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Saturday, August 05, 2023

हर 10 मिनट में एक व्यक्ति का अंग काटना पड़ रहा है--डॉ.लव

Saturday 5th August 2023 at 13:36

लेकिन सभी तरह की  एंप्यूटेशन से बचा भी जा सकता है 


लुधियाना
: 5 अगस्त 2023: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::

हर साल 6 अगस्त को मनाए जाने वाले नेशनल वैस्कुलर डे के उपलक्ष्य में ग्लोबल हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल ने एक जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अस्पताल के डायरेक्टर कार्डियोलॉजी डॉ. ब्रजेश  बद्धन व डिपार्टमेंट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर एंड थोरेसिक सर्जरी के हेड डॉ. केसी मुखर्जी ने की। इस दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की गई, जिसमें संबोधित करते हुए अस्पताल के डिपार्टमेंट ऑफ वेस्कुलर एंड एंडो वैस्कुलर सर्जरी के कंसल्टेंट डॉ. लव लूथरा ने नेशनल वेस्कुलर डे, वैस्कुलर एंड एंडो वैस्कुलर सर्जरी के बारे में बहुत सी जानकारियां दीं। 

उन्होंने कहा कि वैस्कुलर सोसाइटी ऑफ इंडिया ने एंप्यूटेशन फ्री इंडिया को मिशन बनाया है, जिसके लिए देश के 24 शहरों में 6 अगस्त को वैस्कुलर सर्जनों द्वारा वाकथान के जरिए वैस्कुलर बीमारियों व एंप्यूटेशन से बचाव के बारे में लोगों को जागरूक किया जाएगा। डॉ. लव लूथरा ने कई तरह की वैस्कुलर डिजीज मसलन वेरीकोज वेन, पेरीफेरल वैस्कुलर डिजीज( गैंगरीन) डायबिटिक फुट डिजीज, करॉटिड आर्टरी डिजीज, मिनिमली इनवेसिव ट्रीटमेंट के बारे में जानकारी दी। 

उन्होंने बताया कि ग्लोबल हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल इस रीजन का एकमात्र हॉस्पिटल है जो ब्रेन, हार्ट, लिंब व एब्डोमेन से संबंधित सभी वैस्कुलर बीमारियों का अत्याधुनिक इनवेसिव तकनीक से इलाज करता है। डॉ.लव ने बताया कि हर 10 मिनट में एक व्यक्ति का अंग काटना पड़ रहा है। 

इसकी सबसे बड़ी वजह डायबिटिक फुट, गैंगरीन की वजह से टांग में ब्लड की सप्लाई घटना, डीप वेन थम्बोसिस इलाज ना करवाना,ट्रॉमा, थरम्बोसिस ऑफ आर्टरी की  वजह से अचानक ब्लड रुक जाना प्रमुख वजहें हैं। उन्होंने बताया कि यदि मरीज समय रहते वैस्कुलर सर्जन से चेकअप करवा ले, तो एंप्यूटेशन से बचा जा सकता है। डॉ.लव ने बताया कि वह पिछले 2 साल में 300 से अधिक ऑपरेशन कर चुके हैं इनमें से ज्यादातर को डॉक्टरों ने एम्प्यूटेश की सलाह दी थी या उन्हें रेफर किया था। 

डॉक्टर लव ने बताया कि ग्लोबल हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल में सभी विनस एंड आर्टरियल डिजीज का आधुनिक तकनीकों से इलाज किया जाता है। वेरीकोज वेन का इलाज 1940 लेजर मशीन से किया जाता है जो कि पंजाब में अकेली है। इसके अलावा अस्पताल में बाईपास व पेरिफेरल एंजोयोप्लासटी व अंगों के बचाव के लिए स्टेंटिंग भी की जाती है। 

डायलसिस के मरीजों के लिए क्रिएशन ऑफ आर्टरीवीनस फिसूला,परम कैथ इंसरशन व अन्य प्रोसीजर हमारे वेस्कुलर सर्जनों की टीम द्वारा किए जाते है। उन्होंने बताया कि इस आयोजन का मकसद लोगों को वैस्कुलर डिजीज और उसके इलाज के बारे में जागरूक करना था। ग्लोबल टीम की ओर से एंप्यूटेशन फ्री पंजाब मुहिम को लांच किया गया है, जिसके जरिए हम लोगों को एंप्यूटेशन से बचाने के लिए वैस्कुलर डिजीज के बारे में जागरूक करेंगे। 

शनिवार के दिन हुए पत्रकार सम्मलेन के दौरान सबसे बड़ी उपलब्धि ज़ेह जानकारी रही कि डॉ.लव ने कहा स्पष्ट कहा कि सभी तरह की  एंप्यूटेशन से बचा जा सकता है, यदि उसकी समय रहते जांच और इलाज करवाया जाए।

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Friday, December 06, 2019

धर्म के आधार पर भारतीय नागरिकता बिल का तीखा विरोध

Friday:Dec 6, 2019, 3:10 PM
शाही इमाम पंजाब ने इसे संविधान और मूल सिद्धांतों के खिलाफ कहा
पाकिस्तान द्धारा शरणार्थियों के भेस में आतंकवाद फैलाने की आशंका
जामा मस्जिद में पत्रकार सम्मेलन को संबोधित करते हुए शाही इमाम मौलाना हबीब उर रहमान सानी लुधियानवी व अन्य

लुधियाना: 6 दिसम्बर 2019:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
केंद्र की भाजपा सरकार की ओर से कैबिनेट में पारित करने के बाद अब संसद में पेश किए जाने वाले नागरिकता बिल का स्वतंत्रता सैनानियों की जमात मजलिस अहरार की ओर से विरोध करते हुए शाही इमाम पंजाब मौलाना हबीब उर रहमान सानी लुधियानवी ने आज पत्रकार सम्मेलन में कहा कि धर्म के आधार पर किसी को भारतीय नागरिकता देना किसी भी तरह से उचित नहीं है, यह सरासर देश के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। शाही इमाम मौलाना हबीब उर रहमान ने कहा कि भारत के संविधान में ये बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि देश की सरकार किसी धर्म विशेष की नहीं बल्कि धर्म निरपेक्ष है और यही भारत का सिद्धांत रहा है। शाही इमाम पंजाब ने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार का यह कहना कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में वहां के अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं इसलिए गैर मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता दी जानी चाहिएं, तो क्या चाइना, म्यांमार, नेपाल और श्रीलंका में अगर किसी मुसलमान पर अत्याचार हो उसे भारत की नागरिकता का अधिकार नहीं होगा? क्या यह गैर मुस्लिम देश भारत के पड़ोसी नहीं है? क्या इन देशों में मानवता पर अत्याचार नहीं हो रहे हैं? शाही इमाम ने कहा कि म्यांमार में वहां के अल्पसंख्यकों पर बहुत अत्याचार हुए हैं उसे कौन नहीं जानता, लेकिन फिर भी धर्म के आधार पर राजनीति की जा रही है। शाही इमाम मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी ने कहा कि दुनिया इस वक्त आतंकवाद से जूझ रही है। आतंक का कोई धर्म नहीं होता, वोट की राजनीति में कहीं हम इन पड़ोसी देशों से आए पाकिस्तानी घुसपैठियों के लिए दरवाजा तो नहीं खोलने जा रहे, क्योंकि अब तक जो भी जासूस और आतंकी भारत में पकड़े गए हैं उन सब का किसी एक धर्म से संबंध नहीं है। शाही इमाम ने कहा कि सरकार देश में बढ़ रही महंगाई और बेरोजगारी पर ध्यान केंद्रित करने की बजाए धर्म के नाम पर सियासत कर रही हैं। एक सवाल के जवाब में शाही इमाम पंजाब मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी ने कहा कि 6 दिसम्बर के दिन बाबरी मस्जिद को कानून की परवाह ना करते हुए शहीद कर दिया गया था जिसे आज भी सुप्रीम कोर्ट ने गलत कहा है इस लिए बाबरी मस्जिद की शहादत को भुलाया नहीं जा सकता। 


