Showing posts with label Poetry. Show all posts
Showing posts with label Poetry. Show all posts

Saturday, June 28, 2025

एक अधूरी आवाज़, एक ठहरी हुई चुप्पी

From Human Emotional State On Friday at 11:19 PM, 27th June, 2025, updated on 28th June, 2025 at 08:59 PM.

‘इंतज़ार में आ की मात्रा’ के आसपास की दुनिया


चंडीगढ़
: 27 जून, 2025 : (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन डेस्क):: 

प्रेम को धैर्य की दरकार होती है... !!! काफ़ी देर बाद जब एक सुन्दर किताब पढ़ी जाती है तो, .... तो उस धैर्य में लिपटे प्रेम की बात ही अलग होती है। तो, ऐसा कुछ नहीं है मेरे पास कहने के लिए, लेकिन इस विषय पर संवाद करने की ख़्वाहिश हरदम शिद्दत से कायम रहती है।  

इसी सिलसिले में, लगभग दो महीने पहले एक किताब मिली, और उसी दिन से उसे लेकर लिखने के बारे में सोच रही हूँ। लेकिन आज जा कर लिख पा रही हूँ। कई बार सोचा कि जब पूरी पढ़ लूँगी, तभी कुछ कहूँगी, तभी इसके बारे में लिखूंगी। मात्रा में 

लेकिन कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिन्हें चाहकर भी पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सकता। आख़िरी पन्ने तक पहुंचने के बाद भी आप फिर से किसी एक कविता, एक पंक्ति, या एक शब्द के पास वापिस लौट हैं, उसके साथ इस तरह जुड़ जायेंगे, जैसे कि वो आपके लिए ही लिखा गया हो।

किताबों से इतर ये किताब आपके मन से होते हुए, कब आपकी सोच और रूह तक पहुँच जाएगी, इसे वक़्त की भाषा में समझा पाना मुश्किल है। शायद पलक झपकने से भी कम समय में यह आपके दिल पर एक छाप छोड़ जाएगी। 


'इंतज़ार में आ की मात्रा’ — नवीन रांगियाल जी का कविता संग्रह, जिसमें लगभग 170 कविताएँ हैं —
इन्हें पढ़ने के बाद आप वैसे नहीं रहते जैसे पहले थे।
एक नई-सी महसूस करने की ऊर्जा जैसे भीतर बहने लगती है।
बिना किसी हड़बड़ी के। बिना किसी जल्दबाज़ी के।

हर शब्द में एक सहजता है। एक सरलता है।
जैसे-जैसे आप पन्नों पर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे कभी लौट कर पिछले पन्ने भी टटोलने लगते हैं।
क्योंकि वहाँ कुछ छूटा हुआ सा लगता है — और वही “छूटा हुआ” सबसे ज़्यादा अपना लगता है।

कभी लगता था, कि मन भावनाओं का ज़ाल है। जिसके तले सारा ब्रह्माण्ड समा सकता है, और शायद शब्द इस भावनाओं को बताने और जताने के रास्ते कम, पर बोझ ज़्यादा लगते हैं। 
वैसे ही जैसे, जब आपके पास बहुत कुछ होता है कहने के लिए, पर बताना नहीं आता। जाहिर करना नहीं आता। 

पर अगर शब्द इन कविताओं जितने ही सरल और सहज होते हुए, एक असीम और गहरा अर्थ छुपाये हुए हों, तो उन्हें बयां किया जा सकता है। 

खैर, 'इंतज़ार में आ की मात्रा' - कविताओं का ये संग्रह आपको भावनाओं के हर क्षितिज पर लेकर जायेगा। नवीन जी पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर, नई दुनिया, लोकमत, वेबदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ जुड़ चुके हैं।
इन प्रोफ़ेशनल परिचयों से इतर — वे कमाल के कवि और लेखक हैं।

मुझे नहीं पता कविताओं ने उन्हें ढूँढा या उन्होंने कविताओं को, पर उनके द्वारा लिखी हर कविता, हर प्रोज, हर शब्द आत्मीयता की गंध समाये हुए हैं। जैसे कि वो लिखते हैं —

"ये दुनिया तब तक चलती रहेगी, जब तक हम एक-दूसरे से मिलने जाते रहेंगे।"

और उस कविता में:

दुनिया में सबकुछ सही चल रहा है
जहां कहना था, वहां चुप्पियां रख दी गईं
जहां रोकना था, वहां जाने दिया
हर जगह सही बात कही और सुनी गई
सभी ने अपने लिए सबसे सही को चुना
सबकुछ सही तरीके से रखा गया
कहीं भी कोई गलती नहीं की गई
नतीजतन, सारे हाथ गलत हाथों में थे
सारे पांव गलत दिशाओं में चले गए
दुनिया में सारे फैसले सही थे 
इसलिए सारे सफ़र ग़लत हो गए।

जिंदगी और नौकरी की दुश्वारियों में -- कला का सृजन बेहद अद्भुत है। इस अनुभूति की अभिव्यक्ति करना ही जैसे नविन का मुख्य पेशा हो। वो दिल के ज़ज़्बातों को इतनी सरलता से आपके सामने रख देते हैं, जैसे कि वो शब्द आपके लिए ही लिखे गए हों। और लगता है, यही नवीन जी का असली पेशा है —

जो तुम्हारे लिए नहीं लिखा गया,
उसमें भी उपस्थित हो
और अदृश्य की तरह
मौजूद हो तुम
हर तरफ़
दूरी में बहुत दूर जैसे
ज़िंदगी में "न" की बिंदी
इश्क़ का आधा "श"
और इंतज़ार में "आ" की मात्रा की तरह। 

प्रेम और संवेदनाओं से आगे बढ़कर, वे आज के हालात के बारे में भी बखूबी लिखते हैं। 

सबसे पहने जबान काटी जाती है 
सबसे पहले रीढ़ तोड़ी जाती है 
फिर चाहे वो किसी आदमी की हो 
या हाथरस की किसी लड़की की हो 

और जब वह लिखते हैं —
"एक पंक्ति की प्रतीक्षा के लिए लंबे समय तक जिया जा सकता है,
एक पूरी रात काटी जा सकती है।
दो वाक्यों के बीच के कुछ भी न होकर एक आसान ज़िंदगी चुनी जा सकती है।"
तो दो अक्षरों और दो वाक्यों के बीच में रहना,
मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती। वे दो वाक्यों के बीच की 'ख़ामोशी' को भी कविता बना देते हैं।
उस खालीपन को जी लेना — शायद वही सबसे बड़ी कविता है।

आप इस किताब को Amazon, गूगल बुक्स या सेतु प्रकाशन के वेबपोर्टल से ऑनलाइन आर्डर कर सकते हैं। 
अगर आप साहित्य, शब्दों और ख़ास तौर पर कविताओं से प्रेम करते हैं तो इसे पढ़िए ज़रूर। 
उनकी दूसरी किताब भी जल्द ही आ रही है। 
आशा है, कि पत्रकार होते हुए, कवितायेँ ऐसे ही उनकी ज़िन्दगी में ख़बरों को ओवरटेक करती रहें।

Friday, December 25, 2020

अड़ियलपन में वाजपेयी के जन्मदिन का सुअवसर भी गंवाया

25th December 2020 at 4:41 PM

जन्मदिन भारत रत्न श्री वाजपेयी का-गुणगान मोदी साहिब का 

              भाजपा के सभी 25 मंडलों में हुए विशेष आयोजन:पुष्पेंद्र सिंगल              

लुधियाना: 25 दिसम्बर 2020: (पंजाब स्क्रीन डेस्क):: 


एनडीए गठबंधन के चलते पंजाब में संकट का एक ऐसा समय भी आया जब पंजाब भाजपा के कई वरिष्ठ नेता अपनी किसी विशेष मांग पर दबाव डालने के लिए अपना अपना इस्तीफा अकालीदल के वयोवृद्ध नेता मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पास पहुँच गए। माहौल ऐसा बन गया महसूस होता था जैसे कि  कम से कम पंजाब में तो आज जह गठबंधन टूट ही जायेगा और इसका असर भी देश भर में बहुत जल्नद नज़र आने लगेगा। लेकिन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल तीखे आक्रामक रुख में आए उन भाजपा नेताओं से बहुत ही भरे मन से बोले लो मेरा इस्तीफ़ा ले जाओ और श्री वाजपेयी जी को दे दो। वह जो कहेंगे मैं मान लूंगा।  सब आक्रोश ठंडा हो गया बात आई गई हो गई। बहुत बड़ा दिख रहा संकट पलों क्षणों में ही दूर हो गया।  आज की तरह अकाली दल के अलग होने की नौबत उस आक्रामक माहौल में भी नहीं आई।  अब तो अकालीदल हर रोज़ किसान मुद्दे पर मोदी सरकार और भाजपा को खरी खोटी सुना रहा है।

यह तस्वीर हिस्ट्री इन  कलर्ज़  से साभार 
आज किसान आंदोलन के चलते जो दरारें बढ़ती जा रही हैं उन्हें रोकने के लिए स्वर्गीय प्रधानमंत्रीअटल बिहारी वाजपेयी जैसा कोई करिश्मा भी नज़र नहीं आ रहा और वयोवृद्ध अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल भी केंद्र सरकार के राज हठ के सामने बेबस से नज़र आ रहे हैं।  किसान आंदोलन लगातार गंभीर होता जा रहा है लेकिन सत्ता उदासीन सी लगती है। क्या अम्बानी अडाणी के पैसे का जादू करोड़ों लोगों के दिमाग को बदलेगा?

इस नाज़ुक स्थिति में स्वर्गीय प्रधानमंत्री अटलबिहारीबादल को उनके जन्मदिन पर हुए अकालीदल के तेज़तर्रार नेता सुखबीर बादल ने भी पते की बात कही है। उन्होंने दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी जयंती पर याद करते हुए कहा कि मौजूदा एनडीए सरकार को श्री वाजपेयी के निर्धारित समावेशी शासन के उदाहरण सीखने की ज़रूरत इस नाज़ुक दौर में बेहद ज़्यादा है। सभी को अपने साथ लेकर चलने की जरूरत इस मौजूदा हालात में पहल्रे से कहीं ज़्यादा है। केंद्र सरकार को अपने दरवाजे पर असहनीय परिस्थिति में डेरा डाले हजारों पुरूषों, महिलाओं तथा बच्चों की पीड़ा को समाप्त करने के लिए संवेदना से काम लेते हुए कोई ठोस कार्य करना चाहिए और इसमें झूठी प्रतिष्ठा तथा अंहकार पर नहीं अड़ना चाहिए।

 आज वाजपेयी जी की छवि ज़रूरी हो गई है भाजपा को बचाने के लिए। मौजूदा दौर बेहद गंभीर है। इसे भाजपा नेता भी अंदर ही अंदर समझते हैं लेकिन खुल कर कोई बोल नहीं पा रहा है। जन्मदिन मनाया शायरी और संवेदना के महांरथी वाजपेयी  का लेकिन उस सुअवसर को भी केवल मोदी मोदी के गुणगान में बलि चढ़ा दिया। चाहिए था वाजपेयी की शायरी की चर्चा  होती। हर विचारधारा के शायर बुलाए जाते और शायरी को सहारा बना कर आम जनता और किसानों के साथ भाईचारा मज़बूत किया जाता लेकिन वह सब हर मंडल में एल ई डी की बड़ी बड़ी स्क्रीनें लगा कर दिखाई गई सियासी भाषणबाज़ी के शोर में निरथर्क कर दिया गया। न जाने भाजपा का थिंक थैंक क्या कर रहा या वह भी इतना बेबस हो गया है?

  यह तस्वीर इंडियन हिस्ट्री पिक्स से साभार
भारतीय जनता पार्टी जिला लुधियाना के जिला प्रधान पुष्पेंद्र सिंगल के दिशा निर्देशा अनुसार 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी का जन्मदिन लुधियाना भाजपा के सभी 25 मंडलों में मनाया गया व भाजपा के सभी 25 मंडलों में भाजपा लुधियाना के सीनियर नेताओं ने हर मंडल में श्री अटल बिहारी बाजपेयी के जीवन के बारे में प्रकाश डाला।  सभी ने श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पण कर उन्हें अपने अपने श्रद्धा सुमन भेट किये। इन मंडलों में भाजपा के सीनियर नेताओ जिनमे भाजपा पंजाब के महामंत्री जीवन गुप्ता, टिब्बा रोड मंडल में जिसके प्रधान जसदेव तिवारी, प्रभारी अमित डोगरा, भाजपा ज़िला सचिव नवल जैन, श्याम लाल फौजी, अमित रॉय कृष्ण कुमार तिवारी आदि उपस्थित रहे।

ऋषि नगर मंडल में जिला प्रधान पुष्पेंद्र सिंगल, मंडल के प्रधान प्रिंस भंडारी, प्रभारी अश्वनी बहल, जिला उपाध्यक्ष सुनील मौदगिल, किसान मोर्चा के पंजाब उपाध्यक्ष दविंदर सिंह घुम्मन, महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष मनिंदर कौर घुम्मन, एस सी मोर्चा के ज़िला प्रधान कुलविंदर सिंह, एस सी मोर्चा पंजाब के उपाध्यक्ष रवि बाली, कैलाश नगर में योगेंद्र मकोल जिसके प्रधान रोमी मल्होत्रा, ज़िला प्रेस सचिव डा.सतीश कुमार, फोकल पॉइंट मंडल में कुशाग्र कश्यप जिसके प्रधान तीर्थ तनेजा, प्रभारी नवल जैन, जमाल पुर मंडल में पवन शर्मा जिसके प्रधान भूपिंदर राय, कैलाश चौधरी मंडल प्रभारी, ताजपुरमंडल में बलबीर कमांडों जिसके प्रधान गुरदीप सिंह सोढ़ी, प्रभारी सुमित टंडन, ढाबा लोहारा मंडल में सुश्री रेनू थापर जिसके प्रधान पंकज शर्मा, प्रभारी तरनजीत सिंह, गयासपुर मंडल में नीरज वर्मा जिसके प्रधान सुरेश अग्रवाल, ढोलेवाल मंडल में सुनील मेहरा जिसके प्रधान केवल गर्ग प्रभारी आर डी शर्मा, जनता नगर मंडल में कांतेदु शर्मा जिसके मंडल प्रधान क्रांति डोगरा, प्रभारी किरण शर्मा,आतम नगर मंडल में रवि बाली जिसके प्रधान बलबीर सिंह बंटी, प्रभारी राजेश्वरी गोसाई, दुगरी नगर मंडल में अरुणेश मिश्रा जिसके प्रधान शिव राम गुप्ता, प्रभारी संदीप पूरी, किदवई नगर में यशपाल चौधरी जिसके प्रधान गुरप्रीत सिंह राजू, प्रभारी धर्मेंदर शर्मा, शिवजी नगर मंडल में सुभाष भाटिया जिसके प्रधान राजीव शर्मा, प्रभारी सुमन वर्मा, सुभानी बिल्डिंग मंडल में भाजपा पंजाब के खजांची गुरदेव शर्मा देबी जिसके प्रधान हरविंदर जॉली प्रभारी अंकित बत्रा, माधो पूरी मंडल में दिनेश सरपाल जिसके प्रधान हरीश शर्मा, प्रभारी मनमीत चावला, गुरुनानक पूरा मंडल में डिम्पी मक्कड़ जिसके प्रधान हरीश सग्गड़ प्रभारी पंकज जैन, दरेसी  मंडल में अशोक जुनेजा जिसके प्रधान विनय मित्तल प्रभारी यशपाल जनोत्रा,हैबोवाल मंडल में भूषण गयल जिसके प्रधान गौरव अरोड़ा, सलेम टाबरी मंडल में परवीन बंसल जिसके प्रधान दमन कपूर, प्रभारी महेश शर्मा, शिव पुरी मंडल में इन्दर अग्रवाल प्रधान यशपाल वर्मा, प्रभारी लकी शर्मा, एस बी एस नगर में अशोक लूम्बा जिसके प्रधान संजीव पूरी प्रभारी दीपक गोयल, घुमार मंडी में कमल चेतली जिसके प्रधान संदीप वधवा, प्रभारी हर्ष शर्मा,भारत नगर मंडल में एडवोकेट बिक्रम सिंह सिद्धू जिसके मंडल प्रधान राकेश जग्गी प्रभारी सुनील मौदगिल,अगर नगर मंडल में मदन मोहन व्यास जिसके प्रधान संजीव सचदेवा प्रभारी संजय गोसाई इसके इलावा हर मंडलों में प्रमुख कार्यकर्ताओं ने अपने अपने मंडलों में जाकर भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेंदर मोदी जी के विचारों को सुना।

                         सभी मंडलों के समस्त कार्यकर्ताओं ने उनको अपने भाव प्रेषित किए और उसके उपरांत प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता किसानों के प्रति दोहराई और  क्रमवार एक एक शंका निवारण किया। वह "राजनीतिक विरोधियों" द्वारा किए जा रहे "दुष्प्रचार" की पोल भी खोली और हर मंडलों में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री जी का संबोधन LED टी वी व् बड़ी स्क्रीनों पर सुना और "किसानों के हित के लिए काम करने वाले प्रधानमंत्री" का कोटी कोटी धन्यवाद भी किया। भाजपा जिला अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंगल ने कहा कि आज का दिन  25 दिसम्बर सुशासन दिवस के रूप में मनाया गया।  उन्होंने कहा की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। वे तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने। वे साल 1996 में पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने। वाजपेयी उन चुनिंदा नेताओं में से एक थे, जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, साथ ही उनकी दोस्ती पक्ष हो या विपक्ष हर किसी से हुई। उन्हें कभी भी नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने भारतीय राजनीति में स्थायी गठबंधन की राजनीति की शुरुआत करने के लिए भी जाना जाता है! अफ़सोस कि राजहठ, अहंकार और अड़ियलपन में भाजपा ने वाजपेयी के जन्मदिन का सुअवसर भी गंवा दिया। 

Sunday, April 19, 2020

कविता कथा कारवाँ ने कराया लॉक डाउन में भी विशेष आयोजन

पाँच दिन तक चला अंतर्राष्ट्रीय वैसाखी उत्सव 
लुधियाना: 18 अप्रैल 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
लॉक डाउन ने सभी को बांध रखा है। कोरोना से बचना है तो हर किसी का अपने अपने घर में रहना आवश्यक भी है। लेकिन न मन बंधता है न ही जज़्बात रुकते हैं। लॉक डाउन और कर्फ्यू का पालन करते हुए इस मनोस्थिति की शायरी का प्रस्तुतिकरन किया कविता कथा कारवां नामक संगठन ने। इस मकसद के लिए एक ऑनलाइन आयोजन करवाया गया जो पांच दिनों तक चला।  
   कविता कथा कारवाँ संस्था की ओर से सफलतापूर्वक आयोजित पाँच दिनों तक चलने वाले अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन बैसाखी उत्सव का समापन भी उसी शायराना ढंग से हुआ जिस तरह इसे शुरू किया गया था। कार्यक्रम के अंतिम पड़ाव में शामिल हुए पंजाबी फ़िल्म जगत के प्रख्यात कॉमेडियन डॉ जसविंदर भल्ला ने कहा कि इस वैश्विक आपदा के समय इस संस्था ने समाज को जोड़ने व पर्यावरण के कल्याण हेतु जो क़दम उठाया है इसके लिए संस्था की प्रेसिडैंट व समस्त सदस्य बधाई के पात्र हैं। पहले दिन के कार्यक्रम की अध्यक्षता पाकिस्तानी पार्लियामैंट की पूर्व मैंबर व मशहूर लेखिका बुशरा हज़ीन ने की व कार्यक्रम का आग़ाज़ सी टी यूनीवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉ जगतार धीमान ने अपनी कविता से किया। आरम्भ बहुत ही ज़बरदस्त रहा। वृद्ध शायरों के साथ साथ युवा उम्र के लोग भी शामिल हुए। लोग अलग अलग थे। उनके शहर भी अलग अलग थे। शायरी का अंदाज़ भी अलग था लेकिन आज के युग की स्थिति के दर्द को पकड़ने की सम्वेदना और कोशिश सभी की ज़बरदस्त थी। यूं कहिये कि एक से बढ़ का एक। 
   इस पाँच दिवसीय शायराना आयोजन में भिन्न -भिन्न शहरों, राज्यों,देशों व विदेशों के कवियों, कवयित्रियों, गायकों व बुद्धिजीवियों ने आज के हालातों को मद्देनज़र रखते हुए कविताओं व शायरी के ज़रिये अपनी मौजूदगी का अहसास कराया।
न कोई भीड़भाड़ और न ही कोई शोर। बस शायरी का सूक्ष्म सा अहसास, एक विशेष स्पंदन, एक ख़ास किस्म की झंकार--जिसे पूरी दुनिया में बैठे साहित्य प्रेमियों ने महसूस किया।
     इस अभियान में  मुख्य कवि-कवयित्रियाें में पाकिस्तान से बुशरा हज़ीन,राजवंत राज,कनाडा, जगपाल सिंह संधू(कैनेडा),त्रिलोचन लोची, गुरसेवक सिंह, परविंदर सिंह, मंजीत कौर धीमान, मंजीत इंदिरा, विभा कुमरिया शर्मा, रश्मि अस्थाना, परमजीत कौर महक, सरिता जैन, वरुन आनंद, सुमन शर्मा, अनु शर्मा, अनु पुरी, सतविन्दर सुखी, जतिन्दर कौर संधू, परमजीत देओल कनाडा, धर्मेंद्र शाहिद, सहजप्रीत मांगट, ज्योति बजाज और अन्यों ने अपनी शायरी से समय बाँध दिया। 
शिक्षाशास्त्री डॉ जगतार धीमान, प्रो.तिलक सेठी, सीमा जैन, डॉ नदीम अहमद, त्रिलोचन सिंह महाजन ने भी समसामयिक हालातों पर अपने  प्रभावपूर्ण विचार रखे। फ़िल्मकार अनिरबान भट्टाचार्य, अमित जिंदल, अरिंदम राय, डॉ जस कोहली ने भी आज के हालातों से बचाव के उपाय बताए। इस तरह यह केवल मुशायरा न हो कर आज के हालात का विशेष मार्गदर्शक भी साबित हुआ। 
कविता कथा कारवाँ संस्था की प्रैसीडैंट जसप्रीत कौर फलक ने कहा कि भविष्य में भी इसी तरह के सृजनात्मक कार्यक्रम करवाए जाएँगे जिससे सामूहिक प्रतिभागिता के साथ -साथ युवा सृजनशील पीढ़ी की हिस्सेदारी भी रहेगी। कुल मिलाकर यह एक यादगारी आयोजन रहा। कठिन वक्तों में जब मिलना जुलना नामुमकिन सा था उस समय भी इस आयोजन ने सभी को आपस में मिलवाया। 

Tuesday, January 28, 2020

जंग में झौंकने की सियासत बंद करें दोनों देशों के हुक्मरान

28th January 2020 at 4:59 PM
IDPD के डाक्टर अरुण मित्रा और उनकी टीम की चेतावनी
लुधियाना: 28 जनवरी 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
महंगाई, गरीबी और आर्थिक मंडी की हकीकत को छुपाने के लिए फिर से एक शोर मचाया जा रहा है ठोक दो ठोक दो-पाकिस्तान को ठोक दो। सियासत की इस खतरनाक शरारत के खिलाफ एक बार फिर बुलंद आवाज़ ले कर आये हैं इंडियन डाकटरज़ फॉर पीस (आई डी पी डी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डाक्टर अरुण मित्रा अपनी टीम साथ। इस  मिशन में उनके साथ हैं बैंकिंग इंडट्री से जुड़े हुए जनाब एम एस भाटिया।  इस टीम ने जंग की बातें कर रहे लीडरों को चेताया है कि आम जनता को तबाही की तरफ मत धकेलें। जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के शब्दों में इन लोगों ने कहा है: 
बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।
                                 बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
                                 कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥
डाक्टर अरुण मित्रा ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के दरम्यान जंग छिड़ी तो होने वाली तबाही अनुमान से भी कहीं ज़्यादा होगी और इसका ख़मयाज़ा दोनों देशों की जनता को भुगतना पड़ेगा। यह ब्यान ऐन उस वक़्त आया है जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया है की जंग में पिस्टन को हराने के लिए उन्हें दस दिन भी नहीं लगेंगे। डाक्टर मित्रा ने इस ब्यान को बेहद निंदनीय कहते हुए दुःख व्यक्त किया है की यह ब्यान उस वक़्त दिया गया है जब दुनिया के बहुत से हिस्सों में पहले से ही जंग छिड़ी हुई है। जंग के अमानवीय दुष्परिणामों को झेलती हुई दुनिया पर और दबाव बढ़ाना कौन से सिद्धांत का हिस्सा है? इसी संगठन के प्रधान डाक्टर एम एस सूदन और महासचिव डाक्टर शकील उर रहमान ने याद भारत और पाकिस्तान दोनों मानवीय विकास के मामले में बेहद पिछड़े हुए हैं। कोई भी युद्ध दोनों देशों को एक ऐसी तबाही की तरफ धकेल देगा जो  दशकों तक भी नियंत्रित नहीं सकेगी। दोनों देशों को शांति  चाहिए तभी दोनों देशों की जनता विकास  कर सकती है।
इन डाक्टरों ने  दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं।  अगर इनका प्रयोग हुआ तो दो अर्ब लोगों का जीवन खतरे में पड़ जायेगा। 
इन लोगों ने सलाह दी की दोनों देशों की सरकारों को गरीबी, अनपढ़ता और बेरोज़गारी को हटाने के लिए काम करें न की युद्ध की ज्वाला को भड़काएं।  
ी डाक्टरों और मित्रों ने चेतावनी दी कि जंग छिड़ी तो और भयानक हो जाएंगी गरीबी और भुखमरी की मौजूदा तस्वीरें।  देश के विकास की डॉ और पिछड़ जाएगी। बेरोज़गारी और महंगाई और भयानक रूप ले लेगी। कुल मिला कर सारा खामियाज़ा आम जनता को भुगतना पड़ेगा। 
डाक्टर अरुण मित्रा ने जनाब साहिर लुधियानवी साहिब की लम्बी रचना की पंक्तियाँ याद दिलाईं:
चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।
                                      जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
                                      हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥
कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।
                                   हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,                                    
                                   हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।
                                   हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
                                   हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
                                  ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
                                  अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
                                हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,                                
                                हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

जंग और जंग की सियासत के खिलाफ डाक्टर अरुण मित्रा के इस अभियान से जुड़ने के लिए आप भी आमंत्रित हैं। उनका मोबाईल नंबर है: 9417000360 
   साहिर लुधियानवी साहिब की इस पूरी काव्य रचना को पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक करें। 

Thursday, November 14, 2019

नोटबंदी,कश्मीर और गौरी लंकेश पर भी हुए कविता में इशारे

कविता पहुंची कालेजों तक:GCG  में हुआ विशेष आयोजन
लुधियाना: 14 नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
युग बदले तो वक़्त के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया। रीति रिवाज तक बदलते देखे गए। लोगों ने अपने धर्म बदल लिए, मज़हब बदल लिए, ईमान बदल लिए। इस सब कुछ के बावजूद एक शायर ही बाकी बचा था वह भी बदल गया लेकिन फिर भी कुछ कलमकार थे जो नहीं बदले। उनकी कविता न खरीदी जा सकी और न ही किसी अंकुश से दबायी जा सकी।   
ऐसे में एक साज़िश हुई और ऐसी कविता को बंधक बना लिया गया। उनकी कविता को वर्ग विशेष से सबंधित लोगों ने अपने अपने गट से सबंधित विशेष हाल कमरों तक महदूद कर लिया। बस उनकी कविता वहीँ तक गूंजती। उसका लोगों से मिलना जुलना बंद हो गया। बंधक वर्ग से जाने अनजाने में जुड़े लोग आते, अपनी रचना सुनाते और जब दुसरे की बारी आती तो बाहर चले जाते या सो जाते। 
कविता दम तोड़ने लगी थी। किसी नई कविता का जन्म भी होता तो आम लोगों को इसका पता ही न चलता। ऐसे में आगे आए कुछ शिक्षण संस्थान।  सहयोग दिया पंजाब कला परिषद जैसे संस्थानों ने। कविता उन वर्ग विशेष के बड़े बड़े हाल कमरों से निकल कर कालेजों में आने लगी जहाँ उसे नयी पीढ़ी के लोग मिले। शायरी में ये लोग कच्चे हो सकते हैं लेकिन तिकड़मों से कोसों दूर थे। इन्होने ने भी जानेमाने शायरों को नज़दीक से देखा। नज़दीक से उनका कलाम सुना। उनके साथ चाय पी खाना खाया और उन्हें अपने नज़दीक महसूस किया।  
यह सब हमारी टीम ने देखा लुधियाना में लड़कियों के सरकारी कालेज में जिसे ज़्यादातर लोग जीसीजी के नाम से जानते हैं। इसी तरह के आयोजन सतीश चंद्र धवन राजकीय कालेज लुधियाना और जीजीएन खालसा कालेज लुधियाना जैसे संस्थानों में भी देखने को मिले। 
दिन था 14 नवंबर 2019 का। समय रहा होगा कोई सुबह 11 बजे। पंजाब कला परिषद के महासचिव डाक्टर लखविंदर जौहल किसी वजह से नहीं आ पाए। उनकी गैरमौजूदगी खटकती भी रही। हाल में औपचारिक सम्मान के बाद मंच पर सुशोभित हो चुके थे शिमला से आये जनाब कुमार कृष्ण जो हिंदी के बहुत अच्छे शायर हैं, लुधियाना से पंजाबी में बहुत गहरी बात करने वाले जनाब जसवंत सिंह ज़फ़र, चित्रों और शब्दों का जादू भरा सुमेल करने की  वाले जनाव स्वर्णजीत सवी, जनता और जनचेतना से जुड़े हुए हिंदी के शायर डा. राकेश कुमार और पंजाबी की शायरा मोहतरमा जसलीन कौर। 
कुमार कृष्ण साहिब ने जहाँ अपनी गुल्ल्क की लूट पर कविता पढ़ते हुए नोटबंदी पर अपना निशाना साधा वहीँ चींटियों और उनके सतत संघर्ष की चर्चा भी बहुत गहरे अर्थों में की। डाक्टर राकेश ने कश्मीर में फौजी वर्दी और बूटों के आतंक की चर्चा बहुत सादगी और खूबसूरती से की। जनाब जसवंत ज़फ़र साहिब ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि जो मां की गालियां देता है, जो बहन की गालियां देता है उसे कोख में होती हत्यायों पर कविता लिखने का कोई अधिकार नहीं। मंच संचालन कार्तिका सिंह ने बहुत खूबसूरती से निभाया। इसके साथ ही उसकी गौरी लंकेश पर पढ़ी कविता भी छायी रही। 
--(पंजाब स्क्रीन टीम में इस कवरेज पर थे-एम एस भाटिया//प्रदीप शर्मा //रेक्टर कथूरिया)

Saturday, July 20, 2019

जैन गर्ल्स स्कूल में हुआ कविता का विशेष आयोजन

शिक्षा के क्षेत्र में फिर ज़ोर पकड़ रहा है कविता का जादू 
लुधियाना: 20 जुलाई, 2019:(कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 
हर तरफ भागदौड़ का माहौल। कैरियर की जंग, ज़िंदगी की जंग, अपनों से जंग, बेगानों से जंग....इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर एक माहौल पैदा हो रहा है कविता का माहौल। विभिन्न स्कूलों में एक बार फिर कविता की शरण ली जा रही है। वह कविता जो एक बार लिखी जाती है लेकिन ज़िंदगी भर बार बार गाई जाती है।  अंतर्मन में छिपी संवेदना को जगाने वाले जादू का नाम है कविता। 
आज जैन गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 10वीं की छात्राओं द्वारा एक स्पेशल असेंबली का आयोजन किया गया। इस असेंबली में छात्राओं द्वारा कविताओं और गीतों की प्रस्तुति करके देश के लिए मर मिटने वाले शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। छात्राओं ने एक नाटक द्वारा  सैनिकों के संघर्षमयी जीवन और उनकी देश भक्ति की भावना को प्रदर्शित किया।  कवाली "भर दो झोली मेरी " ने सबका मन मोह लिया।  स्कूल के समूह स्टाफ व छात्राओं ने इस कार्यक्रम का पूरा आनंद लिया।
इस अवसर पर स्कूल के समूह स्टाफ के साथ साथ स्कूल की मैनेजिंग कमेटी के चेयरमैन  श्री सुखदेव राज जैन, प्रधान श्री नंद कुमार जैन, सैक्रेटरी श्री राजीव जैन, मैनेजर श्री अरविन्द कुमार जैन व् स्कूल प्रिंसिपल श्रीमती मीना गुप्ता जी मौजूद थे।  उल्लेखनीय है कि यह स्कूल कई दश्कों से आसपास के बहुत से इलाकों के बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में मज़बूती से स्थापित करता आ रहा है। 

Thursday, March 07, 2019

मैं गौरी की बात करुँगी-कार्तिका सिंह

मैं हर छल की बात करूंगी

मंच संचालक कहते हैं कि 
यह बोलो 
पर यह न बोलो। 
देश संचालक भी कहते हैं 
यह बोलो और यह न बोलो। 
ठेकेदार समाजों के भी 
ठेकेदार रिवाजों के भी 
अक्सर मुझको यह समझाते 
यह बोलो और यह न बोलो। 
छोटी सी कोई ग़ज़ल सुना दो;
लेकिन दिल की बात न खोलो। 
तस्लीमा नसरीन से पूछा 
तुमने कैसे मन की कर ली?
तुमने कैसे मन की सुन ली?
तुमने कैसे मन की कह ली?
वह बोली हिम्मत थी मेरी 
वह बोली जुर्रत थी मेरी। 
सच देखा तो कहना चाहा। 
मन में एक तूफ़ान उठा था;
बाकी कुछ फिर टिक न पाया। 
जो सोचा वह कह ही डाला। 
लेकिन अभी भी भुगत रही हूँ। 
पल पल हर पल खौफ का साया। 
पल पल हर पल खौफ का साया;  
लगातार है पीछा करता। 
आगे बढ़ना भी मुश्किल था;
लेकिन पीछे मुड़ नहीं सकती। 
सच कहने में मज़ा बड़ा है;
झूठ से अब मैं जुड़ नहीं सकती। 
मेरी भी तक़दीर है गोली,
मेरी भी हत्या ही होगी!
लेकिन बर्बर मौत के डर से
सच का जीवन खो नहीं सकती। 
चैन का जो अहसास मिला है;
उस अहसास को खो नहीं सकती। 
फिर गौरी लंकेश से पूछा 
तुमने क्यों कर जान गंवायी!
वह बोली यह जान क्या है!
जीवन की औकात क्या है!
बस इक सांस का खेल है सारा;
इन सांसों की बात क्या है?
इन सांसों के चलते चलते 
सच को हम न देख सके तो!
सच को हम ने बोल सके तो 
फिर जीवन बेकार ही होगा!
इक बेजान सा तार ही होगा!
ऐसा जीवन क्या करना है?
इससे अच्छा तो मरना है!
मुझको तो रफ्तार पसंद थी 
सच की वह इक धार पसंद थी।
हाँ मुझको तलवार पसंद थी; 
लेकिन कलम ने यह समझाया!
शब्दों में भी जान बहुत है। 
जो तलवार भी कर नहीं सकती 
इन शब्दों में धार बहुत है। 
जिस दिन सच का परचम पकड़ा;
मेरी जान हथेली पर थी। 
मालूम था अंजाम यह मुझको!
लेकिन आँख हवेली पर थी। 

पूंजीवाद की वही हवेली 
जिस में कैद सहेली मेरी। 
वही सहेली-एक पहेली 
इस दुनिया का राज़ कहेगी। 
कदम कदम पर  जो साज़िश है-
उस का पर्दाफाश करेगी।  
इस दुनिया की हर इक औरत 
जिसपे अत्याचार हुआ है 
शब्दों से खिलवाड़ हुआ है 
वह औरत मुझसे कहती है-
तू  तो मेरा हाल बता दे। 
जो जो मेरे साथ हुआ है;
दुनिया को हर बात बता दे। 
कलम को पकड़ा है तुमने तो 
शब्दों से इक आग लगा दे। 
अब गौरी लंकेश की मानूं?
या मानूं तुम लोगों की मैं?
अब गौरी लंकेश है मुझमे 
अब मैं भी वह बात करूंगी। 
जिस जिस ने भी इस जनता को 
छलने का प्रयास किया है। 
मैं उस छल की बात करूंगी। 
मैं गौरी की बात करुँगी। 
मैं गौरी की बात करुँगी।   
                          -कार्तिका सिंह
29 जनवरी 2019 को सुबह सुबह 3:45 लिखी 

Thursday, November 01, 2018

अपना पंजाब अब पंजाब कहां रह गया! ---कार्तिका सिंह

पहली नवम्बर को पंजाब दिवस पर विशेष काव्य रचना
अपना पंजाब अब पंजाब कहां रह गया!
साज़िशों की बाढ़ में पंजाब सारा बह गया। 
कहीं है हिमाचल, कहीं हरियाणा रह गया;
अपना पंजाब अब पंजाब कहां रह गया। 

खेत मिट रहे हैं-खतरे में बाग़ है। 
मक्की की रोटी कहां सरसों का साग है?
भेलपूरी छा गयी है; बर्गर पीज़ा रह गया! 
अपना पंजाब अब पंजाब  कहां रह गया। 

ख़ुदकुशी की खबरें हैं, जुर्मों का राज है। 
ठेके हैं शराब के बस नशे का ही राज है!
कहीं लाल परी, कहीं चिट्टा पाउडर रह गया। 
अपना पंजाब अब पंजाब  कहां रह गया। 

कौन देखे आ के जो पंजाब बना आज है!
रोज़ आती खबरों में लापता सी लाज है!  
सत्ता का यह ताज भी मज़ाक बन के रह गया!
अपना पंजाब अब पंजाब कहां रह गया। 

लूट गया पंजाब बचा क्या जनाब रह गया?
पानी और खेतों का हिसाब कहाँ रह गया?
प्रेम की निशानी वो चनाब कहाँ रह गया!
अपना पंजाब अब पंजाब कहाँ रह गया?
                                   --कार्तिका सिंह 
(शुक्रवार 12अक्टूबर 2018 को रात्रि 11:27 बजे) 

Wednesday, October 03, 2018

खतरे में अमन है.....//--कार्तिका सिंह

अमन की बातें लेकर देश भर में घूम रहे अमन के कारवां को समर्पित 
साभार चित्र
खतरे में अमन है 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
गफलत की नींद जो सोए हैं--
उनको भी जगाना ही होगा। 
खतरे में अमन है... 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
खतरे में अमन है........ 

हर गली गली में खतरा है।
हर कदम कदम पर खतरा है 
हर मोड़ पे कोई खतरा है!
हर कोने में कोई खतरा है-
आवाज़ लगाना ही होगा। 
खतरे में अमन है 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
खतरे में अमन है........ 

इंसान की कीमत कुछ भी नहीं। 
कीमत है व्यर्थ रिवाजों की। 
भगवान को सोना चढ़ता है 
कीमत बढ़ती है अनाजों की। 
इंसान की जान बचाने को 
अब इन्कलाब लाना होगा।  
खतरे में अमन है 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
खतरे में अमन है........ 
साभार चित्र 
यहाँ देवी पूजी जाती है 
पर कन्या मारी जाती है। 
न बच्ची यहाँ सुरक्षित है 
न बूढी यहाँ सुरक्षित है। 
हर मोड़ पे लुटती महिला को 
हम सब को बचाना ही होगा। 

खतरे में अमन है 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
खतरे में अमन है........ 

जब छिड़ी थी जंग आज़ादी की;
तब हमीं मैदान में आए थे। 
हम झूल रहे थे फांसी पर,
यह माफ़ी मांग के आए थे। 
इन रंग बदलते चेहरों का,
हर रंग दिखाना ही होगा। 
खतरे में अमन है 
हम सब को 

अब आगे आना ही होगा।
                --कार्तिका सिंह
 अमन का संदेश देता अमन का कारवां जम्मू में एक गीत गाता हुआ 

Friday, July 13, 2018

एक रिपोर्ट: जॉन को शायरी का चे ग्वेरा मानते हैं कुमार विश्वास

... और क्रिएटिव अडडा ने जान एलिया बहुत से दिलों तक पहुंचाया 
लुधियाना//जालंधर: 12  जुलाई 2018: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
विदेशी हमलों, आंतरिक साज़िशों, भ्रष्टाचार से भरा हुआ सिस्टम, बेरोज़गारी का निरंतर बढ़ता गराफ़ , भूख से होती मौते, जगह जगह असुरक्षा का माहौल--लेकिन फिर भी हमने तरक्की की। हमारे देश ने शिव की तरह बहुत से विष पिए लेकिन भारतीय संस्कृति और कुकनूस की तरह फिर से जी उठने वाली आंतरिक शक्ति को कम नहीं होने दिया।  किसी ने भगवान  या उसका कोई चमत्कार देखा हो या  न देखा हो लेकिन इतनी मुसीबतों के बावजूद देश ने विकास की जो ऊंचाईयां छुई वे किसी करिश्मे से काम नहीं हैं। यह बात अलग है की गलत लोग हमेशां फन उठाते रहे-चालें चलते रहे--पर यह देश की अनेकता में छुपी एकता की  अदभुत शक्ति ही थी जिसने इन्हे बार बार नाकाम करने शमा दिखाया। 
संचार और तकनीकी विकास की सुविधा जब देश के कोने कोने तक पहुंची तो बहुत से फायदे सामने आये। कई कई दिनों के बाद पहूंचने वाली चिठियाँ झटपट पहुँचने लगी ईमेल बन कर। लेकिन यहाँ भी गलत लोग बाज़ नहीं आए। उन्होंने दुष्प्रचार, अफवाह और अश्लीलता की आंधी चला कर इसे गैर ज़िम्मेदार बनाने की कुचेष्टा की। लेकिन अच्छे लोग निराश नहीं हुए। 
इन सभी हकीकतों के बावजूद रचनात्मक लोगों ने इस तकनीकी विकास का शुभ लाभ लिया। इसे समाज को जोड़ने और रचनत्मक बनाने के लिए सदुपयोग किया। 
जालंधर में "क्रिएटिव अडडा"  का आयोजन यही सुखद संकेत देता है। आयोजन यादगारी रहा। क्रिएटिव अड्डा की तरफ से एक मशहूर शायर जॉन एलिया साहब की याद में "जॉन यानी मोहब्बत" एक  नशिस्त करवाई गई । ये नाम यू भी रखा गया कि जॉन साहब एक मोहब्बत के शायर थे ज़िन्दगी के शायर थे इसलिये अगर उनका ताल्लुक मोहब्बत से रखे तो ये गलत नही होगा । जॉन साहब का जन्म अमरोहा में हुआ था वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे । जॉन साहब की ज़िंदगी और उनकी शायरी पर चर्चा हुई । जॉन साहब एक खुदरंग शायर थे । इस इवेंट में उर्दू अदब की मशहूर शायरा रेणु नय्यर जी जो पूरे देश में अपने कलाम पढ़ चुकी है वो मुख्यातिथि के रूप में उपस्थित थी । उन्होंने अपने कलाम और ग़ज़लों से महफिल लगाई ।  लुधियाना से तशरीफ़ लाये थे आनीस खान लुधियानवी जिन्होंने जॉन साहब की ज़िंदगी से तार्रुफ़ करवाया और उनकी कुछ नज़्में पढ़ी । चंडीगड़ से युवा कवि आशीष द्वेवेदी जी हाज़िर हुए थे उन्होंने सबका जॉन साहब की ग़ज़लों से राबता करवाया । इस नशिस्त का की निज़ामत हर्ष सिंह ने की । अतिथि के रूप में रेडियो मिर्ची से हमारे साथ आर जे चेतना भी मौजूद थी ।
इस नशिस्त में काफी लोगो ने शिरकत की । 
रेणु नय्यर जी ने अपनी बेहतरीन ग़ज़ल से महफिल में चार चांद लगाई
उनके ग़ज़ल के कुछ शेर है:

किसी गुमान ने आ कर छुआ था, टूट गया
तुम्हारा अक़्स जो दिल में बसा था, टूट गया

ज़माने वाले तुझे इश्क़ इश्क़ कहते हैं
मेरे लिए तू फ़क़त आईना था, टूट गया
जॉन एलिया के बारे में अगर कुमार विश्वास जी के शब्दों का उल्लेख न करें तो बात अधूरी रहेगी। सत्याग्रह में 
कुमार विश्वास जॉन एलिया को खुदरंग शायर कहते हैं. मतलब, ऐसा शख्स जो अपने ही रंग का हो और ऐसा रंग जो किसी और के पास न हो. कुमार विश्वास उनके लिए लिखते हैं, 'जॉन को मैं शायरी का चे ग्वेरा मानता हूं जो एक स्टेटमेंट देते हुए नज़र .....उन पर कुमार साहिब की पूरी किताब भी पढ़ने वाली है। 
क्रिएटिव अडडा ने जान एलिया की कविता को दूर तक फैलाया है--वो कविता जो जन जन से जुडी है और सभी को पढ़नी चाहिए। 

Thursday, November 09, 2017

चंडीगढ़ में अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन शुरू

गांव गांव में ज़रूरत है ऐसे आयोजनों की तांकि भाषा का सौहार्द बना रहे
चंडीगढ़//लुधियाना: 9 नवंबर 2017: (कार्तिका//पंजाब स्क्रीन)::
मेरा जन्म एक पंजाबी परिवार में हुआ। एक ऐसा परिवार जहां हर भाषा का सम्मान करना सिखाया जाता है। इसके बावजूद मेरे बोलचाल की मुख्य भाषा काफी देर तक पंजाबी ही रही।  धीरे धीरे कब यह हिंदी और पंजाबी का मिक्स अंदाज़ आ गया खुद भी याद नहीं आता। जब सितंबर-2017 में पीएयू ने एक प्रतियोगिता का आयोजन कराया तो उस समय भी मेरी पंजाबी काव्य रचना को ही प्रथम पुरुस्कार मिला। इस सब के बावजूद मेरा हिंदी प्रेम कभी कम नहीं हुआ। हिंदी में लिखना, हिंदी में पढ़ना मेरे स्वभाव में उसी तरह शामिल रहा जिस तरह मैं गांवों की ठेठ पंजाबी के शब्द समझने की कोशिश करती। मैंने मैक्सिम गोर्की की महान रचना-"मां" हिंदी में ही पढ़ी। ओशो की बहुचर्चित रचना "एक ओंकार सतनाम" भी हिंदी में ही पढ़ी। दुष्यंत कुमार के शेयर मुझे बिना प्रयासों के ज़ुबानी याद होने लगे। शायद यह सिलसला यूं ही चलता पर पत्रकारिता की पढ़ाई के कारण अख़बारों और टीवी की खबरों में भी दिलचस्पी बढ़ने लगी। कभी कभी हालात में कुछ गर्माहट आती तो अख़बारों की सुर्खियां भी भयभीत करने लगती। मैंने न तो 1947 का बटवारा देखा, न ही जून-1984 का ब्ल्यू स्टार आपरेशन और न ही नवंबर-1984 का अमानवीय नरसंहार। जब रूस के अक्टूबर इंकलाब की चर्चा सुनती तो बहुत अजीब  सा लगता कि इस अक्टूबर इन्कलाब का दिन नवंबर में क्यों आता है? इस तरह के कई सवालों का जवाब तलाश करने की इच्छा मुझे अक्सर इतिहास की किताबों के नज़दीक ले जाती। इसी बीच ज़ोर पकड़ा पंजाबी भाषा के सम्मान के अभियान ने। सैद्धांतिक तौर पर बात सही थी कि पंजाब में पंजाबी को प्रथम स्थान आखिर क्यों नहीं दिया जाता। दक्षिण भारत में जहाँ के लोग हिंदी के नाम से भी दूर भागते हैं वहां हिंदी को तीसरे स्थान पर लिखा जाता है।  यहां तक कि रेलवे स्टेशनों पर भी।  अन्य स्थानों पर तो हिंदी नज़र भी नहीं आती। इन सभी तथ्यों के बावजूद मुझे यह बहुत ही दुखद लगता कि पंजाब में जहां जहां हिंदी लिखी है वहां वहां कालख पोत दी जाये। पंजाबी का सम्मान बहाल हो यह तो मैं भी चाहती थी लेकिन इसके लिए हिंदी पर कालख पोतनी पड़े यह सही न लगता।  दुःख था। बेबसी थी। कुछ कुछ शर्मिंदगी का अहसास भी।  कुछ गुस्सा भी। सियासत की जंग में मुझे अपनी और आम लोगों की हालत बहुत ही कमज़ोर लगती।
खुद से सवाल करती कि क्या सचमुच सिख धर्म के संस्थापक गुरु साहिबान संस्कृत और फारसी का भी सम्मान करते थे? अगर यह सच है तो उन्हें मानने वाले हिंदी पर कालख क्यों पोतना कहते हैं? बहुत गुस्सा आता उन लोगों पर भी जिनको हिंदी नहीं आती थी लेकिन पंजाबी सूबा के समय  समय जिन्होंने पंजाबी में बोल बोल कर  कि लिखो हमारी मातृ भाषा हिंदी है। हिंदी पंजाबी और अन्य भाषाओं के दरम्यान जिस पुल की बात मैं सोच रही थी वह मुझे अपनी कल्पना ही लगता।  महसूस होता यह कभी साकार नहीं होगी। मुझे लगता कि बस शायद यहां सियासत ही जीत सकती है और न कोई सिद्धांत-न कोई धर्म और और न कोई विचार। 
इसी निराशा में एक दिन पता चला कि चंडीगढ़ में अखिल भारतीय महिला कवि सम्मेलन हो रहा है। जाने की इच्छा भी थी लेकिन कालेज के टेस्ट और कुछ अन्य समस्याएं आड़े आ रही हैं। जब विस्तार से जानकारी ली तो पता चला कि हर पंजाबी शायरा को अपनी पंजाबी रचना के साथ साथ हिंदी अनुवाद भी बोलना है। यह जान कर न जा पाने का दुःख भी हुआ। पता चला कि इस आयोजन में भाग लेने के लिए तकरीबन 300 महिला शायर भाग लेंगीं। यह जानकारी चंडीगढ़ में आल इंडिया पोइटिस कांफ्रेस के संस्थापक डा. लारी आज़ाद ने एक पत्रकार सम्मेलन में दी। डा. लारी आज़ाद ने वास्तव में दुनिया देखी है। सियासत की भी और साहित्य की भी। मोहमद अकरम लारी ने सत्तर के दशक में भरतीय धर्मों और सियासत पर बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं हैं। वह बहुत सी वशिष्ठ पत्रिकाओं का सम्पादन भी करते हैं।  इसलिए भारत में धर्म-सियासत और भाषा की वास्तविक स्थिति को भी बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। इस संगठन के पास आठ हज़ार प्रमुख महिलाएं पंजीकृत है जिनमें से कोई शायरा है, कोई लेखिका, कोई कलाकार, कोई टीवी पर, कोई रेडियो  पर और कोई किसी अन्य में। इनमें कई प्रमुख लोगों से भेंट होती, उनसे मिलने का अवसर मिलता। अब भी कोशिश रहेगी। 
कुल मिला कर प्रसन्नता की बात है कि यह एक ऐसा मंच है जिसे आधार  बना कर पंजाबी के पुल हिंदी और अन्य भारतीय भाषायों से जोड़े जा सकते हैं। सलाम है ऐसे आयोजन को।  सलाम है इसके आयोजकों को। इस तरह के आयोजन होते रहें और विभिन्न भाषाओं के लेखक और कलाकार अलग अलग प्रदेशों और संस्कृतियों को आपस में जोड़ने के सफल प्रयास करते रहें। समाज जुड़ा रहे इसकी उम्मीद अब कलमकारों से ही बची है। इस तरह के आयोजनों की आज सबसे अधिक ज़रूरत हैं। केवल राज्यों की राजधानियों में ही नहीं बल्कि गांव गांव में इनकी ज़रुरत है। आखिर में एक बार फिर सलाम। कवरेज के लिए एक बार अवश्य जाना होगा इस आयोजन में, बाकी की बातें फिर कभी सही। किसी अगली पोस्ट में।  -कार्तिका (लुधियाना)

Monday, August 08, 2016

विशेष लेख//गज़लो-गीतों ने दिलाई आजादी//*अनिल चमड़िया


08-अगस्त-2016 13:50 IST
ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गए
दुनिया में जब भी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गएकिसी ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिन आंदोलनों में मनुष्य अपने ऊपर थोपे गए कई बंधनों से मुक्ति के लिए एकजूट होता है तो उस आंदोलन का कोई न कोई गीत याद आने लगता है। यही वास्तविकता है कि कोई भी आंदोलन गीतों के बिना पूरा नहीं होता है। काव्य धारा के कई रूप हैं और वे कविता, नज्म़, गज़ल, गीत आदि के रूप में जाने जाते हैं। बल्कि यूं भी कहा जाए कि नारे भी अपनी काव्यत्मकता से ही यादगार बन पाते हैं। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखें गए। इस विषय पर कई शोध हुए हैं लेकिन तमाम तरह के शोधों के बावजूद ये लगता है कि वे उस दौरान लिखे गए सभी गीतों को समेट नहीं पाए।
लेखक-अनिल चमड़िया 
आमतौर पर दो चार गीतों को हम दोहराते हैं। उनमें उर्दू के प्रसिद्ध शायर इक़बाल का वह गीत जिसमें वे कहते हैं कि सारे जहां से अच्छा , हिन्दोस्तां हमारा। हम बुलबुले है इसकी , ये गुलसितां हमारा। इसी हिन्दोस्तां को हिन्दुस्तान के रूप में प्रचारित किया गया है। इक़बाल 1938 में ऐसे ही जोश खरोश से भरे गीत लिखकर दुनियां से विदा हो गए। दरअसल ब्रिटिश सत्ता के विरोध में आजादी के संग्राम के गीतों की ये विशेषताएं थी कि उनमें सात समंदर पार के शासकों की ज्यादतियों का एहसास कराया जाए। लेकिन इसके साथ ये भी जरूरी था कि अपने भीतर की अच्छाई और सुदंरता के विभिन्न पहलूओं की तस्वीर लोगों के सामने खींची जाए। इक़बाल हिन्दोस्तां हमारा गीत में ही लिखते हैं कि गोदी में खेलती है उसकी हजारों नदियां, गुलशन है जिनके दम से रश्के –जिनां हमारा।

गुलामी का एहसास कराना, स्वतंत्रता की चाहत पैदा करना, स्वतंत्रता के लिए सामूहिकता की भावना पैदा करना, उस सामूहिकता की ताकत का एहसास कराना और सबसे महत्वपूर्ण कि आपस की दूरियों को दूर करना और उन दूरियों को विविधता के रूप में पहचान कराकर उन्हें अपनी ताकत बताना, ये सब एक साथ जब कोई रचनाकार करता है तो उसकी राष्ट्रीय़ गीतकार के रूप में स्वीकार्यता हो जाती है। केवल इकबाल अपनी रचनाओं में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष और अपने लोगों के बीच एकता विकसित करने की चुनौती से नहीं जूझ रहे थे बल्कि हर वह रचनाकार ऐसी चुनौती से जुझ रहा था जो कि भारत को एक लेकिन सभी भारतवासियों के राष्ट्र के रूप में निखारने के सपने देख रहा था। वंशीधर शुक्ल लिखते हैं कि

बिस्मिल , रोशन , लहरी, मौं.अशपाक अली से वीर

आजादी लेने निकले थे, फांसी चढ़े अखीर

शक्ति अनतोली निकली। सिर बांधे कफनवा।

कैप्टन राम सिंह लिखते है- कदम कदम बढाए जा

खुशी के गीत गाए जा

यह जिंदगी है कौम की

तू कौम पर लुटाए जा, बढ़ाए जा।

भारतीय समाज जातियों, धर्मों और दूसरे तरह के आपसी विभाजनों से जूझता रहा है। इन विभाजनों को दूर करने की लड़ाई सदियों से होती रही है। भक्तिकालीन साहित्य में भी यह चुनौती देखने को मिलती है। ब्रिटिश सत्ता विरोधी आंदोलनों के लिए लोगों को घरों से निकालना था और उन्हें यह एहसास कराना था कि इंसानी जिदंगी समाज को जीवंत बनाए रखने की शर्त के साथ जुड़ी है। इसीलिए उस आंदोलन में शामिल होने वाला सैनानी फांसी पर चढ़ते हुए भी लोगों के भीतर मौत का भय नहीं पैदा करता था बल्कि लड़ने के लिए प्रेरित करता था। इस तरह की प्रेरणा केवल और केवल साहित्य ही कर सकता है। कल्पना करें कि स्वंतत्रता की लड़ाई की अगुवाई करने वालों के साथ इन गीतों का साथ नहीं होता तो लोगों को नींद से जगाना और सक्रिय करना लगभग असंभव होता।

वंशीधर शुक्ल खूनी पर्या गीत में कहते हैं कि-

तुम्हीं हिंद में सौदागर आए थे टुकड़े खाने, मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने, लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईष्या बरसाने, राजाओं के मंत्री फोड़े , लगे फौज को भड़काने. तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा, जब तक तुझको ......

स्वतंत्रता संग्राम की खास बात यह देखी जाती है कि इसने घर-घर में गीत-सैन्य तैयार किए। यानी हर घर में गीत लिखने वाले सैनिक तैय़ार किए। इसीलिए बहुत सारे गीत ऐसे मिलते हैं जिनके रचनाकार के बारे में शोधकर्ताओं को जानकारी नहीं मिलती। दरअसल यहां सैनिक के रूप गीतकार का अर्थ इसी रूप में लेना चाहिए कि जैसे सैकड़ों सैनिक हथियारों से लड़ते-लड़ते शहीद हो जाते हैं और उनके नाम सबकी जुबां तक नहीं पहुंच पाते हैं। दरअसल यही भावना होती है जो कि समाज में परिवर्तन की लड़ाई को अंजाम देने और उनमें सफलता की भावना को सुनिश्चित करती है। एक अज्ञात रचना में गीतकार कहता है कि उठो नौजवानों न रहने कसर दो , विदेशी का अब तो बहिष्कार कर दो, मुअस्सर जहां नहीं पेटभर है दाना . गुलामी में मुश्किल हुआ सर उठाना । रंग दे बसंती चोला , मायी नी रंग दे बसंती चोला वाला जो गीत अक्सर जन भागीदारी वाले कार्यक्रमों में सुनाई देता है उस गीत के भी रचनाकार के बारे में शायद ही कोई जानता हो। वास्तव में उस रचना का रचनाकार अज्ञात है।

दरअसल स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ गीत लोगों के बीच लोकप्रिय है लेकिन बहुत बड़ी संख्य़ा में गीत हैं जिन्हें आमतौर पर सुना व पढ़ा नहीं जाता है। आंदोलन के गीतों की खासियत यह भी होती है कि एक गीत कोई लोकप्रिय होता है तो उसकी तर्ज पर कई-कई गीतों की रचना आम लोग करने लगते हैं। मसलन जन गण मन गीत की तरह ही एक अज्ञात रचनाकार लिखते हैं कि शुभ सुख चैन की वर्षा बरसे , भारत भाग है जागा , पंजाब, सिंध , गुजरात, मराठा,द्रविड़,उत्कल-बंग/चंचल सागर , विंध्य हिमालय नीला यमुना गंगा.....। इसी तरह वंदे मातरम शीर्षक वाले अज्ञात गीतकार लिखते हैं कि सरचढ़ो के सिर में चक्कर उस समय आता जरूर, काम में पहुंची जहां झनकार वंदे मातरम। एक ही गीत से कई-कई गीत निकलते रहे हैं। इन गीतों में एक और विशेषता यह देखी जाती है कि हर तरह के काम धंधे करने वाले लोगों के अनुकूल गीत तैयार करने की कोशिश की जाती थी। चकोर लिखते है कि दुखिया किसान हम है, भारत के रहने वाले. बेदम हुए, न दम है , बेमौत मरने वाले । आखिर पंक्ति में लिखते है – ए मौज करने वालो, कर देंगे हश्र बरपा, उभरे चकोर जब भी, हम आह भरने वाले।

गीतों को ब्रिटिश सत्ता अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती थी। वह लड़ने वालों के खिलाफ जेल,लाठी गोली का तो इस्तेमाल करती ही थी वह गीतों को भी सलाखों में डालने का इंतजाम करती थी। गीत यानी कलात्मक तरीके से जमीनी हकीकत को बयां करने और उसे लड़ने के लिए प्रेरित करने वाली अभिव्यक्ति  से घबराकर ही सरकार ने एक कानून बनाया था जो कि आज भी बरकरार है, जिसके तहत गीतकारों, नाटककारों और दूसरे तरह की साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होने वाले वाले रचनाकारों को जेल के अंदर डाला जाता था और गीतों को जब्त कर लिया जाता था। ब्रिटिश सत्ता ने जिस अनुपात में लोगों को जेलों के भीतर डाला उसी अनुपात में गीत भी जब्त किए। इनमें एक गीत राम सिंह का है- मेरे पुत्रों को यह पैगाम दे देना ज़रा बेटा, मर मिटो देश की खातिर, मेरे लख़्ते-जिगर बेटा। दूसरा गीत कुंवर प्रतापचन्द्र आजाद का है -बांध ले बिस्तर , फिरंगी, राज अब जाने को है, ज़ुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जन संचार विभाग में प्रोफेसर व भारतीय जन संचार संस्थान में हिन्दी पत्रकारिता के प्रशिक्षक रहे हैं।)

***