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Friday, November 04, 2011

पूनम माटिया की कविताओं के संग चलना मुझे अच्छा लगा

पूनम माटिया जैसी ढेर सारी माओं के आँचल की छाँव में "स्वप्न श्रृंगार" करती हैं ये कविताएं-खुर्शीद हयात
किसी भी कवयित्री  की कीर्ती कविता की पोशाक में हो या ग़ज़ल के आवरण में लिपटी हुई   . तभी सार्थक मानी जायेगी , जब आम आदमी कुछ पल के लिए ही सही , उस के माध्यम से , अपने आस पास के मंज़र से रु ब रु हो जाये और उसकी संवेदनाएं उस से जुड़ जाएँ . तेज़ धूप में भी नीम की ठंडी छाँव सा एहसास जब कविता जगा जाये , बर्फ की तरह पिघलती जिंदगी को नया ऐतबार दे जाये ,हमारे ज़हन को बेदार कर जाये ,तब कविता के सायेबाँ में चहलक़दमी करना अच्छा लगता है .
धनक- रंग जिंदगी की पगडण्डी पर, पूनम माटिया की कविताओं के संग चलना मुझे अच्छा लगा , वजह यह रही की इनकी कवितायें बड़ी ख़ामोशी से एक आम आदमी की ख्वाब- ख्वाब निगाहों में एक नया मंजर रख जाती हैं . और फिर  यह मंज़र अलग अलग रंगों के चेहरों से यह कहता दिखाई देता  है ...आगे का रास्ता अभी खुला है , बढे चलो ....!
"यही दस्तूर ऐ ज़माना है 
जो बदल कर हमें दिखाना है 
औरत नहीं मजबूर यहाँ 
आज यही विश्वास जगाना है .."(पूनम )

कवितायें जब पूनम माटिया जैसी ढेर सारी माओं के आँचल की छाँव में "स्वप्न श्रृंगार" करती हैं , किचन से बाहर निकल कर संवरती हैं, निखरती हैं, सावन के मौसम में झुला झूलती हैं, तब सूखते वृक्षों को नया जीवन मिल जाता है, और"पीपल "दूर खड़ा मुस्कुराता रहता है .
मेरे सामने बैठी पूनम माटिया की कवितायेँ बातें कर रही हैं, कवितायेँ जब पाठक से बातें करती हैं ,सौंदर्य -चेतना को कलात्मक स्पर्श के सहारे जगा जाती हैं ,पूनम माटिया आम जिंदगी में,चहल पहल वाली एक ज़िम्मेदार माँ हैं अपनी शबनम की बूंदों जैसी दो प्यारी प्यारी बेटियों की .तो दूसरी तरफ "पति दोस्त" नरेश माटिया की शरीक ऐ सफ़र .जब रिश्ते सच्चे अच्छे दोस्त की तरह हों , जब रिश्ते पाकीजगी की पोशाक में लिपटे हों , तब जिंदगी "रचनाकार '' की दुलारी बन जाती है .
अपनी कविताओं में पूनम माटिया  चहल पहल को दूर रखती हैं ,एक माँ के अन्दर बैठी  कवयित्री की सोच गुफा में जिंदगी की उभरती हुई लहरें आबाद हैं .पूनम के शब्द जब चांदनी पोशाक में बातें करते हैं तब एक अलग समां होता है :-
आजकल ‘उसका’ भी ये आलम है ‘पूनम’
चाँद आसमां में रहता है, मगर 
जिक्र उसका जाने क्यों सरे आम होता 

पूनम का चंचल मन आज भी अपने बचपन की मीठी यादों , गाँव की मिटटी की सोंधी सोंधी खुशबुओं में रचा बसा है :
खुर्शीद हयात 
मन चंचल है हमारा 
बचपन तलाशता रहता है 
गुड्डे गुडिया न सही 
सपनों में चोर सिपाही खेलता रहता है
माँ का आँचल , पापा की ऊँगली 
मिलते नहीं 
अपने बच्चों की हंसी में 
अपनी मुस्कराहट खोजता रहता है 

(स्वप्न श्रृंगार - पृष्ट-१६)
"स्वप्न श्रृंगार "पूनम माटिया का पहला काव्य संग्रह है , अभी इन्हें और निखरना है ,संवरना है , मुझे आशा है ,आने वाले दिनों में हिंदी शायरी के फलक पर वह एक नई इबारत लिखने में कामयाब रहेंगी-खुर्शीद हयात 

Tuesday, October 18, 2011

समीक्षा//बंद कमरा//अलका सैनी

"बंद कमरा" उपन्यास  का हिंदी अनुवाद दिनेश माली जी का सर्वश्रेष्ठ अनुवाद है . सरोजिनी साहू जी के उड़िया उपन्यास "गंभीरी घर" के  हमारी मातृ भाषा हिंदी के इतने खूबसूरत अनुवाद को हम तक  पहुंचाने का सारा श्रेय जाने माने प्रकाशक "राज  पाल एंड संज" को जाता  है जिन्होंने दिनेश जी की काबलियत को पहचाना . इससे पहले भी राज पाल एंड संज से उनका अनूदित कहानी संग्रह " रेप तथा अन्य कहानियाँ 'छप चुका है .  दिनेश जी के अनुवाद की   एक- एक पंक्ति और ख़ास कर कविताएँ तो भावनाओं से इस तरह से ओत प्रोत हैं जैसे एक- एक शब्द उन्होंने उपन्यास को महसूस करके लिखा है .
सरोजिनी साहू जी एक नारीवादी  लेखिका हैं . इस उपन्यास में उन्होंने बहुत ही खूबी से औरत के मन की छुपी हुई भावनाओं को व्यक्त किया है कि कैसे शादी के बाद कदम- कदम पर औरत कभी बीवी ,कभी बहू और कभी माँ बनकर अपने आप की बलि देती चुप चाप सब सहती रहती है . यह उपन्यास विवाह उपरान्त एक औरत के मन में प्रेम की इच्छा के तहत उठती हुई तरंगो को दर्शाता है परन्तु  आज के समाज में भी इसे आलोचना की दृष्टि से देखा जा सकता है . भारतीय समाज में जहाँ शादी एक ऐसा बंधन माना जाता है जिसमे औरत पर परोक्ष रूप से तो अंकुश  माना जाता ही है एवं उसके मन, उसकी भावनाओं पर भी अंकुश लगा दिया जाता है . अगर कोई औरत अपने पति से वह प्यार नहीं पा सकती जिसको पाना हर औरत चाहती है तो उसका मन किस प्रकार विचलित रहता है जिसके बारे में कई बार वह खुद भी नहीं जान पाती .  जैसे कुछ साल पहले करण जोहर फिल्म निर्देशक की फिल्म "कभी अलविदा ना कहना" काफी आलोचनाओं का शिकार हुई . आज के युग में भी शादी के बाद के प्यार को काफी संकीर्ण नजरों से देखा जाता है इसलिए काफी कम लोगों ने इस विषय पर फिल्म बनाने  या लिखने की हिम्मत जुटाई . और यह आज के समाज में एक प्रश्न चिन्ह भी छोड़ता  है कि एक औरत  के लिए कहाँ तक जायज है अपनी इच्छाओं का दमन करना ? पर समय काफी तेजी से बदल रहा है . अगर शादी के बाद पति- पत्नी एक दूसरे से संतुष्ट नहीं तो क्या उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए . प्यार के बिना किसी रिश्ते को घसीटना तो एक समझौता  ही कहलाता है. लेखिका ने इस विषय को काफी बेबाकी से लिखा है कि प्यार किसी भी बंधन फिर चाहे वो विवाह का हो, देश का हो, धर्म का हो या जाति का हो किसी को नहीं मानता. हमारे धार्मिक इतिहास में भी श्री कृष्ण जी का रुक्मणी के साथ  विवाह होने के  उपरान्त भी राधा से