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Saturday, June 28, 2025

एक अधूरी आवाज़, एक ठहरी हुई चुप्पी

From Human Emotional State On Friday at 11:19 PM, 27th June, 2025, updated on 28th June, 2025 at 08:59 PM.

‘इंतज़ार में आ की मात्रा’ के आसपास की दुनिया


चंडीगढ़
: 27 जून, 2025 : (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन डेस्क):: 

प्रेम को धैर्य की दरकार होती है... !!! काफ़ी देर बाद जब एक सुन्दर किताब पढ़ी जाती है तो, .... तो उस धैर्य में लिपटे प्रेम की बात ही अलग होती है। तो, ऐसा कुछ नहीं है मेरे पास कहने के लिए, लेकिन इस विषय पर संवाद करने की ख़्वाहिश हरदम शिद्दत से कायम रहती है।  

इसी सिलसिले में, लगभग दो महीने पहले एक किताब मिली, और उसी दिन से उसे लेकर लिखने के बारे में सोच रही हूँ। लेकिन आज जा कर लिख पा रही हूँ। कई बार सोचा कि जब पूरी पढ़ लूँगी, तभी कुछ कहूँगी, तभी इसके बारे में लिखूंगी। मात्रा में 

लेकिन कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिन्हें चाहकर भी पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सकता। आख़िरी पन्ने तक पहुंचने के बाद भी आप फिर से किसी एक कविता, एक पंक्ति, या एक शब्द के पास वापिस लौट हैं, उसके साथ इस तरह जुड़ जायेंगे, जैसे कि वो आपके लिए ही लिखा गया हो।

किताबों से इतर ये किताब आपके मन से होते हुए, कब आपकी सोच और रूह तक पहुँच जाएगी, इसे वक़्त की भाषा में समझा पाना मुश्किल है। शायद पलक झपकने से भी कम समय में यह आपके दिल पर एक छाप छोड़ जाएगी। 


'इंतज़ार में आ की मात्रा’ — नवीन रांगियाल जी का कविता संग्रह, जिसमें लगभग 170 कविताएँ हैं —
इन्हें पढ़ने के बाद आप वैसे नहीं रहते जैसे पहले थे।
एक नई-सी महसूस करने की ऊर्जा जैसे भीतर बहने लगती है।
बिना किसी हड़बड़ी के। बिना किसी जल्दबाज़ी के।

हर शब्द में एक सहजता है। एक सरलता है।
जैसे-जैसे आप पन्नों पर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे कभी लौट कर पिछले पन्ने भी टटोलने लगते हैं।
क्योंकि वहाँ कुछ छूटा हुआ सा लगता है — और वही “छूटा हुआ” सबसे ज़्यादा अपना लगता है।

कभी लगता था, कि मन भावनाओं का ज़ाल है। जिसके तले सारा ब्रह्माण्ड समा सकता है, और शायद शब्द इस भावनाओं को बताने और जताने के रास्ते कम, पर बोझ ज़्यादा लगते हैं। 
वैसे ही जैसे, जब आपके पास बहुत कुछ होता है कहने के लिए, पर बताना नहीं आता। जाहिर करना नहीं आता। 

पर अगर शब्द इन कविताओं जितने ही सरल और सहज होते हुए, एक असीम और गहरा अर्थ छुपाये हुए हों, तो उन्हें बयां किया जा सकता है। 

खैर, 'इंतज़ार में आ की मात्रा' - कविताओं का ये संग्रह आपको भावनाओं के हर क्षितिज पर लेकर जायेगा। नवीन जी पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया, लोकमत, वेबदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ जुड़ चुके हैं।
इन प्रोफ़ेशनल परिचयों से इतर — वे कमाल के कवि और लेखक हैं।

मुझे नहीं पता कविताओं ने उन्हें ढूँढा या उन्होंने कविताओं को, पर उनके द्वारा लिखी हर कविता, हर प्रोज, हर शब्द आत्मीयता की गंध समाये हुए हैं। जैसे कि वो लिखते हैं —

"ये दुनिया तब तक चलती रहेगी, जब तक हम एक-दूसरे से मिलने जाते रहेंगे।"

और उस कविता में:

दुनिया में सबकुछ सही चल रहा है
जहां कहना था, वहां चुप्पियां रख दी गईं
जहां रोकना था, वहां जाने दिया
हर जगह सही बात कही और सुनी गई
सभी ने अपने लिए सबसे सही को चुना
सबकुछ सही तरीके से रखा गया
कहीं भी कोई गलती नहीं की गई
नतीजतन, सारे हाथ गलत हाथों में थे
सारे पांव गलत दिशाओं में चले गए
दुनिया में सारे फैसले सही थे 
इसलिए सारे सफ़र ग़लत हो गए।

जिंदगी और नौकरी की दुश्वारियों में -- कला का सृजन बेहद अद्भुत है। इस अनुभूति की अभिव्यक्ति करना ही जैसे नविन का मुख्य पेशा हो। वो दिल के ज़ज़्बातों को इतनी सरलता से आपके सामने रख देते हैं, जैसे कि वो शब्द आपके लिए ही लिखे गए हों। और लगता है, यही नवीन जी का असली पेशा है —

जो तुम्हारे लिए नहीं लिखा गया,
उसमें भी उपस्थित हो
और अदृश्य की तरह
मौजूद हो तुम
हर तरफ़
दूरी में बहुत दूर जैसे
ज़िंदगी में "न" की बिंदी
इश्क़ का आधा "श"
और इंतज़ार में "आ" की मात्रा की तरह। 

प्रेम और संवेदनाओं से आगे बढ़कर, वे आज के हालात के बारे में भी बखूबी लिखते हैं। 

सबसे पहने जबान काटी जाती है 
सबसे पहले रीढ़ तोड़ी जाती है 
फिर चाहे वो किसी आदमी की हो 
या हाथरस की किसी लड़की की हो 

और जब वह लिखते हैं —
"एक पंक्ति की प्रतीक्षा के लिए लंबे समय तक जिया जा सकता है,
एक पूरी रात काटी जा सकती है।
दो वाक्यों के बीच के कुछ भी न होकर एक आसान ज़िंदगी चुनी जा सकती है।"
तो दो अक्षरों और दो वाक्यों के बीच में रहना,
मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। वे दो वाक्यों के बीच की 'ख़ामोशी' को भी कविता बना देते हैं।
उस खालीपन को जी लेना — शायद वही सबसे बड़ी कविता है।

आप इस किताब को Amazon, गूगल बुक्स या सेतु प्रकाशन के वेबपोर्टल से ऑनलाइन आर्डर कर सकते हैं। 
अगर आप साहित्य, शब्दों और ख़ास तौर पर कविताओं से प्रेम करते हैं तो इसे पढ़िए ज़रूर। 
उनकी दूसरी किताब भी जल्द ही आ रही है। 
आशा है, कि पत्रकार होते हुए, कवितायेँ ऐसे ही उनकी ज़िन्दगी में ख़बरों को ओवरटेक करती रहें।

