किसी समय उनके साथ इसी कालेज में अध्यापन करते थे पर अचानक ही ज़िन्दगी की राहें जुदा होने के बाद भी उनका विकास जारी रहा और साथ ही बना रहा कालेज के साथ उनका स्नेह सम्बन्ध. आज वे बहुत उच्च पदों पर या फिर सफलता के शिखरों पर कार्य कर रहे हैं पर इतने ऊंचे मुकाम पर जाकर भी वे लोग अपने इस कालेज को नहीं भूले.. इस तरह के लोगों में से एक डाक्टर परम सैनी भी आज कन्वोकेशन के सुअवसर पर यहाँ मौजूद थे जिन्हें प्रिंसिपल मैडम ने उसी पुराने स्नेह के साथ पम्मी मैडम कह कर पुकारा. 
पौने चार सो से अधिक छात्रायों ने अपनी मेहनत और साधना को  डिग्री के रूप में मिली मान्यता का सम्मान लेकर इस दिन को अपनी ज़िन्दगी का एक यादगारी दिन बनाया. इन छात्रायों ने मीडिया  से बात करते हुए भी कहा की उन्हें आज अपनी साधना पर गर्व है और ऐसे लगता है कि जैसे उनकी ग्रैजूएशन की शिक्षा आज मुकम्मल हुयी है. इस शुभ अवसर पर किसी के चेहरे पर हंसी थी तो किसी  की आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे. यह यादगारी आयोजन बाद दोपहर तक जारी रहा. कन्वोकेशन रिपोर्ट:: रेक्टर कथूरिया // तस्वीरें:: संजय सूद  

