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Tuesday, May 02, 2017

May Day:'इंटक" के मंच से हुआ वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी का अपमान

अनीता शर्मा के ज़ोर देने पर किया गया उसी स्वतंत्र सेनानी का सम्मान
कौन हैं यह बाबा-क्या है इतिहास में इनका रोल-देखिये मैडम अनीता शर्मा के साथ एक पुरानी वीडियो 
लुधियाना: 1 मई 2017: (पंजाब स्क्रीन टीम)::  For More Pics Please Click here
इंटक के एक विवादित गुट ने अपने बहादर के रोड पर हुए आयोजन के मंच से एक बेहद वृद्ध व्यक्ति का लगातार अपमान किया जो खुद को स्वतंत्रता सेनानी होने का दावा भी कर रहा था। इस अपमान को अनीता शर्मा ने बहुत जद्दोजहद करके और बाद में शर्म के मारे इन नेताओं ने उसी वृद्ध का मंच से नीचे आ कर सम्मान भी किया और अपनी भूल भी स्वीकार की। यह सब मई दिवस के पावन अवसर पर हुआ। मंच पर नेताओं के सम्मान का घमसान मचा रहा और सम्मान चिन्ह के दोशाले मंच से भीड़ की तरफ अपने ख़ास लोगों की तरफ जूतों की तरह फेंके जाते रहे। हरियाणा की खटटर सरकार के बयान का मई दिवस के हर आयोजन में तीखा विरोध हुआ लेकिन इंटक के इस गुट ने अपने इस आयोजन में इस पर एक शब्द बोलना भी उचित नहीं समझा।  गौरतलब है कि खुद को सेकुलर कहने वाले इंटक के इस विवादित गुट ने बहादर के रोड का आयोजन वाम दलों के केंद्र में सेंध लगा कर किया था जो बुरी तरह से फ्लॉप रहा।
INTUC: ਪਰਮਿੰਦਰ ਪੱਪੂ ਨੂੰ ਹਟਾਇਆ ਮਾਲਵਾ ਜ਼ੋਨ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਵਾਲੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ 
गौरतलब है कि इस जगह अक्सर एटक की तरफ से मई दिवस मनाया जाता था। उस समय यहां पांव रखने की जगह भी नहीं होती थी। यह सब देख कर इंटक के इस गुट को लगा कि यहां के नेताओं को  साथ मिला लिया जाये तो मज़दूरों की बहुत बड़ी संख्या अपने कब्ज़े में आ जाएगी और ऐतिहासिक कार्यक्रम होगा लेकिन एटक का समर्पित केडर यहां आने की बजाये नगर निगम ज़ोन ए में हुए सफल आयोजन में शामिल हुआ। यहां इंटक के कार्यक्रम में कुर्सियां आखिर तक खाली रहीं। शो बुरी तरह फ्लॉप हुआ।  
इसी बीच कार्यक्रम में कांग्रेस का नाम सुन कर यहां एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति आ पहुंचा जिसे आप तस्वीरों में भी देख सकते हैं। उसका दावा है कि उसने तेजा सिंह स्वतंत्र जैसे जाने माने वाम स्वंतन्त्रता सेनानी के साथ जेल काटी है। अंग्रेज़ों के साथ युद्ध के समय कुछ देश विरोधियों की हत्याएं भी की हैं। वह दो शब्द कहना चाहता था माईक पर लेकिन सम्मान के घमसान में व्यस्त इन नेताओं ने उसकी एक न सुनी।  इसकी सूचना मंच संचालकों के साथ साथ मंच पर काबिज़ वरिष्ठ नेताओं तक भी पहुंचाई गयी लेकिन किसी की न सुनी गयी क्यूंकि सम्मान की होड़ से किसी को वहां फुर्सत ही न थी।  
नाम लेने और सम्मान करने कराने का यह सिलसिला इतना अस्त व्यस्त था कि ऊषा मल्होत्रा और कई अन्य लोग बीच में ही उठ कर चले गए। एम एल ए संजीव तलवाड़ नाम लेते लेते रुआंसे हो आये और झट से अपना भाषण समाप्त कर वहां से निकलते बने।  उनके चेहरे पर आई निराशा और आक्रोश को साफ़ देखा जा सकता था। इंटक के महिला विंग के प्रांतीय प्रधान अनीता शर्मा के ज़ोर देने पर जब कार्यक्रम समाप्त हो चुका तो माईक उसी वृद्ध के हाथों थमा दिया गया जो काफी देर से नीचे खड़ा केवल दो मिंट की मांग कर रहा था। माईक  थमाने के साथ ही मंच से रौशनी बंद कर दी गयी। इस अपमानजनक स्थिति पर उस वृद्ध को भी बुरा लगा और उसने छूटते ही कहा चोर उचक्का चौधरी ते गुंडी रन प्रधान। इस बात से सभी का माथा ठनका और स्वयं दिनेश शर्मा सुन्द्रियाल सहित वृद्ध के पास पहुंचे। यहाँ भी सभी ने सेल्फी लेनी शुरू कर दी। उस वृद्ध का सम्मान भी किया। कुछ पल बाद दिनेश शर्मा ने इस पर मंच की गलति का अहसास भी किया लेकिन स्थानीय आयोजकों को इस का ज़रा भी अहसास नहीं हुआ। वे सब गौरवमयी ढंग से चल रहे थे। अंधेरा होते ही सभी नेता लोग घर चले गए मास्टर फ़िरोज़ टेंट और कुर्सियां उठवाने में अपनी ज़िम्मेदारी निभाने लगे। आखिर उन्होंने इस फ्लॉप शो के खर्चे तो उठाने ही थे। मास्टर फ़िरोज़ भी इस सारे घटनाक्रम से बुरी तरह निराश और हताश नज़र आये।  आखिर अनीता शर्मा, श्री पाल शर्मा और कुछ अन्य लोगों ने उन्हें जा कर दिलासा दिया। अब मई दिवस पर एक नया आयोजन होने की चर्चा है इसी महीने के मध्य में।  उसकी जगह और कार्यक्रम फाईनल  होते ही इसकी सूचना सभी को दी जाएगी। मई दिवस के नाम पर सम्मान के घमसान के यह फ्लाप  शो सभी याद रहेगा पर कुछ स्थानीय नेताओं को छोड़ कर क्यूंकि उनमें संवेदना या अहसास नाम की कोई चीज़ नहीं है। 
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(पंजाब स्क्रीन टीम: प्रदीप शर्मा, ओंकार सिंह पूरी, रेक्टर कथूरिया)