Thursday, November 14, 2019

नोटबंदी,कश्मीर और गौरी लंकेश पर भी हुए कविता में इशारे

कविता पहुंची कालेजों तक:GCG  में हुआ विशेष आयोजन
लुधियाना: 14 नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
युग बदले तो वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया। रीति रिवाज तक बदलते देखे गए। लोगों ने अपने धर्म बदल लिए, मज़हब बदल लिए, ईमान बदल लिए। इस सब कुछ के बावजूद एक शायर ही बाकी बचा था वह भी बदल गया लेकिन फिर भी कुछ कलमकार थे जो नहीं बदले। उनकी कविता न खरीदी जा सकी और न ही किसी अंकुश से दबायी जा सकी।   
ऐसे में एक साज़िश हुई और ऐसी कविता को बंधक बना लिया गया। उनकी कविता को वर्ग विशेष से सबंधित लोगों ने अपने अपने गट से सबंधित विशेष हाल कमरों तक महदूद कर लिया। बस उनकी कविता वहीँ तक गूंजती। उसका लोगों से मिलना जुलना बंद हो गया। बंधक वर्ग से जाने अनजाने में जुड़े लोग आते, अपनी रचना सुनाते और जब दुसरे की बारी आती तो बाहर चले जाते या सो जाते। 
कविता दम तोड़ने लगी थी। किसी नई कविता का जन्म भी होता तो आम लोगों को इसका पता ही न चलता। ऐसे में आगे आए कुछ शिक्षण संस्थान।  सहयोग दिया पंजाब कला परिषद जैसे संस्थानों ने। कविता उन वर्ग विशेष के बड़े बड़े हाल कमरों से निकल कर कालेजों में आने लगी जहाँ उसे नयी पीढ़ी के लोग मिले। शायरी में ये लोग कच्चे हो सकते हैं लेकिन तिकड़मों से कोसों दूर थे। इन्होने ने भी जानेमाने शायरों को नज़दीक से देखा। नज़दीक से उनका कलाम सुना। उनके साथ चाय पी खाना खाया और उन्हें अपने नज़दीक महसूस किया।  
यह सब हमारी टीम ने देखा लुधियाना में लड़कियों के सरकारी कालेज में जिसे ज़्यादातर लोग जीसीजी के नाम से जानते हैं। इसी तरह के आयोजन सतीश चंद्र धवन राजकीय कालेज लुधियाना और जीजीएन खालसा कालेज लुधियाना जैसे संस्थानों में भी देखने को मिले। 
दिन था 14 नवंबर 2019 का। समय रहा होगा कोई सुबह 11 बजे। पंजाब कला परिषद के महासचिव डाक्टर लखविंदर जौहल किसी वजह से नहीं आ पाए। उनकी गैरमौजूदगी खटकती भी रही। हाल में औपचारिक सम्मान के बाद मंच पर सुशोभित हो चुके थे शिमला से आये जनाब कुमार कृष्ण जो हिंदी के बहुत अच्छे शायर हैं, लुधियाना से पंजाबी में बहुत गहरी बात करने वाले जनाब जसवंत सिंह ज़फ़र, चित्रों और शब्दों का जादू भरा सुमेल करने की  वाले जनाव स्वर्णजीत सवी, जनता और जनचेतना से जुड़े हुए हिंदी के शायर डा. राकेश कुमार और पंजाबी की शायरा मोहतरमा जसलीन कौर। 
कुमार कृष्ण साहिब ने जहाँ अपनी गुल्ल्क की लूट पर कविता पढ़ते हुए नोटबंदी पर अपना निशाना साधा वहीँ चींटियों और उनके सतत संघर्ष की चर्चा भी बहुत गहरे अर्थों में की। डाक्टर राकेश ने कश्मीर में फौजी वर्दी और बूटों के आतंक की चर्चा बहुत सादगी और खूबसूरती से की। जनाब जसवंत ज़फ़र साहिब ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि जो मां की गालियां देता है, जो बहन की गालियां देता है उसे कोख में होती हत्यायों पर कविता लिखने का कोई अधिकार नहीं। मंच संचालन कार्तिका सिंह ने बहुत खूबसूरती से निभाया। इसके साथ ही उसकी गौरी लंकेश पर पढ़ी कविता भी छायी रही। 
--(पंजाब स्क्रीन टीम में इस कवरेज पर थे-एम एस भाटिया//प्रदीप शर्मा //रेक्टर कथूरिया)

Thursday, March 07, 2019

मैं गौरी की बात करुँगी-कार्तिका सिंह

मैं हर छल की बात करूंगी

मंच संचालक कहते हैं कि 
यह बोलो 
पर यह न बोलो। 
देश संचालक भी कहते हैं 
यह बोलो और यह न बोलो। 
ठेकेदार समाजों के भी 
ठेकेदार रिवाजों के भी 
अक्सर मुझको यह समझाते 
यह बोलो और यह न बोलो। 
छोटी सी कोई ग़ज़ल सुना दो;
लेकिन दिल की बात न खोलो। 
तस्लीमा नसरीन से पूछा 
तुमने कैसे मन की कर ली?
तुमने कैसे मन की सुन ली?
तुमने कैसे मन की कह ली?
वह बोली हिम्मत थी मेरी 
वह बोली जुर्रत थी मेरी। 
सच देखा तो कहना चाहा। 
मन में एक तूफ़ान उठा था;
बाकी कुछ फिर टिक न पाया। 
जो सोचा वह कह ही डाला। 
लेकिन अभी भी भुगत रही हूँ। 
पल पल हर पल खौफ का साया। 
पल पल हर पल खौफ का साया;  
लगातार है पीछा करता। 
आगे बढ़ना भी मुश्किल था;
लेकिन पीछे मुड़ नहीं सकती। 
सच कहने में मज़ा बड़ा है;
झूठ से अब मैं जुड़ नहीं सकती। 
मेरी भी तक़दीर है गोली,
मेरी भी हत्या ही होगी!
लेकिन बर्बर मौत के डर से
सच का जीवन खो नहीं सकती। 
चैन का जो अहसास मिला है;
उस अहसास को खो नहीं सकती। 
फिर गौरी लंकेश से पूछा 
तुमने क्यों कर जान गंवायी!
वह बोली यह जान क्या है!
जीवन की औकात क्या है!
बस इक सांस का खेल है सारा;
इन सांसों की बात क्या है?
इन सांसों के चलते चलते 
सच को हम न देख सके तो!
सच को हम ने बोल सके तो 
फिर जीवन बेकार ही होगा!
इक बेजान सा तार ही होगा!
ऐसा जीवन क्या करना है?
इससे अच्छा तो मरना है!
मुझको तो रफ्तार पसंद थी 
सच की वह इक धार पसंद थी।
हाँ मुझको तलवार पसंद थी; 
लेकिन कलम ने यह समझाया!
शब्दों में भी जान बहुत है। 
जो तलवार भी कर नहीं सकती 
इन शब्दों में धार बहुत है। 
जिस दिन सच का परचम पकड़ा;
मेरी जान हथेली पर थी। 
मालूम था अंजाम यह मुझको!
लेकिन आँख हवेली पर थी। 

पूंजीवाद की वही हवेली 
जिस में कैद सहेली मेरी। 
वही सहेली-एक पहेली 
इस दुनिया का राज़ कहेगी। 
कदम कदम पर  जो साज़िश है-
उस का पर्दाफाश करेगी।  
इस दुनिया की हर इक औरत 
जिसपे अत्याचार हुआ है 
शब्दों से खिलवाड़ हुआ है 
वह औरत मुझसे कहती है-
तू  तो मेरा हाल बता दे। 
जो जो मेरे साथ हुआ है;
दुनिया को हर बात बता दे। 
कलम को पकड़ा है तुमने तो 
शब्दों से इक आग लगा दे। 
अब गौरी लंकेश की मानूं?
या मानूं तुम लोगों की मैं?
अब गौरी लंकेश है मुझमे 
अब मैं भी वह बात करूंगी। 
जिस जिस ने भी इस जनता को 
छलने का प्रयास किया है। 
मैं उस छल की बात करूंगी। 
मैं गौरी की बात करुँगी। 
मैं गौरी की बात करुँगी।   
                          -कार्तिका सिंह
29 जनवरी 2019 को सुबह सुबह 3:45 लिखी 

Wednesday, March 23, 2016

"माल्या बन और भाग जा"

साहित्य में दर्ज हो रही है समय की चाल और चालें 
सत्ता दल या विपक्षी दल चाहे या न चाहे घटना का साहित्य पर प्रभाव अवश्य पड़ता है। सोशल मीडिया पर एक रचना नज़र आई है जिसे पोस्ट किया नूतन जी ने पर पता करने पर उन्होंने भी बताया की  किसकी है पर घूम रही है---लीजिये आप भी पढ़ कर देखिये।
कक्षा १-  हिंदी 
पाठ - १ " माल्या बन "

विजय उठ
माल्या बन
बैंक जा
लोन ले
दारू पी
पार्टी कर
नेता बुला
अभिनेता बुला
पैसे उड़ा
फिर बैंक जा
और लोन ले
फिर भाग जा ।

Saturday, September 05, 2015

गुरु बिना ज्ञान न होत है//जसप्रीत कौर " फ़लक "

 हमारे आचार्य, गुरु, अध्यापक दीपक की तरह जल कर हमारा जीवन रौशन और उज्ज्वल कर देते हैं।
जसप्रीत कौर फलक बहुत ही अच्छी शायरा हैं। उर्दू, हिंदी और पंजाबी के रंगों का सुमेल करके जब वह अपने अलग से अंदाज़ में आशयर कहती हैं तो हाल उनकी शायरी में मग्न हो जाता है। शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्होंने अपने उस गुरु, उस अध्यापक को याद किया है जिस ने उन्हें बनाने में अपनी ज़िंदगी लगा दी।  आज के कारोबारी युग में लोगों को वही शिक्षक याद आ पाते हैं जिन्होंने शिक्षा को कभी व्यापार कभी नहीं समझा था। प्रस्तुत हैं फलक जी की कुछ पंक्तियाँ। 
           -रेक्टर कथूरिया 
जसप्रीत कौर फलक कहती हैं:-
हे गुरु, अध्यापक,शिक्षक,आचार्य आपको प्रणाम। 

आज पाँच सितम्बर हैं यानि शिक्षक दिवस। 

आज हम सभी ऊन अध्यापकों, गुरुओं और शिक्षकों को बधाईयां देते हैं।  

याद करते हैं जिन्होने हमारे जीवन दर्शन में कहीँ न कहीँ हमें गहरी तरह प्रभावित किया है। 

गुरु को ईशवर से अधिक महत्व प्राप्त है। 

आज शिक्षक दिवस के मौके पर अपने बचपन से लेकर आज तक के सफ़र पर नज़र डालूं तो उस पावन नाते को मैं किसी न किसी रूप में स्वीकार कर लेती हूँ। जहाँ कभी माता-पिता ,भाई-बहन,अध्यापक, दोस्त,कभी पति तो कभी बच्चे गुरु बनकर मेरे सम्मुख खड़े होते है और कॊई न कॊई सीख मुझे उनसे प्राप्त हो जाती है।  हमारे आचार्य, गुरु, अध्यापक दीपक की तरह जल कर हमारा जीवन रौशन और उज्ज्वल कर देते हैं। किसी ने ठीक कहा है - गुरु बिना ज्ञान न होत है। 

         जसप्रीत कौर " फ़लक " 
                        लुधियाना.