Thursday, January 12, 2012

नारि‍यल तोड़ने की कला का प्रशिक्षण

सफलता की एक और नयी कहानी                                                  सुधा एस नंबूदरी*
नारि‍यल का खोया हुआ गौरव लौटाया
वि‍श्‍व पर्यटन मानचि‍त्र पर केरल 'ईश्‍वर का प्रदेश' के साथ-साथ नारि‍यल वृक्षों की भूमि‍के नाम से भी अंकित है। लेकि‍न कुछ समय से कई नारि‍यल कि‍सानों ने अन्‍य लाभकारी फसलों की खेती करना शुरू कर दि‍या है। इसके पीछे अन्‍य कारणों के साथ एक प्रमुख कारण यह है कि‍नारि‍यल के पेड़ों पर नारि‍यल तोड़ने के लि‍ए चढ़ने वालों की कमी है। कुछ समय पहले नारि‍यल तोड़ने का काम समाज के एक स्‍तर तक सीमि‍त था लेकि‍न आज के युवाओं के मध्‍य वर्गीय जीवन शैली के प्रति‍आकर्षण तथा कम खतरे एवं ज्‍यादा सम्‍मान वाली नौकरि‍यों के प्रति‍झुकाव के कारण केरल में इस समय नारि‍यल तोड़ने वाले वि‍लुप्‍तप्राय प्रजाति‍की श्रेणी में शामि‍ल होने वाले हैं। अगर आप उन्‍हें खोजने नि‍कलें, तो पहले तो वे मि‍लेंगे नहीं, अगर कोई एक मि‍लता भी है तो वह ऊंची रकम की मांग करेगा और अवैज्ञानि‍क तरीके से वे नारि‍यल तोड़ने का काम करेगा। शुक्र है कि‍नारि‍यल वि‍कास बोर्ड ने एक पहल की जि‍सके अंतर्गत बोर्ड ने युवाओं, प्रौढ व्‍यक्‍ति‍यों और महि‍लाओं को नारि‍यल पेड़ों पर चढ़कर नारि‍यल तोड़ने की कला सि‍खाना शुरू कि‍या है और बोर्ड ने अपनी वेबसाइट पर इन लोगों के संपर्क वि‍वरण भी उपलब्‍ध कराए हैं।
     हालांकि‍कृषि‍के कि‍सी भी क्षेत्र में इस समय श्रम की कमी एक सामान्‍य घटना है। नारि‍यल वि‍कास बोर्ड के अध्‍यक्ष ने बताया कि‍नारि‍यल तोड़ने, पेड़ों की देखभाल, क्राउन क्‍लीनिंग और हारवेस्‍टिंग आदि‍के लि‍ए कुशल श्रम की आवश्‍यकता होती है। इस क्षेत्र में इस आधारभूत समस्‍या को देखते हुए बोर्ड ने 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' नाम से एक नई पहल की है। इस चुनौती को हासि‍ल करने के लि‍ए बोर्ड की मदद हेतु केरल कृषि‍वि‍श्‍ववि‍द्यालय, कृषि‍वि‍ज्ञान केन्‍द्र और कुछ गैर-सरकारी संगठन आगे आए। वि‍स्‍तृत वि‍चार-वि‍मर्श एवं योजना के पश्‍चात 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' प्रशि‍क्षण कार्यक्रम सही रास्‍ते पर है। बोर्ड का यह प्रशि‍क्षण कार्यक्रम 17 अगस्‍त, 2011 में शुरू हुआ और पहले चरण में केरल राज्‍य के 11 जि‍लों में यह कार्य करेगा। इस समय कुल 2651 प्रशि‍क्षि‍त पोशाकधारी 'नारि‍यल पेड़ों के मि‍त्र' कार्य कर रहे हैं, जि‍नमें 118 महि‍लाएं भी शामि‍ल हैं। 6 दि‍न के इस कार्यक्रम में योग, सुरक्षा, आर्थि‍क सुरक्षा, संप्रेषण की कला, नारि‍यल की खेती, नारि‍यल में लगने वाले रोगों की रोकथाम आदि‍के प्रशि‍क्षण के साथ-साथ बोर्ड प्रशि‍क्षार्थी को दैनि‍क भत्‍ता, पेड़ों पर चढ़ने की मशीन और दो पोशाकें मुफ्त में देता है। बोर्ड ने इन 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्रों' के लि‍ए शुल्‍क का मानकीकरण कि‍या है जि‍समें 10 रुपये सामान्‍य पेड़ों (40 फुट ऊंचा) के लि‍ए और अन्‍य सभी ऊंचे पेड़ों के लि‍ए 15 रुपये का शुल्‍क तय है। इस तरह एक मेहनतकश प्रशि‍क्षु एक साल में तीन लाख रुपये तक कमा सकता है। बोर्ड का लक्ष्‍य इस साल पांच हजार 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' तैयार करना है। हालांकि‍बोर्ड उन पारंपरि‍क नारि‍यल तोड़ने वालों की भी मदद करना चाहता है जो 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' बनना चाहते हैं। लक्षद्वीप के भी 102 लोग प्रशि‍क्षण पा चुके हैं।

     नारि‍यल तोड़ने के कार्य में शर्म महसूस करने के कारणों पर नारि‍यल वि‍कास बोर्ड वि‍स्तृत अध्‍ययन कर रहा है। इसके बड़े कारणों में व्‍यावसायि‍क जोखि‍म एक महत्‍वपूर्ण कारण पता चला है। इसको देखते हुए बोर्ड ने यूनाइटेड इंडि‍या इन्‍श्‍योरेंस कंपनी के साथ नारि‍यल पेड़ों पर चढ़ने वालों के लि‍ए जोखि‍म बीमा उपलब्‍ध कराने की एक योजना आरंभ की है। केरा सुरक्षा बीमा नाम से यह योजना केरल, कर्नाटक, तमि‍लनाडु, आंध्र प्रदेश और पुद्दूचेरी में लागू की जा चुकी है। बीमा कि‍स्‍त का 75 प्रति‍शत बोर्ड देगा जबकि‍पेड़ पर चढ़ने वालों को मात्र 25 प्रति‍शत खर्च वहन करना होगा। नारि‍यल पेड़ पर चढ़ने वाले बीमाकृत व्‍यक्‍ति‍को दुर्घटना में मौत, अधि‍कतम शारीरि‍क क्षति‍, स्‍थायी आंशि‍क क्षति‍, अस्‍पताल के खर्चे, साप्‍ताहि‍क मुआवजा और मृत्‍यु के मामलों में अंति‍म संस्‍कार के खर्चे आदि‍पर कुल 1,16,750 रुपए अधि‍कतम लाभ मि‍ल सकेंगे। प्रति‍व्‍यक्‍ति‍146 रुपये (सभी कर सहि‍त) की कि‍स्‍त तय की गयी है। लेकि‍न अगर 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' का बीमा बोर्ड द्वारा कराया जाता है तो सौ प्रति‍शत बीमा का भार बोर्ड ही उठाएगा। उन्‍हें प्रशि‍क्षण के पहले दि‍न से ही बीमा लाभ मि‍लना शुरू हो जाएगा। 'नारि‍यल पेड़ मि‍त्र' परि‍योजना नारि‍यल क्षेत्र के खो चुके वैभव को वापस लाने के लि‍ए बोर्ड की पहल है। यह प्रशि‍क्षण कार्यक्रम बेरोजगार युवाओं को उनके अपने क्षेत्र में ही एक बेहतर आय और आजीवि‍का उपलब्‍ध कराने का अवसर है। श्री जोस ने बताया कि‍यदि‍कोई व्‍यक्‍ति‍इच्‍छुक एवं मेहनती है, तो वह नि‍श्‍चि‍त तौर पर सरकारी या प्राइवेट कर्मचारी की तरह कमाई कर सकता है। उन्‍होंने बताया कि‍यदि‍नारि‍यल क्षेत्र में यह पहल सफल होती है तो अन्‍य कृषि‍फसलों में भी ऐसी शुरूआत की जा सकती है।

