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Sunday, September 11, 2022

इण्डिया गेट की जगह पर अपना राष्ट्रिय स्मारक अब तक क्यों नहीं?

Saturday 10th September 2022 at 11:32 PM

नामधारियों ने किया प्रीति सिंह की अगवानी में ज़ोरदार रोष प्रदर्शन


नई दिल्ली
:10 सितंबर 2022: (साहिबा कौर//पंजाब स्क्रीन डेस्क):: 

दिल्ली का इंडिया गेट फिर विवादों में है। बहुत से लोगों का कहना है कि यह अंग्रेजों की ही निशानी है। उसी शासन सत्ता की याद दिलाता है। इस बार इसके खिलाफ आए हैं नामधारी समाज के लोग। इनका कहना है की हमारे अपने शहीदों का कोई स्मारक ही नहीं है। इसे देख कर ब्रिटिश सत्ता के शहीद याद आते हैं। 

गौरतलब है कि नई दिल्ली के केंद्र में 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट उन इमारतों में शामिल है जिन्हें दिल्ली जाने वाले लोग विशेष तौर पर देखना पसंद करते हैं। सुबह शाम इण्डिया गेट परिसर में भारी भीड़ रहती है जो यहां पिकनिक जैसा माहौल बना देती है। 

रोष प्रदर्शनों के लिए भी अक्सर इसका इस्तेमाल किजा जाता है। इस तरह यह दिल्ली का एक केन्द्रीय स्थल बना हुआ है। इसके अतीत में जाएं तो वास्तव में यह गेट ऐसा है जो एक चौराहे के बीच में आर्कवे की तरह “आर्क-डी-ट्रायम्फ” ही है। लगभग अपने फ्रांसीसी समकक्ष के समान, यह उन यह उन हज़ारों भारतीय सैनिकों को याद करता है, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए अपनी जान गंवा दी थी। शहीद हुए सैनिकों की संख्स्माया को लेकर आंकड़े अलग अलग मिलते हैं। इस स्रमारक में 13,516 से अधिक ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम भी उक्रे हुए  जो पश्चिमोत्तर सीमांत अफगान युद्ध 1919 में मारे गए थे। आखिर यहां 1947 के बाद शहीद हुए उन भारतियों का ज़िक्र क्यों नहीं जो भारत के लिए लड़ते शहीद हुए हों?  स्वतंत्र भारत में बेगाने शहीदों का स्मारक क्यूं?

यहां याद दिलाना उचित होगा कि इंडिया गेट की आधारशिला उनकी रॉयल हाइनेस, ड्यूक ऑफ कनॉट ने 1921 में रखी थी और इसे एडविन लुटियन ने डिजाइन किया था। स्मारक को 10 साल बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने राष्ट्र को समर्पित किया था। भारत को आजादी मिलने के बाद एक और स्मारक, अमर जवान ज्योति बहुत बाद में जोड़ा गया था। दिसंबर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों की देश को याद दिलाने के लिए मेहराब के नीचे अनन्त ज्योति दिन-रात जलती है। लेकिन सिर्फ अम्र जवान ज्योति क्यूं? पूरा स्वतंत्र स्मारक भारतीय शहीदों के लिए क्यूं नहीं। इस मकसद की मांग पहले भी बहुत बार उठी है लेकिन इस बार इसे लेकर सामने आए हैं नामधारी। वे नामधारी जो अपने गुरु ठाकुर दलीप सिंह जी के आदेशों को भगवान के वचनों की तरह मानते हैं। 

अब यह नामधारी दिल्ली के इंडिया गेट पर शहीद स्मारक बनाने की मांग को लेकर के नामधारी समाज के लोगों ने धरना प्रदर्शन किया। इस मौके पर नामधारी समाज के लोगों की पुलिस के साथ तीखी बहस भी हुई। इस मौके पर  पहुंचे हुए प्रदर्शनकारियों की मुख्य संयोजक प्रीति सिंह ने कहा कि हम पिछले 7 सालों से सरकार से मांग कर रहे हैं हैं कि सरकार देश के उन स्वतंत्रता सेनानियों को उचित सम्मान देते हुए उनके लिए एक शहीद स्मारक बनाए। जिससे शहीदों को सही सम्मान मिल सके जिन्होंने देश को आजाद कराने में अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। ऐसे हज़ारों स्वतंत्रता सेनानी है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी लेकिन उन्हें अभी तक कोई नहीं जान पाया है। हम चाहते हैं कि सरकार उन सभी शहीदों के नाम का स्मारक बनाये। सरकार एक ऐसा भव्य स्वतंत्रता शहीद  स्मारक बनाये जिस पर उन सभी शहीदों के नाम अंकित हो जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए।  एक ऐसा विशाल शहीद स्मारक बनाए जो एक मिसाल बन सके। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए लेकिन पुलिस ने बाद में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

इसी बीच कुछ लोग इस पर भी नाराज़ हैं कि महारानी एलिज़ाबेथ के निधन पर देश का राष्ट्रिय ध्वज आधा क्यूं झुकाया गया है?

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Sunday, April 26, 2020

नामधारी संगत के साथ शहीद सरबजीत की बहन ने भी बांटा राशन

26th April 2020 at 5:28 PM
दलबीर कौर ने "पंथ के ठेकेदारों" को भी रखा आलोचना के निशाने पर  
अमृतसर//कुराली//लुधियाना: 26 अप्रैल 2020: (पुष्पिंदर कौर//पंजाब स्क्रीन):: 
कोरोना से कराह रहे लोगों को राहत पहुंचाने के मिशन में नामधारी सम्प्रदाय ने शहीद सरबजीत सिंह भिखीविंड की बहन दलबीर कौर को भी अपने साथ लिया है। दलबीर कौर ने भी भलाई के इस कार्य पर ठाकुर दलीप सिंह की प्रशंसा करते हुए सक्रिय हो कर इस काम में नामधारी काफिले का साथ दिया। उन्होंने ठाकुर जी का धन्यवाद करते हुए कहा कि आर्थिक तौर पर कमज़ोर जिन लोगों को आप ने राशन भिजवाया है पंथ के ठेकेदार तो इन लोगों को सिख ही नहीं मानते। इस मौके पर शहीद सरबजीत सिंह की चर्चा भी चली। आपको याद है न सरबजीत सिंह और उसकी ह्रदय विदारक शहादत? 
सच क्या है यह तो सरकारें ही जानती होंगीं लेकिन एक बात अवश्य होती रही कि नौजवान उम्र में धड़कते हुए दिल अपने देश के लिए खुद को खतरों में डाल कर अक्सर बहुत कुछ ऐसा कर बैठते हैं जो एक नया इतिहास भी रच जाता है। इन कामों में दुसरे देशों में जा पहुंचना और जासूसी करना भी शामिल होता है। जासूसों की ज़िंदगी बेहद रहस्यपूर्ण होती है। वे जो कुछ करते हैं उसका सबूत भी अक्सर खुद ही मिटा देते हैं। इस लिए जब कोई उनसे उनके कामों का सबूत मांगें तो उनके लिए वह घड़ी बहुत ही मुश्किल की घड़ी होती है। मिटाये हुए सबूतों को भला कौन ला सकता है? पाकिस्तानी प्रचार के मुताबिक कहा जाता है कि भिखीविंड का सरबजीत सिंह भी पाकिस्तान में सीक्रेट ऐजन्ट था। उसने एक भारतीय जासूस के तौर पर  काफी काम किये। लेकिन गाँव के लोग कुछ और ही कहने बताते हैं। उनका कहना है कि उसने गलती से सीमा पार कर ली थी क्यूंकि उनदिनों कांटेदार बाड़ नहीं लगी होती थी।उसे नाम का भरम होने के कारण वहां पकड़ा गया। वहां उसे मंजीत सिंह बता कर अदालत में पेश किया गया। उसे यातनाएं भी दी गयीं और मौत की सज़ा भी सुनाई गई  जिसे कूटनयिक प्रयासों से रद्द करवा लिया गया। उसकी बहन दलबीर कौर ने उसे बचाने के लिए जो संघर्ष किया उसकी मिसाल शायद कहीं और नहीं मिलती। जब उसे रिहा किये जाने का वक़्त नज़दीक आया तो पाकिस्तान की कोटलखपत जेल में ही किसी अन्य कैदी ने उस पर हमला करके उसे बुरी तरह पीटा। मारपीट जानलेवा थी। शायद वहीँ पर उसकी मौत हो गई थी लेकिन फिर भी उसके इलाज का सिलसिला कई दिनों तक चला। उसके रिहा होने की बातें केवल कागज़ों में रह गई। रिहाई होने वाली थी लेकिन वहीँ अस्पताल में उसका देहांत हो गया। कभी किसी शायर ने कहा था:
पास मंज़िल के मौत आ गई 
जब सिर्फ दो कदम रह गए!
बस रिहा हो कर भिखीविंड गांव में अपने परिवार में पहुंचने की बातें केवल कागज़ों में रह गईं। उसके परिवार का सपना कभी पूरा न हुआ। उसकी बेटियां कभी अपने पिता को न देख सकीं। उसका शव ही यहाँ पहुंचा। दर्द असहनीय था लेकिन सरे परिवार ने इस दर्द को सहा। उसकी बहन दलबीर कौर ने उस नाज़ुक हालत में भी उस परिवार को संभाला। हालांकि दलबीर कौर को भी लोगों ने बहुत कुछ कहा लेकिन वह डटी रही। उसने सरबजीत सिंह की अंत्येष्टि राजकीय सम्मानों के साथ करवाई।  मौत पर पंजाब सरकार ने तीन दिनों तक का राजकीय शोक भी रखा। एक करोड़  आर्थिक राहत  भी दी। इस तरह सरबजीत को शहीद का सम्मान भी प्राप्त हुआ। इस सब के बावजूद लोग उसे भूलते चले गए। सियासी लोग भी और समाजिक लोग भी। उसके जाने का दर्द याद रहा केवल उसके परिवार को। साथ ही उस दर्द को नामधारी सम्प्रदाय ने भी याद रखा। 
अब जब कोरोना का कहर छाया तो यह संकट भीखीविंड में ही महसूस किया गया। वहां भी कारोबार ठप्प हो गए। गरीब और मध्यवर्गीय लोगों को खाने के लाले पड़ गए। काम लगातार ठप और खर्चे लगातार जारी। पेट की भूख तो लगातार सताती रही। गहरे संकट की इस नाज़ुक घड़ी में ठाकुर दलीप सिंह ने अपनी संगत सिंह से भिखीविंड जाने को भी कहा और शहीद सरबजीत सिंह की बहन से मिलने का भी आदेश दिया। नामधारी संगत ने ऐसा ही कहा। भिखीविंड में पहुंच कर नामधारी सम्प्रदाय के लोगों ने आर्थिक कमज़ोर लोगों का पता लगाया।एक एक करके उनके घर ढूंढे और बिना कोई शोर शराबा किये राशन और आर्थिक सहायता उन तक पहुंचाई। न मीडिया बुलाया और न ही फोटो खिंचवाने का आडंबर किया। जिस तस्वीर को आप देख रहे हैं इसे भी किसी ने चुपके से खींच लिया। दलबीर कौर  भूपिंदर कौर ने भी सक्रिय हो कर इसमें योगदान दिया। 
नामधारी संगत का काफिला और दलबीर कौर मिलकर अमृतसर के गांव गांव में पहुँच रहे हैं। वहां ज़रूरतमंद सिख परिवारों को दैनिक उपयोग में आने वाली सभी आवशयक चीज़ें मुहैया कराई जा रही हैं। नामधारी संगत के इस काफिले का नेतृत्व कर रहे हैं साहिब सिंह, लाल सिंह और गुरचरण सिंह। इन नामधारी प्रतिनिधियों ने कहा कि यह सब  ठाकुर दलीप सिंह जी के विशेष आदेशों पर ही किया जा रहा है। शहीद सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर ने ही कहा कि मैं ठाकुर जी की विशेष आभारी हूँ जिन्होंने इस संकटकाल में इन लोगों का दामन थामा है। मुश्किल की इस घड़ी में यह ज़रूरतमंद लोग बहुत ही डगमगाए हुए थे। नामधारी संगत इनके लिए भगवान बैंक कर पहुंची है। उन्होंने इस बात पर गहरा दुःख व्यक्त किया कि पंथ के कुछ स्वयंभू ठेकेदार तो इनको सिख भी नहीं मानते। इनके साथ लम्बे समय से भेदभाव करते आ रहे हैं। दलबीर कौर ने साड़ी संगत से अपील की कि जो खुद को सिख समझता है वह किसी के साथ भी भेदभाव न करे। भेदभाव दूर करके ही पंथ की चढ़दीकला होगी। गुरु का तेज भी हमें तभी मिलेगा। 
इस मौके पर सरपंच दविंदर सिंह नागी, बलकार सिंह, धीर सिंह, सुच्चा सिंह, प्रितपाल सिंह, बीबा भूपिंदर कौर और अन्य लोग भी मौजूद रहे।
यह भी पढ़िए बस यहाँ नीचे दिए गए नीले लिंक पर क्लिक करके 
पटियाला और आसपास के क्षेत्रों में मोर्चा संभाला कुलदीप कौर और अन्य नामधारी सहयोगियों ने 

