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Monday, May 08, 2017

जेल सुधारों पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को गृह मंत्रालय की सलाह

08-मई-2017 17:59 IST
2016 में हुआ था जेल प्रमुखों का पांचवां राष्ट्रीय सम्मेलन
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती ललिता कुमारमंगलम 30 सितंबर,2016 को नई दिल्ली में राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के कारागार प्रमुखों के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह में।                    (एजे/पीआईबी,हिंदी इकाई)
जेल सुधारों पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जेल प्रमुखों के पांचवें राष्ट्रीय सम्मेलन में अपनाए गए प्रस्तावों पर गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुख सचिवों/ गृह सचिवों (कारावास प्रभारी) को एक पत्र लिखा है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती ललिता कुमारमंगलम
30 सितंबर,2016 को नई दिल्ली में राज्यों और संघ शासित प्रदेशों के
कारागार प्रमुखों के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन में समापन संबोधन
करती हुईं। (एजे/पीआईबी,हिंदी इकाई)
जेल सुधारों पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जेल प्रमुखों का पांचवां राष्ट्रीय सम्मेलन नई दिल्ली में 29- 30 सितंबर, 2016 को हुआ था। सम्मेलन का उद्घाटन गृह राज्य मंत्री श्री हंसराज गंगाराम अहीर ने किया था, जिसमें राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों, सीपीओ, एनजीओ इत्यादि के 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। कारावास प्रशासन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई थी। सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को स्वीकार किया था।
राज्यों/ केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह  दी गई है कि वे निम्नलिखित सुधारों पर गौर करें और उन्हें कार्यान्वित करें। इनका उद्देश्य कारावास प्रशासनिक प्रणाली को कारगर बनाना है :
  i.     कारावास विभाग का नाम बदल कर ‘कारावास एवं सुधारात्मक प्रशासन’ किया जाएगा, जिसके तहत एकीकृत कारावास, सुधारात्मक और परिवीक्षा सेवाएं शामिल हैं।
  ii.     हर राज्य को कारावास विभाग के तहत एक कल्याण शाखा स्थापित करनी होगी, जिसमें कल्याण अधिकारियों, विधि अधिकारियों, काउंसलर और परिवीक्षा अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी।
 iii.     कारावास नियमों और कानूनों में बुनियादी एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अपने मौजूदा जेल मैनुअल की समीक्षा करें और गृह मंत्रालय द्वारा तैयार तथा मई, 2016 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजे गए आदर्श जेल मैनुअल, 2016 के प्रावधानों को लागू करें।
 iv.     शीघ्र सुनवाई और अदालतों तक विचाराधीन बंदियों को लाने-ले-जाने के खर्च में कमी लाने के लिए सभी जेलों को वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिये अदालतों से जोड़ा जाए।
  v.     कारावास विभागों में सभी पदों की मौजूदा रिक्तियों को जल्द भरा जाए।
 vi.     प्राथमिकता के आधार पर जेल ई-प्रणाली को अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणालियों (सीसीटीएनएस) तथा ई-न्यायालयों के साथ एकीकृत किया जाए।
vii.     समय-समय पर विचाराधीन बंदी प्रबंधन के संबंध में जेल, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और न्याय पालिका का संयुक्त प्रशिक्षण आयोजित किया जाए। कैदियों की आपराधिक प्रवृत्ति और कट्टरता में कमी लाने के लिए अलग से प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जाएं।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी गई है कि वे उपरोक्त सुधारों को समयबद्ध तरीके से लागू करने के लिए समेकित प्रयास करें। बंदियों की दशा सुधारने के लिए यह नितांत आवश्यक है। इसके लिए कारावास प्रशासन में भी सुधार लाया जाए।
राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रशासनों से आग्रह किया जाता है कि वे उपरोक्त सलाह के क्रियान्वयन के संबंध में प्रगति की सूचना प्रदान करें।
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Sunday, October 27, 2013

सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी की ज़मानत का मामला

कल सुनवाई के लिए आएगा सर्वोच्च न्यायलय के सामने
फेसबुक: 27 अक्टूबर 2013:(Himanshu Kumar):सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी की कहानी दरअसल भारतीय समाज की सडन की कहानी है। इन दोनों को सरकार ने पूरी योजना बना कर नकली मुकदमों में फंसा कर जेल में डाला। 
दोनों को जेल में खूब यातनाएं दी गयीं।सारी यातनाओं का विवरण बाहर भी भेज दिया गया। 

सोनी सोरी की कहानी सुनो

पुलिस के इन दोनों के खिलाफ बनाये हुए सारे मामले झूठे साबित हुए। 
अब आखिरी एक मामला बचा है जिस का बहाना बना कर इन दोनों साहसी आदिवासियों को जेल में डाल कर रखा हुआ है।                                        
आखिरी मामला इतना फर्जी और हास्यास्पद है उसमे कभी किसी को जेल हो ही नहीं सकती। 
लेकिन ये दोनों निर्दोष आदिवासी सारी दुनिया को जानकारी होने के बाद भी जेलों में सड़ाये जा रहे हैं। 
असल में इन दोनों आदिवासियों के मामले में हम अपनी क्रूर और जिद्दी सनक पर अड् गए हैं।  
क्योंकि अगर ये दोनों आदिवासी सही हैं तो क्या ये सरकार , सभ्यता हमारी लूट सच में गलत है ? 
बस इस जिद की वजह से इन दोनों को जेल में डाल कर रखा गया है।  
लेकिन इस पूरी लड़ाई में सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी तो हारे ही नहीं। 
लड़ाई तो आपकी नकली सभ्यता और आपके ढोंग ने हारी है। 
बेपर्दा आप हुए हैं।  
आप क्या सोचते हैं आप किसी को मार कर या सता कर जीत जाते हैं ?
नहीं बल्कि मुझे आप ही हारे हुए और हाँफते हुए दीख रहे हैं। 
देश की जेलों मे बंद हज़ारों आदिवासियों की रिहाई , आदिवासियों के विरुद्ध सरकारी हमला , संसाधनों की लूट के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर कल दिल्ली मे साथी जमा हुए , आवाज़ बुलंद की , गीत गाये कल सोनी सोरी को जेल मे भेजने के लिये पोस्ट कार्ड भी लिखे गये चिराग रोशन किये ताकी ज़ुल्म का अँधेरा काम हो . जो साथी जमा हुए वो उनमे से हैं जिनके जैसे लोगों ने हर दौर मे ज़ुल्म का विरोध किया है . आशुतोष कुमार , अफलातून भाई , प्योली स्वतिजा , स्वामी अग्निवेश , वंदना शिवा , मीरा शिव , किरण शाहीन , विजय प्रताप ,कल्पना मेहता , कविता श्रीवास्तव , कविता कृष्णन , सलीमा आरिफ , शाइस्ता , मेथ्यु भाई , पाणिनि आंनद, अभिषेक श्रीवास्तव , मुकुल दुबे , कैलाश मीणा, अमीन , सौरभ, किशन ठाकर , डाक्टर हीरा , मुक्ति तिर्की और सैंकडों साथियों को एकजुटता के लिये सलाम (File photo)
ध्यान से देखिये भारत के करोड़ों आदिवासी, दलित अपसंख्यक आपकी इस सभ्यता पर सवाल उठा रहे है।इन्हें अनदेखा मत कीजिये . भारत सिर्फ आपका ही नहीं है बल्कि सबका है। 


सोनी सोरी की कहानी सुनो                        सोनी सोरी को दी जा रही हैं एक्सपायरी दवाएं



Friday, August 16, 2013

मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं ?

लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा ! 
अब जब कल स्वतन्त्रता दिवस पर सरकारी डयूटी करके थके मांदे सरकारी मुलाजिम कल फिर ड्यूटी देने के  लिए आज कर रहे होंगें  तो गांधीवादी नेता हिमांशु कुमार अर्थात Himanshu Kumar ने फिर कुछ कड़वे सत्य सामने रख कर उनके दिलो-दिमाग को आंदोलित कर दिया है। हिमांशु लिखते हैं :सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय , स्वामी अग्निवेश , कविता श्रीवास्तव , नंदिनी सुंदर , हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं !
ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके ! 
सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं ! इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा ! फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे !
67 वें स्वतन्त्रता दिवस पर एक दुसरे को थोक के भाव आज़ादी की बधाईयाँ दे रहे लोगों की इस में कड़वे सत्य को देख कर  हो रहे हिमांशु समाज के सभी वर्गों से---गुहार लगाते हुए कहते है---पुकारते हैं--झंक्झौरते हैं--:
कोई तो बचाओ इस लड़की को ! संसद , सुप्रीम कोर्ट , टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं ! और हमारे वख्त में ही एक जिंदा इंसान को तिल तिल कर हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है ! और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है !
हिमांशु चेतावनी भी देते हैं--:शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है !एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं ! मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं ? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा ! नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे !

सोनी सोरी की कहानी सुनो

लोकतंत्र पर आए दिन जगह जगह पर दिए जाते खोखले उपदेशो से बुरी तरह आहत हुए हिमांशु कुमार की आवाज़ क्या अनसुनी रहेगी ? काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की की बेबसी किसी को नजर नहीं आएगी? क्या इस आदिवासी अध्यापिका को हर द्रोपदी की तरह नंगा किया जाता रहेगा ? क्या किसी कृष्ण तक नहीं पहुँच प् रही इस अबला की पुकार ? हम देवी के 9 रूपों की पूजा करने वाले एक धार्मिक देश में ही रहते हैं या कहीं और? क्या यह समाज पूरी तरह कौरव प्रधान हो गया है?--यहाँ सत्य की आवाज़ सुनने वाले अब नहीं रहे क्या? नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की का आखिर कसूर क्या है ? स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर आखिर कोई तो बताये !           ----रेक्टर कथूरिया 


सोनी सोरी की कहानी सुनो                        सोनी सोरी को दी जा रही हैं एक्सपायरी दवाएं


Wednesday, May 29, 2013

फरीदकोट अपहरण काण्ड: दोषी निशान सिंह व अन्य को सजाएँ

जनता के एकजुट संघर्ष की बड़ी जीत करार
29 मई, लुधियाना। कारखाना मजदूर यूनियन, पंजाब, के संयोजक लखविन्दर, टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष राजविन्दर, नौजवान भारत सभा के संयोजक छिन्दरापल व स्त्री मुक्ति लीग की नेत्री नमिता ने फरीदकोट अपहरण व बलातकार काण्ड के दोषी निशान सिंह को उम्र कैद व 9 अन्य को 7-7 वर्ष की कैद की सजा सुनाए जाने के अदालती फैसले का स्वागत करते हुए इसे जनसंघर्ष की बड़ी जीत करार दिया है। उन्होंने पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष करने वालीं वाले छात्रों, नौजवानों, मकादूरों, किसानों, बुद्धिजीवियों के जनसंगठनों को बधाई दी है। निशान सिंह व अन्य दोषियों को सजाए होना इस बात की पुष्टि है कि लोग जब एकजुट होकर संघर्ष करते हैं तभी वे इंसाफ हासिल कर सकते हैं। 31 दिसम्बर 2012 को संगरूर जिले के नमोल गाँव में अपनी नाबालिग छात्रा के साथ बलातकार करने वाले अध्यापक को उसके राजनीतिक सम्बन्धों के बावजूद लोगों के संघर्ष के कारण 23 मई को उम्र कैद की सजा होना भी इसी बात की मिसाल है। साथ ही उन्होंने कहा कि स्त्रियों के साथ हो रहे अपराधों को रोकने की राह भी जनता में चेतना पैदा करना और एकजुट जन आन्दोलन का निर्माण करना ही हो सकता है।
टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष राजविन्दर ने बताया कि 24 सितम्बर, 2012 को कत्ल, लूट व बलातकार जैसे 22 संगीन अपराधों में शामिल, गुण्डागर्दी के लिए मशहूर, सत्ताधारी अकाली दल के नेताओं से अच्छे सम्बन्ध रखने वाले निशान सिंह व उसके साथियों ने मिल कर नाबालिग लडक़ी को फरीदकोट स्थित उसके घर में से दिन दिहाड़े हथियारों के दम पर अगव कर लिया था और परिवार के सदस्यों की बुरी तरह से मार-पीट की थी। जब दोषियों के राजनीतिक सम्बन्धों के कारण पुलिस ने इस मामले में कोई गम्भीर कार्रवाई न की तो विभिन्न जनसंगठनों के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग पीडि़त परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए आगे आए। जनाक्रोश के आगे झुकी पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 21 अक्टूबर 2012 को गोवा से लडक़ी को बरामद किया और दोषी को गिरफ्तार किया। इसके बाद भी पुलिस ने दोषी का साथ देना नहीं छोड़ा और तरह तरह की साजिशें रचकर देषियों को बचाने में लगी रही। इधर लोगों का गुस्सा बढ़ता गया जो दोषियों को सजा दिलाने के लिए बड़े स्तर पर अन्दोलन के रूप में सामने आया। दो महीने तक फरीदकोट शहर में बड़े स्तर पर धरने-प्रदर्शन होते रहे। आखिर जनसंघर्ष रंग लाया जिस तहत गुजरी 27 मई को मुख्य दोषी निशान सिंह को उम्र कैद और 9 अन्य को 7-7 वर्ष की कैद की सजा हुई जब्कि दस दोषियों को सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया गया। अकाली नेता डिम्पी समरा को भी 7 वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई है। बरी किए गए दोषियों को सजा दिलाने के लिए पीडि़त परिवार और संघर्षशील संगठनों ने हाईकोर्ट में केस लडऩे का ऐलान किया है।
लखविन्दर, संयोजक, कारखाना मकादूर यूनियन पंजाब, (फोन नं.-9646150249)