Saturday, March 21, 2015

लुधियाना में प्रेस लायंज़ क्लब


Sat, Mar 21, 2015 at 5:29 PM
आओ एकजुट होने की तरफ बढ़ें  
लुधियाना: 21 मार्च 2015:(रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कभी वक़्त था जब पत्रकारों का दबदबा हुआ करता था। उस समय पत्रकारों की संख्या बहुत ही काम थी लेकिन उनका प्रभाव बहुत दूर तक असर करता था और उसके परिणाम भी दूरगामी हुआ करते थे। अब जबकि पत्रकारों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है और उनकी शक्ति और प्रभाव भी उसी हिसाब से बढ़ना चाहिए था लेकिन काम उल्टा होता चला गया। लालच, स्वार्थ, अहंकार और टांग खींचने की कुप्रथाओं ने जोर पकड़ा तो साज़िशों भरी चालें सामने आने लगीं। एक दुसरे को नीचे दिखाने के निंदनीय प्रयासों ने फुट पैदा की और फुट का फायदा उन्हें ही पहुंचा जो कभी नहीं चाहेंगे की पत्रकार एकजुट हों। इस निराशाजनक हालात में भी नई उम्र के कुछ पत्रकार पुराने मीडिया कर्मियों से सलाह करके कुछ न कुछ कोशिशें कर रहे हैं।  हम इनका स्वागत करते हैं इस आशा के साथ कि यह कोशिश मीडिया की भलाई पर केंद्रित रहते हुए गुटबन्दियों से ऊपर उठने के काम को पहल देगी। हमें आज ही एक तस्वीर ईमेल से प्राप्त हुई है जिसे यहाँ शुभकामनायों के साथ प्रकाशित किया जा रहा है।

Wednesday, January 30, 2013

बात मीडिया की दुनिया में तेज़ी से हुए विकास की

30-जनवरी-2013 13:01 IST
बदलती तकनीकों के साथ नियम भी बदलने चाहिए: श्री मनीष तिवारी
सूचना और प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने कहा कि मीडिया की दुनिया में तेज़ी से हुए विकास से कई बदलाव आए हैं जिसमें बदलती तकनीकों के साथ नियमों में भी उसी गति से परिवर्तन होना चाहिए। इन बदलती परिस्थितियों में समान गति बनाए रखने के लिए एक सक्षम कानूनी माहौल बनना चाहिए। मीडिया और मनोरंजन जगत के बदलते स्‍वरूप ने इसे, हमारी अर्थव्‍यवस्‍था के तेज़ी से बढ़ते हुए क्षेत्रों में से एक बना दिया । यह उन नीतियों से संभव हो पाया है जिसमें कारोबार मॉडल के लिए निवेश, निरंतरता को प्रोत्‍साहन मिला है तथा उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा दिया गया। यह ज़रूरी था कि उद्योग विशेषकर प्रसारण क्षेत्र ने बदलती परिस्थितियों के साथ मेल बिठाया तथा उसे अपनाया। श्री तिवारी कल बीईएस एक्‍सपो 2013 में बोल रहे थे। 

श्री तिवारी ने कहा कि उद्योग के नए स्‍वरूप ने 'समावेशी विकास ' की धारणा को सुदृढ़ किया है। 'समावेशी विकास' विश्‍वास का एक रूप है- यह एक विकासात्‍मक मॉडल था जिसमें सामाजिक विकास कार्यक्रमों और नीतियों के प्रभावी कार्यान्‍वयन से प्रत्‍येक हितधारक और प्राप्‍तकर्ता की चिंताओं को सम्मिलित किया गया था। मीडिया को लोकतांत्रिक रूप देने के मुद्दे पर श्री तिवारी ने कहा कि देश और बड़ी संख्‍या में लोगों की सामाजिक प्रकृति पर इस प्रक्रिया के निहितार्थों को समझना ज़रूरी था। 

उन्‍होंने कहा कि बदलते परिस्थितियों में प्रसारण हमेशा संचार का एक शक्तिशाली माध्‍यम रहेगा। बीईएस एक्‍सपो 2013 जैसे सम्‍मेलन भविष्‍य की ज़रूरतों और प्रारूप को ध्‍यान में रखते हुए नीति निर्माण में बदलाव लाने तथा आत्‍म निरीक्षण करने का अवसर प्रदान करते हैं। 

इससे पहले सार्वजनिक सूचना अवसंरचना और नावाचार के लिए प्रधानमंत्री के सलाहकार श्री सैम पित्रोदा ने कहा कि प्रौद्योगिकी ने लोगों के जीवन में कई बडे़ बदलाव किए हैं। श्री पित्रोदा ने राष्‍ट्रीय ज्ञान नेटवर्क और सार्वजनिक ढ़ांचागत व्‍यवस्‍था को मज़बूत करने में सर‍कार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी जानकारी दी। सूचना और प्रसारण सचिव श्री उदय कुमार वर्मा ने भी हाल ही में हुए नीतिगत प्रयासों से इस क्षेत्र में हुए बदलावों पर प्रकाश डाला। (PIB) 
 बात मीडिया की दुनिया में तेज़ी से हुए विकास की 
मीणा/प्रियंका/तारा- 360

Friday, January 18, 2013

सहयोग करें सफलता आपके कदम चूमेंगी-भावना त्यागी

भारत को ब्रह्माण्ड़ गुरु की गरिमा वापस दिलाने का प्रयास 
दामिनी की जान हम नहीं बचा पाए उसके बाद इस तरह की घटनायों की मुक्कमल रोकथाम भी नहीं कर पाए लेकिन इस के बावजूद महिला सम्मान को लेकर एक आन्दोलन अवश्य खड़ा हुआ जो लगातार मजबूत हो रहा है। जहाँ एक और महिलायों और उनकी पौशाक को लेकर बहुत ज़िम्मेदार समझे जाने वाले लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं वहीँ इस नाज़ुक समय में महिलायों के समान को लेकर एक विशेष आयोजन भी हो रहा है। महिला रत्नों के सम्मान में आप अपने क्षेत्र की महिलायों के नामांकन भी भेज सकते हैं साथ ही आलेख, सुझाव, सहयोग और विज्ञापन भी। इस विशेष आयोजन में कर्मठसत्यानिष्ठ,  कर्तव्यनिष्ठ,  संघर्षशीलप्रतिभाशालीसमाजसेवीराष्ट्रहित  में कार्य करने वाली सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ का सम्मान किया जायेगा। आयोजकों का कहना है कि विश्व सभ्यता की रक्षासुरक्षा एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति के विकास व विस्तार हेतु संकल्प के साथ इस हाभियान मे सहयोग करों सफलता आपके कदम चूमेंगी। आपका छोटा सा प्रयास भारत को विश्वगुरु ही नही वरन्
ब्रह्माण्ड़ गुरु की प्राचीन गरिमा वापस दिलाएगा। सम्पर्क   : भावना त्यागी भारतीय (011 22528272, 9013666652) और भू त्यागी भारतीय (विश्व चिंतक) (09999466822, 9013666651) आप अपने सुझाव यहाँ भी भेज सकते हैं जिन्हें आयोजकों तक पहुंचा दिया जायेगा।-- रेक्टर कथूरिया 
*महिला रत्नों का सम्मान                                         *सभी कार्यक्षेत्रों की महिलाओ का सम्मान


*महाभियान मे सहयोग करों--भावना त्यागी भारतीय



नामांकन आमन्त्रण महिला और मीडिया 2013 FFF.pdf
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Saturday, September 08, 2012

मौत की क्रूरता: पाबला जी के युवा बेटे को छीना


किस भगवान से मांगें दर्द सहने की शक्ति  
                      साभार चित्र 
ब्लॉग जगत को नए नए अंदाज़ देने, ब्लॉग लेखकों को एक नयी पहचान देने और उन्हें किसी न किसी भने नजदीक लाने में हर पल व्यस्त रहने वाले मित्र बी एस पाबला जी के साथ मौत ने एक क्रूर मजाक किया है। मौत ने उनके युवा बेटे को हमसे हमेशां के लिए छीन लिया है।  भाई रजनीश अली जाकिर जी की पोस्ट से इस दुखद खबर का पता चला। पाबला जी का नम्बर तीन चार बार निकाला पर उनके दुःख को बाँट सकने की हिम्मत मेरी भी नहीं हुई। कभी कभी शब्द भी कितने बेबस से हो जाते हैं। जो दुःख कभी भूल नहीं सकेगा उस दुःख को भूलने की बात कहना----जो असहनीय है उसे सहन  करने का उपदेश देना जीने के लिए---समाज के लिए लाख जरूरी सही पर---केवल खोखली औपचारिकता लगता है। मैंने अपना एकलौता बेटा खोया है---सो इस दर्द का अहसास भी कर सकता हूँ---पर बाँटने में कितना असमर्थ हो गया हूँ---क्योंकि जानता हूँ कि  यह दर्द अकेले ही सहना होगा----सारी उम्र हर पल यह दर्द बना रहेगा ! भगवान् होता तो यह ज़ुल्म नहीं करता----इस लिए किस भगवान् से कहूं की पुत्र नहीं रहा और इस दर्द को सहने की शक्ति एक पिता को दे---जाकिर जी की पोस्ट भी नीचे दी जा रही है ! --रेक्टर कथूरिया 
पाबला जी को पुत्र शोक// जाकिर अली रजनीश जी 
 बड़े दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हरदिल अजीज़, ब्‍लॉग शिरोमणि बी.एस.पाबला जी के युवा पुत्र गुरप्रीत का आकस्मिक निधन आज दिनांक 08 सितम्‍बर, 2012 को प्रात: भिलाई में हो गया है। मुझे डॉ0 अरविंद मिश्र जी से यह समाचार मिला, जिसे सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। क्‍योंकि लगभग एक साल पहले गुरप्रीत का एक बड़ा एक्‍सीडेंट भी हो गया था। उस दुर्घटना के बाद गुरप्रीत काफी स्‍वस्‍थ हो गया था। लेकिन आज प्रात: पता नहीं कैसे क्‍या हुआ कि भिलाई के नेहरू नगर इलाके में गुरूप्रीत के साथ एक ट्रेन दुर्घटना हो गयी, जिसमें उसका आकस्मिक निधन हो गया। यह खबर सुनकर ब्‍लॉग जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है। मेरी इस सम्‍बंध में भिलाई निवासी ब्‍लॉग संजीव तिवारी और प्रो0 अली से भी बात हुई है। पर मैं इस शोकाकुल समय में पाबला जी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूं।