INTUC: ਪਰਮਿੰਦਰ ਪੱਪੂ ਨੂੰ ਹਟਾਇਆ ਮਾਲਵਾ ਜ਼ੋਨ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਵਾਲੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ 


Friday, April 25, 2014

मई दिवस 1947

यह एक गाथा है… पर आप सबके लिए नहीं!   -हावर्ड फास्ट
वर्ष 1947 के मई दिवस के अवसर पर लिखा गया प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड फास्ट का यह लेख मई दिवस की गौरवशाली परम्पराओं की याद एक ऐसे समय में करता है जब अमेरिका में लम्बे संघर्षों से हासिल मज़दूर अधिकारों पर हमला बोला जा रहा था। आज भारत में देशी-विदेशी पूँजी की मिली-जुली ताक़त ने श्रम पर ज़बरदस्त हमला बोल दिया है। ऐसे में यह लेख आज भारत के मज़दूरों के लिए लिखा गया महसूस होता है, और मई दिवस की यह गाथा उत्साह और जोश से भर देती है। इसका अनुवाद 1946 के नौसेना विद्रोह में शामिल रहे ‘मज़दूर बिगुल’ के वयोवृद्ध सहयोगी सुरेन्द्र कुमार ने किया है। मज़दूर बिगुल से हम यह आलेख साभार प्रकाशित कर रहे हैं। यह बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है और साथ ही राह भी दिखाता है। —सं.

