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Saturday, April 18, 2020

'यमन दो मोर्चों पर युद्ध नहीं लड़ सकता'

संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स की अपील 
17 अप्रैल 2020//शांति और सुरक्षा
© UNICEF/Romenzi यमन में युद्ध के दौरान एक हवाई हमले में ध्वस्त हुए एक मकान के सामने बैठे कुछ बच्चे. (जुलाई 2019)
यमन में वैश्विक महामारी कोविड-19 के और ज़्यादा गंभीर होते जाने के कारण अब बिल्कुल सही वक़्त है कि युद्धरत पक्ष अपनी अदावत ख़त्म करके लड़ाई बन्द कर दें। यमन के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने गुरूवार को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के ज़रिए सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक में कही। 

उन्होंने कहा, “यमन एक साथ दो मोर्चों का सामना नहीं कर सकता: युद्ध और एक वैश्विक महामारी. और वायरस का मुक़ाबला करने में यमन के सामने अब जो नया युद्ध दरपेश है, उसी में उसकी सारी ताक़त लग जाएगी।"

इस युद्ध को तत्काल रोके जाने और सारे संसाधन इस नई मुसीबत का मुक़ाबला करने में लगा देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।”

ध्यान रहे कि यमन में अनेक वर्षों से सरकार समर्थित सेनाओं और हूती विद्रोहियों के बीच युद्ध जारी है।

सरकारी पक्ष को गठबंधन का समर्थन हासिल है जबकि हूती विद्रोहियों को अंसार अल्लाह आंदोलन भी कहा जाता है।

ये दोनों पक्ष ख़स्ता हालत में पहुँच चुके देश पर क़ब्ज़ा करने के लिए पाँच साल से भीषण युद्ध लड़ रहे हैं जहाँ विश्व का भीषणतम मानवीय संकट पैदा हो गया है।

यमन की लगभग 80 फ़ीसदी आबादी बाहरी व मानवीय सहायता पर निर्भर हो चुकी है। 

मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने कहा कि कि यमन में कोविड-19 महामारी के आने से वहाँ के लोगों की तकलीफ़ें और भी ज़्यादा दर्दनाक बनने का ख़तरा पैदा हो गया है। 
UN Photo/Eskinder Debebe 
सुरक्षा परिषद की एक वर्चुअल मीटिंग को यूएन मुख्यालय स्थित स्टूडियों स्टाफ़ ने मुमकिन बनाया. (16 अप्रैल 2020)
“इससे बेहतर और कोई समय नहीं हो सकता जब युद्धरत पक्षों को अपनी बन्दूकें ख़ामोश कर देनी होंगी व संघर्ष समाप्त करके एक शान्तिपूर्ण और राजनैतिक समाधान की तलाश करनी होगी।”

राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के लिए वार्ता
यमन सरकार की सेनाओं को सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन हासिल है. इस गठबंधन ने यूएन महासचिव की अपील पर ध्यान देते हुए 8 अप्रैल को आरंभिक रूप में एक पखवाड़े के लिए इकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा की थी। 

महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कुछ ही दिन पहले दिए अपने सन्देश में कोविड-19 वैश्विक महामारी को देखते हुए वैश्विक युद्धविराम की अपील की थी। 

मार्टिन ग्रिफ़िथ्स यमन में एक राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के प्रस्तावों पर दोनों युद्धरत पक्षों के बीच बातचीत कराने के लिए सक्रिय रहे हैं। 

इनमें क़ैदियों की रिहाई, सिविल सेवा के कर्मचारियों की वेतन अदायगी और मानवीय सहायता कार्यों के लिए रास्तों का खोला जाना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा शामिल है। 

उनका कहना था, “मैं पुरउम्मीद हूँ, और मेरा विश्वास है कि–जो प्रस्ताव मैंने रखे हैं, हम उन पर आम सहमति की तरफ़ बढ़ रहे हैं, ख़ासतौर से, एक राष्ट्रव्यापी युद्धविराम के सिद्धांत पर, जिसे दोनों ही पक्षों का समर्थन हासिल है।”

हताहतों की संख्या
विशेष दूत ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों को ये भी बताया कि इन घटनाक्रमों के बावजूद,अदावत अब भी जारी है। 
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यों के लिए शीर्ष अधिकारी मार्क लोकॉक ने भी इस मौक़े पर बताया कि यमन में जनवरी के बाद से आम लोगों के हताहत होने की संख्या हर महीने बढ़ती ही रही है. इस अवधि के दौरान 500 लोग हताहत हुए हैं, उनमें से लगभग एक तिहाई बच्चे थे। 