Sunday, March 29, 2020

कोरोना संकट में भी सामने आई ठाकुर दलीप सिंह की संगत

29th March 2020 at 5:08 PM
हर राज्य में पहुंचाए जा रहे हैं राशन और अन्य आवश्क्य चीज़ों के पैकेट  
लुधियाना: 29 मार्च 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना वायरस ने सारी दुनिया को हिला कर रख दिया है लेकिन हकीकत यह भी है कि इसने सभी को एक भाईचारे का अहसास भी करवा दिया है। जहां पर्यावरण का मौसम शुद्ध हो गया है वहीँ लोगों के दिल और दिमाग का प्रदूषण भी अब तेज़ी से कम होता जा रहा है। लोग घर में बैठ कर चिंतन मनन करने लगे हैं। खुद से मुलाकात भी करने लगे हैं। लेकिन पैसे का संकट भी गहराया है। 
इस नाज़ुक हालात में जब आम लोग भूखमरी की कगार पर भी  पहुंच गए हैं। इस समय स्थिति बेहद नाज़ुक रूप ले रही है। लोगों के पास न तो नगद पैसा बचा है और न ही खाने का भोजन। ऐसे में जो लोग लंगर और राशन की सेवा ले कर आगे आये हैं उनमें से अधिकतर लोग या तो फोटो खिंचवा खिंचवा कर इन गरीबों के आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं या फिर इनके आधार कार्ड मांग कर इनको इनकी गरीबी और मजबूरी का अहसास कराते हैं। उनके अंदाज़ में कहीं भी दया भावना या दिव्यता नहीं होती। मध्य वर्गों से जुड़े बहुत से लोग ऐसी हालत में भूखे मरना तो मंज़ूर कर लेते हैं लेकिन लीडरी की ललक रखने वाले ऐसे लोगों की लिस्टों में अपना नाम कभी नहीं लिखाते। ऐसे लोगों की सहायता को पहुंचे हैं नामधारी समुदाय के संत स्वभाव लोग। किसी के भी आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उसको मदद देते हैं। बिना कोई शर्त रखे बिना कोई सबूत मांगे। हालांकि गलत लोग इस का फायदा भी उठाने का प्रेस करते हैं लेकिन इनकी अंतर्दृष्टि सब पहचान लेती है और उन बेईमानों को भी इमां के रास्ते पर ले आती है।  शब्दों की मिठास उसे इस संकट में जो राहत देती है उसका उल्लेख शब्दों में किया ही नहीं जा सकता।  
इन मजबूर लोगों की मजबूरी और आत्म सम्मान को समझते हुए नामधारी संगत इनको बिना किसी भेदभाव के राहत पहुंचा रही है। राहत में सूखा राशन भी है और नगदी भी। नामधारी संगत यह सारा काम अपने सद्गुरु ठाकुर दलीप सिंह के आदेशों पर कर रही है। राहत के इस काम को पंजाब के साथ साथ दिल्ली, यूपी, हरियाणा, हिमाचल  प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों तक भी लेजाया जा रहा है। अमृतसर, गुरदासपुर, चुन्नी, मोहाली, जालंधर और पटियाला की संगत इस काम के लिए बढ़चढ़ कर आगे आई है। नामधारी हरविंदर सिंह, नामधारी तेजिंदर सिंह, सेवक देव सिंह ने कहा कि जैसी जैसी ड्यूटी लगाई गयी है उसी के मुताबिक संगत अपना काम कर रही है। 
नामधारी नवतेज सिंह ने कहा कोरोना के इस गंभीर संकट को देखते हुए जिस तरह बहुत से समाज सेवी संगठन आगे बढ़ कर आये है उसे देखते हुए यह विश्वास और पक्का होता है कि हम प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कोरोना को जल्द ही हरा देंगें। ऐसे में बेरोज़गारी और राशन की कमी का जो संकट खड़ा हुआ है उसे भी हमें सभी लोगों को एकजुट हो कर ही हराना होगा। हंस सभी एक रहेंगे तो इस पर भी काबू पाया जा सकेगा। 
इस लिए जितने भी संगठन इस मकसद के लिए कार्य कर रहे हैं वे सभी हार्दिक बधायी के पात्र हैं। हम उन्हें सलाम करते हैं।  
उनके साथ ही सुश्री भूपिंदर कौर (अमृतसर) ने कहा कि ठाकुर दलीप सिंह जी उन लोगों को ज़बरदस्त सड़कों पर लंगर खिलाने के हक में नहीं जो पहले ही पेट भर कर खाये होते हैं। हमें यह सारा लंगर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचना होगा। इस मकसद के लिए अन्य लोगों को भी प्रोत्साहित करना होगा। 
संकट का सामना करने के इस दिव्य अवसर पर सुश्री कुलदीप कौर (पटियाला), साहिब सिंह (अमृतसर), रत्न सिंह, हज़रा सिंह (चंडीगढ़), हरदीप सिंह (हिमाचल प्रदेश), जसपाल सिंह, मनमोहन सिंह (कानपुर), जसवीर सिंह (सिरसा), मोहन सिंह झब्बर (करीवाला), सरबजीत कौर दिल्ली और गुरमीत सिंह सग्गू भी मौजूद रहे।
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Monday, March 09, 2020

फिर उठी माता चंद कौर के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग

9th March 2020 at 4:58 PM
नामधारी महिलाओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर उठाया मुद्दा 
लुधियाना: 9 मार्च 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
नामधारियों के पाठ करने का तौर तरीका और लाइफ स्टाईल बहुत से लोगों को प्रभावित करता है। प्रभावित हुए लोगों में पुरुष भी होते हैं और महिलाएं भी। प्रभावित हुए ऐसे लोगों का वर्ग रहता तो अपने अपने धर्म और वर्ग में ही है लेकिन किसी न किसी तरह नामधारी समुदाय के नज़दीक सा अवश्य हो जाता है।  इस तरह किसी न किसी तरह नामधारी समुदाय के कामों से जुड़ी महिलाओं ने इस बार अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर नया मोर्चा खोला है। 
इन महिलाओं ने माता चंद कौर के हत्यारों की गिरफ्तारी का मुद्दा फिर से उठाया है। ये लोग यह महिलाएं नामधारियों के दोनों-तीनों धड़ों से इस बात को लेकर नाराज़ भी हैं कि माता चंद कौर के हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं किया जाता? इन्हीं महिलाओं के संगठन महिला सेवा वेलफेयर सोसायटी ने कहा है कि इतनी बड़ी शख्सियत के हत्यारे अगर इतने लम्बे समय तक गिरफ्तार नहीं होते तो ऐसे महिला दिवस मनाने की कोई तुक ही नहीं बनती। इस संगठन की अध्यक्षा कुलदीप कौर और महासचिव बीमा सेन के नेतृत्व हुई एक विशेष बैठक हुई जिसमें कई आरोप भी लगाए गए और सवाल भी उठाये गए। इन महिलाओं का कहना है कि महिलाओं के ले कर भारत की स्थिति साड़ी दुनिया से अलग है। हमारे लिए हमारी माता वंदनीय होती है। हम उस समाज में रहते हैं जहां लोग देवी के 9 रूपों की पूजा भी करते हैं। ऐसे माहौल में गुरु मां की स्थिति तो सर्वोच्च बन जाती है। अगर हम गुरु मां के हत्यारों को ही गिरफ्तार नहीं करवा सकते तो लानत है हम पर। 
गौरतलब है कि चार अप्रैल-2016 की सुबह को श्री भैणी साहिब में हुई थी माता चंद कौर की हत्या। तब से लेकर अब तक बहुत सी जांच समितियां बनी लेकिन हत्यारे कानून के शिकंजे में नहीं आए। हत्यारों की गिरफ्तारी में हो रही देरी को लेकर रोष में आईं इन महिलाओं का कहना है की अगर गुरु माता ही सुरक्षित नहीं तो बाकी कौन सुरक्षित है? कल को हम में से किसी के साथ कुछ भी हो सकता है। 
इन महिलाओं ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी इसी आशय की अपील की है की इन हत्यारों को जल्द से जल्द पकड़ा जाये। इन का यह भी कहना है कि शायद पुलिस और प्रशासन पर किसी न  किसी तरह का दबाव है जिसके चलते वे हत्यारों को नहीं पकड़ रहे। 
मनप्रीत कौर, रणजीत कौर, बलविंदर कौर, गुरप्रीत कौर, हरप्रीत कौर, नरिंदर कौर और मंजीत कौर नाम की  इन महिलाओं ने कहा कि यदि गुरु मां के हत्यारों को ही नहीं पकड़ा जाता तो फिर महिला दिवस मनाना एक आडंबर जैसा ही है। यदि इतनी बड़ी शख्सियत की  हत्या का मामला यूँही फाईलों में बंद पड़ा रह गया तो फिर महिला दिवस तो कैलंडरों और कागज़ी कार्रवाई तक ही सीमित रह जायेगा। 