यह गाथा उनके लिए है। उन माताओं के लिए जो अपने बच्चों को मरता नहीं बल्कि ज़िन्दा देखना चाहती हैं। उन मेहनतकशों के लिए जो जानते हैं कि फासिस्ट सबसे पहले मज़दूर यूनियनों को ही तोड़ते हैं। उन भूतपूर्व सैनिकों के लिए, जिन्हें मालूम है कि जो लोग युद्धों को जन्म देते हैं, वे ख़ुद लड़ाई में नहीं उतरते। उन छात्रों के लिए, जो जानते हैं कि आज़ादी और ज्ञान को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। उन बुद्धिजीवियों के लिए, जिनकी मौत निश्चित है यदि फासिज्म ज़िन्दा रहता है। उन नीग्रो लोगों के लिए, जो जानते हैं कि जिम-क्रो’ और प्रतिक्रियावाद दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन यहूदियों के लिए जिन्होंने हिटलर से सीखा कि यहूदी विरोध की भावना असल में क्या होती है। और यह गाथा बच्चों के लिए, सारे बच्चों के लिए, हर रंग, हर नस्ल, हर आस्था-धर्म के बच्चों के लिए  उन सबके लिए लिखी गयी है, ताकि उनका भविष्य जीवन से भरपूर हो, मौत से नहीं।
यह गाथा है जनता की शक्ति की, उनके अपने उस दिन की, जिसे उन्होंने स्वयं चुना था और जिस दिन वे अपनी एकता और शक्ति का पर्व मनाते हैं। यह वह दिन है, जो अमरीकी मज़दूर वर्ग का संसार को उपहार था और जिस पर हमें हमेशा फख़्र रहेगा।
उन्होंने आपको  यह नहीं बताया 
हावर्ड फास्ट
…स्कूल में आपने इतिहास की जो पुस्तकें पढ़ी होंगी उनमें उन्होंने यह नहीं बताया होगा कि ”मई दिवस” की शुरुआत कैसे हुई थी। लेकिन हमारे अतीत में बहुत कुछ उदात्त था और साहस से भरपूर था, जिसे इतिहास के पन्नों से बहुत सावधानी से मिटा दिया गया है। कहा जाता है कि ”मई दिवस” विदेशी परिघटना है, लेकिन जिन लोगों ने 1886 में शिकागो में पहले मई दिवस की रचना की थी, उनके लिए इसमें कुछ भी बाहर का नहीं था। उन्होंने इसे देसी सूत से बुना था। उजरती मज़दूरी की व्यवस्था इन्सानों का जो हश्र करती है उसके प्रति उनका ग़ुस्सा किसी बाहरी स्रोत से नहीं आया था।
पहला ”मई दिवस” 1886 में शिकागो नगर में मनाया गया। उसकी भी एक पूर्वपीठिका थी, जिसके दृश्यों को याद कर लेना अनुपयुक्त नहीं होगा। 1886 के एक दशक पहले से अमेरिकी मज़दूर वर्ग जन्म और विकास की प्रक्रिया से गुज़र रहा था। यह नया देश जो थोड़े-से समय में एक महासागर से दूसरे महासागर तक फैल गया था, उसने शहर पर शहर बनाये, मैदानों पर रेलों का जाल बिछा दिया, घने जंगलों को काटकर साफ़ किया, और अब वह विश्व का पहला औद्योगिक देश बनने जा रहा था। और ऐसा करते हुए वह उन लोगों पर ही टूट पड़ा जिन्होंने अपनी मेहनत से यह सब सम्भव बनाया था, वह सबकुछ बनाया था जिसे अमेरिका कहा जाता था, और उनके जीवन की एक-एक बूँद निचोड़ ली।
स्त्री-पुरुष और यहाँ तक कि बच्चे भी अमेरिका की नयी फैक्टरियों में हाड़तोड़ मेहनत करते थे। बारह घण्टे का काम का दिन आम चलन था, चौदह घण्टे का काम भी बहुत असामान्य नहीं था, और कई जगहों पर बच्चे भी एक-एक दिन में सोलह और अठारह घण्टे तक काम करते थे। मज़दूरी बहुत ही कम हुआ करती थी, वह अक्सर दो जून रोटी के लिए भी नाकाफी होती थी, और बार-बार आने वाली मन्दी की कड़वी नियमितता के साथ बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी के दौर आने लगे। सरकारी निषेधाज्ञाओं के ज़रिये शासन रोज़मर्रा की बात थी।
परन्तु अमरीकी मज़दूर वर्ग रीढ़विहीन नहीं था। उसने यह स्थिति स्वीकार नहीं की, उसे किस्मत में बदी बात मानकर सहन नहीं किया। उसने मुक़ाबला किया और पूरी दुनिया के मेहनतकशों को जुझारूपन का पाठ पढ़ाया। ऐसा जुझारूपन जिसकी आज भी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।
1877 में वेस्ट वर्जीनिया प्रदेश के मार्टिन्सबर्ग में रेल-हड़ताल शुरू हुई। हथियारबन्द पुलिस बुला ली गयी और मज़दूरों के साथ एक छोटी लड़ाई के बाद हड़ताल कुचल दी गयी। लेकिन केवल स्थानीय तौर पर; जो चिनगारी भड़की थी, वह ज्वाला बन गयी। ”बाल्टीमोर और ओहायो” रेलमार्ग बन्द हुआ, फिर पेन्सिलवेनिया बन्द हुआ, और फिर एक के बाद दूसरी रेल कम्पनियों का चक्का जाम होता चला गया। और आख़िरकार एक छोटा-सा स्थानीय उभार इतिहास में उस समय तक ज्ञात सबसे बड़ी रेल हड़ताल बन गया। दूसरे उद्योग भी उसमें शामिल हो गये और कई इलाक़ों में यह रेल-हड़ताल एक आम हड़ताल में तब्दील हो गयी।
पहली बार सरकार और साथ ही मालिकों को भी पता चला कि मज़दूर की ताक़त क्या हो सकती है। उन्होंने पुलिस और फौज बुलायी; जगह-जगह जासूस तैनात किये गये। कई जगहों पर जमकर लड़ाइयाँ हुईं। सेण्ट लुई में नागरिक प्रशासन के अधिकारियों ने हथियार डाल दिये और नगर मज़दूर वर्ग के हवाले कर दिया। उन लोमहर्षक उभारों में कितने हताहत हुए होंगे, उन्हें आज कोई नहीं गिन सकता। परन्तु हताहतों की संख्या बहुत बड़ी रही होगी, इस पर कोई भी, जिसने तथ्यों का अध्ययन किया है, सन्देह नहीं कर सकता।
हड़ताल आख़िरकार टूट गयी। परन्तु अमरीकी मज़दूरों ने अपनी भुजाएँ फैला दी थीं और उनमें नयी जागरूकता का संचार हो रहा था। प्रसव-वेदना समाप्त हो चुकी थी और अब वह वयस्क होने लगा था।
अगला दशक संघर्ष का दौर था, आरम्भ में अस्तित्व का संघर्ष और फिर संगठन बनाने का संघर्ष। सरकार ने 1877 को आसानी से नहीं भुलाया; अमेरिका के अनेक शहरों में शस्त्रागारों का निर्माण होने लगा; मुख्य सड़कें चौड़ी की जाने लगीं, ताकि ”गैटलिंग” मशीनगनें उन्हें अपने नियन्त्रण में रख सकें। एक मज़दूर-विरोधी प्राइवेट पुलिस संगठन ”पिंकरटन एजेंसी” का गठन किया गया, और मज़दूरों के ख़िलाफ उठाये गये क़दम अधिक से अधिक दमनकारी होते चले गये। वैसे तो अमेरीका में दुष्प्रचार के तौर पर ”लाल ख़तरे” शब्द का इस्तेमाल 1830 के दशक से ही होता चला आया था, लेकिन उसे अब एक ऐसे डरावने हौवे का रूप दे दिया गया, जो आज प्रत्यक्ष तौर पर हमारे सामने है।
परन्तु मज़दूरों ने इसे चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उन्होंने भी अपने भूमिगत संगठन बनाये। भूमिगत रूप में जन्मे संगठन नाइट्स ऑफ लेबर के सदस्यों की संख्या 1886 तक 7,00,000 से ज़्यादा हो गयी थी। नवजात अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर का मज़दूर यूनियनों की स्वैच्छिक संस्था के रूप में गठन किया गया, समाजवाद जिसके लक्ष्यों में एक लक्ष्य था। यह संस्था बहुत तेज़ रफ़्तार से विकसित होती चली गयी। यह वर्ग-सचेत और जुझारू थी और अपनी माँगों पर टस-से-मस न होने वाली थी। एक नया नारा बुलन्द हुआ। एक नयी, दो टूक, सुस्पष्ट माँग पेश की गयी : ”आठ घण्टे काम, आठ घण्टे आराम, आठ घण्टे मनोरंजन”।
1886 तक अमेरिकी मज़दूर नौजवान योद्धा बन चुका था, जो अपनी ताक़त परखने के लिए मौक़े की तलाश कर रहा था। उसका मुक़ाबला करने के लिए सरकारी शस्त्रागारों का निर्माण किया गया था, पर वे नाकाफी थे। ”पिंकरटनों” का प्राइवेट पुलिस दल भी काफी नहीं था, न ही गैटलिंग मशीनगनें। संगठित मज़दूर अपने क़दम बढ़ा रहा था, और उसका एकमात्र जुझारू नारा देश और यहाँ तक कि धरती के आर-पार गूँज रहा था : ”एक दिन में आठ घण्टे का काम — इससे ज़रा भी ज़्यादा नहीं!”
1886 के उस ज़माने में, शिकागो जुझारू, वामपक्षी मज़दूर आन्दोलन का केन्द्र था। यहीं शिकागो में संयुक्त मज़दूर प्रदर्शन के विचार ने जन्म लिया, एक दिन जो उनका दिन हो किसी और का नहीं, एक दिन जब वे अपने औज़ार रख देंगे और कन्धे से कन्धा मिलाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेंगे।
पहली मई को मज़दूर वर्ग के दिवस, जनता के दिवस के रूप में चुना गया। प्रदर्शन से काफी पहले ही ”आठ घण्टा संघ” नाम की एक संस्था गठित की गयी। यह आठ घण्टा संघ एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर, नाइट्स ऑफ लेबर और समाजवादी मज़दूर पार्टी शामिल थे। शिकागो की सेण्ट्रल लेबर यूनियन भी, जिसमें सबसे अधिक जुझारू वामपक्षी यूनियनें शामिल थीं, इससे जुड़ी थी।
शिकागो से हुई शुरुआत कोई मामूली बात नहीं थी। ”मई दिवस” की पूर्ववेला में एकजुटता के लिए आयोजित सभा में 25,000 मज़दूर उपस्थित हुए। और जब ”मई दिवस” आया, तो उसमें भाग लेने के लिए शिकागो के हज़ारों मज़दूर अपने औज़ार छोड़कर फैक्टरियों से निकलकर मार्च करते हुए जनसभाओं में शामिल होने पहुँचने लगे। और उस समय भी, जबकि ”मई दिवस” का आरम्भ ही हुआ था, मध्य वर्ग के हज़ारों लोग मज़दूरों की क़तारों में शामिल हुए और समर्थन का यह स्वरूप अमेरिका के कई अन्य शहरों में भी दोहराया गया।
और आज की तरह उस वक्त भी बड़े पूँजीपतियों ने जवाबी हमला किया — रक्तपात, आतंक, न्यायिक हत्या को ज़रिया बनाया गया। दो दिन बाद मैकार्मिक रीपर कारख़ाने में, जहाँ हड़ताल चल रही थी, एक आम सभा पर पुलिस ने हमला किया। उसमें छह मज़दूरों की हत्या हुई। अगले दिन इस जघन्य कार्रवाई के विरुद्ध हे मार्केट चौक पर जब मज़दूरों ने प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन पर फिर हमला किया। कहीं से एक बम फेंका गया, जिसके फटने से कई मज़दूर और पुलिसवाले मारे गये। इस बात का कभी पता नहीं चल पाया कि बम किसने फेंका था, इसके बावजूद चार अमेरिकी मज़दूर नेताओं को फाँसी दे दी गयी, उस अपराध के लिए, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं था और जिसके लिए वे निर्दोष सिद्ध हो चुके थे।
इन वीर शहीदों में से एक, ऑगस्ट स्पाइस, ने फाँसी की तख्ती से घोषणा की :
”एक वक्त आयेगा, जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज़्यादा ताक़तवर सिद्ध होगी, जिनका तुम आज गला घोंट रहे हो।” समय ने इन शब्दों की सच्चाई को प्रमाणित कर दिया है। शिकागो ने दुनिया को ”मई दिवस” दिया, और इस बासठवें मई दिवस पर करोड़ों की संख्या में एकत्र दुनियाभर के लोग ऑगस्ट स्पाइस की भविष्यवाणी को सच साबित कर रहे हैं।
शिकागो में हुए प्रदर्शन के तीन वर्ष बाद संसारभर के मज़दूर नेता बास्तीय किले पर धावे (जिसके साथ फ़्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआत हुई) की सौवीं सालगिरह मनाने के लिए पेरिस में जमा हुए। एक-एक करके, अनेक देशों के नेताओं ने भाषण दिया।
आख़िर में अमेरीकियों के बोलने की बारी आयी। जो मज़दूर हमारे मज़दूर वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा था, खड़ा हुआ और बिल्कुल सरल और दो टूक भाषा में उसने आठ घण्टे के कार्यदिवस के संघर्ष की कहानी बयान की जिसकी परिणति 1886 में हे मार्केट का शर्मनाक काण्ड था।
उसने हिंसा, ख़ूंरेज़ी, बहादुरी का जो सजीव चित्र पेश किया, उसे सम्मेलन में आये प्रतिनिधि वर्षों तक नहीं भूल सके। उसने बताया कि पार्सन्स ने कैसे मृत्यु का वरण किया था, जबकि उससे कहा गया था कि अगर वह अपने साथियों से ग़द्दारी करे और क्षमा माँगे तो उसे फाँसी नहीं दी जायेगी। उसने श्रोताओं को बताया कि कैसे दस आयरिश ख़ान मज़दूरों को पेनसिल्वेनिया में इसलिए फाँसी दी गयी थी कि उन्होंने मज़दूरों के संगठित होने के अधिकार के लिए संघर्ष किया था। उसने उन वास्तविक लड़ाइयों के बारे में बताया जो मज़दूरों ने हथियारबन्द ”पिंकरटनों” से लड़ी थीं, और उसने और भी बहुत कुछ बताया। जब उसने अपना भाषण समाप्त किया तो पेरिस कांग्रेस ने निम्नलिखित प्रस्ताव पास किया :