प्रेम दिखाया है. लेखिका ने एक जगह पर  नायिका के मन की स्थिति दर्शाई है जहाँ वह मन ही मन अपने पति से कहती है कि "बेबी" जैसे छोटे से शब्द के संबोधन में कितना अपार प्रेम और दो जहान  का सुख समाया है जिसे उसका पति नहीं जान पाता और ना ही वह उसे अपने मन की बात खुल कर कभी कह पाती है. लेखिका ने इस उपन्यास में यही दिखाने की कोशिश की है कि औरत कितनी भावुक और संवेदन शील होती है. प्रेम एक बहुत ही पवित्र बंधन है जो कि दो आत्माओं का मिलन होता है और जिस्म की परिभाषा  से काफी ऊपर उठ जाता है. मीरा ने विवाह उपरान्त कृष्ण जी से प्रेम किया था और जब प्यार असीम हो जाता है तो भक्ति का रूप ले लेता है. उपन्यास में भी यही दिखाया गया है कि नायक जो कि बहुत सी औरतों को भोग चुका होता है नायिका के अपने जीवन में आने से अपने अन्दर एक अजीब सा बदलाव महसूस करता है जबकि वो दोनों कभी मिले नहीं होते और वह नायिका को अपनी देवी मानने लगता है. यही तो प्रेम की परकाष्ठा  मानी जाती है जबकि आजकल लोगों ने प्रेम को जिस्म तक सीमित करके प्रेम का स्तर नीचे गिरा दिया है. ऐसे उपन्यास से आभास होता है कि प्रेम कितना अद्भुत होता है उसका अहसास इंसान को किस कदर हजारों मील दूर से भी महसूस  होता है . इस उपन्यास को पढ़ते- पढ़ते  मुझे मनु भंडारी जी की कहानियाँ याद  आ गई जिन्होंने प्यार के बारे में काफी गहराई से लिखा है. इनकी कहानियाँ "यह सच है" , "स्त्री  सुबोधिनी" , "एक बार और"  में उन्होंने औरत को काफी भावुक प्रवृति की दिखाया है और प्यार को पाने के लिए वह किसी भी हद तक चली जाती हैं. उन्होंने आदमी का रूप काफी नकारात्मक दिखाया  है कि औरत काफी बार आदमी के हाथों इस्तेमाल होती है और बेवकूफ बन जाती  है. यहाँ उन्होंने शादी शुदा आदमी के स्वार्थ को  दिखाया है कि आदमी प्यार तो करना जानता है पर उसमे इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह अपनी शादी को दाव  पर लगा कर किसी औरत को जिसे वो प्यार करने का दम भरता है अपनाने की हिम्मत नहीं रखता. औरत जबकि प्यार के लिए काफी खतरा उठा लेती है वहीँ आदमी काफी प्रैक्टीकल होते हैं जो कि प्यार भी काफी नाप तोल कर करते है.  
इसके विपरीत इस उपन्यास में लेखिका ने एक शादी शुदा आदमी के आध्यात्मिक, अद्भुत प्रेम को दिखाया है और एक शादी शुदा  औरत भी उस प्रेम को पाकर अपने आप को एक अलग ही दुनिया में महसूस करती है क्योंकि  अगर उसे विवाह उपरान्त पूरा प्यार नहीं मिलता तो प्यार पाने के लिए वह किस कदर  नदी की तरह बहती चली जाती है. --अलका सैनी 


Written By : Sarojini Sahoo
translated by Dinesh kumar Mali
Price : INR 150/-
Format : Paperback
ISBN : 978 81 7028 954 8

Sunday, October 16, 2011

राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित करता है उपन्यास ‘बंद कमरा’

