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Thursday, July 25, 2024

प्रसन्ना की तीन-दिवसीय नाट्य कार्यशालाएँ संपन्न//विनीत तिवारी

 Thursday 25th July 2024 at 10:35 AM

श्रम के साथ अभिनय सीखा प्रतिभागियों ने


इंदौर
: 25 जुलाई 2024: (विनीत तिवारी//पंजाब स्क्रीन डेस्क)::

नाटक बिना लाइट, माइक और बाक़ी तामझाम के भी हो सकता है लेकिन वो नाटक में काम करने वालों के आपसी सहयोग के बिना हो ही नहीं सकता। अगर एक क़िरदार क़ातिल है और दूसरे की भूमिका मरने की है तो मंच पर दोनों में इतना सहयोग होना चाहिए कि दर्शकों को वो सच लगे जबकि वो सच नहीं है। नाटक सहयोग और मैत्री सिखाता है। नाटक इस अर्थ में बेहतर जीवन और बेहतर मनुष्य बनना सिखाता है। 

भारतीय रंगमंच के किंवदंती कहे जाने वाले नाट्य निर्देशक और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना हेग्गोडु की तीन-दिवसीय दो नाट्य कार्यशालाएँ इंदौर में 7 जून से 10 जून 2024 तक संपन्न हुईं। चूँकि प्रसन्ना केवल एक नाटककार ही नहीं हैं, एक ज़मीनी काम करने वाले प्रयोगधर्मी ऐक्टिविस्ट भी हैं इसलिए उनसे दुनिया के बड़े नाटककारों के काम के बारे में जानने के साथ ही उनके गाँवों में किये गए सहकारिता के प्रयोगों को भी सुनना था। 

यही सोचकर जया मेहता ने एक कार्यशाला तीन दिन रोज़ शाम 5 बजे से 8 बजे तक करने की योजना बनायी जिसमें नाटक के सिद्धांत, जीवन से नाटक के जुड़ाव, श्रम के साथ नाटक के सम्बन्ध, दैत्य अर्थव्यवस्था और उसके बरअक्स मनुष्य की गरिमा को बहाल करने वाली जीवन व्यवस्था, उपभोक्तावाद के बरअक्स जरूरतें कम करने का जीवन दर्शन, सहकारिता आदि विषयों पर घंटों विचार-विमर्श सवाल-जवाब होते थे।  

सुबह 8 बजे से 11 बजे तक चलने वाली कार्यशाला में प्रसन्ना ने अभिनय की तकनीकें, आवाज़ के उतार-चढ़ाव से भाव के निर्माण आदि बातें प्रतिभागियों को सिखायीं, लेकिन मेरे विचार से इन कार्यशालाओं में प्रतिभागियों ने तकनीक से ज़्यादा कुछ ज़रूरी जीवन मूल्य और कुछ ज़रूरी सवाल सीखे। कितने ही प्रतिभागियों के मन में यह सवाल शायद पहली बार ही उठा होगा कि जिस तरह की जीवन पद्धति हमने अपनायी हुई है, उसका नतीजा अगली पीढ़ी के लिए क्या होगा? 

कितने लोगों ने पहली बार ये सोचा होगा कि हम मशीनों के साथ ख़ुद कितने मशीनी होते जा रहे हैं? कितने ही लोगों को पहली बार ये फ़िक्र महसूस हुई होगी कि पर्यावरणीय बदलावों का असर कितना भयंकर हो सकता है या कितने ही लोगों ने प्रेम में अधिकार और अहंकार से ज़्यादा विनम्रता का महत्त्व सीखा होगा।  इस मायने में यह नाट्य कार्यशाला सिर्फ़ नाट्य कार्यशाला नहीं थी, उससे बहुत ज़्यादा थी।  

अभिनय की बारीकियाँ सिखाते हुए उन्होंने "मैं तुमसे प्यार करता हूँ" वाक्य को लगभग 50 प्रतिभागियों से बुलवाकर सुना। आख़िर में उन्होंने कहा कि यह वाक्य अहंकार के साथ "मैं"  पर ज़ोर देकर कहा जाए तो वह प्यार को  प्रदर्शित ही नहीं करेगा। प्यार में 'मैं' होगा तो सही लेकिन विनम्रता और प्रसन्नता से भरा हुआ।  प्यार में प्यार और जिससे प्यार करते हैं, उसका महत्त्व ज़्यादा है, तभी वह वाक्य प्यार भरा वाक्य होगा अन्यथा खोखला होगा। एक यही बात अगर प्रतिभागियों ने ठीक से समझ ली हो तो वो कभी ‘मेल सुप्रीमेसी’ को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने देंगे। 

एक सत्र में उन्होंने निराला की कविता "वह तोड़ती पत्थर" की पंक्तियों का विभिन्न प्रतिभागियों से पाठ करवाकर अर्थ की परतें पाठ के ज़रिये कैसे खुलतीं हैं, समझाया।  एक सत्र में उन्होंने प्रतिभागियों से समूह बनाकर ऐसी निरर्थक भाषा में बात करने का अभ्यास करवाया जिसमें एक भी शब्द का कोई अर्थ न हो, हिंदी, अंग्रेज़ी या किसी भी भाषा का न हो (जिबरिश) और फिर भी जो सुनें, उन्हें लगे कि लोग आपस में कोई काम की बात कर रहे हैं। 

इस अभ्यास का मक़सद यह महसूस करवाना था कि भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सदा भाषा और शब्द ही आवश्यक नहीं होते, बल्कि अनेक हाव-भाव द्वारा भी अपने आपको अभिव्यक्त किया जा सकता है। अनेक अभ्यासों के द्वारा उन्होंने प्रतिभागियों से जो करवाया, उससे आठ साल से सत्तर साल तक के सौ से ज़्यादा प्रतिभागियों ने अपने भीतर एक नये मनुष्य को पहचाना, उसका अहसास उन्हें हुआ।  

विभिन्न सत्रों में उन्होंने दुनिया के पिछली सदी के महान नाटककार बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (जर्मनी) से लेकर इब्राहिम अल्काजी और हबीब तनवीर तथा सफ़दर हाश्मी सहित अनेक नाटककारों की विशेषताओं की चर्चा की और उनसे जुड़े प्रसंग भी सुनाये जिससे माहौल दिलचस्प बना रहता था।  एक और बहुत महत्त्वपूर्ण बात सहयोग और मैत्री के संबन्ध में उन्होंने यह कही कि फ़िल्म अभिनेता प्राण ने खलनायक की अनेक यादगार भूमिकाएँ कीं, अनेक बार अभिनेत्रियों की अस्मत लूटने वाले दृश्य भी किए लेकिन प्राण के साथ हर अभिनेत्री अपने आपको इतना सहज, सुरक्षित और शंकारहित महसूस करती थी क्योंकि प्राण अपने अभिनय के अलावा निजी ज़िंदगी में सभी महिला साथियों के साथ बहुत सम्मानजनक व्यवहार करते थे। तभी उन्हें अपने क़िरदार को निभाने के लिए उनकी महिला साथी सहयोग करती थीं। कलाकार को सभ्य, और उसके द्वारा निभाए गए पात्र की भूमिका सहज होना चाहिए।

