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Sunday, January 06, 2013

सिक्किम की सुगंध-टेमी चाय

03-जनवरी-2013 14:58 IST
दुनिया भर के चाय प्रेमियों का दिल जीत लिया 
टेमी चाय पर विशेष लेख                                                         * खगेन्‍द्रमणि प्रधान
                                                                                                                                  Courtesy Photo
आकर्षक और भव्‍य माउंट कंचन ज़ोंगा की पृ‍ष्‍ठभूमि में तीस्‍ता नदी की सुहावनी समीर के साथ सिक्किम हर सुबह टेमी चाय का आनंद लेता है। 4500 से 6,316 फुट की ऊंचाई पर फैली ढलान वाली 180 हेक्‍टेयर भूमि में टेमी चाय के बागान हैं, जहां बहुत ही बढ़िया परम्‍परागत चाय की पैदावार होती है, जिसकी चाय के कदरदान तारीफ करते नहीं थकते।
    टेमी चाय बागान की स्‍थापना सिक्किम के पूर्व नरेश चोग्‍याल के शासनकाल में 1969 में हुई थी और बड़े पैमाने पर इसका उत्‍पादन 1977 में शुरू हुआ। चाय बागान के रोजमर्रा के काम-काज को व्‍यवस्थित रखने के लिए 1974 में चाय बोर्ड की स्‍थापना की गई और बाद में यह सिक्किम सरकार के अंतर्गत उद्योग विभाग की सहायक कम्‍पनी बन गई। टेमी चाय से जहां एक ओर 4 हजार से अधिक श्रमिकों और 30 कर्मचारियों को सीधे रोजगार मिलता है, वहीं यह कम्‍पनी सरकारी क्षेत्र में रोजगार प्रदान करने वाली एक बड़ी कम्‍पनी बन गई है।
    हल्‍की ढलान वाली यह भूमि तेंदोंग पर्वत श्रृंखला से शुरू होती है। 30-50 प्रतिशत ढलान वाली दुम्‍मट मिट्टी की यह भूमि चाय बागान के लिए बहुत ही उपयुक्‍त है और यहां साल में लगभग 100 टन चाय की पैदावार होती है। यदि बड़े चाय बागानों से मुकाबला किया जाए, तो यह पैदावार बहुत ज्‍यादा नहीं है, लेकिन इसकी गुणवत्‍ता और सुगंध ने भारत और दुनिया भर के चाय प्रेमियों का दिल जीत लिया है।
    टेमी चाय बागान में पैदा हुई चाय को ''टेमी चाय'' जैसे कई ब्रांड नामों से पैक किया जाता है, जो सबसे बढ़िया क्‍वालिटी की चाय होती है, जिसमें सुनहरी फूलों जैसी नारंगी झलक वाली बढि़या काली चाय होती है। इसके बाद दूसरी बढ़िया चाय का लोकप्रिय ब्रांड नाम है 'सिक्किम सोलजा' और उसके बाद 'मिस्‍टीक चाय' और 'कंचनजंगा' चाय का नाम आता है। इसे 'ऑर्थोडोक्‍स डस्‍ट टी' के नाम से बेचा जाता है। चाय की लगभग 70 प्रतिशत पैदावार अधिकृत दलाल के माध्‍यम से कोलकाता में सार्वजनिक नीलामी से बेची जाती है और बा‍की की चाय के रिटेल (खुदरा बिक्री के लिए) पैकेट बनाए जाते हैं और स्‍थानीय बाजार में बेचे जाते हैं।
    चाय बागान की भूमि की भौगोलिक स्थिति और चाय के पौधों को जैविक खाद से पोषित करने से इस चाय बागान में पैदा होने वाली चाय के पत्‍तों की कीमत और सुगंध और बढ़ जाती है।
    टेमी चाय बागान ने स्विटज़रलैंड की बाजार नियंत्रण से संबंधित संस्‍था-आईएमओ  के निर्देशों का पालन किया और पर्यवेक्षण की अवधि पूरी होने के बाद आईएमओ इंडिया ने, जो आईएमओ स्विटज़रलैंड का सदस्‍य समूह है, 2008 में टेमी चाय बागान को 100 प्रतिशत ऑर्गेनिक का प्रमाण पत्र दिया। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली के अंतर्गत भी यह आईएसओ-22,000 मानक के अनुसार एचएसीसीपी द्वारा भी परमाणीकृत चाय बागान है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि बाजार पहुंचने वाला उत्‍पाद उत्‍तम गुणवत्‍ता वाला है। यह भी उल्‍लेखनीय है कि टेमी चाय बागान को लगातार दो वर्षों से भारतीय चाय बोर्ड ने भी अखिल भारतीय गुणवत्‍ता पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया है।
    चाय उत्‍पादन की पूरी प्रक्रिया को परंपरागत से ऑर्गेनिक में बदलने से न केवल इसके लिए अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में मांग बढ़ी है, बल्कि सिक्किम जाने वाले पर्यटक भी बड़ी संख्‍या में इसकी मांग करते हैं। चाय की ऑर्गेनिक खेती के लिए जैविक खाद और वर्मिन-कम्‍पोस्‍ट खाद, नीम और अरंण्‍डी की बट्टियों के रूप में कीटनाशक भी उपलब्‍ध होते हैं। चाय बागान के पास लगभग 100 एकड़ वन भूमि भी है, जिससे बड़ी मात्रा में चाय बागान के लिए जैविक खाद-पदार्थों की पूर्ति हो जाती है, जो इसे आवश्‍यक संसाधनों की दृष्टि से आत्‍मनिर्भर बनाता है।
    खेती में रासायनिक खादों के इस्‍तेमाल को छोड़कर पैदावार के ऑर्गेनिक तरीके अपनाने से न केवल टेमी चाय बागान की उत्‍पादन लागत कम हुई है, बल्कि हानिकारक रसायनों से मुक्‍त ऑर्गेनिक पैदावार को पसंद करने वालों का एक बहुत बड़ा बाजार भी मिल गया है। टेमी चाय बोर्ड को अपनी सफलता पर गर्व है और वह सरकारी राजस्‍व में भी पर्याप्‍त योगदान दे रहा है।
    जर्मनी, ब्रिटेन, अमरीका और जापान टेमी चाय के प्रमुख खरीददार हैं। ग्रीन टी की बढ़ती मांग को देखते हुए इसमें विविधता लाने के कई प्रयास किए जा रहे है और इसकी कीमत बढ़ाने के लिए अधिक आकर्षक डिज़ाइन वाले पैकेट तैयार किए जा रहे हैं। इसके अलावा सिक्किम की इस चाय के लिए विदेशी बाजार में सीधे खरीददार बनाने के भी प्रयास किए जा रहे हैं। चाय बोर्ड ने कनाडा और जापान को ऑर्गेनिक चाय के छोटे पैकेट सीधे निर्यात करना भी शुरू कर दिया है, जहां इसके लिए स्‍पर्धात्‍मक और आकर्षक दाम मिल रहे हैं।
    चाय बागान के विस्‍तार के लिए उपयुक्‍त भूमि न मिलने से इसके क्षेत्र का विस्‍तार नहीं हो पा रहा है। लेकिन टेमी चाय बागान छोटे किसानों और उत्पादकों को बढ़िया पौध और अन्‍य तकनीकी जानकारी की सहायता उपलब्‍ध करा रहा है। बागान की नर्सरी में बढ़िया पौध तैयार की जाती है, जिसका वितरण राज्‍य के छोटे चाय बागानों की सहकारिताओं में किया जाता है।
    हालांकि टेमी चाय चाय पारखियों की उम्‍मीदों पर खरी उतरी है, फिर भी चाय बागान की जलवायु संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए यहां अधिक कीमत वाली और बढि़या चाय पत्‍तों वाली पैदावार की अभी भी गुंजायश है।
            (PIB)       (पत्र सूचना कार्यालय विशेष लेख)सिक्किम की सुगंध-टेमी चाय
*फ्रीलांस पत्रकार
नोट: लेखक द्वारा इस लेख में व्‍यक्‍त किए गए विचार आवश्‍यक नहीं कि पत्र सूचना कार्यालय के विचारों से मेल खाते हों।

