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Friday, September 18, 2026

बैंक पेंशन>1993 के समझौते से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक

M S Bhatia on Friday 18th September 2026 at 11>16 AM Regarding Banks Pension -Punjab Screen Punjabi 

बैंक पेंशन अपडेशन पर मनिंदर सिंह भाटिया का खास लेख


​बैंक कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की पेंशन अपडेशन का मुद्दा कोई नया या हाल ही में उठा मामला नहीं है। इसकी जड़ें 29 अक्टूबर 1993 के ऐतिहासिक मेमोरेंडम ऑफ सेटलमेंट में मिलती हैं। यह समझौता इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) द्वारा 58 बैंकों के प्रबंधन और बैंक कर्मचारियों की यूनियनों के बीच हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी इस समझौते और इसकी धारा 12 का उल्लेख दर्ज है।

​इस समझौते का मुख्य उद्देश्य बैंक कर्मचारियों के लिए पेंशन योजना शुरू करना था। इसके तहत पेंशन को सेवानिवृत्ति के दूसरे लाभ के रूप में लागू करने का निर्णय लिया गया और इसकी प्रभावी तिथि 1 नवंबर 1993 रखी गई। समझौते में पेंशन की दर, योग्य सेवा, महंगाई राहत (Dearness Relief), कम्यूटेशन आदि के बारे में भी प्रावधान किए गए।

​परंतु इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण बात धारा 12 है। इसमें कहा गया था कि पेंशन योजना में पेंशन की "अपडेटिंग" सहित अन्य शर्तों के लिए प्रावधान किए जाएं और ये प्रावधान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) में लागू प्रावधानों की तर्ज पर हों।

​इसके अलावा, 1993 के समझौते में पेंशनभोगियों को महंगाई राहत देने के संबंध में भी कहा गया था कि यह भारतीय रिजर्व बैंक में चल रहे महंगाई भत्ता फॉर्मूले की तर्ज पर हो। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय पेंशन व्यवस्था तैयार करने वालों के सामने आरबीआई का पेंशन मॉडल एक महत्वपूर्ण संदर्भ था।

​इसके बाद 1995 के बैंक एम्प्लॉइज पेंशन रेगुलेशंस बने। यहाँ से पेंशन अपडेशन की कानूनी व्याख्या का मुद्दा और जटिल हो गया। बाद में रेगुलेशन 35(1) में 2002 में संशोधन किया गया और इसमें कहा गया कि बेसिक पेंशन और जहाँ लागू हो वहाँ अतिरिक्त पेंशन को अपेंडिक्स-I में दिए गए फॉर्मूले के अनुसार अपडेट किया जाएगा।

​यहाँ ही पेंशनभोगियों और बैंक प्रबंधन/सरकार के बीच कानूनी विवाद का मुख्य बिंदु बना। पेंशनभोगियों द्वारा यह तर्क दिया गया कि यदि 1993 का समझौता आरबीआई की तर्ज पर पेंशन अपडेशन की बात करता है और 2002 के संशोधन में "सेल बी अपडेटेड" जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, तो इसका लाभ व्यापक रूप से पेंशनभोगियों को मिलना चाहिए। दूसरी ओर, इसकी कानूनी व्याख्या और इसकी सीमा के बारे में विभिन्न अदालती स्तरों पर अलग-अलग विचार सामने आए हैं।

लेखक एम एस भाटिया 
​इसी पृष्ठभूमि में एम.सी. सिंगला मामला महत्वपूर्ण बन गया है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। 22 जुलाई 2026 की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से उस तर्क को नोट किया कि 2002 में संशोधित रेगुलेशन 35(1) के तहत अपडेशन सभी कर्मचारियों पर लागू होना चाहिए और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की वार्षिक पेंशन की गणना में यह अपडेशन नहीं दिया गया। अदालत ने पीएनबी को इस संबंध में अतिरिक्त हलफनामा और दस्तावेज पेश करने के लिए कहा और 7वें से 12वें 'द्विपक्षीय समझौते' (Bipartite Settlement) तक के संबंधित दस्तावेज भी मांगे।

​सितंबर 2026 तक मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। 9 सितंबर को मामला सूचीबद्ध हुआ था लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी और पेंशनभोगी संगठन द्वारा जारी जानकारी के अनुसार अगली सुनवाई के लिए इसे फिर से सूचीबद्ध करने का प्रयास किया गया। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन अपडेशन के पक्ष में कोई अंतिम फैसला दे दिया है।

​इस पूरे मामले को समझने के लिए 29 अक्टूबर 1993 का दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य है। यह दस्तावेज स्पष्ट रूप से बताता है कि पेंशन योजना बनाते समय "अपडेटिंग" को विचार से बाहर नहीं रखा गया था, बल्कि इसे समझौते की धारा 12 में विशेष रूप से शामिल किया गया था।

​आज जब बैंकों में वेतन और पेंशन की गणना में बड़े बदलाव आ चुके हैं, तो हजारों पुराने पेंशनभोगियों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या उनकी पेंशन भी समय-समय पर अपडेट होनी चाहिए या नहीं। इसका अंतिम कानूनी जवाब अब सुप्रीम कोर्ट की विचाराधीन कार्रवाई से जुड़ा हुआ है।

​इसलिए 1993 का समझौता केवल बैंक पेंशन की शुरुआत का दस्तावेज नहीं है, बल्कि पेंशन अपडेशन पर चल रही लंबी कानूनी चर्चा का एक महत्वपूर्ण आधार भी है।

​(लेखक एक पूर्व बैंकर, ट्रेड यूनियनिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं।)

Friday, September 05, 2025

“ गुरुबिना ज्ञान कहां, ज्ञान बिना इंसान कहां”

Received From M S Bhatia on Thursday 4th September 2025 at 12:28 PM Regarding Teachers Day

शिक्षक दिवस 2025-हमारे शिक्षकों को नमन//मनिंदर सिंह भाटिया

गुरुबिना ज्ञान कहां, ज्ञान बिना  इंसान कहां! को समझा रहे हैं जानेमाने लेखक एम एस भाटिया 


भारत में, शिक्षक दिवस 5 सितंबर को, प्रख्यात दार्शनिक, शिक्षक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती पर मनाया जाता है। उनका मानना ​​था कि "शिक्षकों को देश का सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क होना चाहिए"। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना दशकों पहले था: किसी राष्ट्र की प्रगति उसकी कक्षाओं में समर्पित शिक्षकों से शुरू होती है।

ए.एस. सीनियर सेकेंडरी स्कूल, खन्ना, ज़िला लुधियाना में, 1968 से 1975 तक की शैक्षिक यात्रा ने हमारे जीवन में एक नया अध्याय शुरू किया। साधारण कक्षाओं और समर्पित शिक्षकों के साथ, उस समय उन मूल्यों और अनुशासन की नींव रखी गई थी जिनके लिए यह विद्यालय आज भी जाना जाता है।

जब हम शिक्षक दिवस 2025 मनाते हैं, तो हम उन शिक्षकों को कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं जिन्होंने धैर्य और प्रतिबद्धता के साथ हमारे बाल मन को आकार दिया। उनकी विरासत आज भी शिक्षकों का मार्गदर्शन करती है तथा हमें याद दिलाती है कि यद्यपि पद्धतियां बदलती रहती हैं, परंतु शिक्षा की भावना शाश्वत रहती है।

उस समय स्कूल में खन्ना से जितने छात्र पढ़ने आते थे, लगभग उतने ही आसपास के गाँवों जैसे छोटा खन्ना, राहौं, बहोमाजरा, मोहनपुर, इकलाहा, सलाना, अमलोह, सेह आदि से भी। हालाँकि उस समय ज़्यादातर छात्रों के माता-पिता आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत नहीं थे, फिर भी छात्रों में संतोष का भाव था। कुछ सीखने की ललक थी। मुझे याद है कि हमारे कई दोस्त दोपहर का खाना अचार के साथ परांठे के रूप में लाते थे और हम साथ बैठकर खाते थे।

हर दिन स्कूल में सुबह की प्रार्थना सभा की गूँज, कॉपियों की खनक और शिक्षकों का अपने छात्रों के प्रति स्नेह, ताज़गी भरा होता था। शिक्षक दिवस पर, रोज़मर्रा के इस जादू को याद किया जाता है: हम उन शिक्षकों का धन्यवाद करते हैं जो जिज्ञासा जगाते थे, कांपते हाथों को थामते थे और संभावना को उद्देश्य में बदल देते थे। वे छात्रों को स्वच्छता अभियान, पौधारोपण, सड़क सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता में भी आगे बढ़ाते थे और उन्हें ज्ञान को सेवा में बदलना सिखाते हैं। परिणाम न केवल अंकतालिकाओं में, बल्कि व्यवहार में भी स्पष्ट दिखाई देते थे: उन विद्यार्थियों में जिन्होंने ध्यान से सुना, प्रश्न पूछे, सहयोग किया और नेतृत्व किया।

