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Monday, January 23, 2012

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी-ग्रामीण जागरूकता के संवाहक

परिवारों तथा विभिन्‍न विभागों के बीच सहज कड़ी
पत्र सूचना कार्यालय अगरतला की ओर से कराई गई.एक संगोष्ठी में बेबाक होकरसवाल पूछती एक महिला. इस संगोष्ठी का आयोजन भारत निर्माण जन सूचना अभियान के अंतर्गत २० जनवरी को राज नगर दक्षिणी त्रिपुरा में किया गया था. (फोटो: पी.आई.बी.
भारत निर्माण स्‍वयंसेवी एक ऐसा व्‍यक्‍ति है जो ग्रामीण परिवेश से जुड़ा है वह अपनी मर्जी से परिवारों तथा विभिन्‍न विभागों के मेजबानों के बीच सहज कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्‍न कार्यक्रमों के लाभ बिना पहुंच वाले ग्रामीणों को दिलवाना सुनिश्‍चित करता है। दूसरे शब्‍दों में, वे कार्यक्रमों तथा इन कार्यक्रमों की पहंच से दूर बिना के लोगों के बीच मील का आखिरी मानवीय संपर्क है। अब तक देश में 31,000 स्‍वयंसेवी को भारत निर्माण स्‍वयंसेवी के रूप में नामांकित कर लिया गया है। इस वर्ष मार्च तक 1,60,000 को नामांकित करने का लक्ष्‍य है।
भारत निर्माण स्‍वयंसेवी क्‍यों?
     सरकार तथा संबंधित राज्‍य सरकारें कई दशकों से विभिन्‍न कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों को संचालित कर रही हैं। तथापि, कई मूल्‍यांकन अध्‍ययनों में यह दर्शाया गया है कि कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन में कमी रह गई और गरीबी से नीचे रहने वाले कई संबद्ध परिवारों को वांछित लाभ नहीं मिल पाया। विभिन्‍न स्‍तरों पर इन सुविधाओं का लाभ देने वालों का आकार सीमित रहने तथा पर्याप्‍त समय न देने पर लक्षित ग्रामीण घर परिवारों को इनका लाभ भी समय पर नहीं मिल पाया तथा कहीं पर ऐसे लोगों को भी लाभ मिल गया जिन्‍हें इसकी जरूरत नहीं थी।

     ग्रामीण घर परिवारों के साथ आखिरी जुड़ाव के रूप में मानवीय चेहरा प्रस्‍तुत करने के लिए यह सोचा गया कि क्षमतावान युवकों का उपयोग भारत निर्माण स्‍वयंसेवी के नाम से किया जाए जो ग्रामीण घर परिवारों के बीच कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता फैलाएंगे जिससे बेहतर योजना तथा कार्यक्रमों का सुचारू कार्यान्‍वयन हो और पारदर्शिता तथा जवाबदेही लाई जा सके।
वे क्‍यों स्‍वयंसेवी बने?
पिछले काफी समय से देखा जा रहा था कि ग्रामीण परिवेश में स्‍थानीय शक्‍ति के समूह बढ़ने, विभिन्‍न समुदायों के बीच एकता का अभाव, उनसे संबंधित मुद्दों के बारे में जागरूकता का अभाव, कार्यक्रम की कार्यान्‍वयन प्रक्रिया के पहलुओं के बारे में जागरूकता का अभाव जैसे मुद्दे सामने आ रहे थे इससे विभिन्‍न सरकारी कार्यक्रमों का लाभ गरीब परिवारों को नहीं पहुंच पा रहा था। इसके साथ ही, विभिन्‍न कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों की योजना की प्रक्रिया में ग्रामीण परिवारों की सहभागिता पर्याप्‍त नहीं थी। इसलिए, ग्रामीणों की विशेष तौर पर युवाओं की स्‍वयंसेवी भागीदारी तथा ग्राम विकास के लिए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में भाग लेने का अवसर प्रदान करना आवश्‍यक समझा गया। भारत निर्माण स्‍वयंसेवकों ने अपने कार्यों से अपने व्‍यक्‍तित्‍व, व्‍यवहार में काफी परिवर्तन महसूस किया। उन्‍होंने सम्‍मान और पहचान प्राप्‍त की तथा जहां उन्‍होंने कोई विशिष्‍ट कार्य किया तो उनमें यह भाव पैदा हुआ कि ‘यह हमने किया’।

