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Wednesday, April 22, 2020

शहीद भगत सिंह नगर हुआ कोरोना मुक्त-बलबीर सिंह सिद्धू

ज़िला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कड़ी मेहनत का नतीजा 
कोरोना पर फतह के बाद मीडिया से बात करते हुए जसकरण सिंह 
चंडीगढ़//नवां शहर: 22 अप्रैल 2020: (पुष्पिंदर कौर//पंजाब स्क्रीन)::
जिस तरह से कोरोना आया उसे देख कर दुनिया हार भी  थी लेकिन अब अच्छी खबरें आ रही हैं। ज़िंदगी है-कोरोना हार रहा है। अतीत में कई बार इतिहास रचने वाले शहीद भगत सिंह नगर ने फिर एक नया इतिहास रचा है। यह ज़िला कोरोना मुक्त घोषित हो गया है। यह खबर पूरी दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पंजाबियों के जीवट, उत्साह और इच्छा शक्ति को दर्शाती हुई खबर। ज़िला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कड़ी मेहनत के चलते शहीद भगत सिंह नगर आज कोरोना मुक्त होने वाला पंजाब का पहला ज़िला बन गया है। कोरोना प्रभावित इस ज़िले का अठारहवां मरीज जसकरन सिंह भी आज ठीक होने के बाद घर रवाना हो गया। कोरोना पर फतह पाने की यह उपलब्धि आज के इस युद्ध में बहुत ही बड़ी बात है। एक नई प्रेरणा देती है यह खबर। एक  जगाती है यह खबर। इस खबर से समाज के सभी क्षेत्रों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। 
स्वास्थ्य मंत्री स. बलबीर सिंह सिद्धू ने स्वस्थ हुए मरीजों को तंदुरुस्त जीवन की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि ये सभी व्यक्ति अब कोरोना प्रभावित मरीजों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं कि हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ घातक बीमारियों को भी मनुष्य हरा सकता है। उन्होंने बताया कि जिले को रैड जोन में से ग्रीन जोन में ले जाने के लिए जिला प्रशासन समेत स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने दिन-रात काम किया और जिसके लिए विधायक अंगद सिंह, डिप्टी कमिश्नर विनय बबलानी, एस एस पी अलका मीना, सिविल सर्जन डाॅ. रजिन्दर प्रसाद बधाई के पात्र हैं जिनके नेतृत्व अधीन सभी मरीज स्वस्थ होकर अपने घर लौटे हैं।
स्वास्थ्य मंत्री ने शहीद भगत सिंह नगर जिले के निवासियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि जिस तरह यहाँ पंजाब सरकार की हिदायतों और कर्फ्यू का पालन किया गया है वह भी पूरे पंजाब के लिए एक मिसाल है। उन्होंने कहा कि कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई को आम जनता के सहयोग के साथ ही जीता जा सकता है जो शहीद भगत सिंह नगर ने कर दिखाया है।
स्वास्थ्य विभाग की मिसाली कारगुजारी को उजागर करते हुए उन्होंने बताया कि 19 मार्च से 26 मार्च तक एक दम आए 18 कोरोना मामलों के साथ यह इलाका कोरोना से बुरी तरह प्रभावित हो गया था जिस कारण जिला हस्पताल में भी तनाव का माहौल बन गया था। इसके उपरांत बड़ी संख्या में मरीजों को मानक इलाज सेवाएं मुहैया करवाना एक चुनौती बन गया था परन्तु जिस तरह बहादुरी और संजीदगी के साथ मैडीकल और पैरा-मैडीकल टीमों द्वारा मरीजों का ध्यान रखा गया वह काबिले तारीफ है जो भविष्य में भी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
गौरतलब है कि एस एस पी अलका मीना के नेतृत्व अधीन स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिला हस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में मरीजों के लिए निभाई गई सेवाओं की सराहना करते हुए डाॅक्टरों और पैरा-मैडीकल स्टाफ पर फूलों की वर्षा करके ताली के साथ धन्यवाद भी किया गया।

Saturday, April 18, 2020

'यमन दो मोर्चों पर युद्ध नहीं लड़ सकता'

संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स की अपील 
17 अप्रैल 2020//शांति और सुरक्षा
© UNICEF/Romenzi यमन में युद्ध के दौरान एक हवाई हमले में ध्वस्त हुए एक मकान के सामने बैठे कुछ बच्चे. (जुलाई 2019)
यमन में वैश्विक महामारी कोविड-19 के और ज़्यादा गंभीर होते जाने के कारण अब बिल्कुल सही वक़्त है कि युद्धरत पक्ष अपनी अदावत ख़त्म करके लड़ाई बन्द कर दें। यमन के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने गुरूवार को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के ज़रिए सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में कही। 

उन्होंने कहा, “यमन एक साथ दो मोर्चों का सामना नहीं कर सकता: युद्ध और एक वैश्विक महामारी. और वायरस का मुक़ाबला करने में यमन के सामने अब जो नया युद्ध दरपेश है, उसी में उसकी सारी ताक़त लग जाएगी।"

इस युद्ध को तत्काल रोके जाने और सारे संसाधन इस नई मुसीबत का मुक़ाबला करने में लगा देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।”

ध्यान रहे कि यमन में अनेक वर्षों से सरकार समर्थित सेनाओं और हूती विद्रोहियों के बीच युद्ध जारी है।

सरकारी पक्ष को गठबंधन का समर्थन हासिल है जबकि हूती विद्रोहियों को अंसार अल्लाह आंदोलन भी कहा जाता है।

ये दोनों पक्ष ख़स्ता हालत में पहुँच चुके देश पर क़ब्ज़ा करने के लिए पाँच साल से भीषण युद्ध लड़ रहे हैं जहाँ विश्व का भीषणतम मानवीय संकट पैदा हो गया है।

यमन की लगभग 80 फ़ीसदी आबादी बाहरी व मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी है। 

मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने कहा कि कि यमन में कोविड-19 महामारी के आने से वहाँ के लोगों की तकलीफ़ें और भी ज़्यादा दर्दनाक बनने का ख़तरा पैदा हो गया है। 
UN Photo/Eskinder Debebe 
सुरक्षा परिषद की एक वर्चुअल मीटिंग को यूएन मुख्यालय स्थित स्टूडियों स्टाफ़ ने मुमकिन बनाया. (16 अप्रैल 2020)
“इससे बेहतर और कोई समय नहीं हो सकता जब युद्धरत पक्षों को अपनी बन्दूकें ख़ामोश कर देनी होंगी व संघर्ष समाप्त करके एक शान्तिपूर्ण और राजनैतिक समाधान की तलाश करनी होगी।”

राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के लिए वार्ता
यमन सरकार की सेनाओं को सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन हासिल है. इस गठबंधन ने यूएन महासचिव की अपील पर ध्यान देते हुए 8 अप्रैल को आरंभिक रूप में एक पखवाड़े के लिए इकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा की थी। 

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कुछ ही दिन पहले दिए अपने सन्देश में कोविड-19 वैश्विक महामारी को देखते हुए वैश्विक युद्धविराम की अपील की थी। 

मार्टिन ग्रिफ़िथ्स यमन में एक राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के प्रस्तावों पर दोनों युद्धरत पक्षों के बीच बातचीत कराने के लिए सक्रिय रहे हैं। 

इनमें क़ैदियों की रिहाई, सिविल सेवा के कर्मचारियों की वेतन अदायगी और मानवीय सहायता कार्यों के लिए रास्तों का खोला जाना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा शामिल है। 

उनका कहना था, “मैं पुरउम्मीद हूँ, और मेरा विश्वास है कि–जो प्रस्ताव मैंने रखे हैं, हम उन पर आम सहमति की तरफ़ बढ़ रहे हैं, ख़ासतौर से, एक राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के सिद्धांत पर, जिसे दोनों ही पक्षों का समर्थन हासिल है।”

हताहतों की संख्या
विशेष दूत ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों को ये भी बताया कि इन घटनाक्रमों के बावजूद,अदावत अब भी जारी है। 
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यों के लिए शीर्ष अधिकारी मार्क लोकॉक ने भी इस मौक़े पर बताया कि यमन में जनवरी के बाद से आम लोगों के हताहत होने की संख्या हर महीने बढ़ती ही रही है. इस अवधि के दौरान 500 लोग हताहत हुए हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई बच्चे थे। 

कोविड-19 यमन में ऐसे समय पहुँचा है जब देश में पाँच साल की लड़ाई के कारण स्वास्थ्य ढाँचा बुरी तरह चरमरा गया है, लोगों की रोग प्रतिरोधी क्षमता बहुत कमज़ोर हो चुकी है और उनके अन्दर बीमारियों के लिए बहुत अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा हो गई हैं।

मानवीय सहायता कार्यों के संयोजक मार्क लोकॉक ने कहा, “परिणामस्वरूप स्वास्थ्य वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि कोविड-19 यमन में बहुत तेज़ी से फैल सकता है, ज़्यादा व्यापक दायरे में और अनेक अन्य देशों की तुलना में जानलेवा नतीजों के साथ।”