एक सत्र में उन्होंने बहुत दिलचस्प तरह से संवादों में, या नाटक में ‘बिंदी’ के प्रयोग को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि बिंदी वो चीज है जो दिखती नहीं है लेकिन उसे निर्देशक और अभिनेताओं को देखना आना चाहिए तभी वो कुछ अलग कर सकते हैं। लगभग सभी प्रतिभागी बड़ी उलझन में कि ऐसी कैसी बिंदी है जो होती है पर दिखती नहीं है। खुद मेरे लिए ये बिंदी अत्यंत रहस्यमय होती जा रही थी लेकिन शायद प्रसन्ना का कहने का आशय ये था कि नाटक में और संवादों में ऐसी जगहें आती हैं जहाँ कलाकार या निर्देशक के पास कुछ अलग करने का मौका होता है बशर्ते वो उसे पहचान सके तो। बस वही बिंदी है। ऐसे मौकों को पहचानने का कोई प्रशिक्षण नहीं हो सकता लेकिन करने से वो आता जाता है। 

उन्होंने कहा कि कलाकार को अभिनय के लिए दिए गए पात्र के अभिनय की प्रेरणा अपने अंदर से नहीं, बाहरी प्रतिक्रिया से मिलती है। नाटक क्रिया और प्रतिक्रिया, यानि एक्शन और रिएक्शन से चलता है। जब तक दूसरा क़िरदार आपके एक्शन पर रिएक्शन नहीं देगा, तब तक आपका एक्शन किसी काम का नहीं होगा। और आपने बहुत अच्छा एक्शन किया लेकिन रिएक्शन उतना अच्छा नहीं हुआ तो भी आपके एक्शन का वो असर नहीं पैदा होगा। उन्होंने अलग-अलग ढंग से अभिनय में शरीर के विभिन्न अंगों के इस्तेमाल का भी अभ्यास करवाया। उन्होंने कहा कि अभिनय केवल दिए गए संवादों से ही नहीं होता, कलाकार का शरीर और उसके अंग, विशेषकर आँखें भी बोलना चाहिए, लेकिन अच्छा अभिनय यही है कि जो जितना होना है, उतना ही हो, ज़्यादा हाथ-पैर और भाव-भंगिमाएँ बनाने से भी अभिनय को नुक़सान पहुँचता है। 

उन्होंने एनएसडी में अपने वरिष्ठ नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, सुरेखा सीकरी, उत्तरा बावकर, अपने समकालीन राज बब्बर और अपने बाद के बैच के रघुबीर यादव के भी अनेक प्रसंग सुनाकर बताया कि वे लोग अपने क़िरदार में जान डालने के लिए कितनी मेहनत करते थे। एक सवाल उनसे यह किया गया कि नसीरुद्दीन शाह आपसे नाराज़ क्यों रहते हैं? प्रसन्ना ने कहा कि वे मेरे सीनियर भी हैं और बहुत अच्छे अभिनेता भी। उनके लिए मेरे मन में आदर है लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि एनएसडी ने अपने दीक्षांत समारोह में, जो कि आठ-दस वर्षों में एक बार होता है, उसमें एनएसडी प्रशासन ने नसीरुद्दीन शाह को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया। मैंने एनएसडी को पत्र लिखा कि एनएसडी को किसी ऐसे कलाकार को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाना चाहिए था जो मुख्य रूप से नाटक और थिएटर से जुड़ा रहा हो न कि सिनेमा से। इस बात को इस तरह दुष्प्रचारित किया गया कि प्रसन्ना को नसीर के नाम पर ऐतराज है जबकि ऐसा हरगिज़ नहीं था। 

9 जून को प्रतिभागियों से श्रमदान भी करवाया गया और प्रसन्ना के साथ-साथ इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव और प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक तनवीर अख़्तर (पटना) और हबीब तनवीर के नाटकों की प्रसिद्ध अभिनेत्री और गायिका पूनम तिवारी (छत्तीसगढ़) ने तीन फलदार और छायादार वृक्षों के पौधे गाँधी हॉल प्रांगण में रोपे। श्रमदान के बाद के सत्र में  साफ़-सफ़ाई के महत्त्व को नाटक और अभिनय के साथ जोड़कर यह भी समझाया कि अगर स्टेज पर कूड़े की ज़रूरत है तो उसे वहाँ होना चाहिए वर्ना जिसकी ज़रूरत नहीं, ऐसी ख़ूबसूरत चीज़ भी कूड़े के समान है। प्रसन्ना ने कहा कि स्टेज पर किसी को थप्पड़ मारने का दृश्य करते हुए सही में थप्पड़ मारना या किसी भी तरह का ऐसा काम नहीं होना चाहिए जो दर्शकों को ख़राब लगे। 

उन्होंने कहा कि हमारी नाट्य परंपरा कालिदास, भवभूति और भास की रही है। शहरी नाटक इंग्लिश नाटकों से प्रेरित हैं। गाँव के नाटकों से उनका कोई रिश्ता नहीं रहा है। हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन और लोक कहानियों एवं नाटकों के माध्यम से भारतीय नाट्य परंपरा में ख़ूबसूरत विकास के अध्याय जोड़े हैं। हबीब साहब ने जन सामान्य से नायक तलाशे थे। हबीब तनवीर का थिएटर लोक कला या मनोरंजन मात्र नहीं था बल्कि उन्होंने आधुनिक समय को लोक के माध्यम से व्यक्त किया।  उनके नाटक सामान्य लोगों में से बड़ी मानवीय चीज़ें निकाल कर लाते हैं। बड़ी चीजों की ओर भागना हमारी प्रवृत्ति है। थिएटर और समाज का भी यही सच है। छोटे-छोटे प्रयासों की सफलता स्थाई होती है। थिएटर भव्य स्टेज, रंग बिरंगी रोशनी पर नहीं, दर्शकों पर निर्भर होता है। 

प्रसन्ना ने कहा कि एक्टर अपनी प्रस्तुति से निर्मित नहीं होता। वह निरंतर अभ्यास से ही विकसित हो सकता है। नाटक, कलाकार को बोलना सिखाता है। मोबाइल से कला नहीं सीखी जा सकती। जिस तरह देश किसी चुनाव से या सिर्फ़ सरकार से नहीं, बल्कि जन सामान्य के छोटे-छोटे प्रयासों से विकसित होता है, इसकी एक प्रक्रिया है। इसी तरह समाज हो अथवा नाटक उसे ऐसी ही प्रक्रिया के दौर से गुजरना होता है। अगर आप प्रोसेस पूरी नहीं होने देंगे तो अच्छा थिएटर कैसे तैयार होगा। उन्होंने कहा कि फ़िल्म हो अथवा नाटक, बिना रिहर्सल (अभ्यास) के  अच्छे नहीं बन सकते। जापान के फ़िल्म निर्देशक अकीरा कुरोसावा और भारत के सत्यजीत राय कलाकारों से महीनों रिहर्सल करवाते थे, उसके बाद ही वे फ़िल्म शूट करते थे। 

उन्होंने कहा कि आज हर कोई मुंबई में जाकर सीधे फ़िल्म स्टार बनना चाहता है, जबकि वहाँ कलाकारों का शोषण भी होता है। वर्तमान में शहर और गाँव में द्वंद्व चल रहा है। नगरीय व्यवस्था नौजवानों को महानगरों की ओर खींच रही है। फ़िल्मों में पैसा है तो थोड़ा पैसा कमाने जाइए लेकिन थोड़े दिन बाद वापस आकर अपने शहर में, गाँव में थिएटर कीजिये। फ़िल्मों का अर्थशास्त्र अनैतिक है। थिएटर अपने उत्पादन में भी सहकारिता से होता है और प्रदर्शन में भी, जबकि फ़िल्म में मेहनत तो सबकी होती है लेकिन मुनाफ़े का वितरण बहुत ग़ैर बराबरीपूर्ण होता है। और ज़्यादा  थिएटर किये जाने की, और थिएटर के बारे में समाज का सोच और बेहतर किये जाने की ज़रूरत है। वर्तमान में केवल हिंदी ही नहीं, सभी भाषाओं का थिएटर संकट में है। वैचारिकी के संकट को देखते हुए कलाकारों को प्रतिबद्ध और जागरूक रहना ज़रूरी है। वर्तमान समय में संस्कृति और कला के सामने बड़ा संकट है। भाषा, संस्कृति, नागरिकता बोध सभी ख़तरे में हैं। बाज़ार और राजनीति के हावी हो जाने से आपसी संबंध और मित्रता खो-सी गई है। 

