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Tuesday, September 24, 2013

INDIA: सत्ता में सहभागिता का भ्रम-2//--सचिन कुमार जैन

An Article by the Asian Human Rights Commission  Mon, Sep 23, 2013 at 9:06 AM
लोगों ने विरोध किया तो उन्हे राष्ट्र विरोधी और नक्सलवादी कह कर अपराधी करार दिया गया
विकास के नाम पर सरकार के काम लोगों के खिलाफ जा रहे हैं
एक अच्छा शासन व्यावस्था का सूचक है व्यवस्था में समाज की हिस्सेदारी; इस हिस्सेदारी का मतलब यह अहसास बनाए रखना है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं है. सत्ता में लोगों की सहभागिता की वकालत करते समय हम मानते हैं कि समाज को किसी भी गलत व्यवहार के खिलाफ निर्णय लेने का अधिकार भी होगा. उड़ीसा के नियमागिरी क्षेत्र में आदिवासी जिस पहाड़ को पूजते हैं और जिससे उनकी खाद्य और आजीविका सुनिश्चित होती है, बाक्साईट के लिए उस पहाड़ को मिटाने की योजना बन गयी क्योंकि विकास होना है. लोगों ने विरोध किया तो उन्हे राष्ट्र विरोधी और नक्सलवादी कह कर अपराधी करार दिया गया. आखिर में सर्वोच्च न्यायलय ने संविधान की लाज रही और कहा कि ग्राम सभाएं तय करेंगी कि वहाँ खनन होगा या नहीं; आखिर में सभी १२ ग्राम सभाओं ने खनन के विरोध में प्रस्ताव पारित किया. यह एक उदहारण है कि विकास के नाम पर सरकार के काम लोगों के खिलाफ जा रहे हैं.
वर्ष २००६ में हमारी संसद ने एक और क़ानून बनाया – वन अधिकार क़ानून; यह क़ानून इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसमे सरकार ने माना था कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्याय होता रहा है और उनसे उनके संसाधन छीने जाते रहे हैं. वे हज़ारों साल से जिस जमीन पर रहते हैं, उन जमीनों को पहले अंग्रेजों और बाद में भारत की सरकारों ने कागजों पर गलत नियम – क़ानून बना कर अपने कब्जे में ले लिए और प्राकृतिक अधिकार के बावजूद आदिवासियों और जंगलों में रहने वालों को अतिक्रमणकारी कहा जाने लगा. भारत सरकार ने कहा अब उन्हे जंगल पर अधिकार दिया जायेगा; पर इसके लिए आदिवासी समाज को प्रमाण देकर यह सिद्ध करना था कि कि वह कितने और किस जरूरत के लिए जंगल का उपयोग करता है! जो समाज अपनी ही व्यवस्था में रहता आया हो, जिसमे जंगल या जमीन को निजी संपत्ति न माना हो; उससे कागजी प्रमाणों की मांग की गयी. इसके उलट दूसरी तरफ सरकार के पास हर जिले में हर गांव के बारे में यह जानकारी दस्तावेजी रूप में उपलब्ध है कि संसाधनों का समुदाय कैसा उपयोग करता है? ऐतिहासिक अन्याय से मुक्त करने के मकसद से बनाए गए क़ानून में सरकार ने यह नहीं कहा कि हम उनकी मुक्ति का पहला कदम उठाएंगे और हर दस्तावेज ग्राम सभा को बिना मांगे उपलब्ध करवाएंगे. यही कारण है कि आज भी देश भर में लोगों को केवल ३ प्रतिशत सामुदायिक हक मिल पाए हैं. ऐसे में समावेशी विकास और सहभागिता के मौजूदा चेहरे पर कितना विश्वास किया जाना चाहिए?
भेदभाव अभी भी सबसे बड़ी चुनौती है. पारंपरिक रूप से दलितों के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक छुआछूत की व्यवस्था बनी रही है. स्कूल में बच्चों के साथ भेदभाव, कुएं पर पानी भरने और दलित व्यक्ति को घोड़ी पर चढ़ कर बारात ले जाने तक की अनुमति नहीं रही. आज भी दलित के पास जमीन है भी तो उस पर ऊँची जाति का कब्ज़ा बरकरार है. इसी श्रृंखला में अब भेदभाव का नया रूप जुड़ गया है. श्योपुर जिले के कराहल विकास खंड के एक गांव में १० बच्चे मध्यान्ह भोजन नहीं करते हैं; वे कहते हैं कि हम किसान है. इसी तरह सीहोर में भी अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे स्कूल का खाना नहीं खाते हैं, क्योंकि दलित महिलाओं का समूह भोजन पकाता है. अब तक ऊँची जातियां दलितों और आदिवासियों को भेदभाव के नाम पर बाहर धकेलती रही हैं; पर अब वे खुद के बहिष्कार की सोची समझी तकनीक के जरिये भेदभाव और ऊँचे-नीचे होने की भावना को बरकरार रखने की दिशा में बढ़ गयी हैं.
इसी दौर में भारत में पंचायतों में महिलों के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी; पर २० सालों के अनुभव बताते हैं कि लोगों को सत्ता सौंपने के मकसद से स्थापित विकेन्द्रीकरण की इस व्यवस्था में उन्हे न तो शक्ति संपन्न बनने के लिए प्रशिक्षण की कोई ठोस व्यवस्था की गयी, न ही उनके संरक्षण की कोई व्यवस्था खड़ी की गयी. सहभागिता के नाम पर महिलाओं, दलित और आदिवासियों को एक तरफ आरक्षण दिया गया, तो वहीँ दूसरी तरफ व्यावस्था ऐसे बुनी गयी कि वंचित समुदायों के ये वंचित प्रतिनिधि ऊँची जातियों, ऊँची जातियों के प्रतिनिधियों और नौकरशाही के नए उपनिवेश बन गए. सरकार की उलझावदार व्यावस्था में अच्छे-अच्छे फँस जाते हैं, वहाँ पंचायत सचिवों को ताकतवर बना दिया गया और उन्होंने नौकरशाही के साथ गठजोड़ करके चुने हुए जनप्रतिनिधियों को ऐसा फंसाया कि विकेन्द्रीकरण की सोच पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया. कुल मिला कर बात यह है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को सरकार ने क्रियान्वयन के काम में जुटा दिया, अंतिम निर्णय लेने के अधिकार नौकरशाही को दे दिए और ऐसा माहौल बनाया कि पंचायत में जन-सहभागिता का मतलब समुदाय में बिखराव हो गया. मध्यप्रदेश की ग्रामपंचायत अपने सचिव (जिसे लोग मंत्री कहते हैं) को नहीं हटा सकती है न शिक्षक को नहीं हटा सकती है. उन्हे यह अधिकार दिया गया है कि वे सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के हितग्राहियों का चयन करें; वे २० पात्र लोगों का चयन करते हैं पर सरकार १० लोगों को पेंशन देती है; इससे लोगों के मन में भी पंचायत व्यवस्था के खिलाफ अविश्वास पैदा होता है. जैसे भारत की सरकार और संसद में किसी भी मांग को खारिज करने के कारण नहीं बताए जाते हैं, वैसे ही पंचायत में भी यह किसी को पता नहीं चलता है कि उन्हे समय पर मजदूरी क्यों नहीं मिल रही है या उनके स्कूल में शिक्षक क्यों नहीं है? बस लोगों को चुपचाप स्थिति को "जहाँ है जैसी है" के सिद्धांत पर ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने की बाध्यता है. यही उनकी राज्य के प्रति जिम्मेदारी है.
राजनीतिक व्यवस्था में सहभागिता सुनिश्चित किये बिना लोकतंत्र में सहभागिता आयेगा; यह कल्पना करना बेमानी है. वर्ष २०१३ में जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं; वहाँ चुनावी प्रक्रियाएं इस बात से तय होती हैं कि किस विधान सभा क्षेत्र में कितने दलित, कितने आदिवासी, कितने मुसलमान और कितने पिछड़ा वर्ग के मतदाता हैं. इसी आधार पर उम्मीदवारी तय होती है. फिर यह देखा जाता है कि जैन, अग्रवाल या यादव कितने हैं!! इन आधारों पर संपन्न होने वाले चुनावों के बाद जो व्यवस्था बनेगी क्या वह समग्र समाज की सहभागिता की पक्षधर होगी?
दो साल पहले भारत की वृद्धि दर ९ प्रतिशत सालाना थी. इस साल अनुमान था कि यह ५.५ प्रतिशत रहेगी, पर अप्रैल २०१३ की पहली तिमाही में वृद्धि दर ४.४ प्रतिशत रही. पिछले कुछ सालों में हमने खूब आर्थिक विकास किया क्योंकि तब हम अपने संसाधनों (खनिज़, जंगल, नदियों और श्रम) का एकसाथ बेतरतीब शोषण कर रहे थे, उन्हे बेंच रहे थे. इससे खूब पैसा आ गया. हज़ारों लाखों साल में इन संसाधनों से संपन्न हुए थे. हमरे विकासकार इन संसाधनों को एक ही बार में उपयोग में ले आना कहते हैं. आप एक कोयला या बाक्साईट निकाल सकते हैं; फिर जब २० से ३० सालों में यह खत्म हो जायेगा तो क्या करेंगे? समाज, खास तौर पर आदिवासी समाज इस लूट का विरोध करता रहा है. वह जानता है कि प्रकृति और इंसान का विकास एक दूसरे पर निर्भर है; परन्तु संसाधनों के शोषण आधारित विकास को लागू करने के लिए सत्ता ने हर तरह के हथियारों का उपयोग किया. अब विकास के बीस सालों के बाद चमक का तारा टूटने लगा क्योंकि सरकार के एजेंडे में प्रकृति का संरक्षण रहा ही नहीं. अगस्त २०१३ में वित्तमंत्री ने इसे साबित भी कर दिया. उन्होंने अर्थव्यवस्था को फिर से विकास की पटरी पर लाने के लिए संसद के सामने १० बिंदुओं की एक कार्ययोजना रखी.; उसमे समाज की प्राथमिकताओं और सहभागिता का कोई जिक्र ही नहीं था. कुछ मामलों में (जैसे नियमागिरी में आदिवासियों के हक) सर्वोच्च न्यायालय की सक्रीय भूमिका को सरकार विकास की राह में रोड़ा मानती है. यानी सरकार आश्वस्त है कि आर्थिक विकास तो बिना सहभागिता के ही होगा; सहभागिता में तो लोग योजना बनायेंगे, प्राथमिकताएं भी वे ही तय करेंगे और निगरानी भी उन्ही की होगी; इससे जिस तबके के हितों को हमारी सरकारें संरक्षित करना चाहती हैं, उनका विकास तो हो ही नहीं पायेगा.
छत्तीसगढ़ में ग्राम सभाओं ने तय किया कि वे इस बात के पक्ष में नहीं हैं कि प्राकृतिक संसाधन कंपनियों और माफियाओं को लूटने के लिए सौंप दिए जाएँ. वे सरकार की विकास की परिभाषा को खारिज कर रहे थे. यदि सहभागिता एक मूल्य है तो उन्हे इसका अधिकार दिया जाना चाहिए था. पर इसके उलट सत्ता ने उनके खिलाफ बंदूकें तान दीं और ६०० गांवों के लोगों को अपनी जगह से बेदखल करके शरणार्थी बना दिया गया. इस व्यवस्था में सहभागिता का सिद्धांत कहाँ लागू होगा?
शासन व्यवस्था का मौजूदा चरित्र ही ऐसा है कि वह लोगों की सहभागिता को पचा ही नहीं सकती. चूँकि लोकतंत्र में सहभागिता का जिक्र होना जरूरी है इसलिए वह इसका भ्रम पैदा कर देती है. इसमे देश का बजट बनाते समय वित्तमंत्री जी कंपनियों और उद्योगपतियों के संगठनों के मंच पर जाकर उनकी बात को सुनते और समझते हैं; पर किसानों, महिलाओं, मजदूरों, आदिवासिओं और दलितों के खुले मंचों पर उन्हे जाने की हिम्मत नहीं होती. अभी सहभागिता का मतलब सत्ता में निर्णायक हिस्सेदारी नहीं है.

About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. The author could be contacted at sachin.vikassamvad@gmail.comTelephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

This is second and concluding part of a 2 part article on illusion of participation in Indian democracy.

INDIA: सत्ता में सहभागिता का भ्रम -1//सचिन कुमार जैन

Friday, August 16, 2013

मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं ?

लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा ! 
अब जब कल स्वतन्त्रता दिवस पर सरकारी डयूटी करके थके मांदे सरकारी मुलाजिम कल फिर ड्यूटी देने के  लिए आज कर रहे होंगें  तो गांधीवादी नेता हिमांशु कुमार अर्थात Himanshu Kumar ने फिर कुछ कड़वे सत्य सामने रख कर उनके दिलो-दिमाग को आंदोलित कर दिया है। हिमांशु लिखते हैं :सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय , स्वामी अग्निवेश , कविता श्रीवास्तव , नंदिनी सुंदर , हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं !
ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके ! 
सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं ! इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा ! फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे !
67 वें स्वतन्त्रता दिवस पर एक दुसरे को थोक के भाव आज़ादी की बधाईयाँ दे रहे लोगों की इस में कड़वे सत्य को देख कर  हो रहे हिमांशु समाज के सभी वर्गों से---गुहार लगाते हुए कहते है---पुकारते हैं--झंक्झौरते हैं--:
कोई तो बचाओ इस लड़की को ! संसद , सुप्रीम कोर्ट , टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं ! और हमारे वख्त में ही एक जिंदा इंसान को तिल तिल कर हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है ! और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है !
हिमांशु चेतावनी भी देते हैं--:शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है !एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं ! मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं ? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा ! नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे !

सोनी सोरी की कहानी सुनो

लोकतंत्र पर आए दिन जगह जगह पर दिए जाते खोखले उपदेशो से बुरी तरह आहत हुए हिमांशु कुमार की आवाज़ क्या अनसुनी रहेगी ? काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की की बेबसी किसी को नजर नहीं आएगी? क्या इस आदिवासी अध्यापिका को हर द्रोपदी की तरह नंगा किया जाता रहेगा ? क्या किसी कृष्ण तक नहीं पहुँच प् रही इस अबला की पुकार ? हम देवी के 9 रूपों की पूजा करने वाले एक धार्मिक देश में ही रहते हैं या कहीं और? क्या यह समाज पूरी तरह कौरव प्रधान हो गया है?--यहाँ सत्य की आवाज़ सुनने वाले अब नहीं रहे क्या? नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की का आखिर कसूर क्या है ? स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर आखिर कोई तो बताये !           ----रेक्टर कथूरिया 


सोनी सोरी की कहानी सुनो                        सोनी सोरी को दी जा रही हैं एक्सपायरी दवाएं


Saturday, June 08, 2013

नक्‍सल प्रभावि‍त जि‍लों में 'रोशनी'

07-जून-2013 19:42 IST
 50,000 युवाओं को दी जाएंगी नौकरियां-जयराम 
ग्रामीण वि‍कास मंत्री श्री जयराम रमेश ने 24 नक्‍सल प्रभावि‍त जि‍लों में ग्रामीण युवाओं के लि‍ए नई कौशल वि‍कास योजना की शुरूआत की है। 'रोशनी' नामक इस योजना के अंतर्गत इस क्षेत्र के 50,000 युवाओं के कौशल को वि‍कसि‍त कि‍या जाएगा। ओडीशा और झारखंड के 6 जि‍ले, छत्‍तीसगढ़ से पांच, बि‍हार से दो और आंध्र प्रदेश , उत्‍तर प्रदेश, पश्‍चि‍म बंगाल, मध्‍य प्रदेश ओर महाराष्‍ट्र से एक-एक जि‍लों का चयन कि‍या गया है। अगले तीन वर्षों में 100 करोड़ रूपए के खर्चे से इस योजना को पूरा कि‍या जाएगा। श्री जयराम रमेश ने पत्रकारों को बताया कि‍ इस योजना के क्रि‍यान्‍वयन में केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकार की भागीदारी क्रमश: 75 और 25 प्रति‍शत होगी। राष्‍ट्रीय स्‍तर की संस्‍थाएं इस योजना का नि‍यंत्रण करेंगी। मंत्री महोदय ने यह भी कहा कि लाभार्थियों में 50 प्रति‍शत महि‍लाएं होंगी। यही नहीं ऐसे आदि‍वासी समूहों को प्राथमि‍कता दी जाएगी जो कि‍ हाशि‍ये पर हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि‍ 18 से 35‍‍ वर्ष की आयु वर्ग के ऐसे लाभार्थि‍यों के चयन को प्राथमि‍कता दी जाएगी जो वि‍शेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों से हैं। सार्वजि‍नक-नि‍जी और वि‍भि‍न्‍न सार्वजनि‍क क्षेत्रों की आपसी भागीदारी के तहत प्रशि‍क्षण प्रदान कि‍ए जाएंगे। शैक्षणि‍क संस्‍थाओं, कार्पोरेट संस्थाओं और ऐसी संस्‍थाओं की सेवाएं इस योजना के लि‍ए ली जाएंगी जो कि‍ सार्वजनि‍क सेवाओं के लि‍ए प्रशि‍क्षण देती हों। श्री जयराम रमेश ने बताया कि‍ ऐसे चार मॉडलों का चयन कि‍या गया है जो कि‍ 3 महीने से एक साल के दौरान युवाओं की आवश्‍यकताओं का ध्‍यान रखते हुए उन्‍हें आरंभि‍क स्‍तर की योग्‍यता देने के लि‍ए उपयुक्‍त हैं। (PIB)

‍ वि‍.कासोटि‍या/रत्‍नावली/सुजीत-2681

Thursday, May 30, 2013

नक्सली हिंसा का प्रतिकार विकास से हो

आम आदिवासी की आज़ादी पूर्णत: छिन चुकी है--राजीव गुप्ता
अमेरिकी मार्क्सवादी नेता बाब अवेकिन के शब्दों में किसी भी प्रकार की क्रांति न तो बदले की कार्यवाही है और न ही मौज़ूदा तंत्र की कुछ स्थितियों को बदलने प्रक्रिया है अपितु यह मानवता की मुक्ति का एक उपक्रम है. परंतु मानवाधिकार को ढाल बनाकर भारत की धरा को मानवरक्तिमा से रंगने वालें
“बन्दूकधारी-कारोबारियों” को बाब अवेकिन की यह बात समझ नही आयेगी. भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (माओवादी) की दंड्कारण्य स्पेशल ज़ोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए बताया कि 25 मई को कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हमला इसलिये किया था क्योंकि इन्हे सलवा ज़ुडूम के प्रणेता महेन्द्र कर्मा को मारकर बदला लेना था. केन्द्र-सरकार जब नेताओं की सुरक्षा नही कर सकती और उसकी नाक के नीचे से इन नक्सलियों के पास अत्याधुनिक हथियार और पैसे पहुँचते है तो आम जनता की सुरक्षा तो भगवान भरोसे ही है. सरकार व नक्सलियो के बीच आम आदिवासी मात्र शरणार्थी बनकर रह गया है. न कोई प्राकृतिक आपदा आई, न कोई महामारी फैली परन्तु फिर भी आम आदिवासी को सरकार के राहत शिविरों मे रहना पड रहा है. देखते ही देखते पूरा क्षेत्र राहत शिविरों से पट  गया. जंगल मे राज़ा की भाँति विचरण करने वाला आदिवासी राहत शिविरों मे रहकर सरकारी दिनचर्या के हिसाब से जीने को मजबूर हो गया. उसके लिये इधर कुआँ उधर खाई वाली कहानी बन गई है. सरकार की बात करेगा तो नक्सली की गोली खानी पडेगी और अगर राहत शिविर छोडकर जायेगा तो नक्सली का जासूस कहकर सरकार की गोली खानी पडेगी. उसकी आज़ादी पूर्णत: छिन चुकी है या यूँ कहे कि उसके लिये अब आज़ादी के मायने ही बदल चुके है.         
देश की विकास-धारा को गति देने वाला छत्तीसगढ देश का 20 प्रतिशत स्टील और 18 प्रतिशत सीमेंट का उत्पादन करता है. परंतु यह देश का दुर्भाग्य ही है कि नक्सलवाद के चलते छत्तीसगढ में उथल-पुथल मची हुई है. शायद नक्सली समर्थक अपने कुतर्कों के आधार पर आम आदिवासी को पूरी तरह बरगालाने मे सफल हो गये है कि सराकर के विकास का अर्थ है उनसे उनकी संपदा से बेदखल कर देना. केन्द्र सरकार को छत्तीसगढ को विशेष तौर पर अलग से आर्थिक मदद उडीसा के कालाहांडी की तर्ज़ पर देना चाहिये क्योंकि अकेले छत्तीसगढ में 32 प्रतिशत आदिवासी है और जबतक उन्हे सडक या रेल तंत्र से जोडा नही जायेगा विकास का असली अर्थ ये भटके हुए आदिवासी नही समझ पायेंगे. जल्दी से जल्दी जयराम रमेश द्वारा 50 करोड रूपये की मूल्य के प्रोजेक्ट गवर्नेंस एंड एसिलरेटेड लाईवली हुड्स सिक्योरिटी प्रोजेक्ट्स स्कीम (गोल्स) को लागू किया जाय. ताकि इस प्रोजेक्ट के द्वारा असमानता की खाई को पाटा जा सके. अन्यथा नक्सली समर्थक नेताओं व गैर सरकारी संगठनो के चंगुल मे फँसकर ये भटके हुए आदिवासी यूँ ही बन्दूक उठाते रहेंगे. अत: जितनी जल्दी हो सके केन्द्र व राज्य सरकार मिलकर इस भयंकर समस्या को समय रहते सुलझा लेना चाहिये.
यह एक शाश्वत है कि किसी भी विचार से शत-प्रतिशत सहमत व असहमत नही हुआ जा सकता. इसके लिये लोकतंत्र मे तर्काधारित संवाद किया जा सकता है और अपने वैचारिक प्रकटीकरण के लिये संविधान ने हमें यह व्यवस्था दी है. नीतियों मे न्यूनता हो सकती है, जिसे समयानुसार संशोधित किया जा सकता है परंतु संविधान द्वारा प्रदत्त लोक-कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना को ही धराशायी करने का अधिकार किसी को कैसे दिया जा सकता है. हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि लोकतंत्र में संवाद वह हथियार है जिसकी मदद से कोई भी जंग न केवल जीती जा सकती है अपितु संपूर्ण मानवता की भी रक्षा की जाती है. कोई भी देश वहाँ के निर्मित संविधान से चलता है परंतु स्थिति ज्यादा खतरनाक तब हो जाती है जब आम जनता को संविधान के खिलाफ ही भडकाकर उन्हे हथियार उठाने के लिये विवश कर दिया जाता हो. परंतु कुछ चिंतक-वर्ग अपनी कुंठित मानसिकता के चलते देश को अराजकता के गर्त मे ढकेल कर एक गृह-युद्ध आरंभ करना चाहते है. देश के नीति-निर्मातों को देश-विरोधी हर अभियान को हर स्तर पर अलग-थलग कर उसका बहिष्कार करने के लिये जो भी कठोर फैसले लेना हो तत्काल लेना चाहिये ताकि भारत की धरती पुन: ऐसी रक्त-रंजित न हो.    
इस सच्चाई को नकारा नही जा सकता कि आज़ादी के बाद से लेकर आजतक आदिवासियों के विकास के लिये जो भी कदम उठाया गया वह उस आदिवासी के शरीर की सभी 206 हड्डियों को मज़्ज़ा से ढकने के लिये नाकाफी रहा. आज भी उन्हे दो जून की रोटी व पीने के लिये पानी नसीब नही है. ऐसे मे उनके लिये विकास की बात करना मात्र एक छ्लावा है और शहरों की चमचामाती सडके और गगनचुम्बी इमारतें उनके लिये अकल्पनीय है. जिसका लाभ लेकर अरुन्धती राय सरीखे लोगों द्वारा आदिवासियों को सत्ता के खिलाफ बन्दूक उठाने के लिये प्रेरित व विवश किया जाता है. यही वें लोग हैं जो आम आदिवासी को यह समझाते है कि सत्ता द्वारा तुम्हे तुम्हारी संपत्ति से बेदखल कर तुम्हे विस्थापित कर दिया जायेगा. यह ठीक है कि कोई भी स्वस्थ समाज यह सहन नही कर सकता कि उसकी ही धरती पर उसे विस्थापित होकर रहना पडे. आज भी सरकार आम-जन को उसकी संपदा के अधिग्रहण का मुआवज़ा देती ही है. मुआवजे की राशि व प्रकृति को लेकर विवाद हो सकता है परंतु अगर कोई अपनी संपदा ही नही देगा तो सरकार विकास की इबारत कहाँ लिखेगी. सरकार यह सुनिश्चित कर उन आदिवासियों का भरोसा जीतकर वहाँ विकास मार्ग प्रशस्त करें कि इन आदिवासी क्षेत्रों मे यदि कोई आदिवासी विस्थापित होता है तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होगी. इस प्रकार का कोई भी संवाद आदिवासियों द्वारा सरकार से किया जा सकता है. उन आम आदिवासियों को यह भी समझना होगा कि जो सडक उनके जंगल-खेत-खलिहानों से होकर गुजरेगी वही सडक उनकी इस असमानता को दूर करेगी क्योंकि वर्तमान समय में सडकें ही विकास का प्रयाय है. यदि उनके बच्चे स्कूलों में शिक्षा लेंगे, देश-समाज को समझेंगे, संचार माध्यमों से जुडेंगे तभी तो वे भी भविष्य में देश के विकास मे भागीदार होंगे. सत्ता से सशस्त्र ट्कराव करना कोई बुद्धिमानी नही है क्योंकि जिस भी दिन इनके “प्रेरणा-पुंजों” को नियंत्रण मे लेकर  सत्ता यह दृढ निश्चय कर लेगी कि इन आदिवासियों के पास हथियार नही पहुँचने चाहिये उस दिन इन आदिवासियों के पास मात्र आत्मसमर्पण के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नही रह जायेगा. पंजाब के आतंकवाद का दमन इस बात का एक जीता-जागता उदाहरण है. देर-सवेर इन भटके हुए आदिवासियों को विकास की इस धारा मे आना ही होगा. परंतु सरकार यदि उन भटके हुए आदिवासियों को समझाने में सफल हो गयी तो उन मानवधिकारवादी- कारोबारियों की जीविका कैसे चलेगी मूल प्रश्न यह है.        -राजीव गुप्ता (9811558925)


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सरकार के विरूद्ध युद्ध की तैयारी कर रहे नक्‍सलवादी                                 लाल सलाम 




Sunday, May 26, 2013

सभ्य समाज में ऐसे बर्बर कृत्यों के लिए कोई स्थान नहीं

बस्तर में कल हुए माओवादी हमले पर उपराष्ट्रपति का बयान 
देश और दुनिया को हिला कर रख देने वाले वाले बड़े और सुनियोजित हमले पर देश भर में तीखी प्रतिक्रिया का सिलसिला जारी है। उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने इसे कायरतापूर्ण बताते हुए कहा है कि किसी भी सभ्य समाज में इस तरह के बर्बर और सम्वेदना हीन हमलों की कोई जगह नहीं होती।इसी बीच प्रधानमन्त्री डाक्टर मनमोहन सिंह और राष्ट्रिय सलाहकार परिषद की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी अपनी सभी व्यस्ततायों को बीच में ही छोड़ कर रायेपुर पहुँच गये।
बस्तर में कल हुए माओवादी हमले पर उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने कहा कि वे इस कायरतापूर्ण हमले की निंदा करते हैं जिसमें कई निर्दोष मारे गए जबकि कई अन्य घायल हो गये। उन्होंने कहा कि सभ्य समाज में ऐसे संवेदनाहीन और बर्बर कृत्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। श्री अंसारी ने कहा कि चरमपंथ और हिंसा के सभी पक्षों से मुकाबला किया जाना चाहिए और उन्हें अपने बीच से मिटा देना चाहिए। 
इस हमले में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति अपनी शोक संवेदनाएं प्रकट करते हुए श्री अंसारी ने घटना में घायल हुए लोगों के शीघ्र स्वस्थ्य होने की भी कामना की। उप राष्ट्रपति ने कहा कि उनकी भावनाएं और प्रार्थनाएं इस कठिन समय में उनके साथ हैं। श्री अंसारी ने कहा कि ईश्वर उन्हें इस दुःख से उबरने में साहस और धैर्य प्रदान करे। 
प्रधानमंत्री ने नक्सली हमले में घायल हुए लोगों से मुलाकात की, पीड़ित परिवारों को सहायता और अपराधियों को सज़ा दिलाने का संकल्प जताया प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कल छत्तीसगढ़ में हुई हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति अपनी गहरी शोक संवेदनाएं व्यक्त की हैं। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के साथ रायपुर अस्पताल का दौरा करके घटना में घायल लोगों के शीघ्र स्वस्थ्य होने की कामना की। 
प्रधानमंत्री इस नृशंस हमले की निंदा करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाओं से हिंसा के खिलाफ लड़ाई में देश की दृढ़ता में कमजोरी नहीं आएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस हमले के जिम्मेदार अपराधियों को जल्द ही कानून के दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने देश को आश्वासन भी दिया कि सरकार अपराधियों को सज़ा दिलाने के प्रति वचनबद्ध है। 
उन्होंने राज्य प्रशासन से घायलों को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा उपचार देने को कहा। डॉ. मनमोहन सिंह ने घटना में मारे गए लोगों के परिवारों को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष से पांच लाख रुपए और घायलों को 50 हजार रुपए की सहायता राशि देने की घोषणा की। 
प्रधानमंत्री ने राज्य के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ छत्तीसगढ़ में सुरक्षा स्थिति का भी जायजा लिया। उन्होंने स्थिति से निपटने के लिए राज्य को हर संभव सहायता देने का भी आश्वासन दिया। 
डॉ मनमोहन सिंह ने कहा कि इस तरह के बर्बर कृत्य करने वाले अपराधी क्षेत्र में विकास और शांति के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं। 
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले की निंदा की। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले की निंदा की है। प्रधानमंत्री के संदेश का अनूदित पाठ इस प्रकार है: 
"मैं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हिंसक हमले की कड़ी निंदा करता हूं। मैं उन लोगों के परिवारों के प्रति गहरी सहानुभूति प्रकट करता हूं जिन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी। मैं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री विद्याचरण शुक्ल सहित इस कायरतापूर्ण हमले में घायल लोगों के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार के लिए दुआ करता हूं। 
मैंने राज्य के मुख्यमंत्री से बात की है और उनसे अनुरोध किया है कि घायलों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए तथा अपहृत लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। 
मैं हमलावरों से अपील करता हूं कि अपहृत लोगों को जल्द से जल्द छोड़ दें। 
ऐसी घटनाएं हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के विरूद्ध हैं। सरकार किसी भी तरह की हिंसा के दोषी लोगों पर कड़ी कार्रवाई करेगी।" 
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सरकार के विरूद्ध युद्ध की तैयारी कर रहे नक्‍सलवादी                                 लाल सलाम 



Wednesday, February 06, 2013

नक्‍सल प्रभावित जिलों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना

05-फरवरी-2013 20:24 IST
केंद्र सरकार ने दी चौमुखी सडक सम्पर्क को मंजूरी
Photo Courtesy:Naxaliterage
सरकार ने नक्‍सल प्रभावित जिलों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधीन चौमुखी संपर्क कायम करने को अपनी मंजूरी दे दी है। केन्‍द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम नरेश ने आज यहां पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि राज्‍यों की सरकारें दो चरणों में विस्‍तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर सकती हैं। राज्‍य सरकारें ढांचे का निर्माण, ग्रेवल बेस आदि का निर्माण पहले चरण के अधीन कर सकती हैं, जबकि दूसरे चरण में बिटुमिनस अथवा कंक्रीट की सतह तैयार करना शामिल है। उन्‍होंने कहा कि राज्‍यों को पहले चरण का कार्य पूरा करने की अनुमति दी जाएगी और कानून व्‍यवस्‍था को ध्‍यान में रखते हुए मार्च 2015 से पहले दूसरे चरण के लिए विस्‍तृत परियोजना रिपोर्ट भेजने के लिए कहा जाएगा। नक्‍सल प्रभावित 82 जिले के 52,000 आवास स्‍थलों में से 30,000 आवास स्‍थलों को इसमें शामिल किया गया है, किंतु अब तक केवल 19,000 आवास स्‍थलों को ही सड़कों से जोड़ा गया है।(PIB)
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वि.कासोटिया/सुधीर/मनोज-450

नक्सलबाड़ी स्क्रीन में भी देखिये 
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधीन

कामरेड स्क्रीन में देखिये:नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सडकों का जाल 

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Thursday, January 10, 2013

पत्रकार सम्‍मेलन में गृह मंत्री का वक्‍तव्‍य

10-जनवरी-2013 19:11 IST
लातेहर जिले में माओवादियों के गढ़ों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाए
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री सुशील कुमार शिंदे ने दिसम्बर-2012 के लिए गृह मन्त्रालय का रिपोर्ट कार्ड एक पत्रकार सम्मेलन में 10 जनवरी-2013 को नई दिल्ली में प्रस्तुत किया। उनके साथ नजर आ रही हैं पत्र सूचना कार्यालय की प्रिसिपल डायरेक्टर जनरल (एम एंड सी) सुश्री नीलम कपूर (फोटो:पी आई बी)
सेना और सुरक्षा बलों ने दिसम्‍बर, 2012 में संयुक्‍त अभियानों में जम्‍मू एवं कश्‍मीर में सक्रिय 14 आतंकवादियों (8 विदेशी आतंकवादियों सहित) का खात्‍मा किया जिससे आतंकवादियों को काफी नुकसान हुआ। इसमें सुरक्षा बलों के विरुद्ध विभिन्‍न हमलों में शामिल नौ उग्रवादी (2 स्‍थानीय उग्रवादी तथा 7 विदेशी उग्रवादी) शामिल थे जो श्रीनगर सिटी में हमले की योजना बना रहे थे। मारे गए दो उग्रवादी (पम्‍पोरी में सेना के काफिले पर हमले में शामिल एक विदेशी आतंकवादी सहित) होटल सिल्‍वर स्‍टार गोलीबारी में शामिल थे। मारे गए उग्रवादियों में दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय विस्‍फोट मामले में वांछित हिजबुल मुजाहिद्दीन का एक स्‍थानीय कमांडर भी शामिल था।

2.   दिसम्‍बर 2012 माह के दौरान राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी ने वर्ष 2006 में मालेगांव में, फरवरी, 2007 में समझौता एक्‍सप्रेस में और मई 2007 में मक्‍का मस्जिद, हैदराबाद में तथा सितम्‍बर 2008 में मालेगांव में बम विस्‍फोट की घटनाओं में शामिल चार अभियुक्‍तों को गिरफ्तार किया। इन चार अभियुक्‍तों में से राजेन्‍द्र चौधरी, धन सिंह और मनोहर मालेगांव में बम रखने में शामिल थे; राजेन्‍द्र चौधरी और तेजराम ने हैदराबाद में मक्‍का मस्जिद में बम रखे थे तथा धन सिंह मालेगांव में बम विस्‍फोट में शामिल था।

    पूछताछ के दौरान इन अभियुक्‍तों ने पता न लगे तीन सनसनीखेज पुराने अपराधों अर्थात् (i) उज्‍जैन के नरवर पुलिस थाने में एक महिला नन (लीना) पर गोली चलाकर उसे घायल करने,  (ii) 9 जनवरी, 2004 को जम्‍मू में एक मस्जिद पर ग्रेनेड फेंकने, जिसमें दो व्‍यक्तियों की मृत्‍यु हो गई तथा 15 अन्‍य घायल हो गए,  (iii) फरवरी 2005 में नई दिल्‍ली में ‘’एस. ए. आर गिलानी’’ (संसद हमला मामले में वरी अभियुक्‍त) पर गोली चलाने, (iv) उज्‍जैन (मध्‍य प्रदेश) में एक पठान मुजीव लाला की हत्‍या करने तथा  (v) रमेश निनामा (इंदौर के पियर सिंह निनामा की हत्‍या के मामले में एक प्रमुख गवाह) की हत्‍या करने में अपनी भूमिकाएं स्‍वीकार कर लीं।

3.   केन्‍द्रीय लोक निर्माण विभाग, भोपाल द्वारा केन्‍द्रीय पुलिस प्रशिक्षण अकादमी, भोपाल का निर्माण किए जाने के लिए 7 दिसम्‍बर, 2012 को 281 करोड़ रुपये की राशि की स्‍वीकृति जारी की गई है। यह अकादमी सीधी भर्ती से नियुक्‍त होने वाले राज्‍यों के पुलिस उपाधीक्षकों तथा अपर पुलिस अधीक्षकों को बुनियादी प्रशिक्षण प्रदान करेगी तथा हमारे मित्र देशों की प्रशिक्षण आवश्‍यकताओं का निराकरण करेगी।
4.   दिनांक 4 दिसम्‍बर, 2012 को बंगलादेश सरकार के गृह मंत्री डॉ. मुहीउद्दीन खान आलमगीर ने मुझसे मुलाकात की तथा सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद के खतरे का निवारण करने के लिए पार‍स्‍परिक सहयोग आदि से संबंधित द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। सीमा पार से चलने वाली अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने के लिए दोनों देशों के बीच हस्‍ताक्षरित समन्वित सीमा प्रबंधन योजना (सी बी एम पी) पर सहयोग बढ़ाने पर हमारी सहमति हुई, हमने सुरक्षा संबंधी मामलों पर सूचना का आदान-प्रदान करने के लिए नोडल पॉइंट्स के कार्य संचालन की समीक्षा की तथा हमने जीरो लाइन के 150 गज के भीतर विकास कार्य की अनुमति देने पर सहमति व्‍यक्‍त की। हम संशोधित यात्रा करार और प्रत्‍यर्पण संधि को अंतिम रूप देने तथा उस पर जनवरी 2013 में हस्‍ताक्षर करने के लिए सहमत हो गए। गृह मंत्री स्‍तर की अगली वार्ता 28 से 30 जनवरी, 2013 के दौरान ढाका में आयोजित की जाएगी।

5.   12 दिसम्‍बर, 2012 को नाईजीरिया के माननीय मिनिस्‍टर ऑफ इंटीरियर श्री अब्‍बा मोरो ने मुझसे मुलाकात की और आप्रवासन तथा वीजा संबंधी मुद्दों पर चर्चा की।
6.   दिनांक 14 दिसम्‍बर, 2012 से 16 दिसम्‍बर, 2012 तक पाकिस्‍तान के इंटीरियर मिनिस्‍टर श्री रहमान मलिक द्विपक्षीय वार्ता के लिए भारत दौरे पर आए। आतंकवाद को पाकिस्‍तान के निरंतर सहयोग और पाक अधिकृत कश्‍मीर में आतंकवादी शिविरों के संचालन, मुंबई आतंकवादी हमले के प्रमुख मास्‍टर माइंड व्‍यक्तियों के अभियोजन तथा विचारण, मुंबई आतंकी हमले के षड़यंत्रकारियों तथा 1993 के मुंबई बम विस्‍फोटों के भगोड़ों को कानून के अंतर्गत सजा दिलाने, नियंत्रण रेखा तथा अंतर्राष्‍ट्रीय सीमाओं के पार से गोलीबारी, आतंकवाद के वित्तपोषण, जाली भारतीय करेंसी नोट, पाकिस्‍तान में मछुआरों तथा सिविलियन कैदियों और भारत के युद्ध बंदियों की रिहाई, वीजा और कंसूलर मुद्दों, स्‍वापक तथा मादक द्रव्‍यों की तस्‍करी तथा भारत और पाकिस्‍तान के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर करने और उसका अनुसमर्थन करने तथा एम एल ए टी एवं प्रत्‍यर्पण संधि आदि मुद्दों पर चर्चा की गई।

7.   8 सितम्‍बर, 2012 को भारत तथा पाकिस्‍तान सरकारों के बीच हस्‍ताक्षरित नए वीजा करार को भारत के माननीय गृह मंत्री तथा पाकिस्‍तान के माननीय इंटीरियर मिनिस्‍टर द्वारा 14 दिसम्‍बर, 2012 को नई दिल्‍ली में क्रियाशील बनाया गया।

8.   19 दिसम्‍बर, 2012 को संयुक्‍त राष्‍ट्र शरणार्थी उच्‍चायुक्‍त श्री एन्‍टोनिओ गुटरेस ने मुझसे मुलाकात की और शरणार्थियों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की।

आंतरिक सुरक्षा
9.   26/11 के मुंबई आतंकी हमले के मामले में पाकिस्‍तान में गिरफ्तार अभियुक्‍त के विचारण के संबंध में पाकिस्‍तान के न्‍यायिक आयोग के दूसरे प्रस्‍तावित दौरे के संशोधित विचारार्थ विषयों को अंतिम रूप देने के लिए चार सदस्‍यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने 20 से 26 दिसम्‍बर, 2012 तक पाकिस्‍तान का दौरा किया।
10.  20 दिसम्‍बर, 2012 को विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) संशोधन विधेयक, 2011 राज्‍य सभा द्वारा पारित किया गया। यह विधेयक लोक सभा द्वारा 30/11/2012 को पहले ही पारित कर दिया गया था।

11.   राष्‍ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा जांच के दौरान इकट्ठे किए गए साक्ष्‍यों की स्‍वतंत्र रूप से समीक्षा करने तथा इन मामलों में निर्धारित समय के भीतर आरोप पत्र दायर करने की सिफारिश करने के प्रयोजन से विधि-विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के अंतर्गत गठित ‘’प्राधिकरण’’ का 31 दिसम्‍बर, 2013 तक विस्‍तार किया गया है।

कश्‍मीर संबंधी मामले
12.  परियोजना मूल्‍यांकन समिति की 13वीं बैठक 19 दिसम्‍बर, 2012 को आयोजित हुई जिसमें विशेष उद्योग पहल योजना के अंतर्गत 25 उम्‍मीदवारों को प्रशिक्षित करने के लिए बजाज अलियांज तथा 50 उम्‍मीदवारों को प्रशिक्षित करने के लिए आइकॉन सेंट्रल लेबोरेट्रीज के प्रस्‍तावों को अनुमोदित किया गया।

पूर्वोत्‍तर
13.  कार्रवाई स्‍थगन के बारे में कुकी नेशनल आर्गेनाइजेशन (के एन ओ), यूनाइटेड पीपल्‍स फ्रंट (यू पी एफ) तथा मणिपुर के अम्‍ब्रेला संगठनों के साथ नई दिल्‍ली में 5 दिसम्‍बर, 2012 को त्रिपक्षीय बैठकें आयोजित की गईं। यू पी एफ के साथ कार्रवाई स्‍थगन करार को नौ माह तक बढ़ा दिया गया है किंतु कुकी नेशनल आर्गेनाइजेशन (के एन ओ) के साथ कार्रवाई स्‍थगन का और विस्‍तार किए जाने के बारे में कोई समझौता नहीं हो सका।

14.  उग्रवाद पर प्रभावी नियंत्रण के भाग के रूप में पूर्वोत्‍तर में भूमिगत संगठनों की गतिविधियों की समीक्षा की गई तथा हिन्‍नीवट्रेप नेशनल काउंसिल (एच एन एल सी), यूनाटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्‍फा) तथा नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एन डी एफ बी) को विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के अंतर्गत विधिविरुद्ध संगम (2 वर्ष तक) घोषित करने संबंधी अधिसूचनाएं जारी की गईं।

केन्‍द्रीय सशस्‍त्र पुलिस बल
15.  भूमि के अधिग्रहण के लिए केन्‍द्रीय सशस्‍त्र पुलिस बलों को 25 करोड़ रु. की राशि स्‍वीकृत की गई है तथा कार्यालय/रिहायशी भवनों के निर्माण के लिए भी उनको 357 करोड़ रु. की राशि स्‍वीकृत की गई है।

आपदा प्रबंधन
16.  देश के विभिन्‍न भागों में कार्रवाई करने तथा राहत गतिविधियां चलाने के लिए नौकाओं, वाहनों तथा अपेक्षित उपकरणों सहित राष्‍ट्रीय आपदा कार्रवाई बल के 614 कार्मिक तैनात किए गए। राष्‍ट्रीय आपदा कार्रवाई बल के कार्मिकों ने राज्‍य सरकारों के प्राधिकारियों के समन्‍वय से कार्य किए तथा 16 लोगों की जान बचाई और 18 शव निकाले।

नक्‍सल प्रबंधन
17.  विशेष रैली आयोजित करके वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में रिक्तियों को भरने के लिए केन्‍द्रीय सशस्‍त्र पुलिस बलों में कांस्‍टेबलों की भर्ती के मुद्दे पर
चर्चा करने के लिए गृह सचिव ने 4 दिसम्‍बर, 2012 को केन्‍द्रीय सशस्‍त्र पुलिस बलों के महानिदेशकों के साथ एक बैठक की अध्‍यक्षता की।

18.  10 अक्‍तूबर, 2012 को केन्‍द्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक सेवानिवृत्त महानिदेशक श्री के. विजय कुमार को वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास संबंधी मामलों पर सलाह देने के लिए वरिष्‍ठ सुरक्षा सलाहकार नियुक्‍त किया गया है।

19.  सुरक्षा बलों ने झारखंड के लातेहर जिले में माओवादियों के गढ़ों में बड़े पैमाने पर अभियान चलाए हैं। यह लड़ाई बहुत कठिन होने की संभावना है क्‍योंकि माओवादी इस क्षेत्र में दशकों से जमे हुए हैं तथा इस भू-भाग से परिचित हैं। इस क्षेत्र में हाल ही में हुई गोलीबारी से दस सुरक्षा कार्मिक शहीद हो गए तथा कुछ घायल हो गए। आसूचना संबंधी जानकारी से यह पता चला है कि माओवादियों को भी बहुत क्षति पहुंची है। यह अभियान इस क्षेत्र से माओवादियों का सफाया होने तक जारी रहेंगे।

विदेशी विषयक
20.  माह के दौरान पैराग्‍वे (चैक रिपब्लिक); नैरोबी (कीनिया) तथा मपुतो (मोजाम्बिक) में स्थित भारतीय दूतावासों में आई वी एफ आर टी के अंतर्गत इंटीग्रेटिड ऑनलाइन वीजा एप्‍लीकेशन प्रणाली शुरू की गई है। यह सुविधा अब विदेशों में स्थित 101 भारतीय मिशनों में उपलब्‍ध है।

21.  विदेशी छात्रों के कल्‍याण के बारे में तथा उनकी गतिविधियों/निष्‍पादन और सामान्‍य आचरण पर नजर रखने के लिए आई वी एफ आर टी के अंतर्गत विदेशी छात्र सूचना प्रणाली (एफ एस आई एस) विकसित की गई है ताकि संबंधित शैक्षणिक संस्‍थानों द्वारा विदेशी छात्रों के विवरण को ऑनलाइन भरने में सुविधा हो सके। यह मॉड्यूल प्रयोग के तौर पर एफ आर आर ओ चैन्‍नई में शुरू किया गया है।

संघ राज्‍य क्षेत्र
22.  यौन उत्‍पीड़न मामलों में 30 दिन के भीतर त्‍वरित न्‍याय तथा निवारक दंड की व्‍यवस्‍था करने के लिए दंड कानूनों में संभावित संशोधनों की जांच करने के लिए सरकार ने 24 दिसम्‍बर, 2012 को न्‍यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जे. एस. वर्मा समिति का गठन किया।

23.  दिल्‍ली में हाल ही में घटित सामूहिक बलात्‍कार की दु:खद घटना के बारे में सरकार ने 26 दिसम्‍बर, 2012 को न्‍यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) उषा मेहरा जांच आयोग का भी गठन किया।

24.  कल मैंने दिल्‍ली में कानून एवं व्‍यवस्‍था की स्थिति की दिल्‍ली पुलिस के साथ समीक्षा की। हमने इस बारे में निम्‍नलिखित निर्णय लिए हैं :-
क) दिल्‍ली पुलिस के कार्मिकों द्वारा रात्रि में मोटरसाइकिल पर गश्‍त लगाना;

ख) प्रत्‍येक पुलिस थाने में महिला हेल्‍प डैस्‍क-पुलिस थाना क्षेत्र में सभी स्‍कूलों और कॉलेजों में महिला हेल्‍प डैस्‍क का सैल नंबर तथा टेलीफोन नंबर अधिसूचित किया जाना होगा; और

ग) सिविल रक्षा कार्मिकों, होमगार्ड, भूतपूर्व सैनिकों तथा महिला गैर सरकारी संगठनों को शामिल करके प्रत्‍येक पुलिस थाने में समितियों का गठन किया जाए ताकि जनता, विशेष रूप से महिलाओं से संबंधित मुद्दों को बातचीत के दौरान पुलिस अधिकारियों के समक्ष लाया जा सके।

राज्‍य विधायन
25.  भारत के राष्‍ट्रपति ने दिसम्‍बर, 2012 में असम राज्‍य सतर्कता आयोग विधेयक, 2010; राजस्‍थान विशेष न्‍यायालय विधेयक, 2012;  उत्तर प्रदेश

राजस्‍व संहिता विधेयक, 2006 तथा भारतीय स्‍टाम्‍प (पश्चिम बंगाल संशोधन) विधेयक, 2012 को मंजूरी प्रदान की।

हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र को विशेष दर्जा
26.  हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र, जिसमें गुलबर्गा, बिदर, रायचूर, कोपल और यादगीर जिले शामिल हैं तथा कर्नाटक राज्‍य में बेल्‍लारी जिला अतिरिक्‍त रूप से शामिल है, को विशेष दर्जा प्रदान करने के लिए एक नया अनुच्‍छेद 371 (ञ)
अंत:स्‍थापित करने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा संविधान (संशोधन) विधेयक, 2012 पारित कर दिया गया है।

सीमा प्रबंधन
27.  दिसम्‍बर, 2012 माह के दौरान भारत बंगलादेश सीमा के 40 किलोमीटर भाग पर तेज रोशनी करने का कार्य पूरा कर लिया गया।

28.  तटीय सुरक्षा के अंतर्गत 131 तटीय पुलिस थानों में से 116 के लिए भूमि के निर्धारण को अंतिम रूप दे दिया गया है तथा दिसम्‍बर 2012 तक 74 मामलों में भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। तटीय राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों द्वारा 60 में से 27 घाटों के लिए भूमि का निर्धारण कर लिया गया है।

29.  सरकार ने भारत-चीन सीमा पर भारत-तिब्‍बत सीमा पुलिस की कुल 804 किलोमीटर लम्‍बी 27 प्राथमिकता सड़कें स्‍वीकृत की हैं जिनमें से दिसम्‍बर 2012 तक 562 किलोमीटर लम्‍बी सड़कों का फॉर्मेशन कार्य तथा 241 किलोमीटर लम्‍बी सड़कों के समतलीकरण का कार्य पूरा कर लिया गया है।  (PIB) पत्रकार सम्‍मेलन में गृह मंत्री का वक्‍तव्‍य
वि.कासोटिया / श्‍याम – 139

Wednesday, July 04, 2012

मुठभेड़ पर सवाल//दैनिक ट्रिब्यून का सम्पादकीय

सीआरपीएफ की मुठभेड़ में 20 लोगों की मौत पर विवाद
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जनपद में सीआरपीएफ की मुठभेड़ में 20 लोगों की मौत पर उठे विवाद ने अर्धसैनिक बलों की भूमिका पर एक बार फिर सवाल खड़े किये हैं। एक ओर जहां केंद्रीय गृहमंत्री ने सुरक्षा बलों की पीठ थपथपायी है वहीं मामले की जांच के लिए बनी समिति में राज्य के कांग्रेस अध्यक्ष व एक केंद्रीय मंत्री भी शामिल हैं। कहा जा रहा है कि फसल की तैयारी के लिए हो रही बैठक में शामिल ग्रामीण, महिला व बच्चों को अर्धसैनिक बलों ने निशाना बनाया। मरने वालों में एक लड़की भी शामिल है। सीआरपीएफ दावा कर रही है कि नक्सली ढाल के रूप में महिला व बच्चों को इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि इतनी बड़ी मुठभेड़ के बाद जटिल भौगोलिक परिस्थिति वाले इलाके में एक भी सुरक्षा बल जवान का हताहत न होना बताता है कि मुठभेड़ में शिकार लोगों की ओर से कोई प्रतिरोध सामने नहीं आया। हालांकि बीजापुर मुठभेड़ की हकीकत सामने लाने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और माकपा ने दिल्ली में आंदोलन किया। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर ने 29 जून की मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से मामले की जांच कराने की मांग की है। सच्चर आरोप लगाते हैं कि आदिवासी फसल बोने से पहले अपने रीति-रिवाजों के अनुसार भूमि-पूजन की तैयारी कर रहे थे। उधर, कांग्रेस राज्य के गृहमंत्री के उस बयान को मुद्दा बना रही है जिसमें उन्होंने कहा कि नक्सलियों की मदद करने वाले ग्रामीणों को मार गिराया जायेगा। इस मामले की जांच के लिए कांग्रेस की राज्य इकाई ने बारह सदस्यीय कमेटी भी गठित की है।
इसमें दो राय नहीं कि बीजापुर के इस इलाके में नक्सलवादियों की खासी सक्रियता है लेकिन यह कहना कि इलाके का हर ग्रामीण नक्सलवादी है, तर्कसंगत नजर नहीं आता। माना कि कुछ लोग सशस्त्र प्रतिरोध के जरिये कानून-व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं लेकिन इसके चलते सुरक्षा बलों को इसका अधिकार नहीं मिल जाता कि बीस लोगों को गोलियों से भून दें। उन्हें आत्मसमर्पण के लिए भी बाध्य किया जा सकता था और देश की कानून व्यवस्था के तहत दोषी पाये जाने पर दंडित किया जा सकता था। ऐसे मामलों पर यदि मानवाधिकार संगठन संज्ञान लेते हैं तो शासन-प्रशासन को उनकी बात सुननी चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री दलील दे रहे हैं कि नक्सली महिला व बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं तो दोनों तरफ से पिसने वालों की मदद या रक्षा कौन करेगा? विगत में भी फर्जी मुठभेड़ों पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणियां की हैं। बहरहाल, नक्सलवादियों के नाम पर निहत्थे व निर्दोष लोगों को गोलियों का शिकार बनाने की इजाजत तो नहीं दी जा सकती। अकसर देखा गया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों को न तो स्थानीय जटिल भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी होती है और न ही स्थानीय पुलिस से बेहतर तालमेल। इसके चलते निर्दोष लोगों के शिकार बनने की संभावना बनी रहती है। मुठभेड़ में जिन बड़े नक्सली नेताओं को मारने की बात सीआरपीएफ कर रही थी, उनके बारे में स्थानीय पुलिस व सीआरपीएफ स्पष्ट कहने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसा लगता है कि वे बचाव की मुद्रा में हैं। जब सीआरपीएफ मामले में आंतरिक विभागीय जांच की बात कर रही है तो इसके मायने यह हैं कि उसे मुठभेड़ की वास्तविकता पर संदेह है। ऐसे मामलों से स्थानीय लोगों में सुरक्षा बलों के प्रति विश्वास खत्म होता है, जिसका फायदा नक्सली उठाते हैं।

Wednesday, February 15, 2012

अन्याय मत लिखो, प्रतिकार मत लिखो,

जंगल से आती हुई ललकार मत लिखो
इस नज्म को पोस्ट किया था जाने मने गांधीवादी हिमांशु कुमार ने. वही हिमांशु जो कहते हैं,"मैं सदैव एक योद्धा रहा हूं ! तो एक लड़ाई और सही ! इसे मैं जीवन की अंतिम और सर्वश्रेष्ठ लड़ाई की तरह लडूंगा !...I was always a fighter, so let there be another fight, the last and the best. उनकी इस काव्य रचना को नरिंदर कुमार जीत ने दोबारा पाठकों के सामने रखा और बहुत ही तेज़ी से लोक्प्रिय्हो रही यह रचना अब आपके सामने भी है.आपको यह नज्म कैसी लगी अवश्य बताएं. आपके विचारों की इंतज़ार बनी रहेगी.--रेक्टर कथूरिया 
अक्लमंद हो तो क्या लिखो ?
रूप, रंग, गंध लिखो
मन की उडान हो गई जो स्वच्छंद लिखो
तितली लिखो, फूल लिखो,
रेशम लिखो, प्रेम लिखो,
जो भी लिखो,
प्रशंसा, पैसा और सम्मान के जरूरतमंद लिखो,
चमक लिखो, दमक लिखो,
ठसक और खनक लिखो,
देश, विश्व, सत्ता के बदलते समीकरण लिखो,
अच्छा लिखो, नफीस लिखो,
ऊँचा लिखो, दमकदार लिखो,
जिनकी पढ़ने की हैसियत है,
उनकी हैसियत के अनुसार लिखो,
मुख्य धारा लिखो, बिकने वाला लिखो,
शोहरत वाला लिखो, चर्चा लायक लिखो,
छप्पर मत लिखो, साथ में नाला मत लिखो,
खून मत लिखो, भूख मत लिखो,
सडती हुई लाश पर मंडराते चील, कौवे मत लिखो,
औरत की कोख में ठूंसे गये पत्थर बिल्कुल मत लिखो,
दिवानों, पागलों और सनकियों की बात मत लिखो,
देश मत लिखो, समाज मत लिखो,
गांव मत लिखो, गरीब मत लिखो,
विकास लिखो, खनिज लिखो,
हवाई अड्डा और होर्डिंग लिखो,
ए.सी. लिखो, कार लिखो, स्काच लिखो,
सेंट लिखो, लड़की लिखो,
पैसा लिखो, मंत्री लिखो,
साहब लिखो, फाइल क्लियर लिखो,
जली हुई झोंपड़ी, लूटी हुई इज्जत, मरा हुआ बच्चा
पिटा हुआ बुढा बिल्कुल मत लिखो,
पुलिस की मार, फटा हुआ ब्लाउज ,
पेट चीरी हुई लड़की की लाश मत लिखो,
महुआ मत लिखो, मडई मत लिखो,
नाच मत लिखो, ढोल मत लिखो,
लाल आँख मत लिखो, तनी मुट्ठी मत लिखो
जंगल से आती हुई ललकार मत लिखो,
अन्याय मत लिखो, प्रतिकार मत लिखो,
सहने की शक्ति का खात्मा और बगावत मत लिखो,


क्रान्ति मत लिखो, नया समाज मत लिखो,
संघर्ष मत लिखो, आत्मसम्मान मत लिखो,
लाईन है खींची हुई, अक्लमंद और पागलों में,
अक्लमंद लिखो , पागल मत लिखो



Posted by हिमाँशु कुमार at 9:47 PM

Saturday, February 04, 2012

देश के 60 नक्‍सल प्रभावि‍त जिलों में होगी एक नई पहल

सरकार ने की नक्‍सल प्रभावि‍त क्षेत्रों में छह वन आधारि‍त परि‍योजनाओं की घोषणा 
सरकार ने देश के 60 नक्‍सल प्रभावि‍त जिलों में वन आधारि‍त छह परि‍योजनाओं के सृजन की घोषणा की है। इन परि‍योजनाओं को सार्वजनि‍क नि‍जी भागीदारी के माध्‍यम से छह महीनों के भीतर कार्यान्‍वि‍त कि‍या जाएगा और झारखंड, छत्‍तीसगढ़, ओडि‍शा, मध्‍य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्‍ट्र जैसे राज्‍यों को इसमें शामि‍ल कि‍या गया है। वन आधारि‍त उत्‍पादों पर आधारि‍त एक राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन को आज यहां संबोधि‍त करते हुए केन्‍द्रीय ग्रामीण वि‍कास मंत्री श्री जयराम रमेश ने कहा कि‍लाह, गोंद, औषधीय पौधे, तसर, बांस और नीम तथा महुआ जैसे गैर-खाद्य ति‍लहनों से जुड़ी परि‍योजनाएं इन वनोत्‍पादों के संग्रह के काम में लगी जनजाति‍यों की आय को बढ़ाएंगी। 
मंत्री महोदय ने कहा कि‍वनोत्‍पादों के बाजार का नि‍रंतर वि‍स्‍तार करना और उन्‍हें पुनर्जीवन प्रदान करना इस क्षेत्र से जुड़ी दो बड़ी चुनौति‍यां हैं। उन्‍होंने कहा कि‍यह परि‍योजनाएं राष्‍ट्रीय ग्रामीण आजीवि‍का मि‍शन का हि‍स्‍सा होंगी और ये नक्‍सल प्रभावि‍त क्षेत्रों में वनोत्‍पादों के क्षेत्र में आजीवि‍का सृजन और मूल्‍यसंवर्धन पर मुख्‍य रूप से जोर देंगी। मंत्री महोदय ने इस उद्देश्‍य को पूरा करने के लि‍ए वन वि‍भागों और स्‍थानीय स्‍व-सहायता समूहों तथा ऐसे अन्‍य संगठनों के बीच सहयोग कायम करने पर जोर दि‍या। {पत्र सूचना कार्यालय} 03-फरवरी-2012 19:45 IST