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Saturday, December 17, 2022

पंजाब:बसों की आधी हड़ताल जारी-सोमवार तक आधी में छूट

मामला नहीं सुलझा तो फिर से पूरी हड़ताल जारी रहेगी 


चंडीगढ़: 17 दिसंबर 2022: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 

पंजाब रोडवेज, पनबस और पीआरटीसी कांट्रेक्ट वर्कर्स यूनियन पंजाब ने आधी हड़ताल सोमवार तक बढ़ा दी है और बाकी आधी हड़ताल जारी रहेगी। यह ऐलान 16 दिसंबर की देर शाम तब किया गया जब 16 दिसंबर को सरकार से बातचीत पूरी नहीं हो सकी। इस संबंध में प्रेस नोट जारी करते हुए प्रदेश अध्यक्ष रेशम सिंह गिल, सचिव शमशेर सिंह, उपाध्यक्ष हरकेश कुमार विक्की, जगतार सिंह बलजीत सिंह, जालोर सिंह, दलजीत सिंह, प्रदीप कुमार, कैशियर बलजिंदर सिंह, सतनाम सिंह, जगदीप सिंह ने बताया कि हमारी बैठक मोहाली 65 सेक्टर पंजाब मंडी बोर्ड के सचिव मुख्यमंत्री रवि भगत आईएएस से  बहुत ही अच्छे माहौल में हुई जिसमें संगठन की मांगों पर चर्चा हुई. मुख्य मुद्दा पन बस में 28 अप्रशिक्षित चालकों की आउटसोर्स के माध्यम से भर्ती का था। इस संबंध में मुख्यमंत्री के सचिव को बताया गया कि इन अप्रशिक्षित चालकों को कम वेतन पर रखा गया है और यह भर्ती नियमों को ताक पर रखकर की जा रही है। 

इस बैठक में अन्य मांगों पर भी चर्चा हुई। कम वेतन पर भी विशेष रूप से चर्चा हुई। खास बात यह थी कि सचिव ने पूरी बातचीत को अच्छे तरीके से सुना और सभी मांगों को निपटाने के लिए सोमवार को पंजाब के मुख्य सचिव के साथ एक पैनल बैठक निर्धारित की और भर्ती विभाग के अधिकारियों को सोमवार तक अनट्रेंड लोगों की भर्ती रोकने के लिए भी कहा लेकिन विभाग के अधिकारियों के अड़ियल रवैये के कारण इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया। 

इस अड़ियल रवैये को देखते हुए संगठन ने निर्णय लिया है कि सोमवार की बैठक तक पनबस हड़ताल जारी रहेगी और लोगों की परेशानी को देखते हुए आधी हड़ताल वापिस ले कर पीआरटीसी बसों को सोमवार तक चालू रखा जाएगा।  यदि सोमवार की बैठक में भी समाधान नहीं होता है तो तत्काल अगले दिन पीआरटीसी के सभी 9 डिपो बंद कर संघर्ष को तेज करते हुए सड़क जाम या मुख्यमंत्री आवास पर धरना देने जैसे कठोर कदम उठाये जायेंगे। 

गौरतलब है कि लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर पंजाब रोडवेज, पनबस और पीआरटीसी के कर्मचारी एक बार फिर हड़ताल पर हैं। यह हड़ताल 15 दिसंबर की दोपहर को शुरू हुई थी। इस हड़ताल के चलते 16 दिसंबर को भी पंजाब के 18 डिपो से 1900 बसें सड़कों पर नहीं उतरीं। बस स्टैंड सूने रहे और यात्रियों को भी काफी परेशानी हुई। 

हड़ताल पर गए पनबस के कॉन्ट्रेक्ट कर्मचारियों ने भी साफ ऐलान कर दिया है कि अगर सर्कार मांगें नहीं मानेगी तो वे संघर्ष को और तेज करेंगे। इस बार यह हड़ताल 15 दिसंबर की दोपहर में शुरू हुई थी जो सुबह होने तक पूरी तरह फैल गई थी। पंजाब के कॉन्ट्रेक्ट बस वर्कर्स ने बताया कि प्रबंधन ने ड्राइवरों की भर्ती में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इसलिए हमने मजबूरन हड़ताल का आह्वान किया था। 

हड़ताल के चलते प्रदेश के 18 बस डिपो की करीब 1900 बसें सड़क पर नहीं उतरीं। बटाला कंडक्टर के खिलाफ सरकार की कार्रवाई से छिड़ा आंदोलन एक बार फिर अन्य मांगों को लेकर गरमा गया है। इस बार इस आंदोलन में और भी कई मांगें शामिल हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार मीटिंगों में हमसे जो वादे करती है और विधानसभा में जो कहती है, उसे कभी पूरा नहीं करती। सरकार की कथनी और करनी में हर बार फर्क होता है। सरकार कहती कुछ है और करती कुछ है।

पनबस पीआरटीसी कांट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन लुधियाना डिपो के महासचिव गुरप्रीत सिंह वड़ैच ने कहा कि पंजाब सरकार उनसे किए गए वादों को पूरा करने में विफल रही है। प्रबंधन द्वारा बिना प्रक्रिया का पालन किए बिना पिछले दरवाजे से नए वाहन चालकों की भर्ती की जा रही है। जिसके चलते उन्होंने यह हड़ताल की है। 

पहले उन्हें मुख्यमंत्री आवास का घेराव करना था, लेकिन सरकार द्वारा आज शाम बैठक बुलाने के कारण इसे टाल दिया गया है। लेकिन अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो संघर्ष और तेज किया जाएगा। श्री गुरप्रीत सिंह वड़ैच ने कहा कि अफसरशाही बिना किसी ट्रायल और ट्रेनिंग के आम लोगों की जान जोखिम में डालकर आउटसोर्स ड्राइवरों से जुड़कर संगठन को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रही है। 

कर्मचारी नेता सतनाम सिंह ने भी सरकार की इन नीतियों के बारे में खुलकर बात की और इनका पुरजोर विरोध किया। कर्मचारी नेताओं ने कहा कि 15 दिसंबर 2022 को जहां मौजूदा सरकार चुनाव के दौरान किए गए वायदों से मुकरते हुए कच्चे कर्मचारियों को काम पर रखने से भाग रही है, वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा में किए गए दावों के विपरीत कदम उठा रही है। 

आउटसोर्सिंग खत्म करने के लिए सरकार विधान सभा में भी कह चुकी है और यूनियन के  में भी। वर्तमान परिवहन मंत्री और परिवहन विभाग का प्रबंधन चालकों को बिना किसी प्रक्रिया के कम वेतन पर भर्ती करके और उन्हें आउटसोर्स कर डिपो में शामिल होने के लिए मजबूर कर रहा है। इससे जहां पंजाब रोडवेज/पनबस में काम करने वाले कच्चे कर्मचारियों के अधिकारों पर कुठाराघात हो रहा है, वहीं पंजाब रोडवेज/पनबस बसों में रोजाना सफर करने वाले आम लोगों के कीमती जीवन को भी खतरे में डाला जा रहा है।

सरकार की नीयत और नीतियों के तीखे विरोध में पनबस/पीआरटीसी ठेका मजदूर यूनियन ने तत्काल प्रभाव से पंजाब के 18 डिपो बंद कर हड़ताल का एलान किया। इस हड़ताल के परिणाम स्वरूप 1900 बसें सड़कें पर उत्तरी ही नहीं। 

इस कार्रवाई के साथ ही कल सुबह पंजाब के मुख्यमंत्री के चंडीगढ़ आवास का घेराव करने का भी एलान किया गया है। इस मौके पर डिपो महासचिव गुरप्रीत बराइच ने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा किए जा रहे अन्याय और धक्के के विरोध में पंजाब रोडवेज के डिपो तब तक बंद रहेंगे जब तक कोई ठोस फैसला नहीं लिया जाता है।

 गौरतलब है कि सरकार ने पिछले कुछ दिनों में बार-बार बैठकें बुलाई हैं और खुद को वापस ले लिया है. निजीकरण और आउटसोर्सिंग की ओर बढ़ते हुए इन कर्मचारियों के सरकार से टकराव की आशंका से निकट भविष्य में इंकार नहीं किया जा सकता है। इन कर्मचारी नेताओं ने कहा कि हम सरकारी परिवहन को लाभ की ओर ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन सरकार की नीतियां विभाग को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाकर बंद करने की तरफ बढ़ती जा रही हैं। 

अब देखते हैं सोमवार की शाम को हड़ताल क्या लेती है? या तो हड़ताल सोमवार शाम को समाप्त हो जाएगी या फिर अनिश्चित काल के लिए पूरे पंजाब में तुरंत फ़ैल  जाएगी।

Monday, May 18, 2020

22 मई को पंजाब में भी रोष प्रदर्शन करने का ऐलान

Monday: 18th May 2020:4:26 PM
16 जन संगठनों द्वारा देश स्तरीय आह्वान पर फैसला 
चण्डीगढ़:18 मई 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::  
ट्रेड यूनियनों द्वारा 22 मई को देश भर में रोष प्रदर्शन करने के आह्वान के तहत पंजाब के 16 मज़दूर-मुलाज़िम, किसान, नौजवान, विद्यार्थी संगठनों ने भी राज्य भर में रोष प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। यह जानकारी आज मज़दूर नेताओं राजविन्दर सिंह, लछमण सिंह सेवेवाला, जगरूप सिंह, प्रमोद कुमार और किसान नेताओं जोगिन्द्र सिंह उगराहाँ, कंवलप्रीत सिंह पन्नू द्वारा जारी सांझे प्रेस विज्ञप्ति में दी गई। नेताओं ने कहा है कि केंद्र की मोदी सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने कोरोना संकट को बहाना बना कर मज़दूर वर्ग पर तीखा राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक हमला किया है। विभिन्न राज्यों में 8 घंटों की जगह 12 घंटे कार्यदिवस लागू करने समेत अन्य क़ानूनी श्रम अधिकारों का हनन किया गया है और किया जा रहा है। पंजाब में भी बारह घंटे कार्यदिवस लागू करने तैयारी है। भाजपा की उत्तर-प्रदेश सरकार ने तो लगभग सभी श्रम कानून ख़त्म करने का ऐलान कर दिया है। ज़रूरत तो इसकी थी कि कमज़ोर श्रम कानूनों को मज़दूरों के पक्ष में मज़बूत बनाया जाये परन्तु सरकारें न सिर्फ़ इनको ओर कमज़ोर बनाने पर तुलीं थी बल्कि अब तो ख़त्म ही कर रही हैं। यह प्रक्रिया पहले ही जारी थी परन्तु कोरोना संकट के बहाने और लॉकडाउन का फ़ायदा उठा कर इस मज़दूर विरोधी और देशी-विदेशी पूँजीवादी एजंडे को अंजाम दिया रहा है। इस तरह सरकारें पूँजीपतियों को मज़दूरों से जैसे मर्ज़ी लूट-खसोट और अन्य बेइन्साफ़ी करने की पूरी छुट दे रही हैं।
          नेताओं ने कहा सरकारों ने कोरोना संकट के हल के लिए उचित कदम उठाने की जगह इसको और भी गंभीर बनाया है। उन्होंने दोष लगाया कि हुकूमत द्वारा कोरोना से बचाव के बहाने जनता पर थोपे गए ग़ैर-जनवादी और दमनकारी लॉकडाउन के ज़रिए मज़दूरों-मेहनतकशों को भुखमरी, शारीरक कमज़ोरी, कोरोना और अन्य बीमारियों से नुकसान का ख़तरा बढ़ाने, पैदल व साईकिलों के ज़रिए लंबे सफरों, पुलिस दमन, नाजायज गिरफ़्तारियों, हादसों, आत्महत्यों आदि मुसीबतों के मुँह में धकेलने की आपराधिक भूमिका निभाई गई है जिसके लंबे समय तक भयानक नतीजे मज़दूरों तथा अन्य जनता को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि जनता की समस्याएँ दूर करने की जगह सरकारें ‘‘देश’’ तथा ‘‘राज्य ’’ को कोरोना और लॉकडाउन से हुए नुकसान का बहाना बना कर आर्थिक पैकेज के नाम पर पूँजीपतियों को सरकारी ख़ज़ाना लुटा रही हैं और बिजली क्षेत्र समेत तमाम जन-सेवाओं के उपक्रमों के मुकम्मल निजीकरण के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। सरकारें जनता पर नए टेक्स थोपने की तैयारी कर रही हैं। खेती को राहत के नाम पर खेती उपभोग उत्पाद के उद्योगपतियों को लुटाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ़ जनता को कोरोना संकट, लॉकडाउन और अन्य भयानक मुसीबतों के मुँह में धकेल कर बड़ा राजनीतिक-आर्थिक हमला किया जा रहा है। संगठनों ने मज़दूर वर्ग, अन्य सभी मेहनतकशों तथा जनवादी लोगों को हुक्मरानों के इस हमले के ख़िलाफ़ ज़ोरदार संघर्ष और 22 मई के प्रदर्शनों में सावधानियाँ रखते हुए शामिल होने का निमंत्रण दिया है।
इन 16 संगठनों में टेक्स्टाल-हौज़री कामगार यूनियन, पॉवर कॉम एंड ट्रांसको ठेका मुलाज़िम यूनियन, पंजाब खेत मज़दूर यूनियन, टेक्निकल सर्विसज़ यूनियन, भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहाँ), किसान संघर्ष कमेटी पंजाब, मोल्डर एंड स्टील वर्कर्ज़ यूनियन, जल स्पलाई एवं सेनिटेशन कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन पंजाब (रजि. नं 31), नौजवान भारत सभा (ललकार), पी.एस.यू. (शहीद रंधावा), नौजवान भारत सभा, पी.एस.यू. (ललकार), कारख़ाना मज़दूर यूनियन, गुरू हरगोबिंद थर्मल प्लांट लहरा मोहब्बत ठेका मुलाज़िम यूनियन आज़ाद, ठेका मुलाज़िम संघर्ष कमेटी पॉवर कॉम (ज़ोन बठिंडा) और पंजाब रोडवेज़ /पनबस कंट्रैक्ट वर्कर्ज़ यूनियन शामिल हैं।

Friday, July 29, 2016

जनविरोधी बैंकिंग सुधारों का नाश हो--हड़ताली बैंक मुलाज़िमों का श्राप

भारी बारिश भी नहीं रोक पायी बैंक मुलाज़िमों का जोश 
लुधियाना; 29 जुलाई 2016:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो);
यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स के आहवान पर, एक मिलीयन बैंक कर्मचारी एवं अधिकारी आज जनविरोधी बैंकिंग सुधारों के विरुद्ध एक दिवसीय अखिल भारतीय हड़्ताल पर हैं । निर्णय के अनुसार, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स (लुधियाना इकाई) ने केनरा बैक, भारत नगर चौंक, लुधियाना के सामने जोरदार प्रदर्शन किया । कामरेड नरेश गौड़, संचालक, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स, कामरेड पवन ठाकुर, प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई), कामरेड संजय शर्मा, उप प्रधान, आल इण्डिया बैंक आफिसर्स कन्फैडेरेशन, लुधियाना अंचल, कामरेड जे पी कालड़ा, प्रधान, स्टेट बैंक आफ इण्डिया आफिसर्स एसोसिएशन, कामरेड इकवाल सिंह, सहायक महा सचिव, स्टेट बैंक आफ इण्डिया स्टाफ एसोसिएशन, कामरेड डी पी मौड़, महा सचिव, ज्वाईंट काउंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स ने बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों को संबोधित किया । इस अवसर पर कामरेड अशोक मल्हन, कामरेड राजेश वर्मा, उप प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई) एवं कामरेड प्रवीण मोदगिल, संचालक, वूमैन सैल, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन भी उपस्थित रहे ।     

बैंक कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कामरेड नरेश गौड़ ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि सरकार  बैंकिंग सुधार उपायों को एक प्रकार से अथवा दूसरे रुप में आगे बढाना चाहती है इसके पीछे मौलिक विचार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग को कमजो़र करना तथा छिन्न-भिन्न कर देना है और निजी क्षेत्र की बैंकिंग को बढ़ावा देना है हम निरन्तर ऐसी योजनाओं से लड़्ते रहे हैं हमने संघन अभियान, आन्दोलन, संघर्ष और हड़ताली कार्यवाहियाँ इस सभी उपायों के विरुद्ध खड़ी की है हम वास्तविक रुप से गर्व अनुभव कर सकते हैं कि इस सभी लगातार प्रयासों के कारण जिस गति से इन सुधार कार्यक्रमों का प्रस्ताव लागू करने के लिए किया गया था उस पैमाने पर नहीं लागू हो सके किन्तु हम जानते हैं कि सरकार अपने पंजों के बल अपनी कार्यसूची को किसी भी प्रकार लागू करने के लिए खड़ी है
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय के लिए भी घोषणा की है पहले ही आरबीआई ने काँर्पोरेट एवं औद्दोगिक घरानों को लाईसैंस देने की योजना की घोषणा की है आरबीआई ने इससे आगे लघु निजी बैंकों और भुगतान बैंकों की स्थापना के लिए भी दिशानिर्देश जारी कर दिये हैं अत: यह हमारे बैंकिंग क्षेत्र को अधिक से अधिक निजी हाथों में देने का एक ठोस प्रयास है  बैंकिंग उद्दोग में हमें पहले ही पता है कि सरकार अपने कथित सुधारों के निरंतर प्रयास आगे बढ़ा रही है, जिसकी कार्य सूची में प्राथमिकता के आधार पर बैंकों का निजीकरण सुदृढ़ीकरण और विलय आदि है । अधिक से अधिक निजी पूंजी और सीधे विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया  जा रहा है । क्षेत्रिय ग्रामीण बैंकों के निजीकरण का प्रयस चल रहा है और इस संदर्भ में हमारी यूनियनों के विरोध के बावजूद संसद में इस संदर्भ में विधेयक पारित कर दिया गया है । प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों में (पीएसी) समेटे जाने के खतरे में है । शहरी साहकारी बैंक लाईसेंस समाप्त किये जाने के खतरे   में हैं। निजी क्षेत्र के कार्यकारियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में थोपा जा रहा है । बिना किसी ढांचागत सुविधा और कर्मचारियों के बढाए सरकारी नीतियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों पर थोपा जा रहा है । बैंक अधिकारियों को काम के नियमित घंटों से वंचित किया जा रहा है । स्थाई और नियमित कार्यों को ठेका आधार पर आउट्सोर्स किया जा रहा है और ठेका कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है । सरकार अपनी कार्य सूची पर आगे बढ़ रही है और श्रम संगठनों से बिना समुचित विचार विमर्श किये बिना श्रम कानूनों को संशोधित करेगी ।      

बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों के नाम पर, बैंकों के निजीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं जिससे कि उन्हें निजी कार्पोरेटों के हाथों सौंपा जा सके जिससे वह जनता की बहुमूल्य बचत को और लूट सकें । बैंकों के एकीकरण का प्रयास, उन्हें बड़ा बनाने और उन्हें वैश्वीकृत करने का है जबकि बैंकों का विस्तार और जन सामान्य तक उनकी पहुंच बढाना अधिक आवशयक था ।  पहले ही हमारे बैंक खराब ऋणों की खतरनाक वृद्धि के कारण लहूलुहान हैं, कार्पोरेटों तथा बड़े व्यवसायियों के जानबूझकर चूक करने के कारण ऐसा है । अपराधियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने और ऋणों की वसूली के स्थान पर, प्रयास किये जा रहे हैं कि उन्हीं चूककर्ताओं को बैंक सौंप दिये जायें । यह बहुत ही स्पष्ट है कि उनके बैंकिंग सुधारों की सभी बातें और विलय तथा एकीकरण के प्रस्ताव केवल एक हथकण्डा और खेल का तरीका है जिससे कि लोगों का ध्यान इस बड़े पैमाने पर बैंकों के खराब ऋणों से हटाया जा सके ।  हमारे देश की आवश्यकता एक सुदृढ़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं न कि अनावशयक रुप से बड़े बैंक जिनका वैशिवक आकार हो । हमारे देश की आवश्यकता बैंकिंग के विस्तार की है न कि बैंकों का एकीकरण और जनता के लिए बैंकिंग सेवाओं का संकोचन की । खराब ऋणों की चिन्ताजनक वृद्धि जो कि लगभग 13 लाख करोड़ तक पहुंच गये हैं पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए । कठोर कदम उठाकर उस धन को वापस लेने के प्रयास किये जाने चाहिए न कि हड़बड़ी में प्रावधानों, बट्टे खाते डालने, सीडीआर तथा एसडीआर के माध्यम से ढकने के ।

यदि ऋण खराब रुप से मंजूर किये गये हैं, सम्बंधित कार्यकारियों पर कार्यवाही की जानी चाहिए । यदि कर्जदारों ने बैंक को छला है, तो चूककर्ता के विरुद्ध फौज़दारी मामला लागू करना चाहिए ।  खराब ऋणों के लिए प्रावधान करना, तुलन पत्र को साफ सुथरा बनाना और बैंकों को फिर घाटा देने लायक बना देना समस्या का समाधान नहीं है । यह स्पष्ट है, ये सभी बड़े खराब ऋणों के लिए जवाबदेही से बचने केलिए केवल बंटाने की रणनीति है । किंगफिशर माल्या हिम्शिला का केवल शिखर है । बैंकों में खराब ऋणों के सागर में बहुत अधिक शार्क हैं । क्यों चूककर्ताओं की सूची उनके द्वारा प्रकाशित नहीं की जा रही है? क्यों आपराधिक कार्यवाही जानबूझकर कार्पोरेट चूककर्ताओं पर नहीं की जा रही है? क्यों उन सभी के साथ मखमली व्यवहार किया जा रहा है? क्यों इन चूककर्ता कम्पनियों में इक्विटी निवेश के रुप में खराब ऋणों को बदलने के प्रयास हैं । क्या यह सरकार की कार्पोरेट शासन प्रणाली तथा सुशासन प्रणाली नीति है? आडीबीआई बैंक में, 10 वर्ष पूर्व, लगभग रुपए 9000  करोड़् के खराब ॠण उनकी किताबों से बाहर कर दिये गये । अब पुन: रुपए 19000 करोड़ के खराब ऋण हैं । इन खराब ऋणों की वसूली की कार्यवाही करने के स्थान पर, सरकार बैंक का निजीकरण कर उन्हीं निजी क्षेत्र के हाथों में बेच देना चाहती है जो कि आईडीबीआई बैंक में इन सारी तादाद चूक के लिए जिम्मेदार हैं। 

Saturday, July 09, 2016

11 जुलाई की हड़ताल-ट्रेड यूनियन नेतायों ने धोखा किया?

We call upon you all to quit the bandwagon of dead TUs 
Carry forward the Strike of 11th July

हड़ताल को टालने का निर्णय पड़ेगा भारी
कर्मचारियों को लग रहा कि नेताओं ने उनके साथ धोखा किया है
Worker Socialist Movement
नईदिल्ली। हड़ताल को टालने का निर्णय फेडरेशनों के साथ-साथ इनसे जुड़ी यूनियनों को भारी पडऩे वाला है। कर्मचारियों को लगने लगा है कि अब रेलवे में इनका विकल्प जरूरी हो गया है ताकि इनकी मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। कर्मचारियों के बीच अब यह नारा लग रहा है शौक नहीं मजबूरी है अब दोनों यूनियनों को हटाना जरूरी है…। इसी एक नारे से कर्मचारियों की भावनाओं को समझा जा सकता है। फेडरेशनों के निर्णय से कर्मचारियों के बीच काम करने वाले यूनियन पदाधिकारियों के सामने विकट स्थिति उत्पन्न हो गई है। वह चुप होकर बैठ गये हैं। उन्होने हांलाकि हड़ताल स्थगित करने को अपनी जीत बताने की कोशिश की लेकिन जिस प्रकार के उनको जबाव सुनने को मिले उससे उन्होने चुप रहना ही बेहतर समझा है। कर्मचारियों के बीच तेजी से यह बात फैल रही है कि जबतक सेवानिवृत्त लोगों को घर नहीं बैठाया जाता तब तक उनका भला होने वाला नहीं है।
हड़ताल को स्थगित करने के फैसले से कर्मचारी बिफरे हुये हैं। उन्हे लग रहा है कि नेताओं ने उनके साथ धोखा किया है। पहले से ही वेतन आयोग के खिलाफ सरकार को कोसने वाले यह लोग अब नेताओं को सबसे बड़ा धोखेबाज बताने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इनको लग रहा है कि सरकार के साथ फे डरेशनों के नेताओं ने कोई गुप्त समझौता किया है जिसके कारण हड़ताल को रद्ध किया गया है।
कर्मचारियों को किसी भी समिति पर कोई विश्वास नहीं है। वह तो 11 जुलाई को हड़ताल या फिर उठाये गये मुद्धों का हल चाहते थे। लेकिन फेडरेशनों के नेताओं ने जिस प्रकार से सरकार के सामने समर्पण किया उसे लेकर वह काफी आक्रोशित हैं। उन्हे लग रहा है कि नेताओं ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया, हड़ताल के नाम पर उन्हे बरगलाया गया।
वहीं दूसरी ओर अब जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले यूनियन के पदाधिकारियों के सामने अजीब स्थिति उत्पन्न हो गई है। वह पद जाने के डर से अपनी यूनियन के निर्णय का विरोध नहीं कर पा रहे हैं लेकिन उन्हे भी लग रहा है कि बड़े नेताओं ने गलत किया है। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया में यह पदाधिकारी हड़ताल को लेकर जमकर माहौल बनाने में लगे हुये थे। अब इनके पास कोई जबाव नहीं है। कई कर्मचारियों ने रेलवार्ता कार्यालय में फ ोन कर जानना चाहा कि नेता कितने में बिके हैं यदि कोई गुप्ता जानकारी हो तो उसे सार्वजनिक किया जाये। कर्मचारी पदाधिकरियों से पूछ रहे हैं कि उनके नेताओं ने कितने में समझौता किया है…। सोशल मीडिया पर कई दिनों से छाये यह नेता अब भूमिगत हो गये हैं।
दरअसल हड़ताल स्थगित करने के निर्णय को सही ठहराने की उन्होने कोशिशें की लेकिन कर्मचारियों के जबाव सुनकर इन्होने चुप रहना ही बेहतर समझा।
कल तक सरकार को वेतन आयोग की सिफारिशों को लेकर निशाना बना रहे यह कर्मचारी अब दोनों फेडरेशनों को निशाना बनाये पड़े हुये हैं। नेताओं को गंदी से गंदी गाली देने में भी इन्हे अब परहेज नहीं हैं। कर्मचारियों के इस गुस्से को देखकर लगता है कि यदि फेडरेशन के नेता हड़ताल के लिये अड़ जाते तो शायद कर्मचारियों का कुछ भला हो जाता या फिर 1974 के बाद एक बार हड़ताल हो जाती। इस तरह से घुटने टेकने से अच्छा था एक सम्मान जनक समझौता या फिर हड़ताल। कर्मचारियों का कहना है कि फेडरेशनों के नेता कभी हड़ताल करना ही नहीं चाहते थे वह तो सरकार को ताकत दिखाना चाहते थे ताकि कुछ पर्दे के पीछे से कुछ पाया जा सके लेकिन उल्टा हो गया। आज मोदी सरकार ने इन नेताओं की विश्वनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। कल तक सरकार को गाली देने वाले आज इनको गाली दे रहे हैं। शायद सरकार चाहती भी यही थी।

by Rohit kumar tpz

Friday, May 20, 2016

सहयोगी बैंकों को बन्द कर उनके अधिग्रहण के विरोध में गुस्सा तेज़

सहयोगी बैंकों में रही एक दिवसीय अखिल भारतीय हड़्ताल
7 जून एवं 28 जुलाई 2016 को भी हड़्ताल
लुधियाना: 20 मई 2016: (रेकटर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
संघर्ष को आगे बढाते हुए, आज स्टेट सैक्टर बैंक ईम्पलाइज़ एसोसिएशन ने एक दिवसीय अखिल भारतीय हड़ताल की एवं स्टेट बैंक आफ पटियाला, आंचलिक कार्यालय, मिल्ल्रर गंज, लुधियाना के सामने 5 सहयोगी बैंकों को बन्द करके एसबीआई द्वारा उनके अधिग्रहण के विरोध में जोरदार प्रदर्शन किया । कामरेड नरेश गौड़, सचिव, स्टेट सैक्टर बैंक ईम्पलाइज़ एसोसिएशन एवं आल इण्डिया स्टेट बैंक आफ पटियाला इम्पलाईज़ फैडेरेशन ने बैंक कर्मचारियों को संबोधित किया । कामरेड अशोक मल्हन, उप प्रधान, आल इण्डिया स्टेट बैंक आफ पटियाला ईम्पलाइज़ फैडेरेशन, कामरेड पवन ठाकुर, प्रधान, कामरेड राजेश वर्मा, उप प्रधान, कामरेड बलवंत राय, सहायक सचिव एवं कामरेड अशवनी सिंगला, संगठन सचिव, पंजाब बैंक ईम्पलाइज़ फैडेरेशन (लुधियाना) ने भी संबोधित किया। 
बैंक कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कामरेड गौड़ ने कहा कि 5 सहयोगी बैंकों अर्थात स्टेट बैंक आफ त्रावनकोर (एसबीटी), स्टेट बैंक आफ मैसूर (एसबीएम), स्टेट बैंक आफ हैदराबाद (एसबीएच), स्टेट बैंक आफ बीकानेर एण्ड जैयपुर (एस्बीबीजे) तथा स्टेट बैंक आफ पटियाला (एसबीपी) के निदेशक मण्डल की बैठक में जो कि जल्दबाजी में मुम्बई में आयोजित की गई, जिसकी कोई पूर्व सूचना नहीं थी, अचानक एक कार्यसूची निदेशक मण्डल की बैठक में एसबीआई के हुम्कनामे पर रखी गई जिसमें सहयोगी बैंकों को बन्द करने की बात थी ताकि एसबीआई उनका अधिग्रहण कर सके । एआईबीईए के कामगर निदेशकों के विरोध और प्रतिरोध तथा कुछ अन्य स्वतंत्र निदेशकों के विरोध के बावजूद, प्रस्ताव और पद्धति को स्वीकृति दे दी गई, इस मामले में प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया।
यह अत्यन्त शर्मनाक है कि जब सरकार कार्पोरेट प्रशासन अधिकार और अच्छे प्रशासनिक अधिकार की बात कर रही है, निदेशक मण्डल की कार्यसूची को बिवा किसी सूचना के ऐसे गम्भीर मामले पर ले आया गया और निर्णय भी ले लिया गया । यह निर्णय भी वित्त मंत्री के साथ हमारी बैठक जो 23 मार्च और 25 अप्रैल 2016 को हुई थी में वित्त मंत्री के सुझाये गये तरीके के अनुरुप नहीं था । उनकी राय थी कि सभी 5 बैंकों को एक बैंक में परिवर्तित किया जा सकता है। किन्तु एसबीआई और सहयोगी बैंक जो प्रयास कर रहे हैं वह वित्त मंत्री के सुझाव के सर्वथा विपरीत है।  

5 सहयोगी बैंकों का इतिहास एवं स्थिति मार्च 2016 तक इस प्रकार है :-
         (रु करोड़ में)

बैक का नाम    साल जमारिशियाँ अग्रिम  कुल व्यवसाय

स्टेट बैंक आफ हैदराबाद  75 139,300 114,000 253,300

स्टेट बैंक आफ पटियाला  99 105,800 85,900 191,700

स्टेट बैंक आफ बीकानेर   70 93,300 74,700 168,000

एण्ड जयपुर
स्टेट बैंक आफ त्रावनकोर  70 100,400 67,000 167,400
स्टेट बैंक आफ मैसूर   103 70,200 55,400 125,000
सहयोगी बैंकों की 67000 से अधिक शाखाएं एवं 9000 ए.टी.एम हैं। इन बैंकों का कुल व्यवसाय मार्च 2016 तक 900,000 करोड़ रु है तथा परिचालन लाभ 10,500 करोड़ रू है।      
73000 (45000 + 28000) अधिकारी एवं कर्मचारी इन बैंकों मे कार्यरत हैं । एसबीआई में इन बैंकों के विलय के फलस्वरूप बहुत सी शाखाएं बंद कर दी जायेंगी एवं बहुत से कर्मचारी अधिशेष हो जायेंगे। इस के परिणाम स्वरुप जनता एवं कर्मचारी पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। केरला, कर्नाटका, राज्सथान, तेंलेगाना एवं पंजाब की इन बैंकों से संबंधित राज्य सरकारों की आमदनी खत्म हो जायेगी क्योंकि इन बैंकों द्वारा लाभ पर अदा किये गये कर का हिस्सा इन राज्य सरकारों को नहीं मिल पायेगा।
इन सब के पीछे मूल तर्क केवल भारतीय स्टेट बैंक को एक बड़ा एवं विश्व स्तर का बैंक बनाना है । भारत को मज़बूत एवं अच्छे बैंकों की आवशयकता है, न कि बड़े बैंकों की। संयुक्त राज्य अमेरिका में हमने बड़े से बड़े बैंकों को ताश के पत्तों की तरह गिरते देखा है । बड़े बैंक आम आदमी की जरुरतों को नज़रअंदाज़ करेंगे एवं उनके प्रति असंवेदनशील होंगे। वह केवल बड़े कारबारियों की ही जरुरतें पूरी करेंगे । भारतीय स्टेट बैंक मूल प्रमुख बैंक है, यह अपनी बढोतरी एवं विस्तार के लिए सहयोगी बैंकों को नही मार सकता । भूखे माता पिता अपने बच्चों का कत्लेआम नहीं किया करते।
इसलिए हम मांग करते हैं कि सहयोगी बैंकों को भारतीय स्टेट बैंक से आजा़द किया जाये।
एसबीआई एवं सहयोगी बैंकों की इस उत्तेजक कार्रवाई के विरुद्द अपना गुस्सा एवं विरोध प्रदर्शित करने के लिए, हम सभी सहयोगी बैंकों के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं एवं आज एक दिवसीय हड़्ताल भी की है।  


7 जून 2016 एवं 28 जुलाई 2016 को भी हड़्ताल की जायेगी।   

Wednesday, September 02, 2015

लुधियाना के बैंकिंग क्षेत्र में भी हुयी ज़बरदस्त हड़ताल

Wed, Sep 2, 2015 at 1:59 PM
श्रम विरोधी नीतियों के खिलाफ फिर बुलंद हुयी देश की आवाज़ 
लुधियाना: 2 सितम्बर 2015: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन): 
स्थान था लुधियाना का भारतनगर चौंक में स्थित केनरा बैंक जहाँ गूँज रहा था आकाश जन विरोधी नीतियों के खिलाफ। 
मकसद था* कामगार विरोधी श्रम सुधारों का विरोध

                  * जनविरोधी बैंकिंग सुधारों का विरोध  

प्रमुख मांगें हैं:

* कामगार विरोधी श्रम सुधार रोके जायें
* जनविरोधी बैंकिंग सुधार रोके जायें
* कार्पोरेट ऋण चूककरर्ताओं द्वारा जनता के धन की लूट रोकी जाए
* बैंक ऋणों को जानबूझकर अदा न करना फौजदारी अपराध घोषित किया जाए
* बैंक कार्यों की आउटसोर्सिंग रोकी जाए
आल इंण्डिया बैंक इम्पलाईज़ एसोसिएशन (एआईबीईए), एआईबीओए, बीईएफआई, आईएनबीओसी, एनओबीड्बल्यु, आईएनबीईएफ एवं एनओबीओ ने आज 2 सितंबर 2015 को केन्द्रीय सरकार की कामगार विरोधी नीतियों के विरुद्ध हड़्ताल की । देश भर के 100 मिलीयन से अधिक मजदूर/कामगार आज राष्ट्रव्यापी हड़्ताल पर हैं । यह वर्तमान एन.डी.ए. सरकार की कामगार विरोधी नीतियों के विरोध में सबसे ताकतवर लड़ाई है । 
पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई) ने आज एक दिवसीय हड़ताल की और केनरा बैंक, भारत नगर चौंक, लुधियाना के सामने जबरद्स्त प्रदर्शन किया । कामरेड पी.आर.मेहता, प्रधान, कामरेड नरेश गौड़, सचिव, कामरेड हरविन्द्र सिंह, सीनियर उप-प्रधान, कामरेड पवन ठाकुर, प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई), कामरेड गुरमीत सिंह, कामरेड चिरंजीव जोशी, आल इंण्डिया बैंक आफिसर्स एसोसिएशन से एवं कामरेड डी.पी.मौड़, महा सचिव, ज्वाईंट काऊंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स ने बैंक कर्मचारियों को संबोधित  किया।
बैंक कर्मचारियों को संबोधित करते हुए फैडेरेशन के नेताओं ने कहा कि हम सभी को ज्ञात है कि कामगारों पर हमले बढ़ रहे हैं और श्रम संगठन अधिकारों पर और सुविधाओं पर हमले बढ़ रहे हैं तथा हमारे देश में मालिकों को सुविधाएं प्रोत्साहन और छूट बढाई जा रही है । विभिन्न श्रम कानूनों को मालिकों के पक्ष में संशोधित करने तथा मज़दूरों के विरुद्द करने के खुले प्रयास चल रहे हैं । नव उदार आर्थिक नीतियों न केवल कामगारों वरन जन सामान्य की समस्याएं भी बढा  रही हैं । सरकार के कुछ प्रस्तावों और नीतियों का प्रारुप इस प्रकार है - श्रम कानूनों को संशोधित कर मालिकों को ऐसी शक्तियां देना जिससे उन्हें "रखो और निकालो" का अधिकार मिल जाए, कामगारों और श्रम संगठनों को उनके अधिकारों से वंचित करना, रणनीतिक क्षेत्रों जैसे रेलवे, सुरक्षा और वित्तीय क्षेत्रों में निर्वात सीधा विदेशी निवेश, वर्तमान भूमि अधिग्रहण कानून में व्यापक परिवर्तन, कृषकों की भूमि व कृषि कामगारों के जीवन यापन के अधिकारों को व्यापक रुप से कुचलना और कटौती करने के प्रयास, ईपीएफ और ईएसआई योजनाएं एच्छिक बनाने का प्रस्ताव, मौलिक सामान्य सुरक्षा ढांचा, जो संगठित क्षेत्र को  उपलब्ध हैं, को तहस नहस करने का प्रयास इत्यादी ।      
बैंकिंग उद्दोग कोई अपवाद नहीं है । बैंकिंग उद्दोग में हमें पहले ही पता है कि सरकार अपने कथित सुधारों के निरंतर प्रयास आगे बढ़ा रही है, जिसकी कार्य सूची में प्राथमिकता के आधार पर बैंकों का निजीकरण सुदृढ़ीकरण और विलय आदि है । अधिक से अधिक निजी पूंजी और सीधे विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया  जा रहा है । क्षेत्रिय ग्रामीण बैंकों के निजीकरण का प्रयस चल रहा है और इस संदर्भ में हमारी यूनियनों के विरोध के बावजूद संसद में इस संदर्भ में विधेयक पारित कर दिया गया है । प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों में (पीएसी) समेटे जाने के खतरे में है । शहरी साहकारी बैंक लाईसेंस समाप्त किये जाने के खतरे में हैं । निजी क्षेत्र के कार्यकारियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में थोपा जा रहा है । बिना किसी ढांचागत सुविधा और कर्मचारियों के बढाए सरकारी नीतियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों पर थोपा जा रहा है । बैंक अधिकारियों को काम के नियमित घंटों से वंचित किया जा रहा है । स्थाई और नियमित कार्यों को ठेका आधार पर आउट्सोर्स किया जा रहा है और ठेका कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है । सरकार अपनी कार्य सूची पर आगे बढ़ रही है और श्रम संगठनों से बिना समुचित विचार विमर्श किये बिना श्रम कानूनों को संशोधित करेगी । इस लिए यह आवशयक तथा अनिवार्य है कि सार्वभौम श्रम संगठन आंदोलन से जुड़ा जाए और सरकार की इन श्रम विरोधी नीतियों के विरुद्द अपना विरोध दर्ज किया जाए ।