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Wednesday, January 12, 2022

हां मैं समाजवादी हूं--स्वामी विवेकानंद

11th January 2022 at 11:04 AM

स्वामी विवेकानंद की जयंती (12 जनवरी) पर एल. एस. हरदेनिया का खोजपूर्ण लेख 

 अन्त में आयेगा मजदूरों का राज्य


भोपाल
//नई दिल्ली11 जनवरी 2022: (एल. एस. हरदेनिया//पंजाब स्क्रीन)::

पिछले दिनों से देश के विभिन्न भागों में मुस्लिम एवं ईसाई नागरिकों पर अत्प्रयाशित हमले होते रहे हैं। यहां तक कि हरिद्वार में मुसलमानों के कत्लेआम तक का आव्हान किया गया। इस तरह की बातों से देश की एकता को चोट पहुंचती है। इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि देश के नागरिकों की एकता के बिना देश का विकास संभव नहीं है।

हमारे सबसे महान आध्यात्मिक गुरू और हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ संत स्वामी विवेकानंद ने सभी धर्मावलंबियों की एकता पर जोर दिया था। उनका कहना था कि वेदांत और इस्लाम के समन्वय के बना अति दरिद्र भारत का विकास संभव नहीं है।

इस संदर्भ में उनका एक दस्तावेज प्रकाशित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के हल के बारे में उनके गहन विचार इस लेख में प्रकाशित किए जा रहे हैं। 

 प्रिय मोहम्मद सरफराज हुसैन,                                          अलमोड़ा, १० जून १८९८

आपका पत्र पढक़र मैं मुग्ध हो गया और मुझे यह जानकर अति आनन्द हुआ कि भगवान चुपचाप हमारी मातृभूमि के लिए अभूतपूर्व चीजों की तैयारी कर रहे हैं।

चाहे हम उसे वेदान्त कहें या और किसी नाम से पुकारें परन्तु सत्य तो यह है किऽ धर्म और विचार में अद्वैत ही अन्तिम शब्द है और केवल उसी के दृष्टिकोण से सब धर्मों और सम्प्रदायों को प्रेम से देखा जा सकता है। हमें विश्वास है कि भविष्य के सभ्य मानवी समाज का यही धर्म है। अन्य जातियों की अपेक्षा हिन्दुओं को यह श्रेय प्राप्त होगा कि उन्होंने इसकी सर्वप्रथम खोज की।  इसका कारण यह है कि वे अरबी और हिब्रू दोनों जातियों से अधिक प्राचीन हैं। परन्तु साथ ही व्यावहारिक अद्वैतवाद का-जो समस्त मनुष्य-जाति को अपनी ही आत्मा का स्वरूप समझता है, तथा उसी के अनुकूल आचरण करता है-विकास हिन्दुओं में सार्वभौमिक भाव से होना अभी शेष है।

इसके विपरीत हमारा अनुभव यह है कि यदि किसी धर्म के अनुयायी व्यावहारिक जगत् के दैनिक कार्यों के क्षेत्र में, इस समानता को योग्य अंश में ला सके हैं तो वे इस्लाम और केवल इस्लाम के अनुयायी हैं - यद्यपि सामान्यतः जिस सिद्धान्त के अनुसार ऐसे आचरण का अवलम्बन है उसके गम्भीर अर्थ से वे अनभिज्ञ है जिसे कि हिन्दू साधारणत: स्पष्ट रूप से समझते हैं।

इसलिए हमें दृढ़ विश्वास है कि वेदांत के सिद्धान्त कितने ही उदार और विलक्षण क्यों न हों, परन्तु व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, मनुष्य-जाति के महान् जनसमूह के लिए वे मूल्यहीन हैं। हम मनुष्य-जाति को उस स्थान पर ले जाना  चाहते हैं जहाँ न वेद हैं, न बाइबिल है, न कुरान; परन्तु वेद, बाइबिल और कुरान ऽके समन्वय से ही ऐसा हो सकता है। मनुष्य-जाति को यह शिक्षा देनी चाहिए कि सब धर्म उस धर्म के, उस एकमेव द्वितीय के भिन्न भिन्न रूप हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति इन धर्मों में से अपना मनोनुकूल मार्ग चुन सकता है।

हमारी मातृभूमि के लिए इन दोनों विशाल मतों का सामंजस्य - हिन्दुत्व और इस्लाम - वेदान्ती बुद्धि और इस्लामी शरीर - यही एक आशा है।

मैं अपने मानस-चक्षु से भावी भारत की उस पूर्णावस्था को देखता हूँ  जिसका इस विप्लव और संघर्ष से तेजस्वी और अजेय रूप में वैदान्तिक बुद्धि और इस्लामी शरीर के साथ उत्थान होगा।

प्रभु से सर्वदा मेरी यही प्रार्थना है कि वह आपको मनुष्य-जाति की सहायता के लिए, विशेषतः हमारी अत्यन्त दरिद्र मातृभूमि के लिए, एक शक्ति-सम्पन्न यन्त्र बनावें।

इति।                                                                                                भवदीय

स्नेहबद्ध                                                                                                   विवेकानन्द 

ईसाई बन रहे हैं अछूत

प्रिय पंडितजी महाराज,

हम लोगों को विदेशों की यात्रा करनी चाहिए। यदि हम अपने को एक सुसंगठित राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि दूसरे देशों में किस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था चल रही है और साथ ही हमें मुक्त हृदय से दूसरे राष्ट्रों से विचार विनिमय करते रहना चाहिए। सब से बड़ी बात तो यह है कि हमें गरीबों पर अत्याचार करना एकदम बन्द कर देना चाहिए। किस हास्यापद दशा को हम पहुँच गये हैं! यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है तो छुतही बीमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सिर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है-वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो-तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोकटोक नहीं, ऐसा कोई नहीं जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक बिडम्बना की बात क्या हो सकती है? आइये, देखिये तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गजब कर रहे हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या में ईसाई बना रहे हैं। ट्रावंनकोर में जहाँ पुरोहितों के अत्याचार भारतवर्ष भर में सब से अधिक हैं, जहाँ जमीन के प्रत्येक टुकड़े के मालिक ब्राहमण हैं और जहाँ राजघरानों की महिलाएँ तक ब्राहमणों की उपपत्नी बनकर रहने में गौरव मानती हैं, वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँ? हे भगवन्, मनुष्य कब दूसरे मनुष्यों से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेंगे? (खेतड़ी निवासी पंडित शंकरलाल को 20 सितम्बर 1892 को बंबई से लिखित)

क्या मांस खाने वालों को प्रभु कृपा नहीं मिलेगी?

तुमने मांस खाने वाले क्षत्रियों की बात उठायी है। क्षत्रिय लोग चाहे मांस खायें, या न खायें वे ही हिन्दूधर्म की उन सब वस्तुओं के जन्मदाता हैं जिनको तुम महान और सुन्दर देखते हो। उपनिषद् किसने लिखे थे? राम कौन थे? कृष्ण कौन थे? बुद्ध कौन थे? जैनों के तीर्थंकर कौन थे? जब कभी क्षत्रियों ने धर्म का उपदेश दिया, उन्होंने सभी को धर्म पर अधिकार दिया। और जब कभी ब्राहमणों ने कुछ लिखा उन्होंने औरों को सब प्रकार के अधिकारों से वंचित करने की चेष्टा की। गीता और व्याससूत्र पढ़ो, या किसी से सुन लो। गीता में मुक्ति की राह पर सभी नरनारियों, सभी जातियों और सभी वर्णों को अधिकार दिया गया है, परन्तु व्यास गरीब शूद्रों को वंचित करने के लिए वेद की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं। क्या ईश्वर तुम जैसा मूर्ख है कि एक टुकड़े  मांस से उसकी दयारूपी नदी में बाधा खड़ी हो जायगी? अगर वह ऐसा ही है तो उसका मोल एक फूटी कौड़ी भी नहीं! (शिकागो से 03 मार्च 1894 को लिखे गए पत्र से)

ब्राहम्ण और साधु गरीबों का खून चूस रहे हैं

इस देश की-सी महिलाएँ दुनिया भर में नहीं हैं। वे कैसी पवित्र, स्वावलम्बी और दयावती हैं। महिलाएँ ही यहाँ की सब कुछ हैं। विद्या, बुद्धि आदि सभी उन्हीं में हैं। ‘‘या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेषु’’ (जो पुण्यात्माओं के घरों में  स्वयं लक्ष्मीरूपिणी हैं) इसी देश में हैं, और ‘‘पापात्मनां हृदयेष्वलक्ष्मीः’’ (पापियो के हृदय में अलक्ष्मीरूपिणी हैं) हमारे यहाँ हैं-बस यही समझ लो। यहाँ की महिलाओं को देखकर तो मेरे होश उड़ गये। ‘‘त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ही’’ (तुम्हीं लक्ष्मी हो, तुम्हीं ईश्वरी हो, तुम्हीं, तुम्हीं लज्जारूपिणी हो) इत्यादि। ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता’’ (जो देवी सब प्राणियों में शक्तिरूप से विराजती हैं) इत्यादि। यहाँ की बर्फ जैसी सफेद है वैसी शुद्ध मनवाली हजारों नारियाँ यहाँ हैं। फिर अपने देश की दस वर्ष की उम्र में बच्चों को जन्म देने वाली बालिकाएँ!!! प्रभु, मैं सब समझ रहा हूँ। हे भाई, ‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’’ (जहां नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं) - वृद्ध मनु ने कहा है। हम महापापी हैं; स्त्रियों को ‘घृणित कीड़ा’, ‘नरक का द्वार’ इत्यादि कहकर हम अधःपतित हुए हैं। बाप रे बाप! कैसा आकाश-पाताल का अन्तर है! ‘‘याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात्।’’ (जहाँ जैसा उचित हो, ईश्वर वहाँ वैसा कर्मफल का विधान करते हैं। - ईश उप.) क्या प्रभु झूठी गप्प से भूलने वाले हैं? प्रभु ने कहा है, ‘‘त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी’’ (तुम्हीं स्त्री हो और तुम्हीं पुरूष; तुम्ही कुँवारे हो और तुम्ही क्वाँरी। - श्र्वेताश्र्वर उप.) इत्यादि और हम कर रहे हैं, ‘‘दूरमपसर रे चण्डाल’’ (ऐ चण्डाल, दूर हट) ‘‘केनैषा निर्मिता नारी मोहिनी’’ (किसने इस मोहिनी नारी को बनाया है?) इत्यादि। दक्षिण भारत में उच्च जातियों का नीची जातियों पर क्या ही अत्याचार मैंने देखा है! मन्दिरों मंे देव-दासियों के नृत्य की ही धूम मची है! जो धर्म गरीबों का दुःख नहीं मिटाता, मनुष्य को देवता नहीं बनाता, क्या वह भी धर्म है? क्या हमारा धर्म, धर्म कहलाने योग्य है? हमारा तो छूतमार्ग है-सिर्फ ‘‘मुझे मत छुओ’’, ‘‘मुझे मत छुओ।’’ हे भगवन्! जिस देश के बड़े खोपड़ी वाले आज दो हजार वर्षों से सिर्फ यही विचार कर रहे हैं कि दाहिने हाथ से खाऊँ या बायें हाथ से, पानी दाहिनी ओर से लूँ या बायीं और से,... उनकी अधोगति न होगी तो किसकी होगी? ‘‘कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः।’’ (सभी के सोने पर भी काल जागता ही रहता है, काल को कोई नहीं पार कर सकता।) ईश्वर सब जानते हैं, भला उनकी आँखों में धूल कौन झोंक सकता है?

जिस देश में करोड़ों मनुष्य महुए के फूल खाकर दिन गुजारते हों, और दस बीस लाख साधु और दस बारह करोड़ ब्राह्मण उन गरीबों का खून चूसकर पीते हैं और उनकी उन्नति के लिए कोई चेष्टा नहीं करते, क्या वह देश है या नरक? क्या वह धर्म है या पिशाच का नृत्य? भाई, इस बात को गौर से समझो-मैं भारतवर्ष को घूम-घामकर देख चुका और इस देश को भी देखा-क्या बिना कारण के कहीं कार्य होता है? क्या बिना पाप के सजा मिल सकती है?(शिकागो से 19 मार्च 1894 को लिखे गए पत्र से)

हां मैं समाजवादी हूं

मानवी समाज पर चारों वर्ण-पुरोहित, सैनिक, व्यापारी और मजदूर-बारी-बारी से राज्य करते हैं। हर अवस्था का अपना गौरव और अपना दोष होता है। जब ब्राह्मण का राज्य होता है तब जन्म के आधार पर पृथकता रहती है - पुरोहित स्वयं और उनके वंशज नाना प्रकार के अधिकारों से सुरक्षित रहते हैं-उनके अतिरिक्त किसी को कोई ज्ञान नहीं होता-और उनके अतिरिक्त किसी को शिक्षा देने का अधिकार नहीं। इस विशिष्ट काल में सब विद्याओं की नींव पड़ती है, यह इसका गौरव है। ब्राह्मण मन को उन्नत करता है, क्योंकि मन द्वारा ही वह राज्य करता है।

क्षत्रिय-राज्य क्रूर और अन्यायी होता है, परन्तु उनमें पृथकता नहीं रहती और उनके काल में कला और सामाजिक शिष्टता उन्नति के शिखर पर पहुँच जाती है।

उसके बाद वैश्य-राज्य आता है। उनमें कुचलने की, और खून चूसने की मौन शक्ति अत्यन्त भीषण होती है, उसका लाभ यह है कि व्यापारी सब जगह जाता है इसलिए वह अपनी दोनों अवस्थाओं में एकत्रित किये हुए विचारों को फैलाने में सफल होता है। उनमें क्षत्रियों से भी पृथकता होती है परन्तु सभ्यता की अवनति आरम्भ हो जाती है।

अन्त में आयेगा मजदूरों का राज्य। उसका लाभ होगा भौतिक सुखों का समान वितरण-और उससे हानि होगी (कदाचित्) सभ्यता का निम्न स्तर पर गिर जाना। साधारण शिक्षा का बहुत प्रचार होगा, परन्तु असामान्य प्रतिभाशाली व्यक्ति कम होते जायेंगे। 

यदि ऐसा राज्य स्थापित करना सम्भव हो जिसमें ब्राह्मण-काल का ज्ञान, क्षत्रिय-काल की सभ्यता, वैश्य-काल का प्रचार-भाव और शूद्र-काल की समानता रखी जा सके-उनके दोषों को त्याग कर तो वह आदर्श राज्य होगा। परन्तु क्या यह सम्भव है?

परन्तु पहले तीनों का राज्य हो चुका है। अब शूद्र-राज्य का काल आ गया है-वे अवश्य राज्य करेंगे, और उन्हें कोई रोक नहीं सकता। ‘‘सोने और चाँदी के प्रमाप ;ैजंदकंतकद्ध रखने में क्या क्या कठिनाइयाँ हैं, मैं यह सब नहीं जानता, (और मैंने देखा है कि कोई भी इस विषय में अधिक नहीं जानता) परन्तु मैं यह देखता हूँ कि स्वर्ण प्रमाप ने धनवानों को अधिक धनी तथा दरिद्रों को और भी अधिक दरिद्र बना दिया है। ब्रायन ने यह ठीक ही कहा था कि ‘‘सोने के भी क्रास पर हम लटकाये जाना पसन्द न करेंगे।’’ यदि चाँदी का प्रमाप हो जायेगा तो इस असमान युद्ध में गरीबों के पक्ष में कुछ बल आ जायेगा। मैं समाजवादी हूँ, इसलिए नहीं कि मैं इसे पूर्ण रूप से निर्दोष व्यवस्था समझता हूँ, परन्तु इसलिए कि रोटी न मिलने से आधी रोटी ही अच्छी है।

और सब मतवाद काम में लाये जा चुके हैं और दोषयुक्त सिद्ध हुए हैं। इसकी भी अब परीक्षा होने दो-यदि और किसी कारण से नहीं तो उसकी नवीनता के लिए ही। सर्वदा उन्हीं व्यक्तियों को सुख और दुःख मिलने की अपेक्षा सुख-दुःख का बँटवारा करना अच्छा है। शुभ और अशुभ की समष्टि संसार में समान ही रहती है। नये मतवादों से वह भार कन्धे से कन्धा बदल लेगा, और कुछ नहीं। इस दुःखी संसार में सब को सुख-भोग का अवसर दो जिससे इस तथाकथित सुख के अनुभव के पश्चात् वे संसार, शासन-विधि और अन्य झंझटों को छोड़कर परमात्मा के पास आ सकें। (वेस्टमिनिस्टर इंग्लैड से 01 नवंबर 1896 को कुमारी मेरी हेल को लिखे गए एक पत्र का अंश)

अस्पृश्यता-अन्धविश्वास की देन

पहले महत् का लक्षण था-त्रिभुवम् उपकार-श्रेणिभिः प्र्रीयमाणः -सेवा के अनेक कामों से तीनों लोकों को प्रसन्न रखना, परन्तु अब है-मैं पवित्र हूँ और बाकी सारा संसार अपवित्र है, केवल मैं ही शुद्ध हूँ! सहज ब्रह्मज्ञान! वाह! हे भगवान! आजकल ब्रह्म न तो हृदय-कन्दर में है, न गोलोक में  और न सब जीवों में-अब वह भात की हाँडी में है। हम सनातनी हिन्दू हैं पर हम अपने आपको ‘मत छूओ-वाद’ में बिल्कुल सम्मिलित करना नहीं चाहते।

वह हिन्दू धर्म नहीं है-वह हमारे किसी ग्रन्थ में नहीं है; यह एक सनातनी अंधविश्वास है जिसने  हमारी राष्ट्रीय कुशलता को सदा हानि पहुँचायी है।

धर्म तो भात की हाँड़ी में समा चुका है। वर्तमान हिन्दू धर्म न तो विचार-प्रधान है और न ही ज्ञान-प्रधान, ‘मुझे न छूओ, मुझे न छूओ’-इस प्रकार की अस्पृष्यता ही उसका एकमात्र अवलम्ब है, बस इतना ही।

अस्पृश्यता एक तरह की मानसिक बीमारी है; उससे सावधान रहना। सब प्रकार का विस्तार ही जीवन है और सब प्रकार की संकीर्णता मृत्यु है। जहाँ प्रेम है, वहीं विस्तार है और जहाँ स्वार्थ हैं, वहीं संकीर्णता। अतः प्रेम ही जीवन का एकमात्र विधान है।

इस घोर वामाचार-रूप अस्पृश्यता में फँसकर तुम अपने जीवन से हाथ न धो बैठना

Tuesday, August 27, 2013

स्वामी विवेकानंद अवार्ड ऑफ एक्सीलैंस-2013 अब लुधियाना में

प्रतिभाशाली शख्सीयतों का चयन पूरा
8 सिंतबर को लुधियाना के पीएयू आडिटोरियम में सम्मान समारोह
 प्रोग्राम के बारे में जानकारी देते हुए डी.जी.एम एस.एस भल्ला व संजीव राणा
लुधियाना:26 अगस्त 2013: (विशाल/पंजाब स्क्रीन):  स्वामी विवेकानंद अवार्ड ऑफ एक्सीलैंस-2013 की तरफ से लुधियाना की प्रतिभाशाली शख्सियतों को  पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के व्हीट आडिटोरियम में 8 सिंतबर को शाम 5 बजे कार्यक्रम के दौरान सम्मानित किया जाएगा। यह जानकारी सैंट्रल बैंक ऑफ इंडिया लुधियाना रिजन के डी.जी.एम एस.एस भल्ला व स्वामी विवेकानंद अवार्ड ऑफ एक्सीलैंस-2013 के प्रोजैक्ट हैड व प्रणय मीडिया के संजीव राणा ने दी। उन्होंने बताया कि प्रणय मीडिया व सेंट्रल बैंक आफ इंडिया मिलकर इस अवार्ड सेरामनी का आयोजन कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि ज्यूरी द्वारा लगभग 1 महीने की खोज के बाद नामों को फाइनल किया गया है। इससे पहले चंडीगढ़, अमृतसर, जालंधर, होशियारपुर व पटियाला में उक्त अवार्ड से शख्सियतों को सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि 8 श्रेणियों पर्यावरण, उद्योग, लिटरेचर एंड एजुकेशन, मैडीकल एंड हैल्थ, सोशल सर्विस, खेल, डिफेंस व स्पेशल अवार्ड शामिल है। उन्होंने बताया कि इस अवार्ड के माध्यम से उन छिपे हुए चेहरों को भी समाज के सामने लाया जाता है जो प्रसिद्धि से दूर रहकर समाज सेवा को समर्पित हैं और उनके कार्य समाज के लिए प्रेरणादायक हैं। चूंकि वर्ष 2013  को स्वामी विवेकानंद जी की 150 वीं जयंति के तौर पर मनाया जा रहा है। इसलिए यह सारा कार्यक्रम देश के इस महान सपूत को ही समर्पित है।


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Thursday, January 31, 2013

देश सर्वोपरि है//राजीव गुप्ता

Wed, Jan 30, 2013 at 11:44 AM
ऐसी विषम परिस्थिति में हिन्दू-आतंकवाद का नाम क्यों ?
देश सर्वोपरि है. विश्व - पटल पर भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का 150वाँ जन्मदिन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रामकृष्ण मिशन के साथ-साथ भारत सरकार भी मना रही है. परन्तु जिस तरह जयपुर के कांग्रेस-चिन्तन शिविर से भारत के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने  "हिन्दू-आतंकवाद" नाम का चुनावी शिगूफा  छेड़ा, सारा देश सकते में आ गया. गृहमंत्री के इस दुर्भाग्यपूर्ण बयान से देश स्तब्ध है.  मात्र सत्ता पाने के लिए विश्व समुदाय के सामने पूरे देश को कलंकित करना कहां तक उचित है ? आतंकवाद को भगवे रंग में रंगकर पहले पी. चिदम्बरम ने भगवा-आतंकवाद का नाम लेकर संघ पर प्रहार  किया, जब इतने से भी इन सत्ता-लोलुप नेताओं का पेट नहीं भरा तो आतंकवाद का वर्गीकरण कर पुन: संघ के साथ -साथ करोड़ो हिन्दुओ पर प्रहार कर दिया.  हमारा आपस मे वैचारिक मतभेद हो सकता है. वैचारिक मतभेद ही लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करता है.  मात्र इन वैचारिक मतभेदों को कारण गृहमंत्री को देश की छवि धूमिल करना कहां तक उचित है ? गृह मंत्री के ऐसे बयान से क्या यह मान लिया  की स्वामी विवेकानंद की 150 जयन्ती मनाना सरकारी  ढोंग से अधिक कुछ नहीं है ? क्योंकि गृहमंत्री के बयान से देश की छवि को गहरा धक्का लगा है.

अब पाकिस्तान के आतंकी गृह मंत्री के बयान से प्रसन्न होकर विश्व समुदाय से भारत को "आतंकवादी देश" घोषित करने की मांग कर रहे है.  अभी तक भारत ने पाकिस्तान को 'आतंकवाद' के विषय पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग - थलग किया हुआ था. परन्तु अब पाकिस्तान विश्व समुदाय के समक्ष यह  बात पूरे जोर - शोर से उठायेगा कि  भारत में जितने भी आतंकवादी हमले हुए है, उसे भारत ने खुद करवाएँ  है, इसकी पुष्टि खुद वहाँ के गृहमंत्री ने की है. पाकिस्तान की करतूतो की वजह से सीमा पर बढ़ा तनाव अभी कम भी नहीं हुआ है, ऐसी विषम परिस्थिति में शिंदे ने हिन्दू - आतंकवाद का नाम क्यों लिया ?  कल तक कांग्रेस ने सुशील कुमार शिंदे के इस बयान को उनके मुंह से गलती से निकलने  की बात कह थी रही थी, परन्तु कांग्रेस के नेता, भारत के विदेश मंत्री जैसे सरीखे लोग तथाकथित "तथ्यों के आधार" पर गृहमंत्री का बचाव करने में कोइ कसर नहीं छोड़ रहे है. अगर गृहमंत्री के तथ्य सही है,  तो उन्हें  दोषियो पर  कार्यवाही करने से रोका किसने है ? सुशील कुमार शिंदे को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे कांग्रेस पार्टी के नहीं 'देश' के गृहमंत्री है.

कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्त्ता अपना विवेक खो बैठे हैं, परिणामतः बार - बार एक देशभक्त संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के ऊपर अपने शब्दों के माध्यम से कुठाराघात करते रहते है .इनकी आखों पर राजनीति की ऐसी परत चढी है कि समाज को बांटने के लिए संघ को कभी "भगवा आतंकवाद" से संबोधित करते है तो कभी "फासिस्ट-संगठन" की संज्ञा देते हैं .कांग्रेस के नेता हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के दोनों सिद्धांतो पर चलते है .मसलन एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है. दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो .इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर . इसी सिद्धांतों पर चलते हुए कांग्रेसी हर उस व्यक्ति की आड़ में संघ को बदनाम करने कोशिश करते है, जो देशहित की बात करता है.

इसकी आड़ में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लपेटने के चक्कर में हैं, जिसकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते .भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और उसकी मानसिकता बदस्तूर जारी है . इसीलिए कांग्रेसी नेता आतंकवाद को मजहबों में बांटकर इस्लामी, ईसाई आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ कर देश की जनता को भ्रमित करने नाकाम कोशिश करते है .

जो सभ्यता पूरे विश्व के कल्याण का उदघोष करती हो और उस सभ्यता का जोरदार समर्थन करने वाले लोगों को बदनाम करने की साजिश वर्तमान सरकार की नियत को दर्शाता है . भारतीय चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना और भोजन से पूर्व जीव-जंतुओं के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है. ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र तो अब शासन ने भी अपना लिया है.

खुद कमाओ खुद खाओ यह प्रकृति है , दूसरा कमाए तुम छीन कर खाओ यह विकृति है और खुद कमाओ दूसरे को खिलाओ यह भारतीय संस्कृति है .परन्तु तथाकथित वैश्वीकरण अर्थात ग्लोब्लाईजेशन के इस दौर में अपने को अधिक आधुनिक कहलाने की होड़ के चक्कर में व्यक्ति जब अपनी  पहचान,  अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपने मूल्यों तथा  अपनी संस्कृति से समझौता करने को आतुर हो तो ऐसे विकट समय में अपने देश की ध्वजा-पताका थामे अगर कोई भारत में भारतीयता की बात करता हो तो उसे बदनाम करने के लए तरह - तरह के हथकंडे अपनाये जाते है .क्या स्वतंत्र भारत में भारतीयता की बात करना गुनाह है ?

आज भारत अनेक आतंरिक कलहों से जूझ रहा है .देश में कही नक्सलवाद , आतंकवाद अपने चरम पर है तो असम समेत अनेक राज्यो मे साम्प्रदायिक दंगे हो रहे है. बंग्लादेशी घुसपैठ सबको विदित ही है .कृषि - प्रधान कहलाने वाले देश में  कृषक आत्महत्या को मजबूर हो रहा है . राजनैतिक पार्टियाँ बस अपने स्वार्थ-पूर्ति में ही लगी रहती है कोई पार्टी जाति के नाम पर वोट मांगती है तो कोई किसी विशेष समुदाय को लाभ पहुचाने के लिए उन्हें कोटे के लोटे से अफीम चटाने का काम करती है . राजनेताओं पर राजनीति का ऐसा खुमार चढ़ा है कि वे अपनी सस्ती राजनीति चमकाने के चक्कर में देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आते . जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी दिल्ली में खुले आम देश की अखंडता को चुनौती देकर चले जाते है और किसी के कानो पर जूं तक नहीं रेंगती .  आज भ्रष्टाचार का हर तरफ बोलबाला है, परन्तु बावजूद इसके, सरकार को इस समस्या से ज्यादा चिंता इस बात की है, कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले के पीछे कही संघ तो नहीं है . क्या संघ के लोग इस देश के नागरिक नहीं है ? क्या संघ के लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते ? संघ अछूत  है क्या ? किसी प्रसिद्ध चिन्तक ने कहा है  कि जो कौमें अपने पूर्वजों को भुला देती है, वो ज्यादा दिन तक नहीं चलती है .
-राजीव गुप्ता                                              देश सर्वोपरि है//राजीव गुप्ता

Saturday, January 19, 2013

स्वामी विवेकानंद जी की 150वीं वर्षगांठ के समारोह

18-जनवरी-2013 14:52 IST
राष्ट्रपति ने किया रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन का उद्घाटन
भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने आज 18 जनवरी 2013 को कोलकाता में स्वामी विवेकानंद के जन्मस्थल पर स्वामीजी की 150वीं वर्षगांठ के समारोह के तहत रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन का उद्घाटन किया। 

इस अवसर पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के संदेश और उनकी सीख उस समय, आज और जब तक मानव सभ्यता है, तब तक हर दौर में प्रासंगिक है। उन्होंने स्वामीजी को बंगाल का महान सपूत और महान दूरदर्शी बताया। उन्होंने कहा कि सुप्रसिद्ध इतिहासकार अल बशम ने विवेकानंद को एक ऐसी हस्ती के रुप में वर्णित किया था जो सदियों में एक बार पैदा होती हैं।

उन्होंने कहा कि यह बहुत विस्मयकारी है कि अपने छोटे से समय में उन्होंने ऐसे समाज को बदल दिया जो स्वंय में भरोसा खो चुका था। उन्होंने अपने दर्शन से सभी को झकझोर कर रख दिया और एक विचलित राष्ट्र के भरोसे को वापस लौटाया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब हमारे लोगों का आत्मबल काफी कमजोर था और बहुत से भारतीय आदर्शों के लिए पश्चिम की ओर देखते थे ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने उनके भीतर स्वंय पर भरोसा और गर्व के भाव को जगाया।

राष्ट्रपति ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरु को उद्धरित करते हुए कहा – "भारत के इतिहास में जड और भारतीय गौरव पर पूरे गर्व को समाहित करते हुए जीवन की समस्याओं के प्रति विवेकानंद का दृष्टिकोण आधुनिक था, एक तरह से यह भारत के इतिहास और वर्तमान के बीच सेतु के रुप में था। " (PIB) 
 स्वामी विवेकानंद जी की 150वीं वर्षगांठ के समारोह
मीणा /विजयलक्ष्मी/ - 246

Saturday, January 12, 2013

आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Fri, Jan 11, 2013 at 11:03 PM
खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे नरेन्द्र
तस्वीर ओशो टीचिंग से साभार 
11 सितम्बर, 1893 ई. को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन मे भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. मे कलकत्ते (कोलकाता) के शिमलापल्ली नामक मोहल्ले के निवासी श्री विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर हुआ. बचपन का इनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था तथा ये अपने माता-पिता की छठ्वी संतान थे. बच्चो की प्राथमिक पाठशाला माता की गोद ही होती है और उस पाठशाला मे अध्यापन उसकी माता द्वारा ही किया जाता है. माता की उस शिक्षा का प्रभाव बच्चे के मस्तिष्क पर अजीवन रहता है. इस बात को नरेन्द्रनाथ की माँ भलिभाँति जानतीं थी. अत: उन्होने नरेन्द्रनाथ को सुसंस्कारित करने मे कोई कसर नही छोडी. वे नरेन्द्रनाथ को बाल्यवस्था से ही रामायण और महाभारत की कथाये सुनाया करती थी. अगर कोई साधु उनके द्वार पर भिक्षा माँगने आ जाता तो नरेन्द्रनाथ की माँ नरेन्द्रनाथ को साथ मे लेकर उस साधु का यथोचित सेवा-सत्कार कर अपने सामर्थ्यानुसार उन्हे भिक्षा देती थी. माँ के इस कृत्य ने नरेन्द्रनाथ के मन पर अमिट छाप छोडी. पढाई मे प्रखर होने के साथ – साथ ये खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे. गायन कला के चलते ही नवम्बर, 1881 को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर पर इनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई. नरेन्द्रनाथ की गायन कला से प्रभावित होकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इन्हे दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण दिया और कालांतर मे नरेन्द्रनाथ उनके शिष्य बने. परंतु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को नरेन्द्रनाथ ने अपना गुरु तब तक नही माना जब तक उन्होने उनकी उत्कंठा के चलते उनका भगवान से साक्षात्कार नही करवा दिया.  
नारी चिंतन
न्यूयार्क मे भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जबतक वहाँ का समाज स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर प्रत्येक मानव मे मानवता का दर्शन नही करता और यह नही सोचता कि स्त्री-पुरुष दोनो एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी है तबतक वहाँ की स्त्रियो का वास्तविक रूप से उत्थान नही हो सकता. मात्र बौद्धिक और अक्षर ज्ञान से ही मानव का कल्याण संभव नही है. अपितु मानव – कल्याण हेतु बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के साथ – साथ उसकी अध्यात्मकिता और नीतिमत्ता की उन्नति भी अत्यंत आवश्यक है. भारत की नारियाँ भले ही बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के स्तर पर अमेरिका की नारियो से पीछे हो परंतु वे सदैव अपने शील की रक्षा के साथ-साथ एक चरित्रवान जीवनायपन करते हुए अपने पवित्र आचार-विचार और हृदय की पवित्रता के माध्यम से अध्यात्म के सहारे मानव-कल्याण के पथ पर अग्रेसित होती है. स्वामी जी ने अपने भाषण मे वहाँ के प्रेमाचार के विषय पर कहा कि अगर वे विवाहेच्छुक होते तो अमेरिका के अन्य नवयुवको की भाँति सैकडो बार प्रेमाचार के आडम्बर की अपेक्षा बिना किसी आडम्बर के किसी एक के प्रियपात्र बन चुके होते है. अमेरिका मे बढते तलाको की संख्या पर चिंतित होकर उन्होने वहाँ बताया कि भारतीय समाज मे यह सर्व-शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपने पति-पत्नी के अलावा अन्य सभी को मातृवत-पुत्रवत की नजर से देखे. अमेरिका मे स्त्री भोगवादी मानसिकता के केन्द्र-बिन्दु मे वास करती है परंतु भारत मे स्त्री सदैव से पूज्या रही है. इसी भारतीय-चिंतन के चलते भारत मे तलाको की संख्या अमेरिका के अपेक्षाकृत नगण्य है. 
  व्यक्तित्व विकास

राजीव गुप्ता-9811558925
व्यक्तित्व विकास की शिक्षा पर स्वामी जी का मानना था कि व्यक्ति का व्यक्तित्व असरदार होना चाहिये. व्यक्ति जिसके भी सम्पर्क मे आये उस पर उसके ग़ुणो की, उसकी बुद्धि की तथा उसके आचरण का जबरदस्त हो यह हर व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिये क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्थान दो-तिहाई भाग मे होता है और मात्र एक-तिहाई भाग मे ही बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द का स्थान रहता है. हमारा कर्म हमारे व्यक्तित्व का बाह्य अभिव्यक्ति मात्र ही है. अत: हमारी सम्पूर्ण शिक्षा और सारे अध्ययनो का एकमेव लक्ष्य हमारे व्यक्तित्व को गढते हुए उसे और अनवरत निखारना ही है. व्यक्तित्व की महत्ता हम इसी बात से लगा सकते है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व जिस पर भी पडता है उसे कार्यशील बना देता है. व्यक्तित्व पर एक उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने यहाँ तक कहा कि दार्शनिक मात्र बुद्धि पर असर करता है अपितु एक धर्मसंस्थापको का असर सम्पूर्ण समाज पर पडता है जिससे सारा देश तक हिल जाता है. मनुष्य को पूर्णता को प्राप्त होना ही उसके जीवन उद्देश्य होना चाहिये. मनुष्य मे अच्छी – बुरी स्वभाविकत: दोनो वृत्तियाँ होती है. समयानुसार व्यक्ति द्वारा उसके अन्दर की बुराईयो को कम करने की कोशिश करना ही उसे पूर्णता की ओर अग्रसित करता है.
शिक्षा
शिकागो से भारत वापस लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. स्वामी विवेकानन्द ने एक सभा मे शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का आधार धर्म होना चाहिये और उसका केन्द्र बिन्दु “चरित्र-निर्माण” ही होना चाहिये. धर्म से उनका तात्पर्य मात्र पूजा-पद्धति ही नही था अपितु “जीवन जीने की कला” था जिसकी पुष्टि उन्होने विचार-शक्ति का महत्व, कर्म का परिणाम और भाग्य के निर्माण इत्यादि जैसे विभिन्न विषयो पर अपने विचार रखकर किया. स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि हम जैसे सोचते है वैसे ही बन जाते है क्योंकि विचार सजीव होते है परिणामत: वाणी की अपेक्षाकृत उनका अधिकतम प्रभाव सदैव हमारे जीवन पर पडता रहता है. अत: हमे अपने विचारो के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये.

स्वामी विवेकानन्द शिक्षा हेतु किसी भी प्रकार के दंड देने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था कि जिस प्रकार प्रताडित करके गधे को घोडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार किसी भी प्रकार की प्रताडना से हम उसे अक्षर ज्ञान तो दे सकते है पर हम उसे शिक्षित नही बना सकते. इसलिये उन्होने शिक्षित बनाने हेतु ठोक-प्रणाली का खुलकर विरोध किया और उनका मानना था कि  शिक्षा के माध्यम से मानसिक बल, चरित्र-निर्माण और बुद्धि का विकास होता है, इतना ही नही “मन की एकाग्रता” ही शिक्षा का सार है और शिक्षा के माध्यम से मिले सारे प्रशिक्षणो का उद्देश्य व्यक्ति-विकास ही है.

किसी भी देश की उन्नति मे वहाँ के शिक्षित-प्रतिशत की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. क्योंकि देश की उन्नति का अनुपात और जन-समुदाय के शिक्षित का अनुपात सदैव परस्पर निर्भर होते है. भारतवर्ष के पिछडेपन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कुछ चन्द लोगो ने शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमा रखा है. गाँवो मे शिक्षा-रूपी दीपक का प्रकाश अभी भी धूमिल ही है. अत: यदि किसी अभाववश विद्यालय मे विद्यार्थी न पहुँच पाये तो विद्यालय को स्वयम उन अभावाग्रस्त विद्यार्थियो के पास पहुँचकर उनकी मातृभाषा मे ही उन्हे शिक्षा देनी चाहिये. इसके साथ- साथ शिक्षा मे संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा का स्थान विशिष्ट होना चाहिये. संस्कृत भाषा मात्र वेदो-उपनिषदो की भाषा बनकर न रहकर जाय अत: इसके प्रचार-प्रसार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा पर केवल ब्राह्मण विशेष का अधिकार न होकर अपितु सभी सभी लोगो का समान अधिकार है. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यही है कि वह व्यक्ति को स्वामी बनाये परिणामत: वह सदैव एक स्वामी की तरह कार्य करे न कि किसी भी प्रकार के गुलाम की तरह.
-राजीव गुप्ता (9811558925
आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता