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Friday, August 01, 2025

जत्थेदार दादूवाल को रजत पट्टिका से सम्मानित किया गया

 From Sarabjeet Singh Sufi on Friday 1st August 2025 at 15:13 Regarding Sant Baljeet Singh Daduwal

वाशिंगटन डीसी के कैपिटल हिल स्थित व्हाइट हाउस में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया


लुधियाना
: 1 अगस्त 2025: (सरबजीत सिंह सूफी//पंजाब स्क्रीन डेस्क)::

अंतर्राष्ट्रीय सिख उपदेशक जत्थेदार बलजीत सिंह दादूवाल, धर्म प्रचार हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष शिरोमणि अकाली दल आज़ाद, कुछ दिनों की अपनी निजी यात्रा पर अमेरिका पहुँचे हैं। 

जत्थेदार दादूवाल की पंथिक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए, अमेरिका में विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित हस्तियों द्वारा उनका सम्मान किया जा रहा है। इसी कड़ी में, जत्थेदार दादूवाल ने जत्थेदार चरण सिंह और प्रख्यात सिख विचारक डॉ. सुरिंदर पाल सिंह के साथ व्हाइट हाउस और सीनेट हाउस, कैपिटल हिल, अमेरिका के राष्ट्रपति के निवास का दौरा किया। 

इस यात्रा को अमेरिकी सीनेट के वरिष्ठ कांग्रेसी स्टेनी एच. होयर ने प्रायोजित किया था। इस यात्रा के दौरान जत्थेदार दादूवाल जी ने कहा कि अमेरिका विश्व में एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में जाना जाता है और भारत-अमेरिका संबंध हमेशा से सौहार्दपूर्ण रहे हैं। 

उन्होंने कहा कि भविष्य में जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति या अमेरिकी सरकार का कोई प्रतिनिधि भारत आएगा, तो वह उनसे पंजाब और हरियाणा के ऐतिहासिक स्थलों का दौरा करने का अनुरोध अवश्य करेंगे। 

व्हाइट हाउस यात्रा के दौरान, सिख विचारक डॉ. सुरिंदरपाल सिंह गिल को चेयरपर्सन इंटरनेशनल फोरम यूएसए, जत्थेदार चरण सिंह प्रेमपुरा, अध्यक्ष एनआरआई विंग यूएसए और जत्थेदार दादूवाल ने स्मृति चिन्ह रजत पट्टिका देकर विशेष रूप से सम्मानित किया।

Thursday, May 21, 2020

चीन के प्रति अमेरिकी सामरिक रवैया:आखिर वजह क्या है?

20 मई 2020 को  जारी किया गया 

 चीन अमेरिका की उमीदों पर खरा नहीं उतरा  

The Conversation  से साभार तस्वीर

परिचय

अमेरिका और चीन के बीच 1979 में जब से राजनयिक संबंध स्थापित हुए हैं, अमेरिका की चीन के प्रति नीति आमतौर पर इस उम्मीद पर आधारित रही है कि गहराते रिश्ते चीन में बुनियादी आर्थिक और राजनीतिक खुलापन लाएंगे और आख़िरकार इससे एक रचनात्मक और ज़िम्मेदार अंतरराष्ट्रीय साझेदार का उदय होगा, जिसका समाज और अधिक खुला होगा। 40 साल से भी ज़्यादा समय के बाद ये स्पष्ट हो चुका है कि इस दृष्टिकोण ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की चीन में आर्थिक और राजनीतिक सुधार की गुंज़ाइश को रोकने की इच्छाशक्ति को कम करके आंका था। पिछले दो दशकों के दौरान सुधारों की गति या तो धीमी हुई है, या तो उन्हें रोक दिया गया है या उन्हें पलट दिया गया है। चीन की तेज़ आर्थिक विकास और दुनिया से उसका बढ़ा संपर्क जनता केंद्रित, स्वतंत्र और खुली व्यवस्था से तार नहीं जोड़ पाया है, जैसे कि अमेरिका ने उम्मीद की थी। सीसीपी ने इसके बदले स्वतंत्र और उदार नियमों पर आधारित व्यवस्था का लाभ उठाने का विकल्प चुना और इससे ज़रिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नया आकार देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की। चीन सीसीपी के हितों और विचारों के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने की कोशिश करने की बात को खुले तौर पर स्वीकार करता है। सीसीपी द्वारा आर्थिक, सामाजिक और सैनिक शक्ति का इस्तेमाल उत्तरोत्तर बढ़ाकर विभिन्न राष्ट्रों को सहमति के लिए मजबूर करना अमेरिका के अहम हितों को नुक़सान पहुंचा रहा है और इसकी वजह से दुनिया के देशों और व्यक्तियों की संप्रभुता और गरिमा को नुक़सान पहुंच रहा है। 

चीन की चुनौती का जवाब देने के लिए, अमेरिकी प्रशासन ने चीन को लेकर एक बराबरी का रुख़ अपनाया है, जो सीसीपी के इरादे और क़दमों के स्पष्ट आकलन, अमेरिका के विभिन्न सामरिक बढ़तों और कमियों के पुनर्मूल्यांकन और व्यापक द्विपक्षीय टकराव के संबंध में धैर्य पर आधारित है। हमारा रुख़ चीन के लिए ख़ासतौर पर कोई शर्त निर्धारित करने पर आधारित नहीं है। दरअसल हमारा लक्ष्य अमेरिका के अहम राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है, जोकि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) 2017 के चार स्तंभों के रूप में व्यक्त किया गया है। हमारा लक्ष्य है: (1) अमेरिकी लोगों, होमलैंड और जीवन शैली की रक्षा करना; (2) अमेरिकी समृद्धि को बढ़ावा देना; (3) शक्ति के सहारे शांति क़ायम रखना; और (4) अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाना।

चीन के प्रति हमारे प्रतिस्पर्धी रुख़ के दो उद्देश्य हैं: पहला, हमारी संस्थाओं की सुदृढ़ता, गठबंधन और साझेदारी में सुधार करना ताकि चीन की ओर से पेश की जा रही चुनौतियों पर हावी हो सकें; दूसरा, चीन को इसके लिए मजबूर किया जा सके कि वो अमेरिका के अहम राष्ट्रीय हितों और उसके सहयोगी देशों और साझेदारों के हितों को नुक़सान पहुंचाने वाली कार्रवाई या तो ख़त्म कर दे या कम करे। हम भले ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, लेकिन हम हमारे हितों के मद्देनज़र सहयोग का स्वागत भी करते हैं। प्रतिस्पर्धा से हमेशा टकराव या संघर्ष नहीं होता है। अमेरिका के मन में चीन के लोगों के प्रति गहरा और स्थाई सम्मान है और हमारा चीन के साथ पुराना संबंध है। हम चीन के विकास को रोकना नहीं चाहते और न हीं हम चीन के लोगों के साथ संपर्क तोड़ने की इच्छा रखते हैं। अमेरिका चीन के साथ एक ईमानदार प्रतिस्पर्धा की उम्मीद रखता है, जहां हमारे दोनों देश, हमारे व्यवसाय और हमारे लोग सुरक्षा और समृद्धि का आनंद ले सकें।

चीन के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए कई साझेदारों के साथ सहयोगी संबंध ज़रूरी है और अमेरिकी प्रशासन हमारे साझा हितों और मूल्यों की रक्षा के लिए साझेदारी विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस प्रशासन के अहम सहयोगियों में कांग्रेस, प्रांतीय और स्थानीय सरकारें, प्राइवेट सेक्टर, नागरिक समाज और शिक्षाविद् शामिल हैं। कांग्रेस सुनवाइयों, बयानों और चीन के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार पर रोशनी डालने वाली रिपोर्टों के माध्यम से अपनी बात रखती रही है। कांग्रेस अमेरिकी सरकार को अपने सामरिक लक्ष्य हासिल करने की दिशा में क़दम उठाने के लिए क़ानूनी प्राधिकार और संसाधन उपलब्ध कराती है। अमेरिकी प्रशासन चीन के प्रति स्पष्ट और मज़बूत रुख़ अपनाने के लिए अपने सहयोगी देशों और साझेदारों द्वारा उठाए गए क़दमों को स्वीकार करती है, जिनमें अन्य बातों के अलावा यूरोपीय संघ द्वारा मार्च 2019 में ईयू-चाइना: ए स्ट्रेटेजिक आउटलुट का प्रकाशन शामिल है।

अमेरिका स्वतंत्र और मुक्त व्यवस्था के साझा सिद्धांतों के समर्थन के लिए मित्र राष्ट्रों, साझेदारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग स्थापित कर रहा है। ख़ासतौर पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए, ऐसी कई पहलों का ज़िक्र दस्तावेज़ों में किया गया है, ये दस्तावेज़ हैं- रक्षा मंत्रालय की जून 2019 की हिंद-प्रशांत सामरिक रिपोर्ट और ए फ़्री एंड ओपन इंडो-पैसिफ़िक: एडवांसिंग ए शेयर्ड विज़न पर विदेश मंत्रालय की नवंबर 2019 की रिपोर्ट। अमेरिका एक दूसरे की साझा दूरदर्शिता और दृष्टिकोण के साथ समन्वय के साथ काम कर रहा है, जैसे एसोसिएशन ऑफ़ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस का आउटलुक ऑन द इंडो-पैसिफ़िक, जापान की मुक्त और स्वतंत्र हिंद-प्रशांत संकल्पना, भारत की क्षेत्र में सबकी सुरक्षा और सबके विकास की नीति, ऑस्ट्रेलिया की हिंद-प्रशांत अवधारणा, दक्षिण कोरिया की नई दक्षिण नीति और ताइवान की नई दक्षिणवर्ती नीति।

यह रिपोर्ट हमारी सामरिक प्रतिस्पर्धा के तहत दुनिया भर में अमेरिकी प्रशासन के उन व्यापक क़दमों और नीतिगत पहल का विवरण देने की कोशिश नहीं है। दरअसल यह रिपोर्ट एनएसएस को लागू करने पर केंद्रित है क्योंकि ये सीधे तौर पर सबसे अधिक चीन पर लागू होती है।

चुनौतियां  

चीन आज अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को अनेक चुनौतियां दे रहा है।

आर्थिक चुनौतियां

आर्थिक सुधारों के प्रतिबद्धताओं के अनुपालन में चीन का ख़राब रिकॉर्ड और इसकी सरकारी संरक्षणवादी नीतियों और कार्यप्रणाली से अमेरिकी कंपनियों और कामगारों को नुक़सान होता है, विश्व बाज़ार का स्परूप बिगड़ता है, इससे अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन होता है और वातावरण प्रदूषित होता है। जब 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में शामिल हुआ था, उस समय उसने डब्ल्यूटीओ की मुक्त व्यापार आधारित व्यवस्था को स्वीकार किया था और इस पर भी सहमति जताई थी कि वो इन सिद्धांतों को अपनी व्यापार व्यवस्था और संस्थाओं में लागू करेगा। डब्ल्यूटीओ के सदस्य उम्मीद करते थे कि चीन आर्थिक सुधारों के रास्ते पर चलना जारी रखेगा और ख़ुद को बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था और व्यापार व्यवस्था में ढालना भी जारी रखेगा।

लेकिन ये उम्मीदें वास्तविकता में नहीं बदलीं। चीन ने प्रतिस्पर्धा आधारित व्यापार और निवेश के अपने मानकों और कार्यप्रणाली को अपने यहां लागू नहीं किया और इसके उलट डब्ल्यूटीओ की सदस्यता का फ़ायदा उठाते हुए वह दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया, जबकि अपने घरेलू बाज़ार का वह व्यवस्थित ढंग से संरक्षण करते रहा। चीन की आर्थिक नीतियों के कारण उसकी औद्योगिक क्षमता ज़रूरत से ज़्यादा हो गई है। इससे अंतरराष्ट्रीय क़ीमतें प्रभावित होती हैं और चीन को अपना ग्लोबल मार्केट शेयर बढ़ाने का मौक़ा मिल जाता है। ऐसा उन प्रतिस्पर्धी कंपनियों की क़ीमत पर होता है, जो बिना किसी अनुचित लाभ के काम करती हैं, जोकि चीन अपनी कंपनियों को देता है। चीन व्यापर और निवेश को लेकर अपनी बाज़ार रहित आर्थिक संरचना और सरकार की अगुआई में मुनाफ़ाखोरी वाले रवैये पर क़ायम है। इसी तरह राजनीतिक सुधार भी कमज़ोर हो गया है और उल्टी दिशा में चला गया है, तथा सरकार और पार्टी के बीच का अंतर कम हो रहा है। महासचिव शी का राष्ट्रपति के कार्यकाल की सीमा को ख़त्म करना दरअसल उनके कार्यकाल को अनिश्चितकाल के लिए प्रभावी रूप से बढ़ा देना है। ये चीन में जारी इन प्रवृतियों का सार है।

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत चीन के क़दमों, नीतियों और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, बौद्धिक संपदा और नवाचार की जांच के अपने नतीजों में निर्धारित किया कि चीन की सरकार के कई क़दम, नीतियां और कार्यप्रणाली अनुचित और पक्षपातपूर्ण हैं जो अमेरिकी वाणिज्य को रोकती हैं या उस पर बोझ बनती हैं। ठोस जांच के आधार पर यूएसटीआर ने निष्कर्ष निकाला कि चीन: (1) अमेरिकी कंपनियों को बाध्य करता है या उन पर दबाव डालता है कि वे अपनी प्रौद्योगिकी चीनी कंपियों को ट्रांसफ़र कर दें; (2) बाज़ार की शर्तों पर अपनी प्रौद्योगिकी के अधिकार देने की अमेरिकी कंपनियों की क्षमता पर पर्याप्त प्रतिबंध लगाता है; (3) आधुनिक और अग्रणी प्रौद्योगिकी हासिल करने के लिए अपनी घरेलू कंपनियों को अमेरिकी कंपनियों के अधिग्रहण के लिए प्रत्यक्ष और अनुचित तरीक़े से मदद करता है; और (4) संवेदनशील सूचनाएं और व्यापार की गोपनीय जानकारी हासिल करने के लिए अमेरिकी कंपनियों के नेटवर्क पर अनाधिकृत साइबर हमले करवाता है और इसका समर्थन करता है। 

अपनी लूटपाट वाली आर्थिक कार्यप्रणाली को रोकने के लिए चीन की प्रतिबद्धता खोखले और झूठे वादों से भरी पड़ी है। 2015 में चीन ने वादा किया था कि वो व्यावसायिक फ़ायदे के लिए गोपनीय व्यापार जानकारियों की सरकार निर्देशित साइबर चोरी को रोकेगा, 2017 और 2018 में भी उसने यही वादा किया था। 2018 में बाद में अमेरिका और दर्जन भर अन्य देशों ने चीन के सुरक्षा मंत्रालय से जुड़े लोगों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटर्स को हैक करने का अभियान चलाने तथा बौद्धिक संपदा और गोपनीय व्यापार जानकारियों को निशाना बनाने का आरोप लगाया। ये चीन की 2015 में की गई प्रतिबद्धता का उल्लंघन था। 1980 के दशक से चीन ने बौद्धिक संपदा की सुरक्षा के लिए कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके बावजूद दुनिया के 63 फ़ीसदी से अधिक जाली सामान चीन में बनते हैं, जिससे दुनिया भर में वैध व्यापार को खरबों डॉलर का नुक़सान होता है। 

हालांकि चीन ये स्वीकार करता है कि अब वो एक परिपक्व अर्थव्यवस्था है, लेकिन चीन डब्ल्यूटीओ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ काम करते समय ये तर्क देता है कि वो अब भी एक विकासशील देश है। हालांकि वो उन्नत प्रौद्योगिकी के उत्पादों का सबसे बड़ा आयातक है, सकल घरेलू उत्पाद, रक्षा ख़र्च और बाहरी निवेश में वो अमेरिका के बाद दूसरी रैंकिंग पर है। चीन अपने को विकासशील देश कहता है ताकि वो अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली को सही ठहरा सके, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सेक्टरों को संस्थागत रूप से विकृत करती हैं। इससे अमेरिका और अन्य देशों को नुक़सान होता है।

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) चीन के लिए एक ऐसा व्यापक शब्द है, जिसके तहत वो अपनी कई पहलों की व्याख्या करता है। इनमें से कई अंतरराष्ट्रीय मानकों, मापदंडों और नेटवर्कों को नया आकार देते दिखते हैं ताकि चीन के अंतरराष्ट्रीय हितों और दृष्टिकोण को बढ़ाया जा सकते, साथ ही ये चीन की घरेलू आर्थिक ज़रूरतों का भी ख़्याल रखते हैं। हालांकि ओबीओआर और अन्य क़दमों के ज़रिए चीन महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी सेक्टरों में अपने औद्योगिक मापदंडों का इस्तेमाल बढ़ा रहा है, ये ग़ैर-चीनी कंपनियों की क़ीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अपनी कंपनियों की स्थिति मज़बूत करने की उसकी कोशिश का भी एक हिस्सा है।

चीन ने जिन परियोजनाओं को ओबीओआर के तहत रखा है, उनमें परिवहन, सूचना और संचार तकनीक, आधारभूत ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक पार्क, मीडिया सहयोग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान, धर्म और संस्कृति पर कार्यक्रम तथा सैनिक और सुरक्षा सहयोग शामिल हैं। चीन ओबीओआर से जुड़े व्यावसायिक विवादों में अपने विशेषज्ञ अदालतों, जोकि सीसीपी के अधीन हैं, के ज़रिए मध्यस्थता करना चाहता है। अमेरिका दीर्घकालिक और उच्चस्तरीय विकास में चीन के उस योगदान का स्वागत करता है, जो सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के हिसाब से हैं, लेकिन ओबीओआर की परियोजनाएं अक्सर इन मापदंडों से अलग काम करती हैं और मेज़बान देशों में ख़राब गुणवत्ता, भ्रष्टाचार, पर्यावरण की दुर्दशा, सार्वजनिक निगरानी की कमी या जनता की भागीदारी में कमी, क़र्ज़ में पारदर्शिता की कमी, कॉन्ट्रैक्ट की परिस्थितियों के निर्माण या शासन एवं वित्त से जुड़ी समस्याओं के गहराने को लेकर जानी जाती हैं।

राजनीतिक रियायत लेने या अन्य देशों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई में चीन की अपनी आर्थिक क्षमता के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए अमेरिका का अनुमान है कि चीन ओबीओआर परियोजनाओं को अनावश्यक राजनीतिक प्रभाव और सैन्य पहुंच के लिए बदलने की कोशिश करेगा। चीन सरकारों, बुद्धिजीवियों, कंपनियों, थिंक टैंकों और अन्य पर सीसीपी के निर्देशों पर चलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने हेतु दबाव बनाने के लिए, अकसर परोक्ष तौर पर, धमकी और लोभ के मिश्रण का इस्तेमाल करता है। चीन ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण कोरिया, जापान, नॉर्वे, फिलीपिंस और अन्य देशों के साथ व्यापर और पर्यटन को सीमित कर दिया है। उसने इन देशों के आंतरिक राजनीतिक और न्यायिक प्रक्रियाओं में दखल देने की कोशिशों के तहत कनाडा के नागरिकों को हिरासत में रखा है। 2016 में जब दलाई लामा ने मंगोलिया का दौरा किया, तो चीन की सरकार ने अपने देश से गुज़रने वाले भूमिबद्ध देश मंगोलिया के खनिज निर्यात पर नए शुल्क लगा दिए। इससे अस्थाई रूप से मंगोलिया की अर्थव्यस्था पंगु बन गई थी।

चीन चाहता है कि पर्यावरण को लेकर उसकी कोशिशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिले। चीन दावा करता है कि वो हरित विकास को बढ़ावा देता है। हालांकि एक दशक से भी ज़्यादा समय से चीन बड़े अंतर से दुनिया भर में ग्रीन हाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक है। चीन ने उत्सर्जन में कमी को लेकर एक अस्पष्ट और अप्रवर्तनीय प्रतिबद्धता सामने रखी है, जो 2030 के आसपास तक चीन के उत्सर्जन के बढ़ते रहने की अनुमति देता है। दुनिया के बाक़ी देश मिलकर उत्सर्जन में जितनी कमी कर रहे हैं, चीन की योजना उससे ज़्यादा उत्सर्जन की है। चीन की कंपनियां कोयले के ईंधन वाले प्रदूषक पावर प्लांट सैकड़ों विकासशील देशों को निर्यात करती हैं। चीन दुनिया भर में समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण का भी सबसे बड़ा स्रोत है। हर साल चीन 3.5 मिलियन मिट्रिक टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में छोड़ता है। चीन दुनिया भर के तटीय देशों के पानी में ग़ैरक़ानूनी, अनियंत्रित और ख़बरों से दूर फ़िशिंग के मामले में पहले नंबर पर है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर ख़तरा पैदा होता है और समुद्री परिवेश को नुक़सान पहुंचता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुक़सान पहुंचाने वाले इन क़दमों पर लगाम लगाने की चीन के नेताओं की अनिच्छा पर्यावरण के प्रबंधन के उनके वादे वाले बयानों से मेल नहीं खाती।

हमारे मूल्यों को चुनौती

सीसीपी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन मूल्यों को बढ़ावा देती है, जो अमेरिकी विश्वास के मूल सिद्धांतों को चुनौती देते है, जिसमें हरेक व्यक्ति के जीने के, स्वतंत्रता के और ख़ुशहाली की कोशिश के असंक्राम्य अधिकार शामिल है। मौजूदा पीढ़ी के नेतृत्व के अधीन सीसीपी ने अपनी शासन व्यवस्था को उन देशों से बेहतर दिखाने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं, जो अपने को विकसित और पश्चिमी देश कहते हैं। चीन इस बारे में स्पष्ट है कि वो अपने आप को पश्चिम के साथ वैचारिक प्रतिस्पर्धा में शामिल देखता है। 2013 में महासचिव शी ने सीसीपी में दो प्रतिस्पर्धी व्यवस्थाओं के बीच दीर्घकालिक सहयोग और संघर्ष के लिए तैयार रहने की अपील की थी और घोषणा की थी कि पूंजीवाद का ख़ात्मा तय है और समाजवाद की विजय निश्चित है। सीसीपी का लक्ष्य व्यापक राष्ट्रीय शक्ति और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के मामले में चीन को ग्लोबल लीडर बनाना है। महासचिव शी ने 2017 में ये विचार व्यक्त किए थे। ऐसा उस व्यवस्था को मज़बूत करने से होगा, जिसे वे चीनी विशिष्टताओं वाले समाजवाद की व्यवस्था कहते हैं। ये व्यवस्था मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा की चीन की व्याख्या पर आधारित है। साथ ही इसमें एक राष्ट्रवादी और एकल पार्टी तानाशाही, सरकार निर्देशित अर्थव्यवस्था, देश की सेवा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल शामिल हैं और सीसीपी की सेवा के लिए व्यक्तिगत अधिकारों का आधिपत्य ख़त्म हो जाता है। ये प्रतिनिधित्व पर आधारित सरकार, मुक्त उद्यम, बुनियादी गरिमा और हरेक व्यक्ति को महत्व देने वाले अमेरिका और अन्य समान विचारधारा वाले देशों के सिद्धांतों के विपरीत है।

सीसीपी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महासचिव शी के वैश्विक शासनप्रणाली की संकल्पना को बढ़ावा देता है। ये संकल्पना ‘मानवमात्र के लिए समान नियति वाले समुदाय के निर्माण’ के बैनर तले आता है। घरेलू स्तर पर वैचारिक समानता के लिए दबाव देने की चीन की कोशिश, दरअसल व्यावहारिक रूप में सीसीपी के नेतृत्व वाले समाज की एक बेचैन करने वाली तस्वीर पेश करती है: (1) एक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान, जिसने राजनीतिक विरोधियों का ख़ात्मा कर दिया; (2) ब्लॉगरों, अधिकारवादी कार्यकर्ताओं और वकीलों पर अन्यायपूर्ण मुक़दमा; (3) जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार करना; (4) सूचना, मीडिया, विश्वविद्यालय, व्यवसाय और ग़ैरसरकारी संगठनों पर सख़्त नियंत्रण और सेंशरशिप; (5) निगरानी के साथ-साथ नागरिकों, कंपनियों और संगठनों की सोशल क्रेडिट स्कोरिंग; और (6) असंतुष्ट समझे जाने वाले लोगों को मनमानेपूर्ण तरीक़े से हिरासत में रखना, उन्हें प्रताड़ित करना और उनसे दुर्व्यवहार करना। घरेलू स्तर पर समानता का एक कठोर उदाहरण देखिए, स्थानीय अधिकारियों ने एक सामुदायिक पुस्तकाल में किताब जलाने के कार्यक्रम का प्रचार किया ताकि वे ‘शी जिनपिंग की विचारधारा’ के प्रति अपनी वैचारिक वफ़ादारी दिखा सकें।

शासन प्रणाली को लेकर ऐसे रुख़ का एक विनाशाकारी नतीजा शिनजियांग में चीन की नीति है, जहां 2017 से अधिकारियों ने 10 लाख से ज़्यादा उइगर तथा अन्य जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिरासत में लिया है। इन्हें ऐसे शिविरों में रखा जाता है, जहां उनकी आस्था और सोच बदलने की कोशिश की जाती है। वहां कई लोगों से से ज़बरन श्रम कराया जाता है, उनकी वैचारिक सोच बदलने की कोशिश की जाती है और उन्हें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक §§दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है। इन शिविरों के बाहर सरकार ने एक पुलिस राज्य स्थापित कर रखा है, जिसमें आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और बायोजेनेटिक्स शामिल हैं ताकि जातीय अल्पसंख्यकों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सके और ये सुनिश्चित किया जा सके कि वे सीसीपी के प्रति वफ़ादार रहें। ईसाइयों, तिब्बती बौद्धों, मुसलमानों, फ़ालुन गोंग के अनुयायियों का बड़े पैमाने पर धार्मिक उत्पीड़न होता है। इनमें पूजा स्थलों का अपमान और विध्वंस, शांतिपूर्ण आस्थावानों की गिरफ़्तारी, आस्था का ज़बरन परित्याग कराना और परंपरागत आस्था के अनुरूप बच्चों के पालन पर पाबंदी शामिल हैं।