यद्यपि विद्यालय के विद्यार्थी सभी अध्यापकों का आदर करते थे, परन्तु उनमें सबसे अधिक आदर तत्कालीन प्रधानाचार्य मदन गोपाल चोपड़ा जी का था, जो 25 वर्षों (5.11.1949 से 14.10.1974) तक विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे और जिनके समय में यह विद्यालय पंजाब के शीर्ष तीन या चार विद्यालयों में से एक था। यहाँ के विद्यार्थी बोर्ड परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त करते थे और बहुत बड़ी संख्या में विद्यार्थी  बोर्ड की कक्षाओं में मैरिट पर आते थे। श्री मदन गोपाल चोपड़ा जी के बाद, श्री रिखी राम शर्मा जी 15.10.1974 से प्रधानाचार्य बने। मास्टर विनोद कपिला जी और लाजपत राय जी उप-प्रधानाचार्य थे, मास्टर अविनाश चंदर जी और मास्टर नरेश चंद जी भी बाद में स्कूल के प्रधानाचार्य बने।

कई और नाम भी याद आ रहे हैं। मास्टर हेम राज, मास्टर सोम नाथ- हिंदी- साहित्य और संस्कृत, राम सरूप चोपड़ा, मास्टर गुरुमीत सिंह, मास्टर हरद्वारी लाल- हिंदी, मास्टर वासुदेव-संस्कृत, मास्टर तिलक राज- हिंदी, मैडम गोपाल शर्मा, अविनाश चंद्र, मास्टर नरेश नौहरिया, मास्टर ओ.पी. टककियार, मास्टर महिंदर पाल- गणित, मास्टर ओम प्रकाश नौहरिया-गणित, मास्टर जोगिंदर सिंह- पंजाबी, मास्टर बचन सिंह, मास्टर निर्मल सिंह- पीटी, मास्टर ओ.पी. वर्मा- वॉलीबॉल, मास्टर जोगिंदर पाल गुप्ता- अंग्रेजी, मास्टर मुख्तियार सिंह सामाजिक अध्ययन और एनसीसी एयर विंग के प्रभारी, मास्टर उजागर सिंह, मास्टर सुरजीत सिंह और मास्टर तरलोचन सिंह स्पोर्ट्स, मास्टर गुरदयाल सिंह, मास्टर एम.एल. कांडा, मास्टर मंगत राय, मास्टर हरद्वारी लाल, मास्टर तिलक राज, मास्टर राम नाथ, मास्टर खरैती लाल जी (सीनियर) तथा मास्टर खरैती लाल जूनियर, मास्टर कमल कुमार शर्मा इतिहास और हिंदी (लुधियाना से), मास्टर राम दास जी (बाद में दूसरे सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल बने), मास्टर देस राज, मास्टर रूलाराम-अंग्रेजी/हिंदी और हॉकी कोच, मास्टर मदन लाल, पीटीआई मास्टर करनैल सिंह तथा प्रेम सिंह, मास्टर धर्मपाल गर्ग, मास्टर हरि ओम, मास्टर विजय मोहन भांबरी, मास्टर सतपाल मैनरो, मास्टर देस राज  गणित-मास्टर वेद प्रकाश  हिंदी तथा मास्टर शिव प्रकाश 5वीं कक्षा में एबीसी पढ़ाते थे, मास्टर सतपाल वर्मा, मास्टर साधु राम-ड्राइंग, मास्टर बचना राम, मास्टर एन के वर्मा, मास्टर जतिंदर वर्मा, मास्टर मेहर सिंह, मास्टर हरिओम, मास्टर अजीत कुमार - फिजिक्स (कुछ समय बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी), ड्राइंग मास्टर गुरमेल सिंह, पंजाबी मास्टर करम सिंह, मास्टर धरम पाल अंगरीश, मास्टर तरलोचन सिंह गिल, *मास्टर भोला नाथ जी गणित पढ़ाने में समर्पण की मिसाल थे। वे हर सवाल ब्लैकबोर्ड पर हल करते थे।

स्कूल में ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ बेटा और बाप दोनों एक साथ शिक्षक रहे, जैसे मास्टर अयोध्या प्रकाश जी और मास्टर नरेश चंद खन्ना। वी.पी. कपूर - भौतिकी और मास्टर हेमराज - सरल गणित।

मास्टर कृष्ण कुमार शर्मा जी 1972 में हमारे स्कूल आए थे। उन्होंने शिक्षक-छात्र संबंधों में एक नया अध्याय शुरू किया। बाद में वे स्कूल के प्रधानाचार्य भी बने। पंजाबी पढ़ाने के अलावा, वे वॉलीबॉल के एक बहुत अच्छे कोच भी थे। उनके प्रयासों से स्कूल की वॉलीबॉल टीम न केवल राज्य स्तर पर, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रसिद्ध हुई।

शिक्षकों की भावना छात्रों को एक नई पीढ़ी के रूप में गढ़ने की थी, न कि आज की तरह व्यावसायिक संबंध बनाने की। सीमित बुनियादी ढाँचे और अभिभावकों में कम साक्षरता दर के बावजूद, कई प्रतिभाशाली छात्र अच्छे मानवीय मूल्यों वाले थे। वेतन बहुत ज़्यादा नहीं था, पेंशन योजना भी नहीं थी, यह शिक्षकों में नौकरी के प्रति उत्साह और संस्था प्रमुख द्वारा मानव संसाधन के अच्छे प्रबंधन का परिणाम था, जिसने हमारे संस्थान में बहुत बड़ी भूमिका निभाई और देशभक्ति का जोश इन संस्थानों की आत्मा था।

हमारे सम्मानित शिक्षकों में से एक श्री ओम प्रकाश शर्मा जी-कॉमर्स के शिक्षक थे और एनसीसी की आर्मी विंग के प्रभारी थे, जो अंबाला में सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं। मास्टर सुरजीत सिंह बैडमिंटन कोच थे।

वैसे तो हर बैच में स्कूल के विद्यार्थी प्रथम स्थान और मैरिट में आते थे, लेकिन 1974 का 10वीं और 1975 का 11वीं का बैच आज भी नहीं भूला है, जब 1974 में 10वीं में सुधीर घई पंजाब में तीसरे और जगदीश घई पंजाब में सातवें स्थान पर रहे थे। 1974 में 10वीं कॉमर्स में लखमीर सिंह पंजाब में प्रथम आए थे। 1975 में 11वीं में सुधीर घई नॉन-मेडिकल में पंजाब में प्रथम और जगदीश घई पंजाब में पाँचवें स्थान पर रहे थे। इसी तरह, मेडिकल स्ट्रीम में रविंदर कुमार अरोड़ा टॉपर रहे थे। सुधीर घई और जगदीश घई ज़िला स्तर पर 10वीं और 11वीं दोनों में क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर रहे थे*।

इन शिक्षकों द्वारा पढ़ाए गए कई छात्र आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, सीए, शिक्षक, बैंकर या अन्य सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी और अधिकारी बने। कुछ ने अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया और सफल उद्यमी बने। हमारे कुछ मित्र समाज सेवा और राजनीति के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं।

हमारे एक मित्र अविनाश सिंह छतवाल, जिन्होंने पहले एमबीबीएस और बाद में आईएएस किया। वे पंजाब के सचिव के पद तक पहुँचे।

खेलों में भी, उस समय के कई प्रतिभाशाली छात्रों ने ख्याति अर्जित की और जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल का नाम रोशन किया।

सन 1972 में, स्कूल में एक खो-खो टीम बनाई गई और मुझे याद है कि 12 में से 9 खिलाड़ी आठवीं-डी सेक्शन से चुने गए थे। मुझे कुछ नाम याद हैं - छोटे खन्ने से दर्शन सिंह और दर्शन लाल, रसूलडा से प्रीतम सिंह और मेहर सिंह आदि और मैं भी उस टीम का हिस्सा था। हमने 1973 में सुधार में आयोजित जिला स्तरीय खेलों में खो-खो में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

अंत में, मैं यही कहूँगा कि हमारे गुरु ही हमारी ताकत हैं। वे ही हैं जिन्होंने हमारे सपनों को उड़ान दी। हम आज जो भी हैं यह सब हमारे शिक्षकों की कड़ी मेहनत, सच्चाई और प्रेम की वजह से है जिन्होंने हमारी बहुत मजबूत नींव रखी ।

हम अपने आदरणीय शिक्षकों, विशेषकर प्रधानाचार्य मदन गोपाल चोपड़ा जी जैसे शिक्षकों के प्रति उनके समर्पण और मार्गदर्शन के लिए भी आभारी हैं, जिन्होंने हमारे विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आज, 50 वर्षों के बाद, हमारे गुरुओं के प्रति हमारा सम्मान हमारे हृदय में पहले से कहीं अधिक है।

शिक्षक दिवस की एक बार फिर शुभकामनाएँ!

(लेखक 1968 से 1974 तक ए.एस. सीनियर सेकेंडरी (तत्कालीन हायर सेकेंडरी) स्कूल, खन्ना के छात्र रहे और 5वीं, 8वीं और 10वीं कक्षा में मैरिट सूची में स्थान प्राप्त किया।)

Tuesday, August 10, 2021

बैंकों के निजीकरण को किसी भी हालत में सहन नहीं करेंगे

9th August 2021 at 8:42 PM

 सरकार की इस नीति को जबर्दस्त टक्कर देँगे-बैंक यूनियन लीडर 


लुधियाना/जालंधर:11 अगस्त 2021: (एमएस भाटिया और पंजाब स्क्रीन डेस्क इनपुट)::

मोदी सरकार अपनी पूर्व नियोजित स्क्रिप्ट के मुताबिक सब कुछ अपनी मनमर्ज़ी के मुताबिक करती चली जा रही है। वाम, विपक्ष या दूसरी ट्रेड यूनियनें केंद्र सरकार के किसी भी कदम को रोक पाने में सफल नहीं हो सकीं। केवल तीन कृषि कानूनों को लेकर शुरू हुए किसान आंदोलन ने ही केंद्र सत्ता को अवरोध का कुछ अहसास कराया है अन्य क्षेत्रों में तो सत्ता की मनमानी जारी पूरी तरह जारी है। इस हकीकत के बावजूद बैंकों से सबंधित ट्रेड यूनियनों का कहना है हम बैंकों का निजीकरण नहीं होने देंगें और इस अभियान को ज़बरदस्त टक्कर देंगें। क्या सचमुच में ऐसा हो पाएगा? क्या मोदी सरकार की मनमानी के तेज़ रफ्तार रथ का घोडा ट्रेड यूनियन का यह मोर्चा कभी पकड़ पाएगा? आइए देखते हैं बैंकों से जुड़े ट्रेड यूनियन नेताओं के दावों और बयानों को। 

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया कर्मचारी संघ (एन.जेड) और सेंट्रल बैंक ऑफिसर्स यूनियन (चंडीगढ़ जोन) की कार्यकारी समिति की एक संयुक्त बैठक आयोजित की गई जिसमें बैंकों के निजीकरण पर एक बार फिर से  ज़ोरदार चर्चा की गई। 

इस सिलसिले में हुई बैठक को संबोधित करते हुए यूनियनों के नेताओं ने याद दिलाया कि सन 1969 से पहले सैकड़ों निजी बैंक विफल हो चुके थे और आम आदमी की बचत को बर्बाद किया जा रहा था। बैंक कर्मचारी 1946 से एआईबीईए के मार्गदर्शन में बैंकों के राष्ट्रीयकरण की मांग कर रहे थे। अंत में, 1969 में 14 प्रमुख निजी बैंकों और 1980 में 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद, देश ने चौतरफा प्रगति की और विशेष रूप से बैंकों ने ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में अपनी शाखाएँ खोलीं, जिससे आबादी के बड़े भाग को बहुत लाभ हुआ। परिणाम भी सुखद रहा। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, नीली क्रांति और औद्योगिक क्रांति ने विकास के नए रेकार्ड कायम किये। इस खुशहाली का रंग आम गरीब और माध्यम वर्ग के लोगों के जीवन में भी नज़र आया। 

गौरतलब है कि सन 1969 में गैर-सूचीबद्ध वाणिज्यिक बैंकों की 9000 शाखाएँ थीं जो राष्ट्रीकरण के बाद अब बढ़कर 160,000 हो गई हैं। इसके अलावा, 220,000 एटीएम, ग्रामीण क्षेत्रों में 541,000 बैंकिंग संपर्क कर्ता और शहरी क्षेत्रों में 635,000 बैंकिंग संपर्क कर्ता लोगों को उनके बैंकिंग लेनदेन में सहायता कर रहे हैं। सन 1969 में ही कृषि  को कुछ हज़ार करोड़ का क़र्ज़ ही दिया गया था, जो अब बढ़कर 12 लाख करोड़ हो गया है। 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वर्तमान सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं में भारी रूप से शामिल रहे हैं। मुद्रा योजना के तहत 28 करोड़ लाभार्थियों को वितरित किए गए 15 लाख करोड़ रुपये में से अधिकांश ऋण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा वितरित किए गए थे। पिछले पांच वर्षों के दौरान, प्रधान मंत्री जन धन योजना के तहत 41 करोड़ खाते खोले गए, जिनमें से 97% सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और इसके प्रायोजित क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा खोले गए। यह भी एक नया रेकार्ड है। 

इसी तरह, कोरोना महामारी के दौरान, बैंक कर्मचारी कोरोना योद्धाओं के रूप में सेवा करते रहे, जिसकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी आगे बढ़ कर सराहना की। इन सबके बावजूद मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के लिए कटिबद्ध है।  इस मकसद के लिए निरंतर प्रयासशील भी है। 

ट्रेड यूनियन नेताओं ने आगे कहा कि ए.आई.बी.ई.ए और  ए.आई. बी.ओ.ए के बैनर तले बैंक कर्मचारी किसी भी तरह के संघर्ष के लिए तैयार हैं। बैंक कर्मचारी 1991 से सरकार की नई आर्थिक नीतियों के तहत सुधारों का विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे किसी भी तरह से बैंकों या देश के लोगों के पक्ष में नहीं हैं। 

बैंकों के निजीकरण के बाद, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोग बैंकिंग सेवाओं से वंचित हो जाएंगे क्योंकि निजी बैंक केवल लाभ के लिए काम करते हैं। सभा को संबोधित करने वाले नेताओं में राजेश वर्मा और सुरेश भाटिया, महासचिव और अध्यक्ष-सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया कर्मचारी संघ, गुरमीत सिंह, संजीव भल्ला और सुनील फुल, महासचिव, चेयरमैन और अध्यक्ष-सेंट्रल बैंक ऑफिसर्स यूनियन शामिल थे। 

महिला विंग की चेयरपरसन बलजीत कौर और ऑफिसर्स यूनियन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष गुरमेल सिंह भी मौजूद थे। बैठक में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ यूटी के नेताओं और साथियों ने भाग लिया। बैठक में मौजूद वरिष्ठ कॉमरेड एमएस भाटिया ने भी सभा को संबोधित किया और युवा साथियों को आगे आकर आंदोलन में शामिल होने को कहा।

लेकिन आंदोलन क्या होगा? निजीकरण के इस सरकारी कदम को रोकने का कोई ठोस तरीका क्या होगा? यह सवाल भी जवाब मांगते हैं। वास्तव में मोदी सरकार के आने से काफी पहले ही 1990 के दशक में केन्द्रीय सत्ता का विशेष लेकिन छुपा हुआ प्रचार अभियान इस मकसद के लिए चल रहा था कि सरकारी बैंकों के कर्मचारी कामचोरी जैसी डयूटी करते हैं। अगर किसीबैंक में किसी मुलाज़िम ने कुछ ऊंचा बोल दिया तो इसे भी निजीकरण के हक में इस्तेमाल किया जाने लगा। क्या ट्रेड यूनियन नेताओं ने कार्पोरेट के समर्थक हो चुकी सरकारों के खिलाफ उसी समय कोई ज़ोरदार कदम उठाया। इस तरह कोई खतरनाक साज़िशों को समझा? नहीं--ऐसा कुछ भी नहीं हो सका।  ट्रेड यूनियन लीडर अपने ही बंद कमरों में, अपने ही लोगों के दरम्यान, अपने ही रटे रटाए भाषण देते रहे। शहरों और गाँवों की आम जनता से सीधा सम्पर्क शुरू करने में ट्रेड यूनियन लहर कभी गंभीर ही नहीं हुई। बैंक अधिकारीयों के अपने बच्चे निजी बैंकों में खाते खुलवाने और यहाँ तक कि नौकरी करने को भी पहल देने लगे। 

अब भी केवल यही रास्ता बचा है जो स्थिति को बदल सकता है। क्या बैंकों से सबंधित ट्रेड यूनियन लीडर गांवों और शहरों के आम लोगों की तरफ रुख करेंगे? इस काम को करना है तो अपनी यूनियनों, अपने सम्मेलनों, अपने हाल कमरों और अपने मंचों से बाहर निकल कर बहुत ही खुले मन से लोगों में जाना ही होगा। सरकार का मुकाबिला समुचित और एकजुट जनता को साथ लेकर ही किया जा सकता है। जागरूक जनता की शक्ति बहुत बड़ों बड़ों का रुख मोड़ देती है। लेकिन इसे एकजुट तो करना ही होगा। कभी इन ट्रेड यूनियनों ने ऐसा गंभीर प्रयास किया? ये लोग यही सोचते रहे-यह कांग्रेस की जनता, यह सीपीआई की जनता, यह सीपीएम की जनता......और ऐसा सोच कर असली एकता कभी बन ही नहीं पाएगी और सरकार सफल होती रहेगी। अब गेंद ट्रेड यूनियनों के पाले में भी आ सकती है लेकिन कुछ बोल्ड तो होना पड़ेगा। सरकार के मुकाबिले में अब भी बहुत बड़ी शक्ति बना जा सकता है। क्या वास्तव में ट्रेड यूनियन लहर इस बेहद ईमानदार अभियान के लिए तैयार भी है?

Sunday, October 18, 2020

पुरुष मानसिकता को बदल कर ही होगा बदलाव

 सहमभरी ख़ामोशी को तोड़ने आगे आया सोशल थिंकरज़ फोरम 


लुधियाना
: 17 अक्टूबर 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन):: 

 मता-ए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है 

कि ख़ून-ए-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ मैं ने 

ज़बाँ पे मोहर लगी है तो क्या कि रख दी है 

हर एक हल्क़ा-ए-ज़ंजीर में ज़बाँ मैं ने        --(जनाब फैज़ अहमद फैज़ साहिब) 

कोरोना का कहर, कानून की पाबंदियां, लॉकडाउन से टूटी आर्थिकता की कमर--कुल मिला कर बोलना नामुमकिन जैसा हो गया। दर्द असहनीय हद तक बढ़ा लेकिन चीखना भी सम्भव न रहा। माहौल में अजीब सी सहम भरी चुप्पी, दर्द के मारे कोई कराहता तो उस आवाज़ को सुनना भी मुश्किल लगता। ऐसे माहौल में डाक्टर अरुण मित्रा और एम एस भाटिया की टीम आगे आई। महिलाओं के खिलाफ लगातार बढ़ रहे अत्याचार और जुर्म को बेनकाब करना ज़रूरी हो गया। सोशल थिंकर्ज फोरम ने जब इस मकसद की आवाज़ बुलंद करनी चाही तो उसे दुविधा का अहसास भी था लेकिन उसे उत्साहित किया इसी टीम ने। उत्साह से जोश भी मिला हिम्मत भी बढ़ी। सोशल थिंकर्ज फोरम के सक्रिय सहयोग से महिलाओं का यह काफिला निकल पड़ा अत्याचार की साज़िशों को बेनकाब करने। इस काफिले को देख कर याद आया डा. कविता किरण का वह शेयर जिसमें कमाल की बात कही गयी है, इस काले स्याह दौर में भी रौशनी देती बात, लगातार चलने का संदेश देती बात--:   

नामुमकिन को मुमकिन करने निकले हैं,

हम छलनी में पानी भरने निकले हैं।

                                आँसू पोंछ न पाए अपनी आँखों के

                               और जगत की पीड़ा हरने निकले हैं।

बुद्धिजीवियों के इस काफिले ने डा. अरुण मित्र से प्रेरणा पा कर वेबिनार का आयोजन किया। पितृ सत्ता को चुनौती देने का नारा एक बार फिर बुलंद किया गया। महिला वर्ग के कदम कदम पर बेड़ियां ले कर तैयार खड़ा पितृ सत्ता का वर्ग बहुत से रूप बदल कर भी हर तरफ मौजूद मिला। इस दबाव से मुक्ति की आवाज़ उठाई इस वेबिनार ने। इस दबाव से मुक्ति के लिया आवश्यक है इस पितृ सत्ता से आज़ाद होना। इस जागीरदारी सोच से मुक्ति परमावश्यक हो गयी है। महिला वर्ग की प्रतिभा, कौशल और शक्ति पर एक पहाड़ बन कर जमा हुआ है पितृसत्ता से भरी सोच का ढांचा। इसका नाश हुए बिना शायद बदलाव सम्भव ही नहीं। इस वेबिनार में मौजूद रहे पूर्व जिला अटार्नी जनरल और जानेमाने लेखक मित्र सेन मीत। उन्होइने कानून की बारीकियां समझाते हुए बताया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिए कानून तो बहुत से बने हुए हैं लेकिन उन्हें सही तरह से लागु ही नहीं किया जाता। पुरुष प्रधान सत्ता और समाज में यौन हिंसा से सबंधित मामलों में भी जब तफ्तीश शुरू होती है तो उसका केंद्रीय बिंदु महिला ही रहती है। आरोपियों का न तो मेडिकल होता है और न ही उनसे इस तरह के तीखे सवाल हैं। परिणाम यही होता है दोषी ही बड़ी हो जाते हैं। पुलिस पर सियासी दबाव भी उनके हक में ही जाता है। हाथरस मामले की बात करते हुए उन्होंने कहा कि योगी सरकार से मिले आदेशों के अंतर्गत पुलिस ने जिस तरीके से वहां काम किया वह बेहद निंदनीय है। संविधानिक धाराओं की बुरी तरह से धज्जियां उड़ाई गयीं हैं। वहां की पुलिस ने पूरी तरह से गैरपेशेवराना ढंग से काम किया है। यहाँ तक कि गैर पारम्परिक ढंग से जिस तरह रात में लाश को जला कर सबूतों को पुरी तरह से नष्ट कर दिया गया वह कानून और संविधान के उलंघन की सभी सीमाओं को पार करने जैसी बात है। 

जानीमानी लेखिका डा. परम सैनी ने कहा कि इस  तरह से महिला की मानसिकता पर बहुत ही बुरा प्र भाव पढ़ता है। बुरी तरह से निराश और हताश हो कर वह हौंसला छोड़ बैठती है। इससे इस तरह की बहुत सी अन्य घटनाओं को शह मिलती है। इस तरह के मुजरिमों का हौंसला बढ़ जाता है। यदि उसे परिवार और समाज की तरफ से आश्रय, सहायता और सहयोग न मिले तो हालत बुरी तरह बिगड़ जाती है जिसका परिणाम  लिए घातक होता है। इस स्थिति में से निकलने के लिए पुरुषों की मानसिकता में बदलाव बहुत ही आवश्यक है जिसकी शुरुआत बचपन से ही की जनि चाहिए। 

एटक  महासचिव समरजीत कौर ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा प्राचीन समय से चलती चली आ रही है और इसका ज़िक्र हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी आता है।  समाज में व्याप्त जागीरदारी वाली इस सोच को बदलना बेहद आवश्यक है। समाज को केवल पितृ सत्ता पर आधारित न रखते हुए इसे बराबरी का समाज बनाना होगा। शक्ति के प्रदर्शन को सामने रख कर की जाती यह हिंसा केवल  महिलाओं के प्रति ही नहीं है बल्कि बच्चों और समाज के दबे कुचले लोगों के प्रति भी भी उसी तरह से बर्बर है। मैडम अमरजीत कौर ने यूपी  द्वारा दिए गए ब्यान की तीखी निंदा की जिसमें मंत्री  कि महिलाओं को संस्कारी बनाओ। मंत्री के ब्यान को बुरी  अशोभनीय और एतराज़योग्य बताते हुए  बास्तव में आवश्यकता तो लड़कों में अच्छे संस्कार भरने की है। यूं तो बच्चे बुरे नहीं होते लेकिन जब उन्हें सरकार से शह मिलने लगती है तो वे गलत रास्तों पर चलते हुए किसी भी किस्म की हिंसा करने से गुरेज़ नहीं करते क्यूंकि उन्हें सरकार  डर नहीं रहता। वे यह समझने लगते हैं  भी करें आखिर सरकार में बैठे उनके लोग उन्हें बचा ही लेंगें।

पंजाब स्त्री सभा लुधियाना की प्रधान डा.गुरचरण कौर कोचर में महिलाओं के प्रति हो  रही हिंसक वारदातों का विस्तार बताते हुए कहा कि आज के युग में हमारे देश की यह शर्मनाक स्थिति बन गई है कि जो बेहद चिंतनीय भी है। 

आल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के  जिला सचिव दीपक कुमार ने कहा कि वह छात्रों में इसे लेकर जाग्रति पैदा करने का ज़ोरदार अभियान चलाएंगे। शिक्षा नीति में अर्थपुर्ण तब्दीलियों के लिए छात्रवर्ग को लामबंद भी करेंगे क्यूंकि केंद्रीय सरकार की मौजूदा शिक्षा नीति में तो आर्थिक तौर पर कमज़ोर वर्गों के  शिक्षा से ही पूरी तरह से वंचित हो जायेंगे। 

सोशल थिंकर्ज फोरम के संयोजक डा. अरुण मित्रा ने कहा कि विचार विमर्श को समाज  तक लेजाने की आवश्यकता है। 

फोरम के सह संयोजक एम एस भाटिया ने कहा कि यह अकेला महिलाओं का मुद्दा है बल्कि समुचित समाज की ज्वलंत समस्या है जिस पर गहन चिंतन पर आधारित कार्यों की आवश्यकता है। 

इस वेबिनार में अलग अलग वर्गों से बड़ी संख्या में हुए जिनमें प्रमुख हैं कुसुम लता, कुलवंत कौर, इंद्रजीत सिंह सोढ़ी एडवोकेट, डा. राजिंदरपाल, डा. गुरप्रीत रत्न,  अजीत जवद्दी, रंजीत सिंह, अवतार छिब्बड़, अनु कुमारी, प्रदीप शर्मा  कुमार इत्यादि। 

इस तरह के आयोजन भविष्य  में भी होते रहेंगे। यदि आप  ऐसे  किसी भी आयोजन में शामिल होने के इच्छुक हैं तो अपना नाम पता  फॉर्म संयोजक डा. अरुण मित्रा से उनके मोबाईल फोन नंबर   +91IDAG@@@CF@  पर या फिर सह संयोजक एम एस भाटिया के मोबाईल फोन नंबर-919988491002 पर सम्पर्क करके अपनी इच्छा व्यक्त करें। भविष्य के लिए आपका नाम पता दर्ज कर लिया जायेगा।  

Tuesday, January 28, 2020

जंग में झौंकने की सियासत बंद करें दोनों देशों के हुक्मरान

28th January 2020 at 4:59 PM
IDPD के डाक्टर अरुण मित्रा और उनकी टीम की चेतावनी
लुधियाना: 28 जनवरी 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
महंगाई, गरीबी और आर्थिक मंडी की हकीकत को छुपाने के लिए फिर से एक शोर मचाया जा रहा है ठोक दो ठोक दो-पाकिस्तान को ठोक दो। सियासत की इस खतरनाक शरारत के खिलाफ एक बार फिर बुलंद आवाज़ ले कर आये हैं इंडियन डाकटरज़ फॉर पीस (आई डी पी डी) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डाक्टर अरुण मित्रा अपनी टीम साथ। इस  मिशन में उनके साथ हैं बैंकिंग इंडट्री से जुड़े हुए जनाब एम एस भाटिया।  इस टीम ने जंग की बातें कर रहे लीडरों को चेताया है कि आम जनता को तबाही की तरफ मत धकेलें। जनाब साहिर लुधियानवी साहिब के शब्दों में इन लोगों ने कहा है: 
बहुत दिनों से है यह मश्ग़ला सियासत का,
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जायें।
                                 बहुत दिनों से है यह ख़ब्त हुक्मरानों का,
                                 कि दूर-दूर के मुल्कों में क़हत बो जायें॥
डाक्टर अरुण मित्रा ने चेतावनी दी है कि अगर भारत और पाकिस्तान के दरम्यान जंग छिड़ी तो होने वाली तबाही अनुमान से भी कहीं ज़्यादा होगी और इसका ख़मयाज़ा दोनों देशों की जनता को भुगतना पड़ेगा। यह ब्यान ऐन उस वक़्त आया है जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया है की जंग में पिस्टन को हराने के लिए उन्हें दस दिन भी नहीं लगेंगे। डाक्टर मित्रा ने इस ब्यान को बेहद निंदनीय कहते हुए दुःख व्यक्त किया है की यह ब्यान उस वक़्त दिया गया है जब दुनिया के बहुत से हिस्सों में पहले से ही जंग छिड़ी हुई है। जंग के अमानवीय दुष्परिणामों को झेलती हुई दुनिया पर और दबाव बढ़ाना कौन से सिद्धांत का हिस्सा है? इसी संगठन के प्रधान डाक्टर एम एस सूदन और महासचिव डाक्टर शकील उर रहमान ने याद भारत और पाकिस्तान दोनों मानवीय विकास के मामले में बेहद पिछड़े हुए हैं। कोई भी युद्ध दोनों देशों को एक ऐसी तबाही की तरफ धकेल देगा जो  दशकों तक भी नियंत्रित नहीं सकेगी। दोनों देशों को शांति  चाहिए तभी दोनों देशों की जनता विकास  कर सकती है।
इन डाक्टरों ने  दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं।  अगर इनका प्रयोग हुआ तो दो अर्ब लोगों का जीवन खतरे में पड़ जायेगा। 
इन लोगों ने सलाह दी की दोनों देशों की सरकारों को गरीबी, अनपढ़ता और बेरोज़गारी को हटाने के लिए काम करें न की युद्ध की ज्वाला को भड़काएं।  
ी डाक्टरों और मित्रों ने चेतावनी दी कि जंग छिड़ी तो और भयानक हो जाएंगी गरीबी और भुखमरी की मौजूदा तस्वीरें।  देश के विकास की डॉ और पिछड़ जाएगी। बेरोज़गारी और महंगाई और भयानक रूप ले लेगी। कुल मिला कर सारा खामियाज़ा आम जनता को भुगतना पड़ेगा। 
डाक्टर अरुण मित्रा ने जनाब साहिर लुधियानवी साहिब की लम्बी रचना की पंक्तियाँ याद दिलाईं:
चलो कि चल के सियासी मुकामिरों से कहें,
कि हम को जंगो-जदल के चलन से नफ़रत है।
                                      जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आये,
                                      हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है॥
कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया,
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी।
                                   हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी,                                    
                                   हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
उठो कि आज हर इक जंगजू से कह दें,
कि हमको काम की खातिर कलों की हाजत है।
                                   हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक नहीं,
                                   हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है॥
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख न करे,
अब इस जा कोई कंवारी न बेची जाएगी।
                                  ये खेत जाग पड़े, उठ खड़ी हुई फ़सलें,
                                  अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जायेगी॥
यह सर ज़मीन है गौतम की और नानक की,
इस अर्ज़े-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी।
                                हमारा खून अमानत है नस्ले-नौ के लिए,                                
                                हमारे खून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी॥

जंग और जंग की सियासत के खिलाफ डाक्टर अरुण मित्रा के इस अभियान से जुड़ने के लिए आप भी आमंत्रित हैं। उनका मोबाईल नंबर है: 9417000360 
   साहिर लुधियानवी साहिब की इस पूरी काव्य रचना को पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक करें। 

Saturday, November 16, 2019

सराभा के शहीदी दिवस पर सीपीआई ने कराया विशेष आयोजन

आयोजन में व्यक्त की देश में बढ़ रही साप्रदायिक ज़हर पर गहरी चिंता
लुधियाना: 16  नवंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन टीम)::
करतार सिंह सराभा। आज़ादी के लिए शहादतों का मर्ग दिखने वाला महान योद्धा। छोटी सी उम्र लेकिन कामों का रेकार्ड बहुत बड़ा। रंगीन सपने देखने की उम्र थी। घर परिवार और बजुर्ग माता पिता को संभालने की उम्र थी। इन ज़मीनी हकीकतों के बावजूद करतार सिंह ने सपना भी देखा तो एक अलौकिक सा सपना। हर किसी के बस में नहीं होता घर के सुख आराम को त्याग कर कर देश और देश की जनता के सुख का सपना  देखना। लेकिन सराभा ने सपना देखा-देश को आज़ाद कराने का सपना। सिर्फ सपना ही नहीं देखा बल्कि इसे साकार करने के लिए देश भक्ति की इसी शमा पर हंसते हंसते अपनी जान न्योछावर कर दी। अपने अपने नाम के आगे गांव सराभा का नाम लगाने वाले सभी लोग काश इस भावना और त्याग को भी अपनी ज़िंदगी में उतार सकें। काश कोई तो हो जो उस रास्ते पर फिर चलने का साहस सके और बता सके कि अभी उन शहीदों के सपने अधूरे हैं। अभी बहुत काम बाकी हैं। अभी रात बाकी है। 
यूं तो आज भी सिंह सराभा का शहीदी दिन बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। बहुत ज़ोर शोर से आयोजन होते हैं। ये आयोजन सरकारी भी होते हैं और गैर सरकारी भी। इन सभी आयोजनों में देश के ठेकेदार बन बैठे सियासतदानों से कोई नहीं पूछता कि आख़िर आप देश पर कुर्बान होने वाले शहीदों को शहीद का दर्जा क्यूं नहीं देते? क्यों बेचते हो उनका नाम और उनकी शहादत? क्यों करते हो उनके नाम पर आडम्बर? अफ़सोस कि वाम दलों ने शहीदों को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए उन दिनों में भी कुछ नहीं किया जब दिल्ली में वाम की तूती बोलती थी और कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत किंग मेकर गिने जाते थे। परिणाम यह हुआ कि शहीदों का नाम एक आडंबर बन कर रह गया। वे लावारिस से हो गए। कोई भी उनके नाम पर कुछ भी करने को स्वतंत्र  महसूस करने लगा। काश शहीदों के नाम का दुरपयोग रोकने के उनके वारिस आगे आएं। दुःख की बता है की ऐसा दुरपयोग हर बार देखने को मिलता है। 
बड़ी हैबोवाल लुधियाना के एक सरकारी स्कूल में तो हद ही हो गयी जब सराभा के नाम पर स्कूलों बच्चों से हुस्न इश्क के गीत संगीत प्रस्तुत कराए गए जिनका देश भक्ति से कोई लेना देना ही नहीं था।  व्यापारी और साम्प्रदायिक सियासतदान इन आयोजनों के मुख्य मेहमान बने होते हैं। इसका मुद्दा कामरेड एम एस भाटिया ने सीपीआई के उस सेमिनार में भी उठाया जो सराभा की याद में आयोजित हुआ।
सीपीआई के पार्टी कार्यालय में हुए इस कार्यक्रम जहां करतार सिंह सराभा को याद किया गया वहीं देश में तेज़ी से बढ़ रहे साप्रदायिक ज़हर वाले माहौल पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जिला इकाई ने आज पार्टी आफिस में शहीद करतार सिंह सराभा का शहीदी दिवस मनाया। इस मौके पर जहां गदर लहर और अन्य शहीदों की चर्चा की गई वहीं अंग्रेज़ सरकार से कई कई बार क्षमा याचना करके रिहा होने वाले लोगों की भी चर्चा हुई। इस मौके पर वीर सावरकर और संघ परिवार को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया। इस श्रद्धांजलि सभा में जिला सचिव डी पी मौड़ के साथ साथ डॉक्टर अरुण मित्रा, रणजीत सिंह, केवल सिंह बनवैत, गुरनाम सिंह सिद्धू, गुलज़ार गोरिया और कई अन्य स्थानीय नेता भी शामिल हुए।
                       --(पंजाब स्क्रीन टीम में  इस कवरेज पर थे-कार्तिका सिंह//एम एस भाटिया//रेक्टर कथूरिया)

Tuesday, September 10, 2019

सोशल थिंकर्स फोरम ने कराया सोसायटी को दो विद्धानों से रूबरू


संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहती है भाजपा सरकार

लुधियाना: 10 सितंबर 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
मार्क्सवादी चिंतक,लेखक व CPI 
की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य 
अनिल राजिमवाले
जानीमानी खोजी पत्रकार और इतिहास
लेखिका सुश्री कृष्णा झा की बहुचर्चित
पुस्तक का कवर  
लुधियाना के बौद्धिक क्षेत्रों में एक नया रंग देखने को मिला। सियासी लोगों की भीड़ में एक ऐसा आयोजन सामने आया जिसमें चर्चा तो राजनीती पर भी हुई लेकिन चर्चा करने वाले दो विद्धान बौद्धिक क्षेत्रों में अलग सी पहचान रखते हैं। एक तो थीं सुश्री कृष्ण झा जिन्होंने अयोध्या विवाद पर बहुत ही चर्चित पुस्तक लिखी थी। दुसरे थे जानेमाने विद्धान अनिल राजिमवाले जिन्होंने जन संघर्षों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इन लोगों ने आशंका जताई कि देश को एक ही रंग में रंगने का जनून बहुत बड़ी गड़बड़ी खड़ी कर देगा। इन्होने साफ़ कहा कि सत्ता पर मौजूद भारतीय जनता पार्टी देश की सभी विभिन्नताओं को समाप्त करने की ताक में है। अलग अलग इलाकों और अलग अलग समुदायों के रीतिरिवाजों के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। 

इन लोगों ने कहा कि आर एस एस की शह और सरपरस्ती प्राप्त भाजपा सरकार लोकतंत्र की नृशंस हत्या करके देश भर में एक जैसी संस्कृति लागू करने पर तुली हुई है। यह बात यहाँ सोशल थिंकर्स फोरम की तरफ से कराई गयी एक विचार गोष्ठी में जानीमानी ऐतिहासकार और समाज सेविका सुश्री कृष्णा झा ने कही।  
उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र का आधार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रखा गया था जिसमें सभी वर्गों, धर्मों और जातियों के लोगों ने हिस्सा लिया।  इसके परिणाम स्वरूप धर्म निरपेक्ष, न्याय, और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना  का संकल्प लिया गया।   देश का संविधान भी इन्हीं आधारों पर ही बनाया गया था और राज्यों को अनेक मामलों में अधिक अधिकार भी दिए।  दबे और कुचले हुए दलित लोगों को भी बहुत सी सुविधाएँ दी गयीं। लेकिन जनसंघ, आर एस एस और इसके सहयोगी संगठनों ने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया बल्कि तिरंगे का अपमान किया, भारत छोड़ो आंदोलन और नमक सत्याग्रह का केवल विरोध ही नहीं किया बल्कि अंग्रेज़ों का साथ भी दिया। इसी वजह से उनके लिए भारतीय संविधान का कोई महत्व नहीं है। यह सरकार और इसके सहयोगी संगठन संविधान की सभी मूल भावनाओं को बदल कर देश में एक जैसी संस्कृति लागू करना चाहते हैं। इस मकसद के लिए यह लोग देश और विदेश के कार्पोटेस्ट के साथ मिल कर देश के आम लोगों का बुरा हाल कर रहे हैं। सरकारी अत्याचार के खिलाफ उठ रहे जन आंदोलनों को दबाने के लिए यूएपीए जैसे कानून लाये जा रहे हैं।  श्रम सुधारों के नाम पर मज़दूर विरोधी और कारपोरेट समर्थक तब्दीलियां की जा रही हैं।शिक्षा और स्वास्थ्य नीति में परिवर्तन करके कम वेतन वाले लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा  जैसे मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्य वर्गों के मुकाबले में दलितों की तरफ से दी जाने वाली फीसें तीन गुना बढ़ा दी गयी हैं। उच्च शिक्षा के लिए दी जानेवाली ग्रांट को 602 करोड़ रूपये से कम कर के 283 करोड़ रूपये कर दिया गया है।  किसानों का तो और भी बुरा हाल है। इसीलिए आत्महत्यायों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। आज माध्यम वर्ग भी दबाव में है। इन सब से  ध्यान हटाने के लिए हिन्दू मुस्लिम फसाद  कराये जा रहे हैं और जंग की बातें की जा रही हैं। ग्रह मंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दुओं को तो बसाया जा रहा है लेकिन मुस्लिमों को नज़रबंदी की स्थिति में रखा जायेगा।   इकलौते मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर में 370 इसी इरादे से हटाई गयी है। अमित शाह ने साफ़ शब्दों में कहा है कि अन्य राज्यों में 371 को छेड़ा भी नहीं जायेगा। यह खुलमखुल्ला साम्प्रदायिक पक्षपात का रवैया है। कश्मीर में 80 लाख लोगों के अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं।  सभी लोकतान्त्रिक संस्थानों की स्वायत्ता समाप्त की जा रही है। सेना का उपयोग राजनैतिक मकसदों के लिए किया जा रहा है।  सैनिक अधिकारीयों से राजनैतिक ब्यान दिलाये जा रहे हैं।इस अवसर जानमाने विद्धान अनिल रजिमवाले ने कहा की इस नाज़ुक घड़ी में सभी प्रगतिशील शक्तियों को एकजुट हो कर इन फासीवादी शक्तियों का मुकाबिला करना होगा वरना देश का भविष्य धुंदला है। इस मौके पर डाक्टर अरुण मित्रा, एम् इस भाटिया, चरण सराभा, एडवोकेट हरिओम जिंदल, शुभदीप कौर, डाक्टर जसविंदर सिंह ने भी बहस में हिस्सा लिया। युवा और छात्र नेता डाक्टर तानिया, डाक्टर विनोद वर्मा, दीपक कुमार, राजीव कुमार, सौरव कुमार, प्रदीप कुमार और ललित कुमार ने अपने विचार व्यक्त किये।

Sunday, January 14, 2018

जनविरोधी बैंकिंग सुधारों को वापस लेने की मांग


सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के कर्मचारी यूनियन संघ के हस्ताक्षर अभियान कैंप
लुधियाना: 14 जनवरी 2018: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया एम्प्लॉइज यूनियन (नॉर्थ जोन) और सेंट्रल बैंक आफिसर्स यूनियन (चंडीगढ़ जोन) ने संयुक्त रूप से ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज एसोसिएशन (एआईबीईए) द्वारा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के बाहर अभियान के निजाम रोड, लुधियाना में विशेष हस्ताक्षर शिविर का आयोजन किया। उल्लेखनीय है कि यह अभियान बैंकों के तथाकथित सुधारों के खिलाफ शुरू किया गया है, जिससे आम लोगों को बहुत परेशान किया जा सकता है। इस अभियान के तहत, जनता को बैंकों के निजीकरण के बारे में व्याख्या की। यह अभियान 20 जनवरी तक जारी रहेगा। इस अभियान के तहत पंजाब से पांच लाख हस्ताक्षर और पूरे देश में से एक करोड़ हस्ताक्षर  प्राप्त किए जाएंगे और लोकसभा के अध्यक्ष के लिए जन याचिका पेश की जाएगी। बैंकों के साथ जुड़े ग्राहकों, आम लोग इस अभियान का समर्थन कर रहे हैं। शिविर के दौरान एक हजार लोगों ने याचिका पर हस्ताक्षर किए।

लुधियाना में अभियान का नेतृत्व करने वाले नेताओं में कॉमरेड राजेश वर्मा, महासचिव, कॉमरेड एमएस भाटिया - क्षेत्रीय सचिव सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया कर्मचारी संघ (उत्तर क्षेत्र), कॉमरेड गुरुमीत सिंह - उप-महासचिव और कॉमरेड सुनील ग्रोवर क्षेत्रीय सचिव - सेंट्रल बैंक संघ (चंडीगढ़ जोन) शामिल हैं।  लुधियाना की सभी शाखाओं के सदस्यों ने शिविर में भाग लिया। इस शिविर के दौरान, जनता ने बैंकिंग सुधारों के बारे में कई सवाल पूछे, जिनके जवाब आयोजकों द्वारा दिए गए थे।

इस याचिका में एफआरडीआई विधेयक को वापस लेने की मांग शामिल है, जो आम जनता को डराता है। साथ ही, बकाएदारों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की गई, जो बड़े ऋण ले रहे थे और सार्वजनिक पैसा लूट रहे थे। यह मांग की गई थी कि इस तरह के ऋण बकाएदारों का बोझ आम लोगों पर अलग-अलग सर्विस चार्जों को बढ़ाकर नहीं लगाया जाना चाहिए। यह भी मांग की गई थी कि नियमित बैंकिंग सेवाओं को निजी ठेकेदारों को नहीं दिया
जाना चाहिए। इसी प्रकार, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को निजी क्षेत्रों को सौंपने का विरोध किया गया। बैंक में जमा पैसे पर ब्याज की दर बढ़ाई जानी चाहिए और इस ब्याज पर  आयकर से छूट दी जानी चाहिए। रोजगार निर्माण परियोजनाओं और कृषि क्षेत्र के लिए अधिक ऋण दिया जाना चाहिए।

Sunday, October 23, 2016

कन्हैया ने दी जाह्नवी को शुभकामनाएं और विरोध करने वालों को धन्यवाद

पंजाब का वाम छात्र आंदोलन अब फिर छू  सकता है नई शिखरें 
लुधियाना: 23 अक्टूबर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कन्हैया कुमार को खुली बहस की चुनौती देने वाली जाह्नवी को कन्हैया कुमार ने शुभ कामनाएं दी हैं। इसके साथ ही उन्होंने विरोध करने वाले वकीलों को भी धन्यवाद किया और कहा कि यह सांस्कृतिक लोग हैं और कानून के दायरे में रहते हुए अपने अधिकार का प्रयोग क्र रहे हैं। यहाँ मीडिया से एक भेंट वार्ता के दौरान उस छात्रा  के सलाह भी दी कि अगर उसे डिबेट करनी है तो इस देश के नेतायों से डिबेट करनी चाहिए, इस देश के राष्ट्र अध्यक्षों से डिबेट करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि डिबेट के लिए डिबेट अच्छी बात है लेकिन अगर यह राजनीतिक स्टंटबाजी हो तो गलत है। गौरतलब है कि यह छात्रा कई  बार कन्हैया को खुली बहस की चुनौती दे चुकी है। 
अब जबकि देश पर बहुत सी स्वदेशी और विदेशी ईस्ट इंडिया कम्पनियां जोर पकड़ रही है उस समय कन्हैया कुमार का यह कहना कि  ले के रहेंगे आज़ादी एक ऐसा नारा बन के उभरा है जिसके साथ हाल के अधिकतर युवा साथ साथ गाने लगे थे ले के रहेंगे आज़ादी। जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्य्क्ष कन्हैया कुमार ने यहां एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार देश में शिक्षा का निजीकरण करने पर तुली हुई है। इसी कारण वह सरकारी शिक्षण संस्थानों को नुकसान पहुंचा रही है। इससे पहले कन्हैया के यहां पहुंचने पर उनका विरोध किया गया। वकीलों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन किया अौर उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने से रोकने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उनको हटा दिया। कन्हैया की एक झलक पाने को लोग यहाँ बेकरार थे। कन्हैया एक क्रांति का प्रतीक बन कर यहाँ पहुंचे। 
यहां पंजाब साहित्य अकादमी परिसर में 'शिक्षा और रोजगार' विषय पर आयोजित सेमीनार में कन्हैया कुमार ने मोदी सरकार की शिक्षा नीति पर तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश के सरकारी व पब्लिक सेक्टर के शिक्षण संस्थानों का निजीकरण करने की साजिश की जा रही है। यह देश के लिए खतरनाक है और शिक्षा का व्यावसायिक करण का प्रयास है। उन्होंने विमान से 2500  सेरुपयों में सफर की बात उठाते हुए भी कहा कि जो गरीब लोग 25 रुपयों में रेल से सफर करते हैं उनके लिए मोदी जी के पास क्या योजना है? अच्छे दिनों की चर्चा करते हुए कन्हैया ने कहा कि मोदी जी का मित्र 30 रूपये किलो दाल खरीद कर महंगे भाव बेच दे क्या यही हैं अच्छे दिन?
छात्र-छात्राओं के बीच आये कन्हैया कुमार की मौजूदगी एक जादू की तरह असर कर रही थी। उनके साथ सेल्फी लेने वालों की एक होड़ लगी थी। पंजाब में आतंकवाद से संघर्ष के दौरान दम तोड़ चुकी वाम छात्र लहर में एक नया जोश नज़र आया। मुद्दत के बाद भाकपा समर्थक छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंटस फेडरेशन (ए आई एस एफ) के झंडे पंजाब में नज़र आए। कन्हैया के लुधियाना आने से इस ऐतिहासिक संगठन की मौजूदगी का अहसास तीव्रता से सामने आया है जो इस चुनावी मौसम में वाम विरोधियों के लिए खतरे की घण्टी है। करीब एक वर्ष के अंदर अंदर तैयार किया गया यह छात्र केडर पूरी तरह से अनुशासित और सक्रिय। इसकी सक्रियता उन लोगों को कड़ा जवाब है जो मीडिया के सामने भी यह कहते नहीं थकते कि कमरेडटॉ अब खत्म हो चुके हैं।
सेमिनार में लोगों की संख्या किसी रैली की तरह थी। मौजूदगी रजिस्टर पर हस्ताक्षर कराये जा रहे थे। एक नज़र देखा तो संख्या 700 के करीब थी। हाल के अंदर भी भीड़ थी और बाहर भी। शायद पहली बार इस हाल को कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा भरा देखा।  
सेमिनार में कन्हैया कुमार ने कहा कि मोदी सरकार युवाओं को रोज़गार देने में अक्षम रही है। नरेंद्र मोदी ने इस बारे मे बढ़चढ़ कर बातें की थीं और दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन 1.35 लाख लोगों को ही रोजगार मिले हैं। सरकार युवाआें और जनता को भ्रमित करने में ही लगी रहती है।
कन्हैया ने कहा कि मोदी सरकार का मुख्य उद्देश्य शिक्षा से पैसा कमाना है, न कि लोगों को शिक्षित करना। यह हालत घातक है और गरीब युवाओं के साथ अन्याया है। कन्हैया ने कहा कि देश में भगत सिंह को पिस्तौल और बम चलाने वाले के रूप में प्रदर्शित किया गया है, जबकि वह एक विचारक थे। लेकिन उनके इस पहलू को नहीं उभारा गया। कन्हैया कुमार ने सामंतवाद और पूंजीवाद से आज़ादी पर जोर दिया। उन्होेंने इसके लिए लाेगों खासकर युवाओं और बुद्धिजीवियों से आगे आने की अपील की।
सेमीनार का आयोजन पंजाबी साहित्य अकादमी में सोशल थिंकर फोरम के सहयोग से किया गया। इससे पहले वकीलों ने कन्हैया का पुतला फूंका ओर उनको कार्यक्रम में शामिल नहीं होने देने का एलान किया। पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे वकीलों को गिरफ्तार कर लिया।
इसी बीच पंजाबी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉक्टर सुखदे सिंह सिरसा, महासचिव सुरजीत सिंह और मुख्य वक्ता प्रिंसिपल तरसेम बाहिया ने कहा कि साहित्य अकादमी कीतरफ से इस आयोजन का प्रयास बहुत आवश्यक था क्योंकि पंजाब के शैक्षणिक, बौद्धिक और नैतिक क्षेत्रों में गरावट आ रही थी। उन्होंने स्पष्ट किया की पंजाबी भवन में पहले भी इस तरह के आवश्यक जन मुद्दों पर आयोजन होते रहे हैं। 

Tuesday, October 04, 2016

Indore:इप्टा के राष्ट्रिय अधिवेशन स्थल पर आर एस एस का हमला

जवाब में इप्टा सदस्यों ने लगाए इन्क़लाब ज़िंदाबाद के नारे 
इंदौर/लुधियाना: 4 अक्टूबर 2016: (प्रदीप शर्मा//पंजाब स्क्रीन): 
इंदौर में "इप्टा" के राष्ट्रीय सम्मेलन में उस समय अफरातफरी मच गयी जब आर एस एस और उनके सहयोगी संगठनों ने कार्यक्रम को रुकवाने के लिए अचानक वहां पर हमला कर दिया। बाहर से अचानक अंदर घुसे इन लोगों ने मंच पर कब्ज़ा कर लिया और कहा कि हम कन्हैया के समर्थकों का कर्यक्रम नहीं चलने देंगें। जब तक यह खत्म नहीं होता तब तक हम यहीं रुकेंगे। इसके साथ ही भारत माता ज़िंदाबाद के नारे तेज़ क्र दिए गए और धक्का मुक्की शुरू कर दी गयी। ये लोग भारत माता ज़िंदाबाद के नारे गया रहे थे। इन के साथ कुछ इक्का दुक्का सरदार भी थे जो इनकी अगवानी करने वालों थे।  ये लोग जबरदस्ती अंदर घुस कर मंच पर चढ़ गए और मंच पर कब्ज़ा कर लिया। इस सम्मेलन में कुछ महिलाएं भी अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ मौजूद थी। इसमें कुछ बेहद्द वृद्ध कलाकार भी आये हुए हैं। गौरतलब है कि पंजाब और चंडीगढ़ से कम से कम 31 कलाकार इसमें भाग लेने के लिए गए हुए हैं। 
हमले के जवाब में इप्टा सदस्यों ने इन्क़लाब ज़िंदाबाद के नारे लगाए और ज़्यादा खरमस्ती पर उतारू संघ कार्यकर्तायों को हाथों से भी अच्छा सबक सिखाया। यह सब कुछ करीब पौने चार बजे शाम को शुरू हुआ। संघ के हमलावर लाठियों से भी लैस थे। तिरंगे झंडे भी कुछ लोगों ने  पकड़ रखे थे लेकिन अंदाज़ पूरा गुंडागरी का था। इप्टा के लोगों ने पहले तो समझाया लेकिन नहीं मने तो फिर हाथ भी दिखाए। यह हमला और मंच पर  कब्ज़ा करीब 20-25 मिनट तक रहा। इस हमले के बावजूद वहां पुलिस या कोई अन्य दल सुरक्षा के लिए नहीं आया। अगर इप्टा के लोग जवाब में सख्त रुख इख़्तियार नहीं करते तो  ये लोग सफदर हाश्मी जैसी वारदात दोहरा चुके होते। हफरदफरी समाप्त होने के बाद अगली रणनीति पर विचार विमर्श हुआ क्योंकि जाते जाते ये संघी लोग दोबारा आने को भी कह गए हैं। इप्टा के राष्ट्रिय अधिवेशन का आज आखिरी दिन है जो रात को समाप्त होगा। आज शाम पांच बजे कर 10 मिनट पर कार्यक्रम दोबारा शुरू हो गया। 
हमले की खबर आने के साथ ही हर तरफ निंदा की लहर दौड़ गयी और गुस्सा फ़ैल गया।  लुधियाना इप्टा के अध्यक्ष डॉक्टर अरुण मित्र, उपाध्यक्ष डॉक्टर गुलज़ार पंधेर और सचिव मनिंदर सिंह भाटिया ने एक संयुक्त बयान में इस हमले की सख्त निंदा की। लुधियाना इप्टा ने हमलावरों के खिलाफ केस दर्ज करने की मांग की है। लुधियाना इप्टा ने याद दिलाया कि इप्टा ने बलराज साहनी, कैफ़ी आज़मी और ए के हंगल जैसे देश भक्त कलाकारों को दिया है।  इस फाशी हमले से हम अपने मिशन को नहीं रोकेंगे। हम जन मुद्दों की आवाज़ उठाना बन्द नहीं करेंगे। हम धर्मनिरपेक्षता को तोड़ने के  होने देंगें।  

Friday, July 29, 2016

जनविरोधी बैंकिंग सुधारों का नाश हो--हड़ताली बैंक मुलाज़िमों का श्राप

भारी बारिश भी नहीं रोक पायी बैंक मुलाज़िमों का जोश 
लुधियाना; 29 जुलाई 2016:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो);
यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स के आहवान पर, एक मिलीयन बैंक कर्मचारी एवं अधिकारी आज जनविरोधी बैंकिंग सुधारों के विरुद्ध एक दिवसीय अखिल भारतीय हड़्ताल पर हैं । निर्णय के अनुसार, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स (लुधियाना इकाई) ने केनरा बैक, भारत नगर चौंक, लुधियाना के सामने जोरदार प्रदर्शन किया । कामरेड नरेश गौड़, संचालक, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स, कामरेड पवन ठाकुर, प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई), कामरेड संजय शर्मा, उप प्रधान, आल इण्डिया बैंक आफिसर्स कन्फैडेरेशन, लुधियाना अंचल, कामरेड जे पी कालड़ा, प्रधान, स्टेट बैंक आफ इण्डिया आफिसर्स एसोसिएशन, कामरेड इकवाल सिंह, सहायक महा सचिव, स्टेट बैंक आफ इण्डिया स्टाफ एसोसिएशन, कामरेड डी पी मौड़, महा सचिव, ज्वाईंट काउंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स ने बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों को संबोधित किया । इस अवसर पर कामरेड अशोक मल्हन, कामरेड राजेश वर्मा, उप प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई) एवं कामरेड प्रवीण मोदगिल, संचालक, वूमैन सैल, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन भी उपस्थित रहे ।     

बैंक कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कामरेड नरेश गौड़ ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि सरकार  बैंकिंग सुधार उपायों को एक प्रकार से अथवा दूसरे रुप में आगे बढाना चाहती है । इसके पीछे मौलिक विचार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग को कमजो़र करना तथा छिन्न-भिन्न कर देना है और निजी क्षेत्र की बैंकिंग को बढ़ावा देना है । हम निरन्तर ऐसी योजनाओं से लड़्ते आ रहे हैं । हमने संघन अभियान, आन्दोलन, संघर्ष और हड़ताली कार्यवाहियाँ इस सभी उपायों के विरुद्ध खड़ी की है । हम वास्तविक रुप से गर्व अनुभव कर सकते हैं कि इस सभी लगातार प्रयासों के कारण जिस गति से इन सुधार कार्यक्रमों का प्रस्ताव लागू करने के लिए किया गया था उस पैमाने पर नहीं लागू हो सके । किन्तु हम जानते हैं कि सरकार अपने पंजों के बल अपनी कार्यसूची को किसी भी प्रकार लागू करने के लिए खड़ी है ।
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय के लिए भी घोषणा की है । पहले ही आरबीआई ने काँर्पोरेट एवं औद्दोगिक घरानों को लाईसैंस देने की योजना की घोषणा की है । आरबीआई ने इससे आगे लघु निजी बैंकों और भुगतान बैंकों की स्थापना के लिए भी दिशानिर्देश जारी कर दिये हैं । अत: यह हमारे बैंकिंग क्षेत्र को अधिक से अधिक निजी हाथों में देने का एक ठोस प्रयास है ।  बैंकिंग उद्दोग में हमें पहले ही पता है कि सरकार अपने कथित सुधारों के निरंतर प्रयास आगे बढ़ा रही है, जिसकी कार्य सूची में प्राथमिकता के आधार पर बैंकों का निजीकरण सुदृढ़ीकरण और विलय आदि है । अधिक से अधिक निजी पूंजी और सीधे विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया  जा रहा है । क्षेत्रिय ग्रामीण बैंकों के निजीकरण का प्रयस चल रहा है और इस संदर्भ में हमारी यूनियनों के विरोध के बावजूद संसद में इस संदर्भ में विधेयक पारित कर दिया गया है । प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों में (पीएसी) समेटे जाने के खतरे में है । शहरी साहकारी बैंक लाईसेंस समाप्त किये जाने के खतरे   में हैं। निजी क्षेत्र के कार्यकारियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में थोपा जा रहा है । बिना किसी ढांचागत सुविधा और कर्मचारियों के बढाए सरकारी नीतियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों पर थोपा जा रहा है । बैंक अधिकारियों को काम के नियमित घंटों से वंचित किया जा रहा है । स्थाई और नियमित कार्यों को ठेका आधार पर आउट्सोर्स किया जा रहा है और ठेका कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है । सरकार अपनी कार्य सूची पर आगे बढ़ रही है और श्रम संगठनों से बिना समुचित विचार विमर्श किये बिना श्रम कानूनों को संशोधित करेगी ।      

बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों के नाम पर, बैंकों के निजीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं जिससे कि उन्हें निजी कार्पोरेटों के हाथों सौंपा जा सके जिससे वह जनता की बहुमूल्य बचत को और लूट सकें । बैंकों के एकीकरण का प्रयास, उन्हें बड़ा बनाने और उन्हें वैश्वीकृत करने का है जबकि बैंकों का विस्तार और जन सामान्य तक उनकी पहुंच बढाना अधिक आवशयक था ।  पहले ही हमारे बैंक खराब ऋणों की खतरनाक वृद्धि के कारण लहूलुहान हैं, कार्पोरेटों तथा बड़े व्यवसायियों के जानबूझकर चूक करने के कारण ऐसा है । अपराधियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने और ऋणों की वसूली के स्थान पर, प्रयास किये जा रहे हैं कि उन्हीं चूककर्ताओं को बैंक सौंप दिये जायें । यह बहुत ही स्पष्ट है कि उनके बैंकिंग सुधारों की सभी बातें और विलय तथा एकीकरण के प्रस्ताव केवल एक हथकण्डा और खेल का तरीका है जिससे कि लोगों का ध्यान इस बड़े पैमाने पर बैंकों के खराब ऋणों से हटाया जा सके ।  हमारे देश की आवश्यकता एक सुदृढ़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं न कि अनावशयक रुप से बड़े बैंक जिनका वैशिवक आकार हो । हमारे देश की आवश्यकता बैंकिंग के विस्तार की है न कि बैंकों का एकीकरण और जनता के लिए बैंकिंग सेवाओं का संकोचन की । खराब ऋणों की चिन्ताजनक वृद्धि जो कि लगभग 13 लाख करोड़ तक पहुंच गये हैं पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए । कठोर कदम उठाकर उस धन को वापस लेने के प्रयास किये जाने चाहिए न कि हड़बड़ी में प्रावधानों, बट्टे खाते डालने, सीडीआर तथा एसडीआर के माध्यम से ढकने के ।

यदि ऋण खराब रुप से मंजूर किये गये हैं, सम्बंधित कार्यकारियों पर कार्यवाही की जानी चाहिए । यदि कर्जदारों ने बैंक को छला है, तो चूककर्ता के विरुद्ध फौज़दारी मामला लागू करना चाहिए ।  खराब ऋणों के लिए प्रावधान करना, तुलन पत्र को साफ सुथरा बनाना और बैंकों को फिर घाटा देने लायक बना देना समस्या का समाधान नहीं है । यह स्पष्ट है, ये सभी बड़े खराब ऋणों के लिए जवाबदेही से बचने केलिए केवल बंटाने की रणनीति है । किंगफिशर माल्या हिम्शिला का केवल शिखर है । बैंकों में खराब ऋणों के सागर में बहुत अधिक शार्क हैं । क्यों चूककर्ताओं की सूची उनके द्वारा प्रकाशित नहीं की जा रही है? क्यों आपराधिक कार्यवाही जानबूझकर कार्पोरेट चूककर्ताओं पर नहीं की जा रही है? क्यों उन सभी के साथ मखमली व्यवहार किया जा रहा है? क्यों इन चूककर्ता कम्पनियों में इक्विटी निवेश के रुप में खराब ऋणों को बदलने के प्रयास हैं । क्या यह सरकार की कार्पोरेट शासन प्रणाली तथा सुशासन प्रणाली नीति है? आडीबीआई बैंक में, 10 वर्ष पूर्व, लगभग रुपए 9000  करोड़् के खराब ॠण उनकी किताबों से बाहर कर दिये गये । अब पुन: रुपए 19000 करोड़ के खराब ऋण हैं । इन खराब ऋणों की वसूली की कार्यवाही करने के स्थान पर, सरकार बैंक का निजीकरण कर उन्हीं निजी क्षेत्र के हाथों में बेच देना चाहती है जो कि आईडीबीआई बैंक में इन सारी तादाद चूक के लिए जिम्मेदार हैं।