 'राष्ट्र समूह वाचक नहीं, बल्कि व्यक्ति वाचक' 
पुस्तक समीक्षा                                                          अनुवादक:दिनेश कुमार माली
‘बंद कमरा’ उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।“
एक लम्बे अरसे से डॉ. सरोजिनी साहू ओड़िया साहित्य में अपनी सृजनशीलता के लिए पाठकों में चर्चा का विषय रही हैं। सप्रतिभ भाषा-शैली, कथ्य-संप्रेषण और नवीन चेतना-स्तर के कारण वह अपने समसामायिक साहित्यकारों में एक अलग पहचान रखती है। आपका ओडिया उपन्यास ‘गंभीरी घर’ (हिंदी में ‘बंद कमरा ‘) ओडिशा की प्रसिद्ध ‘गल्प-पत्रिका’ के पूजा-अंक में प्रकाशित होते ही ओडिया -पाठकों में चर्चा का एक जबरदस्त विषय बना। पहले की तरह डॉ.सरोजिनी की हर रचनाओं की तरह यह उपन्यास भी आकर्षण का केन्द्र बना। भले ही, कुछ पाठकों में लेखिका के व्यक्तव्य की स्मार्टनेस नागवार गुजरी, मगर अनेक पाठकों ने न केवल इसे सहर्ष स्वीकार किया,बल्कि इस उपन्यास को पढ़कर भावाभिभूत भी हुए.

लेखिका की कहानियों और उपन्यासों में ऎसी ही जादुई विलक्षणता है, जो पाठकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है। कुछ पाठकों ने उपन्यासकार को उसका खुद एक पात्र समझने की गलती की , मगर यह सार्वभौमिक सत्य है, किसी उपन्यास की सफलता इस बात पर निर्भर करती है जहां पाठकों ने उसके अन्दर किन्हीं छिपी हुई सत्य-संवेदनाओं को अपने भीतर अनुभव किया हो।
क्या यह उपन्यास वास्तव में केवल प्रेम पर आधारित उपन्यास है ? क्या लेखिका हिंदु प्रेमिका और मुस्लिम प्रेमी के बारे में अपनी बात रखना चाहती है या भारतीय नारी और पाकिस्तानी पुरुष का अंतरजाल के माध्यम से विकसित हुई यह प्रेम-कहानी को दर्शाना चाहती है ?
कुछ ओडिया पाठक इसे यौन-स्वतंत्रता से संबंधित उपन्यास मानते हैं, जबकि इन सारी चीजों से ऊपर उठकर ‘गंभीरी घर’ का कथ्य और कथानक की व्यापकता और ज्यादा विशाल हो जाती है। इस उपन्यास में व्यक्ति की निसंगता, विशेष रूप से भारतीय नारी की आधुनिक जीवन -धारा में अकेलेपन और रिक्तता की बातें दर्शाई गई है। इस उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। उपन्यास की मुख्य नायिका कूकी के एक ओर है पतिऔर दूसरी तरफ प्रेमी; पति अनिकेत और प्रेमी शफीक। पति की दुनिया में घर-गृहस्थी मानो संवेदनहीन और पत्थर बन चुकी हो, और प्रेमी शफीक की काल्पनिक दुनिया का कहना ही क्या ! शफीक को देखा तक नहीं कूकी ने, स्पर्श करना तो बहुत दूर की बात। शायद इसलिए शफीक के लिए उसके हृदय में उसको पाने की व्याकुलता स्वाभाविक है। परंतु उसकी पहुँच से परे है शफीक का आकाश।बाहर से प्रेम प्रदर्शन नहीं करने वाला दंभी अनिकेत कूकी को प्यार नहीं करता था, ऐसी बात नहीं थी। सभी के सामने कूकी को अपने शरीर के प्रति लापरवाही बरतने से नाराज होकर कूकी पर हाथ उठाने के पीछे भी कहीं न कहीं उसकी प्रेम की भावना छिपी हुई थी। इसी तरह वह कूकी की तबीयत खराब हो जाने पर रात रात जगकर उसकी सेवा करता था । इन दो परस्पर विरोधी पुरुष-व्यक्तित्वों को लेखिका ने अनिकेत के माध्यम से बहुत ही निपुणता से वर्णन किया है। उपन्यास के अंत में अनिकेत की विदेश-यात्रा के समय पाठक देखेंगे, अनिकेत और कूकी में घनिष्ठ प्रेम है।