 इसके साथ ही इस संगठन ने अन्य महिला संगठनों से भी अपील की है कि वे सभी इस मुद्दे को लेकर आगे आएं तांकि इस मुद्दे पर इन्साफ हासिल किया जा सके। इस मुद्दे को लेकर अंतर्राष्ट्रीय महिला संगठनों और मानवाधिकार संगठनों से भी यह महिलाएं सम्पर्क कर रही हैं।  बहुत ही चेतावनी भरे ढंग में इनका कहना है कि हम हत्यारों की गिरफ्तारी तक चुप नहीं बैठने वाली। ज़रूरत पड़ी तो हम सड़कों पर निकलने से भी पीछे नहीं हटेंगी। 

Friday, February 28, 2020

हम माता चंद कौर के हत्यारों की ग्रिफ्तारी तक संघर्ष जारी रखेंगे

जांच को ठंडे बस्ते में डालने की साज़िश को कामयाब नहीं होने देंगें  
लुधियाना: 28 फरवरी 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
चार अप्रैल का दिन निकट आ रहा है। बस एक महीना और कुछ दिन ही बाकी हैं। इस एक महीने में नामधारी सम्प्रदाय हत्यारों की गरिफ्तारी को लेकर को बहुत बड़ा आंदोलन शुरू करने की तैयारी में है। यह आंदोलन क्या रूप लेगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन एक बात साफ़ है कि  इस मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के प्रयास तेज़ हो रहे हैं। ठाकुर दलीप सिंह के नेतृत्व वाला नामधारी सम्प्रदाय शांतिपूर्ण रहते हुए भी इस आंदोलन को पूरी तरह गरमाने की कोशिश में है। इसी मुद्दे को लेकर अलग अलग ज़िला मुख्यालयों पर बारी बारी से धरने प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। डिप्टी कमिश्नरों को इसी आश्य के ज्ञापन भी दिए जाते हैं लेकिन इस सब के बावजूद हत्यारों की गरिफ्तारी को लेकर कोई ठोस कदम उठता नज़र नहीं आ रहा। श्री भैणी साहिब की ऐतिहासिक गद्दी पर मौजूद ठाकुर उदय सिंह की अगुवाई वाला गट भी हत्यारों की गरिफ्तारी की मांग  है। उन्होंने भी अतीत में इस मांग को लेकर काफी बड़े प्रदर्शन किये हैं। लेकिन दोनों गुटों के प्रदर्शन एक दुसरे के खिलीफ़ शक्तिप्रदर्शन बन कर रह गए। हत्यारों की गरिफ्तारी अभी तक नहीं हो सकी। इस मुद्दे  गुटों की आपसी दूरियां भी बढ़ा दीं। इस समय अगर ठाकुर उदय सिंह की अगुवाई वाला गुट अगर कांग्रेस अगर  हरविंदर सिंह हंसपाल के ज़रिये कांग्रेस के नज़दीक समझा जाता है तो ठाकुर दलीप सिंह के नेतृत्व वाला गुट सीधे सीधे भारतीय जनता पार्टी के नज़दीक है। उनकी बात प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक है। इसके बावजूद माता चाँद कौर के हत्यारों को पकड़े जाने का मामला अभी तक खटाई में पड़ा हुआ है। इसे ले कर आम नामधारी संगत के मन में रोष है। वही आम नामधारी संगत जो श्री भैणी साहिब के साथ भावनात्मक तौर पर जुडी हुई है। आजकल ठाकुर दलीप सिंह के नेतृत्व वाले नामधारी सम्प्रदाय की जो संगत इस मुद्दे को लेकर रोष व्यक्त कर रही है उसने अलग अलग ज़िलों में रोष व्यक्त कर के प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजे हैं। रोष प्रदर्शनों का यह सिलसिला आने वाले दिनों में और तेज़ होने की संभावना है। 
गौरतलब है कि माता चाँद कौर की हत्या चार अप्रैल 2016 को हुई थी। उस दिन सोमवार का दिन था। हत्या के समय माता चंद कौर नामधारी मुख्यालय के पीछे बनी सतगुरु प्रताप सिंह अकादमी में बच्चों के नए सत्र की शुरुआत पर आयोजित पूजा में हिस्सा लेने अपनी बैरी ऑपरेटेड क्लब कार में गई थी। पूजा करने के बाद वह गोशाला की तरफ जाने के लिए अकादमी के गेट से बाहर निकली। बाहर काले रंग को बाइक पर खड़े दो केशधारी युवकों ने पहले उनको माथा टेका, फिर रिवाल्वर निकाल कर उन पर गोलियां दाग दीं। समझा कटा है वृद्ध शरीर होने के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी लेकिन इसकी घोषणा बाद में अस्पताल की पुष्टि के बाद ही की गई। अकादमी में मौजूद लोग माता चंद कौर को सतगुरु प्रताप सिंह अस्पताल लेकर गए। डॉक्टरों ने उनको बचाने का प्रयास किया, लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई।
इलाज और मेडिकल जांच का सारा काम लुधियाना के शेरपुर चौंक में स्थित सतगुरु प्रताप सिंह अस्पताल अस्पताल में हुआ। उस दिन नामधारी संगत निरंतर इसी अस्पताल में बानी रही और देहांत पुष्टि का एलान होते ही सभी बिलखने लगे। 
माता चंद कौर के सिर और दिल के नीचे दो गोलियां लगी, जबकि तीसरी उनके पास से निकल गई। इसी दौरान शोर मच गया और हत्यारे मौके से फरार हो गए। 
पुलिस कमिश्नर जतिंदर सिंह औलख ने मीडिया को बताया कि अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है। जांच के लिए कई टीमों का गठन भी किया गया। पुलिस ने इस मामले में कई बिंदुओं पर काम शुरू किया। सबूत इकट्ठा करने का काम भी हुआ। किसी भी तरह की रंजिश से भी सीपी ने इंकार नहीं किया था। लगता था माता चाँद कौर के अंतिम संस्कार से पहले ही हत्यारे पकड़ में आ जायेंगे लेकिन यह हत्या अभी तक रहस्य ही बनी हुई है। 
हरयारों की गरिफ्तारी को लेकर शुरू रोष प्रदर्शनों के इस सिलसिले की जानकारी देते हुए एक्शन कमेटी के प्रवक्ता गुरमेल सिंह बराड़ और अरविंदर सिंह लाडी ने कहा की यह बहुत ही सुनियोजित हत्या है इसलिए इसका सच सामने लाने की प्रक्रिया को तेज़ कराने के लिए हम  संघर्ष करेंगे। यह हत्या श्री भैणी साहिब के परिसर में हुई है। इसलिए श्री भैणी साहिब में मौजूद लोग इसके लिए जवाबदेह तो हैं ही। इस हत्या की जांच अब तक पंजाब पुलिस, पंजाब सरकार, विशेष जाँच दल और सीबीआई को सौंपी जा चुकी है। इसके बावजूद कोई नतीजा सामने नहीं आया। इन सभी एजंसियों को अभी तक सफलता क्यों नहीं मिली? उन्होंने इस मामले को लेकर कई गंभीर आरोप भी लगाए।  साथियों ने भी कहा कि अगर श्री भैणी साहिब में हुए इस नृशंस हत्याकांड से जुड़े लोगों से पुलसिया धनगतरीक़ों से ही पूछताछ की जाती तो बहुत पहले ही इस सरे मामले का सच सामने आ गया होता। मौजूदा तौरट्रीक इस  ठंडे बस्ते में डालने की ही साज़िश है। इस हत्याकांड की हकीकत को छुपाने में लगे लोगों का सोचना है की शायद इस तरह से धीरे धीरे नामधारी संगत का जोश भी ठंडा पड़ जायेगा लेकिन हम यह सब नहीं होने देंगें। हम न तो इस हत्या को खुद भूलेंगे और न ही किसी को भूलने देंगें। जब तक साडी सच्चाई सामने नहीं आती और असली हत्यारे सलाखों के पीछे नहीं पहुंचते तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।  चलाने के लिए यूं तो हर ज़िले में अलग अलग कमेटियां बनाई गयी हैं जिनके सदस्यों  लम्बी है लेकिन  जिन लोगों की हमें पुष्टि हो पाई उनमें से कुछ हैं-हरदीप सिंह (सरपंच), जगदेव सिंह (पंच), प्रेम सिंह (पंच), मलकीत सिंह, गुरनाम सिंह, राजिंदर सिंह ठेकेदार, जसविंदर सिंह, महिंद्र सिंह, अवतार सिंह, सिंह, गुरदेव सिंह, सुरिंदर सिंह, फौजी हरजीत सिंह, जसवीर सिंह (पायल), राजिंदर सिंह और सिंह इत्यादि। इन लोगों में गुप्त सहयोग करने वाले बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अंतर्मन से तो ठाकुर दलीप सिंह से जुड़े हुए हैं लेकिन श्री भैणी साहिब के दर्शनों को नियमित तौर पर करने के लिए ठाकुर उदय सिंह के नेतृत्व वाले नामधारी सम्प्रदाय में भी सक्रिय रहते हैं। 
अब देखना है कि नामधारी सियासत और माता चंद कौर के कत्ल की जांच क्या रुख लेते हैं। 