वैचारिक समानता थोंपने का सीसीपी का अभियान चीन की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में चीन ने संप्रभु राष्ट्रों के आंतरिक मामलों में दखल दिया है ताकि चीनी नीतियों के लिए सहमति पैदा की जा सके। चीन के अधिकारियों ने दुनिया भर में कथानकों और व्यवहारों पर सीसीपी के प्रभाव को फैलाने की कोशिश की है और इसके हालिया उदाहरणों में अमेरिका और ब्रिटेन की कंपनियाँ और स्पोर्ट्स टीमें तथा ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के राजनेता शामिल हैं। चीन के किरदार सीसीपी की तकनीकी-सत्तावादी मॉडल के तंत्र को दुनिया के कई देशों में भेज रहे हैं जिससे निरंकुश सत्तावादी राष्ट्र अपने नागरिकों पर नियंत्रण करने और विपक्ष पर नज़र रखने का काम कर रहे हैं। साथ ही, विदेशी साझेदारों को दुष्प्रचार और सेंसरशिप तकनीक की ट्रेनिंग दी जा रही है और जनभावना को अपने अनुकूल बनाने के लिए विस्तृत डेटा संकलन का इस्तेमाल हो रहा है।

चीन की पार्टी आधारित सरकार दुनिया के सबसे अधिक संसाधनों वाले दुष्प्रचार तंत्र को नियंत्रित करती है। चीन अपना विचार सरकारी टेलीविज़न, प्रिंट, रेडियो और ऑनलाइन संगठनों के माध्यम से फैलाता है। इनकी उपस्थिति अमेरिका और अन्य देशों में बढ़ रही है। सीसीपी अक्सर विदेशी मीडिया में अपने निवेश की जानकारी छिपा लेता है। 2015 में ये पता चला कि चाइना रेडियो इंटरनेशनल का 14 देशों में 33 रेडियो स्टेशनों पर नियंत्रण है और ऐसा शेल कंपनियों के माध्यम से हुआ है। और कई मध्यवर्ती संस्थाओं का मुफ़्त चीन समर्थक मीडिया सामग्री उपलब्ध कराते हुए समर्थन किया जाता है।

मीडिया के अलावा सीसीपी अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों में अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए कई तरह के किरदारों का इस्तेमाल करती है। सीसीपी यूनाइटेड फ़्रंट संगठन और उसके एजेंट अमेरिका और अन्य देशों में कंपनियों, विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों, विद्वानों, पत्रकारों, स्थानीय सरकारों और संघीय अधिकारियों को निशाना बनाते हैं। उनकी कोशिश कथानक को प्रभावित करने और चीन में बाहरी प्रभाव को रोकने पर केंद्रित होती है।

चीन नियमित रूप से अपने नागरिकों और अन्य लोगों पर ऐसे आचरण के लिए दबाव बनाता है या उन्हें प्रेरित करने की कोशिश करता है जिनसे कि अमेरिका की राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा होता है और अमेरिका के शोध और विकास उपक्रमों की शैक्षिक स्वतंत्रता और अखंडता कमज़ोर पड़ती है। इन आचरणों में प्रौद्योगिकी और बौद्धिक संपदा को हड़पना, विदेशी सरकार के प्रायोजन वाली कंपनियों के साथ रिश्तों की जानकारी छुपाना, अनुबंध और गोपनीयता के उल्लंघन के साथ-साथ निष्पक्ष और प्रतिभा आधारित संघीय शोध और विकास फंडिंग की प्रक्रिया में जोड़-तोड़ शामिल हैं। चीन अपने नागरिकों को मजबूर करने की कोशिश करता है कि वे हमवतन चीनी छात्रों पर नज़र रखें और उन्हें धमकाएं, उन कार्यक्रमों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करें जो चीन की राजनीतिक विचारधारा के विरोध में किए जाते हैं और अन्य प्रकार से शैक्षिक स्वतंत्रता, जो अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था की विशेषता और मज़बूती है, को बाधित करें।

चीन की मीडिया कंपनियां, पत्रकार, शिक्षाविद और राजनयिक अमेरिका में काम करने को स्वतंत्र हैं, लेकिन चीन अपने यहां ऐसी अमेरिकी कंपनियों और अधिकारियों को काम करने से रोकता है। चीन की सरकार नियमित रूप से अमेरिकी अधिकारियों, चीन में अमेरिका के राजदूत समेत, को अमेरिकी विदेश मंत्रालय की मदद से चलने वाले अमेरिकी सांस्कृतिक केंद्रों में जाने से रोकती है, जो चीन के विश्वविद्यालयों में चीन के लोगों के साथ अमेरिकी संस्कृति को साझा करते हैं। चीन में काम करने वाले विदेशी रिपोर्टर्स अक्सर प्रताड़ना और धमकी का सामना करते हैं।

सुरक्षा चुनौतियां

चीन की बढती ताक़त का असर ये हुआ है कि अपने हितों के रास्ते में आने वाले कथित ख़तरों को समाप्त करने और वैश्विक स्तर पर अपने रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए सीसीपी की धमकाने और ज़ोर-ज़बरदस्ती करने की इच्छा और क्षमता भी बढ गयी है।

बीजिंग की कार्रवाइयों से चीनी नेताओं की यह घोषणा झूठी साबित हुई है कि वे बलप्रयोग की धमकी या उसके उपयोग का विरोध करते हैं, अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, और शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से विवादों को हल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। बीजिंग अपनी बयानबाज़ी के विपरीत आचरण करता है और अपने पड़ोसियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं की धज्जियां उड़ाता है, जब वह पीले सागर, पूर्व और दक्षिण चीन सागरों, ताइवान जलडमरूमध्य, और चीन-भारतीय सीमा क्षेत्रों में उकसाने वाली और आक्रामक सैन्य और अर्धसैनिक गतिविधियों में शामिल होता है।

मई 2019 में रक्षा विभाग ने कांग्रेस को अपनी वार्षिक रिपोर्ट – चीन से जुडे सैन्य और सुरक्षा घटनाक्रम – सौंपी थी जिसमें चीन के सैन्य-तकनीकी विकास के वर्तमान और भविष्य के अनुमानों का आकलन, सुरक्षा और सैन्य रणनीतियां, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की संगठनात्मक और ऑपरेशनल अवधारणाएं शामिल थीं। जुलाई 2019 में, चीन के रक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ओबीओआर, चीन द्वारा पीएलए की विदेशों में उपस्थिति के महत्वाकांक्षी विस्तार से जुड़ा हुआ है, जिसमें प्रशांत द्वीप समूह और कैरीबियन जैसे इलाक़े शामिल हैं।

बीजिंग की सैन्य तैयारियां अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों की राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए ख़तरा हैं, और वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए जटिल चुनौतियां पेश करती हैं।

बीजिंग की सैन्य-असैन्य संलयन (एमसीएफ) रणनीति पीएलए को उन्नत प्रौद्योगिकियों को विकसित और हासिल करने वाली असैन्य संस्थाओं तक अबाध पहुंच प्रदान करती है। इनमें राज्य के स्वामित्व वाली और निजी कंपनियां, विश्वविद्यालय और अनुसंधान कार्यक्रम शामिल हैं। ग़ैर-पारदर्शी एमसीएफ कड़ियों के माध्यम से, अमेरिका और अन्य देशों की कंपनियां अनजाने में चीनी सैन्य अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों को दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकी उपलब्ध करा रही हैं, जिससे घरेलू विरोध को दबाने तथा अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों समेत अन्य देशों को धमकाने की सीसीपी की क्षमता और मज़बूत हो रही है।

अनुचित तरीकों से वैश्विक सूचना और संचार प्रौद्योगिकी उद्योग पर हावी होने के चीन के प्रयास,  चीन राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा क़ानून जैसे भेदभावपूर्ण नियमों में परिलक्षित होते है, जिसके लिए कंपनियों को चीनी डेटा स्थानीयकरण नियमों का पालन करना पड़ता है जो विदेशी डेटा पर सीसीपी की पकड़ को संभव बनाता है। अन्य चीनी क़ानून,  हुवावे और ज़ीटीई जैसी कंपनियों को चीनी सुरक्षा सेवाओं के साथ सहयोग करने के लिए मजबूर करते हैं,  भले ही वे विदेशों में व्यापार कर रही हों। इससे चीनी विक्रेताओं के उपकरण और सेवाओं का उपयोग कर रहे देशों तथा उधोगों के लिए सुरक्षा जोख़िम पैदा होते हैं।

बीजिंग ने उन चीनी नागरिकों के लिए समय पर और सुसंगत तरीके से यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने की अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान नहीं किया जिन्हें अमेरिका छोडने के आदेश दिए गए थे, जिससे चीन ने हमारे देश से उनके निष्कासन को प्रभावी तरीके से रोक कर अमेरिकी समुदायों के लिए सुरक्षा जोख़िम पैदा कर दिया। इसके अलावा, चीन द्वारा हमारी द्विपक्षीय कांसुलर संधि के उल्लंघन से चीन में अमेरिका के नागरिकों के लिए ख़तरा बन जाता है। कई अमेरिकियों को देश छोडने पर चीन सरकार के प्रतिबंध और ग़लत तरीके से हिरासत में लिए जाने के कारण परेशानी उठानी पडती है।

प्रस्ताव

एनएसएस की मांग है कि अमेरिका “पिछले दो दशकों की नीतियों पर पुनर्विचार करें – जोकि इस धारणा पर आधारित हैं कि प्रतिद्वंद्वियों के साथ जुड़ाव और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और वैश्विक वाणिज्य में उनका समावेश उन्हें सौम्य किरदारों और भरोसेमंद साझेदारों में बदल देगा। अधिकांशत: यह धारणा ग़लत निकली। प्रतिद्वंद्वी किरदार लोकतंत्र को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार और अन्य साधनों का उपयोग करते हैं। वे पश्चिम-विरोधी विचारों को आगे बढ़ाते हैं और हमारे, हमारे सहयोगियों और हमारे साझेदारों में विभाजन पैदा करने के लिए ग़लत सूचनाएं फैलाते हैं।”

सिद्धांतवादी यथार्थवाद की ओर लौटते हुए, अमेरिका सीसीपी की सीधी चुनौती का जवाब देते हुए स्वीकार करता है कि हम एक सामरिक प्रतिस्पर्धा में हैं और अपने हितों की उचित रूप से रक्षा कर रहे हैं। चीन के लिए अमेरिका के दृष्टिकोण के सिद्धांतों को एनएसएस और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए हमारी नीति – संप्रभुता, स्वतंत्रता, खुलापन, क़ानून के शासन, निष्पक्षता और पारस्परिकता, दोनों ही में व्यक्त किया गया है। अमेरीकी-चीन संबंध हमारी हिंद-प्रशांत रणनीति का निर्धारण नहीं करते हैं, बल्कि ये उस रणनीति और अतिव्यापी एनएसएस के दायरे में आते हैं। उसी सिद्धांत के अनुरूप, चीन एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र की हमारी नीति के दायरे से बाहर नहीं है।

अमेरिका चीन सरकार को उन्हीं मानकों और सिद्धांतों पर रखता है जो दूसरे सभी देशों पर भी लागू होते हैं। हमारा मानना है कि चीन के लोग अपनी सरकार और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से यही व्यवहार चाहते हैं और उसे पाने के हक़दार भी हैं। चीन के नेतृत्व की रणनीतिक पसंद को देखते हुए,  अमेरिका अब चीन के साथ संबंधों को उसी रूप में मानता और स्वीकार करता है जैसा सीसीपी ने हमेशा आंतरिक रूप से माना है: महान शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा का संबंध।

चीन के घरेलू शासन मॉडल को बदलने का प्रयास अमेरिकी नीतियों का आधार नहीं है, और न ही इन नीतियों में सीसीपी के असाधारण होने और पीडित होने के कथानकों को जगह दी गई है। बल्कि, अमेरिका की नीतियां हमारे हितों की रक्षा और हमारे संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए तैयार की गयी हैं जिससे सीसीपी के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार और चीन के आंतरिक शासन की समस्याओं से संबद्ध नुक़सान का सामना किया जा सके। क्या चीन अंतत: स्वतंत्र और खुले आदेश के सिद्धांतों को अपनाता है, यह केवल चीनी लोग ही निर्धारित कर सकते हैं। हम मानते हैं कि चीन सरकार के कार्यों की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही चीन की है, वाशिंगटन की नहीं।

अमेरिका क़ानून के शासन और क़नून द्वारा शासन; आतंकवाद और उत्पीड़न; प्रतिनिधि शासन और निरंकुशता; और बाज़ार आधारित प्रतियोगिता और राज्य-निर्देशित मुनाफ़ाखोरी के बीच के बीच झूठी समकक्षता के सीसीपी के प्रयासों को खारिज करता है। अमेरिका, बीजिंग के दुष्प्रचार और झूठे बयानों को चुनौती देता रहेगा जो सच्चाई को विकृत करते हैं और अमेरिकी मूल्यों एवं आदर्शों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं।

इसी तरह, अमेरिका, बीजिंग के उन क़दमों को समायोजित नहीं करेगा, जो एक मुक्त, खुली और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमज़ोर करते हैं। हम सीसीपी के उस कथानक का खंडन करना जारी रखेंगे कि अमेरिका सामरिक रूप से पीछे हट रहा है या हम हमारी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को छोड रहे हैं। अमेरिका अपने सहयोगी देशों के मज़बूत नेटवर्क और समान विचारधारा वाले साझेदारों के साथ अपने साझा मानदंडों और मूल्यों पर हो रहे हमलों का विरोध करने के लिए काम करेगा- अपने शासकीय संस्थानों के भीतर, दुनिया भर में और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में।

चीन के विकास में अमेरिकी लोगों का उदार योगदान एक ऐतिहासिक तथ्य है – जिस तरह सुधार और खुलेपन के युग में चीनी लोगों की उल्लेखनीय उपलब्धियां निर्विवाद हैं। हालांकि, बीजिंग की नीतियों और प्रथाओं की नकारात्मक प्रवृत्तियों से चीनी लोगों की विरासत और दुनिया में उनके भावी स्थिति को ख़तरा है।

