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Sunday, May 19, 2013

आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है

Sat, May 18, 2013 at 11:35 PM
न्याय पाने की भाषायी आज़ादी          --राजीव गुप्ता , 09811558925
स्वतंत्रता पूर्व भारत मे सरकारी समारोहों में ‘गाड सेव द किंग’ या ‘गाड सेव द क़्वीन’ गाया जाता था. पर्ंतु 15 अगस्त 1947 से उसका स्थान ‘जन-गण-मन-अधिनायक जय हे’ ने लिया. रातोंरात सभी सरकारी भवनो पर से ‘यूनियन जैक’ झंडा उतारकर तिरंगा झंडा लहरा दिया गया. भारत में स्वतंत्रता का जश्न मनाया गया. भारत को यह स्वतंत्रता लाखो स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की कीमत पर मिली थी. पहली बार भारत के लोगों ने आज़ादी का अर्थ समझा था. देश का संविधान बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी और 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और और राष्ट्रभाषा का बहुत महत्व होता है. इसी महत्ता के चलते देश का राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान तय हो गया परंतु बहुभाषी भारत मे राष्ट्रभाषा का चुनाव करने में बहुत समय लगा. देश का यह दुर्भाग्य ही है कि आज भी अपने देश की कोई राष्ट्रभाषा नही है. हिन्दी के प्रचलन के चलते हिन्दी को राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया गया था.
हिन्दी को राजभाषा का दर्जा
लेखक राजीव गुप्ता 
यह चित्र जय हिंद से साभार 
क्रांतिकारियों के संघर्षो के कारण देश को स्वाधीनता मिली परंतु संविधान सभा का गठन स्वतंत्रता-पूर्व जुलाई, 1946 में ही हो गया था. 11 दिसम्बर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी सदस्य चुना गया. डा. कैलाश चन्द्र भाटिया ने एक लेख में लिखा है कि संविधान सभा की नियम समिति ने डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता मे 1946 में ही एक निर्णय ले लिया था कि संविधान सभा का कामकाज की हिन्दी या अंग्रेजी ही होगी और यदि कोई सदस्य अपनी मातृभाषा मे भाषण देना चाहे तो अध्यक्ष की अनुमति से वह अपनी मातृभाषा मे भाषण दे सकता है. फरवरी, 1948 में संविधान का जो प्रारूप प्रस्तुत किया गया उसमें राजभाषा के संबंध को उल्लेख नही था. परंतु कन्हैया लाल मणिक लाल मुंशी के अथक प्रयासों से 12,13,14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा मे राजभाषा के विषय पर चर्चा हुई और 14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मताओं ने हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाया. इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि मे लिखी गई हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप मे अंगीकार किया गया. हलाँकि संविधान के अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार संविधान लागू होने से 15 वर्ष पश्चात तक अर्थात 25 जनवरी 1965 तक अंग्रेजी भाषा को संघ के सभी कार्यों के लिये अंग्रेजी भाषा मे करने की व्यवस्था की गई. साथ यह व्यवस्था भी की गई देश के महामहिम राष्ट्रपति यदि चाहें तो 15 वर्ष की अवधि पूर्व भी यह आदेश दे सकते है कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग किया जा सकता है.    
हिन्दी और राष्ट्रपति के आदेश
राष्ट्रपति का पहला आदेश 27 मई 1952 को विधि-मंत्रालय की अधिसूचना के रूप में और भारत के राजपत्र में प्रकाशित हुआ. इस आदेश के अनुसार राज्यपालों, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिपत्रों को प्राधिकृत कर दिया गया. राष्ट्रपति का दूसरा आदेश 3 दिसम्बर 1955 को गृह मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया जिसे संविधान (राजकीय प्रयोजनो के लिये हिन्दी भाषा) आदेश 1955’ के रूप में जाना जाता है. इस आदेश के अनुसार जनता से पत्र-व्यवहार, संसद और प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ, सरकारी संकल्प, राजभाषा को अपनाने वाले राज्यों से पत्र-व्यवहार, संधिय़ाँ व करार जैसे प्रमुख क्रियाकलापों में हिन्दी को अपनाने के लिये कहा गया. इसी आदेश के परिणामस्वरूप विभिन्न मंत्रालयों में हिन्दी-अनुवादकों की नियुक्तियाँ शुरू हुई. उसके बाद राष्ट्रपति द्वारा कई आदेश जारी किये गये और 1963 में राजभाषा अधिनियम बना.
योग में आशंकाएँ
 यह चित्र शंखनाद से साभार 
हिन्दी-प्रयोग ने लोगों को कई आशंकाओं में डाल दिया. सैन्य-सेवा मे हिन्दी-प्रयोग से लोग सबसे ज्यादा आशंकित थे. उनका मानना था कि सेना के जवानो आदेश या उनके साथ वार्तालाप अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर कैसे उपयोग किया जाय. भाषा के कारण सैनिकों के मनोबलों और देश-सुरक्षा के साथ खिलवाड नही किया जा सकता. इसी प्रकार से हिन्दी-प्रयोग को लेकर लोगों के मन में बहुत सी आशंकाएँ रही, जिसका कारण लोग मुख्यतया दैनिक कार्यों के निमित्त हिन्दी मे शब्दों की कमी मानते थे. कुछ कमोबेश यही हालत विधि क्षेत्र की भी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के प्रारम्भिक वर्षों में न्यायालयों का अधिकतर कार्य फारसी भाषा में होता था. आज भी हम न्यायालयों के आदेशों मे हम फारसी भाषा का प्रभाव देख सकते हैं. 1836 तक आते-आते फारसी का उपयोग खत्म हो गया और उसका स्थान हिन्दी,अंग्रेजी और उर्दू ने ले लिया. 1950 में देशी रियासतों के भारत में विलय होने तक न्यायालयों का कामकाज़ प्रादेशिक भाषा मे ही होता था. ग्वालियर, पटियाला, बडौदा, जम्मू-कश्मीर हैदराबाद की रियासतें इसका प्रमुख उदाहरण हैं. इतना ही नही भारत की विशालता के चलते ही यहाँ पर कई भाषाई-राज्यों का भी गठन किया गया. और राज्यो को यह अधिकार दिया गया कि वे खुद तय करें कि उनकी राज्यभाषा क्या होगी. सारी परिस्थितियों पर चर्चा के उपरांत यह तय किया गया कि सभी राज्य एक दूसरे राज्य व केन्द्र के साथ राजभाषा में ही पत्र-व्यवहार करें. परंतु यह देश की विडम्बना ही है कि सरकारी स्तर पर प्रयास करने के बावज़ूद आज भी राजभाषा सुचारू रूप से देश-स्तर पर संतोषजनक रूप से लागू नही है. आज भी अशिक्षित लोगों को न्यायालय मे न्याय उनकी मातृभाषा में नही मिलता है.
यह चित्र जय हिंद से साभार 
पिछले दिनों कैट (केन्द्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण) से लेकर उच्च न्यायालय तक के दिये हुए फैसलों को पलटते हुए देश की सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दी मे आरोपपत्र पाने के अधिकार पर ऐसा ऐतिहासिक फैसला दिया जिसने देश के हिन्दी-प्रेमियों की दम तोडती आस पर संजीवनी-बूटी सा असर किया. जिसने आम-जन को अपनी मातृभाषा मे न्याय पाने अधिकार की माँग करने वालों लोगों में एक आस की अलख को जगाया. दरअसल यह मामला मुम्बई के एक नौसेना कर्मी मिथलेश का था, जिसे उच्चाधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार व उनका आदेश न मानने पर एक आरोपपत्र दिया गया था. नौसेना कर्मी ने हिन्दी भाषा मे आरोपपत्र की मांग की जिसे विभाग ने खारिज कर दिया. जिससे नौसेना कर्मी ने विभागीय जाँच मे भाग नही लिया. परिणामत: विभाग ने नौसेना कर्मचारी पर कार्यवाही कर सजा के रूप मे उसके वेतनमान मे कटौती कर दी. जिसे नौसेना कर्मचारी ने आरोपपत्र हिन्दी में न मिलने के कारण को आधार बनाते हुए विभागीय जाँच को रद्द करने की माँग की. स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात आज भी सर्वोच्च न्यायालय और  अधिकांश उच्च न्यायालयों मे अपनी मातृभाषा मे आरोपी अपना पक्ष नही रख सकता. परिणामत: आरोपी को यह पता ही नही चल पाता कि उसके वकील माननीय न्यायाधीशों के समक्ष क्या तर्क कर रहें है. इसलिये आरोपी अपने आप को ठगा-सा महसूस करते है.
कहने को तो हिन्दी देश की राजभाषा है, परंतु आज भी प्रशासनिक व न्यायालय के कामकाज़ में अंग्रेजी का ही वर्चस्व है. देश की शीर्ष अदालत के फैसले के निहितार्थ यही है कि ऐसे मामलों में न्याय के लिये उसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए जिस भाषा को आरोपी समझता हो, ताकि कोई भी व्यक्ति तथ्यों को ठीक-ठाक समझकर अपना पक्ष रख सके. अब समय आ गया है कि अब राजभाषा अधिनियम की नये सिरे से समीक्षा की जाये क्योंकि किसी भी स्वतंत्र देश में मातृभाषा में अपना पक्ष रखना और जवाब मांगना किसी भी व्यक्ति का हक होता है.

Monday, February 04, 2013

उल्लू का राज खुला

3.02.2013, 15:34
 दर्जनों उल्लुओं के एक्स-रे और सीटी स्कैन्स किए गए
Национальный зоопарк Манагуа Никарагуа карлик сова карлик Бруно Браулио птица птицы
                                                                                                                             फोटो: EPA
उल्लू दिन की रौशनी में देख नहीं सकता लेकिन रात के अँधेरे में उल्लू की शक्ति बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। उल्लू की वचित्र खूबियों की चर्चा अक्सर सुनने में मिलती है। तन्त्र की दुनिया में तो उल्लू को वश में करने के बहुत ही कठिन तरीके भी बताये जाते रहे हैं। लेकिन इस सब के साथ साथ विज्ञान अपना काम करता है। अब विज्ञानं ने उल्लू की गर्दन में हैरानीजनक हद तक पाए जाते  लचीलेपन के राज़ का पता लगा लिया है। रेडियो रूस ने इस सम्बन्ध में एक दिलचस्प खबर दी है।
उल्लू अपनी लचीली गर्दन के लिए मशहूर है और अब वैज्ञानिकों ने इसके कारण का भी पता लगा लिया है। उल्लू किसी भी दिशा में अपनी गर्दन को लगभग पूरा [270 डिग्री तक] घुमा सकता है और खास बात यह है कि ऐसा करने में उल्लू को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। उल्लू की शारीरिक संरचना के अध्ययन के लिए दर्जनों उल्लुओं के एक्स-रे और सीटी स्कैन्स किए गए। इसे लेकर मीडिया में जो कुछ आता रहा उसके  अनुसार उल्लुओं का गर्दन घुमाने का रहस्य अब सुलझ गया है। इस अध्ययन के लिए उल्लू की नसों में रंगीन तरल प्रवाहित कर कृत्रिम रक्त प्रवाह बढ़ाया गया। उल्लू के जबड़े की हड्डी से ठीक नीचे सिर के आधार में स्थित रक्त वाहिकाएं रंगीन तरल के पहुंचने के साथ-साथ लंबी होती गई। यह प्रक्रिया तब तक चली जब तक कि यह रंगीन तरल रक्त भंडार में जमा नहीं हो गया। उल्लू में पाया जाने वाला यह गुण बिल्कुल अनोखा है जबकि मनुष्य में ऐसा नहीं होता है। (रेडियो रूस से साभार) उल्लू का राज खुला

Saturday, January 21, 2012

उन्नति के पथ पर अग्रसर

राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र-आर के श्रीवास्तव*
राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र (एनसीडीपीडी) की स्थापना 1999 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) द्वारा की गई थी। राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र बोर्ड का प्रतिनिधित्व प्रतिष्ठित निर्यातक, नीति-निर्धारक और व्यापार तथा उद्योग के प्रतिष्ठित व्यक्ति करते हैं। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) एनसीडीपीडी के पदेन अध्यक्ष होते हैं। यह केन्द्र सदस्य आधारित संस्था है जो प्रमुख तौर पर हस्तशिल्प क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। डिजाइन/उत्पाद विकास और प्रौद्योगिकी के कार्यक्षेत्रों में ठोस माल क्षेत्र के अंतर को पूरा करने के उद्देश्य के साथ इसकी शुरुआत की गई थी। समूहों के लिए पैन इंडिया आधार पर डिजाइन और उत्पाद विकास गतिविधियों को पूरा करने के लिए यह केन्द्र विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के करीबी सानिध्य में कार्य करता है। इस केन्द्र के तहत बहुत सारे राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय डिजाइनर विशेषीकृत डिजाइन/उत्पाद सेवाओं की संपूर्ण श्रेणी प्रदान करने के लिए कार्यरत है।
सेवाएं डिजाइन और उत्पाद विकास, प्रदर्शनी डिजाइन, ग्राफिक-डिजाइन और पैकेज डिजाइन जैसे कई क्षेत्रों में यह केन्द्र अपनी सेवाएं प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त एनसीडीपीडी सतत आपूर्ति प्रबंधन श्रृंखला का सृजन भी करता है। एनसीडीपीडी में गुणवत्ता और प्रौद्योगिकी उन्नयन के साथ ही डिजाइनरों की मदद से डिजाइनों को उत्पादों में तब्दील भी किया जाता है। डिजाइन केन्द्रों, उत्पाद केन्द्रों/संकुलों पर डिजाइन बैंक की स्थापना के जरिए एनसीडीपीडी ढांचागत सहयोग प्रदान करता है। डिजाइन और उत्पाद विकास को बढ़ावा देने के लिए यह औद्योगिक समूहों को शुरु से अंत तक डिजाइन सेवाएं प्रदान करता है। इस केन्द्र में बडे पैमाने पर उत्पादन के लिए मूलभूत कार्यों में मशीनीकरण के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध है।

उद्देश्यः- निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करना एनसीडीपीडी का लक्ष्य है

·      अंतर-राष्ट्रीय खरीदारों की बदलती हुई पसंद और डिजाइन अवधारणाओं को पूरा करना।

·         हस्तशिल्प निर्यातक समुदाय को डिजाइनों के बारे में बदलते हुए प्रचलन और आगे आने वाले बदलावों के संबंध में नियमित तौर पर समय-समय पर जानकारी उपलब्ध कराना।

·         भारतीय डिजाइनों की विशिष्टता का सृजन और इसे सुदृढ़ बनाना

·         प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली आधुनिक तकनीकों के बदलते वैश्विक परिदृश्य के बारे में अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराना।

·         उत्पाद विकास और उन्नयन गुणवत्ता को समर्थन देना।

क्षमता/कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन

     एनसीडीपीडी को मानव संसाधन विकास कार्यक्रम की क्षमता/कौशल विकास के उन्नयन का जिम्मा सौंपा गया है ताकि वैश्विक बाज़ार खास तौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रतिस्पर्धी बाज़ार में मुकाबला किया जा सके। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं :-

·         कुल 500 कार्यक्रमों का संचालन किया गया।

·         पिछले दो वर्षों में 11,000 कारीगरों/शिल्पकारों को प्रशिक्षित किया गया।

·         पूर्वोत्तर क्षेत्र सहित समूचे भारत में 30 से भी अधिक शिल्प संकुलों को समाविष्ट किया गया।

·         समूचे भारत में 200 से भी अधिक संकायों/स्रोत संपन्न व्यक्तियों के साथ गठजोड़।

·         अच्छी तरह से संरचित पाठ्यक्रम

·         एक से पांच के पैमाने पर कार्यक्रम को 4.5 अंक प्रदान किया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप में सतत रोज़गार के लिए भारत और बांग्लादेश के बीच पटसन (जूट) क्षेत्र में सहमति-ज्ञापन पर हस्ताक्षर
   पटसन क्षेत्र में उत्पाद और डिजाइन विकास द्वारा भारत तथा बांग्लादेश में सतत मूल्य आधारित रोजगार को बढ़ावा देने के लिए एनसीडीपीडी ने इस वर्ष यूएनटीएडी के तहत बांग्लादेश में अंतर-राष्ट्रीय जूट स्टडी ग्रुप (आईजेएसजी) के साथ गठजोड और समन्वय किया। इस सहमति ज्ञापन से पटसन से संबंधित कार्यशालाओं, बैठकों और प्रकाशनों आदि के द्वारा सतत रोज़गार और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच अनुसंधान और डिजाइन गठजोड़ गतिविधियों को बल मिलेगा। इस सहमति ज्ञापन के जरिए जूट से संबंधित विविध उत्पाद क्षेत्रों के उद्यमियों, निर्यातकों तथा कारीगरों आदि के लिए आईजीएसजे नवीन/आकर्षक डिजाइनों और उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि में सहयोग देगा तथा एनसीडीपीडी जूट के क्षेत्र में संयुक्त गतिविधियों के विकास और क्रियान्वयन के लिए डिजाइनरों और विशेषज्ञों को उपलब्ध कराएगा।

भारत-अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भागीदारी
  14-27 नवंबर के बीच आयोजित भारत अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले के लिए इस वर्ष का विषय था- "इंडियन हैंडिक्राफ्ट- द मैदिक ऑफ द गिफ्टेड हैंड्स"। इसे ध्यान में रखते हुए एनसीडीपीडी ने अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए थीम पैवेलियन की स्थापना की। इसके तहत वैश्विक फलक पर भारतीय हस्तशिल्प की विस्तृत श्रृंखला की प्रस्तुति की गई। इस प्रदर्शनी के ज़रिए हस्तशिल्पियों/कारीगरों और छोटे निर्माताओं को अपने लिए बेहतर बाजार संबंधों का निर्माण करने में मदद मिली। एनसीडीपीडी के पैवेलियन की ओर प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोग आकर्षित हुए।।


गणतंत्र दिवस परेड-2012 में झांकी का प्रस्तुतिकरण
   भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तहत विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय द्वारा एनसीडीपीडी को गणतंत्र दिवस परेड-2012 में हस्तशिल्प पर झांकी प्रस्तुत करने के लिए केन्द्रीय एजेंसी के रुप में नियुक्त किया गया है। झांकी के लिए चयनित विषय "प्राचीन से नवीनः भारतीय वस्त्र और हस्तशिल्प क्षेत्र में विकास" है।

भविष्य के लिए रणनीतियां
·         नवीन उत्पाद श्रृंखला
Ø      सौ से भी अधिक नवीन उत्पाद श्रृंखला को प्रस्तुत करना।

Ø      स्थापित उत्पाद समूहों को नवीन बाज़ारों में शुरु करना।

·         उत्पाद श्रृंखला में विविधता लाना

Ø   सजावटी उपकरणों के रुप में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देना

Ø   गिफ्ट के रुप में हस्तशिल्प की अवधारणा को बढ़ावा देना

Ø   डिजाइन की प्रमुखता के साथ अभिनव उत्पाद समूह

·         गुणवत्ता में सुधार लाना

Ø   वैधानिक आवश्यकताएं/फैक्टरी अनुपालन/सामाजिक अंकेक्षण/प्रमाणपत्रों

Ø   परीक्षण और फैक्टरी प्रमाणन/क्रय-विक्रय और समर्थन सेवाएं

           एनसीडीपीडी कारीगरों और शिल्पकारों की कौशल क्षमता/विकास के लिए प्रतिबद्ध है और आने वाले समय में भी यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा। साथ ही भारतीय हस्तशिल्प में डिजाइन और उत्पाद विकास के नवीन आयामों को विकसित करने की प्रक्रिया जारी रहेगी।

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*लेखक राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र में कार्यकारी निदेशक हैं
***

Friday, January 20, 2012

पहल लाई परि‍वर्तन

वि‍शेष लेख                                                                                     *किशन रतनानी
हम उत्‍साहि‍त और आशापूर्ण हैं लेकि‍न साथ ही सतर्क और चौकन्‍ने भी
महात्‍मा गांधी का कहना था कि‍ अपने प्रयोजन में दृढ़ वि‍श्‍वास रखने वाला इति‍हास के रूख को बदल सकता है।
     सामाजि‍क परि‍वर्तन भी तभी आते हैं जब हम प्रयोजन में दृढ़ वि‍श्‍वास रखें। दृढ़ वि‍श्‍वास के साथ-साथ सक्रि‍यता और सकारात्‍मकता के साथ पहल करें। ऐसी पहल परि‍वर्तन लाती है।
     वर्ष 2011 में स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में ऐसे कई परि‍वर्तन देखने को मि‍ले हैं, जि‍सका श्रेय चुनौति‍यों को समझने और सुलझाने की सटीक, बहुस्‍तरीय और अभि‍नव नीति‍ तथा स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय द्वारा की गई पहल को जाता है।
     एक साल तक पोलि‍यो मुक्‍त भारत ऐसा ही एक परि‍वर्तन है जो नजर आ रहा है। 13 जनवरी 2011 को पश्‍चि‍म बंगाल के हावड़ा जि‍ले के पांचला ब्‍लाक में एक बालि‍का पोलि‍यो से ग्रस्‍त पायी गई थी।
     अगले तीन वर्षों तक पोलि‍यो का पूरी तरह उन्‍मूलन अब हमारा प्रमुख प्रयोजन है। इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार कल्‍याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद ने कहा- ‘‘हम उत्‍साहि‍त और आशापूर्ण हैं, लेकि‍न साथ ही सतर्क और चौकन्‍ने भी।’’
     हर बार जब राष्‍ट्रीय पल्‍स पोलि‍यो टीकाकरण अभि‍यान चलाया गया, इसके हर दौर में 24 लाख वैक्‍सीनेटर, डेढ़ लाख सुपरवाईजर और 20 करोड़ से ज्‍यादा लोगों ने ये सुनि‍श्‍चि‍त कि‍या कि‍ 17 करोड़ 20 लाख बच्‍चों को पोलि‍यो की दवा पि‍ला दी जाए। चलती-फि‍रती टीमों का अपूर्व योगदान भी महत्‍वपूर्ण रहा।
      पिछले दशक के दौरान एचआईवी से ग्रस्‍त नए लोगों की वार्षिक संख्‍या में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। राष्‍ट्रीय एड्स  नियंत्रण कार्यक्रम और उसकी रोकथाम के उपायों के अधीन विभिन्‍न कार्यक्रमों के प्रभाव का यह एक सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण साक्ष्‍य है।
12 जनवरी को केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्री श्री गुलाम नबी आजाद ने राष्‍ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के रे‍ड रिबन एक्‍सप्रेस के तीसरे चरण का शुभारंभ किया। रेड रिबन एक्‍सप्रेस की मल्‍टी-मीडिया और बहु-क्षेत्रीय सामूहिक जागरूकता परियोजना एक नई पहल है और अपने तरह के एक अद्वितीय उदाहरण के रूप में विश्‍व भर में इसकी सराहना की गई है। पहली दिसम्‍बर, 2007 को रेड रिबन एक्‍सप्रेस के पहले चरण की शुरूआत हुई थी, जो जानकारी जन-जन तक पहुंचाने पर केन्द्रित था। वर्ष 2009 में इसका दूसरा चरण आरंभ किया गया था, जो सलाह और उपचार सेवाओं पर आधारित था। तीसरे चरण में सूचना शिक्षा और संचार वाहनों तथा लोक कला दलों के जरिये विशेषकर राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और छत्‍तीसगढ़ राज्‍यों में प्रदर्शनियों के साथ सूक्ष्‍म आयोजना पर जोर दिया जा रहा है, ताकि यह रेलगाड़ी जिन जि़लों से होकर गुजरेगी उसके आसपास की जनता को इसके बारे में जानकारी मिल सके।
·         संशोधित राष्‍ट्रीय क्षय रोग कार्यक्रम के तहत रोग की पहचान दर 75% तक और पूर्ण इलाज दर 85% तक आ गई है। क्षय रोग से होने वाली मृत्‍यु  के मामलों में भी 43% की कमी आई है।
·         नया डॉट्स लोगो शुरू किया गया- डॉट्स : पूरा कोर्स, पक्‍का इलाज’’ यह क्षय रोग और इसके आविर्भाव के बारे में उभरती चुनौतियों की प्रतिक्रिया का द्योतक है।

प्रजनन व शिशु स्‍वास्थ्‍य के क्षेत्र में कुछ ऐसे ही परिवर्तन हुए हैं :-

·         नवजात मृत्‍यु अनुपात वर्ष 2005 के 58 से घटकर 2009 में प्रति हजार नवजात 50 पर आ गयी है।
·         मातृ मृत्‍यु दर भी वर्ष 2004-2006 में 254 प्रति एक लाख प्रसव से घटकर वर्ष 2007-09 के दौरान 212 प्रति एक लाख प्रसव पर आ गई है।
·          प्रजनन दर 2005 में 2.9 से घटकर 2009 में 2.6 पर आ गई है।
·          व्‍यापक प्रतिरक्षण कार्यक्रम( यूआईपी) के तहत देश के 12-24 माह के 61 प्रतिशत बच्‍चे 6 बीमारियों का टीका ले चुके हैं।
·         देश में संस्‍थागत प्रसव, वर्ष 2007-08 के दौरान 47 %(डीएलएचएस III 2007-08)   से बढ़कर 2009 में 72.9 % हो गया है जैसा कि कवरेज इवेल्‍यूएशन सर्वे (सीईएस-2009) में पाया गया।
·         व्‍यापक प्रतिरक्षण कार्यक्रम के तहत हेपाटाइटिस बी का टीका और खसरा के दूसरे डोज का टीका लगाना शुरू किया गया है। साल 2011-12 के दौरान हेपाटाइटिस 'बी' का टीका अब पूरे देश में दिया जा रहा है। तमिलनाडु और केरल में 15 लाख बच्‍चों को प्रायो‍गिक तौर पर पेंटावैलेंट टीका दिया जा रहा है जो पांच बीमारियों डिप्‍थीरिया, कुकुरखांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस बी और हेमोफीलयस एन्‍फलुएंजा 'बी' से बच्‍चों को सुरक्षा प्रदान करता है।
·         जच्‍चा -बच्‍चा की सुरक्षा के लिए 1 जून 2011 को जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम शुरू किया गया जिसके तहत जन स्‍वास्‍थ्‍य संस्‍थाओं में प्रसव कराने वाली सभी गर्भवती महिलाओं का प्रसव मुफ्त होगा चाहे वह सीजेरियन ही क्‍यों न हो। इसके तहत मुफ्त दवा, रक्‍त, भोजन और आने-जाने का नि:शुल्‍क परिवहन उपलब्‍ध करवाया जा रहा हैं। जन्‍म के बाद 30 दिनों तक नवजात शिशु को संबंधित संस्‍थान में लाने ले जाने के लिए भी ये व्‍यवस्‍थाएं उपलब्‍ध होंगी। 35 में से 32 राज्‍यों और सभी केंद्र शासित-प्रदेशों में यह योजना लागू है।
·         स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्‍ड ट्रैकिंग सिस्‍टम (एमसीटीएस) नाम से एक ई-गवर्नेंस (ई-गवर्नेंस इनिशिएटिव) पहल की है जिसका उद्देश्‍य सभी गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की जानकारी जुटाना है ताकि जच्‍चा-बच्‍चा भी महिला के गर्भधारण से लेकर प्रसव के 42 दिन बाद और नवजात बच्‍चों के मामले में उसके 5 वर्ष तक का होने तक उपचार और प्रतिरक्षण सुनिश्चित किया जा सके। 11 दिसंबर 2011 तक इस प्रणाली के तहत एक करोड़ 27 लाख 41 हजार 402 महिलाओं तथा 69 लाख 55 हजार 165 बच्‍चों का पंजीकरण कराया गया है।
·         स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक संयुक्‍त जच्‍चा-बच्‍चा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड जारी किया गया है। जिससे गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्‍चे के स्‍वास्‍थ्‍य पर  प्रसव पूर्व से जन्‍म के बाद तक निगरानी रखी जा सके।
·         2005-06 के दौरान जननी सुरक्षा योजना के तहत 7.39 लाख गर्भवती महिलाओं को फायदा पहुंचा। 2011 में लगभग एक करोड़ 13 लाख गर्भवती महिलाओं को नकद राशि देकर मदद दी गई। इस योजना पर वर्ष 2005-06 में जहां 38 करोड़ रूपये खर्च हुए  वहीं वर्ष 2010-11 में यह राशि बढ़कर 1618 करोड़ रूपये तक पहुंच गई है।
·        ''आशा'' नाम से भी एक नई योजना चल रही है जो 42 दिनों तक नवजात के घर जाकर उनके स्‍वास्‍थ्‍य पर नजर रखती है।
·         किशोरियों में मासिक धर्म के दौरान स्‍वास्‍थ्‍य की सावधानी के लिए खास कर आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में सब्सिडी पर नैप्किन उपलब्‍ध कराना शुरू किया गया है। इसके पहले चरण में 20 राज्‍यों के 152 जिलों में 10-19 वर्ष की 14 लाख किशोरियों को इसका लाभ मिला है।
        राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना भी एक अभि‍नव पहल के रूप में सामने है। अप्रैल 2008 से अमल में आई इस योजना में 31 दि‍संबर 2011 तक 2 करोड़ 57 लाख स्‍मार्ट कार्ड चलन में थे और 24 राज्‍यों/केंद्रशासि‍त प्रदेशों में 29 लाख 25 हजार से ज्‍यादा लोग अस्‍पताल में भर्ती होने की सुवि‍धा का लाभ ले पाए। इसमें बि‍ल्‍डिं‍ग व नि‍र्माण मजदूर, महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून से लाभान्‍वि‍त ग्रामीण, रेहड़ी पटरी वाले, बीड़ी मजदूर व घरेलू नौकर भी शामि‍ल कि‍ए गए हैं।
परि‍वर्तन के कई पैमाने हैं। सबसे बेहतर परि‍वर्तन वो होता है जि‍से हम महसूस करें, हम सभी महसूस करें। परि‍वर्तन समाज, देश और दुनि‍या को नजर आए। यह एक सामूहि‍क प्रयास है जि‍समें सरकार, समाज, संस्‍था और व्‍यक्‍ति‍ के रूप में हम सबकी सक्रि‍य साझेदारी और सकारात्‍मक सोच जरूरी है। ऐसी पहल परि‍वर्तन की पराकाष्‍ठा तक पहुँचे, आइए कामना करें।   ****


*लेखक पत्र सूचना कार्यालय नई दिल्‍ली में उपनिदेशक (मीडिया एवं संचार)हैं।

Tuesday, January 17, 2012

करूर में आयुष कैम्‍प

चिकित्‍सा की अजब वैकल्पिक प्रणालियां-डॉ. के. परमेश्‍वरन*
केरल में वैद्यों (आयुर्वेद चिकित्‍सकों) के प्रसिद्ध परिवार के बारे में किंवदन्‍ती है, इन्‍हें अलाथर नाम्‍बी कहा जाता है। अलाथर नाम्बियों का परम्‍परागत घर पलक्‍कड़ के आधुनिक जिले के एक भाग में है। उनके आठ चिकित्‍सक परिवार हैं, उनका परिवार चिकित्‍सा की प्रत्‍येक शाखा में विशिष्‍ट क्षमता रखने में प्रसिद्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि एक बार देव लोक से अश्विनी देव जो कि स्‍वास्‍थ्‍य और चिकित्‍सा के संरक्षक देव हैं कौओं के रूप में प्रकट हुए और वे मन्दिर के तालाब के समीप पेड़ पर बैठकर कारुकू की ध्‍वनि का उच्‍चारण करते। 

एक दिन, मन्दिर में अलाथर नाम्‍बी परिवार का मुखिया पूजा के लिए आया तथा कौओं द्वारा किए जा रहे शोर को सुनकर खड़ा हो गया और संस्‍कृत की द्विपदी दोहराई, जिसका तात्‍पर्य यह था कि : जो उचित समय पर आवश्‍यकता अनुसार ही भोजन ग्रहण करता है, जो पेशाब और शौच बिना ज्‍यादा रुकावट के करता है और जो पर्याप्‍त मात्रा में जल पीता है वह किसी भी प्रकार की बीमारी से ग्रस्‍त नहीं होता। ऐसा लगता है कि कौअे ‘‘यह प्रश्‍न कर रहे थे कि ऐसा कौन है जिसे बीमारी नहीं है?’’ जैसा कि आयुर्वेदिक चिकित्‍सकों ने जो जवाब दिया है वह सभी मानकों से आधुनिक है? 

इसी पृ‍ष्‍ठभूमि को ध्‍यान में रखते हुए केन्‍द्रीय सरकार चिकित्‍सा की वैकल्‍पिक प्रणालियों जैसे आयुर्वेद, होम्‍योपैथी, यूनानी, आदिवासी दवाओं आदि को उपयुक्‍त महत्‍व दे रही है। पर्यावरण उन्‍मुख होने के अलावा चिकित्‍सा की इन प्रणालियों से यह लाभ है कि ये प्रतिबन्‍धात्‍मक पहलुओं पर अधिक बल देती हैं। 

आयुष 
तमिलनाडु के करूर में हाल ही में सम्‍पन्‍न हुए भारत निर्माण लोक सूचना अभियान में लोक सूचना अभियान के भाग के रूप में नि:शुल्‍क चिकित्‍सा कैम्‍प आयोजित किया गया और इसमें एक प्रयोग किया गया। इसे केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत आयुष विभाग (आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी) द्वारा संचालित किया गया। अधिकतर रोगियों को आकर्षित करने के अलावा, कैम्‍प एक प्‍लेटफार्म के रूप में भी सफल रहा, जहां औषधियों की वैकल्पिक प्रणाली के लाभों तथा इनकी उपलब्‍धता की जानकारी दी गई। 

चेन्‍नई के विभिन्‍न संस्‍थानों के डाक्‍टरों तथा अर्धचिकित्‍सा स्‍टाफ की टीम ने तीन दिन के अभियान में भाग लिया। यूनानी दवाओं की केन्‍द्रीय अनुसंधान परिषद, आयुर्वेद के अनुसंधान केन्‍द्र तथ होमियोपैथी की क्‍लीनिकल अनुसंधान इकाई जैसे संस्‍थानों ने चिकित्‍सा कैम्‍प का आयोजन किया। इनका नेतृत्‍व क्रमश: डॉ. हफीज मो. सलाम, डॉ. पी. श्रीनिवास और डा. के राजू ने किया। 

एक दिन के चिकित्‍सा कैम्‍प के अलावा, इकाइयों ने इस अभियान में स्‍टाल लगाकर सम्‍बद्ध जानकारी के इश्‍तेहार बांटे तथा विभिन्‍न सामान्‍य बीमारियों की सस्‍ती दवाइयां बांटीं।बीमारों से जानकारी लोक सूचना अभियान प्रदर्शनी स्‍थल के नजदीक थनथनड्रीमलाई अग्रहारम के रिहायशी वेक्‍टेश्‍वरन कुछ समय से अपनी टांगों के अग्रभाग तथा ऐड़ी में दर्द महसूस कर रहे थे। उसने कैम्‍प में आयुर्वेदिक डॉक्‍टरों से परामर्श किया। डॉक्‍टरों ने दवाई युक्‍त तेल के साथ नहाने तथा सुबह खाना खाने से पहले पानी में पावडर को घोलकर पीने का सुझाव दिया। कैम्‍प की समाप्ति के समय वेंकटेश्‍वरन प्रसन्‍नचित्‍त था। उसने कहा कि उर्स दर्द से काफी राहत मिली है। 

करूर के नजदीक करूपत्‍ती से रोज दैनिक मजदूरी करने वाला जगदम्‍मा प्रदर्शनी देखने के लिए आया था। होम्‍योपैथी के डॉक्‍टरों द्वारा बताई गई दवा लगाने के बाद उसकी आंखों की लाली और सूखेपन से उसको काफी राहत मिली। यूनानी डॉक्‍टरों ने भी बहुत से बीमारों को आकर्षित किया। यूनानी डॉक्‍टरों ने बताया कि उन्‍होंने तमिल में तैयार की गई 1000 के लगभग रिकॉर्ड संख्‍या में ‘‘स्‍वस्‍थ जीवन के लिए सूत्र’’ पुस्तिका बांटी। संक्षेप में, कैम्‍प चिकित्‍सा की वैकल्पिक प्रणालियों की प्रभावशीलता तथा क्षमता के बारे में आंखें खोलने जैसा था। इससे सस्‍ती एवं पर्यावरण उन्‍मुख औषधियों की लोकप्रियता बढ़ने की प्रेरणा एवं सहायता मिली जिसे ग्रामीण क्षेत्रों के समान्‍य लोग सहजता से आकलन कर सकते हैं। 

*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, मदुरैई में 
सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत्त हैं

Friday, January 13, 2012

आंध्र प्रदेश में मिला बौध स्‍तूप

टीले के आस-पास के क्षेत्र में काले व लाल रंग के बर्तन भी पाए गए 
आंध्र प्रदेश सरकार के राज्‍य पुरातत्‍व विभाग ने कृष्‍णा जिले के बन्‍टूमिल्लि मांडा के मुंजूलूरू गांव में वर्ष 2010 में एक बौध स्‍तूप स्‍थल की खोज की थी। मुंजूलुरू गांव में पाया गया यह स्‍तूप अर्द्ध गोलाकार टीले पर बना है जिसकी उंचाई 10 मीटर है। इसके आधार में चार दिशाओं में आयातकार उभार बने हैं। यह 27X23X7 से.मी. आकार की ईंटों से बना है। टीले के आस-पास के क्षेत्र में काले व लाल रंग के बर्तन पाए गए हैं। शंखों के साथ पाण्‍डु भी यहां पाए गए हैं। 5-6 शताब्‍दी का बलुआ पत्‍थर का टूटा हुआ अयाका खम्‍भा भी यहां मिला है।

आंध्र प्रदेश सरकार के राज्‍य पुरातत्‍व एवं संग्रहालय विभाग ने कथित प्राचीन स्‍मारक को संरक्षित करने के लिए अधिसूचना सं0 जी.ओ.एमएस सं0 64 वाईएटी एण्‍ड सी (पीएमयू) विभाग, दिनांक 16 जून, 2011 को जारी की है। 

Sunday, November 20, 2011

चुइंगम जैसी चीज़ों में भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग

खतरनाक खानपान को जानिए और सभी को बताइए
अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं | Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है | अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है | Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है, जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है | इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है | अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है | (मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें | ) आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है ? दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है | जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं | 
आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्द पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं | तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं | कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है | वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं| मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां  कैसे बनती हैं ? 
यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं | ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं | मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है ? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद्द सामग्रियों में करते हैं व वे इसे हमसे भी खरीदते हैं | 
इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं | सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है | इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है | बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है |
इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है | नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता | Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है | इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते |
चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है |  इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है |   
Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है |
Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है |
Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है |
Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है |
Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है |
इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं | इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है | तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं |

यह सब आधुनिकता किस काम की ? ये सब हमारे ब्रेनवाश का परिणाम है, जो अंग्रेज़ कर गए|

- डा. के कृष्णा राव, प्रांतीय संवाद प्रभारी, भारत स्वाभिमान एवं पतंजलि योग समिति, म.प्र.

Tuesday, October 04, 2011

व्यवस्था हमारी ऐसी है जो गरीबी देती है

भारत की आबादी और गरीबी:बहुत सी गलतफहमियां 
आज मैं लोर्ड मैकोले के एक महत्वपूर्ण वक्तव्य से इस लेख की शुरुआत कर रहा हूँ जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटेन के नीचले सदन हाउस ऑफ़ कॉमंस में दिया था "I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief "  ये वक्तव्य है तो और लम्बा लेकिन मैंने उसके शुरुआती पंक्ति को ही अपने लेख के लिए जरूरी समझा है | मतलब तो आप सब समझ ही गए होंगे, इसलिए मैं सीधे उन शब्दों की ओर आता हूँ जो उसने अपने वक्तव्य में प्रयोग किया है, उसने कहा है कि "मैंने किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा जो भिखारी हो, जो चोर हो"| मतलब ये हुआ कि मैकोले के देश इंग्लॅण्ड में उस समय भिखारी भी थे और चोर भी थे जिस समय भारत में उसे न कोई भिखारी मिला और न ही चोर मिला जब कि उसने संपूर्ण भारत का दौरा किया था और तब बोला था | यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि 1835 में भारत में एक भी भिखारी नहीं है, मतलब ये हुआ कि भारत में गरीबी नहीं है और कोई गरीब भी नहीं है | जब गरीबी नहीं है तो उसे चोरी करने की भी जरूरत नहीं है |


अब मैं 1947 में आता हूँ, अंग्रेजों ने भारत से जाने के पहले एक सर्वे कराया था जिसमे कहा गया था कि भारत में 4 करोड़ लोग गरीब हैं, ये आंकड़े RBI के भी हैं हाला कि उस समय के अर्थशास्त्रियों ने ये कहा था कि "अंग्रेजों ने गलत सर्वे रिपोर्ट दिया है ताकि दुनिया में उनकी बदनामी न हो दरअसल भारत में ज्यादा गरीब हैं" | वो सर्वे सही थी या गलत मैं उसमे नहीं जाना चाहता | प्रथम प्रधानमंत्री ने एक कमीशन बनाया कि गरीबों की सही संख्या पता चल सके तो 1952 में जब देश में पहली पंचवार्षिक योजना लागू हुई तो उस समय उन्होंने बताया कि देश में वास्तविक गरीबों की संख्या 16 करोड़ है | अब मैं यहाँ सीधे 2007 में आता हूँ जब इस देश की संसद में प्रोफ़ेसर अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट पेश हुई | पहले मैं प्रोफ़ेसर अर्जुन सेनगुप्ता के बारे में थोड़ी जानकारी यहाँ दे दूँ | प्रोफ़ेसर अर्जुन सेनगुप्ता दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्रियों में गिने जाते थे, भारत सरकार का एक विभाग है योजना आयोग, प्रोफ़ेसर अर्जुन सेनगुप्ता बहुत दिनों तक इस योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे | श्रीमती इंदिरा गाँधी के समय वो लम्बे समय तक भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार भी रहे और पश्चिम बंगाल (अब पश्चिम बंग) सरकार के भी लम्बे समय तक वो आर्थिक सलाहकार रहे, सारी दुनिया के नामी विश्वविद्यालयों में वो उनके बुलावे पर लेक्चर देने जाते थे | तो अर्जुन सेनगुप्ता साहब ने सरकार के कहने पर चार साल के अध्ययन के बाद जो रिपोर्ट दी वो काफी चौंकाने वाली है | उनकी रिपोर्ट के अनुसार भारत की 115 करोड़ की जनसँख्या में 84 करोड़ लोग बहुत गरीब हैं, इतने गरीब हैं ये 84 करोड़ लोग कि उनको एक दिन में खर्च करने के लिए 20 रूपये भी नहीं है और इन 84 करोड़ में से 50 करोड़ ऐसे हैं जिनके पास खर्च करने के लिए 10 रूपये भी नहीं है और इन 84 करोड़ में से 25 करोड़ के पास खर्च करने के लिए 5 रुपया भी नहीं है और बाकी के पास 50 पैसे भी नहीं है खर्च करने के लिए | 

जब मैं इस क्षेत्र के विशेषज्ञ लोगों से भारत की इस स्थिति के बारे में पूछता हूँ कि हमारे यहाँ इतनी गरीबी क्यों है, गरीब क्यों हैं, बेकारी क्यों है, भुखमरी क्यों है तो वो कहते हैं कि भारत की गरीबी की मुख्य वजह हमारी बढती हुई जनसँख्या है, जब मैं साधारण लोगों से पूछता हूँ तो वो भी यही जवाब देते है | फिर मैंने इस पर काम किया तो मुझे जो बात समझ में आयी वो मैं आपके सामने रखता हूँ | ..........................1947 में जब हम आज़ाद हुए तो हमारे देश की आबादी 34 करोड़ थी और आज 2011 के जनगणना के मुताबिक हम 120 करोड़ हो गए हैं | 1947 में हमारे देश में अनाज का उत्पादन जो था वो साढ़े चार करोड़ टन था और आज 2011 में यह बढ़कर साढ़े 23 करोड़ टन के आसपास पहुँच गया है | 1947 में भारत में कारखाने बहुत कम थे और कारखानों में होने वाला उत्पादन भी बहुत कम था, उस समय भारत का औद्योगिक उत्पादन एक लाख करोड़ रूपये के आसपास था और आज ये दस लाख करोड़ रूपये के आसपास पहुँच गया है | 1947 में हमारे यहाँ गरीबों की संख्या 4 करोड़ थी अब उस स्तर के गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गयी है मतलब आबादी बढ़ी साढ़े तीन गुना लेकिन गरीब बढ़ गए 21 गुना, बात आप समझ रहे हैं न ? इन 64 सालों में आबादी बढ़ी साढ़े तीन गुनी और गरीब बढ़ गए 21 गुना, ये गरीबों के अनुपात में आबादी के हिसाब से वृद्धि होनी चाहिए थी, मतलब गरीबों की संख्या में भी साढ़े तीन गुनी वृद्धि होनी चाहिए थी, मतलब हमारे देश में आज 2011 मे 14 -15 करोड़ से ज्यादा गरीब नहीं होने चाहिए थे, है न ?  और इसी अवधि में अनाज का उत्पादन लगभग  छः गुना बढ़ा है, मतलब आबादी बढ़ी साढ़े तीन गुनी और अनाज उत्पादन में वृद्धि हुई छः गुनी, फिर क्यों भुखमरी से मर रहे हैं हमारे देश के लोग ? अगर आबादी बढती पांच गुना और अनाज उत्पादन में वृद्धि होती तीन गुना तो मैं मान लेता कि भुखमरी होने का कारण जायज है | और औद्योगिक उत्पादन में दस गुनी वृद्धि हुई है इन 64 सालों में फिर बेरोजगारों की इतनी बड़ी फ़ौज कैसे खड़ी हो गयी है हमारे देश में ? तो कहीं न कहीं नीतियों के स्तर पर हमारे सरकार से चुक हुई है जो गरीबी, भुखमरी और बेकारी रोकने में असफल रही है | ये जो हमने हमारे मन में बैठा लिया है या हमारे दिमाग में बैठा दिया गया है कि जनसँख्या बढ़ने से गरीबी बढती है या जनसँख्या बढ़ने से बेकारी बढती है या  जनसँख्या बढ़ने से भुखमरी बढती है तो ये सिद्धांत ही गलत है |

दुनिया में एक अर्थशास्त्री हुआ माल्थस जिसने ये सिद्धांत दिया था कि जिस देश में जनसँख्या ज्यादा होगी वहां गरीबी ज्यादा होगी, बेकारी ज्यादा होगी | हाला कि उसके इस सिद्धांत को यूरोप के देशों ने ही नकार दिया है लेकिन इस देश का दुर्भाग्य देखिये कि इस देश के लोग वही सिद्धांत पढ़ते हैं और दुसरे लोगों को समझाते हैं | अब इसी सिद्धांत को यूरोप और अमेरिका पर लागू किया जाये तो बिलकुल उलट स्थिति दिखाई देती है, भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसकी जनसँख्या बढ़ी है पिछले पचास वर्षों में या सौ वर्षों में | दुनिया के हर देश की जनसँख्या कई गुनी बढ़ी है, अमेरिका की, फ्रांस की, जर्मनी की, जापान की, चीन की, चीन की तो सबसे ज्यादा बढ़ी है | अमेरिका की जनसँख्या पिछले 60 वर्षों में ढाई गुनी बढ़ी है, ब्रिटेन सहित  यूरोप की जनसँख्या तो पिछले 60 सालों में तीन गुनी बढ़ी है, लेकिन देखने में आया है कि यूरोप और अमेरिका की आबादी बढ़ी है तीन गुनी और इसी अवधि में उनके यहाँ अमीरी बढ़ गयी है एक हजार गुनी | तो अमेरिका और यूरोप में जनसँख्या बढ़ने से पिछले साठ सालों में अमीरी आती है तो भारत में जनसँख्या बढ़ने से गरीबी क्यों आनी चाहिए और अगर भारत में जनसँख्या बढ़ने से गरीबी आती है तो यूरोप और अमेरिका में भी जनसँख्या बढ़ने से गरीबी आनी चाहिए थी, है ना ? क्योंकि सिद्धांत दुनिया में सर्वमान्य हुआ करते हैं, सिद्धांत कभी किसी देश की सीमाओं में नहीं बंधा करते | अगर सिद्धांत है कि जनसँख्या बढ़ने से गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी बढती है तो जनसँख्या तो दुनिया के तमाम देशों की बढ़ी है लेकिन भारत छोड़ कर बहुत सारे देशों में देखा जा रहा है कि वहां जनसँख्या के साथ-साथ अमीरी बढ़ रही है | आप सुनेंगे तो हैरान हो जायेंगे कि डेनमार्क, नार्वे, स्वेडेन आदि देशों में वहां की सरकारें जनसँख्या बढाने के लिए अभियान चलाती है, बच्चों के पैदा होने से उनके यहाँ नौकरी में प्रोमोशन तय होता है, जिसके जितने ज्यादा बच्चे उनकी उतनी ज्यादा प्रोमोशन | हमारे यहाँ उल्टा क्यों है ? हमारे यहाँ कहा जाता है कि बच्चे कम पैदा करो | अगर ये देश ज्यादा बच्चे पैदा कर के अमीर हो सकते हैं तो भारत ज्यादा बच्चे पैदा कर के अमीर क्यों नहीं हो सकता ? या अगर वो ज्यादा बच्चे पैदा कर के गरीब नहीं हो रहे हैं तो हम क्यों ज्यादा बच्चे पैदा कर के गरीब हो रहे हैं ? ये बड़ा प्रश्न है, जिसको मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ और मैं ये इसलिए करना चाहता हूँ कि हमारे मन में बहुत सारी गलतफहमियां बैठी हुई है जनसँख्या को लेकर और गरीबी को लेकर | मैं आपसे निवेदन ये करना चाहता हूँ कि जनसँख्या का किसी भी देश की गरीबी से कुछ लेना-देना नहीं होता है, बेरोजगारी का जनसँख्या से कोई सम्बन्ध नहीं है | 

आपको कभी चीन जाने का मौका मिले तो देखिएगा कि चीन की सरकार अपने लोगों को कभी भी अभिशाप नहीं मानती, चीन की सरकार तो ये कहती है कि जितने ज्यादा हाथ उतना ज्यादा उत्पादन और उन्होंने ये सिद्ध कर के दुनिया को दिखाया भी है, तो भारत में ये सिद्धांत कि "जितने ज्यादा हाथ तो उतना ज्यादा उत्पादन" क्यों नहीं चल सकता ? कारण उसका एक है , कारण ये है कि चीन की सरकार ने अपनी सारी व्यवस्था को ऐसे बनाया है जिसमे अधिक से अधिक लोगों को काम मिल सके और भारत सरकार ने अपनी व्यवस्था को ऐसे बनाया है जिसमे कम से कम लोगों को काम मिल सके | बस इतना ही फर्क है | हमारे देश की पूरी की पूरी व्यवस्था, चाहे वो आर्थिक हो , चाहे पूरी कृषि व्यवस्था हो ये आज ऐसे ढांचे में ढाली जा रही है जिसमे कम से कम हाथों को काम मिल सके | हम फंसे हैं यूरोपियन व्यवस्था पर मतलब Mass Production का सिद्धांत हमने अपनाया है और चीन ने सिद्धांत अपनाया है Production By Masses का |  हमारे देश के एकमात्र महान राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने Nano Technology अपनाने के लिए कहा लेकिन उनकी बात शायद किसी के समझ में नहीं आयी, ये Nano Technology जो है वो यही Production By Masses का Concept है | हमें बड़े नहीं छोटे (Nano) उद्योगों की जरूरत है जिससे हम ज्यादा से ज्यादा लोगो को काम दे सके | हम लोग कम लोगों से ज्यादा उत्पादन लेना चाहते है इसलिए Automisation की बात है, Computerisation की बात है, Centralisation की बात है और चीन में इसका ठीक उलट है, मतलब ज्यादा लोगों द्वारा ज्यादा उत्पादन तो उनके यहाँ Decentralisation की बात है,Labour Intensive Technology की बात है, हमारे यहाँ ठीक उल्टा है, हमारे यहाँ Capital Intensive Technology की बात है | हमारी व्यवस्था गड़बड़ है लोग गड़बड़ नहीं हैं | जनसँख्या हमारी बढ़ गयी है तो इसमें लोगों का कसूर नहीं है, हमारी व्यवस्था निकम्मी और नाकारा है जो बढे हुए लोगों को काम नहीं दे पाते और AC रूम में बैठ के गलियां देते हैं कि ज्यादा लोग पैदा हो गए इस देश में | अगर आप हर हाथ को काम देने की व्यवस्था इस देश में लगायें तो भारत का कोई भी आदमी आपको बेकार बैठा नजर नहीं आएगा |  आप जानते हैं कि दुनिया में हर काम हाथ से ही होते हैं, कम्प्यूटर भी हाथों से ही चला करता है, कम्प्यूटर को कम्प्यूटर नहीं चला सकता है कभी भी | कम्प्यूटर चलाने के लिए भी किसी का दिमाग लगता है और किसी के हाथ लगते हैं और इश्वर ने आपको जो दिमाग और हाथ दिया है आप उसी को अभिशाप मान के बैठे हैं तो ये आपके लिए दुर्भाग्य की बात है किसी दुसरे के लिए नहीं | ये हमारी समझ का फेर है, हमारी बुद्धि का फेर है | और इस  समझ और बुद्धि का फेर हुआ कैसे है तो वो परदेशों से आने वाला विचार है जिसने हमें उड़ा दिया है एक हवा में | कोई अमेरिका से कह देता है या यूरोप से कह देता है कि  भारत को  जनसँख्या कम करनी चाहिए तो हम लग जाते हैं जनसँख्या कम करने में | आप हौलैंड जायेंगे तो पाएंगे कि वहां प्रति  स्क्वायर किलोमीटर में सबसे ज्यादा लोग रहते हैं, लन्दन और टोकियो जैसे शहर में दुनिया की सबसे घनी आबादी रहती है, लेकिन उनको चिंता नहीं है अपनी आबादी कम करने की, उनके यहाँ आबादी कम करने का कोई कैम्पेन नहीं चला करता, और हम मूर्खो के मुर्ख इसी काम में लगे हैं | हम अपनी अक्ल से, अपने दिमाग से, अपने देश की परिस्थितियों के हिसाब से कभी सोच के नहीं देखते हैं कि हमारे लिए ये ठीक है क्या ? जो वहां से कहा जा रहा है हम उसे ही आँख मूंद के स्वीकार कर ले रहे हैं | भारत में हुआ कुछ ऐसा ही है | आजादी के बाद जो व्यवस्था बनाई गयी है इस व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेकारी ही मिल सकती है, रोजगार नहीं मिल सकता | भारत की व्यवस्था इस तरह की बनाई गयी है जिसमे ज्यादा से ज्यादा लोगों को गरीबी ही मिल सकती है, अमीरी नहीं मिल सकती और अगर अमीरी मिलेगी भी तो थोड़े लोगों को जो शायद एक प्रतिशत भी नहीं हैं पुरे भारत की आबादी की | हो सकता है भारत में एक करोड़ लोग बहुत अमीर हों लेकिन 99 करोड़ लोगों को आप हमेशा जीवन में संघर्ष करते हुए ही पाएंगे, मुंबई में एक उद्योगपति हैं जो अपनी पत्नी को जन्मदिन के गिफ्ट के रूप में बोईंग विमान दे देते हैं और उसी मुंबई में धारावी के रूप में  एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी झोपड़ी भी है, जहाँ 10x10 के रूम में दो पीढियां रहती हैं | व्यवस्था हमारी ऐसी है और ये व्यवस्था हमारी जो ऐसी है जो गरीबी देती है, बेकारी देती है, भुखमरी देती है वो दुर्भाग्य से अंग्रेजों की बनाई हुई है जिसको हमें 1947 में तोड़ देना चाहिए था उसको हम तोड़ नहीं पाए और वही व्यवस्था चलती चली आयी है और उस व्यवस्था के विरोधाभास हमको दिखाई तो देते हैं लेकिन उस व्यवस्था को ठीक करने का रास्ता नहीं दिखाई देता इसलिए हम हमारी जनसँख्या को कोसते रहते हैं, अपने लोगों को कोसते रहते हैं, व्यवस्था की गलती, व्यवस्था की खामी हमको दिखाई देना बंद हो चूकी है, मुश्किल हमारी व्यवस्था में है, लोगों में नहीं | इस लेख को यहीं विराम देता हूँ नहीं तो बोझिल हो जायेगा | अगली बार उस व्यवस्था के बारे में बताऊंगा जो हमारी इस हालत के लिए जिम्मेवार है | 

देखिये जब देश की आजादी की लड़ाई चल रही थी तो पूरा भारत उस लड़ाई में नहीं लगा था कुछ लोगों ने उस लड़ाई को लड़ा और हमें आजादी दिलाई थी अब हमें स्वराज्य के लिए लड़ना होगा, स्वराज्य मतलब अपना राज्य, अपनी व्यवस्था, तभी हम सफल हो पाएंगे एक राष्ट्र के रूप में, और आप इसमें पुरे भारत से उम्मीद मत करियेगा कि वो इसमें शामिल हो जायेगा लेकिन हाँ सभी भारतीयों के समर्थन की जरूरत जरूर होगी | और किसी क्रांति के पहले एक वैचारिक क्रांति होती है और मैं अभी उसी वैचारिक क्रांति के लिए ही आपको प्रेरित कर रहा हूँ | वैचारिक क्रांति कैसे होगी ? वैचारिक क्रांति तब होगी जब ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऐसी बातें पहुंचाई जाये और मुझे उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप इस मेल को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएंगे |

पिछली बार के लेख में मैंने अपने नाम के ऊपर "एक भारत स्वाभिमानी" नहीं लिखा तो एक मित्र ने उस ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया था इसलिए इस बार मैं वो सुधार कर ले रहा हूँ |

एक भारत स्वाभिमानी 
रवि 

Monday, April 04, 2011

अगर ब्रिटेन इस संधि को नकार दे तो भारत फिर से गुलाम ?

 ?इन विचारों से मतभेद आपके भी हो सकते हैं. इन तथ्यों पर शक आपको भी हो सकता है लेकिन इनकी  प्रस्तुति में जो पीड़ा झलकती है उसे नजर अंदाज़ करना आपके बस में भी न होगा. देशप्रेम में रंगने के बाद ही ऐसी बेबाकी आती है. अप इन विचारों को पढ़ कर क्या महसूस करते हैं अवश्य लिखिए.रवि वर्मा ने यह लेख पंजाब स्क्रीन के लिए भेजा है जिसे हम ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं.-रेक्टर कथूरिया 
हिंदी का दुर्भाग्य या कहें भारत का दुर्भाग्य // रवि वर्मा  
भारत की जो तथाकथित आज़ादी है वो एक agreement के तहत/अन्तर्गत है, वोagreement है Transfer of power agreement (सत्ता के हस्तांतरण की संधि)| भारत में जो कुछ भी आप देख रहे हैं वो सब इसी agreement के शर्तों के हिसाब से चल रहाहै | और आज अगर ब्रिटेन इस संधि को नकार दे तो भारत फिर से गुलाम हो जायेगा, ये मजाक की बात मैं नहीं कर रहा हूँ, इस मसले पर बड़े बड़े वकील चुप हो जाते हैं और कहते हैं की हो सकता है | खैर, भारत का दुर्भाग्य ये रहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु बन गए या कहें अंग्रेजों द्वारा स्थापित किये गए प्रधानमंत्री थे वो | मैं आप लोगों को एक सच्ची घटना बताता हूँ .....ब्रिटेन की संसद जिसे House of Commons कहा जाता है,  वहां भारत की आज़ादी-स्वतंत्रता को लेकर जब विचार विमर्श हो रहा था तो एक मेम्बर ने कहा कि नेहरु को क्यों चुना जा रहा है प्रधानमंत्री के तौर पर, तो दुसरे ने कहा कि नेहरु देखने में तो भारतीय है लेकिन रहन सहन और सोच में बिलकुल हम जैसा है | इस वाकये का सारा दस्तावेज इंग्लैंड के संसद House of Commons की library में उपलब्ध है | और येजो अंग्रेजी है वो उसी Transfer of power agreement (सत्ता के हस्तांतरण की संधि) के तहत हमारे ऊपर थोपी गयी | अंग्रेजी हटाना और हिंदी को स्थापित करना भारत में मुश्किल लग रहा है | मैं यहाँ कुछ तथ्य आप सब के सामने रखता हूँ कि क्यों इस देश से अंग्रेजी हटाना मुश्किल है |
भारत में अंग्रेजी का इतिहास  
भारत में जहाँगीर के समय पहली बार अँगरेज़ भारत में आये और व्यापार के नाम पर उन्होंने जो कुछ किया वो सब को मालूम है | उस समय भारत में 565 रजवाड़े हुआ करते थे और अंग्रेजों ने उन सभी राज्यों से अंग्रेजी में agreement कर के उस सभी का राज्य एक एक कर के हड़प लिया | क्योंकि अँगरेज़ जो agreement करते थे वो अंग्रेजी में होता था और सभी agreement के अंत में एक ऐसी बात होती थी जिसकी वजह से सब के सब राज्य अंग्रेजो के हो गए (वो agreement के बारे में मैं यहाँ कुछ विशेष नहीं लिखूंगा) | हमारे यहाँ जो राजा थे उन लोगों को अंग्रेजी नहीं आती थी, जो क़ि स्वाभाविक था,  इस लिए वो इन संधियों के मकडजाल में फंस गए लेकिन आजादी के बाद वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी वो कैसे फंस गए ? जब हमें आज़ादी मिली तो हमारे देश में सब कुछ बदल जाना चाहिए था लेकिन सत्ता जिन लोगों के हाथ में आयी वो भारत को इंग्लैंड की तरह बनाना चाहते थे | आज़ादी की लड़ाई के समय सभी दौर के क्रांतिकारियों का एक विचार था कि भारत अंग्रेज़ और अंग्रेजी दोनों से आज़ाद हो और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी स्थापित हो | जून 1946 में महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज़ादी मिलने के 6 महीने के बाद पुरे देश की भाषा हिंदी हो जाएगी और सरकार के सारे काम काज की भाषा हिंदी हो जाएगी | संसद और विधानसभाओं की भाषा हिंदी हो जाएगी | और गाँधी जी ने घोषणा कर दी थी कि जो संसद और विधानसभाओं में हिंदी में बात नहीं करेगा तो सबसे पहला आदमी मैं होऊंगा जो उसके खिलाफ आन्दोलन करेगा और उनको जेल भेजवाऊंगा | भारत का कोई सांसद या विधायक अंग्रेजी में बात करे उस से बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है | लेकिन आज़ादी के बाद सत्ता गाँधी जी के परम शिष्यों के हाथ में आयी तो वो बिलकुल उलटी बात करने लगे | वो कहने लगे कि भारत में अंग्रेजी के बिना कोई काम नहीं हो सकता है| भारत में विज्ञान और तकनिकी को आगे बढ़ाना है तो अंग्रेजी के बिना कुछ नहीं हो सकता, भारत का विकास अंग्रेजी के बिना नहीं हो सकता, भारत को विश्व के मानचित्र पर बिना अंग्रेजी के नहीं लाया जा सकता | भारत को यूरोप और अमेरिका बिना अंग्रेजी के नहीं बनाया जा सकता | अंग्रेजी विश्व की भाषा है आदि आदि | गाँधी जी का सपना गाँधी जी के जाने के बाद वहीं ख़तम हो गया | भारत में आज हर कहीं अंग्रेजी का बोलबाला है | भारत की शासन व्यवस्था अंग्रेजी में चलती है, न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी है, दवा अंग्रेजी में होती है, डॉक्टर पुर्जा अंग्रेजी में लिखते हैं, हमारे शीर्ष वैज्ञानिक संस्थानों में अंग्रेजी है, कृषि शोध संस्थानों में अंग्रेजी है | भारत में ऊपर से ले के नीचे के स्तर पर सिर्फ अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है |
भारत का संविधान (अंग्रेजी के सम्बन्ध में ) 
26 जनवरी 1950 को जो संविधान इस देश में लागू हुआ उसका एक अनुच्छेद है343 | इस अनुच्छेद 343 में लिखा गया है कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी इस देश में संघ (Union) सरकार की भाषा रहेगी और राज्य सरकारें चाहे तो ऐसा कर सकती हैं | 15 वर्ष पूरा होने पर यानि 1965 से अंग्रेजी को हटाने की बात की जाएगी | एक संसदीय समिति बनाई जाएगी जो अपना विचार देगी अंग्रेजी के बारे में और फिर राष्ट्रपति के अनुशंसा के बाद एक विधेयक बनेगा और फिर इस देश से अंग्रेजी को हटा दिया जायेगा और उसके स्थान पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ को स्थापित किया जायेगा | ये जो बात है वो अनुच्छेद 343 के पहले पैरा ग्राफ में हैं लेकिन उसी अनुच्छेद के तीसरे पैरा ग्राफ में लिखा गया है कि भारत के विभिन्न राज्यों में से किसी ने भी हिंदी का विरोध किया तो फिर अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | फिर उसके आगे अनुच्छेद 348 में लिखा गया है कि भारत में भले ही आम बोलचाल कि भाषा हिंदी रहे लेकिन Supreme Court में, High Court में अंग्रेजी ही प्रमाणिक भाषा रहेगी |
1955 में एक समिति बनाई गयी सरकार द्वारा, उस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कह दिया कि देश में अंग्रेजी हटाने का अभी अनुकूल समय नहीं है | 1963 में संसद में हिंदी को लेकर बहस हुई कि अंग्रेजी हटाया जाये और हिंदी लाया जाये | 1965 में 15 वर्ष पुरे होने पर राष्ट्रभाषा हिंदी बनाने की बात हुई तो दक्षिण में दंगे शुरू हो गए और यहाँ मैं बताता चलूँ कि भारत सरकार के ख़ुफ़िया विभाग कि ये रिपोर्ट है कि वो दंगे प्रायोजित थे सरकार की तरफ से | ये उन नेताओं द्वारा करवाया गया था जो नहीं चाहते थे कि अंग्रेजी को हटाया जाये | (ये ठीक वैसा ही था जैसे वन्दे मातरमके सवाल पर मुसलमानों को गलत सन्देश देकर भड़काया गया था)  तो यहाँ केंद्र सरकार को मौका मिल गया और उसने कहना शुरू किया कि हिंदी की वजह से दंगे हो रहे हैं तो अंग्रेजी को नहीं हटाया जायेगा | इस बात को लेकर 1967 में एक विधेयक पास कर दिया गया | इतना ही नहीं 1968 में उस विधेयक में एक संसोधन कर दिया गया जिसमे कहा गया कि भारत के जितने भी राज्य हैं उनमे से एक भी राज्य अगर अंग्रेजी का समर्थन करेगा तो भारत में अंग्रेजी ही लागू रहेगी, और आपकी जानकारी के लिए मैं यहाँ बता दूँ क़ि भारत में एक राज्य है नागालैंड वहां अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित कर दिया गया है | अब ये बिलकुल असंभव है कि हम अंग्रेजी को इस देश से हटा सकें | मैं जनता हूँ कि ये व्यवस्था परिवर्तन हम लोग नहीं कर सकते हैं | हम अपनी भारतीय भाषाओं का सम्मान करने भी लगे तो क्या फर्क पड़ता है अंग्रेजी तो हर हाल में रहेगी | व्यवस्था बदलनी है तो कम से कम 400 सांसद चाहिए जो कि एक विधेयक लाये और इस कानून को उलट दे और मुझे ये संभव नहीं लग रहा है | ये जो गन्दी राजनीति इस देश में आप देख रहे हैं वो अभीगन्दी नहीं हुई है ये अंग्रेजों से अनुवांशिक तौर पर हमारे नेताओं ने ग्रहण किया थाऔर वो आज भी चल रहा है | 
मौलिकता आती है मातृभाषा से आप खुद के ऊपर प्रयोग कर के देखिएगा | अंग्रेजी या विदेशी भाषा में हम केवल Copy Pasting कर सकते है | और मातृभाषा छोड़ के हम अंग्रेजी के पीछे पड़े हैं तो मैं आपको बता दूँ क़ि अंग्रेजी में हमें छः गुना ज्यादा मेहनत लगता है | हम लोगों ने बचपन में पहाडा याद किया था गणित में आपने भी किया होगा और मुझे विश्वास है क़ि वो आपको आज भी याद होगा लेकिन हमारे बच्चे क्या पढ़ रहे हैं आज भारत में वो पहाडा नहीं टेबल याद कर रहे हैं | और मैं आपको ये बता दूँ क़ि इनका जो टेबल है वो कभी भी इनके लिए फायदेमंद नहीं हो सकता | जो पढाई हम B.Tech या MBBS की करते हैं  अगर वो हमारी मातृभाषा में हो जाये तो हमारे यहाँ विद्यार्थियों को छः गुना कम समय लगेगा मतलब M .Tech तक की पढाई हम 4 साल तक पूरा कर लेंगे और वैसे ही MBBS में भी हमें आधा वक़्त लगेगा | इस विदेशी भाषा से हम हमेशा पिछलग्गू ही बन के रहेंगे | दुनिया का इतिहास उठा के आप देख लीजिये, वही देश दुनिया में विकसित हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा का उपयोग अपने पढाई लिखाई में किया | 
कुछ और तथ्य
  • भारत में जो राज्यों का बटवारा भाषा के हिसाब से हुआ वो गलत था |
  • भारत क़ी तरह पाकिस्तान में भी कई भाषाएँ हैं और वहां पंजाबी सबसे लोकप्रिय भाषा है | इसके अलावा वहां पश्तो है , सिन्धी है , बलूच है लेकिनउर्दू मुख्य जोड़ने वाली भाषा है | ये जो इच्छा शक्ति पाकिस्तान ने दिखाई थीवो भारत के नेताओं ने नहीं दिखाया क्यों क़ी नेहरु यहाँ प्रधानमंत्री थे और वो सिर्फ देखने में भारतीय थे |
  • आज़ादी के पहले भारत में जो collector हुआ करते थे उनकी पोस्टिंग किसी जिले में इसी आधार पर होती थी क़ि वो हिंदी जानते हैं क़ी नहीं | लेकिनअब इस देश में ऐसा कोई नियम नहीं है | आपको कोई भाषा आती हो या नहीं आती है अंग्रेजी आनी चाहिए किसी जिले का collector बनने के लिए |
अंग्रेजी को ले के लोगों में भ्रांतियां  
अंग्रेजी को ले के लोगों के मन में तरह तरह कि भ्रांतियां हैं मसलन 
  • अंग्रेजी विश्व भाषा है
  • अंग्रेजी सबसे समृद्ध भाषा है
  • अंग्रेजी विज्ञान और तकनीकी कि भाषा है
क्या वाकई अंग्रेजी विश्व भाषा है ? पूरी दुनिया में लगभग 200 देश हैं और उसमे सिर्फ 11 देशों में अंग्रेजी है यानि दुनिया का लगभग 5 % | अब बताइए कि ये विश्व भाषा कैसे है? अगर आबादी के हिसाब से देखा जाये तो सिर्फ 4 % लोग पुरे विश्व में अंग्रेजी जानते और बोलते हैं | विश्व में सबसे ज्यादा भाषा जो बोली जाती है वो है मंदारिन (Chinese) और दुसरे स्थान पर है हिंदी और तीसरे स्थान पर है रुसी (Russian) और फिर स्पनिश इत्यादि लेकिन अंग्रेजी टॉप 10 में नहीं है | अरे UNO जो कि अमेरिका में है वहां भी काम काज की भाषा अंग्रेजी नहीं है |
क्या वाकई अंग्रेजी समृद्ध भाषा है ? किसी भी भाषा की समृद्धि उसमे मौजूद शब्दों से मानी जाती है | अंग्रेजी में मूल शब्दों कि संख्या मात्र 65,000 है | वो शब्दकोष (dictionary) में जो आप शब्द देखते हैं वो दूसरी भाषाओँ से उधार लिए गए शब्द हैं | हमारे बिहार में भोजपुरी, मैथिली और मगही के शब्दों को ही मिला दे तो अकेले इनके शब्दों कि संख्या 60 लाख है| शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है | इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे | ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी | अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी |
क्या वाकई अंग्रेजी विज्ञान और तकनिकी कि भाषा है ? आप दुनिया में देखेंगे कि सबसे ज्यादा विज्ञानं और तकनिकी की किताबे (Russian ) रुसी भाषा में प्रकाशित हुई हैं और सबसे ज्यादा विज्ञान और तकनिकी में research paper भी Russian में प्रकाशित हुई हैं | मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनिकी कि भाषा Russian है न कि अंग्रेजी | दर्शन शास्त्र में सबसे ज्यादा किताबें छपी हैं वो German में हैं | मार्क्स और कांट एक दो उदहारण हैं | चित्रकारी , भवन निर्माण, कला और संगीत कि सबसे ज्यादा किताबें हैं वो French में हैं | अंग्रेजी में विज्ञान और तकनिकी पर सबसे कम शोध हुए हैं | जितने अविष्कार अंग्रेजों के नाम से दुनिया जानती है उसमे आधे से ज्यादा दुसरे देशों के लोगों का अविष्कार है जिसे अंग्रेजों ने अपने नाम से प्रकाशित कर दिया था | अब इन्टरनेट के ज़माने में सब बातों की सच्चाई सामने आ रही है धीरे धीरे | कभी मौका मिला तो इस पर लिखूंगा |
सारांश ये है कि अगर आपमें व्यवस्था परिवर्तन की हिम्मत है तो आप हिंदी ला सकते हैं अन्यथा बस चुपचाप देखते रहिये और अपने काम में लगे रहिये | कुछ नहीं होने वाला | विश्व में दूसरी सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा होने के बावजूद हिंदी लौंडी ही बन के रहने के लिए बाध्य है अपने ही देश में | इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद् | और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये |

एक भारत स्वाभिमानी
रवि