Saturday, December 22, 2018

इस तरह हुआ था नामधारी गुरुतागद्दी के सम्बन्ध में रहस्यमय खुलासा

Dec 21, 2018, 2:07 PM
21 दिसंबर: जब श्री जीवन नगर में कायम हुई थी त्याग की मिसाल 
21 दिसंबर 2012 को त्याग का अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जब श्री जीवन नगर, सिरसा में हजारों की संख्या में नामधारी संगत एकत्रित हुई पर माहौल शोकपूर्ण था क्योंकि मौका था सतगुरु जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि देने का, जिन्होंने 13 दिसंबर 2012 को देह रूपी चोले को त्यागा था। 
श्रद्धा सुमन अर्पित करने का यह आयोजन ठाकुर दलीप सिंह जी और उनकी संगत की तरफ से किया गया था क्यूंकि श्री भैणी साहिब में रहने वाले ठाकुर उदय सिंह, जगतार सिंह आदि ने सतगुरु जगजीत सिंह जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् भैणी साहिब पर कब्ज़ा करके पुलिस और प्राइवेट सेक्योरिटी लगवाकर पूरी तरह से प्रतिबंध लगवा दिया कि यहाँ संगत के आलावा चाहे कोई भी ऐरा-गैरा तो आ सकता है पर ठाकुर उदय सिंह के बड़े भ्राता ठाकुर दलीप और अपने सगे माता बेबे दलीप कौर को भैणी साहिब के अंदर आने की सख्त मनाही थी। यहाँ तक कि सतगुरु जी के अंतिम संस्कार के समय भी ठाकुर दलीप सिंह जी को अंदर आने की इजाजत नहीं मिली और अपनी मर्जी से अगले गुरु का चुनाव भी कर लिया गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए श्री जीवन नगर की संगत और सतगुरु जगजीत सिंह जी के बड़े सपुत्र श्री ठाकुर दलीप सिंह जी की तरफ से श्री जीवन नगर इलाके में श्रद्धांजलि समागम करना पड़ा। इस समागम ने इस बात को साबित कर दिया कि जहाँ ठाकुर दलीप सिंह जी त्याग की मूरत हैं वहीं ठाकुर उदय सिंह प्रॉपर्टी और गद्दी के अभिलाषी हैं। 
                       इस समागम में एकत्रित संगत बहुत वैरागमयी अवस्था में थी क्योंकि संगत को सतगुरु जगजीत सिंह जी का बिछड़ना बर्दाश्त नहीं हो रहा था। इस श्रद्धांजलि समागम में बहुत बड़ा खुलासा हुआ। यह खुलासा किया डॉक्टर इक़बाल सिंह जी ने जो सतगुरु जगजीत सिंह जी के निजी डॉक्टर रहे। वह  आयुर्वैदिक, फिजियोथेरेपी, एक्यूपंचर  आदि तरीकों से सतगुरु जी की सेवा करते थे। 
                     इस ऐतिहासिक आयोजन को सम्बोधन करते हुए डॉक्टर इक़बाल सिंह ने गुरुता गद्दी को लेकर एक बहुत बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 29 जनवरी 2012 को जब वह सतगुरु जगजीत सिंह जी के पास अकेले बैठे उनकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर रहे थे तो सतगुरु जी ने उनसे कहा कि मैंने तुम्हे एक बात बतानी है पर तुम मुझे वायदा करो कि यह बात किसी को पता न चले। तुमने अभी किसी से कुछ नहीं बताना। फिर किसी कपड़े में लपेटा हुआ समान मुझे थमाते हुए कहा कि जब मैं यह शरीर त्याग दूंगा तो यह अमानत बड़े बेटे दलीप सिंह जी को देनी है और सारी संगत  को यह बात बतानी है कि मेरे बाद दलीप सिंह जी को ही अपना गुरु मानें। डॉ साहिब ने वह अमानत संगत के सामने  खोल  के दिखाई।  इसमें कुछ वस्त्र के अलावा एक दस्तार, एक नारियल, पांच पैसे तांबे के व एक आसन था। डॉक्टर साहिब ने ठाकुर दलीप सिंह जी के चरणों में यह अमानत लेने की विनती की। उनके साथ सतगुरु जगजीत सिंह जी के निजी सेवक दीदार सिंह और पंथ के सिरमौर सूबा साहिबान भी खड़े थे। उन सभी ने भी विनती कि सतगुरु जी के हुक्म अनुसार अब आप जी ही पंथ की बागडोर सम्भालो और उन्हें दुविधा से बाहर निकालें। यह सारा दृश्य देख-सुन कर निराश हुई संगत को थोड़ी राहत मिली और सारा पंडाल जैकारों से गूंज उठा और कितनी देर गूंजता रहा। फिर एक आशा भरी नज़र से संगत ने जैसे ही ठाकुर दलीप सिंह जी की तरफ देखा तो सभी दंग रह गए। जब ठाकुर दलीप सिंह जी ने बड़ी ही शालीनता और विनम्रता से सतगुरु जी की भेजी हुई अमानत ले कर अपने मस्तक से लगाई फिर बहुत ही सम्मान से माता चंद कौर जी की तस्वीर के आगे रख दी। आप ने संगत को सम्बोधित करते हुए कहा कि एक तरफ मेरे छोटे भाई गद्दी पर बैठे हैं दूसरी तरफ मैं गद्दी को अपना कर पंथ को विभाजित नहीं करना चाहता। मैंने पंथ को जोड़ना है। तोड़ना नहीं है। इसके आलावा इस समय माता जी पंथ की सर्वोच्च हस्ती हैं। मैंने उनके आगे यह अमानत रख दी है और मैं चाहता हूँ कि जब तक हमारी आपसी एकता नहीं हो जाती तब तक आप सभी लोग माता जी को गुरु रूप में स्वीकार करें क्योंकि माता जी सभी के लिए सम्मानीय हैं और सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी भी हैं। इस पर संगत को हौंसला नहीं हो रहा था। संगत तो इस तरह तड़प रही थी जैसे पानी के बिना मछली। पर ठाकुर दलीप सिंह जी अपने वचन पर अटल रहे और त्याग का वह महान सबूत दिया जो बेमिसाल था और वह त्याग था केवल पंथ की एकता के लिए। 
                 इसके आलावा आपके द्धारा आज भी जो प्रयत्न किए जा रहे हैं उन्हें देखकर यही प्रतीत होता है कि वे इस महान पंथक-एकता के साथ-साथ आपसी एकता व् सौहार्द्य को बढ़ावा देने के लिए निरंतर यत्नशील हैं।                                                 रिपोर्ट:: प्रितपाल सिंह खालसा--7814545781 प्रेषक:राजपाल कौर

Wednesday, November 28, 2018

त्रिशूल और खण्डे को अन्याय के खिलाफ एकजुट करने का प्रयास

शिव मंदिर फिल्लौर में भी मनाया गया गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व 
28  नवंबर 2018 को प्राचीन शिव मंदिर नगर (फिलौर) से लौट कर पंजाब स्क्रीन टीम
बात केवल कोई पर्व मनाने की नहीं है। गुरुपर्व हो, रामनौमी हो, जन्माष्टमी हो, ईद हो या क्रिसमिस। इन त्योहारों को हम अपनी आस्था के मुताबिक घर में शायद ज़्यादा अच्छी तरह मना सकते हैं। शोर शराबे और भागदौड़ से कुछ समय के लिए दूर रह कर अपने गुरुओं, पीरों, पैगंबरों और अवतारों से जुड़ कर, उनके उपदेशों का मर्म समझ कर। कुछ देर के लिए ही सही उनके संघर्षों भरे जीवन का मनन करके। भगवान और उनके दूत दिखावा नहीं केवल प्रेम चाहते हैं। 
मीरा को ज़हर दिया जाना और मीरा का ज़हर पीना आज भी यही बताता है कि आस्था से प्रेम आसान नहीं होता। सिर  को हथेली पर लेकर आना पढ़ता है प्रेम की गली में। सलीब केवल ईसा को मिली ऐसा मत सोच लेना। आस्था और विश्वास पर टिकोगे तो आज भी सलीब पर चढ़ना पड़ सकता है। माता चंद कौर की दिन दिहाड़े हत्या यही दिखा रही है कि आज भी माहौल उसी तरह का बन गया है। आज भी ज़हर का प्याला,  गोली या सलीब ही है धर्म के मार्ग पर चलने का परिणाम। जो मौत  में भी  जीवन देख सके वही इस रास्ते पर आये। भयभीत और स्वार्थ या लालच से भरे लोगों का इस रह पर आना सभव ही नहीं। 
गुरुओं, पीरों, पैगंबरों और अवतारों की मानोगे तो सत्य की राह पर चलना पड़ेगा। सत्य की राह पर चलना हो तो अपने सिर को हथेली पर रखने को तैयार रहना। आसान नहीं होगा इस राह पर चलना। असत्य और अन्याय की तरफ धनवान और बाहुबली होंगें और सत्य की तरफ केवल संघर्ष और प्रेम होगा। चुनाव आप ने ही करना है लेकिन ध्यान से करना। कंस की तरफ खड़े होना है या कृष्ण की तरफ। बाबर की तरफ या नानक की तरफ। 
अपने अपने समय में सभी गुरुओं और अवतारों ने अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की। गलत को गलत कहा। शोषण का विरोध किया। इसके साथ ही एकता का संदेश भी दिया लेकिन सिर को हथेली पर रख कर ही दिया। इस एकता ने ही बड़े बड़े तख्तनशीनों को उखाड़ फेंका। गुंडागर्दी उस समय भी थी। बाहुबलियों का दुरपयोग उस समय भी होता था। 
इस सारी जंग में उनकी कुर्बानियों को चमत्कारों का नाम दे कर छोटा मत करो। उनको मानना है तो उनके बताये मार्ग पर चलो। आज भी खतरे उसी तरह मौजूद हैं। फैसला आपके हाथ में है। सत्य की तरफ आना है या झूठ की तरफ जाना है। कोई मजबूरी भी नहीं है। अंतरात्मा की आवाज़ सुननी है या इसको अनसुना करना है। इसका फैसला आपके हाथ में है। 
आज यहाँ प्राचीन मदिर में जो लोग एकत्र हुए हैं वे अपनी मर्ज़ी से अपने कामकाज छोड़ कर आए हैं। इनको समझ में आ चुका है कि बाहुबलियों के शोषण को समाप्त करना है तो एकता करनी होगी। एकता में प्रताप है-पंथ तोड़ना पाप है। मंदिर में गूंज रहे गुरु नानक देव जी के जैकारे और शब्द गुरुनानक देव जी के जीवन का संघर्ष याद दिला रहे हैं। 
यहां ठाकुर दलीप सिंह जी की प्रेरणा से मंदिर कमेटी ने श्री गुरुनानक देव जी का प्रकाश पर्व मनाने का आयोजन किया है। करीब एक हज़ार वर्ष पुराने इस मंदिर में भजन भी गाए जा रहे हैं और शब्द भी। मंदिर में लगा नामधारी प्रमुख ठाकुर दलीप सिंह का बैनर बता रहा है कि इस मंदिर में भी गुरु पर्व मनाने का संदेश लागू हो चुका है। मंदिर के एक सेवादार अमरजीत सिंह बताते हैं कि वैसे तो वह यहाँ हर  करने आते हैं लेकिन आज उनको यहाँ आ कर बहुत प्रसन्नता हुई है।  इसी तरह  मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहाँ इस तरह का आयोजन किसी चमत्कार से कम नहीं है। मंदिर की सेवा में आई मंदिर कमेटी महिलाओं में भी उत्साह है। 
यहाँ पर हिन्दुओं और सिखों का उत्साह बता रहा है कि अब वही पहले जैसी एकता फिर से हो कर रहेगी। एकता तोड़ने वाले तत्वों को फिर मुँह की खानी पड़ेगी। इस अवसर पर नामधारी संगत भी मौजूद थी और मंदिर में आने वाली हिन्दू संगत भी। सभी ने श्री गुरु नानक देव जी की तस्वीर के सामने बहुत ही श्रद्धा से माथा टेका और शब्द गायन में हिस्सा लिया। 
इस मंदिर में आई हुई संगत को देख कर लगता था जैसे मंदिरों में गुरु पर्व मनाने की बाढ़ सी आई हुई है। एकता की एक ऐसी आंधी जो फुट डालने अले तत्वों को अपने साथ ही उड़ा ले जाएगी। 

Saturday, July 07, 2018

भावी पीढ़ी को सही दिशा-निर्देश देने के लिए गुरमत सम्मेलन

Jul 7, 2018, 5:32 PM
आयोजन का मकसद अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा 
जालंधर: 7 जुलाई 2018: (राजपाल कौर//पंजाब स्क्रीन)::
हमारा समाज और देश तभी तरक्की की राह पर आगे बढ़ सकते हैं ,जब हमारी भावी पीढ़ी अच्छे आदर्श ,संस्कार और गुरमत विचारों को अपने जीवन मेँ धारण करे। नामधारी गुरु ,सतगुरु जगजीत सिंह जी ने 1963 ईस्वी में बच्चों के सर्वोतोन्मुखी विकास के लिए गुरमत विद्यक सम्मेलन का आयोजन करवाया था जो कि वर्तमान समय में सतगुरु दलीप सिंह जी के सुयोग्य नेतृत्व में निरन्तर चल रहा है। यह विशेष रूप से गर्मियों की छुटियों में करवाया जाता है। इस गुरमत विद्यक सम्मेलन का सिलेबस गुरमत विद्यक सिद्धान्तों तथा अच्छे संस्कारों के मुताबिक निर्धारित किया जाता है। फिर देश-विदेश में अलग-अलग स्थानों पर इसका आयोजन करवा कर बच्चों के बीच अनेक प्रकार की प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं। जैसे कि नाम-सिमरन प्रतियोगिता ,भाषण ,कविता प्रतियोगता ,अरदास ,गुरबाणी-कंठ प्रतियोगता ,दस्तार प्रतियोगता ,सिक्ख इतिहास से संबन्धित प्रश्न-उत्तर प्रतियोगता ,सवाल-जवाब प्रतियोगता इसके अलावा चित्रकारी ,खेल ,पौष्टिक आहार बनाने तथा संगीत प्रतियोगता आदि उनको अलग-अलग ग्रुपों में बांटकर करवाई जाती हैं। इस तरह अलग-अलग प्रकार से मुकाबले करवाए जाते हैं ताकि बच्चों का अच्छी बातें सीखने के साथ-साथ थोड़ा मनोरंजन भी हो जाये,इसके साथ ही सिखलाई कैम्प भी लगाए जाते हैं।इस समागम का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सिक्ख धर्म की परम्पराओं के साथ जोड़कर ,अपनी महान विरासत से ज्ञात करवाना है। इसके अलावा उनमें अच्छे संस्कार ,समाज-सेवा तथा देशभक्ति जैसे जज्बे पैदा करने के लिए सिखलाई कैम्प भी लगाए जाते हैं।सम्मेलन में भाग लेने वाले विद्यार्थी की उम्र 4-5 साल से लेकर 24-25 साल तक होती है।विजेता शिक्षार्थियों को उनका हौंसला बढ़ाने के लिए इनाम भी दिए जाते हैं ,इसके इलावा इस सम्मेलन भाग लेने वाले प्रत्येक शिक्षार्थी को कुछ इनाम अवश्य ही दिया जाता है ताकि कोई बच्चा निराश न हो। इस साल 2018 के गुरमत विद्यक सम्मेलन देश के अलग-अलग स्थानों जैसे कि जालंधर के कई इलाकों के अलावा, श्री जीवन नगर(हरियाणा),चंडीगढ़ ,बीड भमारसी (पटियाला),मंडी (हिमाँचल-प्रदेश),अमृतसर ,दिल्ली ,दसूहा ,लुधियाना आदि कई स्थानों पर आयोजित किया गया,जो कि 10 जून से लेकर 5 जुलाई तक चलता रहा। यह आयोजन श्री सतगुरु दलीप सिंह जी तथा माता गुरमीत कौर जी की कृपा और निर्देशानुसार,विश्व-नौजवान नामधारी विद्यक जत्थे के प्रधान तथा जालंधर विद्यक सोसाइटी के चेयरमैन पलविंदर सिंह की अगवाई तथा उनकी टीम के सहयोग से सम्पन्न हुआ।इसमें मुख्य रूप से मास्टर सुखविंदर सिंह जी ,प्रिंसिपल हरमनप्रीत सिंह जी ,मुख्त्यार सिंह जी ,सुखदेव सिंह जी ,सुखराज सिंह जी ,गुरमुख सिंह जी ,सूबा अमरीक सिंह जी ,रत्न सिंह जी (प्रधान यूथ अकाली दल मोहाली),सरबजीत सिंह भिंडर ,प्रधान हजारा सिंह जी ,प्रधान अरविंदर सिंह जी ,जसवीर सैनी जी ,हरदीप सिंह राजा ,प्रधान गुरमेल सिंह बराड़,जसवंत सिंह सोनू ,सुरैन सिंह जी ,बूटा सिंह जी ,निर्मल सिंह वां,लाल सिंह जी और अध्यापिका भगवंत  कौर जी ,अध्यापिका रुपिन्दर कौर जी,परमजीत कौर ,सतनाम कौर ,सिमरजीत कौर ,हरविंदर कौर बीड़,रमनदीप कौर ,दर्शन कौर जी ,संदीप कौर जी तथा मुख्याध्यापिका राजपाल कौर आदि शामिल थे।

Sunday, August 20, 2017

हिन्दू और सिख सगे भाईयों की तरह हैं-ठाकुर दलीप सिंह

Sun, Aug 20, 2017 at 6:35 PM
नामधारी समाज ने मनाया धूमधाम से जन्माष्टमी का त्यौहार 
नई दिल्ली: 20 अगस्त 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
जब बहुत से लोग अपने अपने स्वार्थ और अज्ञान के कारण समाज को तोड़ने और फुट डालने में लगे हुए हैं उस समय ठाकुर दलीप सिंह ने दिली के पंजाबी बाग़ इलाके में विशाल स्तर पर जन्माष्टमी मनाने का हौंसला दिखाया। लोगों के आरोपों की बौछारों को अपने ऊपर झेल कर मुस्कराते हुए ठाकुर दलीप सिंह ने स्पष्ट किया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में श्री कृष्ण को द्वापर युग का अवतार कहा गया है और  श्री गुरु नानक देव जी को कलियुग का अवतार बताय गया है। इस लिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब को के ज्ञान की रौशनी में इस नज़दीकी को समाज के सभी वर्गों तक लेजाना आवश्यक था। जो लोग इसे ठीक नहीं मानते उन्हें श्री गुरु ग्रंथ साहिब को बहुत ही ध्यान और श्रद्धा से पढ़ना चाहिए। इस अवसर पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी विशेष तौर पर समय निकाल कर आये। 
जन्माष्टमी आयोजन के इस शुभ अवसर पर ठाकुर दलीप सिंह ने उन लोगों को भी आड़े हाथों लिया जो किसी न किसी हीं भावना से ग्रस्त होने के कारण भारत को नीचे दिखाने वाली बातें करते हैं। ठाकुर दलीप सिंह ने बताया कि किस तरह अमेरिका जैसा विकसित देश भारत जैसे विकासशील देश के सामने बहुत से मामलों में बहुत पीछे है। उन्होंने आंकड़े दे कर अमेरिका में जुर्मों और कैदियों का विवरण भी संगत को बताया। 
उन्होंने कहा कि अपना देश हम सब का है। इसका विकास करने के लिए आप जो भी कर सकते हैं करें। यह हमारा धर्म भी बनता है और नैतिक कर्तव्य भी। देश की आज़ादी के लिए अनगिनत लोगों ने कुर्बानियां दी हैं। देश की निंदा करके उनकी कुर्बानियों को गाली मत दो। अपने ही मुख से अपने ही देश की निंदा किसी भी तरह उचित नहीं। 
इस अवसर पर आर एस एस, राष्ट्री सिख संगत और विश्व हिन्दू परिषद के प्रतिनिधियों ने भी इस आयोजन में भाग लिया। ठाकुर दलीप सिंह जी ने कहा कि हिन्दू और सिख सगे भाईयों की तरह हैं। इनको हमेशां मिल जल कर रहना चाहिए बहुत ही प्रेम और सम्मानके साथ। जो इस भावना को ठेस पहुंचते हैं वे दोनों के ही दुश्मन हैं। उन्होंने नारा भी दिया-- भाईयो-जुड़ोगे तो बढ़ोगे--लड़ोगे तो घटोगे। 

Friday, May 19, 2017

""ठाकुर दलीप सिंह जी की कृपा से ठीक हो गया दिल का सुराख"

Fri, May 19, 2017 at 10:33 AM
जालंधर की प्रिंसिपल राजपाल कौर ने किया सभी सबूत पास होने का दावा 
बच्ची प्रेम कौर और उसके माता पिता करणबीर सिंह और राजिंदर कौर 
जालंधर: 19 मई 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
आजकल नवजन्मे या छोटे बच्चों के दिल में सुराख होने की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसा ही कुछ हुआ जम्मू के एक नामधारी परिवार के साथ। इस परिवार की बच्ची के दिल में भी सुराख था। जालंधर की प्रिंसिपल राजपाल कौर ने दावा किया है कि यह सुराख ठाकुर दलीप सिंह जी की कृप से बिना किसी इलाज के ठीक हो गया है। उनकी भेजी रिपोर्ट हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। इस रिपोर्ट पर आपके विचारों की भी इंतज़ार रहेगी।-सम्पादक 
राजपाल कौर की रिपोर्ट:::
सतगुरु शब्द सत्य और गुरु के सुमेल से बना है। जो अज्ञान के अन्धेरे से ज्ञान के प्रकाश की तरफ ले चले तथा जो शिष्यों को सच की राह दिखाये उसे सतगुरु कहते हैं। गुरबाणी में भी लिखा है "सति पुरखु जिनि जानिआ सतगुरु तिस का नाउ" तथा "सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा, तिस दा बुरा किउ होई"---क्योंकि ऐसे सतगुरु रूप संसार में सभी का कल्याण करने के लिए तथा सदमार्ग दिखाने के लिए ही आते हैं और जो सच्चे मन से सतगुरु जी के चरणों से जुड़ जाता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।                       
सतगुरु की कृपा से असम्भव काम भी हो जाते हैं सम्भव 
इस बच्ची के दिल में था सुराख 
वर्तमान समय में नामधारी प्रमुख सतगुरु दलीप सिंह जी, जो विनम्रता तथा त्याग की मूरत हैं, अपने अलौकिक रूप से सबका मन मोह लेते हैं तथा शरण आये हुए पर अपनी कृपा - मेहर करते हैं। ऐसे अनेक अलौकिक कृपाओं को मैने देखा-सुना भी है तथा अनुभव भी किया है, उनमें से केवल एक का ही जिक्र करने जा रही हूँ, जो वाकई सभी को अचंभित कर देने वाली है कि ऐसे कलयुग के समय में भी सतगुरु की कृपा से तथा नाम जपने से असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। जम्मू के कृष्णानगर में रहने वाले कुलदीप सिंह जी ने मुझसे मुलाकात होने पर अपनी आपबीती वार्ता के बारे में बताया ,उनके साथ उनका परिवार; उनकी पत्नी सुखविंदर कौर, बेटा करणबीर सिंह, बहु रजिन्दर कौर तथा उनकी पोती प्रेम कौर भी थे। उन्होंने बताया की जब उनकी पोती प्रेम कौर जब केवल दो महीने की ही थी तो वह बहुत बीमार रहती थी, उन्होंने उसे जम्मू के डॉक्टर सी.डी.गुप्ता से चेक करवाया तो उन्होंने बताया की आपकी पोती के दिल में सुराख़ है और इसका अभी कोई इलाज नहीं हो सकता ,जब आपकी बच्ची पाँच साल की हो जाएगी तो एक नई तकनीक द्वारा, जिसमें पैर का मांस काट कर वहां लगा कर ऑपरेट किया जा सकता है या फिर धीरे-धीरे बड़े होने पर भर सकता है। सारे परिवार वाले बहुत निराश हुए और सोच में पड़ गए कि अब क्या किया जाये क्योंकि वो मासूम बच्ची दिल में सुराख़ होने की वजह से उसे बुखार भी अक्सर हो जाया करता था तथा उसके शरीर का उचित विकास भी नहीं हो रहा था।लेकिन निराशा और दुःख में तो केवल परमात्मा ही पुकार सुन सकते है उनकी भी पुकार सुनी गई और उन्हें अपने आराध्य गुरु, सतगुरु दलीप सिंह जी के दर्शन करने का मौका मिला, उन्होंने दर्शन करके सतगुरु जी के चरणों में विनती करके अपनी पोती की हालत के बारे में बताया। सतगुरु जी ने बड़े ध्यान से सारी बात सुनी, फिर बचन किया कि बच्ची की माता उसे अपनी गोद में लेकर पांच मिनट प्रतिदिन नाम सिमरन करे और ऐसा लगातार चालीस दिन तक करे, वे सत्यवचन कहकर, सतगुरु जी को नमस्कार कर घर आ गए और उनकी बहु ने बताया की ऐसा उसने लगातार करना शुरू कर दिया और चालीस दिन के बाद बच्ची की हालत में सुधार आना शुरू हो गया और उसका  ग्रोथ (विकास) होना भी शुरू हो गया, बुखार आना भी धीरे-धीरे बंद हो गया। उसके बाद वे थोड़ा निश्चिंत हो गए और दुबारा टैस्ट कराने भी नहीं गए क्योंकि उन्हें अपने गुरु पर पूरा भरोसा था फिर भी उन्होंने सभी की तसल्ली करवाने के लिए लगभग दो साल बाद बच्ची का टैस्ट करवाने के लिए उसी डॉक्टर के पास दुबारा  गए तथा जब डॉक्टर ने टैस्ट कर लिए तो वे हैरान हो गए कि बच्ची बिल्कुल ठीक थी ,उसके दिल में कोई सुराख़ नहीं था। डॉक्टर के पूछने पर कि आपने कोई इलाज करवाया था, बच्ची नॉर्मल कैसे हो गई तो कुलदीप सिंह जी ने उन्हें सारी बात बताई कि कैसे सतगुरु जी की आज्ञा से, नाम जपने से उनकी बच्ची ठीक हो गई। गुरबाणी में भी लिखा है" सरब रोग का अउखदु नामु" पर जो इसे श्रद्धा से मानता है वही इसका लाभ प्राप्त कर सकता है, सतगुरु जी के बचनों को जीवन में श्रद्धापूर्वक अपनाकर ही खुशियाँ प्राप्त की जा सकती है। डॉक्टर ने उन्हें रिपोर्ट भी दिखाई और वे ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस आ गए। उन्होंने मुझे भी दोनों रिपोर्टे दिखाई पहली वाली और बाद वाली भी। मैं भी उनके बचन सुनकर धन्य हो गई। मेरे मुँह से केवल यही शब्द निकले ;धन्य सतगुरु जी और धन्य हैं उनके सिक्ख! जो श्रद्धा से उनके बताये मार्ग पर चलकर उनके कृपा-पात्र बन जाते हैं। जम्मू में रहने वाले कुलदीप सिंह जी ने मुझसे मुलाकात होने पर अपनी आपबीती वार्ता के बारे में बताया, उनके साथ उनका परिवार; उनकी पत्नी सुखविंदर कौर, बेटा करणबीर सिंह, बहु रजिन्दर कौर तथा उनकी पोती प्रेम कौर भी थे। उन्होंने बताया की जब उनकी पोती प्रेम कौर जब केवल दो महीने की ही थी तो वह बहुत बीमार रहती थी, उन्होंने उसे जम्मू के डॉक्टर सी.डी.गुप्ता से चेक करवाया तो उन्होंने बताया की आपकी पोती के दिल में सुराख़ है और इसका अभी कोई इलाज नहीं हो सकता, जब आपकी बच्ची पाँच साल की हो जाएगी तो एक नई तकनीक द्वारा, जिसमें पैर का मांस काट कर वहां लगा कर ऑपरेट किया जा सकता है या फिर धीरे-धीरे बड़े होने पर भर सकता है। सारे परिवार वाले बहुत निराश हुए और सोच में पड़ गए कि अब क्या किया जाये क्योंकि वो मासूम बच्ची दिल में सुराख़ होने की वजह से उसे बुखार भी अक्सर हो जाया करता था तथा उसके शरीर का उचित विकास भी नहीं हो रहा था।लेकिन निराशा और दुःख में तो केवल परमात्मा ही पुकार सुन सकते है उनकी भी पुकार सुनी गई और उन्हें अपने आराध्य गुरु, सतगुरु दलीप सिंह जी के दर्शन करने का मौका मिला, उन्होंने दर्शन करके सतगुरु जी के चरणों में विनती करके अपनी पोती की हालत के बारे में बताया। सतगुरु जी ने बड़े ध्यान से सारी बात सुनी, फिर बचन किया कि बच्ची की माता उसे अपनी गोद में लेकर पांच मिनट प्रतिदिन नाम सिमरन करे और ऐसा लगातार चालीस दिन तक करे, वे सत्यवचन कहकर, सतगुरु जी को नमस्कार कर घर आ गए और उनकी बहु ने बताया की ऐसा उसने लगातार करना शुरू कर दिया और चालीस दिन के बाद बच्ची की हालत में सुधार आना शुरू हो गया और उसका  ग्रोथ (विकास ) होना भी शुरू हो गया ,बुखार आना भी धीरे-धीरे बंद हो गया। उसके बाद वे थोड़ा निश्चिंत हो गए और दुबारा टैस्ट कराने भी नहीं गए क्योंकि उन्हें अपने गुरु पर पूरा भरोसा था फिर भी उन्होंने सभी की तसल्ली करवाने के लिए लगभग दो साल बाद बच्ची का टैस्ट करवाने के लिए उसी डॉक्टर के पास दुबारा  गए तथा जब डॉक्टर ने टैस्ट कर लिए तो वे हैरान हो गए कि बच्ची बिल्कुल ठीक थी, उसके दिल में कोई सुराख़ नहीं था। डॉक्टर के पूछने पर कि आपने कोई इलाज करवाया था , बच्ची नॉर्मल कैसे हो गई तो कुलदीप सिंह जी ने उन्हें सारी बात बताई कि कैसे सतगुरु जी की आज्ञा से, नाम जपने से उनकी बच्ची ठीक हो गई। गुरबाणी में भी लिखा है"सरब रोग का अउखदु नामु " पर जो इसे श्रद्धा से मानता है वही इसका लाभ प्राप्त कर सकता है, सतगुरु जी के बचनों को जीवन में श्रद्धापूर्वक अपनाकर ही खुशियाँ प्राप्त की जा सकती है। डॉक्टर ने उन्हें रिपोर्ट भी दिखाई और वे ख़ुशी-ख़ुशी घर वापिस आ गए। उन्होंने मुझे भी दोनों रिपोर्टे दिखाई पहली वाली और बाद वाली भी। मैं भी उनके बचन सुनकर धन्य हो गई। मेरे मुँह से केवल यही शब्द निकले ;धन्य सतगुरु जी और धन्य हैं उनके सिक्ख! जो श्रद्धा से उनके बताये मार्ग पर चलकर उनके कृपा-पात्र बन जाते हैं। 

Monday, January 09, 2017

तेजिंदर सिंह नामधारी को विहिप का धर्म प्रसार अध्यक्ष बनाया

Date: 2017-01-09 17:37 GMT+05:30
विश्व हिन्दू परिषद चंडीगढ़ ने किया संगठन विस्तार
लुधियाना: 9 जनवरी 2017: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): 
आज चंडीगढ़ में एक अजब नज़ारा था। विश्व हिन्दू परिषद के सदस्यों के गले में नामधारी सम्प्रदाय की माला थी और नामधारी सिंह को वी एच  पी का धर्म प्रसार अध्यक्ष बनाया गया था। इंसान को इंसान से लड़ाने वालों की साज़िशों को नाकाम करता हुआ यह आयोजन मानव एकता का एक नया इतिहास लिख रहा था। 
आज शिव मानस मंदिर इंडस्ट्रियल एरिया फेज-2 में विश्व हिन्दू परिषद चंडीगढ़ की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता विहिप पंजाब प्रांत के उपाध्यक्ष कर्नल धर्मवीर ने की।
बैठक में नामधारी संप्रदाय के भी अनेक लोगो ने भाग लिया। बैठक में हिन्दू सिख एकता तथा
संगठन के द्वारा चलाये जा रहे सेवा कार्यो पर चर्चा की गयी।
संगठन विस्तार के क्रम में तेजिंदर सिंह नामधारी को विश्व हिन्दू परिषद का धर्म प्रसार अध्यक्ष, गिरिवर जी को धर्माचार्य अध्यक्ष, अनुज सहगल को गौ रक्षा अध्यक्ष तथा प्रगट सिंह व संदीप सिंह को प्रखण्ड अध्यक्ष का दायित्व दिया गया।
बैठक में मुख रूप से सुरेश राणा, गिरीश कालड़ा, नरेश अरोड़ा, डॉ हरवंत सिंह, दविंदर सिद्धू, द्विजेंद्र डोगरा, राकेश चौधरी, मंगेश कुमार, सुमित शर्मा,जयशंकर जोशी, हरविंदर सिंह, हरभान सिंह, मरियाँ सिंह तथा तरण सिंह उपस्थित थे। 

Saturday, December 17, 2016

ठाकुर दलीप सिंह ने दी नया साल वैसाखी पर मनाने की काल

भारतीय जनमानस को एकता के सूत्र में लाने का एक और प्रयास 
लुधियाना: 17 दिसम्बर 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):
नामधारियों और सिक्खों के साथ साथ समुचित भारतीय जनमानस को एकजुट करके एकता के सूत्र में पिरौने में लगे नामधारी प्रमुख ठाकुर दलीप  ने अब नव वर्ष के अवसर पर कहा है कि भारतीय लोगों को वर्ष वैसाखी के दिन मनाना चाहिए। यह बात उन्होंने एक अनौपचारिक वार्ता में कही। 
नव वर्ष केवल कैलेंडर पर होने वाली समय की बदली नहीं होती। इसका सम्बन्ध मौसमों के साथ साथ पर्यावरण और मानवीय शरीर की आंतरिक सरंचना  होता है।  नारियल पानी पीने को दिल करता है और कब मूंगफली की इच्छा है-यह एक गहन विज्ञानं है। किसी समय इसकी समझ पूरे समाज को हुआ थी। धीरे धीरे जब पैसे  दुरपयोग बढ़ा तो बहुत से दिन--बहुत सी रातें शराब के जश्न में डूबने लगीं। नव वर्ष का अवसर अर्थात 31 दिसम्बर और जनवरी के दरम्यान की रात शराब और शबाब के ऐसे बेहूदा अंदाज़ का पर्याय बन गई कि इस अवसर पर पीना पिलाना  आवश्यक कृत्य गिना जाने लगा। यह अभिशाप पूरे समाज को स्वीकृत होता चला गया। आज भी नव वर्ष एक उत्सव की तरह पूरे विश्व में अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तिथियों तथा विधियों से मनाया जाता है। विभिन्न सम्प्रदायों के नव वर्ष समारोह भिन्न-भिन्न होते हैं और इसके महत्त्व की भी विभिन्न संस्कृतियों में परस्पर भिन्नता है। धर्मकर्म और संस्कृति से जुड़े कुछ लोग आज भी अपने अपने  समाज के मुताबिक समय की इस चाल को अपनाते हैं। लेकिन पूर्व की बहुसंख्य पाश्चात्य प्रभाव के रंग ढंग में डूबती चली गई। अब हालत इतनी बदतर है कि तकरीबन हर जगह पर 31 दिसम्बर की रात को पुलिस सुरक्षा का प्रबन्ध पड़ता है। 

नशे की मदहोशी और गुंडागर्दी का आभास देते हो हल्ले के आतंक में होती है नए साल की शुरुआत। इसका इतिहास देखें तो नव वर्ष उत्सव 4000 वर्ष पहले से बेबीलोन में मनाया जाता था। लेकिन उस समय नए वर्ष का ये त्यौहार 21 मार्च को मनाया जाता था जो कि वसंत के आगमन की तिथि भी मानी जाती थी। प्राचीन रोम में भी नव वर्षोत्सव के लिए चुनी गई थी। रोम के तानाशाह जूलियस सीजर ने ईसा पूर्व 45वें वर्ष में जब जूलियन कैलेंडर की स्थापना की, उस समय विश्व में पहली बार 1 जनवरी को नए वर्ष का उत्सव मनाया गया। ऐसा करने के लिए जूलियस सीजर को पिछला वर्ष, यानि, ईसापूर्व 46 इस्वी को 445 दिनों का करना पड़ा था। 
हिब्रू मान्यताओं के अनुसार भगवान द्वारा विश्व को बनाने में सात दिन लगे थे। इस सात दिन के संधान के बाद नया वर्ष मनाया जाता है। यह दिन ग्रेगरी के कैलेंडर के मुताबिक 5 सितम्बर से 5 अक्टूबर के बीच आता है।
हिन्दुओं का नया साल चैत्र नव रात्रि के प्रथम दिन यनि गुदी पर हर साल चीनी कैलेंडर के अनुसार प्रथम मास का प्रथम चन्द्र दिवस नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह प्रायः 21 जनवरी से 21 फ़रवरी के बीच पड़ता है।
भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है। पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से 13 अप्रैल को मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिळ नव वर्ष भी आता है। तेलगु नया साल मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नया साल विशु 13 या 14 अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल 15 जनवरी को नए साल के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह 19 मार्च को होता है। महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है, कन्नड नया वर्ष उगाडी कर्नाटक के लोग चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं, सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगाड़ी और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है जो अक्टूबर या नवंबर में आती है। बंगाली नया साल पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को आता हैपश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नया साल होता है।
जीवन नगर से संचालित बहुसंख्यक नामधारी संगठन के सतिगुरु ठाकुर दलीप सिंह ने इस अंदाज़ को बदलने का आहवान किया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय लोगों को भारतीय संस्कृति भारतीय धर्म कर्म, भारतीय परिवेश और भारतीय अंदाज़ में नया साल मनाना  वो तारीख  आती है वैसाखी के पर्व पर। इस लिए नए साल को उसी अवसर पर मनाया जाना चाहिए।  

Sunday, October 02, 2016

जप-प्रयोग का आँखों देखा दृश्य-प्रिंसिपल राजपाल कौर (जालंधर)


अमन ,शांति व एकता के लिए चल रहा वार्षिक नामधारी कार्यक्रम  
चालीस दिनों का सालाना जप-प्रयोग (नाम-सिमरन)जो की नामधारी सम्प्रदा के सदगुरु, सदगुरु प्रताप सिंह जी द्वारा 1920 ईस्वी में एक भादो से लेकर अश्विन मास तक देश में अमन ,शांति और सर्वत्र के भले के लिए शुरू किया गया था। उसके बाद निरन्तर यह नियम चलता रहा वर्तमान समय में भी एकता और विनम्रता के पुंज श्री सतगुरु दलीप सिंह जी द्वारा इसे सार्थक रूप देते हुए इस साल 2016 में भी चालीस दिनों का जप-प्रयोग शुरू किया गया है।यह जप प्रयोग नामधारियों के दूसरे प्रमुख तीर्थ स्थान श्री जीवन नगर (हरियाणा) में 20 भादों 2073  से 29 आश्विन 2073 मुताबिक 4 सितम्बर 2016 से 14 अक्टूबर 2016 तक चलेगा। इसमें सुबह से शाम तक लगभग 8 घण्टे नाम -सिमरन,कथा -कीर्तन आदि का प्रवाह चलता रहता है। इस समय दौरान सिक्ख अमृत वेले अर्थात ब्रह्ममुहूर्त में लगभग 2 बजे जाग कर सतगुरु जी के अनमोल खजाने का तो आनंद प्राप्त करता ही है ,साथ ही साथ सात्विक आहार और सादे पहरावे को अपनाते हुए, नाम सिमरन और सेवा करते हुए सारा दिन सतगुरु के रंग में ही रंगा रहता है और अपने आपको ज्यादा स्वस्थ महसूस करता है। विशेष बात यह है कि यहाँ संगत की सेहत को भी ध्यान में रखते हुए सुबह के नाम सिमरन के बाद योगा भी करवाई जाती है,फिर गिलोय की शरदाई छकाई जाती है, उसके उपरान्त देसी घी से तैयार अमृतमयी लंगर भी छकाया जाता है। 
            मुझे पहले दिन 4 सितम्बर 2016 ,दिन रविवार को जप-प्रयोग की आरम्भता में शामिल होने का मौका मिला। इस बार, हर बार से कुछ भिन्न ,अदभुत ही नज़ारा देखने को मिला,जिस का आँखों देखा विवरण इस तरह है--सुचना मुताबिक कि इस बार प्रयोग बीर -मंदिर की जगह ,श्री सतगुरु प्रताप सिंह सरोवर पर है। हम वहां पहुँच गए। सुबह का तीन बजे का समय था। चारो तरफ कुदरती नज़ारों के साथ मौसम भी सुहावना था। सुबह -सुबह पैदल और गाड़ियों पर आने वाली संगत का उमड़ता हुआ दृश्य था। हम मुख्य दरवाजे से अंदर आये तो वहां जोड़े (जूते) रखने वाले और चरण धुलाने वाले सेवादार हाजिर थे। फिर हम आगे बढ़े तो और भी सुन्दर दृश्य था। जहाँ से सीढ़ियों से उतर कर नीचे की ओर जाते हैं ,वहाँ एक तरफ श्री सतगुरु प्रताप सिंह जी की तस्वीर आसान पर सुशोभित थी ,दूसरी तरफ श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की तस्वीर सुशोभित थी। (उल्लेखनी है कि यह स्थान इन गुरु साहिबानों का तप स्थान रहा है और लोग यहाँ स्नान कर के  नीरोग तो होते ही हैं, उनकी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं) वहाँ सीढ़ियों के सामने ही स्टेज सजी हुई थी जहाँ एक तरफ आसा की वार का कीर्तन हो रहा था तथा दूसरी तरफ फूलों से सुशोभित आसन पर श्री सतगुरु दलीप सिंह जी विराजमान थे। सामने, सरोवर के चारों तरफ ऊपर व् नीचे की ओर बैठी हुई संगत,हंसों के झुण्ड की तरह नज़र आ रही थी। सरोवर के चारो तरफ रंग-बिरंगी लाइटें लगी हुई थी जो रंग -बिरंगे सितारों की तरह चमक रही थीं। इन लाइटों की परछाई जब जल में पड़ रही थी तो और भी अद्भुत दृश्य लग रहा था। बीच में सरोवर का जल ,आस -पास सितारों जैसी रोशनी, सामने स्टेज पर शोभायमान सतगुरु जी,आस-पास बैठी अन्य संत -जन,चारो तरफ सफ़ेद कपड़ों में सुशोभित संगत हंसो के झुण्ड की तरह नज़र आ रही थी। स्वर्गलोक जैसा नज़ारा प्रतीत हो रहा था। ऐसा लग रह था मानो इस पवित्र सरोवर से हँस हीरे मोती-चुगने के लिए आये हों।जैसा कि गुरबाणी में अंकित है,"सरवर हंस तुरे ही मेला, खसमै एवै भाना। सरवर अन्दर हीरा मोती एह हँसा दा खाना।"वास्तव में सतगुरु के बनाये हंसो का आहार भी कीमती ही होता है। फिर सरोवर के किनारे समाधी में बैठे मेरे मन में यह विचार आया कि आज  हम पर सतगुरु जी ने कितनी कृपा की है हम कितने भाग्यशाली हैं कि जहाँ हमारे गुरु साहिबानों ने इतनी तपस्या की आज हमें भी मौका मिला है यहाँ बैठने का कितना आनंद है यहाँ !पवित्र सरोवर की छोह प्राप्त कर आती हुई ठंडी हवा,जो केवल तन को ही नहीं अंतर्मन को भी शीतल कर रही थी। सचमुच में बहुत राहत मिल रही थी। इस तरह हम ब्रह्ममुहूर्त का आनंद प्राप्त करते हुए लगभग डेढ़ घंटे 4 से 5:30 बजे तक समाधी में लीन रहने की कोशिश की। उसके बाद 5 :30 से 6 :30 बजे तक आसा जी की वार का कीर्तन हुआ। फिर श्री सतगुरु दलीप सिंह जी ने साध-संगत के कल्याण के लिए अनमोल प्रवचन किए। आप जी संगत को इन चालीस दिनों का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए समाधी लगाकर, अपनी ज्ञानेन्द्रियों को नियन्त्रित कर ,सतगुरु जी के चरणों में अपना मन लगाने का तरीका बताया। इसके अलावा इन चालीस दिनों में ज्यादा से ज्यादा मौन रहकर अर्थात बातें कम करने,गुरबाणी के फरमान ;"अलप आहार सुलप की निद्रा"के अनुसार अल्प आहार करने, प्रेमाभक्ति मार्ग को अपनाने ,अपने गुरु साहिबानों को याद रखने तथा सरोवर के पास बैठ कर भक्ति करने के महत्व को भी बताया। बाद में अरदास हुई तथा कड़ाह प्रसाद वितरित किया गया। 
                         इस तरह इस महान कुम्भ जप-प्रयोग की शुरुआत हुई जिसका भोग 29 अश्विन मुताबिक 14 अक्टूबर को सुबह (अमृत वेले) होगा।अन्तिम तीन दिन 12 ,13 तथा 14 अक्टूबर को विशाल समागम होगा।   --प्रिंसिपल राजपाल कौर (जालंधर)

Monday, September 12, 2016

इस समय माता जी को ही निर्विवाद हो कर माथा टेका जा सकता है

उनको सद्गुरु रूप में स्वीकार कर पंथ को टूटने से बचा सकते हैं
नामधारी पंथ के पूजनीय श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी श्री माता चंद कौर जी का नाम उसी श्रेणी में आता है,जिन माताओं की देवियों के रूप में पूजा की जाती है तथा गुरबाणी में भी उन्हें धन्यता योग्य स्थान प्राप्त है जैसे 
धन्नु सु वंसु  धन्नु सु पिता धन्नु सु माता जिनि जन जणे।। (११३५ )  

धनु जननी जिनि जाइिआ धन्नु पिता परधानु।।  (३२ )  आदि। 
           श्री माता चंद कौर जी द्धारा पंथ व गरीबों और दुखियों की सेवा व सहायता की। श्री सतगुरु जी के पावन चरणों में रहते हुए देश की आज़ादी के बाद बेघर हुए लोगों के इलाकों में बसाने, आबाद करने तथा उन्हें उन्नति के शिखर तक पहुँचाने में आप जी ने सतगुरु जी के साथ मुख्य भूमिका निभाई। आप दिन रात पंथ की सेवा में लगे रहते। माता जी सर्वगुण सम्पन्न थीं।  

       आप जी की  महानता का परिचय श्री ठाकुर दलीप सिंह जी के बचनों तथा उन तस्वीरों से मिलता है जो स्वयं आप जी ने अपनी अलौकिक फोटोग्राफी से तैयार कर उन्हें सेवा के प्रत्यक्ष स्वरुपशांत मूरत तथा जगत माता आदि उपनामों से सम्बोधित कर सभी  नामधारी परिवारों में सप्रेम भेंट स्वरुप दी। इसके साथ ही ऐसे पूजनीक माता जी की निन्दा करने से भी वर्जित किया था। संभव है कि उस समय भी कुछ मनमुख लोग माता जी की निंदा करते होंगे।
   
            उसके बाद दिसंबर 2012 में नामधारी पंथ के मुखी  श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद नामधारी पंथ में कुछ दरारें आती देख पंथ को एकजुट करने के लिए श्री ठाकुर दलीप सिंह जी ने यह निर्णय लिया कि इस समय माता जी ही केवल पंथ की सर्वोच्च हस्ती हैं जहाँ बिना किसी विवाद के माथा टेका जा सकता है और पंथ इकट्ठा हो सकता है। हम उनको सद्गुरु रूप में स्वीकार कर पंथ को टूटने से बचा सकते हैं और केवल कहा ही नहीं बल्कि श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी के गुरुद्धारा साहिब श्री जीवन नगर में हो रहे श्रद्धांजली समारोह के दौरान श्री माता  चंद  कौर जी की तस्वीर को सतगुरु जगजीत सिंह जी की तस्वीर के साथ सुशोभित कर पहले आप नमस्कार की फिर सारी संगत को नमस्कार  करने तथा अरदास में उनका नाम शामिल कर के अरदास करने का हुक्म किया। ऐसे समय में श्री ठाकुर दलीप सिंह जी  ने सद्गुरु जगजीत सिंह जी की ओर से उनके सेवक डॉ. इक़बाल सिंह जी द्धारा भेजे गए गद्दी के उत्तराधिकारी होने के हक़ को त्याग कर दूर दृष्टि  से ये सोचा कि इस परिस्थिति में केवल माता जी के चरणों में सीस झुका कर ही सारा पंथ इक्कठा हो सकता है। और ऐसा ऐलान आप जी ने कोई निजी स्वार्थ के लिए नहीं अपितु  पंथ की भलाई के लिए किया।  

        संगत के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था क्योंकि माता जी तो पहले से ही महान हस्ती श्री सतगुरु जगजीत सिंह जी की धर्मपत्नी होने के नाते सभी की पूजनीय थीं। पर पता नहीं संगत क्यों दुविधा में पड़ गई और संगत ने उनके आदेश का पूरी तरह से पालन नहीं किया। और कई लोग आप जी से वाद-विवाद करने लग गये क्योंकि कई मतलब परस्त तथा स्वार्थी लोगों को शायद यह खतरा पैदा हो गया कि यदि माता जी गुरुगद्दी पर बिराजमान हो गये तो वे गुरुघर की सम्पति पर कब्ज़ा कैसे करेंगे और भैणी साहिब में रहने वाले कुछ कब्जाधारी लोगों ने तो बहुत टीका टिप्पणी की। वे कहने लगे कि ये कौनसा नया काम है? एक स्त्री कैसे गुरु बन सकती है?जबकि गुरबाणी में सतगुरु के अनेक लक्षण लिखे हैं पर ऐसा कहीं नहीं लिखा कि एक स्त्री गुरु नहीं बन सकती। और इस तरह माता जी को गुरु रूप में स्वीकार नहीं किया। पर उनकी इस मनमत से पंथ का कई तरह से नुकसान हुआ। पंथ का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पंजाब की धरती पर माता जी की हत्या का कलंक लग गया और हमने अपने पूज्य माता जी को खो दिया।
काश! समूह नामधारी संगत ने श्री ठाकुर दलीप सिंह जी का आदेश मान कर माता चंद कौर जी को गुरु रूप में स्वीकार कर लिया होता। यदि माता जी सतगुरु रूप में बिराजमान होते तो नामधारी पंथ को ऐसी संकट की घड़ी ना देखनी पड़ती। हम उनके पावन सानिध्य का आनंद ले रहे होते और समाज व देश के लिए महान मिसालें कायम करने वाला नामधारी पंथ आज इस कगार पर असमंजस में ना खड़ा होता।  
 पर इस समय दौरान ही सिक्ख पंथ के निरंकारी समुदाय में ऐसा ही उदाहरण देखने को मिला जिसने पंथक हितैषी नामधारी समुदाय को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि नामधारियों ने माता जी को गुरु मानने का ऐलान कर शुरुआत तो की पर इसका लाभ नही उठा सके। इसका लाभ उनके निरंकारी भाइयों ने प्राप्त कर लिया। क्योंकि निरंकारी समुदाय ने  नामधारी पंथ के मुखी श्री ठाकुर दलीप सिंह जी द्वारा सर्वप्रथम शुरू की जाने वाली परंपरा को अपना कर इतिहास में एक नई मिशाल कायम की है। उन्होंने मई 2016 में अपने पंथ के मुखी बाबा हरदेव सिंह जी के ब्रह्मलीन हो जाने के पश्चात् ज्यादा दुविधा में न पड़ कर उनकी धर्मपत्नी माता सविंदर कौर जी को गुरु रूप में स्वीकार कर सराहनीय कार्य किया है। माता सविंदर कौर जी ने पंथ को उसी तरह सहेज लिया तथा सारा पंथ उनके समक्ष नतमस्तक है। इसके अलावा पंथ में किसी प्रकार का विवाद नहीं उठा और पंथ उन्नति की राह पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने सभी के समक्ष एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया उन लोगों को भी प्रेरणा दी है जो कहते थे कि एक स्त्री कैसे गुरु बन सकती है ? अतः आज भी उन लोगों को नारी शक्ति के अस्तित्व को पहचानने की जरूरत है जिन्हें पूजनीय स्थान देने पर हमेशा लाभ ही होता है नुकसान नहीं। महर्षि मनु जी ने संस्कृत के एक श्लोक में ठीक ही कहा है......         "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्र फ़ला: क्रिया: ।।"   

अर्थात जहाँ स्त्रियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। जहाँ ये नहीं पूजी जाती वहां सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं। 


    प्रिंसीपल राजपाल कौर , 90231-50008 , Email : rajpal16773@gmail.com