कोविड-19 यमन में ऐसे समय पहुँचा है जब देश में पाँच साल की लड़ाई के कारण स्वास्थ्य ढाँचा बुरी तरह चरमरा गया है, लोगों की रोग प्रतिरोधी क्षमता बहुत कमज़ोर हो चुकी है और उनके अन्दर बीमारियों के लिए बहुत अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा हो गई हैं।

मानवीय सहायता कार्यों के संयोजक मार्क लोकॉक ने कहा, “परिणामस्वरूप स्वास्थ्य वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि कोविड-19 यमन में बहुत तेज़ी से फैल सकता है, ज़्यादा व्यापक दायरे में और अनेक अन्य देशों की तुलना में जानलेवा नतीजों के साथ।”

वैसे तो कोविड-19 महामारी को कम करने के लिए किए जा रहे ऐहतियाती उपायों के कारण सहायता अभियानों की रफ़्तार पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन रास्तों को रोके जाने, असुरक्षा और स्टाफ़ और सामान ले जाने पर लगी प्रशासनिक पाबंदियों के कारण बाधित ज़रूर हो रहे हैं। 

धन की कमी एक अन्य समस्या है, क्योंकि यमन में सहायता के लिए चलाए जा रहे 41 प्रमुख कार्यक्रमों और अभियानों में से 31 आने वाले कुछ सप्ताहों में बन्द हो जाएंगे, बशर्ते कि उन्हें सहारा नहीं दिया गया तो। 

मार्क लोकॉक ने अतीत में बीमारियों को क़ाबू करने में सक्रिय रहे स्वास्थ्य दलों को खो देने का डर जताते हुए कहा, “हमें इन चिकित्सा दलों की पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है – ना केवल कोविड-19 का मुक़ाबला करने के लिए, बल्कि बारिश का मौसम नज़दीक होने के कारण हैज़ा फिर से अपना सिर उठा सकता है।”

Friday, August 08, 2014

जारी है मासूमों पर पैसे वालों का दमन

14 वर्षीय बालक पर 55 जैकेट  चोरी करने का आरोप
कुंदन अपनी माँ  रेणु के साथ डीसी आफिस के सामने 
लुधियाना: 8 अगस्त 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
स्वतंत्रता दिवस आने वाला है लेकिन दबे हुए गरीब लोग अभी भी उसी तरह दुखी हैं जैसे विदेशी शासन में थे। उनकी सुनवाई नहीं होती, उन्हें इंसान नहीं समझा जाता और इस दमन के बावजूद अगर कोई आवाज़ उठाने की हिम्मत कर ले तो उस पर कोई झूठा आरोप लगा कर उसे फंसाने में कोई कस्र नहीं छोड़ी जाती। इस का ताज़ा मामला सामने आया लुधियाना में। हम आपके सामने रख रहे हैं दो अलग अलग घटनाएं। इनमें एक बच्चा है और दूसरी एक महिला है।
कामरेड हरि सिंह साहनी के साथ कुंदन और उसका परिवार 
मासूम कुंदन जिसकी अभी पढ़ने की उम्र है।  कुंदन जिसकी अभी खेलने की उम्र है। छोटा सा बालक जिसे अभी तक कपड़े पहनने की तमीज़ भी नहीं आई होगी उस पर आरोप लगा दिया गया कि उसने दूकान से 55 जैकटें चोरी की हैं। दिलचस्प बात है कि 55 जैकटों का वज़न वह उठा ही नहीं सकता। लेकिन उस से यह आरोप कबूल भी करवा लिया गया। इस कबूलनामे की रेकार्डिंग भी कर ली गई। उस का कसूर पता क्या था? उसने दुकान में अक्सर आने वाले कुछ युवकों को देखा था जो चोरी से माल ले जा रहे थे। उसने देख लिया तो वे उसे ही धमकाने लगे। सहमे हुए कुंदन ने सारी बात दुकान के मालिक को बताई। दूकान मालिक शाम के जश्न में डूबा हुआ था।चोरी हो रही है यह बात सुनकर भी नहीं उठा। कहने लगा अगर सामान उठा रहे हैं तो उन्हें रोको। भला एक बच्चा हट्टे कट्टे चोर उचक्कों को कैसे रोकता? नतीजा वही हुआ की चोरी करने वालों ने उलटे उसे ही फंसा दिया। इस आरोप को कबूल करवाने के लिए उस पर दबाव बनाया गया।  उसके साथ मारपीट की गई। उस पर उल्टा छुरा रख कर उसे जान से मारने की धमकी दी गई। बेचारा 14 बरस का कुंदन अपने मालिक की हर बात मानता चला गया। उसे मारपीट से बचने का यही आसान तरीका लगा। जब घर में बात खुली तो उसकी मान उस दिन को कोसने लगी जब वह करीब दस दिन पूर्व रोज़ी रोटी के चक्कर में लुधियाना आये थे। परिवार के लोग पुलिस के पीछे गए तो वहां शुरू हुआ वही पुराना चक्कर कि यह इलाका हमारे थाने में नहीं आता। थानों सीमा ढूँढ़ते ढूँढ़ते यह परिवार जब यह परिवार हताश हो गया तो  जुड़ा हैबोवाल में ही रहने वाले कामरेड हरि सिंह साहनी से।
कामरेड ने चेतावनी दी है की अगर उसे इन्साफ नहीं मिला तो कमिश्नर का घेराव किया जायेगा।  हम इस बच्चे को यूँही लावारिस नहीं छोड़ेंगे। सारे मामले की जानकारी गृह मंत्री पंजाब, डीजीपी और पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग को भी भेज दी गई है।
दूसरे वाले महिला के मामले की चर्चा हम अलग पोस्ट में कर रहे हैं।
 इस तरह के हालात  देख कर फिर याद आते हैं साहिर लुधियानवी साहिब और इनकी रचना----
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी
कुंदन  के परिवार से सम्पर्क के लिए मोबाईल नंबर है: 99156 57953 और पता है: रेनू देवी पत्नी संभु साह, प्लाट नंबर-6484, गली नंबर-2, तरसेम कालोनी, जस्सियां रोड, हैबोवाल कलां, लुधियाना 