     पालक्‍काड़ के एक प्रशिक्षणार्थी 51 वर्षीय श्री थंकामनी का कहना है कि‍उन्‍होंने एक माह पहले पल्‍लकड़ में प्रशि‍क्षण लि‍या, जि‍ससे उन्‍हें उनके सीमि‍त समय में ही 4000 रुपए महीने की अति‍रि‍क्‍त आय हुई। वह एक नि‍जी संस्‍था में कार्य करते हैं जहां से उन्‍हें प्रति‍माह 4200 रुपए की आमदनी होती है। वह प्रशि‍क्षण और उसमें मि‍ली मशीन से काफी प्रभावि‍त हैं और उन्‍होंने अपने कई मि‍त्रों को भी इस प्रशि‍क्षण में शामि‍ल होने का सुझाव दि‍या है। उन्‍होंने बताया कि‍मशीन वाकई में काफी अच्‍छी है, जि‍ससे पेड़ पर चढ़ने में थकान का पता ही नहीं चलता। प्रशिक्षण ले चुके एक अन्‍य व्‍यक्ति श्री थम्‍पी वी ए 15,000 रुपए पर एक पूर्णकालि‍क नौकरी पा चुके हैं। वह और अधि‍क काम के लि‍ए पहुंच आसान बनाने हेतु दोपहि‍या वाहन खरीदने की योजना बना रहे हैं। उन्‍होंने बताया कि‍उनकी काफी मांग है जि‍न्‍हें वह पूरा नहीं कर पा रहे हैं। यह महज एक खबर नहीं है। यह कहने की आवश्‍यकता नहीं है कि‍इससे महज नारि‍यल पेड़ मि‍त्रों का वि‍कास हो रहा है बल्‍कि‍नारि‍यल वि‍कास बोर्ड के नि‍देशक भी यह वि‍श्‍वास करते हैं कि‍इससे नारि‍यल क्षेत्र का खो चुका गौरव भी वापस आएगा।       ***

* मीडिया एवं संचार अधिकारी, पत्र सूचना कार्यालय, कोचीन

Tuesday, March 29, 2011

कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर न आये

भारतीय शास्त्रों में  बार बार यह बात याद दिलाई जाती है कि इंसान को अपने धर्म में हर पल कायम  रहना चाहिए. धर्म और स्वभाव का गहरा मेल है. जैसे आग जलाती है, हवा सुखाती है ये सब उनका स्वभाव है. सूर्य हमें रौशनी भी देता है और गर्मी भी, चाँद हमें चांदनी देता है जो आँखों को ठंडक देती हुयी महसूस होती हैं. इनमें से कभी भी कोई अपने धर्म से नहीं हटा. लेकिन इंसान बार बार किसी न किसी बहाने से अपने मानवीय धर्म और प्रेम प्यार के धर्म से हट जाता है. कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर, कभी मज़हब के नाम पर और कभी क्षेत्र के नाम पर. लेकिन जो लोग धर्म पर कायम रहते हैं उनके सामने दुनिया झुकती है. इसमें देर चाहे हो जाये लेकिन अंधेर कभी नहीं होता. कभी वक्त था कि रूस और अमेरिका एक दूसरे के सामने खड़े थे. एक दूसरे को मिटाने के लिएआतुर. मास्को और वाशिंगटन कभी इस नफरत को भूल पायेंगे कभी किसी ने नहीं सोचा था. पर इस तस्वीर ने मुझे बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया. तस्वीर में अमेरिकी रक्षा विभाग के सचिव रोबर्ट एम गेटस एक मकबरे पर फूल माला अर्पित करके अपने श्रद्दा सुमन अर्पित कर रहे हैं. मकबरा किसी सैनिक का है. सैनिक का नाम मैं नहीं जानता लेकिन जो बात पता चल सकी वह यह कि तस्वीर में दिखाया गया मकबरा मास्को में है. इस तस्वीर को अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए कैमरे में क्लिक किया  Cherie Cullen/ ने 22 मार्च 2011 को. इस तस्वीर को देख कर जहन में लता जी का गाया हुआ  वह अमर गीत भीआने लगता है...कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर न आये....अगर आपके मन में भी कुछ आ रहा है तो उसे तुरंत लिख भेजिए. चाहे डाक से चाहे इमेल से. आपके विचारों का स्वागत होगा. आपको यह तस्वीर कैसी लगी ? इस पर अपने विचार भी भेजें और अगर आपके पास भी कोई अच्छी तस्वीर हो तो उसे अवश्य भेजें उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित किया जायेगा. --रेक्टर कथूरिया. 

Monday, May 10, 2010

जब भूख लगती है

दुनिया में प्रेम की तरह भूख भी एक ऐसी जुबान है जिसे किसी को भी सीखना या सिखाना नहीं पढता. इसके साथ ही इसकी एक और खासिअत यह भी है कि यह जाति पाति उंच नीच और रंग नसल भेद को भी मिटा देती है. जैसे नींद आने पर बिस्तर नहीं देखा जाता कि वह कैसा है उसी तरह भूख लगने पर इस बात को नहीं देखा जाता कि भोजन कैसा है, कहां है, उसके साथ क्या है...? इसी तरह की एक हालत उन सैनिक अधिकारिओं की भी हुई जो अफगानिस्तान के एक विशेष टूर पर थे. अमरीकी सेना के एक जनरल David Petraeus ने इंटरनैशनल स्किओरिटी फ़ोर्स के कमांडर पद पर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे  Stanley  McCrystal, रीजनल कमांड साऊथ के मेजर जनरल Nick कार्टर और अफगानिस्तान में अमरीकी राजदूत Karl Eikenberry भी इस मौके पर उनके साथ थे. जब भूख ने थोडा सताया तो उन्होंने वहीँ कंधार शहर के बाहरी क्षेत्र में बनी एक बेकरी के सामने अफगानी नवयुवकों के साथ मिलकर ब्रैड के साथ अपनी भूख मिटाई. गौरतलब है कि जनरल डेविड अमरीकी सेंट्रल कमेटी के कमांडर भी है.अप्रैल महीने के आखिरी शुक्रवार अर्थात 30 अप्रैल 2010 के दिन भूख मिटाने के इन पलों को अमेरिकी रक्षा विभाग के लिए कैमरे में कैद किया अमेरिकी सेना के Staff Sgt.Lorie Jewell  ने. --रैक्टर कथूरिया 

Saturday, September 06, 2008

एक सच जिंदगी के बारे में......




ओशो कहते हैं :

जिंदगी क्या है; इक पहेली है !

कभी दुश्मन;कभी सहेली है !
छू के देखा तो महफिले यारां ;
अपनी अपनी जगह अकेली हैं !


बहुत ही सीधे और सादे से शब्दों में ब्यान किये गए इस सच को मैंने जिंदगी में कदम कदम पर सच होते देखा. इस करिश्मे को बहुत से लोगों ने देखा होगा पर दुःख है की लोग अभी भी, इस करिश्मे को देख कर भी उन लोगों ले पास चाकर काटते हैं जो थोड़ी सी मदारीगिरी दिखा कर लोगों का शोषण करते रहते हैं...