 सिक्किम स्क्रीन में भी देखें 
  
मीणा/राजगोपाल/लक्ष्‍मी-03

Sunday, March 25, 2012

केन्द्रीय बजट और ग्रामीण भारत//राजीव गुप्ता का विशेष लेख

ग्रामीण भारत से जुड़ाव दिखाने का प्रयास और हकीकत
                                                                                                                     तस्वीर भारत जल पोर्टल से साभार 
पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन से सबक लेते हुए एवं  रेल बजट से उत्पन्न हुए गर्म सियासी माहौल के बीच वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने यूपीए सरकार की दूसरी पारी का तीसरा बजट पेश करते हुए अपने को आम आदमी अर्थात ग्रामीण भारत से जुड़ाव दिखाने का प्रयास किया ! हालाँकि ग्रामीण भारत के लिए जितनी घोषणाएं वित्त मंत्री ने की है वह अभी अपर्याप्त है परन्तु फिर भी कुछ हद तक स्वागत योग्य है लेकिन यह भी कड़वा सच है आने वाले समय में महंगाई की मार से आम आदमी फिर से और त्रस्त होगा क्योंकि वित्त मंत्री द्वारा सेवा कर में दो प्रतिशत (पहले दस प्रतिशत थी अब बारह प्रतिशत हो जायेगी ) की वृद्धि के प्रयोजन के साथ  - साथ आम जनता को दी जा रही  सब्सिडी में कटौती का बंदोबस्त कर दिया गया है जिसके कारण लोक - लुभावनी घोषणाओं के साथ - साथ महंगाई का दंश झेल रहा आम आदमी की जेब अब और भी ढीली होगी ! या यूं कहा जाय कि मामला अब एक हाथ दे और एक हाथ ले का हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी !
लेखक: राजीव गुप्ता 
बहरहाल इस बजट से कुछ हद तक किसानो को जरूर फायदा होगा और अब किसानों को किसानी घाटे का सौदा नहीं रह जायेगा ! ज्ञातव्य है कि एन एस एस ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 41 फीसदी किसान अपनी किसानी छोड़ना चाहते है ! 2.5 की ग्रोथ दर से कृषि क्षेत्र जहां अपनी सांसे गिन रहा था तो ऐसे में कृषि एवं सहकारिता विकास के लिए वित्त मंत्री द्वारा चालू वित्त वर्ष आयोजना परिव्यय को 18 फीसदी बढाकर 17123 करोड़ रूपये (2011 -2012 ) से 20 ,208 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) करने के साथ-साथ कृषि कर्ज में  भी 1 ,00 ,000  करोड़ रुपये का इजाफा करते हुए 4,75,000 करोड़ रुपये (2011 -2012 ) से 5,75,000 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) की व्यवस्था कर दी गयी है जिससे कुछ हद तक सूदखोरों से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है ! साथ ही किसानों को प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर पर अल्पावधि फसल ऋण के लिए ब्याज आर्थिक सहायता को जारी रखा गया है एवं कर्ज समय से चुकाने वाले किसानो को 3 प्रतिशत की अतिरिक्त राहत की व्यवस्था की जायेगी ! 
यूरिया उत्पादन - क्षेत्र में अगले पांच वर्ष में आत्म निर्भरता का लक्ष्य स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक लगभग 25 प्रतिशत यूरिया आयत किया जाता है साथ ही उर्वरक सब्सिडी किसानो और रिटेलरों को सीधे देने की घोषणा भी स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक ऐसा माना जाता था कि उर्वरक सब्सिडी के 40 प्रतिशत से ही किसान लाभान्वित होते थे बाकी 60 प्रतिशत उर्वरक उद्योग  उर्वरक सब्सिडी का लाभ उठाते थे ! सरकार ने नंदन नीलकणि जो कि आईटी नीति से संबंधित है की अध्यक्षता वाले कार्यबल की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा है कि सब्सिडी का सीधा अंतरण किया जायेगा और इनके आधार पर एक  मोबाइल आधारित उर्वरक प्रबंध प्रणाली तैयार की गई है जिसे 2012 में पूरे देश में लागू किया जाएगा !  उर्वरकों के दुरूपयोग में कमी और सब्सिडियों पर व्यय कम करने के उपायों से 12 करोड़ किसान परिवारों को लाभ होगा ! वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 में कृषि क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए कई लुभावनी घोषणाएं की है जो कि स्वागत योग्य है !
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक - नाबार्ड
समन्वित ग्रामीण विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र में संमृद्धि सुनिश्चित करने हेतु कृषि , लघु उद्योगों , कुटीर एवं ग्रामोद्योगों हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्प कलाओं के विकास में आने वाली ऋण समस्याओ के निपटान हेतु बनाई  गयी इस योजना को वित्त मंत्री ने 10 ,000 हजार करोड़ रुपये प्रावधान किया है !
किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी
किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी  का उद्देश्य मौसमी कृषि परिचालनो के लिए  पर्याप्त , कम लागत पर और समय पर बिना किसी झंझट के अल्पावधि ऋण प्राप्त करने में कृषको को होने वाली कठिनाइयों को दूर करना है ! मौखिक पट्टेदार , काश्तकारों और बटाईदारों आसी सहित सभी कृषक वर्गों को इस योजना में शामिल किया गया है ! कृषि यंत्र , खाद व अन्य खेती से जुड़े समानो की खरीदारी के लिए उपयोग में आने वाला किसान क्रेडिट कार्ड से अब एटीएम की तर्ज पर नकदी भी प्राप्त किया जा सकेगा ! इससे किसानो को फसल के समय कृषि यंत्र, बीज, उर्वरक इत्यादि के लिए ऊंचे दरों पर ब्याज लेने की आवश्यकता नहीं होगी ! साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड की खरीद सीमा बढ़ाने पर भी सरकार विचार कर रही है ! गौरतलब है कि वर्तमान समय में किसानो को 25 ,000 रूपये तक की सीमा का किसान क्रेडिट कार्ड दिया जा रहा है !
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले हर एकल परिवार जिसमे माता , पिता और उन पर आश्रित बच्चे शामिल है का साल में सौ दिन का अकुशल शारीरिक काम मांगने और प्राप्त करने का हक बनता है ! इसके अंतर्गत उपेक्षित समूहों को रोजगार प्रदान किया गया ! फरवरी 2011 तक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भागीदारी क्रमशः 28 व 24  प्रतिशत रही वही महिलाओ की भागीदारी वित्त वर्ष 2010 -2011 में 47 प्रतिशत तक हो गयी ! ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा से पलायन रोकने में काफी मदद मिली है ! इस महत्वपूर्ण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के लिए आगामी वित्त वर्ष 2012 - 2013 में सरकार ने 33 ,000 हजार करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया है ! हालाँकि पिछले वित्त वर्ष में मनरेगा को 40 ,000 करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया था !
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन - एनआरएलएम
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिदेश में सभी निर्धन परिवारों तक पहुँच सुनिश्चित करना, उन्हें स्थाई जीविका के अवसर उपलब्ध करवाना और गरीबी से ऊपर आने तक उनका पोषण करना निहित है ! एनआरएलएम के माध्यम से बेरोजगार ग्रामीण निर्धन युवाओं के कौशल विकास तथा विशेष रूप से विकसित क्षेत्रों में नौकरियों में रोजगार उपलब्ध कराने अथवा लाभकारी स्वरोजगार एवं लघु उद्योगों में रोजगार उपलब्ध कराने का उद्देश्य है ! सरकार ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 एनआरएलएम को 34 प्रतिशत के बढ़ोत्तरी करते हुए 3915 करोड़ रूपये का प्रायोजन किया है !
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना - एनआरएचएम
इस बार ग्रामीणों के  स्वास्थ्य  की चिंता करते हुए वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012-2013  के लिए  विगत वर्ष में किये गये 18,115 करोड़ रुपए आबंटन को बढ़ाकर 20,822 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया है!
बुनकर क्षेत्र को विशेष राहत 
स्‍वचालित शटल-रहित करघों को 5 प्रतिशत के बुनियादी सीमा-शुल्‍क से पूर्ण छूट देने का प्रस्‍ताव किया गया है और स्‍वचालित रेशम चरखी और प्रसंस्‍करण मशीनरी और इनके पुर्जों को भी बुनियादी शुल्‍क से पूरी छूट दे दी गयी है ! एक तरफ जहां 5 प्रतिशत की बुनियादी सीमा-शुल्‍क की इस छूट और मौजूदा रियायती दर को केवल नई टेक्‍सटाईल मशीनरी तक सीमित रखा गया तो दूसरी तरफ सेकेंड हैंड मशीनरी के लिए 7.5 प्रतिशत के बुनियादी शुल्‍क का प्रस्‍ताव किया गया जिससे बुनकर समाज को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी !
इसके साथ - साथ ग्रामीण पेयजल और स्‍वच्‍छता के लिए बजटीय आबंटन को 27 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ातें हुए वर्ष 2012-13 में 14,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए आबंटन को 20 प्रतिशत बढ़ाते हुए 24,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया है ! साथ ही पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर अपना ध्‍यान केन्‍द्रि‍त करते हुए उन्‍होंने पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि की धन राशि में लगभग 22 प्रतिशत वृद्धि करते हुए वर्ष 2012-13 में आबंटन राशि 12,040 करोड़ रुपए करने की वित्त मंत्री द्वारा घोषणा की गयी ! ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि के अ‍धीन आबंटन को बढ़ाकर 20,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया एवं सर्वशिक्षा अभियान के लिए 25,555 करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने की घोषणा भी की गयी, जो विगत वर्ष की तुलना में 21.7 प्रतिशत अधिक है ! इसी प्रकार राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के परिव्‍यय को 7860 करोड़ रुपए से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2012-13 में 9217 करोड़ रुपए करने का भी प्रस्‍ताव किया गया है !
भारत के राज्‍यों में हरित क्रांति लाने के उपायों के परिणामस्‍वरूप धान के उत्‍पादन और उत्‍पादकता में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है ! हरित क्रांति में भाग लेने वाले राज्यों ने 70 लाख टन चावल पैदा कर एक नयी मिशाल कायम की परिणामतः धान के उत्‍पादन को और बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपए के आबंटन को बढ़ाकर वर्ष 2012-13 में 1000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया ! साथ ही राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत विदर्भ सघन सिंचाई विकास कार्यक्रम के लिए 300 करोड़ रुपए आबंटित करने का भी प्रस्‍ताव किया गया ! राष्‍ट्रीय प्रोटीन पूरक आहार मिशन को सुदृढ़ बनाने और डेयरी क्षेत्र में उत्‍पादकता बढ़ाने के उद्देश्‍य से विश्‍व बैंक की सहायता से 2242 करोड़ रुपए की परियोजना की घोषणा एवं मछली पालन आदि के लिए वर्ष 2012-13 में परिव्‍यय को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपए किया जाना स्वागत योग्य कदम है ! देश में सिंचाई सुविधा के विस्‍तार के लिए आबंटन को 13 प्रतिशत बढ़ाकर वर्ष 2012-13 के दौरान 14,242 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव एक सराहनीय कदम के साथ - साथ अपर्याप्त है ! 
देश में खुले आसमान के नीचे लाखो - करोड़ों टन सड़ते अनाजों को बचाने के लिए   खाद्यान्‍नों की अतिरिक्‍त भंडारण क्षमता सृजित करने के उद्देश्‍य से भी कई उपायों की घोषणा तो की परन्तु उन  भंडारण में बिजली पहुँचाने की व्यवस्था कैसे होगी यह नहीं बताया गया ! बहरहाल वित्त मंत्री द्वारा ग्रामीण भारत को सशक्त और सुदृढ़ करने के लिए उठाया गया कदम अपर्याप्त परन्तु कुछ हद तक सराहनीय है बशर्ते इन घोषणाओं के पालन एवं उसमे पारदर्शिता हो ! भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी वर्तमान यूंपीए - 2  सरकार से ईमानदारी की अपेक्षा करना थोडा मुश्किल जरूर है परन्तु समुचित राशि अगर उन्ही के हाथो में पहुचे जिनके लिए आबंटित की गयी है तो निश्चित ही ग्रामीण भारत का जीवन आगामी वित्त वर्ष में थोडा सुधरेगा ! पर राजीव गुप्ता का विशेष लेख 

Sunday, March 04, 2012

हर दूसरे-तीसरे महीने मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा

भारत को तेल-आधारित अर्थव्यवस्था का विकल्प सोचना ही होगा
अब यह कहना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णतः  कच्चे तेल पर आधारित हो चुकी है बिलकुल भी अतिश्योक्ति नहीं होगा ! मशीनीकरण के इस आधुनिक युग में लगभग सभी उत्पादन-क्षेत्र ऊर्जा-आधारित है ! भारत में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत "पेट्रोलियम पदार्थ" है ! "पंचलाईट" से लेकर सुपरसोनिक हवाई जहाज़ और अंतरिक्षयान तक लगभग सभी उपकरणों में ईंधन के रूप में पेट्रोलियम पदार्थ का ही उपयोग होता है जिसका सरोकार समाज के हर तबके से है ! इसलिए हम कह सकते है कि वर्तमान समय में तेल रूपी "विश्व-मोहिनी" से प्रभावित होकर महंगाई "सुरसा"  की भांति अपना मुंह दिन-प्रतिदिन फैलाकर बढ़ाये जा रही है ! जिसकी मार से आम आदमी त्रस्त है, और सरकार विश्व-पटल पर तेल के दामों में बढ़ोत्तरी को जिम्मेदार ठहराकर अपना पल्ला झाड लेती है ! परन्तु जबसे यूंपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया है आये हर दूसरे-तीसरे महीने निजी कम्पनियाँ मनमानी ढंग से तेल की कीमतों में इजाफा किये जा रही है ! ज्ञातव्य है कि पिछले साल पेट्रोल के दामों मे लगभग आठ रूपये से भी अधिक तक का इजाफा किया गया ! इसका कारण निजी कम्पनियाँ  अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की लगातार बढ़ती हुई  कीमत बताती हैं ! गौरतलब है कि वर्तमान में कच्चे तेल की कीमत १२१ यूएस डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक है ! अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे के भी मुख्यतः कई  कारण हैं जैसे चीन और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में तेल की मांग में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी, तेल - उत्पादक देशो जैसे अरब देश, लीबिया आदि में हो रही राजनैतिक अस्थिरता और वहां उपजे जन असंतोष , तेल-भण्डार में हो रही निरंतर कमी, सटोरियों का दबदबा इत्यादि ! 
अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है कि मांग और आपूर्ति का समीकरण ही किसी भी वस्तु के  मूल्य को प्रभावित करता है ! दुनिया के लगभग सभी देश अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से रखने के लिए कच्चे तेल पर निर्भर है ! कच्चे तेल की मांग में लगातार जिस अनुपात में इजाफा हो रहा है उस अनुपात में आपूर्ति में इजाफा न होना तेल-मूल्यों की लपटों को गगनचुम्बी बना रहा है ! परन्तु तेल-आपूर्ति बढाकर इस समस्या से तात्कालिक निजात पाया जा सकता है जैसा कि भारत ने जून २०११ में करके दिखाया था ! ज्ञातव्य है कि २५ जून २०११ से अगले तीन दिनों तक भारत ने तेल-आपूर्ति को बढ़ा दिया था जिससे कि तेल के दामों में कुछ गिरावट आई थी हालाँकि बाद में कीमत फिर से उछल गयी थी ! परन्तु तेल-इतिहास यह कहता है कि मात्र तेल-आपूर्ति से इस गगनचुम्बी आग पर दीर्घकालीन के लिए निजात पाना संभव नहीं है ! इसलिए हमें तेल की मांग पर भी अंकुश लगाना ही होगा !  २००८ के बाद एक ऐसा समय भी आया था जब तेल-मूल्य घटकर ३० डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था ! यह चमत्कार कोई रातोरात नहीं हो गया था ! तेल-मूल्य को नीचे लाने में मुख्यतः यूरोप और अमेरिका की आर्थिक मंदी जिम्मेदार थी ! आर्थिक मंदी होने के कारण उन देशों में करों की बिक्री कम हो गयी, दूसरे देशों से आने वाली वस्तुओं की खरीदारी भी कम हो गयी और  जहाजो ने भी उड़ान भरना कम कर दिया था ! परन्तु अब पुनः एक बार फिर से तेल की मांग जोरो पर है ! जनवरी २०१२ को लन्दन में आयोजित  "मेना, MENA अर्थात मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका" आधारित दो दिवसीय सेमीनार में ओपेक - सेक्रेटरी जनरल ने बताया कि कच्चे तेल की वैश्विक मांग २०११ में ८८ मिलियन बैरल / प्रतिदिन थी जिसके २०१५ तक ९३ मिलियन बैरल / प्रतिदिन , २०३५ तक ११० मिलियन बैरल / प्रतिदिन तक बढ़ने की सम्भावना है !  अगर मांग की इसी अनुपात में तेल - उत्पादन और उसकी आपूर्ति नहीं की गयी तो आने वाले समय में एक बार फिर समूचे विश्व की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी !

लेखक:राजीव गुप्ता  
ईरान जैसा देश जहां पेट्रोलियम - पदार्थ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है उसने भी ऊर्जा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाकर समूचे विश्व को अचम्भित कर दिया ! ज्ञातव्य है कि अभी हाल ही में कुछ दिनों पूर्व ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका के लाख विरोध के बाद आगे बढ़ाते हुए नाभिकीय - ऊर्जा से विद्युत् उत्पादन के लिए ईरान के राष्ट्रपति ने परमाणु-सयंत्र का उद्घाटन किया और विश्व को दिखाने के लिए उसका टेलीकास्ट भी कराया ! इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों इटली, फ्रांस, स्‍पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल को तेल बेचने से भी मना कर दिया ! गौरतलब है कि इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है ! तेल न मिलने से इन देशो के अर्थव्यवस्था और ख़राब होगी ! अमेरिका की भी अर्थव्यवस्था पहले से ख़राब है ! अमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है ! समूचा विश्व मुख्यतः विकसित देश तेल पर अपना आधिपत्य ज़माने के लिए किस हद तक संघर्षरत है इसका अंदाजा उनकी विदेश नीति को देखकर लगाया जा सकता है ! वैसे तो तेल पर आधिपत्य को लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही कई देशों के बीच होड़ लग गयी थी !
अमरीका  अपनी नजर काकेशिया और कैस्पियन इलाके के तेल भण्डार रूस , ईरान, ईराक तथा सोवियत संघ के विखंडित हिस्सों में जो बड़े पैमाने पर मौजूद थे पर गडाए हुए था ! इसकी पुष्टि अभी हाल ही में हुए एक घटनाचक्र से लगाया जा सकता है ! गौरतलब है कि अमरीका ने अपनी  सैन्य कार्यवाही में लादेन और तालिबान के कट्टर हिस्से को ख़त्म कर और वहां अपनी मनमाफिक सरकार स्थापित किया जिससे अमेरिका न केवल अपने तात्कालिक लक्ष्य को पूरा किया अपितु उसके दूरगामी लक्ष्य यानी अफगानिस्तान के माध्यम से यूरेशियाई - ह्रदय क्षेत्र अर्थात तेल निर्यातक क्षमता वाले छोटे-छोटे  देशों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी बना ली ! इसलिए अमेरिका अब उज्बेकिस्तान, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान इजराइल तथा पश्चिमी देशों के साथ मिलकर  एशिया के चारो शक्तिशाली देश जिसमे रूस, चीन, भारत और ईरान शामिल है के विरुद्ध समीकरण बनाने में जुट गया है ! शंघाई-५ ( रूस, चीन, ताजिकिस्तान, कज़ाकिस्तान, और किरगिस्तान ) की स्थापना तथा इस समूह की ईरान के साथ मित्रता और ईराक के प्रति सहानुभूति एवं भारत-रूस की बढ़ती मित्रता ने अमेरिका के समीकरण-संतुलन को असंतुलित कर दिया ! अपने समीकरण को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने उज्बेकिस्तान से रक्षा-संधि कर ली ! इस प्रकार दुनिया के अब सभी देश अपनी विदेश नीति को तेल-केन्द्रित कर रहे है ! भविष्य में भारत की विदेश नीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह कहना मुश्किल है परन्तु संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को तेल-आधारित से मुक्त करना होगा तथा उसका विकल्प खोजना ही होगा !  राजीव गुप्ता, (98115-58925)

Sunday, January 15, 2012

छोटे शहरों के मेलों से उम्‍मीदें और आकांक्षाएं

मेला शुरू होते ही बिक जाता है बहुत सा माल*विद्या भूषण अरोड़ा
अपने हस्‍तनिर्मित जूते और चप्‍पलों के लिए बड़ी दुकान लेकर सूक्ष्‍म उद्यमी अशोक चवाड़े अब बहुत खुश हैं। राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम (एनएससीएफडीसी) से छह साल पहले लिए एक लाख रुपए के कर्ज की मदद से चवाड़े ने बड़ी दुकान ली और चमड़े की बेहतर ट्रिमिंग के लिए नई रापी मशीन भी खरीदी। इस मदद से वह पहले की तुलना में ज्‍यादा फुटवियर बना पा रहे हैं। उनके लिए कहीं ज्‍यादा संतोषजनक तथ्‍य यह है कि एनएससीएफडीसी से मिले इस कर्ज की शर्तें बेहद आसान हैं। इस कर्ज को 20 सालों में लौटाना है। इंटरमीडिएट पास अशोक महाराष्‍ट्र के नागपुर जिले के छोटे परंतु सुंदर शहर रामटेक से हैं। यहां की आबादी 50 हजार से भी कम है। यहां स्थित अनेक मंदिरों को देखने यहां अच्‍छी संख्‍या में पर्यटक आते हैं। अपने कारोबार के विस्‍तार के बारे में चवाड़े कहते हैं, ‘‘यदि उचित कोशिश हो तो इस शहर में अच्‍छी पर्यटन क्षमता है।’’ इनके फुटवियर 100 से 600 रुपए के दायरे में होने के चलते ये इसे बड़ी संख्‍या में बनाते हैं।
भारत निर्माण के तहत कार्यान्वित की जा रही विकास योजनाओं के प्रदर्शन के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित जनसूचना अभियान के अंतर्गत रामटेक में लगाए गए स्‍टॉल पर अशोक चवाड़े ने अपने उत्‍पादों को प्रस्‍तुत किया। राज्‍य सरकार या संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित की जा रही केंद्रीय योजनाओं के अन्‍य लाभान्वितों ने भी चवाड़े का साथ दिया।
उदाहरणार्थ, नागपुर के निकट के ही एक छोटे से शहर नगरधाम की एक महिला उद्यमी ने इस तीन-दिवसीय मेले में लाए चमड़े के अपने सभी थैलों को मेला शुरू होने के कुछ ही घंटों में बेच दिया। अब वह तेजी से तिरपाल या अन्‍य सामग्रियों से बने थैलों का कारोबार कर रही है। गांवों के गरीबों को स्‍वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित कर उन्‍हें स्‍वरोजगार मुहैया कराने वाले एकीकृत कार्यक्रम स्‍वर्णजयंती ग्राम स्‍वरोजगार योजना के तहत नगरधाम में गठित रानी लक्ष्‍मी महिला बचत गुट की सदस्‍य करुणा अनंत पौनिकर इसके बारे में बड़े आत्‍मविश्‍वास से बताती हैं। करुणा को इस योजना के बारे में पंचायत समिति की सहयोगिनी नन्‍दा खड़से से जानकारी मिली, जिसने उसे स्‍वयं सहायता समूह से जुड़ने और अपना उद्यम शुरू करने को प्रोत्‍साहित किया। संकोची स्‍वभाव की करुणा ने अपने इस मार्गदर्शक के कहने पर 10 हजार रुपए का छोटा कर्ज लेकर वॉशिंग पाउडर, फिनाइल आदि बनाना शुरू किया। उसे जल्‍द ही इस छोटे उद्यम की क्षमता का अहसास हो गया और उसने 60 हजार रुपए के दूसरे ऋण से अपने उद्यम के उत्‍पादों का विस्‍तार किया। उसने तरह-तरह के थैले बनाने वाली एक छोटी इकाई की स्‍थापना की। अब उसके यहां आठ से दस महिलाएं अनुबंध पर थैले और अन्‍य उत्‍पाद बनाती हैं।

हालांकि इस मेले की अन्‍य भागीदार रेणुका बिदकर, अशोक चावड़े और करुणा अनंत पौनिकर से बहुत अलग है, 39 साल की रेणुका पोलियोग्रस्‍त हैं और उन्‍हें चलने के लिए व्‍हीलचेयर की जरूरत पड़ती है। लेकिन अपनी अक्षमता को उसने किसी तरह बाधक नहीं बनने दिया। उसने जीवन की बड़ी चुनौतियों को स्‍वीकार किया और कारोबार में सफलता हासिल की। राष्‍ट्रीय विकलांगता वित्त विकास निगम (एनएचएफडीसी) से छोटा कर्ज लेकर उसने मोमबत्तियां, अगरबत्तियां, चॉक, तरल साबुन, सॉफ्ट खिलौने आदि बनाना शुरू किया। रेणुका ने जल्‍द ही अपना लोन चुका दिया। यही नहीं, उसने लोगों की भर्ती कर अपने उद्यम का विस्‍तार किया। उसने अपने उद्यम में जहां तक संभव हो सका विकलांगों को मौका दिया। रेणुका अब विकलांगों के उत्‍थान के लिए एक संस्‍था भी चलाती है और उन्‍हें रोजगार दिलाने में मदद या स्‍वरोजगार के लिए मार्गदर्शन देती है। रेणुका विश्‍वास से कहती है, ‘‘अब मेरे जीवन का वृहत उद्देश्‍य अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी करने में अक्षम रहने वाले विकलांगों की मदद करना है।’’

दीपक वारकड़े इस मेले में आने वाले आकस्मिक आगंतुक नहीं थे। वह अपने घर के नजदीक अपना कॅरियर शुरू करने के लिए मदद की तलाश में मेले में आए थे। उसने हाल ही में अपने घर रामटेक से हजारों मील दूर मध्‍यप्रदेश के एक शहर में 4,000 रुपए प्रतिमाह की नौकरी छोड़ दी है। डोमिसाइल प्रमाणपत्र न होने के चलते किसी राज्‍य प्रायोजित व्‍यावसायिक कोर्स में अनुसूचित कोटे से नामांकन पाने में विफल रहे दीपक भी इस मेले में मौजूद थे। वह यहां ऋण के लिए जरूरी पात्रता या व्‍यावसायिक प्रशिक्षण के बारे में जानकारी लेने आए थे। वह कहते हैं, ‘‘डोमिसाइल प्रमाणपत्र पाना बहुत मुश्किल काम है।’’ दीपक से जब कहा गया कि कॅरियर गाइडेंस के लिए उसे किसी सिफारिश की जरूरत नहीं होगी तो वह थोड़े सशंकित थे, पर कई स्‍टॉलों पर बातचीत करने के बाद वे शायद संतुष्‍ट होकर लौटे।

कृत्रिम अंग निर्माण निगम (अलिमको) के सहायक उत्‍पादन केंद्र ने भी इस मेले में अपना स्‍टॉल लगाया था। इसके स्‍टॉल पर तकनीशियन और सलाहकार कृत्रिम अंगों के संबंध में विकलांगों या उनके अभिभावकों को सलाह दे रहे थे। प्रोस्‍थेटिक एंड ऑर्थोटिक इंजीनियर आर. एस. दास जरूरतमंदों की समस्‍याओं को समझते हुए उन्‍हें आवश्‍यक सलाह दे रहे थे।

भारत निर्माण या अन्‍य कार्यक्रमों से जुड़ी विकास योजनाओं के बारे में सूचना देने के लिए बैंकों सहित विभिन्‍न सरकारी संस्‍थानों के प्रति‍निधि इस मेले में मौजूद थे, जो स्‍टॉल पर आए आगंतुकों की समस्‍याओं के उत्‍साहपूर्वक समाधान में व्‍यस्‍त दीखे। आगंतुकों ने भी स्‍टॉल पर मौजूद सूचना पुस्तिकाओं को चाव से पढ़ा और उसे एकत्र किया। पूरा माहौल उत्‍साह और उम्‍मीद से सराबोर प्रतीत हुआ। कोई भी इन गरीबों की उम्‍मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करना और उन्‍हें सशक्‍त बनाना चाहेगा, ताकि ये सभी भारत उत्‍थान के अभियान में शामिल हो सकें।
  (18-फरवरी-2011)       ----------
*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्‍ली में उपनिदेशक (एमएंडसी) हैं। ये हाल ही में रामटेक (महाराष्‍ट्र) में आयोजित जनसूचना अभियान से लौटे हैं।

Sunday, November 27, 2011

श्री हरिमंदिर साहिब में परिवार समेत नमस्तक हुई आशा भोसले

जसपिंदर नरुला भी थी साथ आम श्रद्धालु की तरह हुए नतमस्तक 
अमृतसर//26 नवम्बर//गजिंदर सिंह किंग
सच्च्खंड श्री हरि मंदिर साहिब में हिंदुस्तान की मशहूर फ़िल्मी गायिका आशा भोसले  अपने परिवार सहित गुरु घर के दर्शन कर नमस्तक हो कर माथा टेक गुरु घर की खुशियाँ प्राप्त की, उनके साथ हिन्दी और पंजाबी फिल्मो की गायिका जसपिंदर नरुला भी उस के साथ थी, उन्होंने एक आम श्रद्धालु की तरह सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब गुरु घर में नमस्तक होकर माथा टेक कर गुरु जी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया
          सच्च्खंड श्री हरि मंदिर साहिब में आज हिंदुस्तान की मशहूर फ़िल्मी गायिका आशा भोसले  आपने परिवार समेत आशीर्वाद लेने पहुंचे, उनके साथ हिन्दी और पंजाबी फिल्मो की गायिका जसपिंदर नारुला भी उस के साथ थी, उन्होंने एक आम श्रद्धालु  की तरह सचखंड श्री हरिमंदिर साहिब की परिक्रमा कर गुरु घर के दर्शन कर गुरु घर में नमस्तक होकर माथा टेक कर आशीर्वाद लिया और गुरु घर की खुशीया प्राप्त की, शरोमाणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तरफ से गायिका आशा भोसले और उनके परिवार को सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब जी का यादगारी माडल देकर सन्मानित किया, इस दौरान उन्होंने अपने अमृतसर में आने के बारे जानकारी देते हुए बताया,  कि मेरी मन की इच्छा थी की मै सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब जी के दर्शन करू आज बाबा जी में मुझे याद किया है और सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब गुरु घर में पहुँच कर गुरु के सामने नतमस्तक होकर गुरु का आशीर्वाद लिया है,  वहीँ उन का कहना है, कि वह यहाँ पर पहली बार आई है और उन का मन है, कि वह बार बार यहाँ पर आये साथ ही उन का कहना है, कि जब वह वहां माथा टेक रही थी, तब परमात्मा ने उन को शक्ति दी, जिस के बल पर वह झुक कर माथा टेक सकी, क्यों कि घुटने में अब तकलीफ है, जिस के चलते वह झुक नहीं सकती, लेकिन आज वह यहाँ पर नतमस्तक हुई है और वह बहुत खुश है
       उन्होंने बताया, कि आज कल वह फिल्मों में बहुत कम गाती है, क्यों कि आज के ज़माने में फ़िल्मी गानों और संगीत का स्तर बहुत गिरा गया है और जो अच्छे गाने लिखने वाले लोग थे, वह अब नहीं रहे, वहीँ उन का कहना है, कि आज भी उन के द्वारा गए हुए गाने लोग देश-विदेश में सुनते है और उन के गानों को गया जाता है और उन को ख़ुशी है, कि आज चौथी पीडी उनके गाने गा रही है और उन के लिए गायकी पैसों से बहुत ऊपर है और वह अच्छा संगीत चाहती है
      वहीँ इस मौके पर उन के साथ आई गायिका जसपिंदर नरूला का कहना है, कि वह आज बहुत खुश है, कि वह आशा जी के साथ यहाँ पर आई है और आशा जी ने मुझे कहा था, कि वह यहाँ आना चाहती है और वह आज उन को यहाँ ले कर आई है, यह उन के लिए ख़ुशी की बात है और यह ही उन की सेवा है, कि वह यहाँ पर दर्शन कर रही है साथ ही वह आपने आप को खुश किस्मत मान रही है

वालमार्ट और भारत का खुदरा बाज़ार

इन्हें तो अमरीकी हित की ज्यादा चिता है !--रवि वर्मा  
भारत की अर्थव्यवस्था का अध्ययन जब आप करेंगे तो पाएंगे कि हमारी अर्थव्यवस्था जो है उसका 80% unorganised sector में चलती है और 20% अर्थव्यवस्था ही organised है | हमारी जो बड़ी-बड़ी कंपनियां, प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर में हैं वो इस 20% हिस्से में हैं और 80% हिस्सा unorganised सेक्टर में हैं, जैसे छोटे उद्योग, मंझोले उद्योग, कृषि क्षेत्र, फुटपाथ की दुकाने, किराना दुकाने, परचून की दुकाने (General Store)   | फूटपाथ पर हमारे यहाँ बाज़ार लगते हैं, दिल्ली में चले जाइये, दिल्ली की दुकानों में, मौलों में जितना समान बिकता है उससे ज्यादा दिल्ली के फुटपाथों पर बिकता है, मुंबई चले जाइये, कोलकाता चले जाइये, चेन्नई चले जाइये, बंगलौर चले जाइये, हैदराबाद चले जाइये, हर बड़े शहर में आपको ऐसे बाजार मिल जायेंगे और कितना सुन्दर बाजार है ये , कोई बिल्डिंग नहीं, कोई स्ट्रक्चर नहीं, कोई ए.सी. नहीं, establishment का खर्चा शुन्य | हजारों करोड़ का बाज़ार हैं ये और ये इतना व्यवस्थित और इतना सुन्दर बाज़ार क्यों लगता है, क्योंकि मौसम की मेहरबानी है हमारे देश के ऊपर | मौसम हमारे यहाँ इतना अनुकूल है कि हमको मालूम है कि बारिस के मौसम में ही बारिस आएगी, सर्दी के दिनों में ही सर्दी होगी, गर्मी के दिनों में ही गर्मी होगी, इसलिए ये बाजार लगता है और सजता है | और दूसरी बात कि भारत में जीवन को चलाने के लिए जितनी जरूरत की चीजे होती हैं वो हर समान हर जगह होती है | Indian Council for Agricultural Research (ICAR)  के दस्तावेज मेरे पास हैं और उनके अनुसार भारत में 14785 वस्तुएं होती हैं | ये भारत की सभी राज्यों में एक समान होती हैं और भारत के उन शहरों या गाँव को बाहर से केवल नमक मांगना पड़ता है, बाकी हर जरूरत की चीज उसी राज्य में हो जाती हैं | यूरोप और अमेरिका में चूकी मौसम की अनुकूलता नहीं है, साल में नौ महीने ठण्ड पड़ती है और उनके यहाँ कभी भी बारिस हो जाती है और बर्फ भी बहुत पड़ती है, धुप का दर्शन तो साल में 300 दिन होता ही नहीं है | इसके अलावा उनके कृषि क्षेत्र में कुछ होता नहीं है, कुल मिला के दो ही चीजें होती हैं, आलू और प्याज और थोडा बहुत गेंहू, हाँ अमेरिका, यूरोप से थोडा बेहतर है, थोडा सा | वहां कुछ चीजें यूरोप से ज्यादा हो जाती है बाकी उसका भी वही हाल है | तो अपनी इन कमियों को पूरा करने के लिए उन्हें बाहर से वस्तुओं का आयात करना पड़ता है | तो उनकी ये समस्या है, जीवन चलाने के लिए चाहिए तो सब कुछ लेकिन होता कुछ भी नहीं तो बाहर से जो समान आते हैं उनको centralised कर के उनको रखना पड़ता है ताकि लोग आ के उसे खरीद सके, इसलिए उनको बड़े बड़े शौपिंग माल्स की जरूरत पड़ती है और उनके शौपिंग माल्स भारत के माल्स की तरह नहीं हैं, उनके और हमारे शौपिंग माल्स में जमीन आसमान का अंतर है | उनके शौपिंग माल्स में मोटर कार से ले के सुई-धागे तक मिल जायेंगे आपको | और अगर ये एक जगह ना मिले तो उनकी जिंदगी चलनी मुश्किल है | तो उनका unorganised sector इतना बड़ा नहीं है, मौसम की अनुकूलता नहीं है, सब कुछ सब जगह नहीं होता, सब बाहर से मांगना पड़ता है तो उन्होंने बड़े-बड़े Departmental Store बनाये हैं, वालमार्ट आया, केयरफॉर आया, टेस्को आया | ये बाहर से समान मंगाते और उसे redistribute करते हैं | उनकी मजबूरी को हमारे यहाँ ख़ुशी-ख़ुशी लाया जा रहा है और हमारा राजा कह रहा है कि वालमार्ट को भारत में आना चाहिए , बड़े बड़े departmental store खुलने चाहिए, रिटेल मार्केटिंग में विदेशी निवेश होना चाहिए |  कैबिनेट की मंजूरी भी मिल गयी है और सरकार उसको वापस लेने को तैयार नहीं है | अदूरदर्शी राजा से उम्मीद भी क्या की जा सकती है |         

वालमार्ट के समर्थक लोग अलग-अलग न्यूज़ चैनलों पर सरकारी भोपू बन के तर्क दे रहे हैं,  तर्क क्या हैं कि जब ये कंपनियां आएँगी तो ये किसानों से सीधा अनाज खरीदेंगे, किसानों को लाभ होगा, बिचौलिए ख़त्म हो जायेंगे, उपभोक्ताओं को भी फायदा होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और अक्सर इस देश के पढ़े लिखे लोग हैं वो इस बात को मानते हैं कि ये ठीक रास्ता है, WTO पर जब हमारे सरकार ने हस्ताक्षर किया था तब भी यही कहा था, यही तर्क दिए गए थे | वालमार्ट इतनी बड़ी कंपनी है कि उसकी सालाना आय 48 देशों की GDP से ज्यादे है, वालमार्ट का total turnover है वो 400 बिलियन डॉलर का है जो कि भारत के अन्दर जितने व्यापार है उसके बराबर है, एक कंपनी का ये हाल है | वालमार्ट अमेरिका की कंपनी है और उनको अपने देश में एक disclosure statement देनी होती है, और अपने disclosure statement में वालमार्ट ने कहा है कि पिछले पाँच साल में उसने भारत के अन्दर 70 करोड़ रूपये खर्च किया है, खर्च क्यों किया है ? तो भारतीयों को educate करने के लिए, समझाने के लिए | मतलब आप समझे कि नहीं ? ये जो टेलीविजन पर और अख़बारों में भोंपू लोग बैठे हैं उन जैसे लोगों के लिए, और सरकार को educate नहीं करेगी तो उसका प्रोपोजल तो पास होगा ही नहीं तो |  बाकी कंपनियों का खर्च कितना है ये मालूम नहीं है क्योंकि उनका disclosure statement नहीं आया है | और देखिये सरकार का पेंडुलम घिसक के इनके पक्ष में आ गया है, इसीलिए देखिये, सरकार कैसे अकड़ के बोल रही है कि "ये वापस नहीं होगा" | 

कहा जा रहा है कि  इससे अपव्यय कम होगा। यह भी कहा गया है कि इससे रोजगार बढ़ेंगे और किसानों को उनकी फसल की बेहतर कीमत मिल सकेगी। हालांकि ये तर्क संदेहास्पद हैं और सूक्ष्म परीक्षण पर शायद ही खरे उतर पाएं। इस विवाद से परे यह पूछा जाना चाहिए कि ऐसे मल्टी-ब्रांड रिटेल क्या उत्पादक (चाहे किसान हों या निर्माता) से उपभोक्ता के बीच होने वाले वितरण-मूल्य को कम करेगा? मार्केटिंग की भाषा में इसे ‘चैनल कॉस्ट’ कहा जाता है। आम आदमी की भाषा में यह परिवहन/ संग्रह/ वित्तीय प्रबंधन/ विक्रय पर होने वाला वह खर्च है, जो उत्पादन बिंदु और उपभोक्ता को की गई अंतिम बिक्री के बीच किया जाता है। यह आर्थिक कार्यकुशलता का मुख्य मापदंड है, जिस पर हमें गौर करना चाहिए। यह सवाल ही तय करेगा कि मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई न्यायोचित है या नहीं। भारत की थोक और खुदरा व्यापार व्यवस्था की तुलना में वालमार्ट और टेस्को जैसे मल्टी-ब्रांड रिटेलर्स उपभोक्ता को मिलने वाले मूल्य में तत्काल काफी बढ़ोतरी कर देंगे। इस बात को साबित करने के लिए हमारे पास कई प्रमाण हैं। उपलब्ध तथ्यों और तुलनात्मक अध्ययन से इसे आसानी से दिखाया जा सकता है। मूल्यों में होने वाली वृद्धि का यह प्रतिशत छोटा नहीं है। भारत के थोक और खुदरा व्यापार में होने वाले ‘मार्क-अप्स’ (क्रय-मूल्य और विक्रय-मूल्य के बीच का अंतर) की तुलना में, मल्टी-ब्रांड रिटेल में ‘मार्क-अप्स’ की गुंजाइश दो गुना से लेकर नौ गुना तक होती है। यह ‘मार्क-अप्स’ उनकी व्यापार-संरचना में निहित होता है, जिसका भुगतान पश्चिमी देशों में आम उपभोक्ता अपनी रोजमर्रा की खरीद में करते हैं। आइए जरा रोजमर्रा के काम में आने वाले पदार्थो के ऐसे चार वर्गों के ‘चैनल कॉस्ट’ या खर्च की तुलना करें, जो मल्टी-ब्रांड रिटेल के जरिये उपलब्ध होंगे। 
पहला वर्ग है उपभोक्ता वस्तुओं का- इस मामले में भारत में वितरक व थोक व्यापारी का मार्जिन चार से आठ प्रतिशत के बीच होता है, और खुदरा व्यापारी का मार्जिन होता है आठ प्रतिशत से 14 प्रतिशत तक। यह मार्जिन उत्पादन मूल्य पर जोड़ा जाता है। कंपनी की उत्पादन क्षमता, बाजार पर उसकी पकड़, माल की किस्म आदि पर मार्जिन का प्रतिशत निर्भर करता है। इसलिए भारत में वितरण श्रृंखला के ऊपर आने वाली कुल ‘चैनल कॉस्ट’ 12 से 22 प्रतिशत के मध्य होती है। अमेरिका और यूरोप में ‘सेफवेज’, ‘क्रोगेर्स’ और ‘टेस्को’ जैसी कंपनियां इस श्रेणी के पदार्थो के बुनियादी मूल्य पर माल की किस्म, मात्र, मांग और उपलब्धता को देखते हुए तकरीबन 40 प्रतिशत का ‘मार्क-अप्स’ लगाती हैं। यह चैनल ‘मार्क-अप्स’ भारतीय चैनल/ रिटेल कीमतों की तुलना में दो से तीन गुना ज्यादा है। इन कंपनियों द्वारा ग्राहकों को लुभाने के लिए समय-समय पर घोषित ‘सेल’ और ‘लॉस लीडर प्रोमोशन’ से हमें गुमराह नहीं होना चाहिए। दूसरा वर्ग है वस्त्र का- भारत के कपड़ा व्यवसाय में संयुक्त रूप से थोक व खुदरा का मार्जिन, मिल कीमत के ऊपर 35 से 40 प्रतिशत के बीच होता है। रेडीमेड कपड़ों के व्यवसाय में किसी ब्रांडेड रिटेल दुकान का मार्जिन शायद ही कभी लागत के 30 प्रतिशत से ज्यादा होता है। अब जरा इसकी तुलना ‘मेसीस’ या ‘मार्क्स ऐंड स्पेंसर’ स्टोर से करते हैं। ये रिटेलर अक्सर कपड़ों के खरीद मूल्य पर दो से 4.5 गुना ‘मार्क-अप‘ लगाते हैं। उसके बाद वे 15 से 30 प्रतिशत की छूट ‘सेल’ ऑफर पर देते हैं। ‘सेल’ पर मिलने वाली कीमत के बावजूद इन रिटेलर्स द्वारा लगाया ‘मार्क-अप’ कम-से-कम दो गुना अधिक होता है। इसीलिए नियमत: उनके ‘मार्क-अप्स’ भारतीय रिटेलर्स की तुलना में पांच से नौ गुना ज्यादा होते हैं। तीसरा, दवा और चिकित्सा सामग्री- भारत में दवा की दुकानें और औषधि-विक्रेता एक व्यापारिक संस्था के रूप में काफी व्यवस्थित हैं, पर सप्लाई साइड बिखरा पड़ा है, जिससे उन्हें रिटेल में बेहतर मार्जिन मिल जाता है। बावजूद इसके, भारत में एक रिटेल दवा विक्रेता का मार्जिन 20 प्रतिशत तक होता है। इसमें अगर हम वितरक, थोक व्यापारी का 10 प्रतिशत मार्जिन और सीएंडएफ एजेंट का चार प्रतिशत जोड़ दें, तो कुल ‘चैनल कॉस्ट’ लागत का 34 प्रतिशत बनती है। अब इसकी तुलना अमेरिका के ‘वालग्रीन‘ या ‘सीवीएस’ या फिर ब्रिटेन के ‘बूट्स’ से कीजिए। ये रिटेलर्स चिकित्सा-सामग्रियों और दवाइयों के दामों में दो या तीन गुना ‘मार्क-अप’ कर देते हैं और फिर कुछ  मद पर ‘सेल’ ऑफर चला देते हैं। जहां तक ‘चैनल कॉस्ट’ का सवाल है, भारतीय दवा-विक्रेताओं की तुलना में इन बड़े रिटेलर्स की कीमतों में कम-से-कम छह गुना का ‘मार्क-अप’ रहता है। चौथा है, किचनवेयर- भारतीय ‘चैनल कॉस्ट’ या खर्च इस श्रेणी में कम है। भारत में प्रेशर कुकर, कुकवेयर में वितरक, रिटेलर का संयुक्त मार्जिन 30 प्रतिशत से कम है, जिसमें से रिटेलर सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत ही रखता है। इसी श्रेणी के उत्पादों के लिए ‘वालमार्ट’, ‘ब्लूमगडेल्स’ और ‘सीयर्स’ जैसे रिटेलर्स अमेरिका में लागत खर्च पर नियमत: 100 से 200 प्रतिशत का ‘मार्क-अप’ करते हैं। यहां तक कि ‘सेल’ पर भी कम-से-कम भारत के मुकाबले चैनल मूल्यों में पांच गुना का ‘मार्क-अप’ रहता है। ये सभी साक्ष्य दर्शाते हैं कि वर्षों में विकसित हुई भारतीय वितरण व्यवस्था, विश्व में सबसे सक्षम और किफायती है। माना कि हमारे बाजार यूरोप, अमेरिका व जापान के ‘मॉल्स’ की तरह लुभावने नहीं, परंतु आम घरेलू महिलाओं के लिए वे बेहद उपयोगी हैं, और कम कमाई व ज्यादा महंगाई के बुरे वक्त में उनका बखूबी साथ निभाते हैं। रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव इस संतुलन को बिगाड़ देगा। आपूर्ति श्रृंखला में निवेश और ‘बैकएंड लॉजिस्टिक्स’ की बातें सिर्फ ‘चैनल कॉस्ट’ के मुख्य विषय से ध्यान हटाने के लिए हैं। उद्योगों और विदेशी सरकारों के दबाव में आए बगैर हमारी सरकारी कमेटी को अपना पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित करना चाहिए कि हमारे देश के नागरिकों, उपभोक्ताओं के हित में क्या है। हमारे बाजार बेहद सक्षम हैं और लाखों छोटे व्यापारियों और उद्यमियों के हित से जुड़कर चलते हैं। इसमें हस्तक्षेप कर हमें मल्टी-ब्रांड रिटेल के पश्चिमी मायाजाल में नहीं फंसना चाहिए। 

आपने पढ़ा कि किस तरह पश्चिमी देशों में बड़े मल्टी-ब्रांड  रिटेलर्स, जैसे वालमार्ट, टेस्को और कार्रेफौर अपने सभी उत्पादों के दाम में कम से कम दोगुना ‘मार्क-अप’ करते हैं और भारत के रिटेल/होलसेल ‘मार्क-अप्स’ की तुलना में यह नौगुना से भी अधिक तक चला जाता है। सारांश यह है कि चैनल की सक्षमता इस बात से तय होनी चाहिए कि ‘मार्क-अप्स’ (जो दुकान चलाने के खर्च और चैनल द्वारा कमाए गए मुनाफे का कुल योग है) के साथ आम उपभोक्ता को कितना मूल्य अदा करना पड़ेगा। इसी मापदंड के आधार पर मैंने यह निष्कर्ष निकाला था कि थोक विक्रेता, वितरक, स्टॉकिस्ट और खुदरा विक्रेता से बनी भारतीय वितरण श्रंखला दुनिया में सबसे सक्षम और किफायती है।
ऐसा कैसे संभव है? मैं जानता हूं कि आप में से ऐसे लोग भी होंगे, जो इस निष्कर्ष को मानने से इनकार करेंगे। उनसे मेरा अनुरोध है कि वे जरा पश्चिमी व भारतीय खुदरा बाजार के स्वरूप के गणितीय तर्क की गहराई से पड़ताल करें। जिस किसी ने भी व्यावसायिक कार्यप्रणाली एवं नियमों को देखा-समझा है, वे बाजार की इस हकीकत से जरूर वाकिफ होंगे कि बाजार जितना ही संघटित होता है, वह उपभोक्ता को चयन का कम अधिकार देता है, और रिटेलर द्वारा उतना ही अधिक ‘मार्क-अप’ करने व कीमतों में वृद्धि करने की गुंजाइश रहती है। इसके उलट बाजार जितना बिखरा होता है और उपभोक्ता को चयन का अधिक विकल्प मिलता है, ‘मार्क-अप’ उतना ही कम होता जाता है, क्योंकि रिटेलर्स को प्रतिस्पर्धा व व्यापार में बने रहने के लिए कम से कम मूल्य रखने पड़ते हैं।
जब बड़े मल्टी-ब्रांड रिटेल बाजार में प्रवेश करते हैं, तो उनकी रणनीति प्रतिस्पर्धा को खत्म करने और बाजार पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने की होती है। दो उदाहरणों पर गौर कीजिए। अमेरिका में रिटेल बाजार का आकार (खाद्य सेवा और ऑटोमोटिव को छोड़कर) वर्ष 2009 में तीन ट्रीलियन डॉलर आंका गया था। वालमार्ट ने 10 प्रतिशत की बाजार हिस्सेदारी (मार्केट शेयर) के साथ 300 से भी अधिक बिलियन डॉलर का कारोबार किया था। जाहिर है, लंबे समय में अजिर्त ऐसी संघटित शक्ति का इस्तेमाल आपूर्तिकर्ता या वितरक से कम कीमत पर चीजें खरीदने और उपभोक्ता को अधिक ‘मार्क-अप्स’ के साथ बेचने के लिए किया जाता है। वालमार्ट का उद्देश्य दूसरे रिटेलर्स से ज्यादा किफायती बनना है, पर उसका मुख्य लक्ष्य अपने शेयरधारकों को अधिकतम लाभ पहुंचाना है। (जिन लोगों को वालमार्ट के बारे में जानने की रुचि हो, वे बिल क्विन्न की किताब ‘How Walmart is Destroying America and the World ’ पढ़ सकते हैं) ब्रिटेन में इसी से मिलता-जुलता उदाहरण टेस्को का है। पिछले वर्ष इस कंपनी ने 61 बिलियन पाउंड (यानी 99 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का व्यापार किया था, और विकीपीडिया के अनुसार, ब्रिटेन किराना दुकान बाजार में इसकी हिस्सेदारी (मार्केट शेयर) 30 प्रतिशत है। इस स्तर का एकाधिकार रिटेल की दुनिया में अनोखा है और टेस्को को आपूर्तिकर्ता व उपभोक्ता, दोनों के ऊपर असाधारण शक्ति प्रदान कर देता है। ब्रिटेन में किराने का सामान खरीदने वालों के लिए घर के समीप ज्यादा से ज्यादा दो या तीन रिटेलर (टेस्को, सैन्सबरी या शायद अल्डी) का विकल्प होता है। इसका अर्थ है कि प्रोमोशनल ऑफर के बावजूद निर्धारित कीमतों में अधिमूल्य (प्रीमियम) शामिल रहता है और उपभोक्ता की खरीदारी पर रिटेलर की पकड़ मजबूत बनी रहती है। उत्पादक के ऊपर भी उनकी जबर्दस्त पकड़ होती है। अब इसकी तुलना जरा भारत से कीजिए। हमारे पड़ोस में दर्जनों छोटे रिटेलर्स होते हैं, जिनमें हमारे रुपये को पाने की होड़ लगी रहती है। यहां जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा है। लिहाजा, ‘मार्क-अप्स’ व कीमतें मजबूरन कम रहती हैं। हमारी बाजार संरचना लगभग परिपूर्ण है, जिसमें हजारों उत्पादक लाखों रिटेलर्स को माल उपलब्ध कराते हैं, जो आगे करोड़ों उपभोक्ताओं को अपनी सेवाएं देते हैं। बाजार में किसी के पास सचमुच इतना असर या जोर नहीं कि वह अधिक ‘मार्क-अप्स’ लगा सके। यह जमीन से जुड़ी सच्चाई है, जो लाखों छोटे व्यवसायों की उद्यमशीलता और ऊर्जा से पैदा हुई है। इसके संगठन में सरकार ने कोई भूमिका नहीं निभाई है। यदि बड़े मल्टी-ब्रांड रिटेल को भारत में प्रवेश की अनुमति दी जाती है, तो उसका बुरा परिणाम होगा। किसी इलाके में एक विशाल रिटेल स्टोर का उद्घाटन धूमधाम के साथ किया जाएगा। फिर बहुत सारे ‘प्रोमोशनल ऑफर’ दिए जाएंगे और कई जरूरी सामान अनेक दिनों तक मूल कीमत से भी कम में बेचे जाएंगे। (वालमार्ट की भाषा में इसे ‘स्टॉम्प द कॉम्प’ कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है प्रतिस्पर्धा को मिटा देना)। जाहिर है, इस छूट से आकर्षित होकर लोग भारी संख्या में वहां उमड़ पड़ेंगे। ऐसे में, छोटे रिटेलर व्यापार-घाटे को बहुत समय तक नहीं उठा पाएंगे। इस झटके की वजह से उनमें से ज्यादातर दुकानें बंद हो जाएंगी। ऐसा निरपवाद रूप से हर जगह हुआ है। प्रतिस्पर्धा पूरी तरह ध्वस्त हो जाने पर आपूर्तिकर्ताओं व उपभोक्ताओं पर बड़े रिटेलर की पकड़ कस जाती है। उसके बाद बाजार पर नियंत्रण करके वे अधिकतम मुनाफे के लिए धीरे-धीरे ‘मार्क-अप्स’ बढ़ाते जाते हैं। ऐसे में, आखिर क्यों भारत सरकार के प्रमुख वित्तीय सलाहकार के नेतृत्व में बनी कमिटी ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई की सिफारिश की है? फिर निवेश के लिए सुझाए गए कुछ मानदंड भी काफी दुरूह हैं। उदाहरण के लिए, कमिटी ने न्यूनतम एफडीआई निवेश 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर तय किया है। यह ओलंपिक में किसी हेवीवेट लिफ्टर को 10 किलोग्राम वजन उठाने के लिए कहने जैसा है। मैं उन वरिष्ठ बुद्धिजीवियों की कद्र करता हूं, जिन्होंने इस पहलू पर गौर किया है। मैं यह सलाह देने का साहस अवश्य करूंगा कि इस संबंध में बनी नीति का लक्ष्य देश की विशाल आबादी का हित होना चाहिए। नीति-निर्धारकों को पश्चिमी देशों की सरकारों को खुश करने की जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए, जो भारतीय रिटेल बाजार को खुलवाने के लिए निरंतर दबाव बना रहे हैं। मल्टी-ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भारतीय खुदरा क्षेत्र व उन करोड़ों परिवारों का अहित करेगा, जो अपने गुजारे के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 2008 में आई विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से भारत बच गया, क्योंकि बैंकिंग उद्योग जगत जोखिम से अनजान था। ठीक वैसी ही स्थिति रिटेल में है। हमें भारत में पश्चिमी रिटेल की बीमारू संरचना को लाने का प्रयास नहीं करना चाहिए, जो भारतीय उपभोक्ताओं को आने वाले समय में अपना गुलाम बना लेगी।        

ये बाते हमारे सरकार के लोगों, विभिन्न समाचार चैनलों और अख़बारों में बैठे भोपुओं और नपुंशक विपक्ष को समझ में नहीं आ रहा है, विपक्ष तो नूरा कुश्ती लड़ रहा है सरकार के साथ, नूरा कुश्ती आप समझते हैं न, मतलब दिखावे के लिए हल्ला मचाते हैं | वास्तव में ये भारत देश की सरकार अब भारतीयों की सरकार नहीं रही बल्कि विदेशी कंपनियों की दलाल हो गयी है और हो भी क्यों नहीं, जब इस देश का प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, गृहमंत्री और तमाम मंत्री अमेरिका बनवा रहा है तो इनसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है | ये भारत के लोगों का ख्याल थोड़े ही करेंगे, इन्हें तो अमरीकी हित की ज्यादा चिता है | 

जय हिंद 
एक भारत स्वाभिमानी
रवि

Sunday, October 16, 2011

राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित करता है उपन्यास ‘बंद कमरा’

 'राष्ट्र समूह वाचक नहीं, बल्कि व्यक्ति वाचक' 
पुस्तक समीक्षा                                                          अनुवादक:दिनेश कुमार माली
‘बंद कमरा’ उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।“
एक लम्बे अरसे से डॉ. सरोजिनी साहू ओड़िया साहित्य में अपनी सृजनशीलता के लिए पाठकों में चर्चा का विषय रही हैं। सप्रतिभ भाषा-शैली, कथ्य-संप्रेषण और नवीन चेतना-स्तर के कारण वह अपने समसामायिक साहित्यकारों में एक अलग पहचान रखती है। आपका ओडिया उपन्यास ‘गंभीरी घर’ (हिंदी में ‘बंद कमरा ‘) ओडिशा की प्रसिद्ध ‘गल्प-पत्रिका’ के पूजा-अंक में प्रकाशित होते ही ओडिया -पाठकों में चर्चा का एक जबरदस्त विषय बना। पहले की तरह डॉ.सरोजिनी की हर रचनाओं की तरह यह उपन्यास भी आकर्षण का केन्द्र बना। भले ही, कुछ पाठकों में लेखिका के व्यक्तव्य की स्मार्टनेस नागवार गुजरी, मगर अनेक पाठकों ने न केवल इसे सहर्ष स्वीकार किया,बल्कि इस उपन्यास को पढ़कर भावाभिभूत भी हुए.

लेखिका की कहानियों और उपन्यासों में ऎसी ही जादुई विलक्षणता है, जो पाठकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है। कुछ पाठकों ने उपन्यासकार को उसका खुद एक पात्र समझने की गलती की , मगर यह सार्वभौमिक सत्य है, किसी उपन्यास की सफलता इस बात पर निर्भर करती है जहां पाठकों ने उसके अन्दर किन्हीं छिपी हुई सत्य-संवेदनाओं को अपने भीतर अनुभव किया हो।
क्या यह उपन्यास वास्तव में केवल प्रेम पर आधारित उपन्यास है ? क्या लेखिका हिंदु प्रेमिका और मुस्लिम प्रेमी के बारे में अपनी बात रखना चाहती है या भारतीय नारी और पाकिस्तानी पुरुष का अंतरजाल के माध्यम से विकसित हुई यह प्रेम-कहानी को दर्शाना चाहती है ?
कुछ ओडिया पाठक इसे यौन-स्वतंत्रता से संबंधित उपन्यास मानते हैं, जबकि इन सारी चीजों से ऊपर उठकर ‘गंभीरी घर’ का कथ्य और कथानक की व्यापकता और ज्यादा विशाल हो जाती है। इस उपन्यास में व्यक्ति की निसंगता, विशेष रूप से भारतीय नारी की आधुनिक जीवन -धारा में अकेलेपन और रिक्तता की बातें दर्शाई गई है। इस उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। उपन्यास की मुख्य नायिका कूकी के एक ओर है पतिऔर दूसरी तरफ प्रेमी; पति अनिकेत और प्रेमी शफीक। पति की दुनिया में घर-गृहस्थी मानो संवेदनहीन और पत्थर बन चुकी हो, और प्रेमी शफीक की काल्पनिक दुनिया का कहना ही क्या ! शफीक को देखा तक नहीं कूकी ने, स्पर्श करना तो बहुत दूर की बात। शायद इसलिए शफीक के लिए उसके हृदय में उसको पाने की व्याकुलता स्वाभाविक है। परंतु उसकी पहुँच से परे है शफीक का आकाश।बाहर से प्रेम प्रदर्शन नहीं करने वाला दंभी अनिकेत कूकी को प्यार नहीं करता था, ऐसी बात नहीं थी। सभी के सामने कूकी को अपने शरीर के प्रति लापरवाही बरतने से नाराज होकर कूकी पर हाथ उठाने के पीछे भी कहीं न कहीं उसकी प्रेम की भावना छिपी हुई थी। इसी तरह वह कूकी की तबीयत खराब हो जाने पर रात रात जगकर उसकी सेवा करता था । इन दो परस्पर विरोधी पुरुष-व्यक्तित्वों को लेखिका ने अनिकेत के माध्यम से बहुत ही निपुणता से वर्णन किया है। उपन्यास के अंत में अनिकेत की विदेश-यात्रा के समय पाठक देखेंगे, अनिकेत और कूकी में घनिष्ठ प्रेम है।

दिनेश कुमार माली
जबकि बावन स्त्रियों के साथ संभोग किया हुआ, घर में दो बीवियां रखने वाला शफीक विकृत मानसिकता वाला होते हुए भी एक सफल चित्रकार है। मेरा यह मानना है जैसे लेखिका शफीक के अंदर पिकासो को ढूंढ रही हो। पिकासो ने कई स्त्रियों के साथ संबंध बनाए थे। उनके प्रेम और उनकी कामुकता के प्रति आसक्ति भरे खोजी दृष्टिकोण ने उसे विश्व प्रसिद्ध चित्रकार बना दिया था। ये सारी बातें शफीक के अंदर पाई जाती है। परंतु शफीक प्रेमी स्वभाव का है, इसलिए लेखिका ने कूकी का उसके प्रति प्रेम भाव को कई सुन्दर प्रेम कविताओं के पद्यांशों के जरिए दर्शाया है। जहां अनिकेत का आगमन होता है वहाँ भाषा गद्य का रूप ले लेती है। पद्य और गद्य शैली में लिखा गया यह उपन्यास मानवीय हृदय के माधुर्य और तिक्तता को एक साथ प्रकट करता है।
क्या यही है भारतीय नारी की नियति ? हमारी समाज-व्यवस्था, हमारी जीवनचर्या, हमारे संस्कार नारी को अलग कर देते हैं । आधुनिकता, शिक्षा-दीक्षा, संविधान सम्मत समस्त अधिकार होते हुए भी एक नारी अपने प्रेमी और पति से दोनो से विच्छिन्न होकर रह जाती है। वह कैदी है, वह खुद ही अपने को कैद कर लेती है संवेदनशील मातृत्व की सलाखों के पीछे घर नामक चारदीवारी के अंदर। इस विच्छिन्नता बोध को प्रतीक है ‘गंभीरी घर’।
ट्रेजेडी उपन्यास होते हुए भी प्रेम के प्रति आस्थाबोध पाठकों को नजर आएगा। प्रेम के प्रति लेखिका का दृष्टिकोण प्रचलित धारणाओं से उठकर स्वतंत्र रूप में है। पति अनिकेत के प्रेम और प्रेमी शफीक के प्रेम में जो अंतर है, उसे लेखिका ने बड़े से सूक्ष्म ढंग से प्रस्तुत किया है। अनिकेत के प्रेम में है प्रज्ञा और शफीक के प्रेम में आवेग और रोमांच का बाहुल्य ।

एक स्त्री का निश्चल प्यार पाकर एक पर्वटेड कामुक आदमी क्रमशः परफेक्टशन की ओर अग्रसर होता है। स्वयं को यौनता से पृथक करते हुए प्रेम पथ पर बढता जाता है। उसे नारी का शरीर और आकर्षित नहीं करता है। रूखसाना उसके लिए देवी है, इसलिए कूकी के भीतर वह रूखसाना को देखता है।  

कट्टरपंथ , धार्मिक-बंधन, देश, राजनैतिक, भौगोलिक सीमाओं से ऊपर है रूखसाना की स्थिति। इसलिए शफीक कहता है, मेरा कोई अपना देश नहीं है, कलाकार के लिए कोई एक विशेष देश नहीं होता है। उसके पास होते हैं केवल प्रेम के नैसर्गिक संबंध।

इस उपन्यास में कूकी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर लेखिका ने अपने सक्षम लेखन का परिचय दिया है। कुमारी-साधना, ओशों की सम्भोग से समाधि वाली साधना, रागानुराग भक्ति-मार्ग में कूकी विश्वास नहीं रखती थी। वह कहती थी, “शफीक, नहीं, मैं ओशो के दिखाए मार्ग में तुम्हें सहयोग नहीं कर पाऊँगी। मैं अति साधारण औरत हूँ। मेरी आशा और आकांक्षाएं सभी साधारण सी है। मैंअपने प्रेमी से केवल प्रेम की उम्मीद करती हूँ। जीवन जीने की खुराक चाहती हूँ। मुझे किसी भी साधना से क्या लेना-देना ? मुझे मोक्ष प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं है। मैं ‘नेरात्मा’बनकर बैठी रहूंगी और तुम व्याकुल शबर की तरह मेरे पास भागे दौड़े आओगे।”

पिकासो के ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ तस्वीर के जरिए लेखिका ने कूकी के अपराध-बोध को दिखाया है। ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ का मतलब होता है, जिस पति की पत्नी अन्य पुरूषों के साथ प्रेम करती है। वह तस्वीर बहुत ही गजब खूबसूरत थी। उस तस्वीर में एक नंगी औरत पहिए वाली गाड़ी में टांगों को उठाकर एक के ऊपर दूसरे को रखकर सोई हुई है। टांगों के भीतर से उसके यौनांग साफ़ दिखाई पड़ता है। एक नग्न पुरुष उस पहिए वाली गाड़ी को खींच रहा है। छुपकर कुछ नंगे लोग उस दृश्य को देख रहे हैं और उस तस्वीर के बायी ओर एक फ्रॉक पहने लड़की हाथ में चाबुक लिए खड़ी है। अपराध-बोध की सुंदर व्याख्या लेखिका और पिकासो की जुगलबंदी इस उपन्यास को एक विशिष्ट दर्जा प्रदान करती है।

इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं। लंदन बम ब्लास्ट में शफीक के गिरफ्तार होने के पीछे आतंकवाद कोई कारण नहीं है, वह तो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखता था, वह तो इस बात को मानता था कि उसका कोई देश नहीं है, वह कट्टरपंथियों का विरोध भी करता था। वह गिरफ्तार हुआ तो केवल एक छोटे से कारण की वजह से। तबुस्सम और मिल्टरी ऑफिसर के आपसी वैमनस्य और मतभेद से। इस नितांत व्यक्तिगत घटना को एक अंतराष्ट्रीय रूप देकर उसे गिरफ्तार किया गया था।

लेखिका ने इस उपन्यास में आतंकवाद के मलभूत कारणों को जानने की कोशिश की है। अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों को हटाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में आतंकवादियों का प्रशिक्षण प्रदान किया था। इस्लाम की सुरक्षा के नाम पर ,जेहाद के नाम पर, विश्व के हर प्रांत से मुसलमानों को एकत्रित कर गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया था, अस्त्र-शस्त्र बांटे थे। वहीं से शुरू होता है आतंकवाद का बीजारोपण। रूसी सैनिकों ने अफगानिस्तान से हट जाने के बाद अमेरिका भी वहां से हट गया था, क्योंकि वह अप्रत्क्षतः अपने मकसद में सफल हो गया था । वहां से हटते समय छोड़ गया था अस्त्र-शस्त्रों की भरमार खेंपें और उनके ट्रेनिंग कैंप। रह गए थे सिर्फ तालिबानी और जेहादी। उन्होंने कुवैत जैसे भोलेभाले देश को एनजीओ के माध्यम से मुफ्त शिक्षा का प्रलोभन दिखाकर कई कौमी मदरसे खोलें । जहाँ छोटे-छोटे बच्चे धीरे-धीरे मानवीय बंबों और आत्मघाती दस्तों में बदल गए।इस तरह इस उपन्यास में घरेलू आतंकवाद से वैश्विक आतंकवाद के संभावित कारणों का अच्छे ठंग से ताना बना बुना गया है ।

लेखिका ने इसलिए लिखा है,“पूछो, पूछो , अमेरिका को पूछो, अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिए जो हथियार तैयार किए थे, और हृदयहीन रोबोट बनाए थे, अब वे कहाँ जाएंगे ? कहाँ गाडेंगे इतने हथियार ? कैसे भूलेंगे तालिम के वे दिन ? गोला, बारूद, हथियारतो हमेशा खून मांगता है। मांगता है जीवन।”

इसलिए आतंकवाद जितना धर्म आश्रित नहीं होता है, उससे ज्यादा रष्ट्र आश्रित होता है। संभवत अमेरिका का शीत-युद्ध राजनीति लादेन का सृष्टा है। इसलिए लेखिका के उस उपन्यास में अन्तरंग प्रेम के साथ साथ कई बारीक दार्शनिक पहलूओं का जिक्र हैं।

 ‘रेप तथा अन्य कहानियां’ (2011 ) के बाद राजपाल एंड साँस ने    सरोजिनी साहू के चर्चित उपन्यास ‘( अंग्रेजी : ‘The Dark Abode’/ ओडिया ‘गंभीरी घर’)  ’ का हिंदी अनुवाद  ‘बंद कमरा‘ शीर्षक से प्रकाशित किया है.यह उपन्यास पहले से ही मलयालम में ‘इरुंडा कुदरमा’ तथा बंगला में’ मिथ्या गेरोस्थाली’ शीर्षक से केरल तथा बंगला देश से प्रकाशित हो चुकी है. इस उपन्यास का  ऑनलाइन  क्रय हेतु राजपाल एंड साँस पर जाएँ) (परिकल्पना से साभार

Sunday, October 09, 2011

श्री गुरु रामदास जी के प्रकाश दिवस पर हुए कई आयोजन


सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब में सजाया  गया जलो
          अमृतसर 9  अक्टूबर (गजिंदर सिंह किंग)  
सच्च्खंड श्री हरिमंदिर साहिब में सिखों के चोथे गुरु श्री गुरु राम दास जी सोढ़ी पातशाह का प्रकाश दिवस इस बार भी बड़ी धूमधाम से मनाया गया. इस दौरान श्रध्दालुओ ने  सच्च्खंड  श्री हरिमंदिर साहिब  के सरोवर में स्नान किया और आपने मन की शांति के लिए गुरु घर में अरदास कर गुरु घर की खुशीया प्राप्त की, इस उपलक्ष्य में सच्च्खंड  श्री हरिमंदिर साहिब  में श्रध्दालुओ के दर्शन के लिए जलो भी सजाया गया.
सच्च्खंड  श्री हरि मंदिर साहिब  में  शरोमणी  गुरुद्वारा  प्रबंधक कमेटी की तरफ से जलोह सजाया गया,जलोह को देखने के लिए भारी गिनती में श्रध्दालुओ ने दर्शन किये,  इस जलो में बहु -कीमती वस्तुए है, जिनमे हीरे, जवाहरात, सोने-चांदी का समान आदि श्रध्दालुओ के दर्शन के लिए सजाया जाता है. जिनमे सोने के दरवाजे, सोने के पांच कस्सी, चांदी के पांच तसल्ला शामिल है. इस के इलावा महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दिए गए नो लक्खा हार, नीलकंठ का मोर, सोने के छतर, असली मोतीयो की माला आदि का प्रदर्शन आज के दिन जलो द्वारा श्रध्दालुओ के लिए सजाया जाता है, श्रद्धालू जलो के दर्शन कर आपने आप को भाग्य-शाली  समझते है, इस मौके पर सच्च्खंड  श्री हरि मंदिर साहिब में श्री गुरु राम दास जी का प्रकाश दिवस बड़ी धूम-धाम  से मनाया गया. 
इस दौरान श्रध्दालुओ ने  सच्च्खंड  श्री हरि मंदिर साहिब  के सरोवर में स्नान किया और आपने मन की शांति के लिए गुरु घर में अरदास कर गुरु घर की खुशीया प्राप्त की, वहीँ यहाँ आए  श्रध्दालुओ का कहना है, की आज यह उन के लिए ख़ुशी का दिन है की वह यहाँ पर आ कर गुरु घर की खुशियाँ प्राप्त कर रहे है और वैसे तो हरिमंदिर में स्नान पवित्र समझा  जाता है, लेकिन आज स्नान करने से सब  के दुःख दूर हो जाते है और उन की मनोकामना पूरी होती है, वहीँ यहा  आए महिलाओं श्रध्दालुओ का कहना है, की वह आज इस पवित्र दिवस पर यहाँ आए है और आज उन के लिए कोई शब्द ही नहीं है की वह आपनी ख़ुशी को ब्यान कर सके
         सच्चखंड श्री हरि मंदिर साहिब के ग्रंन्थी  ज्ञानी  जगतार  सिंह जी ने  श्री गुरु राम दास जी के प्रकाश दिवस पर देश विदेश की समूह संगत को श्री गुरु राम दास जी के प्रकाश दिवस पर बधाई देते हुए कहा, कि सुबह से  ही श्रध्दालु  स्नान कर गुरुघर की खुशिया प्राप्त  कर आशीर्वाद ले रहे है, उन्होंने कहा, कि  श्री गुरु राम दास जी के शब्द-बाणी के साथ  जुड़ना चाहिए  और की हमे गुरु की दी हुई शिक्षाओं पर चलना चाहिए और गुरु की बाणी के साथ जुड़ने का सन्देश दिया है
        गौरतलब है की इस पावन अवसर पर दूर दूर से आए लोगों ने बहुत ही श्रद्धा भावना से पवित्र सरोवर में स्नान किया और सच्चखंड श्री हरिमंदिर साहिब में नतमस्तक हो कर खुशियाँ प्राप्त की वहीँ आज रहिरास  पाठ के बाद रात के समय दीपमाला  व आतिशबाजी  की जाएगी.
आपको आज की यह कैमरा रिपोर्ट कैसी लगी अवश्य बताएं. आपके विचारों और सुझावों की इंतज़ार रहेगी.

Sunday, September 25, 2011

"अहिल्या "// अलका सैनी की नयी नज़म


कल जब मै तुम्हारे घर की तरफ आई
तो देखा दरवाजे  और खिड़कियाँ खुले थे
मेरे  अंतर्मन में हजारों पुष्प  खिल गए    
पर  देखते-देखते  दरवाजे और खिड़कियाँ बंद हो गए
यह  देख  मेरी रूह गहराई तक  काँप गई   
खुश्क आहों में  मैं   थर्रथर्राती रही 
दर्द से बिलखकर सुबकती  रही 
गिड़गिडाकर इन्तजार करती रही 
दरवाजा खुलने का 

पर कोई  दरवाजा नहीं खुला 
मै बहुत देर तक बाहर सामने की रेलिंग पर बैठी सोचती रही 
शायद समय देखकर तुम आओगे 
मुझे उठाओगे, मुझे अपने सीने से लगाओगे 
पर तुम नहीं आए 
मै वहीँ नीचे घास पर बैठे- बैठे सोने लगी 
सारी रात तुम्हारी राह देखती रही 

आसमान मेरे आँसुओं का गवाह था 
वो भी मेरे साथ पानी बरसा रहा था
धरती का आँचल भी मेरे साथ भीग रहा था 
पेड़- पौधों की हालत भी मेरे जैसी थी 
पास में बैंच के नीचे एक कुत्ता भी 
बीच- बीच में अपनी नजर उठा लेता था 
दूर एक गाय शायद प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी 
हम सब मिलकर एक दूसरे का दुःख बाँट रहे थे   
कई राह चलते मुझ पर बेचारी सी नजर डाल कर आगे बढ़ गए 
जैसे ठंडी हवाएँ मेरे तन को छूकर जाती रही 
मै बारिश के तूफ़ान  में भीगती रही हमेशा की तरह 
पर वहाँ कोई नहीं था मेरे आंसू पोंछने वाला 
जब भी अँधेरे में कोई आकृति नजर आती 
मै उठ कर बैठ जाती कि शायद तुम आए होंगे 
फिर अपना वहम समझ कर वहीँ लेट जाती
मुझे पहली बार उस अँधेरी भयानक रात से भी डर नहीं लगा 
सुबह होते -होते 
आसमान भी  बरस कर थक गया 
धरती की प्यास भी बुझ गई 
पेड़- पौधे भी उजली किरण में खिल  गए 
कुत्ते को कहीं से एक हड्डी मिल गई 
बछड़ा अपनी माँ का दूध पीने लगा 
परन्तु मेरे नैनों का नीर कहाँ सूखा था ?
फिर मै भी मुक्त  हो गई और 
तब  मेरी रूह आँसुओं के सैलाब में विलीन हो गई  
पीछे छोड़ गई   एक बेजान पत्थर का बुत  
जो आज तक अहिल्या की तरह 
किसी राम के आने का इन्तजार कर रहा है 
पर कलयुग में कोई राम हो सकता है ?
     
                                --अलका सैनी