दिनेश कुमार माली
जबकि बावन स्त्रियों के साथ संभोग किया हुआ, घर में दो बीवियां रखने वाला शफीक विकृत मानसिकता वाला होते हुए भी एक सफल चित्रकार है। मेरा यह मानना है जैसे लेखिका शफीक के अंदर पिकासो को ढूंढ रही हो। पिकासो ने कई स्त्रियों के साथ संबंध बनाए थे। उनके प्रेम और उनकी कामुकता के प्रति आसक्ति भरे खोजी दृष्टिकोण ने उसे विश्व प्रसिद्ध चित्रकार बना दिया था। ये सारी बातें शफीक के अंदर पाई जाती है। परंतु शफीक प्रेमी स्वभाव का है, इसलिए लेखिका ने कूकी का उसके प्रति प्रेम भाव को कई सुन्दर प्रेम कविताओं के पद्यांशों के जरिए दर्शाया है। जहां अनिकेत का आगमन होता है वहाँ भाषा गद्य का रूप ले लेती है। पद्य और गद्य शैली में लिखा गया यह उपन्यास मानवीय हृदय के माधुर्य और तिक्तता को एक साथ प्रकट करता है।
क्या यही है भारतीय नारी की नियति ? हमारी समाज-व्यवस्था, हमारी जीवनचर्या, हमारे संस्कार नारी को अलग कर देते हैं । आधुनिकता, शिक्षा-दीक्षा, संविधान सम्मत समस्त अधिकार होते हुए भी एक नारी अपने प्रेमी और पति से दोनो से विच्छिन्न होकर रह जाती है। वह कैदी है, वह खुद ही अपने को कैद कर लेती है संवेदनशील मातृत्व की सलाखों के पीछे घर नामक चारदीवारी के अंदर। इस विच्छिन्नता बोध को प्रतीक है ‘गंभीरी घर’।
ट्रेजेडी उपन्यास होते हुए भी प्रेम के प्रति आस्थाबोध पाठकों को नजर आएगा। प्रेम के प्रति लेखिका का दृष्टिकोण प्रचलित धारणाओं से उठकर स्वतंत्र रूप में है। पति अनिकेत के प्रेम और प्रेमी शफीक के प्रेम में जो अंतर है, उसे लेखिका ने बड़े से सूक्ष्म ढंग से प्रस्तुत किया है। अनिकेत के प्रेम में है प्रज्ञा और शफीक के प्रेम में आवेग और रोमांच का बाहुल्य ।

एक स्त्री का निश्चल प्यार पाकर एक पर्वटेड कामुक आदमी क्रमशः परफेक्टशन की ओर अग्रसर होता है। स्वयं को यौनता से पृथक करते हुए प्रेम पथ पर बढता जाता है। उसे नारी का शरीर और आकर्षित नहीं करता है। रूखसाना उसके लिए देवी है, इसलिए कूकी के भीतर वह रूखसाना को देखता है।  

कट्टरपंथ , धार्मिक-बंधन, देश, राजनैतिक, भौगोलिक सीमाओं से ऊपर है रूखसाना की स्थिति। इसलिए शफीक कहता है, मेरा कोई अपना देश नहीं है, कलाकार के लिए कोई एक विशेष देश नहीं होता है। उसके पास होते हैं केवल प्रेम के नैसर्गिक संबंध।

