Showing posts with label Human Rights. Show all posts
Showing posts with label Human Rights. Show all posts

Sunday, January 26, 2014

मानवाधिकारों की चर्चा कर रहे हैं मनीराम शर्मा अपने विशेष आलेख में

Sun, Jan 26, 2014 at 8:35 AM
उचित विश्राम व समय पर भोजनादि भी मानवाधिकार हैं
आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08/09/2010 से 10/09/2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व  लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था|  दिनांक  08/09/2010 को  श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा , श्री कनकजी  और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके  घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जोकि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता है| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने  महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े  और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह  जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया|  उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियों भी दी|  
उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया जो आगे आयकर महानिदेशक (अनुसंधान ) को भेज दिया गया | अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18/04/2011 को सुना गया| 
आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने  शिकायत में वर्णित आरोपों  दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया|  शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से  भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार , विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   
सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया  जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की  जा सकती  लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी  चाहिए|
आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08/09/2010 को प्रात: 9:30 बजे  शुरू और दिनांक 10/09/2010 को  रात्रि 9.20 बजे  पर संपन्न हुई  है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा  धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी  श्री सौरभ कुमार  ने दर्ज किया है कि उससे  खाताबहियाँ  आदि पेश  करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है| 

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 9.9.10 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के  बुनियादी मानव अधिकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता  है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए  और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए था| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा / या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानव अधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक ​​कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित  नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि  बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही  जारी रखते  हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक  मुआवजा पाने का अधिकारी  है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन  माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|


हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक स्वयम ने यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की  एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|   

Monday, December 09, 2013

INDIA: मानवाधिकार विमर्श में कहाँ खो जाती है तीसरे लिंग की आवाज़

December 09, 2013                               Mon, Dec 9, 2013 at 4:01 PM                  --प्रशान्त कुमार दूबे
An Article by the Asian Human Rights Commission                                                                       
Courtesy Photo: किन्नर भी हमारे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं : डॉ. रमन सिंह
माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन और ए.के. सिकरी की युगल पीठ ने अक्टूबर 2013 में यह टिपण्णी देकर कि 'किन्नर समाज में आज भी अछूत बने हुए हैं। आमतौर पर उन्हें स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। उनके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है', तीसरे लिंग के अस्तित्व और बहिष्कार की बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है | सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सांविधिक निकाय राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(नालसा) की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई| याचिका में किन्नरों के लिए पुरुष और महिला के इतर एक अन्य श्रेणी बनाने की मांग की गई है। साथ ही उन्हें पुरुषों व महिलाओं की तरह ही समान सुरक्षा व अधिकार देने की भी मांग की गई है।
नालसा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह दलील दी कि किन्नरों और तीसरे लिंग के सभी व्यक्तियों को न्यायिक और संवैधानिक पहचान दी जानी चाहिए। इसके बाद राज्य सरकारें इनकी बेहतरी के लिए जरूरी कदम उठा सकेंगी। सरकार ने इनके लिए एक टास्क फोर्स का गठन भी किया है, जो आगे इनके लिए बेहद मददगार साबित होगी। उन्होंने किन्नरों को नौकरियों में आरक्षण देने की भी मांग की।इससे पहले सुप्रीम कोर्ट किन्नरों को तीसरी श्रेणी का नागरिक घोषित करने की मांग करने वाली जनहित याचिका पर केंद्र व राज्य सरकारों को अपना पक्ष साफ करने का भी निर्देश सुना चुकी है।
इस समुदाय के विषय में सोचें तो हम पायेंगे कि अपने घरों में बच्चा पैदा हो, शादी ब्याह हो या फिर कोई और शुभ काम| यदि उस काम में किन्नर या हिजड़ा समुदाय के लोग आ जाएँ तो गा- बजाकर दुआ दे जाएँ तो इसे बड़ा शुभ माना जाता है| इनके गाने बजाने के बदले में इन्हें पैसे और उपहार आदि दिया जाता है| लेकिन मौक़ा ख़तम होने के बाद यही समाज इन्हें अपने पास तक बैठाना पसंद नहीं करता है| न राशन कार्ड, न जाब कार्ड और न आधार कार्ड, न पासपोर्ट, न लाइसेंस यानी समस्त बुनियादी सुविधाओं से मरहूम है यह समाज| इनका तो ले-देकर एक समुदाय ही है और वही इनका सामाजिक ताना-बाना है| अपने परिवार में, समाज में तो यह हाशिये पर हैं ही या यूँ कहें कि शर्म का विषय हैं पर इनके साथ हो रही सरकारी बेरुखी भी कम नहीं|
पिछले 4000 सालों से अपने अस्तित्व के प्रमाण के साथ-साथ रामायण, महाभारत, बाइबिल आदि धर्मग्रंथों और कामसूत्र जैसे शास्त्र में भी अपने होने का प्रमाण देते देते इस वर्ग के पास आज भी जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज नहीं है| पर सरकारी बेरुखी का आलम यह भी है कि अभी तक इस समुदाय की भारत में आधिकारिक गिनती नहीं है| कुछ सामाजिक सर्वेक्षणों की मानें तो हम पाते हैं कि इनकी संख्या कुछ 19 लाख के आसपास है| सरकारी आंकड़े न होने के कारण भारत में इनके अल्पसंख्यकों के अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं| हालांकि जनगणना 2011 में अन्य की श्रेणी में इन्हें स्थान मिला है लेकिन अभी तक इसके नतीजे नहीं आये हैं जिसके चलते अभी तक इनकी कोई संख्या नहीं है| इन्हें जनगणना 2011 में इन्हें कोड 3 कहा गया है|
एक बड़ा सच तो यही है कि हम इनके विषय में कुछ जानते ही नहीं हैं| हमें यह नहीं पता कि किन्नर कौन है और हिजड़ा कौन? और ऐसे में हम जाने अनजाने ही किन्नर, हिजड़ा आदि को ही तीसरे लिंग का संसार मान लेते हैं जबकि ऐसा नहीं है | ये परलैंगिंक समलैंगिक, उभयलैंगिक या लैंगिक हो सकते हैं| कई बार हम ट्रांसजेंडर और ट्रांससेक्सुअल जैसे दोनों शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में करते हैं, जबकि ये दोनों बिलकुल भिन्न हैं| ट्रांसजेंडर प्राकृतिक लिंग से अलग पहचान रखते हैं जबकि ट्रांससेक्सुअल वे हैं जिन्होंने लिंग चिकित्सकीय सहायता से बदल किया है| हम यह भी नहीं जानते हैं कि इनकी शारीरिक संरचना क्या है| इस समुदाय के अपने नियम/कायदे/कानून क्या हैं? इनकी आजीविका के साधन क्या हैं? इनकी अपनी बिरादरी का ताना-बाना क्या है? गुरु-शिष्य परम्परा में गुरु कौन होता है और शिष्य कौन? इनके जीवन का दर्द इनकी मृत्यु के बाद होने वाली रस्मों से भी साफ झलकता है। इनका अंतिम संस्कार आधी रात को होता है। उससे पहले शव को जूते-चप्पलों से पीट-पीट कर दुआ मांगी जाती है कि ऐसा जन्म फिर ना मिले।
आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि ये लोग अपने ही साथी के मरने के बाद उसे जूते- चप्पलों से मारें??
जरा सोचिये कि यदि ये नाचे गायें नहीं तो इनका क्या होगा? क्या हम आज तक इनके लिए सम्मानजनक आमदनी का जरिया उपलब्ध करा पाए हैं| नहीं? तीसरे लिंग का कोई व्यक्ति मजदूरी करने के लिए जाए तो वह क्या काम करेगा या करेगी, यह शायद बाद का विषय होगा लेकिन इसके पहले वह तो कौतूहल का विषय ज्यादा होगा| इसी कारण ये लोग मजदूरी तक नहीं कर सकते हैं? जब काम नहीं करते तो फिर खायेंगे क्या, यह सवाल चिंताजनक है| राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण और अन्य कई सर्वेक्षण अलग-अलग समुदाय के लोगों और पेशों में काम करने वाले लोगों के आंकड़े तो जुटाते हैं लेकिन यह एक सवाल है कि इन सर्वेक्षणों मी जद में यह पेशा क्यों नहीं है? यदि गरीबी रेखा इस देश का यथार्थ है तो फिर ये लोग इन लोगों के लिए कोई रेखा क्यों नहीं? क्या इनके लिए न्यूनतम मजूरी के मापदंड नहीं बनाये जाने चाहिए? यदि इन सब का जवाब हाँ में है तो भी इनके लिए अभी तक कोई पहल नहीं की गई है| यदि ये कहीं स्वरोजगार के लिए पहल करना चाहें तो भी बैंक इनकी स्थाई आमदनी न होने के कारण इनको कहीं ऋण नहीं देते हैं| और बैंक के दस्तावेजों में भी अभी तक महिला/पुरुष के अलावा तीसरे लिंग के लिए कोई स्थान नहीं है| सरकारी नौकरियों में इनके लिए कोई आरक्षण नहीं है, इनके कौशल विकास के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है और कोई आर्थिक सहयोग भी नहीं|
बम्बई में 2001 में बैंकर श्री शेट्टी ने बैंक द्वारा दिए गए कर्ज को वसूलने के लिए इस समुदाय को काम देने की पहल की थी| तत्कालीन समय में यह बहुत ही सराहनीय प्रयास रहा| बिहार सरकार ने भी 2006 में टेक्स कलेक्टर के रूप में इनसे काम लिया था| इन दोनों व इस तरह के कामों ने इनको काम तो दिलाया| यह काम हटकर भी था लेकिन यह अधिकार के रूप में नहीं आया, बल्कि इस काम को ऐसे भी देखा गया कि ये तो पैसा निकाल ही लायेंगे| यानी इनकी विकलांगता को ढाल बनाया गया| जबकि इनकी मांग भी ऐसे नहीं है और ना ही अधिकार आधारित व्यवस्था इसकी इजाजत देती है| हालाँकि इनके तरह के कामों को लेकर बैगलोर में देश का पहला ट्रेड यूनियन "संगमा" बनाया गया है|
अधिकांश स्वास्थ्य सर्वेक्षण हमें यह तो बताते हैं कि स्त्री-पुरुषों में कुपोषण का प्रतिशत क्या है? एनीमिया की स्थिति क्या है? लेकिन इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद भी आज तक किसी स्वास्थ्य सर्वेक्षण में तीसरे लिंग के लोगों की कुपोषण का प्रतिशत और खून की कमी का प्रतिशत लेकर नहीं आया है| यह मेरा दावा है कि जिस तरह की उपेक्षा भरी जिंदगी ये बसर कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि यह समुदाय भी कुपोषण और भुखमरी की जिन्दगी जरूर बसर कर रहा होगा| न हमें इनकी मृत्यु दर पता है और न ही इनकी जन्म दर| यह एक विडम्बना ही है कि अस्पतालों में अंतर्लिंगी बच्चों का कोई रिकार्ड नहीं रहता है| सेक्स रिसाईन्मेंट सर्जरी भी भारत में सुलभ नहीं है| ना ही कोई संबंधित प्रोटोकाल है जो भी इस समस्या को बढ़ावा देता है|
राज्यसभा चैनल के लिए बनाये गए वृत्तचित्र "किन्नर लोक का सच" में इस समुदाय की अनु स्वीकारती हैं कि कभी किसी को स्वास्थ्यगत समस्या होने पर डाक्टर के पास जाते हैं तो या तो वे हमें छूते नहीं हैं या छूते हैं तो फिर गलत तरीके से छूते हैं| दोनों ही स्थितियों में सही बीमारी का पता नहीं लग पाता है, पर यही सच्चाई है| गौर करिए कि हमने देश में जनाना अस्पताल खोला है, सामान्य अस्पताल खोले हैं, शिशु रोगों से संबंधित विशिष्ट स्पताल खोले हैं|लेकिन हम आज तक इस समुदाय के लिए एक अदद विशेष स्वास्थ्य सुविधा मुहैया नहीं करा पाए हैं| हमारे देश में बाल रोग विशेषज्ञ हैं, स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ हैं तो फिर आज तक इस देश में हिजड़ों के मामलों को देखने के लिए एक विशेषज्ञ तक तैयार नहीं कर पाए हैं| वह विशेषज्ञ तैयार हो भी नहीं सकता है क्योंकि यह पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है| और दरअसल यह तबका समाज, सरकार और नीति नियंताओं की सोच की परिधि में नहीं आता है|
तीसरे लिंग के उत्थान के लिए काम कर रही बुनियाद फाउन्डेशन की अध्यक्ष डा. लक्ष्मी कहती हैं कि शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों तक के लिए एक अलग से श्रेणी है पर अफ़सोस कि इनके लिए कोई श्रेणी नहीं है? किन्नर भारती की अध्यक्ष सीता कहती हैं लेट्रिन उठाने वालों तक के लिए नौकरी मिल जाती है लेकिन हमारे लिए नौकरियों में कोई भी आरक्षण नहीं है| 10-15 लाख की जनसंख्या के बाद भी इस देश में हमारा समुदाय अल्पसंख्यक नहीं है जबकि पारसी समुदाय की केवल 70,000 जनसंख्या है और वो इस देश में अल्पसंख्यक हैं| हमारी शिक्षा के आंकड़े अभी तक उपलब्ध नहीं हैं| खैर आंकड़े भी तो तब आयेंगे जब हमें स्कूलों में पढने को मिले| अपने बच्चों के जनम पर हमारी दुआएं लेने वाला समुदाय अपने बच्चों को हमारे साथ नहीं पढ़ाना चाहता है|
भोपाल, मध्यप्रदेश की राजधानी है और यहाँ आप यदि पहली बार आये हैं और आप किसी से पूछें कि भोपाल किन चीजों के लिए प्रसिद्ध है|तो बड़े ही आसानी से जवाब मिलता है जर्दा, पर्दा और नामर्दा| यहाँ पर तीसरे लिंग में से भी हिजड़ों के कई घराने हैं| जिसके कारण भोपाल के साथ इनका नाम जुडा है| इतनी तादाद होने के बावजूद भी आज तक भोपाल में आज तक हम इन्हें एक अलग से जनसुविधा शौचालय उपलब्ध नहीं करवा पाए हैं| यदि कोई हिजड़ा समुदाय का व्यक्ति भीड़ भरे इलाके में है तो वह शौचालय का उपयोग करने कहाँ जाये? बसों में महिलाओं/ विकलांगों के लिए तो सीट आरक्षित रहती है लेकिन इनके लिए नहीं?
राजनीति के धरातल पर भी इनका प्रतिशत प्रतिशत नगण्य ही है| राजनीतिक दलों में तो लगभग शून्य ही है| अभी तक मध्यप्रदेश या उत्तरप्रदेश में जिन इक्का-दुक्का हिजड़ों ने सफलता हासिल की है लेकिन उन्होंने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ही अपनी किस्मत आजमाई है| आपको यह जानकर होगा कि अभी तक संसद में एक भी तीसरे लिंग के व्यक्ति ने चुनकर अपनी उपस्तिथि दर्ज नहीं कराई है| किसी भी राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में इनके लिए कोई स्थान नहीं है| और तो और आजादी के लगभग 50 सालों बाद तक इन्हें मताधिकार भी प्राप्त नहीं था| निर्वाचन आयोग के पूर्व आयुक्त एम. वाय. कुरैशी ने कहा कि हमने देखा कि इन्हें मतदान का अधिकार नहीं है जबकि यह तो संविधान देता है और कोई इसे छीन नहीं सकता है, तब हमने तत्काल प्रभाव से इसके लिए आवश्यक प्रक्रियाएं कर दीं| लेकिन अफ़सोस कि 1994 में मिले इस अधिकार के बाद भी इन्हें मतदाता पहचान पत्र केवल इसलिये नहीं दिया जा सका क्योंकि वे न तो महिला की श्रेणी में ही थे और न ही पुरुष की| इस बार 2013 में इन्हें अन्य की श्रेणी में मतदान करने का अवसर मिला| इसके बावजूद भी हालत यह है कि इनके लिए निर्वाचन आयोग ने कोई ख़ास पहल नहीं की और जिसके चलते केवल मध्यप्रदेश में ही हजारों की संख्या में होने के बावजूद भी कुल 900 लोगों का ही मतदाता परिचय पत्र बन सका है|
यह भी एक विडम्बना है कि तीसरे लिंग के व्यक्तियों को आदतन अपराधी माना ही जाता है| आपराधिक अपराधी अधिनियम 1971 के तहत किन्नरों को अपराधी माना गया है| इन्हें केवल संदेह के आधार पर ही गिरफ्तार किया जा सकता है| इसी प्रकार भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में ट्रांसजेंडर समुदाय के एक भाग को नजरअंदाज किया जाता है| जिसमें अप्राकृतिक सेक्स को अपराध माना गया है| इन्ही कारणों से ये जाने-अनजाने पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं और उसके बाद इन्हें प्रताड़ना देने का चलन चलता रहता है| यह तब है जबकि मानवाधिकार इनके साथ ही सांस लेते हैं और उसके बावजूद यह समुदाय उसमें घुटता रहता है|
न काम, न आरक्षण, न कोई स्वतंत्र पहचान और न ही कोई विशेष योजना | जब हमारे सारे अधिकारों के सामने 'न' लगा हो तो फिर हमारे लिए इन मानवाधिकारों के क्या मायने हैं?? बहिष्कार की एक अंतहीन सी प्रक्रिया को झेल रहे इस समुदाय की समस्याओं को हम मानवाधिकार के प्रकाश में देखें तो हमें पता चलता है कि उस पर किसी का ध्यान नहीं है| मानवाधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय घोषणा पत्र की धारा 3 कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना जीवन स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है| इसी प्रकार आईसीसीपीआर, जिसका भी भारत देश एक हस्ताक्षरी है, की धारा 6(1) कहती है कि बेहतर व सम्मानपूर्ण जीवन बुनियादी अधिकार है| 1979 में हुए इसी समझौते की धारा 4 कहती है कि इन अधिकारों में कोई समझौता नहीं किया जा सकता है| और एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते होने और इस पर भारत देश द्वारा इसे अंगीकृत करने के कारण यह जरुरी है कि वह इन प्रावधानों के परिपालन हेतु काम करे लेकिन यह नहीं होता दिख रहा है| बल्कि तीसरे लिंग के मानवाधिकार सूली पर टंगे दिखाई देते हैं|
मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत माननीय उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख कहते हैं कि संविधान में जीने का अधिकार सभी को है, बल्कि यूँ कहें कि सम्मान के साथ जीने का अधिकार है| संविधान की नजर में सब बराबर हैं लेकिन इन्हें यह नहीं मिलते हैं| इनके साथ कदम कदम पर और कमोबेश हर जगह अन्याय हो रहा है और इनके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है| पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव कविता श्रीवास्तव कहती हैं कि नया भारत बना और उसमें जिस तरह से इनके मानवाधिकार ताक पर रखे गए, वह चिंताजनक है| हमारे संविधान में भी लैंगिक अल्पसंख्यकों का जिक्र ही नहीं है| जिस तरह से इनके साथ अत्याचार हो रहा है, इनके इज्जत से जीने का अधिकार खतरे में है, वह चिंतनीय है| कविता कहती हैं कि भारत में सबसे पहली रिपोर्ट पीयूसीएल की कर्नाटक इकाई ने 2001 में तैयार की| उसके बाद अलग-अलग इकाइयों ने भी इस पर काम किया है|
हालाँकि यह भी उतना ही बड़ा सच है कि यह समूह मानवाधिकार संगठनों की भी पहली प्राथमिकता कभी नहीं रहा है| यह समूह और उनके मुद्दे भी आश्चर्यजनक रूप से इन संगठनों की नजर में नहीं आये हैं| हालांकि अभी कई संगठन आगे आये हैं| इस पूरी श्रंखला में मानवाधिकार आयोगों की भी भूमिका बहुत ही निराशाजनक माहौल पैदा करती है| कई आयोगों में तीसरे लिंग के विषय में जानकारी भी उपलब्ध नहीं है| मानवाधिकार आयोगों ने इस समुदाय के सम्बन्ध में अपने वक्तव्य भी जारी नहीं किये हैं|
केवल और केवल स्त्री-पुरुष में बंटे हमारे समाज के पास थर्डजेंडर के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है। ये आगे आयें, समाज के साथ चलें, यह किसी को मंजूर नहीं| इसमें सरकार भी दोषी है, समाज भी दोषी है, परिवार भी दोषी है और मैं और आप व्यक्तिगत रूप से भी| इन्हें किसी भी तरह के कोई भी अधिकार नहीं मिले हैं लेकिन उसके बाद भी यह लोग हमेशा दुआएं ही बाँटते नजर आते हैं| ऐसे में क्या हमारी जिम्मेदारी नहीं कि हम इनके बेहतर जीवन हेतु अपने-अपने दायरों से बाहर निकलें और इनके अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रयास करें| पर वह प्रयास दुआ के रूप में न हो बल्कि अधिकार के रूप में हो|
# # #
About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com
About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Tuesday, December 03, 2013

INDIA: चुनावी राजनीति में कहाँ गुम हो गए बच्चों के हक के सवाल?

Tue, Dec 3, 2013 at 7:53 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission                    प्रशांत कुमार दुबे
आजकल मध्यप्रदेश के चुनावी समर में कुपोषण एक बार फिर प्रमुख चुनावी मुद्दा है| बच्चों के गुमशुदा होने का मुद्दा भी राजनीतिक दलों को रिझा रहा है| बच्चों की शिक्षा वैसे आजकल चर्चा में तो नहीं है लेकिन घोषणा पत्रों और विज्ञापनों का हिस्सा जरूर बन गई है| इसे एक नजर से ऐसे भी कहा जाए कि बच्चे अभी मुख्यधारा में आ गये हैं, लेकिन वास्तव में एसा नहीं है| बच्चों पर काम करने वाले संगठनों ने अपना एक घोषणा पत्र बनाया और उसे उन्होंने राजनीतिक दलों के सुपुर्द किया| राजनीतिक दलों ने आज की कट कापी पेस्ट तकनीक को अपनाया और कई मुद्दों को अपने घोषणा पत्रों में जगह दी| इससे बच्चों के मुद्दे घोषणापत्रों में तो आ गये लेकिन वे वास्तव में हलचल नहीं मचा पा रहे हैं| सभी अपनी जगह खुश होते नजर आ रहे हैं| संस्थाएं/संगठन अपनी पीठ इस बात पर थपथपा रही हैं कि हमारे मुद्दे घोषणा पत्रों में आ गए हैं और पार्टियां भी अपनी पीठ थपथपा रही हैं कि हमने सभी वर्गों के मुद्दों को अपने घोषणा पत्रों में जगह दी है |
पिछले चुनाव 2008 को ही देखें तो हम पाते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में बच्चों के लिए ना तो वायदों की ही कमी थी और ना ही घोषणाओं की| पर स्थिति में बदलाव नहीं हुआ और इस बार भी कमोबेश कुपोषण एक चुनावी मुद्दा है| सवाल यह है कि क्या बच्चों की भूख और कुपोषण के सवाल घोषणा पत्रों में सजाने के लिए हैं या उनसे कोई सरोकार भी है| राष्ट्रीय पोषण संस्थान के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 51 फीसदी बच्चे कम वजन के पाए गए, इसके सीधे मायने है कि प्रदेश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। इनमें से भी 8 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए हैं। हर साल लगभग 1,25,000 शिशु अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं| शिशु मृत्यु दर में प्रदेश पिछले 10 वर्षों से अव्वल नम्बर पर है, जबकि 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की दर भी बहुत अधिक है| 5 वर्ष तक के बच्चों में टीबी के प्रकरण भी बढते जा रहे हैं और इससे कुपोषण का सीधा सम्बन्ध है।
यही नहीं पिछले 10 वर्षों में शिक्षा के मोर्चे पर भी मध्य प्रदेश के हाल खराब है| शिक्षकों की कमी के मामले में प्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर हैशिक्षा के अधिकार कानून के मानकों के आधार पर देखा जाये तो म.प्र. में 42.03 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। बाल श्रमिकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है लेकिन प्रदेश सरकार के पास आज तक कोई भी आंकड़े नहीं है| प्रदेश में एक और लाडलियों के पक्ष में सुर आलापे किये जा रहे हैं लेकिन दूसरी और लिंगानुपात गिर गया है| आज प्रदेश में लिगानुपात गिरकर 6 वर्ष तक की उम्र में 918 रह गया है| प्रदेश में लड़कियों के लगातार गायब होने के मामले आ रहे हैं,उन्हें बेचा जा रहा है| पिछले 10 साल में 86170 बच्चे गायब हुए हैं और उनमें से 15432 बच्चे अभी तक नहीं मिले हैं और उनमें से 75 फीसदी लडकियां हैं|
यानी बच्चों के मुद्दे तो जस के तस है बस उन्हें सजाने का काम जारी है| सत्तारूढ़ दल बच्चों को मामा बनकर लूट लेता है और विपक्ष मामा बनाकर| बच्चे जब चाहे मुद्दे बनते हैं और जब चाहे बिसार दिए जाते हैं| जब बच्चों को सहभागिता का अधिकार है तो फिर राजनैतिक दल क्यों नहीं बच्चों से पूछे कि तुम्हारी जरुरत क्या है, तुम्हारे सवाल क्या हैं? और यदि इन सवालों को हल कर दिया जाये तो फिर तुम्हारे मम्मी-पाप, भाई बहन हमें वोट करें| पर हमारा ढांचा ही ऐसा है कि बच्चे परिवार से लेकर समाज और बड़े राजनीतिक धरातलों पर भी हमेशा से किनारे कियी जाते रहे हैं| यह कहानी केवल मध्यप्रदेश की नहीं है बल्कि पूरे देश में यही राजनीतिक माहौल है| बच्चे राजनीतिक धुरी के केंद्र में नहीं हैं|
बच्चों को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जाता है क्योंकि वे मतदान नहीं कर सकते हैं| बच्चे विचार के और प्राथमिकता के केंद्र में नहीं है इसका अंदाजा केवल घोषणा पत्रों से नहीं बल्कि इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश में बजट आवंटन में से केवल 15-17 फीसदी बजट ही बच्चों के लिए है| इस बजट में से भी बाल सुरक्षा पर केवल 1 प्रतिशत बजट ही है| यह बजट भी पिछले एक दो सालों में निरंतर घट रहा है| यही नहीं यदि हम विधानसभा के अंदर देखें तो हम पाते हैं कि 13वीं विधानसभा में पूछे गए कुल 2100 प्रश्नों में से बच्चों से जुड़े मुद्दों पर केवल 44 प्रश्न ही किये गए हैं| यानी यह प्रतिशत कुल प्रश्नों का 2 फीसदी ही है| इसमें से भी बाल सुरक्षा को तरजीह नहीं दी गई है, केवल 3 प्रश्न पूछे गये हैं|
इस चुनावी माहौल में अभी बीच में बाल दिवस भी गुजरा है| राजनैतिक दल चाहते तो इस दिन बच्चों के मुद्दों पर अलग से बाल संसद लगाते और उनके मुद्दों पर बात होती| लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| पर पप्पू और फेंकू के इस राजनैतिक युग में उन्हें छोटू की चिंता कहाँ ?? बाल अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते के भी इस वर्ष 24 साल पूरे हो गए हैं और यह दिन भी इसी चुनावी दंगल के बीच आया है लेकिन उस पर भी कोई बैचैनी नहीं दिखी| पूरी कायनात जिसमें कि राजनैतिक दलों के लोग भी शामिल हैं, सचिन के 24 साल के खेल पर वक्तव्य देते नहीं थक रहे हैं, वे बाल अधिकार समझौते के 24 वर्ष पूरे होने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं|
इस पूरे मसले पर मीडिया भी अलग से बच्चों के मुद्दों को देखने की पहल नहीं करती हैं| किसी भी अखबार ने इन चुनावों में अपना कोई अलग पन्ना बच्चों के मुद्दों को समर्पित नहीं किया है| ना ही किसी चेनल ने कोई बहस इन मुद्दों पर छिड़वाई| केवल दूरदर्शन ने ही इस मुद्दे पर बहस छेड़ी क्योंकि वह उसकी नैतिक बाध्यता है| नोबल पुरस्कार विजेता ग्रेबिल मिस्ट्राल ने लिखा है कि हम अनेक भूलों और गलतियों के दोषी हैं और उसमें भी हमारा सबसे बड़ा अपराध है बच्चों को उपेक्षित छोड़ देना | अफ़सोस कि यह हम आज भी कर रहे हैं|
# # #
About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com 
About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Monday, November 11, 2013

आया था रोज़ी रोटी कमाने लेकिन जान से भी हाथ धो बैठा

वेतन मांगने पर हुई पिटाई से गई जान:मामला दर्ज           Update:11 Nov 2013 at 11:00
तस्वीर में ऊपर वारदात  के बाद फैक्ट्री का बंद दरवाज़ा और दूसरी तरफ सदमे की हालत में मृतक नवयुवक  सोनू की मामी दीपा और  नीचे मीडिया को जानकारी देते हुए सोनू का मामा सिकंदर यादव और साथ ही आप देख रहे हैं मृतक सोनू का चेहरा (Photo:Rector Kathuria)
लुधियाना : 11 नवंबर 2013: (रेकटर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन): रविवार को लोग काम से छुट्टी करके आराम करते हैं या फिर मौज मस्ती लेकिन सोनू नाम का एक नवयुवक काम की जगह पर हुई वहिशियाना पिटाई के कारण जान से हाथ धो बैठा। उसका कसूर केवल यह था कि उसने छुट्टी का दिन होने के कारण काम भी किया था और काम के बाद अपनी तीन महीने की तनखाह भी मांग ली थी। ये पैसे उसने अपने घर जाकर अपने माँ बाप को देने थे और बताना था कि अब मैं कमाने लायक हो गया हूँ इसलिए अब रोटी की  चिंता मत करें।   रोज़ी रोटी की तलाश  उसे बिहार से उठा कर पंजाब ले आई थी।  लुधियाना की एक फेक्ट्री में वह दिन भर काम करता और रात को अपने मामा के यहाँ चला जाता। जब पिटाई होने की खबर उसकें साथियों ने उसके मामा मामी को जा कर दी तो वे दोनों भी उसे छुड़ाने के लिए वहाँ फेक्ट्री में चले गए। वहाँ जा कर देखा कि फेक्ट्री का मालिक और कुछ और लोग उसे बेतहाशा पीटे जा रहे हैं। छुड़वाने की कोशिश करने पर उन लोगों ने मामा मामी कि भी पिटाई कर दी। मामी चोट और सदमे से बुरी हालत में है।  वह मुआवज़ा नहीं मौत के बदले मौत मांग रही है।
इसी बीच पुलिस ने इस सारे मामले  की पुष्टि करते हुए बताया कि दस नवंबर को ही दफा 302/34 के अंतर्गत फैक्ट्री मालिक  सिंह और मारपीट में  साथ वाले लोगों के खिलाफ मुकदमा  नंबर 169  दर्ज कर लिया गया था।