Wednesday, March 18, 2015

साहित्य चर्चा//डॉ॰विमला भण्डारी का काव्य-संसार//दिनेश कुमार माली

 Wed, Mar 18, 2015 at 9:54 AM  
विकराल हकीकतों की चर्चा के साथ साथ आशा  जगाती कविता 
दिनेश कुमार माली
डॉ॰विमला भण्डारी
`भले ही,डॉ॰ विमला भण्डारी का नाम हिंदी साहित्य जगत में एक प्रसिद्ध कथाकार,बाल-साहित्यकार, इतिहासज्ञ और राजस्थान की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था सलिला के संस्थापक के रूप में जाना जाता है, मगर उनकी कलम कविताओं के क्षेत्र में भी खूब चली है। “डॉ॰ विमला भण्डारी की रचना-धर्मिता” विषय पर एक मौलिक स्वतंत्र आलेख लिखने की परिकल्पना करते समय मुझमें उनके लेखन की हर विधा को पढ़ने,जानने और सीखने की तीव्र उत्कंठा पैदा हुई,जिसमें कविताएं भी एक हिस्सा थी। इसी संदर्भ में मुझे हरवंश राय बच्चनजी का एक कथन याद गया कि ईश्वर को जानने के लिए किसी साधना की आवश्यकता होती है, मगर यह भी सत्य है कि किसी इंसान के बाहरी और आंतरिक व्यक्तित्वों को जानना किसी साधना से कम नहीं होता है। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत था,इस प्रगल्भ साधना  हेतु  मैंने विमलाजी के व्यक्तित्व का चयन किया और इस कार्य के निष्पादन हेतु कुछ ही महीनों में मैंने उनका समूचा बाल-साहित्य,कविताएं,शोध-पत्र,नाटक और इतिहास संबन्धित पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। मगर कविताएं? कविताएं अभी तक अछूती थी। एक बड़े साहित्यकार के भीतर कवि-  हृदय की तलाश करने के लिए मैंने उनकी कविताओं को खँगालने का प्रयास किया। मेरे इस बारे में आग्रह करने पर उन्होंने अपनी कम से कम पचास से ज्यादा प्रकाशित और अप्रकाशित कविताओं की हस्तलिखित पाण्डुलिपि पढ़ने के लिए मुझे दी। पता नहीं क्यों,पढ़ते समय मुझे इस चीज का अहसास होने लगा,हो न हो, उनकी साहित्य यात्रा का शुभारंभ शब्दों के साथ साँप-सीढी अथवा आँख-मिचौनी जैसे खेल खेलते हुए कविताओं से हुआ होगा,अन्यथा उनके काव्य-सृजन-संसार में विषयों की इतनी विविधता,मनुष्य के छुपे अंतस में झाँकने के साथ-साथ इतिहास के अतीतावलोकन के गौरवशाली पृष्ठ सजीव होते हुए प्रतीत नहीं होते। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, शायद उनकी प्रखर विस्तारित लेखन-विधा मेरे पाठक मन पर हावी हुए जा रही थी। मेरे मानस-पटल पर कभी ‘सलूम्बर का इतिहास’, कभी माँ,तुझे सलाम’ में हाड़ी रानी का चिरस्मरणीय बलिदान, कभी बाल-साहित्य तो कभी “थोड़ी-सी जगह” जैसे कहानी-संग्रह के पात्र अपने-अपने कथानकों की पृष्ठभूमि में अपनी सशक्त भूमिका अदा करते हुए उभरने लग रहे थे। इसलिए मेरे यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ॰ विमला भण्डारी खुली आँखों से संवेदनशील मन और सक्रिय कलम की मालकिन है। दूसरे शब्दों में,वह मर्म-संवेदना से कहानीकार,दृष्टि से इतिहासकार,मन से बाल-साहित्यकार और कर्म से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं,यह बात उनकी थोड़ी-सी कविताएं और कहानियाँ पढ़ने से उजागर हो जाती है। उनकी कविताओं व अन्य साहित्यिक रचनाओं से गुजरते हुए मैंने पाया कि हर युवा कवि व साहित्यकार की भांति अतीत के प्रति मोह,वर्तमान से असंतोष और भविष्य के लिए एक स्वप्न है। हर युवा की भांति प्राकृतिक और मानवीय दोनों तरह के सौन्दर्य की तरफ वह आकृष्ट होती है। रूढ़िओं को तोड़ने का उत्साह उनमें लबालब भरा है। प्रगतिवाद का प्रभाव उनके सृजन में स्पष्टतः परिलिक्षित होता है। हिन्दी कविता की शब्दावली और बनावट इस बात की पुष्टि करती है। कुछ उदाहरण :-
1-  गिरते सामाजिक मूल्यों को दर्शाती पंक्तियाँ कविता “बूढ़ा जाते हैं माँ-बाप” से :-
धीरे-धीरे उनमें चढ़ने लगती है
स्वार्थों की फूफंद
बरगद-सी बाहें फैलाए
आकाशीय जड़े महत्वाकांक्षा की
तोड़ लेती है
सारे सरोकार और
क्षणांश में
बूढ़ा जाते हैं माँ बाप।

इस तरह, दूसरी कविता ‘विश्व सौंदर्य लिप्सा में’ कवयित्री बदलते परिवेश पर भारत के इंडिया बन जाने पर अफसोस व्यक्त करती है। सन 1955 तक स्त्रियाँ घूंघटों में ढकी रहती थी, मगर चालीस साल के लंबे सफर अर्थात निन्यानवे के आते-आते सब-कुछ विश्व सौंदर्य लिप्सा में उघड़ा हुआ नजर आने लगता है। कविता में लोकोक्ति ‘नाक की डांडी’ अद्भुत सौंदर्य पैदा कर रही है। सत्ता और पूंजी के देशी-विदेशी गठबंधन ने मध्यवर्गीय इच्छाओं को कुलीनवर्गीय संस्कृति से जोड़ दिया है।

2॰ नारी शिक्षा के प्रति आज भी राजस्थान के ग्रामीण परिवारों में अजागरूकता को लेकर उनकी कविता ‘वो लड़कियां’-जिन्हें शिक्षा लाभ लेना चाहिए/वे आज भी ढ़ोर डंगर हाँकती है/ जंगलों में लकड़ियाँ बीनती हैं/सूखे कंडे ढोती हैं/बर्तन माँजती हैं/ झाड़ू–पोछा करती हैं/पत्थर काटती हैं/अक्षय तृतीय पर ब्याह दी जाती हैं/वे स्कूल जा पाएगी कभी ?

किशोरी कोख से
किल्लोलती
जनमती है फिर
वो लड़कियां
जिन्हें जाना चाहिए था स्कूल
किन्तु कभी नहीं
जा पाएगी वो स्कूल

इसी तरह,उनकी दूसरी कविता ‘लड़कियां’ में हमारे समाज में लड़कियों पर थोपे जा रहे प्रतिबंधों, अनुशासन में रहने के निर्देशों तथा अपने रिश्तेदारों के आदेशों के अनुपालन करते-करते निढाल होने के बावजूद उन्हें पोर-पोर तक दिए जाने वाले दुखों के भोगे जाने का यथार्थ चित्रण किया गया है।यथा:-

खुली खिड़की से
झांकना मना
घर की दहलीज
बिना इजाजत के
लांघना है मना
अपने ही घर की छतपर
अकेले घूमना मना

 
इन दृश्यों की मार्मिकता इनके विलक्षण होने में नहीं है। ये दृश्य इतने आम हैं कि कविता में दिखने पर साधारणीकृत हो जाते हैं। इनका मर्म उनकी करुणा में है। कहा जा सकता है कि कवयित्री के मार्मिक चित्र स्त्री-बिंम्बो से संबंधित है। यही उनकी निजता का साँचा है जिसमें ढलकर बाह्य वास्तविकता कविता का रूप लेती है। उनके मार्मिक-करुण चित्रों के साथ उनकी कविता की शांत-मंथर-लय और अंतरंग-आत्मीय गूंज का अटूट रिश्ता है।उनमें स्त्री-अस्तित्व की चेतना है और अपने संसार के प्रति जागरूकता भी है। अलग-अलग जीवन-दृश्य मिलकर उनकी कविता को एक बड़ा परिदृश्य बनाते हैं।

कवयित्री का एक दूसरा पक्ष भी है आशावादिता का।‘तुम निस्तेज न होना कभी’ कविता में कवयित्री के आशावादिता के स्वर मुखरित हो रहे हैं कि निराशा के अंधकार में रोशनी हेतु सूरज आने की बिना आशा किए दीपक का प्रयोग भी पर्याप्त है।‘आदमी की औकात’ कविता में सपनों के घरौंदे और रेत के महलों जैसे प्रतीकों में समानता दर्शाते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव,सुख-दुख में यथार्थ धरातल पर उनके संघर्ष को पाठकों के सम्मुख रखने का प्रयास किया है। ‘प्यार’ कविता में प्रेम जैसी संवेदनशील अनुभूति के समझ में आने से पूर्व ही उसके बिखर जाने की मार्मिक व्यथा और वेदना का परिचय मिलता है। ठीक इसी तरह,‘दरकते पल’ कविताओं में उन स्मृतियों की धुंध को ‘राख़ के नीचे दबी चिंगारी’,‘पीले पत्ते’,‘झड़ते फूल’,‘उघाड़ते पद-चिन्ह’ जैसे बिंबो का उदाहरण देकर कवयित्री ने न केवल अपने अंतकरण की सुंदरता, बल्कि पृथिवी की नैसर्गिक सुंदरता के नजदीक होने का अहसास भी कराया है।‘दो बातें प्रेम की’ कविता में अपनेपन की इबादतें सीखने का आग्रह किया गया है।‘एक सूखा गुलाब’ में कवयित्री ने पुरानी किताब और नई किताब को प्रतीक  बनाकर अपनी  भूली-बिसरी यादों को ताजा करते  हुए वेलेंटाइन-दिन के समय पुरानी किताब के भीतर रखे गुलाब के सूख जाने जैसी मार्मिक यथार्थ अनुभूतियों को उजागर करने का सशक्त प्रयास किया है। ‘लाड़ली बिटिया’ कविता में कवयित्री ने अपनी बेटी के जन्म-दिन पर खुशिया मनाने के बहाने अपने आत्मीय प्रेम या वात्सल्य का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। बेटी का  चेहरा,उसकी आवाज,उसकी आँखें,उसके बाल, सभी अंगों में प्यार को अनुभव करते हुए उसे अपने जीवन का सहारा बना लिया है। ऐसे ही उनकी दूसरी कविता ‘अब के बरस’ भी बेटी के जन्मदिन के उपलक्ष में है। इन कविताओं को पढ़ते समय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराली’ की अपनी पुत्री की स्मृति में लिखी कविता ‘सरोज-स्मृति’ याद आ गई है। चाहे कवि हो या कवयित्री, चाहे पुरुष हो या नारी दोनों का बेटियों के प्रति एक विचित्र वात्सल्य,अपनापन,स्नेह व सहानुभूति होती है। इसी तरह ‘कहां खो गए’ कविता में बेटी बनकर अपने माँ के एकाकीपन व निसंगता को अनुभव करती कवयित्री आधुनिक समाज की हकीकत से सामना करवाती है कि माँ के नंदलाल, झूलेलाल, बाबूलाल आदि संबोधनों वाले बेटे अब सामाजिक स्वार्थ और लिप्सा में विलुप्त हो गए है। इसलिए माँ आज अकेली है। नितांत अकेली।

“तदनुरूप” कविता में कवयित्री डॉ॰ विमला भंडारी के दार्शनिक स्वर मुखरित होते हैं कि जब आदमी अपने जड़े खोजने के लिए अतीतावलोकन करने लगता है, तो वहाँ मिलता है उसे केवल घुप्प अंधेरा,स्मृतियों के अनगिनत श्वेत-श्याम, धवल-धूसर चलचित्र और सन्नाटे में किसी एक सुरंग से दूसरी सुरंग में कूच करता अक्लांत अनवरत दौड़ता,अकुलाता अगड़ाई लेता घुड़सवार। इसी तरह उनकी ‘याद’ कविता में यादों को ‘रोटी’को माध्यम बनाकर रूखा सूखा खाकर जीवन बिताने का साधन बताया है। ‘अंधेरे और उजालों के बीच’ और ‘चंचल मन’ कविताओं में कवयित्री की दार्शनिकता की झलक स्पष्ट दिखाई देती हैं।

 ‘तेजाबी प्यार’ कविता में आधुनिक भटके हुए नवयुवकों के एक तरफा प्यार के कारण अपनी प्रेमिकाओं के चेहरे पर एसिड डालने और उनके रास्ते में आ रही रुकावटों के ज़िम्मेवार लोगों की हत्या तक कर डालने का मर्मांतक वर्णन किया हैं। इस तरह ‘रिंगटोन’ कविता में दहेज के दरिंदों द्वारा बेटी को घोर-यातना देने का मार्मिक विवेचन है, इस कविता में कवयित्री कि नारीवादिता के स्वर मुखरित होते हैं।
जैसे :-

बेटी का फोन था
‘मुझे बचा लो माँ’ का रिंगटोन था
कल फिर उन्होंने
मुझे मारा और दुत्कारा
तुम औरत हो
तुम्हारी औकात है ?


कोई अच्छी कविता अज्ञात दृश्यों की खोज नहीं करती। वह ज्ञात स्थितियों के अज्ञात मर्म उजागर करती है। उसमें चित्रित दृश्यों को हम जीवन में साक्षात देखते हैं। फर्क यह होता है कि कविता में देखने के बाद उन जीवन दृश्यों को हम नई दृष्टि से देखने लगते है। बच्चा गोद में लेकर ‘बस में चढ़ती’ रघुवीर सहाय की  स्त्री हो या ‘छाती से सब्जी का थैला सटाए बिना धक्का खाए’ संतुलन बनाकर बस पकडनेवाली अनूप सेठी की ‘एक साथ कई स्त्रियाँ’ हों, वे रोज़मर्रा के ऐसे अनुभव हैं जिनके प्रति कविता हमें एकाएक सजग कर देती हैं।

 ‘खबर का असर’ कविता में कवयित्री आए दिन अखबारों में सामूहिक बलात्कार की खबरें पढ़कर इतना भयभीत हो उठती है कि कब, किस वक्त, कहां, कैसे ये घटनाएँ घटित हो जाएगी,सोचकर उसका दिल दहल जाता है। इस कविता की कुछ पंक्तियाँ ;-

स्त्री जात को नहीं रहा
किसी पर अब ऐतबार
प्यार,गली,मोहल्ले
दोस्त,चाँद और छतें
फिल्म,जुल्फ,रूठने
पायल की रुनझुन
इशारों में इशारों की बातें
सब वीरान हो गई
जबसे नई दिल्ली में
और दिल्ली जैसी
कई वारदातें
किस्सा-ए-आम हो गई

अनामिका ने अपनी पुस्तक “स्त्रीत्व का मानचित्र” में एक जगह लिखा है:-
“अंतर्जगत और बहिर्जगत के द्वन्द्वों और तनावों के सही आकलन की यह सम्यक दृष्टि जितनी पुरुषों के लिए जरूरी है,उतनी ही स्त्रियों के लिए भी। पर स्त्रियों का,खास कर तीसरी दुनिया की हम स्त्रियों का,बहिर्जगत अंतर्जगत पर इतना हावी है कि, कई बार हमें सुध भी नहीं आती,चेतना भी नहीं होती, कि हमारा कोई अंतर्जगत भी है और उसका होना महत्वपूर्ण है।”

विमलाजी की ‘’जिंदगी यहां’ कविता में ऐसे ही स्वरों की पुनरावृत्ति होती है :-

माँ, बहिन, बेटी,बीवी नहीं
सिर्फ औरत बनकर
बिस्तर की सलवटें बनती है जिंदगी यहां
 
जबकि ‘मैं हूँ एक स्त्री’ कविता में जमाने के अनुरूप नारी-सशक्तिकरण का आव्हान किया है, जो रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘अबला हाय! यही तेरी कहानी, आँचल में दुख और आँखों में पानी’ की रचना-प्रक्रिया के समय का उल्लंघन करती हुई अपने शक्तिशाली होने का परिचय देती है :-

“मैं कोई बुत नहीं जो गिर जाऊंगी
हाड़ मांस से बना जीवित पिंजर हूँ
कमनीय स्त्री देह हूँ तो क्या हुआ ?
मोड दी मैंने समय की सब धाराएँ”


किसी उपकरण को कलात्मक मानना और कि
सी को न मानना एक भाववादी तरीका है। भले ही कलावाद के नाम पर हो या जनवाद के नाम पर। कवयित्री के प्रयोगों से स्पष्ट है कि न कोई विवरण अकाव्यात्मक होता है,न बिंब,प्रतीक,सपाटबयानी,मिथक,उपमान,चरित्र वगैरह काव्यात्मक होते हैं। यह सभी कविता के उपकरण है। उपकरणों को कविता बनाती है संवेदना। वही विभिन्न उपकरणों में संबंध, संगीत और सार्थकता लाती है।

“कब तक ?” कविता में ‘बाय-पास”,”एरो’,’स्टॉप’,’फोरलेन’,’बैरियर’तथा ‘टोलनाका’ आदि शब्दों के माध्यम से कवयित्री ने समाज के समक्ष एक प्रश्न खड़ा किया है,आखिर कब तक अपनी मंजिल पाने के लिए एक औरत ‘टोलनाका’ चुकाती रहेगी?इसी तरह उनकी अन्य नारीवादी कविता ‘हरबार’ में ‘ऐसा क्यों होता है ,हरबार मुझे ही हारना होता है’ का प्रश्न उठाया है। जहां  ‘अहसास’ कविता अवसाद की याद दिलाती है, वहीं उनकी कविता ‘समय’ असीम संभावनाओं वाले नए सवेरे के आगमन, “मैं राधा-राधा’ कविता में पथिक से नए इतिहास के निर्माण का आव्हान तथा ‘विज्ञापनी धुएं के संग’ कविता संचार-क्रान्ति के प्रभाव से आधुनिक समाज के विज्ञापनों के प्रति बदलते रुख पर प्रहार है।

कवयित्री लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़ी हुई हैं और यौवनावस्था से ही सक्रिय राजनीति में हिस्सा ले रही हैं। उनकी प्रखर राजनैतिक चेतना लगातार उनके लेखन को तराश रही है और यही कारण है कि वह अपने राजनैतिक परिवेश से अभी भी पूरी तरह संपृक्त हैं। विमला भण्डारी की कविताएं यथार्थवादी है,सामाजिक दृश्यों से सीधा सरोकार रखने वाली। केदारनाथ सिंह सामाजिक दृश्यों का सामना नहीं करते,उनकी ओर पीठ करके उनका अनुभव करते हैं। इसलिए वे माध्यम संवेगों और अमूर्तताओं के कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। जबकि विमला भण्डारी सामाजिक दृश्यों का खुली आँख से सामना करती है,जिनके सारे दृश्य उनके निजी-आभ्यंतर के निर्मल साँचे में ढलकर आते हैं। जिस अर्थ में ‘व्यक्तिगत ही राजनीतिक’ होता है, उस अर्थ में विमलाजी  का काव्य-संसार ‘व्यक्तिगत ही सामाजिक’ है! यह एक संयोग नहीं,परिघटना है।  ‘जब भी बोल’ कविता में कवयित्री ने हर नागरिक से जनहित में बोलने का आग्रह किया है:- –

अरे! कुछ तो बोल
जब भी बोल
जनहित में बोल


‘जनहित’ का यहां उन्होंने व्यापक अर्थ समझाया है अर्थात किसानों, मजदूरों, अबलाओं, कृशकायों, भूखे-नंगों के हित में आवाज उठाने वाले मार्क्सदी स्वर इस कविता में साफ सुनाई पड़ते हैं। जनहित के लिए वह प्रेरणा देती है।यथा:-

देखना एक दिन
न पद होगा
न होगा राज
मन की मन में रह जाएगी
तब कौन करेगा काज
जब भी बोल
जनहित में बोल।


इसी शृंखला में ‘गांव में सरकार आई’ कविता में आधुनिक लोकतन्त्र व प्रशासन से गांवों में धीमी गति से चल रहे विकास-कार्यों पर दृष्टिपात करते हुए व्यंगात्मक तरीके ने करारी चोट की है। कुछ पंक्तियाँ देखिए :-

सब की सब
कह रही है
गांवों में सरकार आई है
पपडाएँ होंठ, धुंधली नजर
मुख अब अस्ताचल की ओर है
निगोड़ी सब निपटे तो मेरा नंबर आए
प्रशासन गांवों की ओर है


राजनीति आधुनिक जीवन-प्रक्रिया का ढांचा है। वह समाज से बाजार तक पूरे जीवन को नियंत्रित करती है। इसीलिए हर प्रकार का संघर्ष एक मोर्चा राजनीति है। समाज और बाजार के विरोधी खिंचाव में राजनीति निर्विकार नहीं करती। वह एक न एक ओर झुकती है। इसीलिए वह सत्ता को कायम रखने की विद्या है, उसे बदलने की विद्या भी है। हमारे समय की प्रभावशाली राजनीति बाजारवाद के अनुरूप ढल गई है।  जिस तरह डॉ॰ विमला भंडारी का कथा-संसार वैविध्यपूर्ण है, ठीक इसी तरह कविताओं को भी रचनाकार की कलम ने सीमित नहीं रखा है। सलूम्बर,नागौर,बूंदी,मेवाड़ आदि छोटे-बड़े ठिकानों,रियासतों के वीर राजपूतों द्वारा अपने आन-बान शान की रक्षा के लिए प्राणों को न्योछावर तक कर देने की गौरवशाली अतीत परंपरा को विमला जी ने अपनी रचनाओं का केंद्र बिन्दु बनाया। उनकी कविताओं ‘अंतराल’ और ‘अब शेष कहां?’ में अपने गांव के प्रति मोह तथा अतीत को याद करते हुए वह कहती है:-

किन्तु
जलाकर
खुद को
धुआं बनकर उड जाएँ
ऐसे बिरले
अब शेष कहां !


लेखिका की ख्याति पूरे देश में बाल साहित्यकार के तौर है। बाल साहित्य में विशेष योगदान के लिए उन्हे केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ, तब यह कैसे हो सकता है कि उनका कविता ससार भी बाल जगत से विछिन्न रह जाता। जीवन की विविध उलझनों,आजीविका के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों, जीवन की विविध व्यस्तताओं और पारिवारिक दायित्व-निर्वहन की आपाधापी के बीच भी विमला जी ने बाल-साहित्य पर लगातार लिखे हुए अपनी कलम की स्याही को सूखने से बचाया आज भी उनका रुझान बाल-साहित्य पर विशेष है। उनकी बाल-कविता जैसे ‘फोटू तुम्हारे’,‘मस्त है छोटू राम’,‘उफ! ये बच्चे’,‘माफ करो भाई’,‘घर धर्मशाला हो जाए’ ने हिंदी जगत में विशिष्ट ख्याति अर्जित की है। ‘इसी सदी का चाँद’ कविता में कवयित्री ने लिंग-भेद के कारण हो रहे भेदभाव, ‘सत्या’ कविता में गिरते सामाजिक मानदंडों पर करारा प्रहार करते हुए ‘यह सत्य भी क्या है?’ की कसौटी का आकलन, ‘हे गणतंत्र!’ में देश प्रेम के जज़्बात तथा मन की फुनगियों पर चिडिया बन आशाओं का संचार करने का अनुरोध है।

‘जलधारा’ कविता में किसी भी इंसान के इंद्रधनुषी जीवन-प्रवाह में नित नए आने वाले परिवर्तनों तथा उन्हें रोकने व बांधने के व्यर्थ प्रयासों का उल्लेख मिलता है। इन परिवर्तनों का आत्मसात करते हुए अनवरत आगे बढ़ते जाने का संदेश है, जबतक कि इस शरीर में प्राण न रहें। गीता के कर्मयोगी बनने के संदेश का आह्वान है इस कविता में।

यदि हम एक रचनाकार की बहुत सारी कहानियां और कविताएं एक साथ पढ़ते हैं तो उसकी मानसिक बनावट और उसके चिंतन,विचारधारा और रुझान का पता लग जाता है। उनका समग्र साहित्य पढ़ने के बाद कुछ बातें अवश्य उनके बारे में कहने कि स्थिति में स्वयं को पाता हूँ। पहला- विमलाजी अपने समाज के निचले व मध्यम वर्ग में गहरी रुचि लेती है। दूसरा – जहां भी शोषण होता है वह विचलित हो उठती है। तीसरा- एक नारी होने के कारण हमारे समाज में महिलाओं पर हो रही घरेलू हिंसा व यातनाओं  के कारणों का अच्छी तरह समझ सकती है। चार- समाज का लगभग हर तबका अपने से कमजोर तबके का शोषण करता है। पांचवा- इतना सब-कुछ होते हुए भी लेखिका/कवयित्री इस ज़िंदगी और समाज से पलायन करने  के पक्ष में नहीं है। उनकी दृष्टि आदर्शवादी है।

विमला भण्डारी के  काव्य संसार की झलक से हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जिस गहन चिंतन और नए प्रयोगों के साथ अपने अंतरंग-कोमल स्वर से बाल-साहित्य को समृद्ध किया हैं,उन्हीं स्वरों को मधुर संगीत देकर अपने काव्य-संसार को भी सुशोभित किया है।

Sunday, October 19, 2014

एक मध्यवर्गीय कुत्ता//हरिशंकर परसाई

An excellent satirical description of middle class by Hari Shankar Parsayi Posted by Dr. Lok Raj 
कुत्ते में और आदमी में यही मूल अंतर है
हरिशंकर परसाई 
मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, “इनके यहां कुत्ता तो नहीं है?“ मित्र ने कहा, “तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!” मैंने कहा, “आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता. उनसे निपट लेता हूं. पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूं.“
कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते. वहां जाओ तो मेजबान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है. अपने स्नेही से “नमस्ते“ हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- “क्यों यहां आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहां से !”

फिर कुत्ते का काटने का डर नहीं लगता- चार बार काट ले. डर लगता है उन चौदह बड़े इंजेक्शनों का जो डॉक्टर पेट में घुसेड़ता है. यूं कुछ आदमी कुत्ते से अधिक ज़हरीले होते हैं. एक परिचित को कुत्ते ने काट लिया था. मैंने कहा, ”इन्हें कुछ नहीं होगा. हालचाल उस कुत्ते का पूछो और इंजेक्शन उसे लगाओ.”
एक नये परिचित ने मुझे घर पर चाय के लिए बुलाया. मैं उनके बंगले पर पहुंचा तो फाटक पर तख्ती टंगी दीखी- ”कुत्ते से सावधान !” मैं फ़ौरन लौट गया.
कुछ दिनों बाद वे मिले तो शिकायत की, ”आप उस दिन चाय पीने नहीं आये.” मैंने कहा, “माफ़ करें. मैं बंगले तक गया था. वहां तख्ती लटकी थी- ‘कुत्ते से सावधान.‘ मेरा ख़्याल था, उस बंगले में आदमी रहते हैं. पर नेमप्लेट कुत्ते की टंगी हुई दीखी.“ यूं कोई-कोई आदमी कुत्ते से बदतर होता है. मार्क ट्वेन ने लिखा है- ‘यदि आप भूखे मरते कुत्ते को रोटी खिला दें, तो वह आपको नहीं काटेगा.‘ 
बंगले में हमारे स्नेही थे. हमें वहां तीन दिन ठहरना था. मेरे मित्र ने घण्टी बजायी तो जाली के अंदर से वही ”भौं-भौं” की आवाज़ आयी. मैं दो क़दम पीछे हट गया. हमारे मेजबान आये. कुत्ते को डांटा- ‘टाइगर, टाइगर!’ उनका मतलब था- ‘शेर, ये लोग कोई चोर-डाकू नहीं हैं. तू इतना वफ़ादार मत बन.‘
कुत्ता ज़ंजीर से बंधा था. उसने देख भी लिया था कि हमें उसके मालिक खुद भीतर ले जा रहे हैं पर वह भौंके जा रहा था. मैं उससे काफ़ी दूर से लगभग दौड़ता हुआ भीतर गया. मैं समझा, यह उच्चवर्गीय कुत्ता है. लगता ऐसा ही है. मैं उच्चवर्गीय का बड़ा अदब करता हूं. चाहे वह कुत्ता ही क्यों न हो. उस बंगले में मेरी अजब स्थिति थी. मैं हीनभावना से ग्रस्त था- इसी अहाते में एक उच्चवर्गीय कुत्ता और इसी में मैं! वह मुझे हिकारत की नज़र से देखता.
शाम को हम लोग लॉन में बैठे थे. नौकर कुत्ते को अहाते में घुमा रहा था. मैंने देखा, फाटक पर आकर दो ‘सड़किया‘ आवारा कुत्ते खड़े हो गए. वे सर्वहारा कुत्ते थे. वे इस कुत्ते को बड़े गौर से देखते. फिर यहां-वहां घूमकर लौट आते और इस कुत्ते को देखते रहते. पर यह बंगलेवाला उन पर भौंकता था. वे सहम जाते और यहां-वहां हो जाते. पर फिर आकर इस कु्ते को देखने लगते. मेजबान ने कहा, “यह हमेशा का सिलसिला है. जब भी यह अपना कुत्ता बाहर आता है, वे दोनों कुत्ते इसे देखते रहते हैं.“
मैंने कहा, “पर इसे उन पर भौंकना नहीं चाहिए. यह पट्टे और ज़ंजीरवाला है. सुविधाभोगी है. वे कुत्ते भुखमरे और आवारा हैं. इसकी और उनकी बराबरी नहीं है. फिर यह क्यों चुनौती देता है!”
रात को हम बाहर ही सोए. ज़ंजीर से बंधा कुत्ता भी पास ही अपने तखत पर सो रहा था. अब हुआ यह कि आसपास जब भी वे कुत्ते भौंकते, यह कुत्ता भी भौंकता. आखिर यह उनके साथ क्यों भौंकता है? यह तो उन पर भौंकता है. जब वे मोहल्ले में भौंकते हैं तो यह भी उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने लगता है, जैसे उन्हें आश्वासन देता हो कि मैं यहां हूं, तुम्हारे साथ हूं.
मुझे इसके वर्ग पर शक़ होने लगा है. यह उच्चवर्गीय कुत्ता नहीं है. मेरे पड़ोस में ही एक साहब के पास थे दो कुत्ते. उनका रोब ही निराला ! मैंने उन्हें कभी भौंकते नहीं सुना. आसपास के कुत्ते भौंकते रहते, पर वे ध्यान नहीं देते थे. लोग निकलते, पर वे झपटते भी नहीं थे. कभी मैंने उनकी एक धीमी गुर्राहट ही सुनी होगी. वे बैठे रहते या घूमते रहते. फाटक खुला होता, तो भी वे बाहर नहीं निकलते थे. बड़े रोबीले, अहंकारी और आत्मतुष्ट.
यह कुत्ता उन सर्वहारा कुत्तों पर भौंकता भी है और उनकी आवाज़ में आवाज़ भी मिलाता है. कहता है- ‘मैं तुममें शामिल हूं.‘ उच्चवर्गीय झूठा रोब भी और संकट के आभास पर सर्वहारा के साथ भी- यह चरित्र है इस कुत्ते का. यह मध्यवर्गीय चरित्र है. यह मध्यवर्गीय कुत्ता है. उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है. तीसरे दिन रात को हम लौटे तो देखा, कुत्ता त्रस्त पड़ा है. हमारी आहट पर वह भौंका नहीं,
थोड़ा-सा मरी आवाज़ में गुर्राया. आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं. थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया. मैंने मेजबान से कहा, “आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है.“
Dr. Lok Raj 
मेजबान ने बताया, “आज यह बुरी हालत में है. हुआ यह कि नौकर की गफ़लत के कारण यह फाटक से बाहर निकल गया. वे दोनों कुत्ते तो घात में थे ही. दोनों ने इसे घेर लिया. इसे रगेदा. दोनों इस पर चढ़ बैठे. इसे काटा. हालत ख़राब हो गयी. नौकर इसे बचाकर लाया. तभी से यह सुस्त पड़ा है और घाव सहला रहा है. डॉक्टर श्रीवास्तव से कल इसे इंजेक्शन दिलाउंगा.“
मैंने कुत्ते की तरफ़ देखा. दीन भाव से पड़ा था. मैंने अन्दाज़ लगाया. हुआ यों होगा-
यह अकड़ से फाटक के बाहर निकला होगा. उन कुत्तों पर भौंका होगा. उन कुत्तों ने कहा होगा- “अबे, अपना वर्ग नहीं पहचानता. ढोंग रचता है. ये पट्टा और ज़ंजीर लगाये हैं. मुफ़्त का खाता है. लॉन पर टहलता है. हमें ठसक दिखाता है. पर रात को जब किसी आसन्न संकट पर हम भौंकते हैं, तो तू भी हमारे साथ हो जाता है. संकट में हमारे साथ है, मगर यों हम पर भौंकेगा. हममें से है तो निकल बाहर. छोड़ यह पट्टा और ज़ंजीर. छोड़ यह आराम. घूरे पर पड़ा अन्न खा या चुराकर रोटी खा. धूल में लोट.“ यह फिर भौंका होगा. इस पर वे कुत्ते झपटे होंगे. यह कहकर- ‘अच्छा ढोंगी. दग़ाबाज़, अभी तेरे झूठे दर्प का अहंकार नष्ट किए देते हैं.‘
इसे रगेदा, पटका, काटा और धूल खिलायी.
कुत्ता चुपचाप पड़ा अपने सही वर्ग के बारे में चिन्तन कर रहा है.
(डाक्टर लोकराज की वाल से साभारजिन्होंने फेसबुक पर 18 अक्टूबर 2014 शनिवार को रात 11:36  पर पोस्ट किया।                          

Friday, October 03, 2014

जगदेव सिंह जस्सोवाल अमेरिका रवाना

पंजाबी सांस्कृति की मशाल लेकर सूरत सिंह खालसा भी साथ गए 
लुधियाना: 2 अक्टूबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कहते हैं अब कलियुग है। इसीलिए भाई भाई को नहीं पहचानता। दोस्त ही दोस्त की पीठ में छुरा घोंपता है पर सरदार जगदेव सिंह जस्सोवाल ने अपने मूक अंदाज़ से साबित किया कि दोस्ती आज भी ज़िंदा है। वह अपने ख़ास लेखक मित्र प्रोफेसर मोहन सिंह की याद  रख रहे हैं। जब श्री जस्सोवाल ने प्रोफेसर साहिब की याद में यह मेला शुरू तो उनके साथ बहुत ही कम लोग थे। जो थे उनमें से भी कई अपने सौरठों से जुड़े थे। इन कठिन हालातों के बावजूद जब  की स्मृति में पहला मेला लगा तो यह एक चमत्कार था। बहुत से लोग खुश थे---पंजाब में किसी पंजाबी लेखक की कदर का यह शायद पहला मामला था। खुश होने वालों के साथ कुछ लोग निराश भी थे। उनका कहना था-अब अगली बार मेला लगेगा तो देखेंगे। उन सब साज़िशों को नाकाम करते हुए जस्सोवाल साहिब डटे रहे। परिणाम सब के सामने है।  वह मेला आज तक लगता आ रहा है।  इस मेले ने बहुत से लोगों को रोज़गार दिया तो बहुत से कलाकारों को स्थापित होने में भी मदद की। अब यह मेला अमेरिका  में लगेगा। अमेरिका में सैक्रामेंटो के शहर स्टाकटिन में यह मेला 4 और 5 अक्टूबर को लगेगा। जाति, मज़हब, रंग और नस्ल के सभी भेदों से ऊपर उठ कर इस महान शायर ने बहुत पहले ही कह दिया था--
दो धड़ियां विच खलकत वण्डी
इक महिलां दा-इक ढोकां दा। 
अब अपनी वृद्ध अवस्था के बावजूद श्री जस्सोवाल इस संदेश को लेकर अमेरिका जा रहे हैं तांकि इस हकीकत को पूरी दुनिया तक पहुंचा सकें। कहते हैं अमेरिका में कही गे बात पूरी दुनिया के लोग बहुत ध्यान से सुनते हैं। उम्मीद की जनि चाहिए कि जब प्रोफेसर  की क्रांति भरी  शायरी  जस्सोवाल के प्रयासों से पूरी दुनिया तक पहुंचेगी तो एक नयी क्रांति की शुरुआत भी होगी।
पंजाबी सांस्कृति  की मशाल लेकर जगदेव सिंह जस्सोवाल वीरवार को प्रोफैसर मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन अमेरिका के बुलावे पर अमेरिका के लिए रवाना हुए उनके साथ प्रसिद्ध समाज सेवक सूरत सिंह खालसा भी अमेरिका गए। इस अवसर पर जस्सोवाल ने विदेशी धरती पर पंजाबी विरसे, पंजाब मिट्टी व धार्मिक रवायतों को कायम रखने वाले पंजाबी, प्रवासियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि पंजाब की पावन भूमि पर जन्म लेने वाले यह लोग वर्षों तक पंजाब की  भूमि  से दूर रहने के बावजूद पंजाबी सभ्याचार को जिंदा रखते हुए उन्होंने अपनी मिट्टी का मोह, सभ्याचार का मोह व धर्म का सत्कार कायम रखा है। इस अवसर पर प्रो. मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन के अध्यक्ष प्रगट सिंह ग्रेवाल सीनियर चेयरमैन साधु सिंह ग्रेवाल, उपाध्यक्ष, कृष्ण कुमार बावा,  निर्मल जोड़ा, पवन गर्ग हरदयाल सिंह अमन, अर्जुन बावा सहित अन्य शामिल थे।

Monday, September 23, 2013

किशन पटनायक स्मृति व्याख्यान

Sun, Sep 22, 2013 at 2:51 PM
नई दिल्ली:22 सितम्बर 2013:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरोसाहित्य वार्ता की ओर से किशन पटनायक स्मृति व्याख्यान का आयोजन दिनांक- 24 सितम्बर 2013 (मंगलवार) की शाम को ठीक 5 बजे किया जा रहा है। इस आयोजन का विषय होगा-वास्तविक लोकतंत्र : सारी सत्ता स्वशासी संस्थाओं को। इसमें भाग लेने वाले प्रमुख वक्ता होंगें-रविकिरण जैन और इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे जस्टिस राजेन्द्र सच्चर। इसका स्थान होगा स्थान - संगोष्ठी कक्ष (तीसरा तल)साहित्य अकादमी, 35, फिरोजशाह रोड, नई दिल्ली।  यदि आयोजनं स्थल पर पहुँचने में किसी को कोई दिक्कत आती है तो ओप्प्र कार्ड में दिए गए नंबरों पर सम्पर्क किया जा सकता है। 
उम्मीद की जनि चाहिए की इस आयोजन से चेतना के ए आयाम खुलेंगे और आज के युग में वास्तविक लोकतंत्र को पाने के रास्तों की बात भी होगी और इन मार्गों पर आने वाली रुकावटों से निपटने के समाधान पर भी विचार होगा। इसके अगले ही दिन होगा आदिवासी भाषा-साहित्य के  विकास की समस्याओं पर गंभीर। इसी स्थान पर दुसरे दिन होगा प्रोफैसर जयदेव मेमोरियल लेक्चर फॉर्म और साहित्य वार्ता की ओर से एक संयुक्त आयोजन। शाम को पांच बजे शुरू होने वाले इस आयोजन में वीर भारत तलवार तो होंगें मुख्य वक्ता और इसकी अध्यक्षता करेंगी रमणिका गुप्ता।  


Wednesday, August 21, 2013

पंजाबी साहित्य सभा समराला की मासिक बैठक

'वीहवीं सदी दा पंजवां दहाका' का विमोचन
समराला (लुधियाना):(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): कई दशक पूर्व अक्सर बड़े बजुर्ग कहा करते थे कि दोराहा के साथ पड़ता रामपुर कोई जादू भरी भूमी है शायद तभी वहां पैदा होने वाले शायरों और लेखकों की संख्या बहुत अधिक है। इस भूमी का यह जादू आसपास के क्षेत्रों दोराहा, नीलों, कटानी और समराला जैसे इलाकों में भी कई बार दिखा।  इस इलाके से गुजरती नहर का जादू उअर इस नहर के  पेड़ों को छू कर आती हवा अचानक ही किसी और दुनिया में ले जाते हैं और इंसान के हाथ कागज़ और कलम की तलाश में खुद-बी-खुद उठ जाते हैं।  यह सारा सिलसिला फिर बार फिर ताज़ा  हुआ समराला में जहाँ एक साहित्यक आयोजन था। पंजाबी साहित्य सभा समराला की मासिक बैठक सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में मंगलवार को हुई। जिसकी अध्यक्षता मंडल में सभा के अध्यक्ष बिहारी लाल सद्दी, नेशनल अवार्डी शमशेर सिंह नागरा, प्रो हमदर्दवीर नौशहरवी, गुरदयाल दलाल व प्रेम सागर शर्मा ने की। इस दौरान जगदीश नीलों की लिखी पुस्तक 'वीहवीं सदी दा पंजवां दहाका' का लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक के विमोचन पर सभी ने प्रसन्नता व्यक्त की। 
पुस्तक की सामग्री पर विस्तृत चर्चा हुई  हुए मास्टर मेघदास ने कहा कि वास्तव में यह पुस्तक एक दस्तावेज है जो 1950 से 1960 तक के दहाके में ग्रामीण लोगों की दशा व विकास की ओर बढ़ने की प्रक्रिया को बहुत ही सादगी और बारीकी से दर्शाती है। इस मौके पर मैनेजर करम चंद, मास्टर प्रेम सागर शर्मा, मास्टर शमशेर सिंह नागरा, बिहारी लाल सदी, ने भी पुस्तक के संदर्भ में अपने विचार व प्रभाव व्यक्त किए और इस पुस्तक के मकसद को समझने-समझाने में रचनात्मिक योगदान दिया। 
साहित्य रचने से सबंधित कलमकार एकत्र हों और साहित्य के रस की बरसात न हो यह कैसे सम्भव है? इस लिए इस मासिक बैठक का दूसरा दौर रचनाएं पढ़ने व उन पर उनके प्रतिक्रया पेश करने का था। जिसका आरभ कवि गुरनाम सिंह ने कविता सुनाकर किया। इसके बाद सुखदेव कलेर, आखिरी सांस तक क्रांति से रहे इंकलाबी शायर लाल सिंह दिल को भी याद किया गया। जसवीर सिंह समराला ने भी अपनी कविता पेश की। इस दौरान मैनेजर करम चंद ने कविता, हरबंस मालवा ने गीत, लखविंदरपाल सिंह ने कविता, सूरीया कात वर्मा ने मिनी कहानी, संतोख सिंह कोटाला ने कविता, मास्टर मेघदास ने मिनी कहानी, दीप दिलबर ने गीत, प्रेम सागर शर्मा ने उर्दू के शेयर, करमजीत बासी ने कविता, लील दयालपुरी ने गीत, हरबंस माछीवाड़ा ने गजल, जगदीश नीलों ने गजल, गुरदयाल दलाल ने गजल व बिहारी लाल सदी ने साहिर लुधियानवी द्वारा लिखी उर्दू की नजम पेश की। इस समय इंद्रजीत कंग, गुरबिंदर सिंह, दर्शन सिंह कंग, जसप्रीत सिंह, सुखविंदर, संदीप तिवारी, मा. जतिंदर, मा. राम रतन, अवतार सिंह समराला, सोहनजरीत सिंह, टी लोचन निरजन सूखम, जसविंदर सचदेवा व गुरजीत भी मौजूद थे। कुल मिलाकर यह एक यादगारी आयोजन बना। 

Tuesday, July 30, 2013

सरोजिनी साहू एक विशिष्ट नाम-कमलेश्वर

Mon, Jul 29, 2013 at 7:45 AM
इनकी कहानियां मन को झकझोरती हैं               -नब्बे के दशक में  कहा था 
प्रिय मित्र,
नब्बे के दशक में कमलेश्वर ने ओडिया की लेखिका सरोजिनी साहू के सन्दर्भ
में लिखा था:
"प्रखरतम लेखिका के रूप में और यथार्थ स्पष्टवादिता के लिए सरोजिनी साहू
एक विशिष्ट नाम है. इनकी कहानियां मन को झकझोरती है. मध्यमवर्ग के
पारिवारिक जीवन की समस्याएं, उलझाने, सुख-दुःख, आशा-निराशा, संजोए-बिखरते
सपने, आम जिन्दगी के संघर्षशील अनुभवों को लेकर वे बड़े ही प्रखर शैली
में अपनी बात कहती हैं. ओडिया कथा-साहित्य में सरोजिनी साहू एक विशिष्ट
प्रतिभा का नाम है. अबतक उनका एक ही संकलन 'सुखर मुहाँ-मुहिं' प्रकाशित
हुआ है. यों नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां प्रकशिओत
होती रहती हैं और बहु-चर्चित कथा लेखिका के रूप में उनकी ख्याति है."
देखें: भारतीय शिखर  कथा कोष   (http://bit.ly/13Rs1MB)
नब्बे के दशक की उस प्रतिभाशाली लेखिका आज भारतीय साहित्य में न केवल
शीर्ष स्थान पर हैं, बल्कि भारतीय नारीवाद को उन्होंने एक नया आयाम दिया
है. हिंदी में, इस प्रखरतम प्रतिभा के, अबतक दो उपन्यास और दो कहानी
संग्रह प्रकाशित हो चुके है.

राजपाल & संस की ओर से उपन्यास 'बंद कमरा' (ISBN :9788170289548 ) तथा
कहानी संग्रह 'रेप तथा अन्य कहानियां' (ISBN: 9788170289210 )प्रकाशित हो
चूका है.

यश प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है उनका उपन्यास 'पक्षिवास' तथा
कहानी संग्रह 'सरोजिनी साहू की दलित कहानियां'.

लेखिका के सन्दर्भ में अधिक जानकारी के लिए उनके होमपेज
सरोजिनीसाहू.कॉम (http://www.sarojinisahoo.com/ )' पर मित्रों का सादर
निमंत्रण है.

सादर प्रणाम
उमा शिवप्रिया

Friday, May 10, 2013

रवींद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती का स्‍मरणोत्‍सव

09-मई-2013 15:58 IST
टैगोर की कविताओं पर आधारित 13 लघु फिल्‍मों रिलीज की गई

संस्‍कृति मंत्री श्रीमती चंद्रेशकुमारी कटोच ने आज रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं पर आधारित 13 लघु फिल्‍मों को लॉंच किया। इन फिल्‍मों को संस्‍कृति मंत्रालय की वित्‍तीय सहायता से बनाया गया है। इस श्रृंखला का निर्देशन प्रसिद्ध निर्देशक श्री बुद्धदेव दास गुप्‍ता ने राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम के माध्‍यम से किया है। कविता आधारित 13 लघु फिल्‍मे/वृत्‍त चित्रों को निर्मित करने की ये परियोजना रवींद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती के स्‍मरणोत्‍सव का हिस्‍सा है। 
फिल्‍म निर्माण और स्‍मरणोत्‍सव से संबंधित प्रस्‍तावों की जांच के श्री श्‍याम बेनेगल की अध्‍यक्षता में संचालन समिति का गठन किया गया था। 
ये लघु फिल्‍मे (प्रत्‍येक 25 से 30 मिनट की अवधि) टैगोर की बंसी (बांसुरी), कृष्‍णकली (श्‍याम युवती), मुक्ति (आजादी), फंकी (धोखा), पुकुर धरे (पोखर की ओर से), एक गये (एक गांव), कैमेलिया (कैमेलिया), बंशी वाला (बांसुरी बजाने वाला), शेष चिठ्ठी (अंतिम पत्र), होतत देखा (अनपेक्षित मुलाकात), पत्र लेखा (लिखे जाने वाला पत्र), बाशा बाड़ी (हवेली) और इस्‍टेशन (स्‍टेशन) नामक कविताओं पर आधारित है। 
***

मीणा/शोभा/प्रियंका/लक्ष्‍मी/तारा-2296

Tuesday, March 05, 2013

अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समारोह 8 जून से नेपाल में

तीन विधाओं की महक से महकेगी त्रिसुगंधि !
आशा पांडेय ओझा 
बाधायों, कठिनाईयों और सीमित साधनों के बावजूद हिंदी प्रेमी हिंदी के प्रचार/ प्रसार के लिए हमेशां सक्रिय रहे हैं। नेपाल में होने वाला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन इसी सिलसिले की एक कड़ी कहा जा सकता है। अखिल भारतीय साहित्यकला मंच की ओर से काठमाण्डु (नेपाल) में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समारोह 8 जून 2013 से 11 जून, 2013 तक आयोजित किया जा सकता है। अब जबकि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च को आने ही वाला है--इस अवसर पर यह जानकारी देते हुए हर्ष हो रहा है कि साहित्य के शेत्र में सक्रिय एक शिष्ट महिला हस्ताक्षर इस आयोजन की कामयाबी के लिए विशेष तौर पर सरगर्म है।मेरा अभिप्राय है आशा पण्डे ओझा से। उनके मुताबिक इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। गौरतलब है कि इस समारोह में त्रिसुगंधि नामक काव्य संकलन/ संग्रह का विमोचन होना है । इस पुस्तक में प्रकाशन हेतु रचनाकारों से उनकी मौलिक व अप्रकाशित रचनाएँ आमंत्रित है, जो प्रिण्ट में प्रकाशित न हुई हों । वेब पर अपलोडेड रचनाएँ स्वीकार्य होंगीं । इच्छुक रचनाकार किसी एक विधा में अपनी दो रचनाएँ अपने संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ भेज दें ।
काव्य विधा हेतु तीन प्रभाग तय किये गइ सम्मेलन ये हैं -  कविता ,गीत और ग़ज़ल इन्ही तीन विधाओं की महक से महकेगी यह त्रिसुगंधि !
रचनाकारों की रचनाएँ हम तक 15/3/2013 तक अवश्य पंहुच जायें, ताकि अनुमोदित तथा स्वीकृत रचनाओं को संकलित कर संकलन-पुस्तक पर काम करने के लिए हमारे पास उपयुक्त समय रहे ।
प्रविष्टिभेजने हेतु मेल-आइडी-trisugandhi@gmail.com 
आभार 
आशा पांडेय ओझा 
सह संयोजक 
द्वारा, अखिल भारतीय साहित्यकला मंच