     प्रशिक्षण में मूल्‍यों तथा नैतिकता के साथ-साथ सरकार की सभी विकास योजनाओं के उद्देश्‍यों पर बल दिया गया है। इससे उनका ध्‍यान उनके समुदाय में व्‍याप्‍त विभिन्‍न बुराइयों जैसे कि शराबखोरी, जल्‍दी स्‍कूल छोड् देने के साथ ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था, सुशासन और योजना की ओर गया। ग्राम सभा, ग्राम पंचायत तथा समितियों के अंतर्गत मुद्दों का निपटान, अनुशासन, सहजता तथा निर्धारित ढंग के होने से वे स्‍वयं अचंभित थे और ऐसा उन्‍होंने पहले सोचा भी नहीं था। वे शक्‍तिशाली स्‍तंभों से भी सामना करने लगे और उन्‍हें अपने विकास कार्यक्रम के अनुरूप ढालने में समर्थ रहे।

     अनेक गांवों में गलियों की सफाई की, कूड़े का निपटान किया, टैंकों को साफ किया, श्रमदान करके सड़क तैयार की, सूचना प्रदान की। कई बार उन्‍होंने अपनी कमाई भी लगाई। उनमें से कुछ ने बेसहारा परिवारों, जिनमें केवल महिलाएं घर चलाती थीं जिनके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली से प्राप्‍त चावल पूरा नहीं पड़ता था, ऐसे परिवारों की पहचान की और कार्यकर्ताओं ने ऐसे परिवारों की मदद की और यह सुनिश्‍चित किया कि वे हर रोज अपने तीन समय का भोजन प्राप्‍त कर सकें। कई स्‍वयंसेवी अपने गांव में रोशनी लाने के लिए ऊर्जा के वैकल्‍पिक स्रोतों की योजना सरकार से धनराशि प्राप्‍त करने के लिए बना रहे हैं। कुछ अपनी गलियों में सौर ऊजा से रोशनी तथा कुछ सौर कुकर और बिजली के लिए योजना बना रहे हैं। गांव में विभिन्‍न समुदायों के बीच काफी समय से चल रहे झगड़ों का निपटारा कर लिया गया है और भाईचारा पनपा है। भारत निर्माण स्‍वयंसेवी ने मंडल स्‍तर पर सभी विभागों से संपर्क कर समुदायों के पूरे नहीं किए गए अनुरोधों के संबंध में उत्‍तर प्राप्‍त किए हैं। इनमें से अनेक ने दफनाने के लिए स्‍थान, खेल के मैदान तथा कुछ ने अपने गांव में बस चलाने के लिए प्रशासन से पहचान तथा अधिसूचना प्राप्‍त कर ली है। प्राय: सभी गांव वालों ने यह सूचित किया है कि उन्‍होंने ऐसी दुकानें (शराब की दुकान) बंद कराने के प्रयास किए और उनमें से कई ऐसी दुकाने बंद कराने में सफल रहे। कुछ ने गांव की दुकानों में पान और गुटकों की बिक्री बंद करा दी। कइयों ने सौ प्रतिशत आईएसएल कवरेज के बारे में अनेक लोगों को सूचित किया है।

     कइयों ने प्रशासन से नालियों की लाइन के निर्माण के लिए संपर्क किया है। एक गांव में प्रत्‍येक घर परिवार के लिए गड्ढ़ा भरना निश्‍चित किया गया है, यह उनका लक्ष्‍य है और उन्‍हें यह विश्‍वास कि वे इस कार्य को शीघ्र ही पूरा कर लेंगे। कुछ गांवों में खुली हवादार लाइब्रेरी शुरू की गयी हैं। अख़बार और पत्रिकाएं शाम तक छोटे कमरे में रख दी जाती हैं और शाम को इन्‍हें पेड़ के पास चौपाल में पढ़ने के लिए पहुंचा दिया जाता है। बाद में इन्‍हें फिर से स्‍वयंसेवी  प्रभारीद्वारा कमरे में वापस पहुंचा दिया जाता है।

     आंध्र प्रदेश ग्रामीण विकास अकादमी (अपार्ड) के प्रशिक्षण कार्यक्रम में सभी भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों को स्‍वयं सेवा की भावना का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रबुद्ध व्‍यक्‍तियों, उस्‍मालिया विश्‍वविद्यालय के साइक्‍लोजिस्‍ट, ब्रह्म कुमारियां, भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम द्वारा शुरू किया गया लीड इंडिया फाउंडेशन, अनुभवी पत्रकार तथा प्रोग्रेसिव सरपंच तथा अपार्ड से लोगों को शामिल किया गया।

इस प्रयोग की सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह रही कि यह सभी स्‍वयंसेवी किसी भी स्रोत से कोई वित्‍तीय सहायता या मानदेय प्राप्‍त नहीं करते। इसके विपरीत कई मामलों में वे जहां आवश्‍यकता पड़ती है अपनी खुद की धनराशि खर्च करते हैं। उन्‍होंने यह सिद्ध कर दिया है कि ग्रामीण समुदाय निष्‍क्रिय नहीं हैं और वे अपनी समस्‍याओं का समाधान करने में सक्षम हैं। उन्‍होंने यह भी सिद्ध कर दिया है कि वे अपने समुदाय के अधूरे सपनों को पूरा कर सकते हैं तथा वे ग्रामीण आंध्र प्रदेश के स्‍तर में गुणवत्‍ता परक सुधार लाएंगे। एक खास बात जो अपार्ड ने देखी कि भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों तथा चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच कार्य का बेहतर माहौल बना जबकि यह लगता था कि इनके बीच टकराव तथा तकरार न हो जाए। यात्रा जारी है और भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों से लम्‍बी सूची प्राप्‍त करने की अपेक्षा है।        {
पी.आई.बी.}        ***

*ग्रामीण विकास मंत्रालय से प्राप्‍त सामग्री के आधार पर

Sunday, January 22, 2012

शहर-ए-दिल्ली, पुराना नहीं होता

विशेष लेख                                                                                    लेखक:-सतपाल *
सात बार उजड़ने और बसने की कहानी
दिल्ली जो एक शहर है, हर शख्स की पसंद
चर्चे इस शहर के हमेशा रहे बुलन्द।

किसी भी दौर में यह वीराना नहीं होता
शहर-ए-दिल्ली, कभी पुराना नही होता।

आज चर्चा है दिल्ली के सौ साल पूरे होने की मगर तथ्य पर गौर करें तो पता चलेगा कि यह सत्य नहीं हैं। दिल्ली का इतिहास कई हजार साल पुराना है। कहते है कि पांडवों की दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ था। इस बीच का कई सैकडों वर्ष का विवरण गुमनाम है मगर, सात बार उजड़ने और बसने की कहानी आज भी लोगों को याद है। इन सात शहरों के नाम और खंडहर तो अपने काल का हाल चाल सुना रहे हैं।  दिल्ली हमेशा से देश की राजधानी रही ।  हर साम्राज्य ने दिल्ली को देश का दिल समझकर इसे राजधानी बनाना पसंद किया।  मुगल साम्राज्य भी अपनी राजधानी आगरा और फतेहपुर सीकरी से लेकर दिल्ली आया और ख्वाबों के हसीन शहर शाहजहांनाबाद की तामीर कराई। यमुना नदी के किनारे बसा शहर समूचे संसार में मशहूर हुआ और कई विदेशी राजा इससे ईष्र्या करने लगे।  अंग्रेजों को भी यहां के ईमानदार और मेहनती लोग और यहां का भूगोल और हरा-भरा इलाका पसंद आया और उन्होंने 1911 में अपने दरबार में अपने इण्डिया की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाने की घोषणा कर दी।  उन्होंने यह घोषणा तब के तमाम राजा, महाराजाओं, नवाबों और बादशाहों की उपस्थिति में की ताकि हरेक आम और खास को इसकी जानकारी मिल जाए और राजधानी के इस बदलाव का संदेश देश के कोने-कोने में पहुंच जाए।  इस तरह यह सौ साल फिर से दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान करने से संबंधित है।  मुगलों के कमजोर हो जाने और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजधानी के रूप में कलकत्ता का महत्व बढ़ जाने के बाद अंग्रेजों ने यह जरूरी समझा कि देश की पुरातन, सनातन राजधानी यानि ऐतिहासिक शहर दिल्ली को राजधानी बनाया जाए ताकि वह एक ऐसे शहर से समूचे भारत पर लम्बे से लम्बे समय तक राज कर सकें, जहां से मुगल सल्तनत का हुक्म देश के कोने-कोने तक सम्मान और गर्व के साथ सुना जाता था। 
कुछ लोग इसे नई दिल्ली के सौ साल होने का दावा कर रहे है।  गौर किया जाए तो, पता चलेगा कि यह भी सत्य नहीं है।  न तो 1911 में नई दिल्ली की नींव पड़ी और न ही इस साल नई दिल्ली का उद्घाटन किया गया।  नई दिल्ली का उद्घाटन तो 1931 में हुआ जिसके बाद दिल्ली एक नगर से महानगर बनना शुरू हो गया।
यह सच है कि आज ज्यादातर दिल्ली का भाग नया है मगर जो शहर कभी दीवारों के बीच सटा हुआ था और मिली-जुली तहजीब का मरकज माना जाता था वह भी तो नया ही महसूस होता है, क्योंकि वहां का रहन-सहन पूरी तरह बदला तो नहीं मगर आधुनिकता के साथ घी और शक्कर की तरह मिल कर और भी समृद्ध हो गया है।
           अंग्रेजों ने जब राजधानी दिल्ली बनाने की घोषणा की तो उन्होंने सिविल लाइन्स में राजधानी के लिए जरूरी इमारतें बनानी शुरू की और कश्मीरी गेट को मुख्य बाजार और रिज की दहलीज के चारों ओर सत्ता के गलियारे बनाने शुरू किए।  लेकिन जब उन्हें यमुना जो कभी बारहमासी नदी हुआ करती थी, उसका रौद्र रूप दिखाई दिया तो वह भयभीत हो गए और इस इलाके को निचला क्षेत्र मानकर एक उंचे स्थान पर राजधानी बनाने की तलाश में निकल पड़े।  मगर, दिल्ली की सबसे पुरानी चर्च कश्मीरी गेट और चांदनी चौक में अब भी विद्यमान हैं और किसी लिहाज से पुरानी नहीं लगती।  इसी तरह पुराना सचिवालय तो अंग्रेजों की पहली संसद थी और इसी के सभागार में दिल्ली यूनिवर्सिटी की पहली कन्वोकेशन हुई थी। दिल्ली यूनिवर्सिटी का वी0सी0 ऑफिस कभी वायसरॉय निवास था।  कहां बदला है ये सब कुछ।  पहले से कहीं ज्यादा रौनक और ताजगी है वहां।

अंग्रेजों ने जब नई दिल्ली का निर्माण शुरू किया तो न जाने कितनी इमारतें बनाई गई।  लुटियन के नक्शे के हिसाब से खुला-खुला, हरा-भरा नया शहर यानी नई दिल्ली सामने आई।  इसकी हर इमारत ऐतिहासिक है मगर इस्तेमाल की दृष्टि से नई भी है और सुविधा सम्पन्न भी।  क्या नई दिल्ली की शान पुरानी हुई है?  नहीं, कभी नहीं हो सकती।  एक समय आया जब अंग्रेजों का बनाया कनॉट प्लेस व्यापार की दृष्टि से महत्व खोने लगा मगर जब मेट्रो का जादू चला तो यहां की रौनक लौट आई और व्यापारी भी फिर प्रसन्न होने लगे।  यह साबित करता है कि दिल्ली कभी न तो बूढ़ी होगी और न ही पुरानी।
           अगर हम तब और अब की ट्रांसपोर्ट की चर्चा करें तो आप महसूस करेंगे कि अंग्रेजों के जमाने के ट्रांसपोर्ट के छोड़े गए निशान पर आज हमारी पब्लिक ट्रांसपोर्ट दौड़ रही है।  अंग्रेजों ने 1903 में चांदनी चौक से ट्राम का सफर शुरू किया था। यह ट्राम 1963 तक चली और इसका किराया एक टका यानी आधा आना और एक आना हुआ करता था।  आज उसी स्थान के नीचे चांदनी चौक, चावड़ी बाजार और सब्जी मण्डी, बर्फखाने में भूमिगत और एलिवेटिड मेट्रो दौड़ रही है।  कभी अंग्रेजों ने रायसीना हिल्स तक निर्माण के लिए पत्थर पहुंचाने के मकसद से रेल लाइन बिछाई थी वहां जमीन के नीचे आज मेट्रो की दो लाइनें सेंट्रल सेक्रेट्रियट स्टेशन से निकल रही इतना ही नहीं अंग्रेजों ने 1911 में अपने दरबार तक जाने के लिए एक रेल लाइन बिछाई थी जो आजाद पुर तक दौड़ती थी।  उसी लाइन के एक स्टेशन तीस हजारी की जगह पर ही आज दिल्ली मेट्रो का तीस हजारी स्टेशन है।

                आज भी लोग कुतुब मीनार को दिल्ली की पहचान मानते हैं। यह बात और है कि कई किताबों में बहाई टेम्पल यानी लोटस टेम्पल को दिल्ली की नई पहचान मानकर दिखाया जाता है मगर कुतुब मीनार अपनी बुलंदी की वजह से हर काल में नई पहचान ही बना रहेगा।  कभी यहां तक जाने के लिए लोग पुरानी दिल्ली से तांगों पर जाया करते थे। हरियाली के बीचों बीच संकरी सड़क से होकर तांगे में बैठे मुसाफिरों को एअर कंडीशन सवारी का आनन्द मिलता था और आज वहां तक जाने के लिए एअर कंडीशन मेट्रो है।  कह सकते है कि वही दिल्ली, वही कुतुब मीनार, वही एअर कंडीशन सफर तो कौन कहता है कि दिल्ली पुरानी हुई है।  दिल्ली का दिल एक ऐसे नौजवान की तरह धड़कता है जिसे हर दम आगे बढ़ने की ललक होती है।  इसी तरह दिल्ली हर पल, संवरती, निखरती, बदलती, सुधरती दिखाई देती है तो कौन कहेगा कि यह शहर पुराना होता है।
इस शहर के हर दम नया रहने के तो ये कुछ संकेत है।  अगर हजारों साल की इस दिल्ली के इतिहास में नएपन का मजा लेना हो तो दिल से दिल्ली वाला बनना होगा। 

दिल्ली नहीं है शहर, एक मिजाज का नाम है।
यह  खास, इस कदर है कि इसको सलाम है।

***
सूचना:

1.*लेखक दिल्ली की मुख्यमंत्री के सूचना अधिकारी हैं।
2.तस्वीरें इंटरनेट से जुटाई गयी हैं....अगर किसी को एतराज़ हो तो इन्हें हटा दिया जायेगा .

Saturday, January 21, 2012

उन्नति के पथ पर अग्रसर

राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र-आर के श्रीवास्तव*
राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र (एनसीडीपीडी) की स्थापना 1999 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) द्वारा की गई थी। राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र बोर्ड का प्रतिनिधित्व प्रतिष्ठित निर्यातक, नीति-निर्धारक और व्यापार तथा उद्योग के प्रतिष्ठित व्यक्ति करते हैं। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) एनसीडीपीडी के पदेन अध्यक्ष होते हैं। यह केन्द्र सदस्य आधारित संस्था है जो प्रमुख तौर पर हस्तशिल्प क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। डिजाइन/उत्पाद विकास और प्रौद्योगिकी के कार्यक्षेत्रों में ठोस माल क्षेत्र के अंतर को पूरा करने के उद्देश्य के साथ इसकी शुरुआत की गई थी। समूहों के लिए पैन इंडिया आधार पर डिजाइन और उत्पाद विकास गतिविधियों को पूरा करने के लिए यह केन्द्र विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के करीबी सानिध्य में कार्य करता है। इस केन्द्र के तहत बहुत सारे राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय डिजाइनर विशेषीकृत डिजाइन/उत्पाद सेवाओं की संपूर्ण श्रेणी प्रदान करने के लिए कार्यरत है।
सेवाएं डिजाइन और उत्पाद विकास, प्रदर्शनी डिजाइन, ग्राफिक-डिजाइन और पैकेज डिजाइन जैसे कई क्षेत्रों में यह केन्द्र अपनी सेवाएं प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त एनसीडीपीडी सतत आपूर्ति प्रबंधन श्रृंखला का सृजन भी करता है। एनसीडीपीडी में गुणवत्ता और प्रौद्योगिकी उन्नयन के साथ ही डिजाइनरों की मदद से डिजाइनों को उत्पादों में तब्दील भी किया जाता है। डिजाइन केन्द्रों, उत्पाद केन्द्रों/संकुलों पर डिजाइन बैंक की स्थापना के जरिए एनसीडीपीडी ढांचागत सहयोग प्रदान करता है। डिजाइन और उत्पाद विकास को बढ़ावा देने के लिए यह औद्योगिक समूहों को शुरु से अंत तक डिजाइन सेवाएं प्रदान करता है। इस केन्द्र में बडे पैमाने पर उत्पादन के लिए मूलभूत कार्यों में मशीनीकरण के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध है।

उद्देश्यः- निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करना एनसीडीपीडी का लक्ष्य है

·      अंतर-राष्ट्रीय खरीदारों की बदलती हुई पसंद और डिजाइन अवधारणाओं को पूरा करना।

·         हस्तशिल्प निर्यातक समुदाय को डिजाइनों के बारे में बदलते हुए प्रचलन और आगे आने वाले बदलावों के संबंध में नियमित तौर पर समय-समय पर जानकारी उपलब्ध कराना।

·         भारतीय डिजाइनों की विशिष्टता का सृजन और इसे सुदृढ़ बनाना

·         प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली आधुनिक तकनीकों के बदलते वैश्विक परिदृश्य के बारे में अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराना।

·         उत्पाद विकास और उन्नयन गुणवत्ता को समर्थन देना।

क्षमता/कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन

     एनसीडीपीडी को मानव संसाधन विकास कार्यक्रम की क्षमता/कौशल विकास के उन्नयन का जिम्मा सौंपा गया है ताकि वैश्विक बाज़ार खास तौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रतिस्पर्धी बाज़ार में मुकाबला किया जा सके। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं :-

·         कुल 500 कार्यक्रमों का संचालन किया गया।

·         पिछले दो वर्षों में 11,000 कारीगरों/शिल्पकारों को प्रशिक्षित किया गया।

·         पूर्वोत्तर क्षेत्र सहित समूचे भारत में 30 से भी अधिक शिल्प संकुलों को समाविष्ट किया गया।

·         समूचे भारत में 200 से भी अधिक संकायों/स्रोत संपन्न व्यक्तियों के साथ गठजोड़।

·         अच्छी तरह से संरचित पाठ्यक्रम

·         एक से पांच के पैमाने पर कार्यक्रम को 4.5 अंक प्रदान किया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप में सतत रोज़गार के लिए भारत और बांग्लादेश के बीच पटसन (जूट) क्षेत्र में सहमति-ज्ञापन पर हस्ताक्षर
   पटसन क्षेत्र में उत्पाद और डिजाइन विकास द्वारा भारत तथा बांग्लादेश में सतत मूल्य आधारित रोजगार को बढ़ावा देने के लिए एनसीडीपीडी ने इस वर्ष यूएनटीएडी के तहत बांग्लादेश में अंतर-राष्ट्रीय जूट स्टडी ग्रुप (आईजेएसजी) के साथ गठजोड और समन्वय किया। इस सहमति ज्ञापन से पटसन से संबंधित कार्यशालाओं, बैठकों और प्रकाशनों आदि के द्वारा सतत रोज़गार और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच अनुसंधान और डिजाइन गठजोड़ गतिविधियों को बल मिलेगा। इस सहमति ज्ञापन के जरिए जूट से संबंधित विविध उत्पाद क्षेत्रों के उद्यमियों, निर्यातकों तथा कारीगरों आदि के लिए आईजीएसजे नवीन/आकर्षक डिजाइनों और उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि में सहयोग देगा तथा एनसीडीपीडी जूट के क्षेत्र में संयुक्त गतिविधियों के विकास और क्रियान्वयन के लिए डिजाइनरों और विशेषज्ञों को उपलब्ध कराएगा।

भारत-अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भागीदारी
  14-27 नवंबर के बीच आयोजित भारत अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले के लिए इस वर्ष का विषय था- "इंडियन हैंडिक्राफ्ट- द मैदिक ऑफ द गिफ्टेड हैंड्स"। इसे ध्यान में रखते हुए एनसीडीपीडी ने अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए थीम पैवेलियन की स्थापना की। इसके तहत वैश्विक फलक पर भारतीय हस्तशिल्प की विस्तृत श्रृंखला की प्रस्तुति की गई। इस प्रदर्शनी के ज़रिए हस्तशिल्पियों/कारीगरों और छोटे निर्माताओं को अपने लिए बेहतर बाजार संबंधों का निर्माण करने में मदद मिली। एनसीडीपीडी के पैवेलियन की ओर प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोग आकर्षित हुए।।


गणतंत्र दिवस परेड-2012 में झांकी का प्रस्तुतिकरण
   भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तहत विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय द्वारा एनसीडीपीडी को गणतंत्र दिवस परेड-2012 में हस्तशिल्प पर झांकी प्रस्तुत करने के लिए केन्द्रीय एजेंसी के रुप में नियुक्त किया गया है। झांकी के लिए चयनित विषय "प्राचीन से नवीनः भारतीय वस्त्र और हस्तशिल्प क्षेत्र में विकास" है।

भविष्य के लिए रणनीतियां
·         नवीन उत्पाद श्रृंखला
Ø      सौ से भी अधिक नवीन उत्पाद श्रृंखला को प्रस्तुत करना।

Ø      स्थापित उत्पाद समूहों को नवीन बाज़ारों में शुरु करना।

·         उत्पाद श्रृंखला में विविधता लाना

Ø   सजावटी उपकरणों के रुप में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देना

Ø   गिफ्ट के रुप में हस्तशिल्प की अवधारणा को बढ़ावा देना

Ø   डिजाइन की प्रमुखता के साथ अभिनव उत्पाद समूह

·         गुणवत्ता में सुधार लाना

Ø   वैधानिक आवश्यकताएं/फैक्टरी अनुपालन/सामाजिक अंकेक्षण/प्रमाणपत्रों

Ø   परीक्षण और फैक्टरी प्रमाणन/क्रय-विक्रय और समर्थन सेवाएं

           एनसीडीपीडी कारीगरों और शिल्पकारों की कौशल क्षमता/विकास के लिए प्रतिबद्ध है और आने वाले समय में भी यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा। साथ ही भारतीय हस्तशिल्प में डिजाइन और उत्पाद विकास के नवीन आयामों को विकसित करने की प्रक्रिया जारी रहेगी।

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*लेखक राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र में कार्यकारी निदेशक हैं
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