Friday, August 02, 2013

INDIA: देश की गरीबी बनाम सरकार का नैतिक दिवालियापन:

An Article by the Asian Human Rights Commission                         Thu, Aug 1, 2013 at 11:40 AM
सन्दर्भ – योजना आयोग द्वारा जुलाई 2013 को जारी गरीबी का नया आंकलन)
Contributors: सचिन कुमार जैन
भारत में 2011 से 2012 के बीच में 8.49 करोड़ लोग गरीब नहीं रहे. वे उस रेखा के ऊपर आ गए हैं जिसमे लोग उलझे रहते हैं पर वह सरकारों को दिखाई नहीं देती. अब तक यह कहा जाता रहा है कि देश की बड़ी आबादी निरक्षर है, परन्तु भारत का योजना आयोग मानता है कि देश की आबादी गंवार और बेवक़ूफ़ है. इसे गुलामी की आदत है, इसलिए इस पर शासन किया जाना चाहिए. वह मानता है कि गरीबी को वास्तविक रूप में कम करने की जरूरत नहीं है, कुछ अर्थशास्त्रियों ने आंकड़ों को बाज़ार की भट्टी में गला कर एक नया हथियार बनाया है, जिसे वे गरीबी का आंकलन (ESTIMATION OF POVERTY) कहते हैं. उन्होंने यह तय किया है कि सच में तो लोग गरीबी से बाहर नहीं निकलना चाहिए परन्तु दिखना चाहिए कि गरीबी कम हो रही है. तो वे बस एक व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले खर्चे को इतना तंग करते चले जा रहे हैं कि भारतीय नागरिक का गला दबता जाए.
क्या हम नीतियों के जरिये से किये जा रहे धीमे जनसंहार के दौर में हैं? एक ऐसा दौर जहाँ हथियार का वार होने पर खून शरीर के बाहर नहीं, शरीर के भीतर के हर एक अंग में रिसता रहता है. जिस दौर में एक किलो दाल 60 रूपए किलो, दूध 40 रूपए लीटर, टमाटर 50 रूपए किलो, लौकी 40 रूपए किलो हो. एक बार की सामान्य बीमारी का खर्च 350 रूपए और एक दिन अपने काम के लिए की जाने वाली यात्रा पर 20 रूपए का न्यूनतम खर्च जरूरी हो. वहीं योजना आयोग ने एक बार फिर 22 जुलाई 2013 को अपना आंकड़ों से बना हथियार चला दिया. उनका आंकलन कहता है कि मंहगाई की दर (जो वास्तविक कम और काल्पनिक ज्यादा होती है), लोगों की बढ़ती क्रय क्षमता और व्यय के आधार पर 2004-05 से 2011-12 के बीच 2 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से बाहर आ गए हैं. हालांकि इस अवधि में जरूरी सामान और सेवाओं की कीमतों में 40 से 160 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, पर वे इसे माने को तैयार नहीं है क्योंकि उनके आंकड़े यह नहीं बता रहे हैं.
योजना आयोग के नए आंकलन के मुताबिक 2004-05 में देश में 37.2 प्रतिशत लोग गरीब थे, 2009-10 में ये घट कर 29.8 प्रतिशत और 2011-12 में और कम हो कर 21.9 प्रतिशत हो गए. वास्तव में जिस तरह से योजना आयोग गरीबी कम कर रहा है, उसी के मान से गरीबों की मृत्यु दर (पूअर्स डेथ रेट) में हो रही बढ़ोतरी को मापे जाने की जरूरत है. आयोग ने माना है कि शहरों में एक व्यक्ति पर रोज 33.33 रूपए से ज्यादा और गांवों में 27.2 रूपए से ज्यादा करने वाले परिवार को गरीब नहीं माना जाएगा. उनके लिए सामाजिक भेदभाव, बहिष्कार, व्यापक