उन्होंने कहा कि लोग संस्कृति को कला से कन्फ्यूज़ करते हैं। संस्कृति पूरा जीवन होती है, खाना, पीना, कपड़े, रस्मो-रिवाज़ आदि सब संस्कृति हैं। उसमें सब अच्छा हो, ये ज़रूरी नहीं लेकिन संस्कृति एक पौधा है और कला उसका फूल। कला में सब व्यवस्थित होना चाहिए।  विभिन्न सत्रों में प्रसन्ना ने बताया कि ब्रेष्ट और गोर्की अपनी रचनाओं के ज़रिए राजनीतिक संदेश देते थे। उदाहरणों और कटाक्षों से उन्होंने राजनेताओं द्वारा किये जा रहे ख़राब नाटकीय भाषणों के भी उदहारण दिए। 

उन्होंने कहा कि असहजता को सहजता से व्यक्त करना ही एक्टिंग है। भारतीय दर्शक मनोरंजन भी चाहता है। नाटकों में चतुराई से गंभीर संदेश देने में हबीब तनवीर का नाटक चरण दास चोर उल्लेखनीय है। प्रसन्ना ने कहा कि केवल किताबें पढ़कर अभिनय नहीं सीखा जा सकता, उसे करके देखना पड़ता है। 

काल और स्थान का महत्त्व समझाते हुए उन्होंने कहा कि अपने स्थान की बजह से कोई चीज अपना अर्थ ग्रहण करती है। रास्ते में गोबर पड़ा है तो गंदगी है, उसे पौधे की जड़ में डाल दो तो वो खाद है। विभिन्न सत्रों का संचालन विनीत तिवारी यानि मैंने और जया मेहता ने किया। 

कार्यशाला के आख़िरी दिन दोपहर के खाने के पहले इप्टा की को लेकर हम कुछ लोग केबिन में भावी योजना पर बातचीत कर रहे थे। राकेश वेदा, तनवीर अख़्तर, जया मेहता, प्रसन्ना और मैं। बस इतने ही लोग थे। कुर्सियाँ थोड़ी दूर-दूर थीं और भारी भी थीं, तो हमने खींच कर पास-पास कर लीं। जब मीटिंग ख़त्म हुई तो हमने कुर्सियों को वापस उनकी पुरानी जगह रखने के लिए खिसकाया। मैंने मुड़कर देखा तो प्रसन्ना एक भारी कुर्सी हाथ में उठाकर एक-एक क़दम सावधानी से रखते कुर्सी को उसकी पुरानी जगह लादकर ले जा रहे थे। मैंने कहा कि मुझे दे दो, मैं रख देता हूँ। तो मना कर दिया। मैंने सोचा कि संकोच में मना कर रहे होंगे तो मैंने कहा-अच्छा नीचे रख दो, उसे उठाने की ज़रूरत नहीं है। तो प्रसन्ना झुँझलाकर बोले – ‘तुम घसीटते हो, इसीलिए नहीं दे रहा हूँ।’ अनावश्यक आवाज़ भी नागवार गुज़रती है-मेरे लिए कार्यशाला से कहिए या प्रसन्ना के साथ से, ये एक और बात मैंने सीखी। अब मैं थोड़े परिश्रम से बचने के लिए कभी शायद ही कुर्सी या कुछ और घसीटूँ। ऐसा करूँगा तो प्रसन्ना का झुंझलाया चेहरा याद या जाएगा, जो बीच-बीच में मुस्कराता भी है। 

कार्यशाला में इंदौर के साथ बिहार, राजस्थान, दिल्ली, मुंबई, पुणे, उत्तर प्रदेश  और मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों से अलावा देश के विभिन्न भागों से आए क़रीब 130 प्रतिभागियों ने भाग लिया। बेगुसराय और पटना से चार नौजवान प्रतिभागी बिना रिज़र्वेशन के 24 घंटे से अधिक का सफ़र तेज़ गर्मी में करके आये। एक ऐक्टिविस्ट लड़की दिल्ली से आयी। एक ट्रांसजेन्डर साथी भी इसमें शामिल हुए। किसी ने सुबह की कार्यशाला में रजिस्टर करवाया था, किसी ने शाम की। बाहर से आये लोगों ने सुबह-शाम दोनों कार्यशालाओं में भाग लिया। लेकिन प्रतिभागियों की रुचि को देखते हुए दोनों कार्यशालाएँ सभी भागीदारों के लिए खोल दी गईं। 

बेंगलुरु से फ्लोरा बोस आईं तो थीं 10 जून 2024 को हबीब साहब के नाटक “जिन लाहौर नी वेख्या, ओ जन्म्या ही नहीं” की प्रस्तुति के लिए आयीं थीं लेकिन उन्होंने भी सुबह और शाम दोनों कार्यशालाओं के सभी सत्र पूरे ध्यान से सुने। उल्लेखनीय है कि वे बादल सरकार से लेकर हबीब तनवीर तक के निर्देशन में 200 से अधिक नाटकों में काम कर चुकी हैं और अकेले ‘लाहौर’ के ही उन्होंने सैकड़ों प्रदर्शन दुनिया के अनेक देशों और देश के अनेक शहरों और गाँवों में किये हैं। 

इसी तरह कुछ और भी साथी थे जो सीधे-सीधे नाटक की दुनिया से नहीं थे, कोई कवि, कोई पत्रकार, कोई उद्योगपति, कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर, कोई संघर्षरत नौजवान तो कोई गृहिणी जिसका नाता दशकों से नाटक से छूट गया था, तो कुछ नौजवान ऐसे भी थे जो नाटक के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर अपने शौक को जुनून में बदलने के लिए अपने पर तौल रहे थे। कुछ एक्टिविस्ट भी थे जो कोई बस्तियों में काम कर रहे थे, कोई अल्पसंख्यक समुदायों के साथ तो कोई ग़रीब महिलाओं के बीच तो कोई आदिवासियों के बीच सहकारिता के आधार पर रोज़गार सृजन और जीवन के नये तरीके की तलाश में लगे हुए थे। 

दस बरस से कम उम्र के एक साहेबान ऐसे भी थे जो अगले ही बरस किसी ऐक्टिंग स्कूल को जॉइन करने के लिए मुंबई जाने वाले थे और यह बात उनके माँ-पिता ने हमें बतायी। कुल-मिलाकर चार दिन तक चलीं 6-7 घंटे रोज़ की यह कार्यशालाएँ नाटक की तकनीक तो जितना सिखा सकीं, सो तो ठीक है ही लेकिन प्रसन्ना जैसे कार्यशील और दार्शनिक व्यक्ति के साथ समय बिताने से यह कार्यशालाएँ जीवन की अनेक ज़रूरी बातें सिखाने वाली रहीं और कुछ नये लोगों से इप्टा का रिश्ता बनाने में भी यह उपयोगी रहीं। अब वो रिश्ते जितने दूर चल सकें उतना अच्छा। 