बीजिंग ने बार-बार यह प्रदर्शित किया है कि वह सद्भावना के अमेरिकी प्रदर्शनों के जवाब में समझौते की पेशकश नहीं करेगा, और उसके कार्य हमारे हितों का सम्मान करने की उसकी पूर्व प्रतिबद्धताओं से नहीं बंधे हैं। इसीलिए, अमेरिका चीन की घोषित प्रतिबद्धताओं के बजाय उसके कदमों का ही जवाब देता है। साथ ही, हम बातचीत के लिए उचित ‘वातावरण’ या ‘स्थिति’ बनाने की बीजिंग की मांगों से भी बंधे नहीं हैं।

इसी तरह, अमेरिका प्रतीकात्मकता या दिखावे के लिए बीजिंग के साथ संवाद करने को महत्व नहीं देता है; हम इसके बजाय ठोस परिणाम और रचनात्मक नतीजों की मांग करते हैं। हम बीजिंग के आदान-प्रदान वाले दृष्टिकोण के अनुरूप उसे समयबद्ध प्रोत्साहन और क़ीमत, या वास्तविक खतरे के रूप में उपयुक्त जवाब देते हैं। शांतिपूर्ण कूटनीति के निरर्थक साबित होने पर अमेरिका चीन सरकार पर सार्वजनिक दबाव बढ़ाएगा और आवश्यक होने पर आनुपातिक लागत का लाभ उठाकर अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए कार्रवाई करेगा।

चीन सरकार कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं पर खरी नहीं उतरी है जिनमें शामिल हैं- व्यापार और निवेश; अभिव्यक्ति और आस्था की स्वतंत्रता; राजनीतिक हस्तक्षेप; नौवहन और वायु मार्ग के इस्तेमाल की स्वतंत्रता; साइबर और अन्य प्रकार की जासूसी और चोरी; हथियारों का प्रसार; पर्यावरण संरक्षण; और वैश्विक स्वास्थ्य। बीजिंग के साथ समझौतों में सत्यापन और प्रवर्तन के कड़े प्रावधान शामिल होने चाहिए।

हम चीनी लोगों के साथ स्पष्ट बातें करते हैं और चीन नेताओं से ईमानदारी की उम्मीद करते हैं। कूटनीति के मामलों में, अमेरिका सीसीपी के झूठे या अस्पष्ट खतरों के जवाब में उचित प्रतिक्रिया देता है, और दबाव का विरोध करने के लिए अपने सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ खड़ा है। अपने निरंतर और स्पष्ट जुड़ाव के माध्यम से, अमेरिका विश्व की शांति, स्थिरता और समृद्धि को लाभ पहुंचाने वाले साझा उद्देश्यों की दिशा में विस्तार और काम करने के लिए चीन के सहयोग का स्वागत करता है। हमारा दृष्टिकोण चीन को बाहर नहीं रखता है। अमेरिका चीन के सकारात्मक योगदान का स्वागत करने के लिए तैयार है।

जैसा कि हमारे दृष्टिकोण के उपरोक्त सिद्धांतों से स्पष्ट है, प्रतियोगिता में आवश्यक रूप से चीन के साथ जुड़ाव शामिल है, लेकिन हमारा संपर्क चयनात्मक और परिणामोन्मुख, हमारे राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए है। हमारी चीन के साथ संलग्नता बातचीत करने तथा निष्पक्षता एवं पारस्परिकता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धताओं को लागू करवाने; ग़लतफ़हमियों से बचने के लिए बीजिंग के इरादे स्पष्ट करने; और तनाव में वृद्धि रोकने के वास्ते विवादों को हल करने के लिए है। अमेरिका जोख़िम को कम करने और संकटों का प्रबंधन करने के लिए चीन के साथ संवाद के माध्यम खुले रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हम उम्मीद करते हैं कि चीन भी इन माध्यमों को खुला और सक्रिय रखेगा।

कार्यान्वयन

राष्ट्रपति की एनएसएस के अनुसार, इस रिपोर्ट में उल्लिखित राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा नीतियां का उद्देश्य अमेरिकी लोगों और होमलैंड की रक्षा करना, अमेरिकी समृद्धि को बढ़ावा देना, शक्ति के माध्यम से शांति बनाए रखना और विदेश में मुक्त एवं खुले दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना है। प्रशासन के पहले 3 वर्षों के दौरान, अमेरिका ने इस रणनीति को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम उठाए हैं जैसा कि यह चीन पर लागू होता है।

अमेरिकी जनता, होमलैंड और अमेरिकी जीवन शैली की रक्षा

अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) की चीन पहल और संघीय जांच ब्यूरो व्यायवसायिक जानकारियों की चोरी, हैकिंग और आर्थिक जासूसी की पहचान करने और मुक़दमा चलाने; और अमेरिकी बुनियादी ढांचे में दुर्भावनापूर्ण निवेश, सप्लाई चेन के ख़तरों और अमेरिकी नीति को प्रभावित करने के विदेश एजेंटों के प्रयासों के खिलाफ़ कार्रवाइयों पर अपने संसाधनों को केंद्रित कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, डीओजे ने चीन की सरकारी मीडिया कंपनी सीजीटीएन-अमेरिका को विदेशी एजेंट पंजीयन अधिनियम (एफ़एआरए) के तहत पंजीकृत होने के उसके दायित्व के बारे में सूचित किया, जिसके तहत पंजीकृत इकाई को संघीय अधिकारियों को अपनी गतिविधियों के बारे में जानकारी देनी होती है और उनके द्वारा वितरित सूचना सामग्री की तदनुसार पहचान ज़ाहिर करनी होती है। इसके बाद सीजीटीएन-अमेरिका ने खुद को एफ़एआरए के तहत पंजीकृत कराया।

अमेरिकी प्रशासन भी अमेरिका में सीसीपी को दुष्प्रचार का जवाब दे रहा है, जिसमें दुर्भावनापूर्ण व्यवहार को उजागर किया जाता है, झूठे कथानकों का मुक़ाबला किया जाता है, और उन्हें पारदर्शिता के लिए बाध्य किया जाता है। अमेरिका के अधिकारी, जिनमें व्हाइट हाउस तथा विदेश, रक्षा और न्याय विभाग के अधिकारी शामिल हैं, अमेरिकी जनता को चीन द्वारा हमारे स्वतंत्र और खुले समाज का फ़ायदा उठाकर अमेरिकी हितों और मूल्यों को नुक़सान पहुंचाने के सीसीपी के एजेंडा चलाने के बारे में अमेरिकी जनता को शिक्षित करने के प्रयासों का नेतृत्व कर रहे हैं। पहुंच संबंधी पारस्परिकता सुनिश्चित करने के प्रयासों के तहत विदेश विभाग ने एक नीति लागू की है जिसमें चीनी राजनयिकों पर सरकारी और स्थानीय निकायों के अधिकारियों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ बैठक करने से पहले अमेरिका सरकार को सूचित करने की बाध्यता है।

प्रशासन पारंपरिक जासूसी और प्रभाव फैलाने के प्रयासों से परे, चीन द्वारा अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में मौजूद अपने नागरिकों और अन्य लोगों को सहभागी बनाने और दबाव डालने के प्रयासों का सक्रियता से मुक़ाबला कर रहा है और इस बारे में जागरूकता बढ़ा रहा है। हम अमेरिकी कैंपसों में चीनी छात्रों के अधिकारों की रक्षा के लिए विश्वविद्यालयों के साथ काम कर रहे हैं, सीसीपी के दुष्प्रचार और झूठी सूचनाओं का मुक़ाबला करने के लिए जानकारी प्रदान कर रहे हैं, और एक अमेरिकी शैक्षणिक वातावरण में नैतिक आचार संहिता की समझ सुनिश्चित कर रहे हैं।

चीनी छात्र आज अमेरिका में विदेशी छात्रों के सबसे बड़े समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमेरिका चीनी छात्रों और शोधकर्ताओं के योगदान को महत्व देता है। 2019 तक, अमेरिका में चीनी छात्रों और शोधकर्ताओं की संख्या एक सर्वकालिक ऊंचे स्तर तक पर पहुंच चुकी थी, जबकि छात्र वीजा के लिए चीनी आवेदनों की अस्वीकृति की संख्या में लगातार कम हुई है। अमेरिका खुले अकादमिक संवाद के सिद्धांतों का दृढ़ता से समर्थन करता है और वैध शैक्षिक गतिविधियों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं का स्वागत करता है; हम छोटी संख्या में मौजूद उन चीनी आवेदकों का पता लगाने के लिए प्रक्रियाओं में सुधार कर रहे हैं जोकि झूठे बहानों या ग़लत इरादे से अमेरिका में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं।

अमेरिका के अनुसंधान समुदाय में, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान और ऊर्जा विभाग जैसी संघीय एजेंसियों ने आचरण और रिपोर्टिंग के लागू मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने, पारदर्शिता बढ़ाने और हितों के टकराव को रोकने के वास्ते नियमों और प्रक्रियाओं को अद्यतन या स्पष्ट किया है। अनुसंधान पर्यावरण पर राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद की अनुसंधान वातावरण संबंधी संयुक्त समिति संघीय वित्तपोषित अनुसंधान के लिए मानकों, और अमेरिकी अनुसंधान संस्थानों के लिए सर्वोत्तम तौर-तरीक़ों का विकास कर रही है। रक्षा विभाग विदेशी शोधकर्ताओं का स्वागत करना जारी रखते हुए यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है कि अनुदान पाने वालों के पास चीन के प्रतिभा भर्ती कार्यक्रमों के साथ भी अनुबंध न हों।

विदेशी दुर्भावनापूर्ण किरदारों के अमेरिकी सूचना तंत्र में प्रवेश रोकने के लिए राष्ट्रपति ने ‘सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी और सेवा सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए कार्यकारी आदेश’ और ‘ अमेरिकी दूरसंचार सेवा सेक्टर में विदेशी भागीदारी के आकलन हेतु कमिटी गठित करने के लिए कार्यकारी आदेश’ जारी किए हैं। इन कार्यकारी आदेशों के कार्यान्वयन से विदेशी शत्रुओं के खुफ़िया एवं सुरक्षा तंत्र से जुड़ीं या उनके लिए कार्यरत कतिपय कंपनियों को, उदाहरण के लिए, अमेरिकी सरकार, अमेरिकी निजी सेक्टर और अमेरिकी नागरिकों के निजी और संवेदनशील सूचनाओं तक पहुंच हासिल करने से रोका जा सकेगा।दुनिया भर में, संवेदनशील सैन्य और खुफ़िया डेटा सहित हमारी जानकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते वैश्विक सूचना अर्थव्यवस्था की बुनियाद तैयार करने के लिए अमेरिका सुरक्षित, ठोस, और विश्वसनीय संचार प्लेटफार्मों हेतु साझा मानकों की एक व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए अपने सहयोगियों और भागीदारों के साथ, बहुपक्षीय मंचों सहित, सक्रिय विचार-विमर्श में संलग्न है। चीन को ज़िम्मेदार राष्ट्रों के व्यवहार के मानदंडों के अनुपालन हेतु बाध्य करने के लिए, अमेरिका सहयोगियों और समान विचारधारा वाले भागीदारों के साथ काम कर रहा है ताकि दुर्भावनापूर्ण साइबर गतिविधियों की पहचान की जा सके और उन्हें रोका जा सके।

प्रशासन अमेरिका में विदेशी निवेश संबंधी कमेटी (सीएफ़आईयूएस) की क्षमता को अद्यतन और मज़बूत करने के लिए विदेशी निवेश जोख़िम समीक्षा आधुनिकीकरण अधिनियम को कार्यान्वित कर रहा है ताकि अभी तक सीएफ़आईयूएस के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहे निवेश ढांचों के विदेशियों द्वारा ग़लत इस्तेमाल को लेकर बढ़ती सुरक्षा चिंताओं से निपटा जा सके। इसमें चीनी कंपनियों द्वारा चीनी सेना के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से अल्पमत निवेश के सहारे अमेरिकी अन्वेषणों की जानकारी हासिल करने के प्रयासों को रोकना भी शामिल है। ख़ासकर चीन की सर्वव्यापी एमसीएफ रणनीति तथा हाइपरसोनिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी और अन्य उभरती और बुनियादी तकनीकों से संबंधित उन्नत प्रौद्योगिकियों को प्राप्त करने के उसके प्रयासों के मद्देनज़र अमेरिका ने अपने निर्यात नियंत्रण नियमों को भी अपडेट किया है। हम सहयोगी राष्ट्रों और साझेदारों को अपने स्वयं के विदेशी निवेश स्क्रीनिंग तंत्र विकसित करने, तथा बहुपक्षीय समझौतों और अन्य मंचों के माध्यम से निर्यात नियंत्रण प्रणाली को अद्यतन करने और मिलकर कार्यान्वित करने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं।

अमेरिका सरकार भी अमेरिकी उपभोक्ता को नकली और घटिया उत्पादों से बचाने के लिए ठोस कदम उठा रही है। 2017 और 2018 के बीच, अमेरिका के होमलैंड सुरक्षा विभाग ने चीन में उत्पादित नकली सामग्रियों की 59,000 से भी अधिक खेप ज़ब्त किए, जिनकी क़ीमत 2.1 बिलियन डॉलर से अधिक थी। यह संयुक्त रूप से अन्य सभी अन्य देशों की ज़ब्त कुल खेपों और उनकी क़ीमत से पांच गुना अधिक है।