वंचितपन, विकलांगता, विस्थापन और बदहाली का पलायन गरीबी का कोई सूचक नहीं है. इसके पहले 2009 में योजना आयोग ने इसी व्यय के आधार पर गांव में 22.42 रूपए और शहरों में 28.65 रूपए को गरीबी की रेखा माना था. बड़ा ही रोचक मामला यह है कि शौचालय बनवाने से लेकर पंचायत व्यवस्था को बेहतर बनाए के लिए विश्व बैंक की चरण वंदना करने वाला योजना आयोग उसके द्वारा दी गयी 1.25 डालर (यानी 80 रूपए) की मानक परिभाषा को नकार देता है. सच तो यह है कि इसे भी आंकड़ों के जाल में फंसा दिया जाता है. योजना आयोग द्वारा जारी वक्तव्य के मुताबिक़ 1993-94 से 2004-05 के बीच जब उदारीकरण की पूंजीवादी नीतियां अच्छे से काम कर रही थीं तब गरीबी में 0.74 प्रतिशत सालाना की दर से कमी हो रही थी. 2004-05 से 2011-12 के बीच जब पूरी दुनिया में तथाकथित विकास टप्प पड़ गया था, देशों की अर्थव्यवस्थाएं दिवालिया हो रही थीं तब भारत में 2.18 प्रतिशत सालाना की दर से गरीबी कम हो रही थी. कभी सरकार कहती है कि दुनिया में हालात बुरे हैं इसलिए हमारे हालात भी बुरे हैं, गरीबी के आंकलन में तो ठीक उल्टा हुआ. जिस दौर में देश में पेट्रोल-डीज़ल, दाल, सब्जियों की कीमतें सबसे ज्यादा बढ़ीं, बेरोज़गारी बढ़ी, थी उसी दौर में योजना आयोग में गरीबी कम कम करने का चमत्कार कर दिखाया.
राज्य और देश में गरीबी – ताज़ा आंकलन के मुताबिक वर्ष 2012 और 2013 के बीच बिहार में गरीबों की संख्या 53.5 प्रतिशत से घटकर 33.74 प्रतिशत हो गयी है. बिहार में एक साल में 185.35 लाख लोग गरीबी से बाहर आ गए हैं. आंध्रप्रदेश में गरीबी 21.1 प्रतिशत से कम होकर 9.20 प्रतिशत पर आ गयी है. वहाँ 97.8 लाख लोग अब गरीब नहीं रहे. गुजरात में 33.97 लाख लोग गरीबी के रेखा से बाहर आ गए हैं. राजस्थान में 64.08 लाख, उत्तरप्रदेश में 139.71 लाख लोग गरीब नहीं रहे. सब सोते रहे और देश में क्रान्ति हो गयी. उत्तराखंड में गरीबी 18 प्रतिशत से कम हो कर 11.26 प्रतिशत रह गयी है. आकंडे और भी बहुत से हैं, पर यहाँ उनका उल्लेख करने की जरूरत नहीं है.
गरीबी की रेखा व्यक्ति के सिर के ऊपर से नहीं गर्दन के सामानांतर होकर गुज़रती है. योजना आयोग के निष्कर्षों के मुताबिक गांव में 27.20 और शहर में 33.33 रूपए प्रतिव्यक्ति व्यय गरीबी की रेखा है. यह रेखा सभी प्रदेश में एक जैसी नहीं है. कुछ राज्यों में यह गर्दन से नीचे से गुज़रती है. ओडिसा में 23.16 रूपए (गांव) और 28.70 रूपए (शहर) से कम खर्च करने वाले ही गरीब माने गए हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो मध्यप्रदेश में 25.70 रूपए, बिहार में 25.93 रूपए, झारखंड में 24.93 रूपए और छत्तीसगढ़ में 24.60 रूपए पर गरीबी की रेखा है. शहरी क्षेत्रों के सन्दर्भ में मध्यप्रदेश में 29.90 रूपए, बिहार में 30.76 रूपए, ओडिसा में 28.70 रूपए और छत्तीसगढ़ में 28.30 रूपए प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन के व्यय को गरीबी की रेखा माना गया है.
गरीबी में खाना – भारत में प्रति व्यक्ति औसत उपभोग खर्च 1053.64 (ग्रामीण) है, इसमे से 600.36 रूपए (56.98%) का खर्चा केवल भोजन पर होता है. शहरी भारत में 1984.46 रूपए के मासिक उपभोक्ता व्यय में से 880.83 रूपए (44.39%) भोजन की व्यावस्था में जाते हैं. बिहार में 780.15 रूपए के मासिक उपभोग (MONTHLY PERCAPITA CONSUMER EXPENDITURE) में से 504.81 रूपए (64.71%) रोटी की जुगाड में जाते हैं. दिक्कत यह है कि भारत में यह आधारभूत सिद्धांत बनाया ही नहीं गया है कि पहले हम जीवन की बुनियादी जरूरतों और वंचितपन के पैमाने तय कर लेन और फिर देखें कि उन पैमानों के मान से कौन और कितने गरीब हैं!
इन आंकड़ों के साथ जुड़े संकट – आप जानते हैं कि भारत में वर्ष 1973-74 में पहली बार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी की रेखा तय की गयी थी. तब व्यय को आधार माना गया था यानी एक व्यक्ति कितना कमाता है और उसमे उसकी जरूरत पूरी होती है या नहीं, उसे कोई महत्त्व नहीं दिया गया. कई बार तो प्राकृतिक संसाधनों से मुफ्त मिलने वाली सामग्री को भी खर्चे में जोड़ कर गरीबी कम की गयी. अब भी यही हो रहा है. ठीक 40 साल पहले जो जो लोग गांव में एक माह में 48.90 रूपए या 1.63 रूपए प्रतिदिन और शहरों में 57 रूपए या 1.90 रूपए प्रतिदिन से कम खर्च करते थे, विशेषज्ञों ने उन्हें उन्हें ही गरीब माना था. व्यय का यह आधार तब की वास्तविक मूल्य पर तय किया गया था, परन्तु उसके बाद से अब तक कभी भी गरीबी की रेखा का आंकलन करते समय वास्तविक मूल्य (CURRENT PRICE) का आधार नहीं लिया गया. इसमे खपत और वास्तविक जरूरत का भी कोई मानक शामिल नहीं है. 40 साल पहले तय की गयी व्यय की राशि में मंहगाई की दर (INFALTION RATE) (जो अपने आप में एक धोखा है) के आधार पर कुछ-कुछ बढ़ोतरी की जाती रही. ये रेखा वस्तुओं या सेवाओं के वास्तविक मूल्यों पर आधारित न होकर कुछ निहित नीतिगत स्वार्थों पर आधारित होती है, जिसमे व्यवस्था गरीबों के ठीक खिलाफ खड़ी होती है. योजना आयोग और ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव डाक्टर एनसी सक्सेना कहते हैं कि यह आंकड़ों का खेल है. जैसे ही आप 27 रूपए के व्यय को 40 रूपए कर देंगे, वैसे ही 26 प्रतिशत गरीबी का आंकड़ा बढ़ कर 50 प्रतिशत हो जाएगा. 27 रूपए से जीवन की बुनियादी जरूरतें बिलकुल पूरी नहीं हो सकती हैं. इतने कम व्यय के मानकों के बाद भी 27 करोड़ लोग गरीब माने गए हैं. हमें इसका विरोध करने के बजाये यह मांग करना चाहिए कि यह राशि बनी रहने दें पर इसे भुखमरी की रेखा (STARVATION LINE) के रूप में स्वीकार किया जाए.
अब यह भी उठेगा कि कि जब यही सरकार कह रही है कि जब 21.9 प्रतिशत लोग ही गरीबी की रेखा के नीचे हैं तो वह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में 67 प्रतिशत जनसँख्या को सस्ता अनाज देने की बात क्यों कर रही है? सच तो यह है कि यह स्वीकार करना सरकार की बाध्यता है कि गरीबी की रेखा से ऊपर होने का मतलब यह नहीं है कि लोगों को गुणवत्ता पूर्ण सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं या शिक्षा के अधिकार की जरूरत नहीं है. नॅशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन के जिस अध्ययन के आधार पर गरीबी की रेखा तय की है वही अध्ययन यह भी बताता है कि हमारे ही देश में स्वास्थ्य पर एक महीने का व्यय 51.91 रूपए (गांव में) और 99.06 रूपए (शहर में) है. स्वास्थ्य पर योजना आयोग की अपनी एक समिति ने बताया था कि स्वास्थ्य पर होने वाले पूरे व्यय में से 80 प्रतिशत व्यय लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है. उन्हे कुछ मुफ्त नहीं मिलता है. जब यह वास्तविक व्यय इतना कम है तो क्या इन अर्थशास्त्रियों को यह जोड़ समझ नहीं आता कि लोगों को अच्छी सरकारी सेवाएं तो मिलती नहीं हैं, पहिर भी वे 51 और 99 रूपए जितनी कम राशि खर्च क्यों कर रहे हैं? केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही लगभग 150 योजनायों में से एक समय पर हमारे देश की 30 योजनाएं गरीबी की रेखा के मापदंड पर संचालित होती थी. अब केवल वृद्धावस्था पेंशन योजना में यह मापदंड है. भारत सरकार को पिछले 10 सालों में इस मापदंड को हटाना पड़ा क्योंकि योजना आयोग का यह आंकलन किसी ने कभी भी स्वीकार नहीं किया. हमारी शासन व्यवस्था पर भी सवाल उठाना चाहिए क्योंकि वहाँ संसद के विशेषाधिकार (DISCREATIONARY POWERS) को बचाने के लिए सभी राजनीतिक दल खड़े हो जाते हैं, पर गरीबी की परिभाषा और आंकलन पर संसद में कभी चर्चा नहीं हुई. मतलब साफ़ है कि योजना आयोग को इस मामले में संसद से ज्यादा विशेषधिकार दिए गए हैं. स्वास्थ्य की तरह ही शिक्षा का भी हाल है. गांव में शिक्षा पर 99.06 और शहरों में 160.5 रूपए खर्च होते हैं.
देश की विकास दर की चमक से हमारी आँखें इतनी चौंधिया चुकी हैं कि हमें नॅशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन का यह तथ्य भी दिखाई नहीं दिया कि वास्तव में देश के व्यय के हिसाब से सबसे ऊपर वाले 10 फीसदी लोग भी 155 रूपए प्रतिदिन के आसपास खर्च करते हैं, मतलब यह कि सरकार और संसद बदहाली को ढंकने की कोशिश कर रही है.
हमें यह भी पता है कि योजना आयोग के इन आंकलनों से लोगों के हकों पर ज्यादा फरक नहीं पड़ेगा, परन्तु सवाल केवल उस बात का नहीं है. इस अमानवीय और अन्यायोचित गरीबी की रेखा का रणनीतिगत उपयोग यह साबित करने के लिए किया जाएगा कि निजीकरण के कार्यक्रम, ढांचागत समायोजन, राज्य की जनकल्याणकारी भूमिका का दायरा सीमित करने और संसाधनों की लूट को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के कारण भारत में गरीबी कम हो गयी. यह सवाल अपना दिमाग साफ़ करने का है कि गरीबी कम नहीं हो रही है गरीब कम किया जा रहे हैं. इसलिए योजना आयोग की भूमिका और मंशा को समझना जरूरी है. 
 
राज्य
 
गरीबी की रेखा (रूपएप्रतिमाह/व्यक्ति व्यय)प्रतिशत जनसँख्या (गरीबी)प्रति व्यक्ति कुल मासिक उपभोग (औसत)भोजन पर व्यय (प्रति व्यक्तिमासिक)कुल व्यय में से भोजन पर व्यय(प्रतिशत)

 
उत्तरप्रदेशग्रामीण76830.4899.1520.8257.93
शहरी94126.061573.91728.4646.28
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>29.43%
 

 

 
मध्यप्रदेशग्रामीण77135.74902.82503.5855.78
शहरी897211665.77693.8941.66
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>31.65%
 

 

 
बिहारग्रामीण77834.06780.15504.8164.71
शहरी923211237.54654.9752.93
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>33.74%
 

 

 
झारखंडग्रामीण74840.84825.15502.8160.94
शहरी97424.831583.75816.0451.53
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>36.96%
 

 

 
हिमाचलप्रदेशग्रामीण9138.841535.75792.5851.61
शहरी10644.332653.881100.3141.46
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>8.06%
 

 

 
दिल्लीग्रामीण114512.922068.491115.7153.94
शहरी11349.842654.461117.1542.09
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>9.91%
 

 

 
उत्तराखंडग्रामीण88011.621747.41788.4445.12
शहरी108210.481744.92847.148.55
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>11.26%
 

 

 
राजस्थानग्रामीण90516.051179.4646.5554.82
शहरी100211.691663.08798.0946.22
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>14.71%
 

 

 
ओड़िसाग्रामीण69535.65818.47506.7561.91
शहरी86117.291548.36749.1348.38
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>32.59%
 

 

 
गुजरातग्रामीण93221.541109.76640.157.68
शहरी115210.141909.06882.346.22
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>16.63%
 

 

 
केरलग्रामीण10189.141835.2284345.93
शहरी9874.972412.58969.7640.20
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>7.5%
 

 

 
छतीसगढ़ग्रामीण73844.61783.57456.0458.20
शहरी84924.751647.32719.9743.71
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>39.93%
 

 

 
हरियाणाग्रामीण101511.641509.91815.253.99
शहरी116910.282321.491001.2643.13
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>11.16%
 

 

 
जम्मू-कश्मीरग्रामीण89111.541343.88776.8257.80
शहरी9887.21759.45901.851.25
राज्य में गरीब>>>>>>>>>>10.35%
 

 

 
भारतग्रामीण81625.71053.64600.3656.98
शहरी100013.71984.46880.8344.39
देश में गरीब>>>>>>>>>>21.93%
 

 

 
स्रोत –
  1. http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/Key_Indicators-Household%20Consumer%20Expenditure.pdf
  2. http://www.indiaenvironmentportal.org.in/files/file/Household%20Consumer%20Expenditure%20across%20Socio-Economic%20Groups.pdf












































About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. The author could be contacted at sachin.vikassamvad@gmail.comTelephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Friday, October 12, 2012

15 अक्तूबर को डी.सी.दफ़्तर पर धरना-प्रदर्शन

मकसद: बेहतर रिहायशी प्रबंधों के के अधिकार की मांग 
पाँच हज़ार से अधिक लोगों के हस्ताक्षरों सहित सौपा जाएगा माँगपत्र
विकास के दावों के बीच देखें...किस तरह जिंदा हैं लोग....कैसे शर्मिंदा हैं लोग ....!

लुधियाना 12 अक्तूबर, 2012:(*विमला सक्करवाल)- लुधियाना के फोकल प्वाइंट फेज़-4 में स्थित मज़दूरों की बस्ती राजीव गांधी कालोनी के लोगों ने बुरी रिहायशी हालतों के प्रति प्रशासन की बेरुख़ी से तंग आकर संघर्ष का रास्ता पकडऩे का ऐलान कर दिया है। राजीव गांधी कालोनी के लोग गलियों पक्की कराने, सीवरेज निकासी के उचित प्रबंध, साफ़-सफ़ाई, साफ़ पानी की नियमित सप्लाई, बिजली सम्बन्धित शिकायतों के निपटारे के उचित प्रबंध समेत अनेकों माँगों के लिए 15 अक्तूबर (सोमवार) को कारख़ाना मज़दूर यूनियन के नेतृत्व में डी.सी. दफ़्तर, लुधियाना पर सुबह 10 बजे धरना देकर रोष प्रदर्शन करेंगे और पाँच हज़ार से अधिक हस्ताक्षरों वाला माँग पत्र डी.सी. लुधियाना को सौंपा जायेगा। धरने की तैयारियाँ ज़ोर शोर के साथ चल रही हैं। एक पर्चा प्रकाशत किया गया है जो कारख़ाना मज़दूर यूनियन के कार्यकर्ता बस्ती में मज़दूरों के कमरे कमरे जा कर बाँट रहे हैं, उनसे माँग पत्र पर हस्ताक्षर करवा रहे हैं और धरने में शामिल होने की अपील कर रहे हैं। माँग पत्र पर अब तक 4758 लोगों के हस्ताक्षर हो चुके हैं।
कारख़ाना मज़दूर यूनियन के संचालक लखविन्दर ने बताया कि गरीबी की जि़ंदगी काटने पर मजबूर इस कालोनी के निवासियों के रिहायशी हालातों की भयंकरता को शब्दों मेंा बयान कर पाना संभव नहीं है। इस कालोनी के सभी निवासी गरीब मज़दूर हैं। उब्बड़-खाबड़ कच्ची गलियाँ, सीवरेज निकासी की उचित व्यवस्था नहीं, गंदे पखाने, चारों तरफ़ कूड़े-गन्दगी-बदबू -मच्छर-मक्खियों का साम्राज्य, पानी की बेहद कम स्पलाई, पीने के लिए दूषित पानी - यह हालत है मज़दूरों की इस बस्ती की। ऐसी हालत में लोगों की सेहत का हाल क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना कोई कठिन नहीं है। इसके अलावा बिजली महकमे से लोग अलग से दुखी हैं। बिजली की खऱाबी ठीक करवानी हो, बिल ज़्यादा आने की शिकायत हल करवानी हो, नया मीटर लगवाना हो - बिजली विभाग के अधिकारी मज़दूरों से सीधे मुँह बात नहीं करते। गलियों में रात के समय के लिए रौशनी का कोई प्रबंध नहीं है। बिजली की 14000 हाईवोलटेज तारें घरों की छतों के बिलकुल ऊपर से गुजरती हैं जिससे हमेशा हादसें होते रहते हैं। राजीव गांधी कालोनी के आस-पास जीवन नगर, शेरपुर, ग्यासपुरा आदि विशाल गरीब आबादी वाले इलाकों के लिए नज़दीक में कोई सरकारी हस्पताल या डिस्पेंसरी नहीं है। राजीव गांधी कालोनी के मज़दूरों की माँग है कि इलाको में सरकारी हस्पताल खोला जाये। औद्योगिक मज़दूरों के लिए खोली गई ई.एस.आई. डिस्पेंसरी का विस्तार किया जाये। पिछले महीने 30 सितम्बर को कालोनी निवासियों की हुई लोग पंचायत में प्रशासन के खि़लाफ़ संघर्ष छेडऩे के ऐलान के बाद यह फ़ैसला किया गया था कि 15 अक्तूबर को डी. सी. दफ़्तर में हजारों कालोनी निवासियों के हस्ताक्षर करवा कर रोषपूर्ण धरना-प्रदर्शन करके माँग पत्र सौंपा जाये। उन्होंने कहा वैसे तो पंजाब सरकार ने लुधियाना शहर के विकास के लिए 3561 रुपए की परियोजना का ऐलान किया है परन्तु राजीव गांधी कालोनी सहित समेत लुधियाना के अलग-अलग गरीब इलाकों के विकास के लिए सरकार कब कदम उठाएगी? उन्होंने कहा कि लुधियाना की बहुसंख्यक आबादी मज़दूरों की है इसलिए सरकार को सब से अधिक ध्यान उनके जीवन के हालात सुधारने की तरफ देना चाहिए। राजीव गांधी कालोनी के बारे में उन्होंने कहा कि यदि सरकार 3561 करोड़ रुपए का कुछ हिस्सा भी इस कालोनी के विकास पर लगा दे तो कालोनी की कायापलट हो सकती है। लखविन्दर ने कहा कि कारख़ाना मज़दूर यूनियन शहर के सभी इंसाफ़पसंद संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों समेत सभी इंसाफ़पसंद लोगों को उनके समर्थन में आने की अपील करती है।

*विमला सक्करवाल कारख़ाना मज़दूर यूनियन संचालन समिति की सक्रिय सदस्य
सम्पर्क: मकादूर यूनियन,मकादूर पुस्तकालय, राजीव गाँधी कालोनी, 
फोकल प्वाइण्ट-4, लुधियाना।  
फोन- 96461-50249                                                                                                      15 अक्तूबर को डी.सी.दफ़्तर पर धरना-प्रदर्शन