मैं अपनी पत्‍नी श्रीमति अर्शिया अली, हमारे साथी डॉ0 अरविंद मिश्र, श्री रवीन्‍द्र प्रभात एवं लखनऊ के समस्‍त ब्‍लॉगरों की ओर से गुरप्रीत की आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं और ईश्‍वर से विनती करता हूं कि वह पाबला जी और उनके परिवार को इस असह्य दु:ख को सहने की शक्ति प्रदान करे।


आमीन, सुम्‍मा आमीन। 


Wednesday, February 15, 2012

अन्याय मत लिखो, प्रतिकार मत लिखो,

जंगल से आती हु ललकार मत लिखो
इस नज्म को पोस्ट किया था जाने मने गांधीवादी हिमांशु कुमार ने. वही हिमांशु जो कहते हैं,"मैं सदैव एक योद्धा रहा हूं ! तो एक लड़ाई और सही ! इसे मैं जीवन की अंतिम और सर्वश्रेष्ठ लड़ाई की तरह लडूंगा !...I was always a fighter, so let there be another fight, the last and the best. उनकी इस काव्य रचना को नरिंदर कुमार जीत ने दोबारा पाठकों के सामने रखा और बहुत ही तेज़ी से लोक्प्रिय्हो रही यह रचना अब आपके सामने भी है.आपको यह नज्म कैसी लगी अवश्य बताएं. आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी.--रेक्टर कथूरिया 
अक्लमंद हो तो क्या लिखो ?
रूप, रंग, गंध लिखो
मन की उडान हो गई जो स्वच्छंद लिखो
तितली लिखो, फूल लिखो,
रेशम लिखो, प्रेम लिखो,
जो भी लिखो,
प्रशंसा, पैसा और सम्मान के जरूरतमंद लिखो,
चमक लिखो, दमक लिखो,
ठसक और खनक लिखो,
देश, विश्व, सत्ता के बदलते समीकरण लिखो,
अच्छा लिखो, नफीस लिखो,
ऊँचा लिखो, दमकदार लिखो,
जिनकी पढ़ने की हैसियत है,
उनकी हैसियत के अनुसार लिखो,
मुख्य धारा लिखो, बिकने वाला लिखो,
शोहरत वाला लिखो, चर्चा लायक लिखो,
छप्पर मत लिखो, साथ में नाला मत लिखो,
खून मत लिखो, भूख मत लिखो,
सडती हुई लाश पर मंडराते चील, कौवे मत लिखो,
औरत की कोख में ठूंसे गये पत्थर बिल्कुल मत लिखो,
दिवानों, पागलों और सनकियों की बात मत लिखो,
देश मत लिखो, समाज मत लिखो,
गांव मत लिखो, गरीब मत लिखो,
विकास लिखो, खनिज लिखो,
हवाई अड्डा और होर्डिंग लिखो,
ए.सी. लिखो, कार लिखो, स्काच लिखो,
सेंट लिखो, लड़की लिखो,
पैसा लिखो, मंत्री लिखो,
साहब लिखो, फाइल क्लियर लिखो,
जली हुई झोंपड़ी, लूटी हुई इज्जत, मरा हुआ बच्चा
पिटा हुआ बुढा बिल्कुल मत लिखो,
पुलिस की मार, फटा हुआ ब्लाउज ,
पेट चीरी हुई लड़की की लाश मत लिखो,
महुआ मत लिखो, मडई मत लिखो,
नाच मत लिखो, ढोल मत लिखो,
लाल आँख मत लिखो, तनी मुट्ठी मत लिखो
जंगल से आती हुई ललकार मत लिखो,
अन्याय मत लिखो, प्रतिकार मत लिखो,
सहने की शक्ति का खात्मा और बगावत मत लिखो,


क्रान्ति मत लिखो, नया समाज मत लिखो,
संघर्ष मत लिखो, आत्मसम्मान मत लिखो,
लाईन है खींची हुई, अक्लमंद और पागलों में,
अक्लमंद लिखो , पागल मत लिखो



Posted by हिमाँशु कुमार at 9:47 PM

Thursday, January 12, 2012

नई दिल्ली में एक प्रेस वार्ता

मीडिया का सामना आसान नहीं होता 
ज़िन्दगी में यूं तो कुछ भी सहज और आसान नहीं होता पर  मीडिया का सामना बहुत ही कठिन काम है. इसकी मुश्किलें वही जानते हैं जिनका सामना अक्सर मीडिया से होता है. जितना बड़ा पद उतनी बड़ी मुश्किलें. यहाँ फ़िल्मी दुनिया की तरह कोई रिटेक भी नहीं होता. जरा सी चूक और खड़ा हो सकता है तूफ़ान. एक ऐसा बवंडर जिसे सम्भालना कभी कभी बहुत ही मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐसे लोग हैं जो इस कला में पारंगत हो जाते हैं. इसका अहसास एक बार फिर होता है इस तस्वीर को देख कर. लगता है प्रेस कान्फरंस में किसी पत्रकार ने कैमरे के सामने कुछ टेड़ा  सवाल पूछ लिया है. पर महिला व बाल कल्याण विभाग की स्वतंत्र प्रभारों वाली राज्य मंत्री सुश्री कृष्ण तीर्थ ने बहुत ही संतुलित रहते हुए बात को सुना भी और उसका उत्तर भी दिया. पत्र सूचना कत्याला के कैमरामैन ने इन यादगारी पलों को  हमेशां के लिया अपने कैमरे में कैद कर लिया. गौर तलब है की ये प्रेस वार्ता 11 जनवरी, 2012 को नई दिल्ली में हुई थी. गर्व की बात है की भारत की राजनीती में अब इस तरह  के आत्म विश्वासी स्वभाव की महिला नेता लगातार बढ़ रही हैं.. -रेक्टर कथूरिया 

Wednesday, January 11, 2012

प्रवासी भारतीय दिवस – संकल्‍पना और साक्षात् के 10 वर्ष

प्रवासी भारतीय दिवस:56 देशों के प्रतिनिधियों ने  लि‍या भाग
वि‍शेष लेख                                                                                       राकेश बी. दुबे*
प्रवासी  भारतीय दिवस पर जयपुर राजस्थान में वेबसाईट लांच करते हुए प्रधान मंत्री डा.मनमोहन सिंह  उनके साथ त्रिनडाड और टोबेंगो की प्रधान मंत्री सुश्री कमला प्रसाद बिसेसर, राजस्थान के राज्यपाल शिवराज पाटिल, मुख्य म्न्त्रिअशिक गहलोत और ओवरसीज़ भारतीय मामलों के केन्द्रीय मंत्री व्यालार रवि भी नजर आ रहे हैं.
08 जनवरी, 2012 को भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीय दिवस-2012 का उद्घाटन किया । प्रवासी भारतीय दिवसों की श्रृंखला में यह दसवां कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में त्रिनीडाड एवं टोबैगो की प्रधानमंत्री श्रीमती कमला प्रसाद बिसेसर मुख्‍य अतिथि थीं ।  09 जनवरी, 2012 को भारत की राष्‍ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने, दुनियां भर में अपने-अपने क्षेत्र में उल्‍लेखनीय उपलब्‍धियां प्राप्‍त करने वाले भारतीय मूल के 14 व्‍यक्‍तियों को प्रवासी भारतीय सम्‍मान से अलंकृत किया । इस वर्ष प्रवासी भारतीय दिवस में 56 देशों के 1500 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्‍सा लि‍या। प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ भारत के जुड़ाव के इस अनूठे कार्यक्रम की संकल्‍पना किसने की, किन-किन रास्‍तों से गुजरकर वर्ष 2003 में प्रवासी भारतीय दिवस की शुरूआत हुई, इन बातों की जानकारी के लिए इतिहास पर एक सरसरी नज़र डाल लेना अभीष्‍ट होगा ।  

     प्रवास की संकल्‍पना, प्राचीन सभ्‍यताओं के समय से ही अस्‍तित्‍व में है । वैदिक सभ्‍यता से लेकर 18वीं शताब्‍दी तक इसका स्‍वरूप भारत में प्राय: ज्ञानार्जन के लिए, लोक कल्‍याण के लिए और धार्मिक अभिप्रायों से किए जाने वाले प्रवास का रहा है । बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद सम्राट अशोक ने ईसा-पूर्व तीसरी शताब्‍दी में अपने पुत्र एवं पुत्री को धार्मिक अभिप्राय से प्रवास पर भेजा था । दक्षिण भारत के राजेन्‍द्र चोल जैसे शक्‍तिशाली सम्राटों ने सुदूर पूर्व के देशों (वर्तमान मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि) तक अपनी नौसेनाओं को भेजकर राजनैतिक-आर्थिक संबंध स्‍थापित किए जो अभी तक विद्यमान हैं । अल बरूनी, मेगस्‍थनीज, मार्को पोलो, ह्वेन सांग, इब्‍न बतूता आदि ने अरब एवं यूरोपीय देशों से आकर भारत में प्रवास किया था ।  मध्‍य एशिया के देशों से आए तुर्क, हूण, पठान, उज्‍बेक आदि का भारत में आगमन तो आक्रमणकारियों के रूप में हुआ था लेकिन वे बाद में यहीं के होकर रह गए और इस प्रकार वे भी भारत में अन्‍य देशों के प्रवासी ही माने जाएंगे । हजारों वर्ष तक भारतीय सभ्‍यता का अरब देशों एवं चीन, इंडोनेशिया, बर्मा, कम्‍बोडिया आदि देशों के साथ प्रत्‍यक्ष और यूरोपीय देशों के साथ अप्रत्‍यक्ष सम्‍पर्क/संबंध रहा है ।

     व्‍यापारिक उद्देश्‍यों के लिए बड़े पैमाने पर प्रब्रजन एवं प्रवास की शुरुआत 16वीं शताब्‍दी में हुई । वॉस्‍को डि गामा, कोलम्‍बस, पेदरो अलवरेस कबराल आदि जैसे महान नाविकों ने भारत, अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों का समुद्री सम्‍पर्क यूरोपीय देशों से जोड़कर प्रवास के नए रास्‍ते खोल दिए । भारत के तटवर्ती प्रदेशों से व्‍यापारियों ने अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ संबंध बनाना शुरू किया । गुजराती व्‍यापारियों ने वर्तमान केन्‍या, उगांडा, जिम्‍बाबवे, जाम्‍बिया, दक्षिण अफ्रीका में अठारहवीं शताब्‍दी में अपने कदम रखे । इन्‍हीं में से एक व्‍यापारी दादा अब्‍दुल्‍ला सेठ के कानूनी प्रतिनिधि के रूप में महात्‍मा गांधी ने मई, 1893 में नटाल प्रान्‍त में पदार्पण किया । रंगभेद नीति के साथ उनका संघर्ष और प्रवासी भारतीय समुदाय के सम्‍मान की उनकी लड़ाई सर्वविदित है । अहिंसा और सत्‍याग्रह के सर्वथा नवीन साधनों से प्राप्‍त सफलता से वे जन-जन के मानस में प्रतिष्‍ठित हो गए । वर्ष 1915 की 09 जनवरी को वे भारत वापस लौटे और 22 वर्ष के प्रवास के बाद लौटे इस महान आत्‍मा से प्रेरणा लेकर इस दिवस को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है ।  

     दरअसल, प्रवासी भारतीयों के साथ भारत का औपचारिक संबंध तो था लेकिन एक निकटवर्ती, घनिष्‍ठ और आत्‍मिक जुड़ाव की आवश्‍यकता बहुत समय से महसूस की जा रही थी । नवम्बर, 1977 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक समारोह में तत्‍कालीन विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि दूर-दराज के देशों में बसे भारतवंशियों के साथ हमें अपना नाता और प्रगाढ़ करना होगा और कि भारत, इन प्रवासियों की सेवाओं, त्‍याग और संघर्ष को किसी प्रकार नहीं भूल सकता । प्रवासी भारतीयों के साथ अपने जुड़ाव को प्रगाढ़ करने के लिए किस प्रकार की नीतियां बनाई जाएं, कौन से साधन अपनाए जाएं और किस प्रकार का तंत्र तैयार किया जाए, इस पर चर्चा होती रही और फलस्‍वरूप 18 अगस्‍त, 2000 को विधिवेत्‍ता, संस्‍कृति कर्मी, कवि, राजनयिक एवं राजनेता डॉ लक्ष्‍मीमल्‍ल सिंघवी की अध्‍यक्षता में एक समिति का गठन विदेश मंत्रालय ने किया । इस समिति में पूर्व विदेश राज्‍यमंत्री श्री आर.एल. भाटिया, पूर्व राजनयिक श्री जे. आर. हिरेमथ, अन्‍तर-राष्‍ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्री बालेश्‍वर अग्रवाल और राजनयिक श्री जे.सी शर्मा शामिल थे । समिति ने 20 से अधिक देशों का प्रत्‍यक्ष दौरा करके, विश्‍व भर के यथा-संभव अधिकतम प्रवासी भारतीय संगठनों से, पूर्व राजनयिकों से बातचीत करके और अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव के आधार 19 दिसम्‍बर, 2001 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को दी जिसमें, अन्‍य बातों के साथ-साथ प्रवासी भारतीय दिवस 09 जनवरी को मनाए जाने और प्रति वर्ष प्रवासी भारतीय सम्‍मान दिए जाने की सिफारिशें भी शामिल थीं ।

     समिति ने पाया कि 19वीं शताब्‍दी में भारत में अंग्रेजी शासन के चलते, नए अवसरों की तलाश में और आर्थिक कारणों से बड़े पैमाने पर लोग दूसरे देशों में प्रवास पर गए । इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ब्रिटेन की संसद ने जब वर्ष 1833-34 में गुलामी प्रथा को समाप्‍त कर दिया और दुनियां भर में फैले उनके साम्राज्‍य को मजदूरों का अभाव सताने लगा तो गुलामी की एक नई तरकीब निकाली गई जिसे शर्तबंदी (अंग्रेजी में अग्रीमेंट- जिसका अपभ्रंश रूप गिरमिट पड़ गया) कहा गया । इसमें अधिकतम पांच वर्ष के अग्रीमेंट पर कामगारों को त्रिनीडाड एवं टोबैगो, गयाना, सूरीनाम, मॉरीशस और फीजी जैसे देशों में ले जाया गया । इन गिरमिटिया मजदूरों का जीवन, गुलामों से किसी प्रकार बेहतर नहीं था । प्रवासियों की दूसरी खेप, भारत की आजादी के बाद, पेशेवर कार्मिकों के रूप में अमेरिका, ब्रिटेन तथा कनाडा जैसे विकसित देशों में और इसके समानांतर एक धारा, तेल-समृद्ध खाड़ी देशों में कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों के रूप में गई । वर्ष 1970 के बाद, उच्‍च कुशल एवं पेशेवर लोग, आगे की पढ़ाई के लिए या वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों पर काम करने के लिए गए । इस प्रकार, भारत के प्रवासी समुदाय में आज की स्‍थिति में लगभग 25 लाख लोग शामिल हैं और दुनियां में चीन ही संभवत: एकमात्र ऐसा देश है जिसका प्रवासी समुदाय, भारत जैसा विविध और विशाल है ।

     चीन की आर्थिक प्रगति में प्रवासी चीनियों के भारी योगदान को देखते हुए, प्रवासी भारतीयों के भारत से आत्‍मिक/आध्‍यात्‍मिक/सामाजिक जुड़ाव को देखते हुए और पश्‍चिम के देशों में अपनी कड़ी मेहनत के बल पर आर्थिक समृद्धि प्राप्‍त कर लेने पर अपनी मातृभूमि के प्रति कुछ करने की आकांक्षा से साक्षात्‍कार करते हुए समिति ने पुरजोर सिफारिश की कि इस विशाल प्रवासी भारतीय समुदाय से लाभ उठाने से पहले हमें उनकी समस्‍याओं एवं चिंताओं का समाधान करना होगा जैसे कि-  

1.      खाड़ी देशों में जाने वाले श्रमिकों के साथ भारत में भर्ती कंपनियां धोखाधड़ी करती हैं। 
2.      काम के दौरान मालिकों द्वारा उनके पासपोर्ट अपने कब्‍जे में ले लिए जाते हैं, उन्‍हें पूरी मजदूरी नहीं दी जाती है, उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता है, उनका दैहिक शोषण किया जाता है ।
3.      भारतीय दूतावासों से उन्‍हें पर्याप्‍त मदद नहीं मिलती है । भारत में उनके परिवारी जनों की सुरक्षा नहीं की जाती है ।
4.      भारत लौटने पर उन्‍हें कस्‍टम अधिकारियों द्वारा परेशान किया जाता है ।
5.      अन्‍य देशों की नागरिकता गृहण कर चुके भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों को भारत आगमन के लिए विदेशियों की तरह वीसा लेना पड़ता है ।
6.      प्रवासियों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक, आर्थिक चिंताओं के समाधान के लिए भारत में उन्‍हें बहुत भटकना पड़ता है ।
7.      पूर्वी अफ्रीकी देशों में,  फीजी में तथा अन्‍य देशों में भी भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों के सामने राजनैतिक/सामाजिक/जातीय आधार पर संकट आने की स्‍थिति में उनकी सहायता के भारत को आगे आना चाहिए, अनिवासी भारतीयों को भारत में मताधिकार होना चाहिए, आदि आदि ।
भारत सरकार ने इन समस्‍याओं के समाधान के लिए इन 10 वर्षों में कई उल्‍लेखनीय कदम उठाए हैं- 
1.      खाड़ी देशों में या अन्‍यत्र भी, आपत्‍ति में आए साधनहीन प्रवासियों की सहायता के लिए 43 देशों में भारतीय समुदाय कल्‍याण कोष की स्‍थापना की गई है । इसमें अन्‍य के साथ-साथ, मुसीबतज़दा मजदूरों/घरेलू नौकर/नौकरानियों को रहने-खाने की व्‍यवस्‍था, सरकारी खर्च पर उन्‍हें भारत पहुंचाने की सुविधा और दुर्भाग्‍यवश मौत हो जाने पर पार्थिव शरीर को भारत लाया जाना शामिल है ।
2.      भारतीय मूल के व्‍यक्‍तियों को भारत की यात्रा के लिए लम्‍बी अवधि का एकमुश्‍त वीसा एवं रहने की अवधि में छूट प्रदान करने वाला पीआईओ कार्ड दिया गया । बाद में इसका नवीकृत रूप ओसीआई कार्ड दिया जा रहा है । इससे भारतीय मूल के व्‍यक्‍ति लंबी अवधि तक बिना वीजा के भारत आ-जा सकते हैं । यह योजना वर्ष 2005 से लागू है और अब तक 8 लाख से अधिक ओसीआई कार्ड जारी किए जा चुके हैं ।  
3.      सैकड़ों वर्ष पूर्व गए प्रवासियों की चौथी-पांचवीं पीढ़ी अपने पैतृक स्‍थान की खोज में बहुत परेशानियों का सामना करती थी । इसके लिए वर्ष 2008 से ट्रेसिंग द रूट्स नाम की योजना चलाई जा रही है ।
4.      प्रवासी भारतीयों की युवा पीढ़ी को आधुनिक भारत का साक्षात्‍कार कराने के लिए ‘भारत को जानो’ (know India program) चलाया जा रहा है । अलग-अलग राज्‍यों के सहयोग से चलाई जाने वाली योजना में 18 से 26 वर्ष के युवाओं को भारत की प्रायोजित यात्रा कराई जाती है । अब तक 17 यात्रा-कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं जिनमें पांच सौ से अधिक युवा हिस्‍सा ले चुके हैं ।  
5.      युवा पीढ़ी को भारत में उपलब्‍ध उच्‍च स्‍तरीय शिक्षा की सुविधा देने के लिए, उच्‍च शिक्षा संस्‍थानों में उनके लिए स्‍थान आरक्षित किए गए हैं और प्रति वर्ष 100 विद्यार्थियों को 5000 अमेरिकी डॉलर प्रति विद्यार्थी की दर से छात्रवृत्‍ति दी जाती है । अलग से पीआईओ विश्‍वविद्यालय स्‍थापित किए जाने की योजना पर काम चल रहा है ।
6.      ओवरसीज इंडियन यूथ क्‍लब, स्‍टडी इंडिया प्रोग्राम,  आदि के द्वारा नई पीढ़ी को भारत से जोड़ने का काम किया जा रहा है ।
7.      वर्ष 2003 से लगातार प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन 7 से 9 जनवरी तक किया जाता है जिसमें भारत के प्रधान मंत्री, राष्‍ट्रपति, कई केन्‍द्रीय मंत्री, राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री तथा मंत्रालयों/विभागों के उच्‍चाधिकारी शामिल होते हैं । प्रवासी भारतीय दिवस, एक उल्‍लेखनीय आयोजन बन गया है । अब तक दिल्‍ली में 6 और मुंबई, हैदराबाद, चैन्‍नई और जयपुर में एक-एक प्रवासी भारतीय दिवस आयोजित किए जा चुके हैं । औसतन 1500 से 1800 प्रतिनिधि इन आयोजनों में प्रति वर्ष हिस्‍सा लेते हैं ।
8.      लघु प्रवासी दिवसों की योजना शुरू की गई है । अब तक न्‍यूयॉर्क, सिंगापुर और कनाडा में ऐसे लघु प्रवासी दिवस मनाए गए हैं । अगला दिवस, दुबई में आयोजित किया जाएगा ।
9.      अपने-अपने प्रवास के देश में उल्‍लेखनीय सफलताएं प्राप्‍त करने वाले, मानव सेवा के क्षेत्र के काम करने वाले तथा भारत का नाम रोशन करने वाले व्‍यक्‍तियों/संस्‍थाओं को प्रति वर्ष राष्‍ट्रपति द्वारा सम्‍मानित किया जाता है । वर्ष 2012 तक 133 व्‍यक्‍तियों एवं 03 संस्‍थाओं को उनकी उपलब्‍धियों/सेवाओं के लिए सम्‍मानित किया जा चुका है ।
10.  अनिवासी भारतीयों द्वारा भारतीय महिलाओं से विवाह के बाद विदेश ले जाकर उन्‍हें परेशान किए जाने की घटनाओं को देखते हुए, प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय द्वारा एक विशेष प्रकोष्‍ठ का गठन करके तथा अलग-अलग देशों के महिला संगठनों की सहायता से परित्‍यक्‍त/सताई गई महिलाओं की सहायतार्थ कदम उठाए जा रहे हैं।

     इतना सब होने के बावजूद, अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है । अनिवासी/प्रवासी भारतीयों को ओसीआई कार्ड प्राप्‍त करने में, भारत में छूट गई अपनी अचल सम्‍पत्‍तियों की सुरक्षा में, यहां चलने वाले मुकदमों में बार-बार पेश होने में, चैरिटी के कार्यों हेतु उचित चैनल उपलब्‍ध न होने के रूप में, उच्‍च स्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं स्‍थापित करने में स्‍थानीय स्‍वीकृतियां आसानी से उपलब्‍ध होने में, उचित पारिश्रमिक और आसान सेवा शर्तें न होने के कारण उत्‍कृष्‍ट शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्‍थानों में अपनी सेवाएं देने में अड़चनों/समस्‍याओं का सामना करना पड़ रहा है । परन्‍तु इतना तय है कि प्रवासी भारतीयों के साथ एक सक्रिय एवं व्‍यापक संपर्क/संबंध/सहयोग के कार्यक्रम के रूप में वर्ष 2003 से प्रारम्‍भ, प्रवासी भारतीय दिवस ने हमें एक रास्‍ता दिखाया है । हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि यह कार्यक्रम, केवल एक आर्थिक गतिविधि बनकर न रह जाए अपितु इसका सरोकार, प्रवासी भारतीयों की सांस्‍कृतिक, सामाजिक एवं भावनात्‍मक चिंताओं से भी बना रहे ।  

  इसके लिए न केवल प्रवासी भारतीय समुदाय की विशालता, विविधता और उपलब्‍धियों को भी भारतीय जनता के सामने रखना होगा और उनकी समस्‍याओं, भारत से उनकी अपेक्षाओं को भी समझना होगा बल्‍कि अपने नीतिगत ढांचे में और बदलाव लाकर, प्रवासियों के प्रति अनुकूल वातावरण बनाकर, उनकी सेवाओं का लाभ उठाते हुए, उनके भारत के साथ गहरे अनुराग को सराहा जाना होगा ।           ..............

प्रवासी भारतीय दिवस

मानव संसाधन मंत्रालय ने निकाला पत्रिका का विशेष अंक
मानव संसाधन‍विकास मंत्रालय ने प्रवासी भारतीय दिवस पर अपनी पत्रिका का एक विशेष अंक निकाला है। यह पत्रिका हर तीन महीने पर जारी होती है और बीते साल प्रवासी भारतीय दिवस के दौरान इसका विशेष अंक निकाला गया है। पत्रिका के इस विशेष अंक में भारत-अमरीकी शिखर सम्‍मेलन, भारत-ब्रिटेन शिक्षा मंच जैसे कई महत्‍वपूर्ण द्विपक्षीय घटनाओं को सम्मिलित किया गया है। इस विशेष अंक में खासतौर से प्रवासी भारतीयों के लिए योजनाओं/कार्यक्रमों से संबंधित मानव संसाधन मंत्रालय, विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग, एआईसीटीई की नई गतिविधियों को भी प्रमुखता दी गई है।

पत्रिका में अपने संदेश में मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्‍बल ने कहा है कि वे विदेश में रह रहे भारतीय समुदाय की सराहना करते हैं। उन्‍होंने कहा कि हमारी दृष्टि युवाओं के लिए सही मायने में नवीन सोच का सृजन करने वाला एक शैक्षिक व्‍यवस्‍था का निर्माण करना है, ताकि हमारे युवा समीक्षात्‍मक सोच, विश्‍लेषणात्‍मक तर्क वितर्क, समस्‍या समाधान और संचार की क्षमता विकसित कर सकें। साथ ही हमारा उद्देश्‍य ऐसे लोगों को तैयार करना है, जो महत्‍वाकांक्षी हों और आत्‍मविश्‍वास से भरे हों। इस सोच को मूर्त रूप देने के लिए हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था में भारतीय प्रवासी समुदाय के साथ सहयोग बनाने के कई अवसर हैं। कौशल विकास, संस्‍थानों का संजाल, उन्‍नत अनुसंधान को मदद और नये शैक्षिक संस्‍थानों के लिए निजी-सरकारी साझेदारी को बढ़ावा देना भी कुछ ऐसे ही कदम हैं। हम उम्‍मीद करते हैं कि प्रवासी भारतीय समुदाय इस साहासिक कार्य में हमारा साथ देने के लिए आगे आएगा। 

Monday, December 19, 2011

पत्रकार पर कातिलाना हमले का मामला गरमाया

हमलावरों को पकड़ने की मांग ने पकड़ा जोर 
प्रशासन को दिया 72 घंटे का अल्टीमेटम   
     गजिंदर सिंह किंग की ख़ास  रिपोर्ट  
अमृतसर// 18  दिसम्बर, 2011// 
दैनिक जागरण के पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले के विरोध में आज अमृतसर के पत्रकार सड़कों पर उतरे और पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह पर हमला करने वालों के लोगों की गिरफ्तारी की मांग की और साथ ही उन्होंने अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर को एक मांग-पत्र भी दिया
     अमृतसर में दैनिक जागरण अखबार के पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर बीती रात कुछ अज्ञात लोगों ने जान लेवा हमला कर दिया, पत्रकार महिंदर पाल सिंह जब आपने घर वापस जा रहां था, तब कोर्ट रोड पर कुछ अज्ञात लोगों ने उन के सिर पर तेज धार हथियार से वार किया, उस के बाद महिंदर पाल सिंह पर गोलियां चला दी, जिस के चलते एक गोली मोहिंदर पाल सिंह के पैर पर लगी, महिंदर पाल सिंह दैनिक जागरण अखबार में बतौर चीफ क्राइम रिपोटर के पद काम करता है, वहीँ गोली लगने के बाद मोहिंदर पाल सिंह को अमृतसर के ई, एम, सी हस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहाँ उन की हालत नाज़ुक बनी है, वहीँ इस मौके पर घटना स्थल पर पहुंचे अमृतसर पंजाब पुलिस के ए, डी, सी, पी बलजीत सिंह रंधावा का कहना है, कि यह मामला उन के सामने आया है, कि आज रात को 9 बजे के करीब जब वह आपने घर जा रहा था, तब उन पर कुछ अज्ञात लोगों ने हमला किया है और आज सुबह से ही उन को धमकी भरे फ़ोन भी आ रहे थे, जिस की जांच की जा रही है, उन्होंने कहा, कि  पुलिस ने एक विशेष टीम बना कर छापे-मारी शुरू कर दी है और जल्द ही आरोपियों को गिरफ्तार किया जायेगा
     लोक तन्त्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारो ने सडको पर उतार कर पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले के की पत्रकार समुदाय ने इस की घोर निंदा की और पत्रकारों ने काले रिबन लगा कर पैदल रोष मार्च प्रोटेस्ट सर्कट हाउस से निकाल कर अमृतसर के डिप्टी कमिश्र्नर के घर तक निकाल कर पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह के गुनहगारों को गिरफ्तार करने की मांग की और पत्रकार महिंदर पाल सिंह को सरकारी सहायता देना, पत्रकारों की सुरक्षा को यकीनी बनाना और 72 घंटे के अन्दर सरकार अपराधियों को गिरफ्तार करने का मांग-पत्र दिया, इस दौरान सीनियर पत्रकारों ने पत्रकार महिंदर पाल सिंह पर हुए कातिलाना हमले की निंदा करते हुए कहा, कि पुलिस प्रशासन ने अभी तक उन हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया है, जिन्होंने यह हमला करवाया और किया है उन्होंने कहा, कि प्रशासन को चाहिए वह जल्द से जल्द उन हमलावारो को गिरफ्तार करे और जिस तरह से अपराधी बे-लगाम हो रहे है, वह चिंता की विषय बना हुआ है, उन्हीने मांग की, कि किसी तरह से पत्रकारों की सुरक्षा को यकीनी बनाया जाये और जिस के चलते वह प्रशासन को 72 घंटे का समय देते है
     वहीँ इस मौके पर पत्रकारों ने अमृतसर के डिप्टी कमिश्र्नर को एक मांग-पत्र दिया,  साथ ही इस मौके पर डिप्टी कमिश्नर ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा, कि यह एक बुरी घटना है और इस के चलते एक विशेष एस,आई,टी (Speacial Investigation Team) का गठन किया गया है और इस मांग-पत्र को सरकार तक पहुंचा दिया जाएगा, ताकि उन अपराधियों को गिरफ्तार किया जा सके
    फिलहाल अब देखना यह होगा, कि आने वाले 72 घंटो में प्रशासन क्या भूमिका अदा करता है और पत्रकार मोहिंदर पाल सिंह के गुनहगारों को पकड़ने में कितना कारगर साबित होता है

Sunday, August 28, 2011

मीडिया पर छाई अन्ना की जीत

पंजाब केसरी के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित खबर 
अन्ना की जीत ने एक नया इतिहास रचा है. जन तन्त्र में डगमगाया विशवास इस जीत ने एक बार फिर भाल कर दिया है. जिन लोगों के सामने इस भ्रष्ट तन्त्र ने अन्धेरा ही अन्धेरा कर रखा था, उह्नें भी लगा है कि नहीं बहुत कुझ किया जा सकता है. जो लोग माओवाद या नक्सलवाद के रास्ते की तरफ  कुछ आशाएं बांध कर सोच रहे थे उन्हें लगा है कि नहीं अभी भी इस हालत में भी इस देश में शांतमय  रह कर बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ी जा सकती है. बाबा रामदेव के साथ सलूक से नाराज़ हुए लोगों ने भी सरकार के रवैये पर दोबारा सोचना शुरू कर दिया है. आतंकी संगठन इस देश में लोक तन्त्र की हत्या जैसे जिन मुद्दों को अक्सर उठाते थे उनके सामने सरकार ने साबित कर दिया है कि यहां ऐसा कुछ नहीं होता. यहां लोक तांत्रिक ढंग से उठाई गयी आवाज़ को पूरी गंभीरता से सुना जाता है. इस जीत की ख़बरों को अख़बारों ने पूरी प्रमुखता से प्रकाशित किया है.जालंधर से प्रकाशित पंजाब केसरी ने भी इस जीत की खबर को अपनी मुख्य खबर बनाते हुए शीर्षक दिया है जन का होगा लोक पाल. इस खबर के अलावा भी अख़बार ने इस मुद्दे पर बहुत कुछ प्रकाशित किया है.
इसी तरह दैनिक जागरण ने भी इसे अपनी मुख्य खबर बनाते हुए लिखा है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में शनिवार को एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ गया। जन आंदोलन के सामने आखिरकार सरकार झुकी। अपार जन समर्थन की बदौलत अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन जीत गया। संसद में उनकी तीनों प्रमुख मांगों के समर्थन में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ। इसके साथ ही अन्ना ने रविवार को सुबह १० बजे अपना अनशन तोड़ देने का एलान भी कर दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा कि जनता की इच्छा ही संसद की इच्छा है। संसद में प्रस्ताव पारित होने की खबर मिलते ही रामलीला मैदान के साथ-साथ देश के दूसरे अन्य भागों में लोगों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। अपने अनशन के १२वें दिन अन्ना हजारे अपने हजारों समर्थकों के साथ दूसरी बार जश्न मना रहे थे। इस बार आंदोलनकारियों के बीच एक मंत्री और दो कांग्रेसी सांसद भी मौजूद थे। केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सांसद संदीप दीक्षित तथा विलास मुत्तमवार प्रधानमंत्री की चिट्ठी लेकर आए थे। इसमें अन्ना की तीनों मांग के समर्थन में संसद में प्रस्ताव पारित होने की सूचना थी। साथ ही अनुरोध था अनशन तोड़ देने का। अन्ना ने तुरंत कहा कि वे अगली सुबह दस बजे अनशन तोड़ देंगे। इससे पहले अन्ना की तीनों मांगों को संसद में पारित किया जा चुका था। छुट्टी के दिन बुलाई गई संसद की कार्यवाही की शुरुआत में ही इसका प्रस्ताव सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने रख दिया। उन्होंने पहले अन्ना के आंदोलन और उस संबंध में सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी दी। रात आठ बजे तक चली कार्यवाही के अंत में यह प्रस्ताव पारित माना गया। यही प्रक्रिया राज्यसभा में भी अपनाई गई। इस तरह जन लोकपाल के तीनों अहम बिंदुओं के पक्ष में सदन की भावना जाहिर हो गई। अन्ना की तीन अहम मांगों में पहली थी-राज्यों में भी लोकपाल की तर्ज पर लोकायुक्त कायम हो। उनकी दूसरी मांग थी- सभी केंद्रीय कर्मचारी लोकपाल के और राज्य सरकार के सभी कर्मचारी लोकायुक्त के दायरे में आएं। तीसरी मांग थी कि नागरिक घोषणापत्र के जरिये जनता के सारे काम तय समय सीमा में हों। हालांकि शनिवार को भी सरकार लगातार इस कोशिश में रही कि सिर्फ सदन में चर्चा कर इस मामले को निपटा दिया जाए और इस पर प्रस्ताव पारित नहीं करना पड़े। सरकार के इस रवैये से एक बार फिर माहौल बिगड़ने की नौबत आ गई, मगर मुख्य विपक्षी दल भाजपा के हस्तक्षेप के बाद कुछ ही घंटों के अंदर सरकार ने फिर सफाई दी कि वह प्रस्ताव पारित करने के लिए तैयार है। आखिरकार रात लगभग आठ बजे प्रणब ने एक बार फिर सरकार का प्रस्ताव रखा, जिसे सदस्यों ने मेज थपथपा कर पारित करवाया। साढ़े आठ बजे राज्यसभा में भी यह प्रस्ताव पारित हुआ। सदन की इस भावना को संसद की स्थायी समिति के पास भेजा जाएगा। वहां इस बिल पर पहले से ही चर्चा हो रही है। संसद में आम तौर पर किसी भी प्रस्ताव के पक्ष में ध्वनि मत विभाजन की प्रक्रिया इस मामले में नहीं अपनाए जाने के बावजूद इसे सदन से पारित प्रस्ताव माना जाएगा। पूर्व सॉलीसिटर जनरल हरीश साल्वे के मुताबिक चूंकि इस प्रस्ताव का किसी सदस्य ने विरोध नहीं किया इसलिए इसमें ध्वनि मत की जरूरत नहीं थी। प्रस्ताव पास होने के बाद खुद प्रणब मुखर्जी ने कहा भी कि उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके साथ ही संसद की सर्वोच्चता और इसे चुनौती जैसी बहस अब समाप्त हो जाएंगी। सदन में चर्चा के दौरान भाजपा और जद (यू) ने तीनों बिंदुओं का पूर्ण समर्थन किया। बसपा और वाम दलों ने लोकायुक्त की मांग को छोड़ बाकी दोनों मांगों का समर्थन किया। कांग्रेस सदस्यों ने किंतु-परंतु के साथ इन मांगों को समर्थन दिया।

Thursday, August 26, 2010

हिंदुस्तान में सचमुच दिलजला आदमी पाना मुश्किल है

यह इन्हीं दिनों की बात है पर अभी तक मुझे यकीन नहीं हो पा रहा. लगता है कोई सपना देख लिया. भला आज के युग में इतने सच कोई इतनी बेबाकी से कैसे बोल सकता है ? किसको है देश की फ़िक्र ? कौन करता है मुद्दों की बात ? कौन छोड़ता है अपना सुख ? कौन करता होगा जनता की बात ? पर यह सभी कुछ है आजके इस कलियुग में है. आज के इस कारोबारी युग में है. मैं पहली बार तो पूरा पढ़ ही नहीं पाया. गला भरा, आँखें भरी..जी चाहा कहीं जा कर छुप छुपा कर रो लूं तो शायद मन हल्का हो जाए. तीन चार बार में तोड़ तोड़ कर पढ़ा तो सारी रात सो नहीं पाया. दिल दिमाग को हिला देने वाला यह आलेख. प्रस्तुत हैं उस सम्पादकीय लेख के कुछ अंश.--रेक्टर कथूरिया 
हरिवंश | 7/18/2010 2:59:25 AM
खबर को पढ़ने के बाद से ही बार-बार यह सवाल बेचैन कर रहा है कि 42 वर्षीय कैक्सी ताइवान में सुख का जीवन जी रहे हैं. इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. फ़िर भी वह चीन जाने को क्यों बेचैन हैं? क्यों मौत आमंत्रित करने की बेचैनी है, उनमें? चीन, जहां उन्हें बचा जीवन जेल के शिकंजों में ही गुजारना होगा या मृत्युदंड की सजा होगी.
22 वर्षो से कैसे वह आग एक इंसान में धधकती रह सकती है? यह जानना, इंसान के उत्कर्ष को समझने जैसा है. वह भी इस भोग के युग में? किस तरह वह सुख का जीवन छोड़ अपने मार्गदर्शक और मित्र ली के साथ जेल काटना चाहते हैं? कैक्सी कहते हैं कि इस तरह का जीवन जीना ही मेरे लिए बड़ा सम्मान है.‘इट विल बी ए ग्रेट ऑनर फ़ॉर मी’. एक तरफ़ चीन में आज भी ऐसे नेता हैं, अपने विचारों के लिए मर मिटनेवाले? पर क्या रीढ़ है, भारत के नेताओं की? पद और कुरसी के लिए हर क्षण अपनी आत्मा गिरवी रखने को तैयार हैं. कर्म,जीवन और कनविक्शन में भारतीय नेताओं का कोई तालमेल ही नहीं.
1975-1980 तक भारत में तपे-तपाये नेताओं की पीढ़ी बची थी. जब इमरजेंसी लगी, तो अनेक लोगों ने माफ़ी मांग ली. फ़िर भी रीढ़वाले लोग थे. आज की राजनीति में अगर भारत में यह अग्नि परीक्षा हो जाये, तो कैक्सी के चरित्र के कितने लोग मिलेंगे? आज मामूली प्रतिबद्धता या वैचारिक आग्रह भी हमारे नेताओं में नहीं है. जीतते किसी दल से हैं, समर्थन किसी सरकार को देते हैं. सरकार बनाने में कहीं फ़ुदक कर चले जाते हैं. याद करिए लालू जी के जमाने में भाजपा से लेकर माले तक के विधायक अपनी मूल नाभि (दल) विचार से टूट कर सत्ता पक्ष में जा मिले.
हम रीढ़हीन कौम हैं. पैसे और पद के लिए विचार, संकल्प और अंतरात्मा गिरवी रखनेवाले. हम जयचंद, मीरजाफ़र,जगत सेठ की परंपरा, विचार और प्रभाव में पले-बढ़े लोग हैं. हमारे रक्त में खोट और दोष है.1857 से 1947 के बीच भारतीयों की एक रीढ़वाली कौम पैदा हुई. बहादुरशाह जफ़र, झांसी की रानी, कुंवर सिंह से चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुभाष की आवाज. आत्मबलवाले गांधीवादियों की साहसिक परंपरा. पर अब वह सब कुछ अतीत बन रहा है.
विरोध की राजनीति करना, सम्मान की बात नहीं रही. आत्मा की सौदेबाजी कर या गिरवी रख सत्ता पाना उपलब्धि है. दलाल बनना गौरव की बात है. शॉर्टकट सफ़लता आज फ़ैशन में है.क्यों हैं हम ऐसे?
मुझको ऐसा लगता है कि अपने देश में क्रांति, असंभव शब्द मैं इस्तेमाल नहीं करूंगा, प्राय: असंभव हो गयी है. लोग आधे-मुर्दा हैं, भूखे और रोगी हैं, लेकिन संतुष्ट भी हैं. संसार के और देशों में गरीबी के साथ-साथ असंतोष है और दिल में जलन. यहां थोड़ी-बहुत जलन इधर-उधर हो तो हो, लेकिन कोई खास मात्रा में जलन या असंतोष नहीं है.हिंदुस्तान में सचमुच दिलजला आदमी पाना मुश्किल है, जैसा कि यूरोप में होता है. यूरोप में तो आदमी अकड़ जाता है. अंदरूनी जुल्म के खिलाफ़ उस तरह का अकड़ा हुआ आदमी यहां पाना मुश्किल है. मैं इस बात को फ़िर दोहरा देना चाहता हूं कि बाहरी जुल्म के खिलाफ़ तो हमारे यहां भी उखड़े हुए आदमी रहे हैं, लेकिन अंदरूनी जुल्म के खिलाफ़ नहीं.
सच कहने को कोई तैयार नहीं.अब इस प्रकरण में एक नयी जानकारी आयी है, द संडे गार्जियन (20 जून, 2010) में. इस जानकारी के अनुसार एंडरसन की रिहाई के बाद मोहम्मद युनूस के बेटे की गंभीर सजा को अमेरिका ने माफ़ किया. मोहम्मद युनूस नेहरू परिवार के निकट मित्र और विश्वस्त सहयोगी रहे हैं. उनके पुत्र ओदल सहरयार को अमेरिका ने एक अपराध के मामले में 35 वर्ष की सख्त सजा सुनायी थी. इसके ठीक छह महीने पहले 7दिसंबर 1984 को भारत ने यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन द संडे गार्जियन की रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सहरयार की रिहाई, एंडरसन को सुरक्षित अमेरिका पहुंचाने के बाद हुई. साफ़ है, दोनों घटनाओं के बीच कोई रिश्ता है.यह खेल है सत्ता का. पर भारत में कोई सच बोलने का साहस नहीं कर रहा. दूसरी तरफ़ हाल में मैक्िसको की खाड़ी में तेल का रिसाव हुआ. अमेरिका के समुद्री तट से 65 किलोमीटर दूर. इसमें कुल 11 लोग मारे गये. इस मामले को खुद राष्ट्रपति ओबामा देख रहे हैं. दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी बीपी भारी मुसीबत में है. खुद ओबामा कंपनी के खिलाफ़ बयान दे चुके हैं.को भारत से निकालने में मदद की.
एक बार एक ही आदमी को सूली लगायी गयी थी, उस एक का परिणाम गुलामों का नजात साबित हुआ. एक ही आदमी को गोली मार दी गयी थी, उस एक का नतीजा हुआ नफ़रत की जलती हुई मशालें बुझ गयीं. सिर्फ़ 72 आदमियों ने नमक आंदोलन शुरू किया था, और उसके अंत में करोड़ों बिजलियां कौंधने लगी थीं. एक ही बच्चे को सामंत की गाड़ी ने कुचला था और उसके फ़लस्वरुप फ्रांस की गलियों में आजादी को बराबरी की पुकार लहू से भीग कर चिल्लाई थी. एक मंगल पांडेय के शरीर को गोलियों ने छेदा था और उसके नतीजे में लाखों गरज फ़ूट कर निकली थी, दिल्ली चलो- दिल्ली चलो. और एक ही हब्शी को जिंदा जलाया गया था, जब अब्राहम लिंकन ने कहा था कि गुलामी को नेस्तनाबूद कर दो. बगावत एक ही लफ्ज है. उसकी बुनियाद में इंसान है, उसका फ़ैलाव इंकलाब है. उसका नतीजा तख्तों और जुल्मों को पलटनेवाली आजादी है.

मैं एक अघोषित पागल हूं. कड़ियों, ईटों की छत-दीवारें दरकीं, बिना पलस्तर की,टूटे-उखड़े हैं फ़र्श और हैं फ़टी चादरें बिस्तर की,घर की न मरम्मत करा सका, दो बार विधायक रहकर भी, मैं एक खंडहरवासी हूं, खुश हूं इस बदहाली में भी,लाखों जनसाधारण बेघर उनकी पीड़ा से घायल हूं. मैं एक अघोषित पागल हूं. 111 करोड़ के इस मुल्क को आज ऐसे पागल चाहिए! अगर कहीं है, तो उनका विवरण और पता जरूर भेजें. (प्रभात खबर से साभार)
इसे पूरा पढने की हिम्मत और चाहत अगर हो तो बस यहाँ क्लिक कीजिये.  


एक नज़र :गबरू जवान हुआ एक किशोर
                             नदीम अख्तर

Saturday, March 20, 2010

....और अब आज़रबायीजान में शुरू हुआ ब्लागरों पर हकूमती कहर.

मिस्र में ब्लागरों पर हकूमती कहर की खबर अभी ताज़ा ही थी कि अब आज़रबायीजान में  भी इस खतरनाक सिलसिले की शुरुयात हो गयी है. वहां पर निशाना बनाया गया है उन दो बलागरों को जिन पर आरोप है कि उन्हों ने कुछ ऐसी वीडियो यू-टयूब  पर पोस्ट कर दी जो सरकार को रास नहीं आती. अदनान हजिज़ादे और  एमिन मिल्ली की सभी अपीलों और दलीलों को सिरे से ही ख़ारिज करते हुए बाकू की अदालत ने उन्हें दो और ढाई साल

कैद की सजा सुना दी. सुनवाई और सजा का यह सारा ड्रामा दस मार्च

2010 बुधवार को हुआ. अमनैस्टी इंटरनैशनल के यूरोप और केंद्रीय एशिया

के डिप्टी प्रोग्राम डायरेक्टर ऐन्द्रिय हुबेर ने इस सारे मामले का गंभीरता से

नोटिस लेते हुए इसकी सखत निंदा की और उसी दिन एक विशेष प्रेस नोट

भी मीडिया को जारी किया. अमनैस्टी इंटरनैशनल ने ब्लागरों पर लगाये गए

आरोपों को आधारहीन और जाली बताते हुए इसे एक दमनपूर्ण कारवाई

बताया. ये दोनों ब्लागर अपने विचारों के आदान प्रदान के लिए यू-टयूब

 फेसबुक और ट्विट्टर का इस्तेमाल किया करते थे. इनकी गिरफ्तारी भी

एक बहुत ही नाटकीय ढंग तरीके से की गयी.  इन दोनों ब्लागरों पर पहले

तो दो अज्ञात व्यक्तियों ने अचानक कहीं से निकल कर हमला किया और जब

पुलिस वह पहुंची तो पुलिस ने उलटे इनको ही गिरफ्तार कर लिया. यू

टयूब पर पोस्ट की गयी वीडियो और और इस नाटकीय गिरफ्तारी में केवल

एक हफ्ते का अंतर है. पोस्ट की गयी स्टोरी में चर्चा थी उस डील के

जिसके अंतर्गत वहां की सरकार हजारों लाखों डालर खर्च करके जर्मनी से

गधों का आयात कर रही है. एक गधे को पत्रकार सम्मलेन संबोधित करते

हुए दिखा कर इस वीडियो में व्यंग्य का तीखा पुट डाला गया

है. करीब  सवा  पांच मिनट की इस वीडियो को देखने के लिए आप

यहां क्लिक कर सकते हैं.  इस मुद्दे को अंग्रेजी में पढने के लिए यहां

क्लिक करें.          

--रैक्टर कथूरिया