इस उपन्यास में कूकी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर लेखिका ने अपने सक्षम लेखन का परिचय दिया है। कुमारी-साधना, ओशों की सम्भोग से समाधि वाली साधना, रागानुराग भक्ति-मार्ग में कूकी विश्वास नहीं रखती थी। वह कहती थी, “शफीक, नहीं, मैं ओशो के दिखाए मार्ग में तुम्हें सहयोग नहीं कर पाऊँगी। मैं अति साधारण औरत हूँ। मेरी आशा और आकांक्षाएं सभी साधारण सी है। मैंअपने प्रेमी से केवल प्रेम की उम्मीद करती हूँ। जीवन जीने की खुराक चाहती हूँ। मुझे किसी भी साधना से क्या लेना-देना ? मुझे मोक्ष प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं है। मैं ‘नेरात्मा’बनकर बैठी रहूंगी और तुम व्याकुल शबर की तरह मेरे पास भागे दौड़े आओगे।”

पिकासो के ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ तस्वीर के जरिए लेखिका ने कूकी के अपराध-बोध को दिखाया है। ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ का मतलब होता है, जिस पति की पत्नी अन्य पुरूषों के साथ प्रेम करती है। वह तस्वीर बहुत ही गजब खूबसूरत थी। उस तस्वीर में एक नंगी औरत पहिए वाली गाड़ी में टांगों को उठाकर एक के ऊपर दूसरे को रखकर सोई हुई है। टांगों के भीतर से उसके यौनांग साफ़ दिखाई पड़ता है। एक नग्न पुरुष उस पहिए वाली गाड़ी को खींच रहा है। छुपकर कुछ नंगे लोग उस दृश्य को देख रहे हैं और उस तस्वीर के बायी ओर एक फ्रॉक पहने लड़की हाथ में चाबुक लिए खड़ी है। अपराध-बोध की सुंदर व्याख्या लेखिका और पिकासो की जुगलबंदी इस उपन्यास को एक विशिष्ट दर्जा प्रदान करती है।

इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं। लंदन बम ब्लास्ट में शफीक के गिरफ्तार होने के पीछे आतंकवाद कोई कारण नहीं है, वह तो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखता था, वह तो इस बात को मानता था कि उसका कोई देश नहीं है, वह कट्टरपंथियों का विरोध भी करता था। वह गिरफ्तार हुआ तो केवल एक छोटे से कारण की वजह से। तबुस्सम और मिल्टरी ऑफिसर के आपसी वैमनस्य और मतभेद से। इस नितांत व्यक्तिगत घटना को एक अंतराष्ट्रीय रूप देकर उसे गिरफ्तार किया गया था।

लेखिका ने इस उपन्यास में आतंकवाद के मलभूत कारणों को जानने की कोशिश की है। अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों को हटाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में आतंकवादियों का प्रशिक्षण प्रदान किया था। इस्लाम की सुरक्षा के नाम पर ,जेहाद के नाम पर, विश्व के हर प्रांत से मुसलमानों को एकत्रित कर गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया था, अस्त्र-शस्त्र बांटे थे। वहीं से शुरू होता है आतंकवाद का बीजारोपण। रूसी सैनिकों ने अफगानिस्तान से हट जाने के बाद अमेरिका भी वहां से हट गया था, क्योंकि वह अप्रत्क्षतः अपने मकसद में सफल हो गया था । वहां से हटते समय छोड़ गया था अस्त्र-शस्त्रों की भरमार खेंपें और उनके ट्रेनिंग कैंप। रह गए थे सिर्फ तालिबानी और जेहादी। उन्होंने कुवैत जैसे भोलेभाले देश को एनजीओ के माध्यम से मुफ्त शिक्षा का प्रलोभन दिखाकर कई कौमी मदरसे खोलें । जहाँ छोटे-छोटे बच्चे धीरे-धीरे मानवीय बंबों और आत्मघाती दस्तों में बदल गए।इस तरह इस उपन्यास में घरेलू आतंकवाद से वैश्विक आतंकवाद के संभावित कारणों का अच्छे ठंग से ताना बना बुना गया है ।

लेखिका ने इसलिए लिखा है,“पूछो, पूछो , अमेरिका को पूछो, अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिए जो हथियार तैयार किए थे, और हृदयहीन रोबोट बनाए थे, अब वे कहाँ जाएंगे ? कहाँ गाडेंगे इतने हथियार ? कैसे भूलेंगे तालिम के वे दिन ? गोला, बारूद, हथियारतो हमेशा खून मांगता है। मांगता है जीवन।”

इसलिए आतंकवाद जितना धर्म आश्रित नहीं होता है, उससे ज्यादा रष्ट्र आश्रित होता है। संभवत अमेरिका का शीत-युद्ध राजनीति लादेन का सृष्टा है। इसलिए लेखिका के उस उपन्यास में अन्तरंग प्रेम के साथ साथ कई बारीक दार्शनिक पहलूओं का जिक्र हैं।

 ‘रेप तथा अन्य कहानियां’ (2011 ) के बाद राजपाल एंड साँस ने    सरोजिनी साहू के चर्चित उपन्यास ‘( अंग्रेजी : ‘The Dark Abode’/ ओडिया ‘गंभीरी घर’)  ’ का हिंदी अनुवाद  ‘बंद कमरा‘ शीर्षक से प्रकाशित किया है.यह उपन्यास पहले से ही मलयालम में ‘इरुंडा कुदरमा’ तथा बंगला में’ मिथ्या गेरोस्थाली’ शीर्षक से केरल तथा बंगला देश से प्रकाशित हो चुकी है. इस उपन्यास का  ऑनलाइन  क्रय हेतु राजपाल एंड साँस पर जाएँ) (परिकल्पना से साभार

Thursday, August 25, 2011

रेप तथा अन्य कहानियाँ//समीक्षा // अलका सैनी


जाने माने प्रकाशक "राज पाल एंड संज "द्वारा प्रकाशित पुस्तक "रेप तथा अन्य कहानियाँ "दिनेश कुमार माली द्वारा  हिंदी भाषा में अनूदित प्रसिद्द उड़िया लेखिका सरोजिनी साहू का कहानी संग्रह है .दिनेश जी के हिंदी अनुवाद की ख़ास बात ये है कि किसी भी कहानी को पढने पर ये नहीं लगता कि यह उड़िया भाषा से हिंदी में अनुवाद है बल्कि बिल्कुल मूल रचना जान पड़ती है . दिनेश जी एक पुरुष होने के बावजूद जिस तरह एक औरत के मनोभावों और भावनाओं को समझते हुए उसे जिस तरह पन्नों पर उकेरते है वो वाकिया में काबिले तारीफ़ है . उनकी इसी दक्षता को पहचानते हुए यह पुस्तक दिल्ली के जाने माने प्रकाशक ' राज पाल एंड संज'  ने हाथ में ली . मुझे यहाँ यह कहने में बिल्कुल गुरेज नहीं है कि उनकी कहानियों के इस भावना परिपूर्ण  अनुवाद को पढ़ते  हुए ही मैंने अपने अंतर्मन में झांकते  हुए अपनी खुद की कहानियाँ लिखने की भी प्रेरणा पाई
इस पुस्तक  में लेखिका ने एक औरत के मन के  भीतर गहराई में छुपी हुई विभिन्न भावनाओं और संवेदनाओं को  बहुत ही सरलता से अपनी कहानियों में अंकित किया है . औरत मन से अत्यंत ही संवेदनशील और भावुक होती है इसलिए एक ही परिस्थिति को वह किस तरह पुरुष की अपेक्षा सूक्ष्म निरीक्षण करती है यही उनकी कहानी बलात्कृता में दर्शाया गया है . औरत अपनी भावनाओं के कारण हर पक्ष के अत्यंत ही गोपनीय पहलुओं तक पहुँच जाती है . 
डाक्टर सरोजिनी साहू 
कहानी रेप जो कि पुस्तक का शीर्षक भी है में औरत के मन की दबी हुई भावनाएं किस तरह सपनों का रूप धारण कर लेती है जबकि सपने का पात्र कहीं भी वास्तविकता में औरत के मन से मेल नहीं खाता है . जिस बेबाकी से लेखिका ने इस कहानी को लिखा है उस हद तक शायद ही कोई पति अपनी पत्नी के इस तरह के सपने को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता हकीकत में तो दूर की बात है. हमारे समाज में अभी तक यही देखने में आता है कि पुरुष अपनी आजादी को हकीकत में भी जिस तरह भी इस्तेमाल करे परन्तु औरत के मन में आए किसी भाव को भी वह कबूल नहीं कर सकता . 
दुःख अपरिमित में एक छोटी लड़की में घर के माहौल में भेदभाव के वातावरण के कारण उसकी मन स्थिति इतनी विकृत हो जाती है कि वह हर समय डर के साए में रहती है इसलिए खुद को नई मुसीबत में घिरा पाती है .
कहानी चौखट में एक जवान लड़की के मन के भावो को दर्शाया गया है कि घर में बाप और भाइयों के रौब दार व्यवहार के घुटन भरे माहौल से छुटकारा पाने के लिए वह किस तरह से छटपटाती  है . इसी कशमकश में वह भविष्य की अनिश्चितता  को भी ना विचारते हुए एक लड़के के साथ  भाग कर प्रेम विवाह कर लेती  है उस समय उसे सिर्फ अपनी माँ की बेबसी का ध्यान आता है .
कहानी गैरेज में किस तरह एक औरत जो कि गृहणी है अपने घर के गैरेज को लेकर अपनी काम वाली के साथ मिलकर आए दिन तरह- तरह के सपने बुनती है . इस कहानी में लेखिका ने घर में रहने वाली औरतों के मन की भावो को दर्शाया है कि वह कुछ करना चाहते हुए भी कई बार कुछ नहीं कर पाती और इसी अधूरेपन में अंत तक विचरती रहती है .
अलका सैनी 
दिनेश कुमार माली
इस तरह लेखिका के इस कहानी सग्रह की हर एक कहानी औरत के मन और उसकी भावनाओं के हर एक पहलु को उजागर करती है . औरत अलग- अलग  परिस्थितियों  में किस तरह इतनी गहराई में सोचती है इसको लेखिका ने बखूबी दर्शाया है . औरत जब नौकरी करती है तब किस- किस तरह के हालात उसे झेलने पड़ते है बच्चों और पति में वह किस तरह ताल मेल बिठाती है या फिर जब वो माँ बनने वाली होती है तो किस तरह की हालत को झेलती है . इस कहानी सग्रह में औरत के हर रूप माँ , बेटी , बहन , पत्नी बन कर किस तरह की परिस्थितियों  से गुजरना पड़ता है ये सब पढ़ने का मौका मिलता है. यहाँ तक कि लेखिका ने औरत के मन में प्रेम और सैक्स को लेकर छुपी हुई अधूरी भावनाओं और इच्छाओं को बहुत ही निडरता से लिखा है जो कि हर औरत के मन के किसी कोने में छुपी होती है परन्तु कई बार उसे घर की जिम्मेवारियां निभाते- निभाते खुद  भी अपनी भावनाओं के बारे में पता नहीं चल पाता . इस उड़िया भाषा के कहानी सग्रह को हमारी मातर   भाषा में इतनी खूबसूरती से हमारे समक्ष प्रस्तुत करने का सारा श्रेय दिनेश कुमार माली जी को जाता है जिससे भारत के ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के भारतीय इसे पढ़ कर औरत की भावनाओं के करीब पहुँच सकते है . .अलका सैनी 

कहानी संग्रह: रेप तथा अन्य कहानियाँ
कहानीकार: सरोजिनी साहू
अनुवादक: दिनेश कुमार माली
प्रकाशक: राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली -11006
प्रथम संस्करण: 2011
ISBN: 978-81-7028-921-0
पृष्ठ संख्या: 175, पेपर बैक
मूल्य: एक सौ पचहत्तर रुपये