नकली ब्रांडेड परिधान, जूते, हैंडबैग और घड़ियों के अलावा, अमेरिकी सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा एजेंसी ने तीन ऐसी खेपों को भी रोका जिनमें बंदूकों के लिए चीन निर्मित 53,000 अवैध पुर्जे और इलेक्ट्रॉनिक्स सामग्री शामिल थे, जो अमेरिकी व्यवसायों और उपभोक्ताओं की सुरक्षा और गोपनीयता को संकट में डाल सकते थे। अमेरिका की क़ानून प्रवर्तन एजेंसियां भी चीन से आयातित नकली दवाइयों और सौंदर्य प्रसाधनों को लक्षित कर रही हैं, जिनमें बैक्टीरिया और पशु अपशिष्ट समेत दूषित पदार्थों की उच्च मात्रा होने की बात सामने आई है, जो अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ख़तरा पैदा करते हैं।

अमेरिका चीन से अवैध रूप से आ रहे चीनी फ़ेंटानिल के घातक प्रवाह को रोकने के लिए चीनी अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। दिसंबर 2018 में, राष्ट्रपति ने चीन में सभी प्रकार के फ़ेंटानिल को नियंत्रित करने हेतु अपने चीनी समकक्ष की वचनबद्धता हासिल की थी। इस संबंध में मई 2019 में चीनी नियामक व्यवस्था स्थापित होने के बाद से, अमेरिका और चीन की क़ानून प्रवर्तन एजेंसियां खुफ़िया जानकारी साझा कर रही हैं और प्रवर्तन की कार्रवाइयों हेतु वातावरण निर्मित करने के लिए समन्वय कर रही हैं ताकि चीनी ड्रग्स उत्पादकों और तस्करों को रोका जा सके। क़ानून प्रवर्तन के उद्देश्यों के लिए छोटे पार्सलों की ट्रैकिंग में सुधार के वास्ते अमेरिका चीन की डाक एजेंसियों के साथ भी काम कर रहा है।

अमेरिकी समृद्धि को बढ़ावा

चीन के प्रमाणित अनुचित एवं ग़लत व्यापार प्रथाओं और औद्योगिक नीतियों के मद्देनज़र प्रशासन अमेरिकी व्यवसायों, श्रमिकों और किसानों की रक्षा करने, तथा अमेरिकी निर्माण आधार को कमज़ोर बनाने वाले चीनी तौर-तरीक़ों को समाप्त करने के लिए कड़ी कार्रवाई कर रहा है। अमेरिका-चीन आर्थिक संबंधों में फिर से संतुलन लाने के लिए अमेरिका प्रतिबद्ध है। सकल सरकार का हमारा दृष्टिकोण निष्पक्ष व्यापार का समर्थन और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को सुदृढ़ करता है,  अमेरिका के निर्यात को बढ़ावा देता है, और अमेरिकी व्यापार और निवेश के लिए अन्यायपूर्ण अवरोधों को तोड़ता है। नियमित, उच्च-स्तरीय संवादों के माध्यम से 2003 से ही चीन को उसकी आर्थिक प्रतिबद्धताओं के अनुपालन पर राज़ी करने में विफल होने के बाद, अमेरिका चीन से अमेरिका आयादित माल पर सीमा शुल्क के रूप में क़ीमत वसूलकर उसके द्वारा बाज़ार विकृत करने वाले उसके ज़बरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा प्रथाओं का सामना कर रहा है। अमेरिका और चीन के बीच द्वितीय चरण के निष्पक्ष व्यापार सौदे पर सहमति बनने तक ये शुल्क लागू रहेंगे।

चीन के बाज़ार को विकृत करने वाली अपनी रियायतों और अतिउत्पादन को कम करने या समाप्त करने में बार-बार विफल रहने के बाद, अमेरिका ने हमारे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस्पात और एल्यूमीनियम उद्योगों की रक्षा के लिए सीमा शुल्क थोपे हैं। उन अनुचित चीनी व्यापार प्रथाओं के लिए जोकि विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान व्यवस्था के अधीन हैं, अमेरिका मामले को निरंतर उठा रहा है और विभिन्न विवादों में जीत हासिल कर चुका है। अंत में, उद्योगों के एक व्यापक दायरे में चीन की डंपिंग और सब्सिडी व्यवस्था पर चोट करने के लिए, वाणिज्य विभाग अमेरिका के डंपिंग विरोधी और बराबर मात्रा में शुल्क लगाने संबंधी क़ानूनों का पिछले प्रशासनों की तुलना में कहीं अधिक इस्तेमाल कर रहा है।

जनवरी 2020 में अमेरिका और चीन ने पहले चरण के आर्थिक एवं व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत अमेरिका की कई दीर्घकालिक चिंताओं को दूर करने की दिशा में चीन को अपनी आर्थिक एवं व्यापारिक प्रणालियों में संरचनात्म सुधार और अन्य कई बदलाव करने हैं। यह समझौता चीन में व्यवसाय करने के लिए विदेशी कंपनियों को बाध्य करने या उन पर दबाव डालने से चीन को रोकता है; चीन में प्रमुख क्षेत्रों में बौद्धिक संपदा अधिकारं के संरक्षण और प्रवर्तन को मज़बूत करता है; नीतिगत अवरोधों को हटाकर अमेरिकी कृषि और वित्तीय सेवाओं के लिए चीन के बाज़ार में नए अवसर उपलब्ध कराता है; और लंबे समय से जारी मुद्रा संबंधी अवैध प्रथाओं की समस्या से निपटता है। समझौता त्वरित और प्रभावी कार्यान्वयन और प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए एक मज़बूत विवाद समाधान तंत्र भी स्थापित करता है। व्यापार की संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने और प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह से प्रवर्तनीय बनाने के कारण, पहले चरण के समझौते से चीन को अमेरिकी निर्यात का विस्तार होगा। इस समझौते के तहत चीन ने अगले 2 वर्षों के दौरान चार व्यापक श्रेणियों – निर्मित वस्तु, कृषि, ऊर्जा और सेवा क्षेत्र – में कम-से-कम 200 बिलियन डॉलर के बराबर अमेरिकी आयात बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। यह समझौता अधिक संतुलित व्यापार संबंधों तथा अमेरिकी श्रमिकों और कंपनियों के लिए अधिक बराबरी की प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने की दिशा में  हुई महत्वपूर्ण प्रगति का प्रतीक है।

जहां तक स्वदेश की बात है, तो प्रशासन ने कर सुधारों और एक ठोस विनियमन एजेंडे के ज़रिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने और 5जी प्रौद्योगिकी जैसे भविष्य के आर्थिक सेक्टरों को बढ़ावा देने के लिए क़दम उठाए हैं। राष्ट्रपति का ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अमेरिका की शीर्ष भूमिका को बनाए रखने हेतु कार्यकारी आदेश’ निवेश और सहयोग को बढ़ावा देने की अमेरिका सरकार की पहल का एक उदाहरण है, जो ये सुनिश्चित करता है कि अमेरिका एक उभरते उद्योग के लिए नवाचारों और मानकों की स्थापना का काम जारी रखे।

समान विचारधारा के अन्य राष्ट्रों के साथ, अमेरिका संप्रभुता, मुक्त बाजारों और सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित आर्थिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है। यूरोपीय संघ और जापान के साथ, अमेरिका के स्वामित्व वाले उद्यमों, औद्योगिक सब्सिडी और मज़बूरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के विषयों पर नियमों के विकास के लिए एक मज़बूत त्रिपक्षीय प्रक्रिया में लगा हुआ है। हम यह भी सुनिश्चित करने के लिए अपने सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ काम करना जारी रखेंगे कि भेदभावपूर्ण औद्योगिक मानक वैश्विक मानक न बनें। दुनिया के सबसे मूल्यवान उपभोक्ता बाज़ार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सबसे बड़े स्रोत, और वैश्विक तकनीकी नवाचार के अग्रणी स्रोत के रूप में अमेरिका सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ साझा चुनौतियों का मूल्यांकन करने और निरंतर शांति एवं समृद्धि सुनिश्चित करने के प्रभावी उपायों का समन्वय करने के लिए व्यापक विचार-विमर्श में संलग्न है। हम प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने के लिए अमेरिकी कंपनियों के साथ स्वदेश और विदेश में कार्य करते हैं, साथ ही प्रोस्पर अफ़्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरीबियन में अमेरिका क्रेस तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऊर्जा के माध्यम से समृद्धि और विकास जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए टिकाऊ विकास को बढ़ावा देते हैं।

शक्ति के सहारे शांति की रक्षा

2018 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति (एनडीएस) चीन के साथ दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देती है और पीएलए की तकनीकी प्रगति, शक्ति में वृद्धि और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति और आक्रामकता का मुक़ाबला करने के लिए आधुनिकीकरण और साझेदारी पर जोर देती है। जैसा कि परमाणु रुख़ की समीक्षा में वर्णित है, प्रशासन परमाणु त्रयी के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे रहा है, जिसमें बीजिंग को विनाश के हथियारों का उपयोग करने या अन्य रणनीतिक हमलों का संचालन करने से रोकने पर केंद्रित पूरक क्षमताओं का विकास शामिल है। इस बीच, अमेरिका चीन के नेताओं को निरंतर वार्ताओं के लिए प्रेरित कर रहा है कि वह आधुनिक और बढ़ते परमाणु क्षमताओं और मध्यम दूरी की मिसाइलों के सबसे बड़े संग्राहक परमाणु शक्ति के रूप में हथियार नियंत्रण और सामरिक जोख़िम कम करने संबंधी चर्चाओं में भाग ले। अमेरिका का मानना है कि बीजिंग का पारदर्शिता बढ़ाना, ग़लतफहमियों से बचना और महंगे हथियारों के भंडार बनाने से परहेज़ करना सभी राष्ट्रों के हित में है।

रक्षा विभाग हाइपरसोनिक प्लेटफार्मों को तैनात करने, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं में निवेश बढ़ाने, तथा लचीले, अनुकूलक और किफ़ायती प्लेटफार्मों पर आधारित अधिक घातक मारक क्षमता विकसित करने पर तेज़ी से काम कर रहा है। सामूहिक रूप से इन क्षमताओं का उद्देश्य बीजिंग की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं तथा तकनीकी समानता और श्रेष्ठता के लिए पीएलए के प्रयासों को रोकना और उनका मुक़ाबला करना है।

अपनी विश्वव्यापी नौवहन संचालन की स्वतंत्रता कार्यक्रम के तहत अमेरिका चीन के प्रभुत्ववादी घोषणाओं और मनमाने दावों विरोध कर रहा है। अमेरिका की सेना दक्षिण चीन सागर समेत जहां भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून अनुमति देता है, वहां नौवहन और सक्रियता के अधिकार का उपयोग करना जारी रखेगा। हम क्षेत्र के सहयोगी देशों और साझेदारों की चिंताओं को स्वर दे रहे हैं, और विवादों में अपनी सेना, अर्धसैनिक बलों और कानून प्रवर्तन बलों का उपयोग कर दबाव डालने और हावी होने के प्रयासों के खिलाफ़ क्षमताओं के निर्माण में मदद करने के लिए उन्हें सुरक्षा सहायता प्रदान कर रहे हैं। 2018 में, दक्षिण चीन सागर में मानव निर्मित स्थलों पर बीजिंग द्वारा उन्नत मिसाइल प्रणालियों की तैनाती के कारण अमेरिकी सेना ने द्विवार्षिक रिम ऑफ़ पैसिफ़िक सैनिक अभ्यास में भाग लेने के लिए पीएलए से निमंत्रण वापस ले लिया था।

मज़बूत गठजोड़ और साझेदारी एनडीएस की आधारशिला हैं। अमेरिका साझेदारों की क्षमताओं को विकसित कर रहा है और चीन की आक्रामकता को रोकने और निरस्त करने के वास्ते सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ पूर्णतया एकीकृत संघर्ष सक्षम विश्वसनीय अग्रिम ऑपरेटिंग उपस्थिति विकसित करने के लिए परस्पर संचालनीय संबंधों  को गहरा कर रहा है। प्रशासन की परंपरागत शस्त्र स्थानांतरण नीति का उद्देश्य अमेरिका की हथियारों की बिक्री को बढ़ावा देना तथा सामरिक और अन्योन्याश्रित रूप में साझेदारों की सैन्य क्षमताओं के विकास में तेजी लाना है। जून 2019 में, रक्षा विभाग ने अपनी पहली हिंद-प्रशांत सामरिक रिपोर्ट जारी की, जिसमें विभाग द्वारा एनडीएस के कार्यान्वयन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए हमारी सकल-सरकार वाली रणनीति को स्पष्ट किया गया है।

अमेरिका ताइवान संबंध अधिनियम और तीन अमेरिका-चीन संयुक्त घोषणाओं पर आधारित अपनी ‘एक चीन’ नीति के अनुसार ताइवान के साथ मजबूत अनौपचारिक संबंध बनाए रखना जारी रखेगा। अमेरिका का कहना है कि चीन-ताइवान मतभेदों का कोई भी समाधान शांतिपूर्ण, दोनों पक्षों के लोगों की इच्छा के अनुसार और धमकियों या दबाव का सहारा लिए बिना होना चाहिए। घोषणाओं के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने में बीजिंग की विफलता, जोकि उसके बड़े पैमाने पर सैन्य तैयारियों से ज़ाहिर है, अमेरिका को आत्मरक्षा की विश्वसनीय क्षमता  बनाए रखने में ताइवान की सेना की सहायता करते रहने के लिए मजबूर करता है, जो आक्रामकता को रोकती है और क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करती है। 1982 के एक ज्ञापन में, राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ज़ोर देकर कहा था कि “ताइवान को प्रदत्त हथियारों की मात्रा और गुणवत्ता ताइवान को चीन से ख़तरे के पूर्णतया अनुरूप हो।” 2019 में, अमेरिका ने ताइवान को 10 बिलियन से डॉलर से अधिक के हथियारों की बिक्री मंज़ूरी दी।