”कांग्रेस फैसला करती है कि राज्यों के अधिकारियों से कार्य दिवस को क़ानूनी ढंग से घटाकर आठ घण्टे करने की माँग करने के लिए और साथ ही पेरिस कांग्रेस के अन्य निर्णयों को क्रियान्वित करने के लिए समस्त देशों और नगरों से मेहनतकश अवाम एक निर्धारित दिन एक महान अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन संगठित करेंगे। चूँकि अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर पहली मई 1890 को ऐसा ही प्रदर्शन करने का फैसला कर चुका है, ”अत: यह दिन अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए स्वीकार किया जाता है। विभिन्न देशों के मज़दूरों को प्रत्येक देश में विद्यमान परिस्थितियों के अनुसार यह प्रदर्शन अवश्य आयोजित करना चाहिए।”
तो इस निश्चय पर अमल किया गया और ”मई दिवस” पूरे संसार की धरोहर बन गया। अच्छी चीज़ें किसी एक जनता या राष्ट्र की सम्पत्ति नहीं होतीं। एक के बाद दूसरे देश के मज़दूर ज्यों-ज्यों मई दिवस को अपने जीवन, अपने संघर्षों, अपनी आशाओं का अविभाज्य अंग बनाते गये, वे मानकर चलने लगे कि यह दिन उनका है  और यह भी सही है, क्योंकि पृथ्वी पर मौजूद समस्त राष्ट्रों के बरक्स हम राष्ट्रों का राष्ट्र हैं, सभी लोगों और सभी संस्कृतियों का समुच्चय हैं।
और आज के मई दिवस की क्या विशेषता है
पिछले मई दिवस गत आधी शताब्दी के संघर्षों को प्रकाश-स्तम्भों की भाँति आलोकित करते हैं। इस शताब्दी के आरम्भ में मई दिवस के ही दिन मज़दूर वर्ग ने परायी धरती को हड़पने की साम्राज्यवादी कार्रवाइयों की सबसे पहले भर्त्सना की थी। मई दिवस के ही अवसर पर मज़दूरों ने नवजात समाजवादी राज्य सोवियत संघ का समर्थन करने के लिए आवाज़ बुलन्द की थी। मई दिवस के अवसर पर ही हमने अपनी भरपूर शक्ति से असंगठितों के संगठन का समारोह मनाया था।
लेकिन बीते किसी भी मई दिवस पर कभी ऐसे अनिष्टसूचक लेकिन साथ ही इतने आशा भरे भविष्य-संकेत नहीं दिखायी दिये थे, जितना कि आज के मई दिवस पर हो रहा है। पहले कभी हमारे पास जीतने को इतना कुछ नहीं था, पहले कभी हमारे खोने को इतना कुछ नहीं था।
जनता के लिए अपनी बात कह पाना आसान नहीं है। लोगों के पास अख़बार या मंच नहीं है, और न ही सरकार में शामिल हमारे चुने गए प्रतिनिधियों की बहुसंख्या जनता की सेवा करती है। रेडियो जनता का नहीं है और न फिल्म बनाने वाली मशीनरी उसकी है। बड़े कारोबारों की इज़ारेदारी अच्छी तरह स्थापित हो चुकी है, काफी अच्छी तरह — लेकिन लोगों पर तो किसी का एकाधिकार नहीं है।
जनता की ताक़त उसकी अपनी ताक़त है। मई दिवस उसका अपना दिवस है, अपनी यह ताक़त प्रदर्शित करने का दिन है। क़दम से क़दम मिलाकर बढ़ते लाखों लोगों की क़तारों के बीच अलग से एक आवाज़ बुलन्द हो रही है। यह वक्त है कि वे लोग, जो अमरीका को फासिज्म के हवाले करने पर आमादा हैं, इस आवाज़ को सुनें।
उन्हें यह बताने का वक्त है कि वास्तविक मज़दूरी लगभग पचास प्रतिशत घट गयी है, कि घरों में अनाज के कनस्तर ख़ाली हैं, कि यहाँ अमेरिका में अधिकाधिक लोग भूख की चपेट में आ रहे हैं।
यह वक्त है श्रम विरोधी क़ानूनों के ख़िलाफ आवाज़ बुलन्द करने का। दो सौ से ज़्यादा श्रम विरोधी क़ानूनों के विधेयक कांग्रेस के समक्ष विचाराधीन आ रहे हैं, जो यकीनन मज़दूरों को उसी तरह तोड़ डालने के रास्ते खोल देंगे, जिस तरह हिटलर के नाज़ीवाद ने जर्मन मज़दूरों को तोड़ डाला था।
संगठित अमेरिकी मज़दूरों के लिए आँख खोलकर यह तथ्य देखने का वक्त आ गया है कि यह मज़दूरों की एकता क़ायम करने की आख़िरी घड़ी है वरना बहुत देर हो जायेगी और एकताबद्ध करने के लिए संगठित मज़दूर रहेंगे ही नहीं।
आप यहाँ पढ़ रहे हैं गाथा, उन लोगों की जो बारह से पन्द्रह घण्टे रोज़ काम करते थे, आप पढ़ रहे हैं गाथा, उस सरकार की, जो आतंक और निषेधाज्ञाओं के बल पर चल रही है।
यह है उन लोगों का लक्ष्य, जो आज श्रमिकों को चकनाचूर करना चाहते हैं। वे अपने ”अच्छे” दिनों को फिर वापस लाना चाहते हैं। इसका सबूत यूनाइटेड माइन के खनिक मज़दूरों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। आप जब मई दिवस के अवसर पर मार्च करेंगे तो आप उन्हें अपना जवाब देंगे।
वक्त आ गया है यह समझने का कि ”अमरीकी साम्राज्य” के आह्वान का, यूनान, तुर्की और चीन में हस्तक्षेप से क्या रिश्ता है! साम्राज्य की क़ीमत क्या है? जो दुनिया पर राज कर दुनिया को ”बचाने” के लिए चीख़ रहे हैं, उन्हें दूसरे साम्राज्यों के अंजाम को याद करना चाहिए। उन्हें यह आँकना चाहिए कि ज़िन्दगी और धन दोनों अर्थों में युद्ध की क्या क़ीमत होती है।
वक्त आ गया है यह देखने के लिए जाग उठने का कि कम्युनिस्टों के पीछे शिकारी कुत्ते छोड़े जाने का क्या अर्थ है? क्या एक भी ऐसा कोई देश है, जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी को ग़ैरक़ानूनी घोषित किया जाना फासिज्म की पूर्वपीठिका न रहा हो? क्या ऐसा कोई एक भी देश है, जहाँ कम्युनिस्टों को रास्ते से हटाते ही मज़दूर यूनियनों को चकनाचूर न कर दिया गया हो?
वक्त आ गया है कि हम हालात की क़ीमत को समझें। कम्युनिस्टों को प्रताड़ित करने के अभियान की क़ीमत था संगठित मज़दूरों को ठिकाने लगाना — उसकी क़ीमत है फासिज्म। और आज ऐसा कौन है, जो इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि फासिज्म की क़ीमत मौत है?
मई दिवस इस देश के समस्त स्वतन्त्रताप्रिय नागरिकों के लिए प्रतिगामियों को जवाब देने का वक्त है। मार्च करते जा रहे लाखों-लाख लोगों की एक ही आवाज़ बुलन्द हो रही है — मई दिवस प्रदर्शन में हमारे साथ आइये और मौत के सौदागरों को अपना जवाब दीजिये।

Tuesday, April 30, 2013

अन्तरराष्ट्रीय मकादूर दिवस

क्रान्तिकारी विरासत से सबक लेकर आगे का रास्ता गढऩा ही मई दिवस मनाने का एक सही तरीका
लुधियाना के पुडा मैदान में मई दिवस सम्मेलन 
सभी मकादूरों-मेहनतकशों-नौजवानों से सम्मेलन में शामिल होने के लिए पुरजोर अपील
लुधियाना।30 अप्रेल 2013: दुनियाभर के मकादूरों-मेहनतकशों को हर तरह के शोषण के खिलाफ एकजुट लड़ाई छेडऩे का आह्वान करने वाला अन्तरराष्ट्रीय मकादूर दिवस कल पूरे विश्व में मनाया जाएगा।  128वें अन्तरराष्ट्रीय मकादूर दिवस के अवसर, कल सुबह 10 बजे कारखाना मकादूर यूनियन, पंजाब व टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन, पंजाब द्वारा लुधियाना के चण्डीगढ़ सडक़ पर पुडा (गलाडा) मैदान में मई दिवस सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। टेक्सटाइल हौजरी कामगर यूनियन के अध्यक्ष साथी राजविन्दर ने बताया कि मई दिवस सम्मेलन में बड़ी संख्या में मकादूर-मेहनतकश-नौजवान शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि मई दिवस सम्मेलन का आयोजन कोई अनुष्ठान को तौर पर नहीं किया जा रहा बल्कि इसके पीछे उनका एक अहम मकसद है। आज मेहनत करने वाले लोगों का चारों ओर से भयंकर रूप से शोषण-उत्पीडऩ हो रहा है। इसके खिलाफ जनता का कोई बड़ा इमानदार आन्दोलन नहीं है। ऐसे समय में अपनी क्रान्तिकारी विरासत को याद करना, उससे पे्ररणा व सबक लेकर मौजूदा हालातों को बदलने के लिए आगे का रास्ता गढऩा ही मई दिवस मनाने का एक सही तरीका हो सकता है। उन्होंने कहा कि मई दिवस सम्मेलन इसी रूप में मनाया जाएगा।
मई दिवस सम्मेलन में मकादूर संगठनों के नेतृत्वकारी साथी मई दिवस आन्दोलन के इतिहास और इस आन्दोलन की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर बात रखेंगे। सम्मेलन में देश व विश्व के आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक हालातों पर बात की जाएगी। आज जब सारी व्यवस्था सिर से पैर तक सड़ चुकी है उस समय शोषितों-उत्पीडि़तों को आज कौन सा रास्ता चुनना होगा इस पर वक्ता अपनी बात रखेंगे।
साथी राजविन्दर ने बताया कि मई दिवस पर वोट-बटोरू पार्टियों से जुड़े बहुत से संगठन लड़कियाँ नचवा कर तथा फूहड़ किस्म के गायकों के जरिए भीड़ जुटा कर मई दिवस ''मनाने का ढोंग रचते हैं तथा मई दिवस की गरिमा को धूमिल करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि मई दिवस सम्मेलन इसका विरोध करते  हुए मई दिवस की क्रान्तिकारी परम्पराओं को आगे बढ़ाएगा। सम्मेलन में क्रान्तिकारी-प्रगतिशील नाटकों-गीतों का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होगा। उन्होंने कहा कि आज के समय में जनता को परोसी जा रही गन्दी, भौंडी, उपभोक्तावादी संस्कृति का विकल्प पेश किया जाना बेहद जरूरी है।
कारखाना मकादूर यूनियन व टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन ने सभी परिवर्तनकामी मकादूरों-मेहनतककशों-नौजवानों को मई दिवस सम्मेलन में बढ़-चढक़र शामिल होने की अपील की है।
लखविन्दर,
अध्यक्ष, कारखाना मकादूर यूनियन, पंजाब।
फोन नं.- 9646150249


Monday, April 29, 2013

मई महीने के रंगीन त्यौहार

फूलों, रंगों और संगीत के कई त्यौहार
                                                                 फ़ोटोः रिया नोवस्ती
मई महीने के पहले दशक में रूसी शहरों में रंगों और संगीत के कई त्यौहार मनाए जाएँगे। आजकल रूस के निवासी रंगों के भारतीय त्यौहार, होली को भी बड़े उत्साह से मनाते हैं। रूस के विभिन्न नगरों में होली के त्यौहार को मनाने का सिलसिला मार्च माह के अंत में ही शुरू हो गया था जो अप्रैल माह से गुज़रता हुआ मई माह में पहुँच जाएगा। आम तौर पर रूस में मई महीने का पहला दशक फूलों, रंगों और संगीत के कई त्यौहारों के रूप में मनाया जाता है। एक मई को श्रम दिवस और नौ मई को विजय दिवस मनाया जाएगा। इसके अलावा साबुन के बुलबुलों का त्यौहार और अंतर्राष्ट्रीय संगीत त्यौहार भी मनाए जाएंगे और रूसी हस्तशिल्प कला के एक प्रदर्शनी-मेले का आयोजन भी किया जाएगा। इस प्रकार, मई महीने के पहले दशक के दौरान रूस के नगरों, कस्बों और गाँवों का माहौल रंगों, फूलों और संगीत से भरपूर रहेगा।

इस साल, 5 मई को मास्को में रंगों का भारतीय त्यौहार, होली फिरसे मनाया जाएगा। हज़ारों की संख्या में लोग एक दूसरे पर रंग और गुलाल डालेंगे। दुनिया का सबसे रंगीन त्यौहार है यह! मास्को में यह उत्सव पूरा दिन जारी रहेगा।

रूस की राजधानी में ही एक अन्य उज्ज्वल और ख़ुशियों-भरा त्यौहार मनाया जाएगा। देश भर से रूसी कारीगरों की हस्तशिल्प कला की एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जाएगा। इस प्रदर्शनी-मेले में विचित्र खिलौनों से लेकर घरेलू उपयोग की वस्तुओं तक, कई प्रकार की अद्भुत शिल्प कला-कृतियाँ न केवल देखी जा सकेंगी बल्कि, अगर कोई चाहे तो इन्हें ख़रीद भी सकेगा। इसके अलावा, आप "कारीगरों की नगरी" में जाकर कुछ ही घंटों में इन कला-कृतियों को बनाने के गुर सीख सकेंगे। इस प्रदर्शनी-मेले के दौरान संगीत कार्यक्रमों, राष्ट्रीय वेशभूषा की प्रदर्शनियों और लोक-नृत्यों के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इसके अलावा, आगुन्तकों को रूसी व्यंजनों का ज़ायका लेने का भी अवसर मिलेगा।

इन सभी त्यौहारों के दौरान आकाश में रंग-बिरंगे गुब्बारे छोड़े जाने की परंपरा है। यह एक बहुत ही सुन्दर नज़ारा होता है। गुब्बारे आसमान में उड़ते-उड़ते पता नहीं कहाँ अलोप हो जाते हैं। इस वर्ष रूस के दूसरे सबसे बड़े नगर सेंट-पीटर्सबर्ग में साबुन के बुलबुले आकाश में छोड़ने का त्यौहार मनाया जाएगा। इस दिन रूस की उत्तरी राजधानी "साबुन के बुलबुलों की नगरी" में बदल जाएगी। इस के केंद्रीय पार्क में इस त्यौहार का उद्घाटन समारोह आयोजित किया जाएगा। इस त्यौहार में हिस्सा लेने की सभी लोगों को अनुमति दी जाएगी। सिर्फ़ एक ही अनिवार्य शर्त होगीः इसके भागीदारों को उज्ज्वल कपड़े या यहाँ तक कि कार्निवाल की पोशाकें पहननी होंगी और उनके हाथों में साबुन के पानी से भरा एक मर्तबान होना चाहिए। इस समारोह का प्रत्येक प्रतिभागी अपने सपने बुन सकता है। उसके मन में कोई उदासी सेंध नहीं लगा सकेगी और उसकी सभी समस्याएँ ऐसे ही ग़ायब हो जाएंगी जैसे साबुन के पानी का बुलबुला फट जाता है।

पूरे रूस में चटख-चमकीले रंगों का माहौल है। चारों तरफ़ रंग-बिरंगे फूल खिले हैं। वातावरण फूलों की सुगंधियों से तरो-ताज़ा है। और ऐसे माहौल में संगीत, मधुर संगीत के बिना मानो किसी रंग की कमी महसूस की जा रही है। संगीत के कार्यक्रमों की कमी। संगीत के बिना कोई त्यौहार कैसे मनाया जा सकता है? तो लीजिए, यह कमी भी पूरी हो गई! रूस के एक सबसे पुराने नगर यरोस्लावल में पाँचवीं बार अंतर्राष्ट्रीय संगीत समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस शहर और इसके आसपास के नगरों में कुछ दिनों तक विभिन्न देशों से आए आर्केस्ट्राओं और संगीत-मंडलियों द्वारा शास्त्रीय संगीत लगातार पेश किया जाएगा। यदि मनुष्य के जीवन में चटख-चमकीले रंगों, फूलों की खुशबू और मधुर संगीत का बोलबाला हो तो उसके लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है?  (
रेडिओ  रूस)

Sunday, April 21, 2013

मकादूर संगठन करेंगे मई दिवस सम्मेलन का आयोजन

पुडा मैदान में होगा मई दिवस सम्मेलन
लुधियाना:21 अप्रेल 2013: (*लखविन्दर): कारखाना मकादूर यूनियन और टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन की ओर से मई दिवस के महान दिन पर कारखाना मकादूर यूनियन और टेक्सटाइल हौजरी कामगार यूनियन की ओर से लुधियाना के पुडा मैदान में मई दिवस सम्मेलन किया जाएगा। यह फैसला आज सुरपाल पार्क, फोकल प्वाइण्ट, लुधियाना में दोनों संगठनों के प्रतिनिधियों की हुई साझी मीटिंग में किया गया। सम्मेलन में मई दिवस आन्दोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। मौजूदा समय में जब मकादूरों-मेहनतकशों की लूट-खसूट तीखी से तीखी होती जा रही है, मई दिवस आन्दोलन की प्रासंगिकता के बारे में और इन हालातों को बदलने की राह के बारे में सम्मेलन में विस्तार से चर्चा की जाएगी। सम्मेलन में क्रान्तिकारी नाटक व गीत भी पेश किए जाएँगे।

टेक्सटाइल-हौजरी कामगार यूनियन के अध्यक्ष राजविन्दर ने कहा कि एक पर्चा बड़े स्तर पर मजदूरों में वितरित किया जाएगा व मीटिंगों-नुक्कड़ सभाओं आदि माध्यमों के जरिए लोगों तक मई दिवस आन्दोलन की शिक्षाओं को पहुँचाया जाएगा और उन्हें मई दिवस सम्मेलन में शामिल होने की अपील की जाएगी। उन्होंने कहा कि मई दिवस की यह इतिहासिक शिक्षा है कि लूटे-खसूटे लोगों को हक तभी हासिल होते हैं जब वे जागृत होकर, एकजुट संघर्ष लड़ते हैं। बिना एकजुट हुए, बिना संघर्ष, बिना कुर्बानियों के कोई हक नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि यह एक विडम्बना है कि 127 वर्ष से दुनिया भर में मई दिवस मनाया जा रहा है लेकिन हमारे देश के अधिकतर मकादूर इस दिन के महत्व के बारे में नहीं जानते। उन्होंने कहा कि जब काम के घण्टे कानूनी तौर पर तय नहीं थे, जब मकादूरों का काम पर जाने का समय तो होता था लेकिन घर लौटने का कोई समय नहीं होता था, जब मकादूर 14-16 घण्टे तक काम करने पर मकाबूर थे, उस समय मकादूरों ने आठ घण्टे दिहाड़ी का कानून बनवाने के लिए संघर्ष की शुरुआत की। भारत में भी 1862 में मकादूरों ने इस माँग को लेकर हड़ताल की थी। लेकिन पहली बार बड़े स्तर पर 1 मई 1886 के दिन अमेरिका में इस माँग को लेकर हड़ताल हुई। शिकागो के मकादूरों को सरकार के बरबर जुल्म का सामना करना पड़ा। लेकिन मकादूर जुल्म के आगे न झुके। यह संघर्ष पूरे संसार में फैला। आगे चलकर सारे संसार की सरकारों को आठ घण्टे दिहाड़ी का कानून बनाना पड़ा। ''कम्युनिस्ट इण्टरनेश्नलÓÓ के ऐलान के बाद सन् 1890 से 1 मई का दिन हर वर्ष अन्तरराष्ट्रीय मकादूर दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है।
राजविन्दर ने कहा कि मकादूरों ने जो हक असंख्य कुर्बानियों के जरिए हासिल किए थे वे फिर से दुनिया भर में छीने जा रहे हैं। हमारे देश में 93 प्रतिशत मकादूर वे हैं जिन्हें कार्यस्थल पर कानून अधिकार हासिल नहीं होते। न तो उन्हें 8 घण्टे दिहाड़ी का अधिकार हासिल है और न ही न्यूनतम वेतन, पहचान पत्र, हाजिरी कार्ड, ई.एस.आई. इ.पी.एफ., हादसों व बीमारियों की रोकथाम के प्रबन्ध, हादसे व बीमारियों की सूरत में मुआवजा, साप्ताहिक व अन्य छुट्टियों सहित लगभग सबी कानूनी अधिकार हासिल नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर ये अधिकार लागू हो जाएँ तो कुछ हद तक मकादूरों को राहत मिल सकती है। लेकिन देश का पूँजीपति वर्ग ये अधिकार भी उन्हें देने के लिए तैयार नहीं। मई दिवस अन्दोलन से प्रेरणा व शिक्षा लेकर देश के मकादूर वर्ग के हक हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर लामबन्द होना होगा। उन्होंने कहा कि ज्यों-ज्यों मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था का देश और विश्व स्तर पर आर्थिक संकट गहराता जा रहा है,  त्यों-त्यों जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ाया जा रहा है। इसके कारण जनता में रोष भी बढ़ता जा रहा है। इन हालातों से निपटने के लिए जनता को धर्म, जाति, क्षेत्र, राष्ट्र के नाम पर बाँटने और जनता कों आपसे में लड़ाने-मराने की साजिशें तेज होती जा रही हैं। ऐसे समय में मई दिवस की शिक्षाओं को मकादूरों-मेहनतकशों तक लेकर जाने की सख्त जरूरत है।
राजविन्दर ने सभी मकादूरों, मेहनतकशों, इंसाफपसंद नागरिकों को मई दिवस सम्मेलन में पहुँचने की अपील की है।

लखविन्दर कारखाना मकादूर यूनियन, पंजाब के अध्यक्ष हैं -----Mobile Number है--फोन-9646150249

Tuesday, May 01, 2012

हम सारी दुनिया मांगेंगे

मजदूरों को उनके निशाने की याद दिलाता एक गीत 
मई दिवस को मनाने की तैयारियां इस बार भी पूरे जोशो खरोश के साथ की गयी हैं.मीडिया में इस बार भी मई दिवस की चर्चा प्रमुखता से हुयी है. इस बार भी नए पुराने कई मुद्दे उठे हैं.पर आज के दिन भी ढाबों में छोटी छोटी उम्र के बच्चे काम करते नजर आये. रिक्शा वाले आज भी पसीना बहते दिखे. और तो और जग्रुक्लता लेन वाले बहुत से पत्रकार भी रोज़ की तरह उब लोगों के लिए खबरें बनाते नजर आये जिन्हें न समाज से कोई सरिकर है और न ही मई दिवस या मजदूरी से.  इस लिए आज के दिन पर फिल्म मजदूर का यह गीत एक बार फिर बहुत कुछ कहता महसूस हो रहा है. लीजिये आप भी सुनिए.आपको यह गीत कैसा लगा और आप आज के दिन पर मजदूरों की हालत पर क्या क्या 
सोचते हैं ? इस सब पर सारे हालात को देखते भी रहे औरलिखते भी रहे. हम मई दिवस के बाद भी इस तरह की सामग्री को प्रकाशित करते रहेंगे आपके नाम के साथ. अगर आप कहेंगे तो आपका नाम  छुपाया भी जा सकता है.-रेक्टर कथूरिया