वैसे तो कोविड-19 महामारी को कम करने के लिए किए जा रहे ऐहतियाती उपायों के कारण सहायता अभियानों की रफ़्तार पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन रास्तों को रोके जाने, असुरक्षा और स्टाफ़ और सामान ले जाने पर लगी प्रशासनिक पाबंदियों के कारण बाधित ज़रूर हो रहे हैं। 

धन की कमी एक अन्य समस्या है, क्योंकि यमन में सहायता के लिए चलाए जा रहे 41 प्रमुख कार्यक्रमों और अभियानों में से 31 आने वाले कुछ सप्ताहों में बन्द हो जाएंगे, बशर्ते कि उन्हें सहारा नहीं दिया गया तो। 

मार्क लोकॉक ने अतीत में बीमारियों को क़ाबू करने में सक्रिय रहे स्वास्थ्य दलों को खो देने का डर जताते हुए कहा, “हमें इन चिकित्सा दलों की पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है – ना केवल कोविड-19 का मुक़ाबला करने के लिए, बल्कि बारिश का मौसम नज़दीक होने के कारण हैज़ा फिर से अपना सिर उठा सकता है।”

Tuesday, January 28, 2020

जंग में झौंकने की सियासत बंद करें दोनों देशों के हुक्मरान

28th January 2020 at 4:59 PM
IDPD के डाक्टर अरुण मित्रा और उनकी टीम की चेतावनी
लुधियाना: 28 जनवरी 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
महंगाई, गरीबी और आर्थिक मंडी की हकीकत को छुपाने के लिए फिर से एक शोर मचाया जा रहा है ठोक दो ठोक दो-पाकिस्तान को ठोक दो। सियासत की इस खतरनाक शरारत के खिलाफ एक बार फिर बुलंद आवाज़ ले कर आये हैं इंडियन डाकटरज़ फॉर पीस (आई डी पी डी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डाक्टर अरुण मित्रा अपनी टीम साथ। इस  मिशन में उनके साथ हैं बैंकिंग इंडट्री से जुड़े हुए जनाब एम एस भाटिया।  इस टीम ने जंग की बातें कर रहे लीडरों को चेताया है कि आम जनता को तबाही की तरफ मत धकेलें। जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के शब्दों में इन लोगों ने कहा है: 
बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।
                                 बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
                                 कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥
डाक्टर अरुण मित्रा ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के दरम्यान जंग छिड़ी तो होने वाली तबाही अनुमान से भी कहीं ज़्यादा होगी और इसका ख़मयाज़ा दोनों देशों की जनता को भुगतना पड़ेगा। यह ब्यान ऐन उस वक़्त आया है जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया है की जंग में पिस्टन को हराने के लिए उन्हें दस दिन भी नहीं लगेंगे। डाक्टर मित्रा ने इस ब्यान को बेहद निंदनीय कहते हुए दुःख व्यक्त किया है की यह ब्यान उस वक़्त दिया गया है जब दुनिया के बहुत से हिस्सों में पहले से ही जंग छिड़ी हुई है। जंग के अमानवीय दुष्परिणामों को झेलती हुई दुनिया पर और दबाव बढ़ाना कौन से सिद्धांत का हिस्सा है? इसी संगठन के प्रधान डाक्टर एम एस सूदन और महासचिव डाक्टर शकील उर रहमान ने याद भारत और पाकिस्तान दोनों मानवीय विकास के मामले में बेहद पिछड़े हुए हैं। कोई भी युद्ध दोनों देशों को एक ऐसी तबाही की तरफ धकेल देगा जो  दशकों तक भी नियंत्रित नहीं सकेगी। दोनों देशों को शांति  चाहिए तभी दोनों देशों की जनता विकास  कर सकती है।
इन डाक्टरों ने  दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं।  अगर इनका प्रयोग हुआ तो दो अर्ब लोगों का जीवन खतरे में पड़ जायेगा। 
इन लोगों ने सलाह दी की दोनों देशों की सरकारों को गरीबी, अनपढ़ता और बेरोज़गारी को हटाने के लिए काम करें न की युद्ध की ज्वाला को भड़काएं।  
ी डाक्टरों और मित्रों ने चेतावनी दी कि जंग छिड़ी तो और भयानक हो जाएंगी गरीबी और भुखमरी की मौजूदा तस्वीरें।  देश के विकास की डॉ और पिछड़ जाएगी। बेरोज़गारी और महंगाई और भयानक रूप ले लेगी। कुल मिला कर सारा खामियाज़ा आम जनता को भुगतना पड़ेगा। 
डाक्टर अरुण मित्रा ने जनाब साहिर लुधियानवी साहिब की लम्बी रचना की पंक्तियाँ याद दिलाईं:
चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।
                                      जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
                                      हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥
कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।
                                   हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,                                    
                                   हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।
                                   हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
                                   हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
                                  ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
                                  अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
                                हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,                                
                                हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

जंग और जंग की सियासत के खिलाफ डाक्टर अरुण मित्रा के इस अभियान से जुड़ने के लिए आप भी आमंत्रित हैं। उनका मोबाईल नंबर है: 9417000360 
   साहिर लुधियानवी साहिब की इस पूरी काव्य रचना को पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक करें। 

Monday, January 14, 2013

माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश?

साइबर युद्ध का ख़तरा-अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से
वर्ष 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बड़ी तेज़गति से वृद्धि होगी। कुछ ख़ास ठिकानों पर ऐसे हमले किए जाएंगे और सरकारी एजेंसियों पर विशाल पैमाने के हमले भी होंगे। यह निष्कर्ष एंटीवायरस निगम "कैसपेर्स्की लैब" के विशेषज्ञों ने निकाला है। अमरीकी खुफिया सेवाओं ने भविष्यवाणी की है कि आनेवाले 20 वर्षों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा।

"कैसपेर्स्की लैब" के विश्लेषकों के मुताबिक, अगले साल कई सरकारी संस्थानों और व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों की निजी कंपनियों की गोपनीय जानकारी की चोरी बड़े पैमाने पर होने लगेगी। सामाजिक सेवाओं और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर साइबर हमले अक्सर होने की सम्भावना है।

गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास भारी मात्रा में ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता होगी। इसके अलावा, संचार प्रौद्योगिकी के विकास की तेज़गति की बदौलत देशों की सरकारों का अपने नागरिकों पर असीम नियंत्रण हो जाएगा। लेकिन इन देशों के नागरिकों के पास भी अपनी सरकारों को चुनौतियाँ देने के कई अवसर मौजूद होंगे।

वर्तमान में, सूचना प्रौद्योगिकी हमारे समाज के सूचना क्षेत्र के विकास के संदर्भ में एक बड़ा ख़तरा बनती जा रही है। इस संबंध में रूस के सूचना सुरक्षा संघ के अध्यक्ष गेन्नादी येमेलियानोव ने रेडियो रूस को बताया –

ऐसा ख़तरा इसलिए बढ़ता जाएगा क्योंकि इस ख़तरे का एक टाइमबम फिट कर दिया जा चुका है। यदि हम समय पर पर्याप्त सुरक्षा उपाये नहीं करेंगे तो यह बम ज़रूर फटेगा और बड़े विनाश का कारण बनेगा। जब हम सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के इतने ज्यादा आदी हो जाएंगे कि इसके बिना जीवन ही असंभव हो जाएगा तब पूरी दुनिया के लिए बहुत-सी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ज़रा सोचिए, इस सूचना प्रौद्योगिकी ने अचानक ही काम करना बंद कर दिया है। अब आप क्या करेंगे? पूरा जीवन ठप्प। आप ज़रा कल्पना कीजिए कि सभी स्थानों पर बिजली गुल हो गई है। सारा काम ठप्प। वित्तीय और आर्थिक कारणों से भी ऐसा ख़तरा पैदा हो सकता है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी को अच्छी तरह से समझने वाले एक बहुत अच्छे दिमाग़ की ही ज़रूरत होगी।

अमरीकी खुफिया सेवाओं ने अपने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को एक रिपोर्ट भेजी है जिसमें अमरीका के लिए मौजूदा साइबर हमलों के ख़तरों की समीक्षा की गई है। इसमें कहा गया है कि इस क्षेत्र में अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से ही पैदा होगा। लॉस एंजिल्स टाइम्स में छपी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस, फ्रांस, इज़राइल और दुनिया के कुछ अन्य देश भी साइबर जासूसी करते हैं लेकिन वे उतना विश्वासघात नहीं करेंगे जितना कि चीन कर सकता है। कम से कम रूस ऐसा नहीं कर रहा है। वह अपने व्यापारियों के लाभ के लिए अमरीकी कंपनियों की जानकारियां चुराने की कोशिशें नहीं कर रहा है।

इस बीच, दिसंबर माह की शुरूआत में साइबर रक्षा पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मंच साइबर सुरक्षा एशिया- 2012 के भागीदार इस बात पर सहमत हुए थे कि सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया की मुख्य समस्या यह है कि दुनिया की सरकारें अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैः साइबर-आतंकवाद क्या चीज़ है? कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं। लेकिन कोई भी सरकार यह गारंटी नहीं दे सकती हैं कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आतंकवादी गिरोह इन मालवेयरों और वायरसों का खूब इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी ख़तरा बना हुआ है। माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता है। (
रेडियो रूस से साभार)
13.12.2012, 16:32         
साइबर युद्ध का ख़तरा