अमेरिका चीन के साथ रचनात्मक और परिणामोन्मुख संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिका सामरिक इरादों संबंधी संवाद; संकट के निवारण और प्रबंधन; संघर्ष के रूप में विकसित होने की आशंका वाले ग़लत आकलनों और ग़लतफ़हमियों के जोख़िम को कम करने; और साझा हितों वाले क्षेत्रों में सहयोग के लिए चीन के साथ रक्षा संपर्क और आदान-प्रदान करता है। अमेरिकी सेना अनपेक्षित परिदृश्यों में तनाव को कम करने वाले माध्यमों के विकास समेत प्रभावी संकट संचार तंत्र विकसित करने के लिए  पीएलए के साथ  मिलकर काम कर रही है।

अमेरिकी प्रभाव का प्रसार

पिछले सात दशकों के दौरान, एक मुक्त और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ने संप्रभु, स्वतंत्र राज्यों को फलने-फूलने और अभूतपूर्व वैश्विक आर्थिक विकास में योगदान करने हेतु स्थिरता प्रदान की है। एक बड़े विकसित देश और इस व्यवस्था के एक प्रमुख लाभार्थी के रूप में, चीन को दुनिया भर के अन्य देशों को स्वतंत्रता और खुलेपन की गारंटी देनी चाहिए। जब चीन इसके बजाय निरंकुश सत्तावाद, आत्म-सेंसरशिप, भ्रष्टाचार, मुनाफ़े के अर्थशास्त्र, तथा जातीय एवं धार्मिक विविधता के प्रति असहिष्णुता को बढ़ावा देता है, तो अमेरिका इन कुत्सित गतिविधियों का विरोध करने और मुकाबला करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का नेतृत्व करता है।

2018 और 2019 में विदेश मंत्री ने धार्मिक स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए पहले दो मंत्रिस्तरीय बैठकों का आयोजन किया। सितंबर 2019 में संयुक्तराष्ट्र महासभा में धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए राष्ट्रपति के अभूतपूर्व वैश्विक आह्वान के साथ ही इन आयोजनों ने दुनिया भर में धार्मिक उत्पीड़न की समस्या पर विचार के लिए वैश्विक नेताओं को एकजुट किया। दोनों ही मंत्रिस्तरीय बैठकों के दौरान अमेरिका और साझेदार देशों ने संयुक्त बयान जारी कर चीन सरकार से उइगर और तुर्की मूल के अन्य मुसलमानों, तिब्बती बौद्धों, ईसाइयों और फ़ालुन गोंग के अनुयायियों के अधिकारों के सम्मान की मांग की। इन सभी को चीन में दमन और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। प्रत्येक व्यक्ति के बिना भय के उपासना करने के अधिकार की रक्षा के लिए फरवरी 2020 में विदेश विभाग ने 25 समान विचारधारा वाले साझेदारों के साथ मिलकर पहले अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता गठबंधन की स्थापना की। राष्ट्रपति ने 2019 की मंत्रिस्तरीय बैठक के दौरान चीनी असंतुष्टों और उत्तरजीवियों से मुलाक़ात की और उन्होंने संयुक्तराष्ट्र महासभा के दौरान चीन में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों के साथ मंच साझा किया। अमेरिका चीन में कार्यरत या चीन पर केंद्रित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्वतंत्र सिविल सोसायटी संगठनों की भी मदद कर रहा है।

अक्टूबर 2019 में न्यूयॉर्क में संयुक्तराष्ट्र में, अमेरिका ने समान विचारधारा वाले राष्ट्रों के साथ मिलकर शिनजियांग में चीन द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन और उसकी अन्य दमनकारी नीतियों की निंदा की, जिससे कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को ख़तरा है। आगे चलकर अमेरिका ने शिनजियांग में मानवाधिकारों के दुरुपयोग में शामिल चीन की चुनिंदा सरकारी एजेंसियों और निगरानी प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों को निर्यात रोकने के लिए क़दम उठाए और मानवाधिकारों पर बीजिंग की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन करने के लिए ज़िम्मेदार चीनी अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए अमेरिकी वीज़ा पर रोक लगा दी। अमेरिका ने शिनजियांग में ज़बरन श्रम के इस्तेमाल से उत्पादित चीनी वस्तुओं के आयात को रोकने लिए भी कार्रवाई शुरू कर दी है।

अमेरिका समान विचारधारा वाले सहयोगी राष्ट्रों और साझेदारों के साथ मिलकर चीन की सेना और इसकी प्रौद्योगिकी-सक्षम निरंकुश सत्तावाद के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी के उपयोग के खिलाफ़ एक सिद्धांतवादी रुख़ अपनाना जारी रखेगा। ऐसा करते हुए, हम उन नीतियों को लागू करेंगे जो तकनीकी परिवर्तनों तथा नागरिक और सैन्य उपयोगों को मिश्रित करने और कंपनियों को चीन की सुरक्षा और खुफ़िया सेवाओं का समर्थन करने के लिए मजबूर करने के चीन के प्रयासों के अनुरूप है।

ये प्रयास उन साझा मूल्यों और मानदंडों के लिए अमेरिका की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव के रूप में कार्य किया है। हालांकि अमेरिका को चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोई इच्छा नहीं है, लेकिन जब बीजिंग अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं और ज़िम्मेदारीपूर्ण व्यवहार से भटकता है, खासकर जब अमेरिका के हित दांव पर होते हैं, तो वैसी स्थिति में वाशिंगटन अपनी बात स्पष्टता से कहेगा। उदाहरण के लिए, हांगकांग के भविष्य में अमेरिका के महत्वपूर्ण हित हैं। हांगकांग में लगभग 85,000 अमेरिकी नागरिक और 1,300 से अधिक अमेरिकी व्यवसाय मौजूद हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री ने बार-बार बीजिंग से 1984 की चीनी-ब्रितानी संयुक्त घोषणा पत्र का सम्मान करने तथा हांगकांग की उच्च स्तर की स्वायत्तता, क़ानून के शासन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के सम्मान का आह्वान किया, जोकि हांगकांग को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त का सफल केंद्र बने रहने में सक्षम बनाते हैं।


अमेरिका हिंद-प्रशांत के राष्ट्र के रूप में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है जो मुक्त उद्यम और लोकतांत्रिक शासन को बढ़ावा देती है। नवंबर 2019 में, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया भर में निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले विकास के माध्यम से पारदर्शी और उच्च गुणवत्ता वाले बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के लिए ब्लू डॉट नेटवर्क शुरू किया, जिसके तहत अकेले हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर के प्रत्यक्ष निवेश का योगदान करेगा। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए हमारी सकल सरकार की रणनीति के कार्यान्वयन पर विदेश विभाग ने एक विस्तृत प्रगति रिपोर्ट जारी की है- ए फ़्री एंड ओपन इंडो-पैसिफ़िक: एडवांसिंग ए शेयर्ड विज़न।

निष्कर्ष

चीन के लिए प्रशासन का दृष्टिकोण एक मौलिक पुनर्मूल्यांकन को दर्शाता है कि अमेरिका दुनिया के सर्वाधिक आबादी वाले देश और दूसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के नेताओं को किस रूप में लेता है और जवाब देता है। अमेरिका हम दोनों की व्यवस्थाओं के बीच दीर्घकालिक सामरिक प्रतिस्पर्धा की बात को स्वीकार करता है। सकल सरकार के दृष्टिकोण और वापस सिद्धांतवादी यथार्थवाद द्वारा निर्देशित, जिसे कि एनएसएस में अभिव्यक्त किया गया है, अमेरिका सरकार अपने हितों की रक्षा करना और अमेरिकी प्रभाव को आगे बढ़ाना जारी रखेगी। साथ ही, जहां हमारे हित मिलते हैं वहां हम चीन के रचनात्मक, परिणामोन्मुखी जुड़ाव और सहयोग के लिए तैयार हैं। हम चीन को उसकी प्रतिबद्धताओं के अनुपालन की चुनौती देते हुए, उसके नेताओं के साथ सम्मानजनक पर सजग रूप से संपर्क जारी रख रहे हैं।

मूल सामग्री देखें: https://www.whitehouse.gov/wp-content/uploads/2020/05/U.S.-Strategic-Approach-to-The-Peoples-Republic-of-China-Report-5.20.20.pdf

यह अनुवाद एक शिष्टाचार के रूप में प्रदान किया गया है और केवल मूल अंग्रेजी स्रोत को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए। 

Sunday, October 27, 2019

ISIS प्रमुख अबू बक्र अल बगदादी शनिवार को मारा गया

दीपावली के मौके पर आई खबर:ट्रम्प ने किया ऐलान
वाशिंगटन: 27 अक्टूबर 2019: (पंजाब स्क्रीन//इंटरनेट):: 
फोटो:इंटरनेट से साभार 
उम्मीद थी कि वह लड़ता हुआ मौत को गले लगाएगा लेकिन उस ने आत्महत्या का रास्ता चुना। खुद को घिरा देख कर उसने खुद को उड़ा लिया।
इस्लामिक स्टेट का सरगना अबू बक्र अल बगदादी शनिवार को उत्तर-पश्चिमी सीरिया में अमेरिका के विशेष बलों के हमले में मारा गया। यह ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को किया। 

ट्रंप ने कहा कि "क्रूर" संगठन इस्लामिक स्टेट का सरगना और दुनिया का नंबर एक आतंकवादी बगदादी "कुत्ते और कायर की" मौत मारा गया। गौरतलब है कि जघन्य हत्यायों के मामले में इस क्रूर संगठन ने नए रेकार्ड बनाये थे। लड़कियों को बंदी बना कर उनकी योनि और गुदा में में गोलियां मारना जैसे हत्याकांडों की बाकायदा वीडियो भी जारी करता रहा यह संगठन। अनगिनत लोगों की बददुआएँ इस संगठन इस प्रमुख का पीछा कर रही थी। छोटे छोटे नाबालिग बच्चों के सर कलम कर देना, विरोधियों को बंदी बना कर उन्हें मुर्गे की तरह आग पर भूनना इस संगठन के लिए आम सी बात थी। बंदी को पिंजरे में दाल कर बाहर से आग लगाना भी ऊके हत्या के तरीकों में से एक था।  की खुद की मौत आई तो उसका हाल देखने लायक था। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस में संवाददाता सम्मेलन के दौरान बगदादी की मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि आईएस का सरगना अपने जीवन के अंतिम क्षणों में रोया, चीखा-चिल्लाया और फिर अपने तीन बच्चों की हत्या कर खुद को बम से उड़ा लिया।
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका के विशेष अभियान बलों ने रात के समय "साहसिक और जोखिम भरे अभियान’’ को शानदार ढंग से अंजाम दिया। यह एक ऐसा अंजाम था जिसकी इंतज़ार दुनिया में बहुत से लोगों को बहुत लम्बे अर्से से थी। 
राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने दुनिया के नंबर एक आतंकी सरगना को मार गिराया है। अबू बक्र अल बगदादी अब सचमुच  मर चुका है। उल्लेखनीय है कि उसकी मौत की खबरें पहले भी आती रही हैं। इस बार उसकी मौत की खबर आने पर बाकायदा डीएनए जांच हुई है। इसके बाद ही इसका ऐलान किया गया।  
बगदादी की मौत का हाल बताते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह आईएसआईएस का संस्थापक और वहशी नेता था जो दुनिया का सबसे क्रूर और हिंसक आतंकी संगठन है। अमेरिका कई वर्षों से बगदादी की तलाश कर रहा था। बगदादी को पकड़ना या मारना मेरे प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा की सर्वोच्च प्राथमिकता रही। दुनिया ने इसे दीवाली की सौगात की तरह लिया क्यूंकि जब ोग दीवाली मना रहे थे तभी बगदादी के मरने की खबर आई। 
ट्रंप ने कहा वह बुरी तरह से गया था। इस साडी स्थिति के बावजूद वह एक तरफ से बंद सुरंग में भागते हुए गया। इस दौरान वह पूरे समय रोता और चिल्लाता रहा। जिस ठग ने दूसरों के मन में डर पैदा किया, उसके जीवन के अंतिम क्षण अमेरिकी सेना के खौफ में बीते। जिस ने न जाने कितने लोगों को ख़ौफ़ज़दा मौत दी थी जब खुद उसका वक़्त आया तो वह बुरी तरह से सहम गया। 
उन्होंने कहा कि अभियान में एक भी अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हुआ, लेकिन बगदादी के कई समर्थक मारे गए। उन्होंने कहा कि उसके पास से बेहद संवेदनशील सामग्री और जानकारी मिली है। वह सामग्री क्या है इसका खुलासा तो अमेरिकी सरकार वक़्त आने पर ही करेगी लेकिन यह अमेरिका की बहुत बड़ी कामयाबी है। 
ट्रंप ने कई बार दोहराया कि बगदादी कुत्ते की मौत मरा। वह कायर की मौत मारा गया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने उपराष्ट्रपति माइक पेंस और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के साथ व्हाइट हाउस से अभियान का सीधा प्रसारण देखा। इस सीधे प्रसारण के दौरान एक एक पल सनसनी से भरा हुआ था। लगता था किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।   
यह सारा हाल बताते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिकी कमांडों ने परिसर की दीवार को धमाका कर उड़ा दिया। विस्फोट ने बगदादी के शरीर को विकृत कर दिया, लेकिन डीएनए जांच में उसकी पहचान की पुष्टि हो गई। इस जाँच के बाद ही उसकी मौत का ऐलान किया गया। गौरतलब है कि आईएस ने लोगों पर बहुत अत्याचार किये, जिसके चलते हजारों लोगों को जान गंवानी पड़ी। जो जो वीडीओ यह संगठन जारी करता रहा उन्हें देख कर रौंगटे खड़े हो जाते थे। पिछले पांच वर्षों में, बगदादी के ठिकाने के बारे में बहुत कम जानकारी मिल पाई थीं। इस दौरान कई बार उसके मारे जाने की खबरें भी आईँ। बगदादी की मौत को राष्ट्रपति ट्रंप के लिये बड़ी राजनीतिक जीत माना जा रहा है, जो विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से महाभियोग की प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
ट्रंप ने अभियान में सहयोग देने के लिये रूस, तुर्की, सीरिया, और इराक को धन्यवाद दिया। उन्होंने अभियान में मददगार जानकारी उपलब्ध कराने के लिये सीरियाई कुर्दों को भी धन्यवाद कहा। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुर्दों ने इस मामले में सैन्य भूमिका नहीं निभाई लेकिन उन्होंने हमें जानकारी ज़रूर उपलब्ध कराई। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिकी विशेष बलों ने तुर्की के किसी क्षेत्र से उड़ान भरी थी।
उन्होंने कहा कि हमने रूस से बात कर उसे बताया कि हम वहां आ रहे हैं...उन्होंने बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी। हमने रूस को यह नहीं बताया कि हमारा मिशन क्या है। 
ट्रंप ने कहा कि यह एक खुफिया अभियान था। वहां घुसते ही हल्की गोलीबारी हुई, जिसका तुरंत जवाब दिया गया। अभियान की प्रक्रिया शाम पांच बजे शुरू की गई।
उन्होंने कहा कि अभियान से पहले 11 बच्चों समेत कई लोगों को बचाया गया। डीएनए जांच में साबित हो गया है कि वह बगदादी था। हमले में उसकी दो पत्नियां भी मारी गईं।
दुनिया की सबसे अच्छी खुफिया एजेंसियों द्वारा खोजे जाने और अमेरिकी अधिकारियों द्वारा उसके बारे में सूचना देने के लिये ढाई करोड़ अमेरिकी डॉलर का इनाम रखने के बावजूद बगदादी हाथ नहीं आया।
बगदादी इराक में अल-कायदा में शामिल हो गया, जिसका बाद में इराक के इस्लामिक स्टेट और अन्य इस्लामी समूहों के साथ विलय हो गया। वह अमेरिकी सेना द्वारा अपने पूर्ववर्ती के मारे जाने के बाद 2010 में समूह का नेता बन गया। इसके बाद उसने 2013 में समूह का नाम बदलकर आईएसआईएल या आईएसआईएस किया और 2014 में खुद को उसका खलीफा घोषित कर लिया। फिर भी यह सवाल अभी कायम है कि आईएसआईएस की गतिविधियां अब बंद होंगीं या मंद पड़ेंगी? क्या इस जघन्य संगठन की जंग अब नियंत्रण में की जा सकेगी? दुनिया भर में फैलिन इनकी शाखाओं पर अब बगदादी की मौत का क्या असर पड़ेगा?  

