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Sunday, April 19, 2020

कविता कथा कारवाँ ने कराया लॉक डाउन में भी विशेष आयोजन

पाँच दिन तक चला अंतर्राष्ट्रीय वैसाखी उत्सव 
लुधियाना: 18 अप्रैल 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
लॉक डाउन ने सभी को बांध रखा है। कोरोना से बचना है तो हर किसी का अपने अपने घर में रहना आवश्यक भी है। लेकिन न मन बंधता है न ही जज़्बात रुकते हैं। लॉक डाउन और कर्फ्यू का पालन करते हुए इस मनोस्थिति की शायरी का प्रस्तुतिकरन किया कविता कथा कारवां नामक संगठन ने। इस मकसद के लिए एक ऑनलाइन आयोजन करवाया गया जो पांच दिनों तक चला।  
   कविता कथा कारवाँ संस्था की ओर से सफलतापूर्वक आयोजित पाँच दिनों तक चलने वाले अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन बैसाखी उत्सव का समापन भी उसी शायराना ढंग से हुआ जिस तरह इसे शुरू किया गया था। कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में शामिल हुए पंजाबी फ़िल्म जगत के प्रख्यात कॉमेडियन डॉ जसविंदर भल्ला ने कहा कि इस वैश्विक आपदा के समय इस संस्था ने समाज को जोड़ने व पर्यावरण के कल्याण हेतु जो क़दम उठाया है इसके लिए संस्था की प्रेसिडैंट व समस्त सदस्य बधाई के पात्र हैं। पहले दिन के कार्यक्रम की अध्यक्षता पाकिस्तानी पार्लियामैंट की पूर्व मैंबर व मशहूर लेखिका बुशरा हज़ीन ने की व कार्यक्रम का आग़ाज़ सी टी यूनीवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉ जगतार धीमान ने अपनी कविता से किया। आरम्भ बहुत ही ज़बरदस्त रहा। वृद्ध शायरों के साथ साथ युवा उम्र के लोग भी शामिल हुए। लोग अलग अलग थे। उनके शहर भी अलग अलग थे। शायरी का अंदाज़ भी अलग था लेकिन आज के युग की स्थिति के दर्द को पकड़ने की सम्वेदना और कोशिश सभी की ज़बरदस्त थी। यूं कहिये कि एक से बढ़ का एक। 
   इस पाँच दिवसीय शायराना आयोजन में भिन्न -भिन्न शहरों, राज्यों,देशों व विदेशों के कवियों, कवयित्रियों, गायकों व बुद्धिजीवियों ने आज के हालातों को मद्देनज़र रखते हुए कविताओं व शायरी के ज़रिये अपनी मौजूदगी का अहसास कराया।
न कोई भीड़भाड़ और न ही कोई शोर। बस शायरी का सूक्ष्म सा अहसास, एक विशेष स्पंदन, एक ख़ास किस्म की झंकार--जिसे पूरी दुनिया में बैठे साहित्य प्रेमियों ने महसूस किया।
     इस अभियान में  मुख्य कवि-कवयित्रियाें में पाकिस्तान से बुशरा हज़ीन,राजवंत राज,कनाडा, जगपाल सिंह संधू(कैनेडा),त्रिलोचन लोची, गुरसेवक सिंह, परविंदर सिंह, मंजीत कौर धीमान, मंजीत इंदिरा, विभा कुमरिया शर्मा, रश्मि अस्थाना, परमजीत कौर महक, सरिता जैन, वरुन आनंद, सुमन शर्मा, अनु शर्मा, अनु पुरी, सतविन्दर सुखी, जतिन्दर कौर संधू, परमजीत देओल कनाडा, धर्मेंद्र शाहिद, सहजप्रीत मांगट, ज्योति बजाज और अन्यों ने अपनी शायरी से समय बाँध दिया। 
शिक्षाशास्त्री डॉ जगतार धीमान, प्रो.तिलक सेठी, सीमा जैन, डॉ नदीम अहमद, त्रिलोचन सिंह महाजन ने भी समसामयिक हालातों पर अपने  प्रभावपूर्ण विचार रखे। फ़िल्मकार अनिरबान भट्टाचार्य, अमित जिंदल, अरिंदम राय, डॉ जस कोहली ने भी आज के हालातों से बचाव के उपाय बताए। इस तरह यह केवल मुशायरा न हो कर आज के हालात का विशेष मार्गदर्शक भी साबित हुआ। 
कविता कथा कारवाँ संस्था की प्रैसीडैंट जसप्रीत कौर फलक ने कहा कि भविष्य में भी इसी तरह के सृजनात्मक कार्यक्रम करवाए जाएँगे जिससे सामूहिक प्रतिभागिता के साथ -साथ युवा सृजनशील पीढ़ी की हिस्सेदारी भी रहेगी। कुल मिलाकर यह एक यादगारी आयोजन रहा। कठिन वक्तों में जब मिलना जुलना नामुमकिन सा था उस समय भी इस आयोजन ने सभी को आपस में मिलवाया। 

Wednesday, February 19, 2020

ज़िंदगी के बदलाव की झलक रही सीटी यूनिवर्सिटी के किसान मेले में

उन बहादर लोगों का मेला था जिन्होंने सपने देखने की हिम्मत की 
लुधियाना: 19 फरवरी  2020: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन)::
जनजीवन तेज़ी से बदल रहा है। यह अलग बात है कि  लोग अभी इसे देख नहीं पा रहे या फिर देखने का मन नहीं बना पा रहे है। बदलाव को देखने के लिए भी एक हिम्मत की ज़रूरत होती है। इस हिम्मत को जुटाना हर किसी के बस में नहीं होता। हर एक नव निर्माण आमतौर पर पुराने का विध्वंस होने के बाद ही होता है। इस विध्वंस की सच्चाई को देखना, सहन करना और स्वीकार करना बेहद मुश्किल काम होता है। जब हम ब्रह्मा, विष्णु महेश का नाम लेते हुए सृष्टि के जन्म, पालन पोषण और फिर नाश की बातों को प्रतीकों के ज़रिये करते हैं तो वास्तव में वह यही सच्चाई होती है। हर पल सृजन भी चल रहा है--पालन-पोषण भी और विध्वंस भी। तीनों देवों  प्रयासों से ही चल रहा है यह संसार। इसके बावजूद हम न तो पुराने को भूल पाते हैं और न ही नए को स्वीकार कर पते हैं। निरंतर जारी इस बदलाव की झलक दिखाई दी सीटी यूनिवर्सिटी के एक दिवसीय किसान मेले में। यहां उन बदलावों की झलक थी जो घट तो तेज़ी से रहे हैं लेकिन फिर भी हमें पूरी तरह से दिख नहीं रहे। विध्वंस हमें अच्छा नहीं लगता न! इस लिए हम  घटित हो रहे सृजन को भी नहीं देख पाते। 
खुदकुशियां बढ़ रही हैं। तेज़ी से बढ़ रही हैं। जनजीवन का एक निराशाजनक दौर जारी है लेकिन इसके बावजूद  न तो लोगों ने सपने देखने छोड़े और न ही  इन सपनों को साकार करने के प्रयास बंद किये। इन्हीं उम्मीदों, इन्हीं सपनों और इन्हीं कोशिशों की झलक दिखा रहा था यूनिवर्सिटी का किसान मेला जो वास्तव में बदलाव की झलक दिखने वाला मेला रहा। यह किसान मेला उन उद्यमियों का मेला था जिन्होंने अपने सपने टूटते हुए देखे हैं। विपत्तिओं के पहाड़ों को खुद पर टूटते हुए देखा है। जीवन में विध्वंस के तांडव को बेहद नज़दीक से महसूस किया है। इस सब के बावजूद फिर से हिम्मत की, फिर से कोशिशें शुरू कीं और फिर खड़े हो गए सूर्य से आंख मिलाने। इन्होंने मौत के मुंह से जीवन छीन कर नयी बुलंदियां छूने का चमत्कार दिखाया है। इसका अहसास इस मेले में जगह जगह होता था।
कृषि खत्म होने की कगार पर है। यह तो अब स्पष्ट होने ही लगा है। इसके बावजूद जो लोग अभी भी डटे हुए हैं उनके लिए नए नए बीजों की शानदार किस्में लेकर आये स्टाल भी मेले में थे। इन बीजों की खासियतें उन्होंने पंजाब स्क्रीन की टीम को भी बतायीं। यह बात अलग है कि मेले में सिर्फ बीजों की बिक्री नहीं थी-बहुत कुछ और भी था।
यहां जानेमाने ट्रेक्टर भी थे बिलकुल नए मॉडलों में भी। साथ ही टायर कंपनियां भी मौजूद रहीं। कृषि से सबंधित हर तकनीक यहां उपलब्ध थी। जिन लोगों ने हालात को देखते हुए अभी से कृषि छोड़ दी है उन्होंने अपने सहायक धंधों का भी शानदार प्रदर्शन किया था। यहां गुड़ और पंजीरी के स्टाल भी थे। गुड़ भी कई किस्म का था। तिलों से मिला गुड़ और उसका तांबे जैसा रंग। स्वाद गज़ब का। शायद मैंने ऐसा गुड़ पहली बार खाया। इसी तरह पंजीरी भी थी। चार सो रूपये किलो। ड्राई फ्रूट से भरी हुई और देसी घी से बनी। इसका स्वाद भी कमाल का था। । इसी तरह शहद भी कई तरह का था खूबसूरत पैकिंग में। दावा था कि प्रोसेसिंग के दौरान इसमें चीनी नहीं मिलाई गई। टेस्ट इसका भी यादगारी रहा।
गेंहूं का जूस तो आजकल सभी लोग आवश्यक महसूस करने लगे हैं लेकिन घरों में यह समय न होने के कारण बनाना मुश्किल लगता है और बाजार में यह हर जगह नज़दीक नहीं मिलता। इसलिए भी बहुत से लोग चाह कर भी इसका सेवन हर रोज़ नहीं कर पाते। उनके लिए इस मेले में था इसका पाऊडर बेचने वाला स्टाल। कीमत थी 350/-रूपये की। वज़न था 250 ग्राम। एक पैकेट से निकलता महीना और पूरा कोर्स है कम से कम तीन महीने का। आप इसे बाद में भी जारी रख सकते हैं।
इसी तरह यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भी अपने स्टाल लगा रखे थे। इन युवाओं ने भी तकनीकी विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। छोटे छोटे रोबोटस, बैटरी से चलने वाली सस्ती सी कारें , खेतों में पंक्षियों को डराने के लिए आधुनिक किस्म के डिजिटल "डराने" भी थे जो कई तरह की आवाज़ों से पंक्षियों को डरा कर भगा देते हैं।
इस मेले में स्वास्थ्य को कायम रखने और बढ़ाने वाले प्रोडक्ट बेचने वाले बहुत से अन्य स्टाल भी मौजूद थे। बहुत कुछ और भी था जिसकी चर्चा अलग से की जा रही है। --रेक्टर कथूरिया