आंदोलन और संगठन ऐसे ही चलते हैं। कुछ लोग वहाँ हमेशा बने रहते हैं और कुछ अलग-अलग वजहों से दूर हो जाते हैं लेकिन एक कामयाब साथ वो होता है जिसमें दूर होने के बाद भी आप उन मूल्यों को नहीं भूलते जो आपने एक समूह में रहकर हासिल किए। 

कार्यशाला संयोजन इंदौर इकाई के सचिव प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे, सारिका श्रीवास्तव, रवि शंकर तिवारी, विजय दलाल, गुलरेज़ ख़ान आदि ने किया। हेमंत कमल चौरसिया, विवेक सिकरवार, नितिन, विकास और आदित्य ने भी कार्यशाला की तैयारियों में और हर छोटे-बड़े काम को दौड़-दौड़कर पूरा किया। 

प्रगतिशील लेखक संघ और स्टेट प्रेस क्लब (मध्य प्रदेश) के साथ ही इंदौर के विभिन्न नाट्य समूहों और संस्कृतिकर्मियों ने कार्यशाला के लिए भरपूर सहयोग किया। 

***

102, चिनार अपार्टमेंट,

172, श्रीनगर एक्सटेंशन,

इंदौर -452018 

मोबाईल – 9893192740 

Monday, January 21, 2019

नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार रात 8 बजे मुंबई में

शिवाजी नाट्य मंदिर में मंचित होगा मंजुल भारद्वाज का लिखा नाटक 
लुधियाना//मुम्बई: 21 जनवरी 2019: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
पहले सिनेमा--फिर फ़िल्में और उसके बाद केबल का प्रचलन। तकनीकी विकास के इस दौर ने सबसे बुरा असर डाला मंच की कला पर। नाटकों का का मंचन कम से कम होता चला गया। नाटक को आंदोलन का रूप देने वाले "इप्टा" जैसे संगठन गुमनामी के दायरे में सिमटते चले गए। उनका अस्तित्व केवल उनके राष्ट्रिय आयोजनों या उन पर होने वाले हमलों की खबरों से ही महसूस होता। तकरीबन तकरीबन यही हाल "जन नाटय मंच" का भी हुआ। सुबह से लेकर रात केवल दाल रोटी  उलझा दिए गए समाज में सबसे अधिक शिकार बने नाटकों की दुनिया के कलाकार, लेखक, निदेशक और अन्य तकनीकी स्टाफ के सदस्य। राजनैतिक दलों के शिकंजे ने भी नाटकों के अभियान को लुप्त जैसा ही कर दिया।  इक्का दुक्का कलाकारों ने नाटकों केमाभियाँ को जीवंत रखने की कोशिश भी की लेकिन उन्हें दर्शक नहीं मिले। ऐसे में उभर कर सामने आए मंजुल भारद्धाज। कुछ बातों का संकल्प- की तीखी आलोचना भी लेकिन साथ ही साथ रंगमंच को फिर से हर दिल तक ले जाने का प्रयास भी।  इसी प्रयास के अंतर्गत हो रहा है "राजगति" का मंचन।   
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” अभ्यासक एवम् शुभचिन्तक आयोजित नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे “शिवाजी नाट्य मंदिर” दादर(पश्चिम), मुंबई में मंचित होगा! सुप्रसिद्ध रंग चिन्तक मंजुल भारद्धाज लिखित और निर्देशित नाटक “राजगति” समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
मंचन का विवरण इस प्रकार है:
कब : 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे
कहाँ : “शिवाजी नाट्य मंदिर”, दादर(पश्चिम), मुंबई
कलाकार:अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर, कोमल खामकर, तुषार म्हस्के,स्वाति वाघ,हृषिकेश पाटिल,प्रियंका काम्बले,प्रसाद खामकर और सचिन गाडेकर।
अवधि :120 मिनट
नाटक 'राजगति', : “नाटक राजगति ‘सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति’ की गति है. राजनीति को पवित्र नीति मानता है.राजनीति गंदी नहीं है के भ्रम को तोड़कर राजनीति में जन सहभागिता की अपील करता है. ‘मेरा राजनीति से क्या लेना देना’ आम जन की इस अवधारणा को दिशा देता. आम जन लोकतन्त्र का प्रहरी है. प्रहरी है तो आम जन का सीधे सीधे राजनीति से सम्बन्ध है.समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
नाटक “राजगति” क्यों ?
हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना को जगाएं ,ताकि आत्महीनता का भाव ध्वस्त हो और ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।
पंजाब में नाटय को समर्पित कुछ विशेष लोग 
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन विगत 26 वर्षों से फाशीवादी शक्तियों से जूझ रहा है। भूमंडलीकरण और फाशीवादी ताकतें ‘स्वराज और समता’ के विचार को ध्वस्त कर समाज में विकार पैदा करती हैं जिससे पूरा समाज ‘आत्महीनता’ से ग्रसित होकर हिंसा से लैस हो जाता है. हिंसा मानवता को नष्ट करती है और मनुष्य में ‘इंसानियत’ का भाव जगाती है कला. कला जो मनुष्य को मनुष्यता का बोध कराए...कला जो मनुष्य को इंसान बनाए! “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”... एक चौथाई सदी यानी 26 वर्षों से सतत सरकारी, गैर सरकारी, कॉर्पोरेटफंडिंग या किसी भी देशी विदेशी अनुदान से परे. सरकार के 300 से 1000 करोड़ के अनुमानित संस्कृति संवर्धन बजट के बरक्स ‘दर्शक’ सहभागिता पर खड़ा है हमारा रंग आन्दोलन.. मुंबई से मणिपुर तक!
लेखक –निर्देशक : रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज रंग दर्शन थिएटर ऑफ रेलेवेंस' के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने नाट्य सिद्धांत "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।  अब तक 28 से अधिक नाटकों का लेखन—निर्देशन तथा अभिनेता के रूप में 16000 से ज्यादा बार राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं!
दर्शक सहयोग और सहभागिता से आयोजित इस मंचन में आपके सक्रिय सहयोग और सहभागिता की अपेक्षा !
अच्छा हो यदि इस नाटक का मंचन देश के सभी भागों में हो सके। इस मकसद के लिए स्थानीय नाटय मंडलियों को एक प्रोफेशनल सोच सामने रखते हुए आगे आना हगा तांकि नाटय  मंडलियों के कलाकारों का आवश्यक खर्चा भी निकल सके। 
लुधियाना में डाक्टर अरुण मित्रा, पत्रकार एम एस भाटिया, मैडम सपनदीप कौर, त्रिलोचन सिंह और इप्टा से जुड़े पुराने कलाकार प्रदीप शर्मा भी सक्रिय  हैं।  चंडीगढ़-मोहाली में प्रगतिशील लेखक कंवर, अमन भोगल, संजीवन सिंह, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला में इंद्रजीत रूपोवालिया, मोगा में विक्की माहेश्वरी सहित बहुत से लोग सक्रिय हैं। अच्छा हो एक ज़ोरदार हल्ला जन विरोधी साज़िशों पर बोला जा सके। शायद सआदत हसन मंटो और सफदर हाशमी की अंतरात्मा को इससे शांति मिल सके। 

Saturday, January 28, 2017

53 वर्ष पुराना 6 फुट से भी ऊंचा तुलसी का पौधा

अभी भी मौजूद है लुधियाना की रेलवे कलोनी नम्बर 5 में 
लुधियाना: 28 जनवरी 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो);      और तस्वीरें देखने के लिए यहाँ क्लिक करें 
हमारे समाज में तुलसी का एक अलग और सम्मानीय स्थान है। छोटे मोटे बुखार को तो तुलसी के पत्तों का सेवन नज़दीक भी नहीं आने देता। जो तुलसी आप देख रहे हैं इसको प्रदीप शर्मा इप्टा के माता जी सुश्री सवर्ण कांता ने रेलवे कलोनी के निवास में लगाया था। यह बात सन मई 1964 की है।  कल हम उधर से गुज़रे तो अचानक उस मकान के सामने रुक गए , दरवाज़ा खटखटाया तो पता चला कि अब वहां कोई और परिवार रह रहा है। यह परिवार यहाँ 2002 में आया था और उनसे पूर्व कोई और परिवार यहाँ रहता था। इतनी मुद्दत के बाद भी तुलसी माता का वहां होना हमें किसी चमत्कार से कम नहीं लगा। उस समय प्रदीप शर्मा जी की कुछ तस्वीरें क्लिक करा सचमुच एक अलौकिक सा अनुभव था। -रेक्टर कथूरिया पौधा 

Thursday, October 13, 2016

देश भर में ज़ोरदार रहा इप्टा पर हमले का विरोध

अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इप्टा के  आए बहुत से संगठन 
दिल्ली//लुधियाना//इंदौर: 13 अक्टूबर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):  
हमला करने वालों ने सोचा होगा बस थोड़ी सी गुंडागर्दी और इप्टा खत्म। जो लोग बचेंगे उन के दिलों में भी हमारी दहशत। फिर डरे हुए कलाकार करेंगे हमारे फाशी  इरादों की प्रशंसा। पर हमला उल्टा पड़ा। इप्टा के साथ जुड़े हुए लोग भी एक बार फिर एकजुट हो गए और जो नहीं जुड़े थे वे भी इप्टा के समर्थन में आ गए। जम्मु, रांची, भिलाई, आगरा, दिल्ली, इंदौर और आंध्रप्रदेश में कलाकारों ने अपनी  कवितायों और गीतों से बुलन्द की फाशीवाद की गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़। 
दिल्ली में कर्यक्रम हुआ शाम चार बजे। जन समर्थक कला संगठन अभिव्यक्ति  के हक में खुल कर आए। इनमें इप्टा दिल्ली के साथ साथ जन नाटय मंच, जनवादी लेखक संघ, जुम्बिश आर्टस, निशांत नाटय मंच, मजमा, खिलौना, प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन  सहित बहुत से संगठन और मंच इस मकसद के लिए एकजुट हुए। 
इसी तरह आगरा में भी इप्टा के हक में कलाकार खुलकर आगे आए। आगरा और आसपास के  क्षेत्रों से जुड़े लोग अपने सभी काम छोड़ कर इस विरोध दिवस में शामिल हुए। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर मंडराते खतरे के खिलाफ हर सच्चे कलाकार ने आवाज़ बुलन्द की। यहाँ भी भाषण थे, कविता थी, संगीत था और संकल्प का सागर। गुंडागर्दी के खिलाफ कलम ने मोर्चा सम्भाला। 
इंदौर वह जगह है जहाँ इस खतरे ने खुलकर अपना चेहरा दिखाया। इंदौर में भी कला और संस्कृति के क्षेत्रों सक्रिय लोग बढ़ चढ़ कर आगे आए। कलाकारों ने हमले के उस काले दिन चर्चा की। इसके जवाब में लगे इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे की चर्चा की और  जता दिया कि हम इस तरह के हमलों से डरने वाले नहीं।  साबित किया कि आम साधारण लोगों से जुड़े संगठन इस तरह डरा नहीं करते।  वे इस  तरह  कायरतापूर्ण हमलों से और मज़बूत होकर निकलते हैं। 
जम्मू में भी गूंजी इप्टा की आवाज़: युद्ध और अशांति जैसा माहौल होने के बावजूद यहाँ भी इप्टा के हक में ज़ोरदार आवाज़ गूंजी। कलाकार खुल कर सामने आए और इप्टा पर  हुए हमले का खुलकर विरोध किया। इस विरोध के बहाने दूर दूर रहने वाले कलाकार भी एक दुसरे के नज़दीक आए। देश विदेश का हर कलाकार सिद्धांत सूत्र में बंधा महसूस हुआ। इस विरोध दिवस से अहसास हुआ कि  कितनी प्यारी है हर कलाकार को अभिव्यक्ति की आज़ादी।  

Saturday, October 08, 2016

इप्टा को और मज़बूत करेगा इप्टा विरोधियों का हमला

देश के कोने कोने तक पहुँच रही है इप्टा पर हमले की आग 
इंदौर//चंडीगढ़//लुधियाना: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
इंदौर में उठी चिंगारी अब आग बन कर पूरे देश में फैलने की तैयारी में है। गौरतलब है कि इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन में आरएसएस  समर्थकों ने अचानक पहुँच कर मंच को कब्ज़े में ले लिया था और नारेबाजी की थी। आपसी टकराव में लात घूंसे भी चले और हाल के बाहर पथराव भी हुआ था। इस हमले का तीखा विरोध भी हुआ। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की मध्यप्रदेश इकाई के राज्य सचिव बादल सरोज ने हमले के दिन चार अक्टूबर को ही स्पष्ट कह दिया था हा कि इंदौर में शुरू हुए इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के राष्ट्रीय सम्मेलन के मंच पर कुछ संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा हमले की कोशिश की गयी जो भर्त्सना योग्य है। उन्होंने इसकी सख्त निंदा की थी। 
कुण्ठित तालिबानी सोच 
श्री सरोज ने यहां पार्टी की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा था कि सम्मेलन पर कुछ स्वयंभू हिंदुत्व ध्वजाधारियों ने धावा बोला जो एक आपराधिक हरकत है। उन्होंने कहा कि किसी भी साहित्यिक, सांस्कृतिक, वैचारिक आयोजन पर गुंडागर्दी की कोशिशें न सिर्फ अलोकतांत्रिक हैं, बल्कि शुद्ध रूप में कुण्ठित तालिबानी सोच और हिटलरी फासीवादी कार्यशैली का घिनौना प्रतिरूप हैं। माकपा इस बेहूदा हरकत की भर्त्सना करती है। देश के अन्य भागों में भी इसका विरोध हुआ था। 
13 अक्टूबर को राष्ट्रव्यापी विरोध
इसके विरोध में इप्टा ने 13 अक्टूबर को राष्ट्रव्यापी विरोध की घोषणा की है। इसकी तैयारियां तकरीबन हर जगह जोरशोर से जारी हैं। यएह विरोध दिवस इप्टा को एक बार फिर सक्रिय तो करेगा हिसाथ ही उन जगहों पर भी पहुंच देगा जहाँ इप्टा का आधार नहीं है या अब टूट चूका है। 
इप्टा पर राजनीती का आरोप
दूसरी तरफ इप्टा के विरोधियों का कहना है कि वे इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में रंगमंच के राजनीतिक मंच में बदल जाने से शहर के कला प्रेमी निराश हुए। उनकी शिकायत है कि इस तीन दिवसीय सम्मेलन और राष्ट्रीय जन सांस्कृतिक महोत्सव में इप्टा ने आम शहरी को जोड़ने की कोशिश नहीं की, बल्कि मंच का इस्तेमाल विचारधारा विशेष को बढ़ाने के लिए किया गया। इनका यह भी कहना है कि इप्टा का इस्तेमाल अब जन मुद्दों पर आधारित न होकर एक विशेष विचारधारा के प्रवक्ता की तरह किया जा रहा है। 
इंदौर में ही रंगकर्मी सुशील जौहरी का कहना था कि यह आयोजन किसके लिए हुआ, किन उद्देश्यों को लेकर हुआ, जिस गरीब तबके की आवाज इप्टा बनता रहा है, क्या उनकी बात हुई, बात कहां तक पहुंची, इन सबका विश्लेषण जरूरी है। संस्कृति कर्म विशेषकर नाटकों के लिए लोग इप्टा को जानते हैं और जब इसका राष्ट्रीय सम्मेलन इंदौर में होने की घोषणा हुई तो शहर के रंगकर्मी और कलाप्रेमियों में उत्साह था। शहर के लिए यह पहला मौका था कि देश की बड़ी और पुरानी नाट्य संस्था का राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, लेकिन पहले सत्र में ही सर्जिकल स्ट्राइक को शर्मनाक बताकर विवाद खड़ा कर दिया गया। इंदौर थिएटर एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील गोयल कहते हैं राष्ट्र सर्वोपरि होना चाहिए, देश के मान-सम्मान को हानि नहीं होना चाहिए। इप्टा के मंच से उठे मुद्दे उससे जुड़े लोगों का नैतिक चिंतन है, निजी मसला है। मंच से नाटकों के जरिए सामाजिक उत्थान और गरीबों के हित में मुद्दे उठना चाहिए थे, जिसके लिए इप्टा को बरसों से जाना जाता है।
आखिरी दिन हमला एक सुनियोजित साज़िश 
उल्लेखनीय है कि इप्टा के इस राष्ट्रीय  सम्मेलन के आयोजन की घोषणा तक इसका कोई विरोध नहीं हुआ। जब इस सम्मेलन में 20 राज्यों से करीब एक हज़ार डेलीगेट इसमें शामिल हुए तो इसकी सफलता से इसके विरोधी कैम्प में भी खलबली मचने लगी। सम्मेलन के आखिरी दिन हमले की योजना को अम्ल में लाया गया। सभी को मालूम था कि  अधिकतर लोग अन्य राज्यों से ए हैं और आखिरी दिन का कर्यक्रम देखने के बाद सभी अपने अपने गन्तव्य की ट्रेन पकड़ कर रवाना हो जाएंगे। अगर यह हमला पहले होता तो इप्टा के सदस्य और अन्य कलाकार अगले दिन इंदौर में रोष मार्च आयोजित करके हंगामा खड़ा कर सकते थे। इसलिए हमलावरों ने आखिरी दिन चुना। सूत्रों के मुताबिक हमले के बाद जब इप्टा के कुछ कार्यकर्ता पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखाने गए तो वहां गेट से पहले ही हमलावरों के लोग  मौजूद थे। सारी   स्थिति को भांप कर रिपॉर्ट लिखने गए लोग वापिस आ गए। 
शुरू हो चुका है हमले का विरोध 
विरोध दिवस के तौर पर 13  अक्टूबर को सारे देश में विरोध व्यक्त करने की काल से पहले ही हमले का विरोध शुरू हो चुका है।  इंदौर में तो चार अक्टूबर को ही तीखा विरोध दर्ज कराया।  पटना में विरोध का सिलसिला 5 अक्टूबर को ही शुरू था। अब देश हिस्सों में भी विरोध की आवाज़ गूंजने वाली है। इप्टा के वो लोग जो जन आंदोलनों और जन शक्ति से वाबस्ता नहीं रहे उनको शायद इसकी सफलता पर सन्देह हो या किसी तरह का डॉ लेकिन इप्टा का खामोश बैठा केडर जानता है कि अब फिर से इप्टा के दिन लौटने वाले हैं। इप्टा पर हुआ हमला इप्टा को और मज़बूत बना कर जायेगा।   

Friday, October 07, 2016

RSS हमले के खिलाफ इप्टा ने किया देशव्यापी प्रतिरोध का आह्वान

Posted on Friday 7th October 2016 at 12: 27 by whatsapp
इप्टा युद्ध और आतंकवाद दोनों का ही कड़ा विरोध करती है
प्रदीप शर्मा//पंजाब स्क्रीन 
इप्टा के कैम्प आफिस इंदौर से जारी वक्तव्य 
इंदौर में 02 से 04 अक्टूबर तक आयोजित इप्टा के 14वें राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतिम दिन आनंद मोहन माथुर सभागृह में समापन सत्र के दौरान दक्षिणपंथी संगठनों से संबद्ध कुछ युवाओं ने सत्र की कार्यवाही को रोकने का प्रयास किया, जिसके परिप्रेक्ष्य में भारतीय जन नाटय संघ ने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे हमलों के विरोध में 13 अक्टूबर का दिन प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया है। यह बयान इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा ने आज सुबह इप्टा सदस्यों के नाम जारी किया। 
इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा ने कहा कि इप्टा के सम्मेलन के दौरान हुआ यह हमला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों द्वारा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार किये जा रहे हमलों की कड़ी का ही एक हिस्सा है। इप्टा का जन्म 1943 में भारत के स्वतत्रंता संग्राम में 1943 में हुआ है। यह द्वित्तीय विष्वयुद्ध का समय भी था और अपनी शुरुआत से ही इप्टा न केवल युद्ध के विरोध में खड़ी हुई है बल्कि देश की संप्रभुता और एकता को बचाने के लिए भी मजबूती से खड़ी रही है और इसके लिए इप्टा के तमाम कार्यकर्ता ब्रिटिश शासन के दौरान जेल भी गए हैं। उन्होंने आगे कहा कि इप्टा युद्ध और आतंकवाद दोनों का ही कड़ा विरोध करती है क्योंकि दोनों ही नवउदारवादी संकट का परिणाम हैं। हम देखते हैं कि यह शासक वर्ग की वही जनविरोधी व्यवस्था है जिसमें जनता की शांति के लिए काम करने वालों की छवि देशविरोधी की छवि बनाकर प्रस्तुत की जाती है। यह हमारी  देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति हमारी प्रतिबद्धता ही है कि हम उस युद्ध का विरोध करते हैं जो दोनों ही देशों में इंसानी जिंदगियों को खत्म कर देगा। भारत के लोगों के पास अपने सैनिकों की जान दांव पर लगाकर भी पाने के लिए कुछ नहीं है। उन्होंने इप्टा की तमाम इकाइयों के साथ अन्य समानधर्मा लेखक, सांस्कृतिक व सामाजिक संगठनों से यह अपील की है कि सभी 13 अक्टूबर 2016 का दिन अभिव्यक्ति की आजादी पर हमलों के खिलाफ प्रतिरोध दिवस के रूप् में मनाएं और साम्प्रदायिक फासीवाद, आतंकवाद, युद्धोन्माद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों के विरुद्ध लोगों को एकजुट करें।

Tuesday, October 04, 2016

Indore:इप्टा के राष्ट्रिय अधिवेशन स्थल पर आर एस एस का हमला

जवाब में इप्टा सदस्यों ने लगाए इन्क़लाब ज़िंदाबाद के नारे 
इंदौर/लुधियाना: 4 अक्टूबर 2016: (प्रदीप शर्मा//पंजाब स्क्रीन): 
इंदौर में "इप्टा" के राष्ट्रीय सम्मेलन में उस समय अफरातफरी मच गयी जब आर एस एस और उनके सहयोगी संगठनों ने कार्यक्रम को रुकवाने के लिए अचानक वहां पर हमला कर दिया। बाहर से अचानक अंदर घुसे इन लोगों ने मंच पर कब्ज़ा कर लिया और कहा कि हम कन्हैया के समर्थकों का कर्यक्रम नहीं चलने देंगें। जब तक यह खत्म नहीं होता तब तक हम यहीं रुकेंगे। इसके साथ ही भारत माता ज़िंदाबाद के नारे तेज़ क्र दिए गए और धक्का मुक्की शुरू कर दी गयी। ये लोग भारत माता ज़िंदाबाद के नारे गया रहे थे। इन के साथ कुछ इक्का दुक्का सरदार भी थे जो इनकी अगवानी करने वालों थे।  ये लोग जबरदस्ती अंदर घुस कर मंच पर चढ़ गए और मंच पर कब्ज़ा कर लिया। इस सम्मेलन में कुछ महिलाएं भी अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ मौजूद थी। इसमें कुछ बेहद्द वृद्ध कलाकार भी आये हुए हैं। गौरतलब है कि पंजाब और चंडीगढ़ से कम से कम 31 कलाकार इसमें भाग लेने के लिए गए हुए हैं। 
हमले के जवाब में इप्टा सदस्यों ने इन्क़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाए और ज़्यादा खरमस्ती पर उतारू संघ कार्यकर्तायों को हाथों से भी अच्छा सबक सिखाया। यह सब कुछ करीब पौने चार बजे शाम को शुरू हुआ। संघ के हमलावर लाठियों से भी लैस थे। तिरंगे झंडे भी कुछ लोगों ने  पकड़ रखे थे लेकिन अंदाज़ पूरा गुंडागरी का था। इप्टा के लोगों ने पहले तो समझाया लेकिन नहीं मने तो फिर हाथ भी दिखाए। यह हमला और मंच पर  कब्ज़ा करीब 20-25 मिनट तक रहा। इस हमले के बावजूद वहां पुलिस या कोई अन्य दल सुरक्षा के लिए नहीं आया। अगर इप्टा के लोग जवाब में सख्त रुख इख़्तियार नहीं करते तो  ये लोग सफदर हाश्मी जैसी वारदात दोहरा चुके होते। हफरदफरी समाप्त होने के बाद अगली रणनीति पर विचार विमर्श हुआ क्योंकि जाते जाते ये संघी लोग दोबारा आने को भी कह गए हैं। इप्टा के राष्ट्रिय अधिवेशन का आज आखिरी दिन है जो रात को समाप्त होगा। आज शाम पांच बजे कर 10 मिनट पर कार्यक्रम दोबारा शुरू हो गया। 
हमले की खबर आने के साथ ही हर तरफ निंदा की लहर दौड़ गयी और गुस्सा फ़ैल गया।  लुधियाना इप्टा के अध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्र, उपाध्यक्ष डॉक्टर गुलज़ार पंधेर और सचिव मनिंदर सिंह भाटिया ने एक संयुक्त बयान में इस हमले की सख्त निंदा की। लुधियाना इप्टा ने हमलावरों के खिलाफ केस दर्ज करने की मांग की है। लुधियाना इप्टा ने याद दिलाया कि इप्टा ने बलराज साहनी, कैफ़ी आज़मी और ए के हंगल जैसे देश भक्त कलाकारों को दिया है।  इस फाशी हमले से हम अपने मिशन को नहीं रोकेंगे। हम जन मुद्दों की आवाज़ उठाना बन्द नहीं करेंगे। हम धर्मनिरपेक्षता को तोड़ने के  होने देंगें।  

आज देश में युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है- हम युद्ध के खिलाफ हैं

हम सर्जिकल ऑपरेशन में नहीं निदान में भरोसा करते हैं
इंदौर: 2 अक्टूबर 2016: (प्रदीप शर्मा//पंजाब स्क्रीन):
मानव से मानव के रिश्ते को और मज़बूत बनाता हुआ इप्टा का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन आज रात समाप्त हो जायेगा। हिन्दोस्तान के अलग अलग स्थानों के दर्द को यहाँ इप्टा मंच पर एक दुसरे के साथ बाँटने और फिर उस दर्द को संघर्ष की एक ऊर्जा में बदलते हुए हम फिर अपने अपने घरों की तरफ रवाना हो जाएंगे। हम  हमारा  हमारी विचारधारा हमें जोड़े रखेगी।  हम क्रांति की शमा को रौशन रखेंगे।
सम्मेलन प्रथम अक्टूबर को स्थानीय आनन्द मोहन माथुर सभागृह में बेहद उत्साह से शुरू हुआ।शुरूआत पारम्परिक रूप से झंडे साथ हुई। झंडोत्तोलन इंदौर के सुपरिचित संस्कृति कर्मी औए पूर्व सांसद होमी दाजी की पत्नी ने किया। इसके बाद भिलाई इप्टा ने मणिमय मुखर्जी के संगीत निर्देशन में एक जनगीत 'हमने ली कसम' की प्रस्तुति दी। यह केवल एक गीत नहीं था--सचमुच में भी हमारी कसम थी। 

उत्साहित सदस्यों को सुवाग्त्म कहते हुए मप्र इप्टा के अध्यक्ष हरिओम राजोरिया ने  यादगारी पर स्वागतीय भाषण दिया। इप्टा के महासचिव राकेश ने कहा की चार्ली चैपलिन कहा करते थे कि कला जनता के नाम एक प्रेम पत्र है। हमने इसमें यह जोड़ने की हिमाकत की कि यह शाषकों के  विरुद्ध,  साम्राज्यवाद के विरुद्ध, शोषण और असमानता के विरुद्ध अभियोग पत्र भी है। उन्होंने कहा कि आज देश में युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। हम युद्ध के खिलाफ हैं क्योंकि युद्ध समस्याओं की समाप्ति नहीं शुरुआत है। हम भगत सिंह की विरासत को लेकर चलते हैं। एक समय उन्हें भी आतंकवादी कहा गया था। हम अपने सांस्कृतिक औजारों से उनकी लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे। हम युद्ध और आतंकवाद से एक साथ लड़ेंगे।


इसके इसके पश्चात् इप्टा के पूर्व अध्यक्ष ए. के.हंगल, पूर्व महासचिव जितेंद्र रघुवंशी, पंडित रविशंकर, ओ. एन करूप, कामरेड ए. बी. बर्धन, रवि नागर, जुगल किशोर, जोहरा सहगल महाश्वेता देवी, राजेन्द्र यादव, रविन्द्र कालिया, नेल्सन मण्डेला, पीट सीगर, आर के लक्ष्मण, मन्नाडे, भूपेन हजारिका, जसपाल भट्टी, सतपाल डांग आदि दिवंगत साथियो-कलाकारों और अन्य जन नेताओं को श्रद्धांजलि दी गई।


 यादगारी फिल्म "गर्म हवा" के लिए चर्चित फिल्मकार और इप्टा के उपाध्यक्ष साथी एम. एस. सथ्यू ने उद्घाटन भाषण देते हुए कहा कि वे 1960 में इप्टा में आए जब वे मुम्बई इप्टा की रिहर्सल देखा करते थे।


मौजूदा हालात का ज़िक्र करते हुए उन्होंने  कहा कि लड़ना आसान है पर शांति से बर्ताव करना मुश्किल है। टेकनोलॉजी के उपयोग से अब लड़ाई और भी आसान हो गयी है है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह गांधी का देश है। आज की सरकार शान्ति के आवरण को फाड़कर फेंक रही है। इस नाज़ुक हालत में हमारी जिम्मेदारी बड़ी है। समाजवाद सबको बराबरी का मौका देता है, इसलिए हमें साम्प्रदायिकता के साथ-साथ जातिवाद से भी लड़ना है।  थिएटर दुनिया को बदल नहीं सकता पर यह इसके लिए प्रेरित कर सकता है।


उन्होंने गिला भी किया कि मुझे उद्घाटन भाषण देने के लिए बुलाया गया। अच्छा होता कि मुझे भाषण देने के बदले नाटक करने के लिए बुलाया गया होता तो मैं अपनी बात बेहतर ढंग से रख पता।


विचारधारा को आगे बढ़ते हुए राजेन्द्र राजन, महासचिव, प्रलेस  ने कहा कि जब इप्टा का गठन नहीं हुआ था तब भी सांस्कृतिक जागरण का काम हम करते थे। प्रेमचन्द रंगशाला को मुक्त करने के लिए एक लम्बी लड़ाई हमने बिहार में लड़ी। लाठियाँ भी खाईं। लड़ाई की इस विरासत से जुड़े होने के कारण मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ। हम सर्जिकल ऑपरेशन में नहीं निदान में भरोसा करते हैं। प्रलेस दिशा देने का काम करता है। इस धारा को कुंद करने के प्रयास पिछले दिनों खूब हुआ। हम उनके लिए एक बेहतर दुनिया चाहते हैं जो भूखे सोते हैं। निश्चय ही उसमें अम्बानी अडानी शामिल नहीं हैं। हम एनजीओ कल्चर के विरुद्ध हैं। अनुदान कला के धार को भोंथरा कर रहा है। इप्टा और प्रलेस को मिलकर इन चुनौतियों का सामना करना है। लेखक और कलाकार को संगठित होकर लड़ाई लड़नी है। जब कबीर कहते थे कि 'दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवै' तो वह दरअसल उनका रोना नहीं होता था। वह विद्रोह का आह्वान करते थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि लडाई के गीत अब भी रचे जाएंगे और यह काम इप्टा के साथी ही कर सकते हैं। निश्चय ही यह काम अब और ज़ोर से होगा। इसके बाद अशोक नगर इप्टा द्वारा वामिक जौनपुरी का एक जनगीत "जब भी नाव चलती है" प्रस्तुत किया गया ।


इसके बाद बारी आई उन महान लोगों को याद  जिन्होंने  इप्टा को मज़बूत किया तांकि  मज़बूत। साथी शमीम फैजी ने कामरेड बर्धन को याद करते हुए कहा कि वे ही मुझे इस आंदोलन में  लेकर आए। मुझ जैसे कई युवा उनके ही कारण आंदोलन से जुड़े। वे सही मायनो में बहु-आयामी थे। अनेक आंदोलनों से जुड़े। साढ़े ग्यारह साल जेल में रहे। कोई 3 साल भूमिगत रहे। वे विचारों को बेहद सरल भाषा में रखते थे। वे आर्ट और कल्चर के साथ भी उतनी ही शिद्दत से जुड़े थे, जितने अन्य संघर्षो से। इसीलिए इप्टा से उनका जुड़ाव समझ में आता है। इसके सम्मेलनों में शिरकत की बागडोर मुझे सौंपते हुए हुए उन्होंने एक बार विनोद में कहा की मैं संस्कृति की बागडोर एक गैर सांस्कृतिक आदमी को सौंप रहा हूँ। साथी शमीम के वक्तव्य के बाद ए. बी. बर्धन के भाषण का एक अंश परदे पर दिखाया गया और उत्पल बेनर्जी ने फैज की एक नज्म 'हम देखेंगे' का गायन किया।


इस अवसर पर इप्टा के पूर्व महासचिव जितेन्द्र रघुवंशी को याद करते हुए राकेश ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दोस्त, एक साथी की चर्चा इस तरह से करनी होगी। बकौल दुष्यंत,"उखड़ गया है एक बाजू जबसे, और ज़्यादा वज़्न उठाता हूँ। अब ये दायित्व हम पर है कि उनकी अनुपस्थिति में ज्यादा जिम्मेदारी से काम करें। सन 57 में दिल्ली में पूर्व गठित इप्टा का आखिरी सम्मेलन हुआ था और 60 में इप्टा बिखर गई। 85 में हम आगरा में मिले और कैफ़ी के नेतृत्व में ये कारवां जितेंद्र ने आगे बढ़ाया। बकौल राजेन्द्र यादव वे बड़े कथाकार हो सकते थे, वे बड़े अनुवादक हो सकते थे पर उन्होंने इप्टा के संघठन का जिम्मा चुना। इप्टा दरअसल उन्हें घुट्टी में मिली थी। राकेश के वक्तव्य के बाद जितेंद्र जी पर फ़िल्म दिखाई गयी, जिसका निर्माण दिलीप रघुवंशी ने किया है।

विनीत तिवारी के संक्षिप्त परिचय के बादव्अंधविस्वास निर्मूलन समिति, सांगली, महाराष्ट्र ने एक नाटक का मंचन किया। सोचने की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता राजसत्ता के लिए खतरा होती है, इस बात को रेखांकित करते हुए नाटककारों ने कहा, तुम गोली चलाओगे, हम एक कविता लिखेंगे। तुम गोले दागोगे, हम एक नाटक खेलेंगे! इसी बीच हुए संघ के हमले की सभी ने निंदा की। पंजाब में भी जब यह खबर पहुंची  तो पंजाब में भी इसका तीखा विरोध हुआ। बहुत से संगठनों ने इस हमले की सख्त निंदा की।  

Sunday, September 04, 2016

मधुबनी में इप्टा का विशेष आयोजन 5 सितम्बर को

कला है जीवन का संग्राम--जन शक्ति को  लाल सलाम लाल सलाम
आम इन्सान के लिए  ज़िन्दगी हमेशां एक नई चुनौती बन कर सामने आई किसी न किसी नई मुसीबत की तरह। बहुत से लोग हिम्मत हार जाते।  हालात के सामने घुटने टेक देते। मौत से भी भयंकर हालात की आंख में आँख डाल कर मुस्कराना सिखाने वालों इप्टा का नाम गर्व से लिया जाता है। वह 25 मई 1943 का एक यादगारी दिन था जब मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इप्टा की स्थापना के अवसर की अध्यक्षता की और आह्वान किया, “लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग़ से काम करने वाले आओ और स्वंय को आज़ादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो”। 
 जिन की अंतरात्मा अभी भी ज़िंदा है और जाग रही है उनको प्रो. हीरेन मुखर्जी की आवाज़ आज भी सुनाई दे रही है। उनको साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी साहिब की नज़्में बार बार बुलाती हैं। उनको बलराज साहनी आज भी प्रेरणा देते हैं। 
भारतीय जननाट्य संघ (ईप्टा) मधुबनी … दिनांक 05-09-2016 को…
सभागार आर० के० कॉलेज मधुबनी में
समय 10 बजे पूर्वाहन से दिन के 03 बजे तक
शिक्षक दिवस समारोह सह मधुबनी नगर सम्मेलन करेगी…
आप सभी जो समाज के प्रति वैज्ञानिक नजरिया रखतें हैं सादर आमंत्रित है…
आप चाहें तो निमन्त्रण पत्रों पर दर्ज फोन नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं। 
निमंत्रण पत्र को बड़ा करके देखने के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें।