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Friday, August 15, 2025

ओशो के यह प्रवचन भी कमाल के हैं

योगिराज अरविन्द घोष क्यू चले गए थे मेडिटेशन में?

ओशो की दुनिया से संजीव मिश्रा: 15 अगस्त 2025: (मीडिया लिंक रविंदर//आराधना टाईम्ज़ डेस्क)::

ओशो के यह प्रवचन भी कमाल के हैं। नीचे दिए गए इस आलेख को सोशल मीडिया पर संजीव मिश्रा साहिब ने आज 15 अगस्त 2025 को बाद दोपहर 02:10 पर पोस्ट किया। इसे पढ़ने के बाद मुझे अपने बचपन की बहुत सी बातें याद आने लगीं। इन्हीं में से कुछ बातें योगिराज अरविन्द जी से सबंधित हैं। मैंने इन के विचार विभिन्न स्रोत से पढ़े थे। न किताबें ज़्यादा थीं न ही इंटरनेट था।  उन्होंने बहुत तीव्रता से प्रभावित भी किया। समादि में बैठने की इच्छा बलवती होने लगी। मुझे ध्यान विधियों का कुछ भी पता नहीं था। बस अनुमान से आँखें बंद करके लेटना और ध्यान जुड़ने लगा। उम्र शायद 15-16 वर्ष की हो चुकी थी। घर परिवार से डांट भी पड़ी। सख्ती से कहा गया तुझे हम लोग सन्यास नहीं लेने देंगें। उसके बाद क्या क्या हुआ इसकी चर्चा फिर किसी पोस्ट में की जाएगी। स्नेह और सम्मान से -रेक्टर कथूरिया 

जनाब संजीव मिश्रा साहिब बताते हैं कि श्री अरविंद को किसी ने एक बार पूछा कि आप भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष की आजादी के युद्ध में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब छोड़कर आप पांडिचेरी में बैठ गए आँख बंद करके। वर्ष में एक बार आप निकलते है दर्शन देने को। आप जैसा संघर्षशील, तेजस्‍वी, व्‍यक्‍ति जो जीवन के घनेपन में खड़ा था और जीवन को रूपांतरित कर रहा था, वह अचानक इस भांति पलायनवादी होकर अंधेरे में क्‍यों छिप गया? आप कुछ करते क्‍यों नहीं? क्‍या आप सोचते है कि करने को कुछ नहीं बचा, या करने योग्‍य कुछ नहीं है? या समाज की और मनुष्‍य की समस्‍याएं हल हो गई है और आप विश्राम कर सकते है? समस्‍याएं तो बढ़ती चली जाती है। आदमी कष्‍ट में है, दुःख में है, गुलाम है, भूखा है, बीमार है, कुछ करिए।

यही लाओत्से कह रहा है। श्री अरविंद ने कहा, कि मैं कुछ कर रहा हूं, और जो पहले मैं कर रहा था वह अपर्याप्त था; अब जो कर रहा हूं वह पर्याप्त है। वह आदमी चौका होगा जिसने पूछा। यह किस प्रकार का करना है कि आप अपने कमरे में आँख बंद किए बैठे है, इससे क्या होगा?

तो अरविंद कहते है कि जब मैं करने में लगा था तब मुझे पता नहीं था कि कर्म तो बहुत ऊपर-ऊपर है, उससे दूसरों को नहीं बदला जा सकता। दूसरों को बदलना हो तो इतने स्‍वयं के भीतर प्रवेश कर जाना जरूरी है जहां से कि सूक्ष्‍म तरंगें उठती है, जहां से कि जीवन का आविर्भाव होता है। और अगर वहां से मैं तरंगों को बदल दूँ तो वे तरंगें जहां तक जायेगी—और तरंगें अनंत तक फैलती चली जाती है।

रेडियो की ही आवाज नहीं घूम रही है पृथ्वी के चारों ओर, टेलीविजन के चित्र ही हजारों मील तक नहीं जा रहे है; सभी तरंगें अनंत की यात्रा पर निकल जाती है। जब आप गहरे में शांत होत है तो आपकी झील से शांत तरंगें उठने लगती है; वे शांत तरंगें फैलती चली जाती है। वे पृथ्वी को छुएगा, चाँद को छुएँगी, तारों और ब्रह्मांड में व्याप्त हो जाएंगी। और जितनी सूक्ष्‍म तरंग का कोई मालिक हो जाए उतना ही दूसरों में प्रवेश क्षमता आ जाती है।

तो अरविंद ने कहा कि अब मैं महाकार्य में लगा हूं। तब मैं क्षुद्र कार्य में लगा था। अब मैं उस महा कार्य में लगा हूं जिसमें मनुष्य से बदलने को कहना न पड़े और बदलाहट हो जाए। क्यूंकि मैं उसके ह्रदय में सीधा प्रवेश कर सकूंगा। अगर मैं सफल होता हूं—सफलता बहुत कठिन बात है—अगर मैं सफल होता हूं तो एक नए मनुष्य का, एक महामानव का जन्म निश्चित है।

लेकिन जो व्यक्ति पूछने गया था वह असंतुष्ट ही लौटा होगा। यह सब बातचीत मालूम पड़ती है। ये सब पलायन वादियों के ढंग और रूख मालूम पड़ते है। खाली बैठे रहना पर्याप्त नहीं है, अपर्याप्त है। इसलिए लाओत्से कहता है, ‘’महाचरित्र अपर्याप्त मालूम पड़ता है।‘’

इसलिए हम पूजा जारी रखेंगे गांधी की, अरविंद को हम धीरे-धीरे छोड़ते जाएंगे। लेकिन भारत की आजादी में अरविंद का जितना हाथ है उतना किसी का भी नहीं है। पर वह चरित्र दिखाई नहीं पड़ सकता। आकस्‍मिक नहीं है कि पंद्रह अगस्‍त को भारत को आजादी मिली; वह अरविंद का जन्‍म दिन है। पर उसे देखना कठिन है। और उसे सिद्ध करना तो बिलकुल असंभव है। क्यूंकि उसको सिद्ध करने का कोई उपाय नहीं है। जो प्रकट स्थूल में नहीं दिखाई पड़ता उसे सूक्ष्‍म में सिद्ध करने का भी कोई उपाय नहीं है।

भारत की आजादी में अरविंद का कोई योगदान है। इसे भी लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती। कोई लिखता भी नहीं। और जिन्होंने काफी शोरगुल और उपद्रव मचाया है, जो जेल गए है, लाठी खाई है, गोली खाई है। जिनके पास ताम्रपत्र है। वे इतिहास के निर्माता है।
इतिहास अगर बह्म घटना ही होती तो ठीक है; लेकिन इतिहास की एक आंतरिक कथा भी है। तो समय की परिधि पर जिनका शोरगुल दिखाई पड़ता है एक तो इतिहास है उनका भी। और एक समय की परिधि के पार, कालातीत, सूक्ष्म में जो काम करते है, उनकी भी कथा है। लेकिन उनकी कथा सभी को ज्ञात नहीं हो सकती। और उनकी कथा से संबंधित होना भी सभी के लिए संभव नहीं है क्यूंकि वे दिखाई ही नहीं पड़ते। वे वहां तक आते ही नहीं जहां चीजें दिखाई पड़नी शुरू होती है। वे उन स्थूल तक पार्थिव तक उतरते ही नहीं जहां हमारी आँख पकड़ पाए। तो जब तक हमारे पास ह्रदय की आंख न हो, उनसे कोई संबंध नहीं जुड़ पाता।

इतिहास हमारा झूठा है। अधूरा है, और क्षुद्र है। हम सोच भी नहीं सकते कि बुद्ध ने इतिहास में क्या किया। हम सोच भी नहीं सकते कि क्राइस्‍ट ने इतिहास में क्या किया। लेकिन हिटलर न क्या किया वह हमें साफ है; माओ ने क्या किया वह साफ है। गांधी ने क्या किया वह साफ है। जो परिधि पर घटता है वह हमें दिख जाता है।

‘’महाचरित्र अपर्याप्त मालूम पड़ता है, ठोस चरित्र दुर्बल दिखता है।‘’ गहरी दृष्टि चाहिए। ठोस चरित्र दुर्बल दिखाई देता है। इस मनोवैज्ञानिक का थोड़ा ख्याल में ले लें। असल में दुर्बल चरित्र का व्यक्ति हमेशा ठोस दीवारें अपने आस-पास खड़ी करता है; ठोस चरित्र का व्यक्ति दीवार खड़ी नहीं करता। उसकी कोई जरूरत नहीं है; पर्याप्त है वह स्वयं।
~ओशो
ताओ उपनिषद
भाग—4,प्रवचन—77

आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं यदि भी कुछ कहना चाहें तो आपके विचारों का स्वागत रहेगा।

Sunday, March 18, 2018

क्या ओशो के साथ अमेरिकी सलूक को भूल चुके हैं ओशो के चाहने वाले?

ओशो शैलेन्द्र से हुई मेडिटेशन से लेकर अमेरिकी सलूक तक की चर्चा  
लुधियाना: 18 मार्च 2018 :(न्यूज़ मेकर टीम)::
आज बरसों बाद यहां फिर ओशो का विशाल उत्सव था जिसका प्रचार ज़ोरशोर से किया गया था। ओशो के छोटे भाई ओशो शैलेंदर यहां गुरुनानक भवन में पधारे थे। उनके आने की धूम कई हफ्तों से यहां थी। बड़े बड़े बैनर जगह जगह लगे थे। गुरुनानक भवन के अंदर और बाहर पांव रखने को जगह तक नहीं थी। किताबों के स्टाल ओशो के विचारों को फ़ैलाने में सहायक हो रहे थे। यहां पर बहुत बड़ी संख्या में आए लोग भी ओशो से मिलने ही आए थे। ओशो शैलेन्द्र में उनको ओशो रजनीश नज़र आये या नहीं? इस ओशो से उनकी मुलाकात संतोषजनक रही या नहीं इसका सही जवाब मिलने वाले ही दे सकते हैं। 
माधोपुर में बरसों से चल रहे संगठन "ओशोधारा" की तरफ से आए ओशो शैलेन्द्र ने ज़िंदगी में कदम कदम पर आने वाली कठिनाईयों की चर्चा की और मेडिटेशन के रास्ते भी बताये। ओशो के अंदाज़ में ही उन्होंने श्रोताओं की तरफ से आए सवालों के जवाब भी बिलकुल उसी अंदाज़ में दिए। मन की शांति और धन की कमी से लेकर बहुत से मुद्दे उठे। हर बात की चर्चा हुई।  हाल में मौजूद श्रोताओं ने सांस रोक कर ओशो को सुना। हाल में केवल ओशो शैलेन्द्र की आवाज़ थी या फिर श्रोताओं की तरफ से बजायी जाती तालियों की संगीतमय। यह आवाज़ श्रोताओं के मनोभावों को व्यक्त कर रही थी। कभी जोश और उत्साह के भाव, कभी ख़ुशी के भाव और कभी उत्सव के भाव। ओशो के ही अंदाज़ में हल्के फुल्के सवालों की चर्चा से सहज हंसी की छनकाहट भी हाइन अक्सर गूंज जाती। 
श्रोताओं में हर उम्र के लोग थे। महिलाओं की श्रद्धा तो देखने वाली थी। "अमृतधारी सिंह" और "कामरेड" कहे जानेवाले लोग भी हाल में ओशो को बहुत ही ध्यान से सुनते दिखे। अमृतधारी सिंह ओशो की जानी मानी पुस्तक:एक ओंकार सतनाम" से प्रभवित थे तो कामरेड सोच वाले दर्शकों के लिए ओशो एक ऐसी शख्सियत थे जिहोने अपने विचारों और कम्यून की जीवन शैली से अमेरिका को डरा दिया था। ओशो को ज़हर दिए जाने का उल्लेख यहां आयोजन हाल के बाहर खड़े दर्षकों के छोटे छोटे ग्रुपों में भी रहा। 
इसके बाद दीक्षा की रस्म भी हुयी। दीक्षा लेने वालों की लम्बी लाईन में हर कोई अपनी बारी की इंतज़ार कर रहा था। कुछ लोग ओशो शैलेन्द्र के लिए किताबों की सौगात भी लेकर आये जिसे ओशो शैलेन्द्र जी ने बहुत ही सम्मान और स्नेह के साथ स्वीकार किया। 
"ओशो आपने कमाल कर दिया--" इस गीत के बोलों पर सारा हाल थिरक उठा।  दीक्षा लेने वाले मस्त हो कर नाच रहे थे लेकिन इनका होशो हवास भी देखने वाला था। ज़रा सी आहट पर सबंधित साधक के पाँव रुक जाते ध्यान की मस्ती में बंद आँखें खुल जाती और वह झट से अपना संदेश देने आये दुसरे साधक के नज़दीक हो लेता। 
इसके तुरंत बाद मीडिया मीट हुई। इस प्रेस कांफ्रेंस में ओशो ने पत्रकारों की तरफ से उठाये सवालों के जवाब भी दिए। इन सवालों में मेडिटेशन से ले कर ओशो के साथ अमेरिकी सलूक तक की चर्चा हुई।  ओशो शैलेन्द्र ने कई सवालों के मामले में टालमटोल जैसा रवैया भी अपनाया। कुल मिला कर लुधियाना में एक यादगारी कार्यक्रम हुआ।  इस आयोजन से निश्चय ही ओशोधारा नए लोगों को अपनी तरफ खींचने में सफल होगी। कुछ बाबाओं और कुछ डेरों के विवादों के चलते पैदा हुई नकारत्मक हवा के बाद जहां  "आध्यात्मिक" लोगों को फिर से एक नया मंच मिला है वहीँ वाम दलों से निराश हो चुके कुछ लोगों को एक बार फिर ओशो के विचारों से "क्रांति की दस्तक" सुनाई देने लगी है।  
हालांकि इस सारे उत्सव के दौरान बार बार यही महसूस हुआ की "ओशो के चाहने वाले" उस सलूक को भूल चुके हैं जो कभी अमेरिका ने ओशो के साथ किया था। अगर ओशो के पैरोकारों ने उस याद रखने और याद कराने की हिम्मत जुताई होती तो शायद आज ओशो क्राईस्ट की तरह पूजे जा रहे होते। अफ़सोस ओशो के पैरोकारों ने ओशो को जगह जगह ओशो के नाम पर खुले रेस्टोरेंटों तक ही सीमित कर दिया। भारत के जलते हुए प्रश्नों की आग खुद ओशो के इन पैरोकारों ने ही बुझा दी और नए प्रश्न करने वाला अब कोई ओशो नज़र नहीं आता। ओशो की तरह बेबाक और तर्कशील अब कोई नहीं 

Saturday, May 30, 2015

लिपस्टिक स्त्री को बदसूरत कर देती है

जो भी नकली है वह लोगों को बदसूरत बना देता है-ओशो 
"लिपस्टिक स्त्री को बदसूरत कर देती है- जो भी नकली है वह लोगों को बदसूरत बना देता है। मैं सोच भी नहीं सकता कि किसी भी पुरुष में जरा भी समझ हो तो उस स्त्री का चुंबन लेगा जिसने लिपस्टिक लगाई हुई है!...वह लिपस्टिक चीन की दीवाल की तरह है- तुम किसी भी तरह से उस स्त्री तक नहीं पहुँच सकते। जिस पल मैं लिपस्टिक देखता हूँ, मैं जानता हूँ कि यह स्त्री नकली है, यह मात्र मुखोटा है।
कुछ दिनों पहले, बहुत अमीर युवा स्त्री मुझ से मिलने आई। वह अखबार और पत्रिका की मालकिन है। वह मेरे बारे में कहानी लिखना चाहती थी, और वह मेरे साथ फोटो भी चाहती थी।
आनंदो ने मुझे बताया कि वह बहुत सुंदर स्त्री है। जब मैंने उसे देखा, मैंने सिर्फ लाल लिपस्टिक देखी और कुछ नहीं दिखा। मैंने उसके चेहरे से बचने की कोशिश की, और मैंने आनंदो से कहा, 'तुम मुझ से कह रही थी कि ये स्त्री सुंदर है? तुमने इसकी लिपस्टिक नहीं देखी?" //OSHO//
ओशो के इस कालजयी विचार को चुन कर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है आनंद अर्चना ने। भिलाई में रहने वाली आनंद अर्चना इस तरह के चुने हुए विचार अक्सर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करती रहती हैं। आपको आज यहाँ प्रकाशित विचार कैसा लगा अवश्य बताएं।