Friday, October 03, 2014

जगदेव सिंह जस्सोवाल अमेरिका रवाना

पंजाबी सांस्कृति की मशाल लेकर सूरत सिंह खालसा भी साथ गए 
लुधियाना: 2 अक्टूबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कहते हैं अब कलियुग है। इसीलिए भाई भाई को नहीं पहचानता। दोस्त ही दोस्त की पीठ में छुरा घोंपता है पर सरदार जगदेव सिंह जस्सोवाल ने अपने मूक अंदाज़ से साबित किया कि दोस्ती आज भी ज़िंदा है। वह अपने ख़ास लेखक मित्र प्रोफेसर मोहन सिंह की याद  रख रहे हैं। जब श्री जस्सोवाल ने प्रोफेसर साहिब की याद में यह मेला शुरू तो उनके साथ बहुत ही कम लोग थे। जो थे उनमें से भी कई अपने सौरठों से जुड़े थे। इन कठिन हालातों के बावजूद जब  की स्मृति में पहला मेला लगा तो यह एक चमत्कार था। बहुत से लोग खुश थे---पंजाब में किसी पंजाबी लेखक की कदर का यह शायद पहला मामला था। खुश होने वालों के साथ कुछ लोग निराश भी थे। उनका कहना था-अब अगली बार मेला लगेगा तो देखेंगे। उन सब साज़िशों को नाकाम करते हुए जस्सोवाल साहिब डटे रहे। परिणाम सब के सामने है।  वह मेला आज तक लगता आ रहा है।  इस मेले ने बहुत से लोगों को रोज़गार दिया तो बहुत से कलाकारों को स्थापित होने में भी मदद की। अब यह मेला अमेरिका  में लगेगा। अमेरिका में सैक्रामेंटो के शहर स्टाकटिन में यह मेला 4 और 5 अक्टूबर को लगेगा। जाति, मज़हब, रंग और नस्ल के सभी भेदों से ऊपर उठ कर इस महान शायर ने बहुत पहले ही कह दिया था--
दो धड़ियां विच खलकत वण्डी
इक महिलां दा-इक ढोकां दा। 
अब अपनी वृद्ध अवस्था के बावजूद श्री जस्सोवाल इस संदेश को लेकर अमेरिका जा रहे हैं तांकि इस हकीकत को पूरी दुनिया तक पहुंचा सकें। कहते हैं अमेरिका में कही गे बात पूरी दुनिया के लोग बहुत ध्यान से सुनते हैं। उम्मीद की जनि चाहिए कि जब प्रोफेसर  की क्रांति भरी  शायरी  जस्सोवाल के प्रयासों से पूरी दुनिया तक पहुंचेगी तो एक नयी क्रांति की शुरुआत भी होगी।
पंजाबी सांस्कृति  की मशाल लेकर जगदेव सिंह जस्सोवाल वीरवार को प्रोफैसर मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन अमेरिका के बुलावे पर अमेरिका के लिए रवाना हुए उनके साथ प्रसिद्ध समाज सेवक सूरत सिंह खालसा भी अमेरिका गए। इस अवसर पर जस्सोवाल ने विदेशी धरती पर पंजाबी विरसे, पंजाब मिट्टी व धार्मिक रवायतों को कायम रखने वाले पंजाबी, प्रवासियों की प्रशंसा करते हुए कहा कि पंजाब की पावन भूमि पर जन्म लेने वाले यह लोग वर्षों तक पंजाब की  भूमि  से दूर रहने के बावजूद पंजाबी सभ्याचार को जिंदा रखते हुए उन्होंने अपनी मिट्टी का मोह, सभ्याचार का मोह व धर्म का सत्कार कायम रखा है। इस अवसर पर प्रो. मोहन सिंह मैमोरियल फाऊंडेशन के अध्यक्ष प्रगट सिंह ग्रेवाल सीनियर चेयरमैन साधु सिंह ग्रेवाल, उपाध्यक्ष, कृष्ण कुमार बावा,  निर्मल जोड़ा, पवन गर्ग हरदयाल सिंह अमन, अर्जुन बावा सहित अन्य शामिल थे।

Thursday, December 19, 2013

भारत के समस्त शासनाध्यक्षों से विनम्र अनुरोध//मनीराम शर्मा

Thu, Dec 19, 2013 at 9:09 PM
भारत में मात्र 25% पुलिस बल ही थानों में जनता की सेवा के लिए
मान्यवर,
पुलिस बल की तैनाती–कानून-व्यवस्था तथा अनुसन्धान एवं दोषसिद्धि
आप इस तथ्य से अवागत होंगे कि अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 256 और भारत में 130 पुलिस है जबकि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुणे मामले दर्ज होते हैं| फिर भी भारत में प्रति लाख जनसंख्या 56 केन्द्रीय पुलिस बल इसके अतिरिक्त हैं| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 5806 मुकदमे दायर होते हैं जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है| तदनुसार भारत में प्रति लाख जनसंख्या 68 मात्र पुलिस होना पर्याप्त है| किन्तु भारत में मात्र 25% पुलिस बल ही थानों में जनता की सेवा के लिए तैनात है और शेष बल लाइन आदि में तैनात है जिसमें से एक बड़ा भाग अंग्रेजी शासनकाल से ही विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, वसूली करने आदि में लग जाता है|


भारत में अंग्रेज, जनता पर अत्याचार कर उनका शोषण करने और ब्रिटेन के राज कोष को धन से भरने के लिए आये थे अत: उनकी सुरक्षा को खतरे का अनुमान तो लगाया जा सकता है| किन्तु जनतन्त्र में शासन की बागडोर जनप्रिय, सेवाभावी और साफ़ छवि वाले लोगों के हाथों में होती है अत: अपवादों को छोड़ते हुए उनकी सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं हो सकता| फिर भी इन राजपुरुषों की सुरक्षा को लोकतंत्र में भी कोई ख़तरा होता है तो उसके लिए उनका आचरण ही अधिक जिम्मेदार है|   

पुलिस अपनी बची खुची ऊर्जा व समय  का उपयोग अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है| वर्ष भर में देश में लगभग एक करोड़ गिरफ्तारियां होती हैं व देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं| राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार भी देश में गत तीन वर्षों में कम से कम 3,668 अवैध गिरफ्तारियां हुई हैं| यह आंकडा तो मात्र रिपोर्ट किये गए मामले ही बताता है जो वास्तविकता का मात्र 5% ही है| इसमें राज्य आयोगों और बिना रिपोर्ट हुए/दबाये गए आंकड़े जोड़ दिए जाएं तो स्थिति भयावह नजर आती है|     

दुखद तथ्य है कि अपनी सुरक्षा के लिए, जिस पुलिस पर देश की जनता पूरा खर्च कर रही उसका उसे मात्र 25% प्रतिफल ही मिल रहा है और न केवल आम नागरिक की सुरक्षा के साथ समझौता किया जा रहा है बल्कि अनुसंधान में देरी का लाभ दोषियों को मिल रहा है| आपराधिक मामलों में 10-15 वर्ष मात्र अनुसंधान में आम तौर पर लगना इस दोषपूर्ण तैनाती नीति की ही परिणति है| अत: अब नीति बनायी जाए की कुल पुलिस बल का कम से कम आधा भाग जनता की सेवा में पुलिस थानों में तैनात किया जाए ताकि जनता कि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके, अपराधियों को शीघ्र दंड मिल सके और उन पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सके|

यदाकदा किसी संवेदनशील मामले में न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अनुसंधान का आदेश दिया जाता है तो भी बयान हैड कांस्टेबल ही लेता और वही रिपोर्ट बनाता है| वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तो वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर मात्र हस्ताक्षर ही करते हैं और बयान लेने कहीं बाहर नहीं जाते हैं| मात्र हस्ताक्षर करने के लिए देश की गरीब जनता की जेब से इतना भारी वेतन और सुविधाएं देना किस प्रकार न्यायोचित है|   

पुलिस तो जनता की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में कार्य करने वाला बल है जिसका कार्यालयों में कोई कार्य नहीं है| सभी स्तर के पुलिस अधिकारियों को कार्यक्षेत्र में भेजा जाना चाहिए और उन्हें, अपवादों को छोड़कर, हमेशा ही चलायमान ड्यूटी पर रखा जाना चाहिए| आज संचार के उन्नत साधन हैं अत: आवश्यकता होने पर किसी भी पुलिस अधिकारी से कभी भी संपर्क किया जा सकता है और पुलिस चलायमान ड्यूटी पर होते हुए भी कार्यालय का कामकाज देख सकती है| पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश हो को वे पुलिस थानों के कार्यालय की बजाय जनता से संपर्क कर निरीक्षण रिपोर्ट बनाएं|

सादर ,   
भवनिष्ठ                                                                            
मनीराम शर्मा                                                        दिनांक 19 .12 .13 
एडवोकेट
नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर-331403
जिला-चुरू(राज)

Wednesday, July 03, 2013

ई०मेल और फ़ोन कॉलों के विश्लेषण:

:                        अमरीकी तरीके से भारत सहमत
                                                                                                                      फोटो: RIA Novosti
मंगलवार को भारत के विदेशमन्त्री सलमान ख़ुर्शीद ने अचानक ही अमरीकी गुप्तचर संगठनों की गतिविधियों का समर्थन किया, जो देशी-विदेशी नागरिकों के इलैक्ट्रोनिक सन्देश और टेलिफ़ोन-बातचीत पर नज़र रखते हैं।
ब्रुनेई में पत्रकारों से बात करते हुए सलमान ख़ुर्शीद ने कहा -- इन सबकी रिकार्डिंग करके उन्हें जो जानकारी मिली, उसके बल पर ही उन्होंने कुछ देशों में बड़ी आतंकवादी घटनाओं को होने से रोक दिया।
सलमान ख़ुर्शीद ने कहा कि उनका मतलब निजी सन्देशों की रिकार्डिंग से नहीं, बल्कि उस कम्प्यूटर-विश्लेषण से है, जो आम सन्देशों और फ़ोन-कॉलों के सिलसिले में किया जाता है।

सलमान ख़ुर्शीद की यह बात भारत के विदेश मन्त्रालय के आरम्भिक नज़रिए से बिल्कुल मेल नहीं खाती क्योंकि बीते जून माह में अमरीकी विदेशमन्त्री से मुलाक़ात करते हुए सलमान ख़ुर्शीद ने कहा था कि निजी जीवन में कोई भी हस्तक्षेप 'स्वीकार नहीं किया जाएगा'।(रेडियो रूस से साभार) 

Monday, January 14, 2013

माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश?

साइबर युद्ध का ख़तरा-अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से
वर्ष 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बड़ी तेज़गति से वृद्धि होगी। कुछ ख़ास ठिकानों पर ऐसे हमले किए जाएंगे और सरकारी एजेंसियों पर विशाल पैमाने के हमले भी होंगे। यह निष्कर्ष एंटीवायरस निगम "कैसपेर्स्की लैब" के विशेषज्ञों ने निकाला है। अमरीकी खुफिया सेवाओं ने भविष्यवाणी की है कि आनेवाले 20 वर्षों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा।

"कैसपेर्स्की लैब" के विश्लेषकों के मुताबिक, अगले साल कई सरकारी संस्थानों और व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों की निजी कंपनियों की गोपनीय जानकारी की चोरी बड़े पैमाने पर होने लगेगी। सामाजिक सेवाओं और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर साइबर हमले अक्सर होने की सम्भावना है।

गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास भारी मात्रा में ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता होगी। इसके अलावा, संचार प्रौद्योगिकी के विकास की तेज़गति की बदौलत देशों की सरकारों का अपने नागरिकों पर असीम नियंत्रण हो जाएगा। लेकिन इन देशों के नागरिकों के पास भी अपनी सरकारों को चुनौतियाँ देने के कई अवसर मौजूद होंगे।

वर्तमान में, सूचना प्रौद्योगिकी हमारे समाज के सूचना क्षेत्र के विकास के संदर्भ में एक बड़ा ख़तरा बनती जा रही है। इस संबंध में रूस के सूचना सुरक्षा संघ के अध्यक्ष गेन्नादी येमेलियानोव ने रेडियो रूस को बताया –

ऐसा ख़तरा इसलिए बढ़ता जाएगा क्योंकि इस ख़तरे का एक टाइमबम फिट कर दिया जा चुका है। यदि हम समय पर पर्याप्त सुरक्षा उपाये नहीं करेंगे तो यह बम ज़रूर फटेगा और बड़े विनाश का कारण बनेगा। जब हम सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के इतने ज्यादा आदी हो जाएंगे कि इसके बिना जीवन ही असंभव हो जाएगा तब पूरी दुनिया के लिए बहुत-सी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ज़रा सोचिए, इस सूचना प्रौद्योगिकी ने अचानक ही काम करना बंद कर दिया है। अब आप क्या करेंगे? पूरा जीवन ठप्प। आप ज़रा कल्पना कीजिए कि सभी स्थानों पर बिजली गुल हो गई है। सारा काम ठप्प। वित्तीय और आर्थिक कारणों से भी ऐसा ख़तरा पैदा हो सकता है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी को अच्छी तरह से समझने वाले एक बहुत अच्छे दिमाग़ की ही ज़रूरत होगी।

अमरीकी खुफिया सेवाओं ने अपने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को एक रिपोर्ट भेजी है जिसमें अमरीका के लिए मौजूदा साइबर हमलों के ख़तरों की समीक्षा की गई है। इसमें कहा गया है कि इस क्षेत्र में अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से ही पैदा होगा। लॉस एंजिल्स टाइम्स में छपी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस, फ्रांस, इज़राइल और दुनिया के कुछ अन्य देश भी साइबर जासूसी करते हैं लेकिन वे उतना विश्वासघात नहीं करेंगे जितना कि चीन कर सकता है। कम से कम रूस ऐसा नहीं कर रहा है। वह अपने व्यापारियों के लाभ के लिए अमरीकी कंपनियों की जानकारियां चुराने की कोशिशें नहीं कर रहा है।

इस बीच, दिसंबर माह की शुरूआत में साइबर रक्षा पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मंच साइबर सुरक्षा एशिया- 2012 के भागीदार इस बात पर सहमत हुए थे कि सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया की मुख्य समस्या यह है कि दुनिया की सरकारें अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैः साइबर-आतंकवाद क्या चीज़ है? कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं। लेकिन कोई भी सरकार यह गारंटी नहीं दे सकती हैं कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आतंकवादी गिरोह इन मालवेयरों और वायरसों का खूब इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी ख़तरा बना हुआ है। माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता है। (
रेडियो रूस से साभार)
13.12.2012, 16:32         
साइबर युद्ध का ख़तरा

Saturday, January 12, 2013

आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Fri, Jan 11, 2013 at 11:03 PM
खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे नरेन्द्र
तस्वीर ओशो टीचिंग से साभार 
11 सितम्बर, 1893 ई. को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन मे भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. मे कलकत्ते (कोलकाता) के शिमलापल्ली नामक मोहल्ले के निवासी श्री विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर हुआ. बचपन का इनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था तथा ये अपने माता-पिता की छठ्वी संतान थे. बच्चो की प्राथमिक पाठशाला माता की गोद ही होती है और उस पाठशाला मे अध्यापन उसकी माता द्वारा ही किया जाता है. माता की उस शिक्षा का प्रभाव बच्चे के मस्तिष्क पर अजीवन रहता है. इस बात को नरेन्द्रनाथ की माँ भलिभाँति जानतीं थी. अत: उन्होने नरेन्द्रनाथ को सुसंस्कारित करने मे कोई कसर नही छोडी. वे नरेन्द्रनाथ को बाल्यवस्था से ही रामायण और महाभारत की कथाये सुनाया करती थी. अगर कोई साधु उनके द्वार पर भिक्षा माँगने आ जाता तो नरेन्द्रनाथ की माँ नरेन्द्रनाथ को साथ मे लेकर उस साधु का यथोचित सेवा-सत्कार कर अपने सामर्थ्यानुसार उन्हे भिक्षा देती थी. माँ के इस कृत्य ने नरेन्द्रनाथ के मन पर अमिट छाप छोडी. पढाई मे प्रखर होने के साथ – साथ ये खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे. गायन कला के चलते ही नवम्बर, 1881 को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर पर इनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई. नरेन्द्रनाथ की गायन कला से प्रभावित होकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इन्हे दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण दिया और कालांतर मे नरेन्द्रनाथ उनके शिष्य बने. परंतु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को नरेन्द्रनाथ ने अपना गुरु तब तक नही माना जब तक उन्होने उनकी उत्कंठा के चलते उनका भगवान से साक्षात्कार नही करवा दिया.  
नारी चिंतन
न्यूयार्क मे भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जबतक वहाँ का समाज स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर प्रत्येक मानव मे मानवता का दर्शन नही करता और यह नही सोचता कि स्त्री-पुरुष दोनो एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी है तबतक वहाँ की स्त्रियो का वास्तविक रूप से उत्थान नही हो सकता. मात्र बौद्धिक और अक्षर ज्ञान से ही मानव का कल्याण संभव नही है. अपितु मानव – कल्याण हेतु बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के साथ – साथ उसकी अध्यात्मकिता और नीतिमत्ता की उन्नति भी अत्यंत आवश्यक है. भारत की नारियाँ भले ही बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के स्तर पर अमेरिका की नारियो से पीछे हो परंतु वे सदैव अपने शील की रक्षा के साथ-साथ एक चरित्रवान जीवनायपन करते हुए अपने पवित्र आचार-विचार और हृदय की पवित्रता के माध्यम से अध्यात्म के सहारे मानव-कल्याण के पथ पर अग्रेसित होती है. स्वामी जी ने अपने भाषण मे वहाँ के प्रेमाचार के विषय पर कहा कि अगर वे विवाहेच्छुक होते तो अमेरिका के अन्य नवयुवको की भाँति सैकडो बार प्रेमाचार के आडम्बर की अपेक्षा बिना किसी आडम्बर के किसी एक के प्रियपात्र बन चुके होते है. अमेरिका मे बढते तलाको की संख्या पर चिंतित होकर उन्होने वहाँ बताया कि भारतीय समाज मे यह सर्व-शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपने पति-पत्नी के अलावा अन्य सभी को मातृवत-पुत्रवत की नजर से देखे. अमेरिका मे स्त्री भोगवादी मानसिकता के केन्द्र-बिन्दु मे वास करती है परंतु भारत मे स्त्री सदैव से पूज्या रही है. इसी भारतीय-चिंतन के चलते भारत मे तलाको की संख्या अमेरिका के अपेक्षाकृत नगण्य है. 
  व्यक्तित्व विकास

राजीव गुप्ता-9811558925
व्यक्तित्व विकास की शिक्षा पर स्वामी जी का मानना था कि व्यक्ति का व्यक्तित्व असरदार होना चाहिये. व्यक्ति जिसके भी सम्पर्क मे आये उस पर उसके ग़ुणो की, उसकी बुद्धि की तथा उसके आचरण का जबरदस्त हो यह हर व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिये क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्थान दो-तिहाई भाग मे होता है और मात्र एक-तिहाई भाग मे ही बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द का स्थान रहता है. हमारा कर्म हमारे व्यक्तित्व का बाह्य अभिव्यक्ति मात्र ही है. अत: हमारी सम्पूर्ण शिक्षा और सारे अध्ययनो का एकमेव लक्ष्य हमारे व्यक्तित्व को गढते हुए उसे और अनवरत निखारना ही है. व्यक्तित्व की महत्ता हम इसी बात से लगा सकते है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व जिस पर भी पडता है उसे कार्यशील बना देता है. व्यक्तित्व पर एक उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने यहाँ तक कहा कि दार्शनिक मात्र बुद्धि पर असर करता है अपितु एक धर्मसंस्थापको का असर सम्पूर्ण समाज पर पडता है जिससे सारा देश तक हिल जाता है. मनुष्य को पूर्णता को प्राप्त होना ही उसके जीवन उद्देश्य होना चाहिये. मनुष्य मे अच्छी – बुरी स्वभाविकत: दोनो वृत्तियाँ होती है. समयानुसार व्यक्ति द्वारा उसके अन्दर की बुराईयो को कम करने की कोशिश करना ही उसे पूर्णता की ओर अग्रसित करता है.
शिक्षा
शिकागो से भारत वापस लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. स्वामी विवेकानन्द ने एक सभा मे शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का आधार धर्म होना चाहिये और उसका केन्द्र बिन्दु “चरित्र-निर्माण” ही होना चाहिये. धर्म से उनका तात्पर्य मात्र पूजा-पद्धति ही नही था अपितु “जीवन जीने की कला” था जिसकी पुष्टि उन्होने विचार-शक्ति का महत्व, कर्म का परिणाम और भाग्य के निर्माण इत्यादि जैसे विभिन्न विषयो पर अपने विचार रखकर किया. स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि हम जैसे सोचते है वैसे ही बन जाते है क्योंकि विचार सजीव होते है परिणामत: वाणी की अपेक्षाकृत उनका अधिकतम प्रभाव सदैव हमारे जीवन पर पडता रहता है. अत: हमे अपने विचारो के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये.

स्वामी विवेकानन्द शिक्षा हेतु किसी भी प्रकार के दंड देने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था कि जिस प्रकार प्रताडित करके गधे को घोडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार किसी भी प्रकार की प्रताडना से हम उसे अक्षर ज्ञान तो दे सकते है पर हम उसे शिक्षित नही बना सकते. इसलिये उन्होने शिक्षित बनाने हेतु ठोक-प्रणाली का खुलकर विरोध किया और उनका मानना था कि  शिक्षा के माध्यम से मानसिक बल, चरित्र-निर्माण और बुद्धि का विकास होता है, इतना ही नही “मन की एकाग्रता” ही शिक्षा का सार है और शिक्षा के माध्यम से मिले सारे प्रशिक्षणो का उद्देश्य व्यक्ति-विकास ही है.

किसी भी देश की उन्नति मे वहाँ के शिक्षित-प्रतिशत की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. क्योंकि देश की उन्नति का अनुपात और जन-समुदाय के शिक्षित का अनुपात सदैव परस्पर निर्भर होते है. भारतवर्ष के पिछडेपन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कुछ चन्द लोगो ने शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमा रखा है. गाँवो मे शिक्षा-रूपी दीपक का प्रकाश अभी भी धूमिल ही है. अत: यदि किसी अभाववश विद्यालय मे विद्यार्थी न पहुँच पाये तो विद्यालय को स्वयम उन अभावाग्रस्त विद्यार्थियो के पास पहुँचकर उनकी मातृभाषा मे ही उन्हे शिक्षा देनी चाहिये. इसके साथ- साथ शिक्षा मे संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा का स्थान विशिष्ट होना चाहिये. संस्कृत भाषा मात्र वेदो-उपनिषदो की भाषा बनकर न रहकर जाय अत: इसके प्रचार-प्रसार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा पर केवल ब्राह्मण विशेष का अधिकार न होकर अपितु सभी सभी लोगो का समान अधिकार है. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यही है कि वह व्यक्ति को स्वामी बनाये परिणामत: वह सदैव एक स्वामी की तरह कार्य करे न कि किसी भी प्रकार के गुलाम की तरह.
-राजीव गुप्ता (9811558925
आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता