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Saturday, March 23, 2024

पत्रकार हरबंस सिंह सोढी आज भी सदमे में हैं उसे याद करके

किस पाताल में गिरते जा रहे हैं हम 

मोहाली//चंडीगढ़: 23 मार्च 2024: (मीडिया लिंक//पंजाब स्क्रीन डेस्क)::


"झोले से निकली यादें" एक स्तम्ब जैसा ही है 
जिसे अक्सर जानेमाने पत्रकार हरबंस सोढी लिखते हैं। इस स्तंभ का लिखना और छपना शायद कोई पक्की अवधि या अंतराल नहीं है। लेकिन पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़ का एक बहुत ही लोकप्रिय व्हाटससप ग्रुप है जहां पर जनाब सोढी का यह स्तंभ अक्सर हवा के किसी ताज़ा झौंके की तरह  कई बार सामने आ ही जाता है। हर बार इसमें होती है-नई जानकारी, नई बात और वह भी बिलकुल नए अंदाज़ में। इस बार की पोस्ट में ु होने याद दिलाई है शहीद-ए-भगत सिंह जी की।

वह बताते हैं: पटियाला में रेडियो कोरेस्पोंडेंट था! पत्रकारों की टोली के साथ शहीद भगत सिंह की समाधि हुसैनीवाला पहुँचे! वापसी पर पत्रकारों ने लुधियाना में लंच के साथ ख़ूब बीयर उड़ा कर “शहीदी दिवस “ मनाया! 

मैं बेहद परेशान था!खाना भी नहीं खाया! 

पाकिस्तान में जिस जेल में भगत सिंह ,राजगुरू,सुखदेव को फाँसी दी गई थी, उसे गिरा कर,वहाँ शादमान चौक बना दिया गया है !(ये और बात है कि पाकिस्तान में इन शहीदों का बहुत सम्मान है ।वहाँ उन के पैतृक घर को सहेज कर भी रखा गया है ।)

 ज्ञानी ज़ैल सिंह ने भगत सिंह की माता विदिया वती को पंजाब माता का दर्जा दिया ।

Politiciansकी “कारगुज़ारियों “ से विचलित हो कर पंजाब माता को कहना पड़ा था- मेरे बेटे ने ऐसी आज़ादी के लिए क़ुर्बानी दी थी क्या?

Politicsके बारे कुछ नहीं कहना! …परन्तु विचलित तो मैं भी हूँ! जेल से छूटने के लिये, के बार बार माफ़ी माँगने वाले अब Hero हो गए हैं!

—शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले! आज शहीदों की चिताओं पर लगने वाले मेले औपचारिकता का चोग़ा पहन , सचमुच आम से मेले बन गये है!

पुनश्च ः

 शहीदी दिवस पर पत्रकारों के 🍺 Beer पीने से मैं परेशान हो उठा था ! बाद में मैं भी पत्रकार बन गया!

After all हर “profession”

के कुछ “ETHICS!” तो होते ही हैं न!

हरबंस सोढी जी यह पोस्ट पढ़ कर चिंता होने लगी है। शर्म आने लगी है। शहीद-ए-भगत सिंह को कुछ लोग इस तरह पिकनिक मना कर श्रद्धांजलि देते हैं तो भगवान् जाने हम किस युग को बुलावा दे रहे हैं।  किस समाज का निर्माण कर रहे हैं। हो सकता है ऐसा जश्न अंग्रेज़ों ने शहीदों को फांसी दे कर मनाया भी हो लेकिन हम--हम क्या कर रहे हैं?

जानेमाने लेखक और पत्रकार हरबंस सिंह सोढ़ी ने उठाया है यह मुद्दा बिना किसी का नाम लिए 

शहीदों के शहीदी दिवस पर ऐसा करने वालों को जाने शर्म कब आएगी????

Saturday, September 24, 2022

वेब की लड़ाई भी लड़ेगी शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन

23rd September 2022 at 07:31 PM

नए प्रबंधन में लुधियाना यूनिट के प्रधान बने कवलजीत सिंह 


जालंधर
: 23 सितंबर 2022: (हरप्रीत सिंह इनपुट-पंजाब स्क्रीन डेस्क)::
   

कुछ ही वर्ष पूर्व जब मीडिया में भेदभाव बढ़ने लगा। बड़े या छोटे पत्रकार कह कर एक अलग तरह की जातिपाति बढ़ने लगी उस समय सामने आया एक पत्रकार संगठन जिसका नाम शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के नाम पर रखा गया। बसंती पगड़ी को भी सम्मान से पहना गया तांकि बसंती छोले का संकल्प हर दिल में और मज़बूत बनाया जा सके। यह संगठन हर उस जगह पहुँचने लगा जहां भी किसी पत्रकार को उत्पीड़न का शिकार बनना पड़ा। मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए काम करने वालों में ही कुछ लोग अपने ही पुराने सहयोगियों को नज़रअंदाज़ करने लगे। उन्हें हिकारत की नज़र से देखने लगे। कसूर बताते कि यह तो वेब मीडिया चलाते हैं। इन बड़े लोगों ने कभी उनकी मुश्किलें न पूछीं बल्कि उन्हें अछूत की तरफ बताने के कुत्सित प्रयास किए। बड़े बड़े वेतनमान लेने वाले इन बड़े पत्रकारों ने अपने ही भाईचारे के ऑनलाइन पत्रकारों को कमज़ोर करने के नापाक प्रयास किए। फिर सियासत में तब्दीलियां आने लगी तो बड़े मीडिया को देश की जनता गोदी मीडिया कह कर बुलाने लगी। जनता के हितों से जुड़ीं हर खबर हर बड़े चैनल और कई बार बड़े अख़बारों से भी गायब हो जाती। आम जनता के एक बड़े हिस्से ने टीवी देखना ही बंद कर दिया। अख़बारों की बिक्री भी कम होने लगी। तो  ही बदल दिया। उस नाज़ुक दौर में जान किसान दिल्ली के बार्डर पर आंदोलन कर रहे थे उस समय इसी वेब मीडिया ने कमाल का ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। साधारण से संसाधनों वाले वेब मीडिया ने बड़े गोदी मीडिया को पटखनी दे दी। इस दर्द, इस जोश और इस उत्साह को मान्यता देने वालों में से पहल की शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन की टीम ने। 

शहीद भगत सिंह प्रेस एसोसिएशन, पंजाब में पत्रकारों की सुरक्षा और अधिकारों के लिए लड़ने वाला एकमात्र प्रमुख और प्रमुख संगठन है। पंजाब की राष्ट्रीय इकाई और राज्य के सभी जिला पदाधिकारियों की अध्यक्षता में सर्किट हाउस  जालंधर में अध्यक्ष अमरिंदर सिंह और शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की बहन विशेष रूप से पहुंचे।  एसोसिएशन की संरक्षक जसमीत कौर की देखरेख में एक आपात बैठक भी की गई। बैठक में पंजाब के विभिन्न कस्बों और ज़िलों के अध्यक्ष, अध्यक्ष और महासचिवों ने भाग लिया। इस सभा के प्रारंभ में पूर्व की भांति अमर शहीदों को याद कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा कल विदा लेने वाले पत्रकार एवं परिवार के सदस्यों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।

बैठक में पत्रकारों के अधिकारों को लेकर कई अहम प्रस्ताव पारित किए गए। वेब चैनल के पत्रकारों को विशेष रूप से जालंधर में पत्रकारों का दर्जा देने के संबंध में कुछ पत्रकारों ने पुलिस की मिलीभगत से अपने ही साथियों को फर्जी पत्रकार बताकर केस दर्ज कराने वालों को परेशान करने की रणनीति पर विचार किया।  कुछ अन्य राज्यों में भी सभी पत्रकारों पर बने झूठे पर्चे को रद्द करने के संबंध में प्रस्ताव पारित किया गया। 

इस अवसर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरिंदर सिंह ने पंजाब के सभी जिलों की उपस्थिति में नैतिक कारणों के आधार पर राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपना इस्तीफा पंजाब के अध्यक्ष गोरा संधू को सौंपा। विचार के बाद इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया। उन्हें संघ के दरवाजे की तरह अपने पास रखने को कहा गया और उनका आश्वासन दिया गया। इस अवसर पर पंजाब उप प्रधान हरप्रीत सिंह मक्कड़, चैयरमैन जसविंदर सिंह चावला, प्रधान कवलजीत सिंह, सुनील जैन, अमरजीत सिंह और पंजाब के सभी जिलों के पद अधिकारी पहुंचे। 

अगर आप भी लिखते हैं तो आप भी कलम के सिपाही हैं। हम सभी कलमकार एक युद्ध  लड़ रहे हैं। इसे जीतने के लिए आइए एकजुट हो जाएं। हमें हर हाल में यह है। संमाज का  इंसान केवल हमसे ही उम्मीद लगाए बैठा है। शहीद भगत सिंह के सपनों का भारत तभी बन पाएगा। 

समाजिक चेतना और जन सरोकारों से जुड़े हुए ब्लॉग मीडिया को जारी रखने में निरंतर सहयोगी बनते रहिए। नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आप सहजता से ही ऐसा कर सकते हैं। 

Friday, September 09, 2016

इस बार पीएयू ने बल्लोवाल सौंखड़ी से दी किसान मेलों की दस्तक

यहां महसूस होता है जल, जंगल और ज़मीन का महत्व  
बल्लोवाल सौंखड़ी से लौट कर रेक्टर कथूरिया 09 सितम्बर 2016:
बल्लोवाल सौंखड़ी यूं तो नवांशहर में है लेकिन यहाँ पहुँचने के लिए काफी आगे जाना पड़ता है। प्राकृतिक सौंदर्य से परिचय कराता यह गाँव बलाचौर से भी काफी आगे जा कर है। यहाँ पहुँच कर महसूस होता है कि माल्स की बड़ी बड़ी इमारतों के मुँह में जा रहे जल, जंगल और ज़मीन की अहमियत क्या होती है। लुप्त हो रहे इस सौंदर्य को बचने के लिए क्या क्या करना आवश्यक है यह प्रश्न निश्चय ही मन में उठने लगता है। प्रकृति से दूर होते जा रहे इंसान को कृषि के ज़रिये फिर प्रकृति के नज़दीक लाना कितना आवश्यक है। प्रसन्नता की बात है कि पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी इस काम को बहुत ही कुशलता से कर रही है। इसकी झलक देखने को मिली यहाँ आयोजित किसान मेले में।
बल्लोवाल सौंखड़ी, नवांशहर पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी में आयोजित होने वाले किसान मेलों में पहला क्षेत्रीय किसान मेला शुक्रवार को क्षेत्रीय खोज केंद्र, बल्लोवाल सौखड़ी, जिला शहीद भगत सिंह नगर में लगाया गया। मेले का उद्घाटन पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक बोर्ड के मैंबर डा. सतबीर सिंह गोसल ने किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. बलदेव सिंह ढिल्लों, उप कुलपति, पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी ने की। इस मौके पर शहीद भगत सिंह नगर के एडीशनल डिप्टी कमिश्नर परमजीत सिंह विशेष मेहमान के तौर पर शामिल हुए। कार्यक्रम में जिले के मुख्य कृषि अफसर डा. जसवंत सिंह भी उपस्थित थे।

इस मौके पर डा. गोसल ने कहा कि यह मेले ज्ञान विज्ञान के मेले होते हैं। हमें इनसे अधिक से अधिक लाभ लेना चाहिए। इस के साथ हम अपनी खेती को तकनीकी दिशा प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में बागवानी, दवा और जड़ी -बूटी के पौधों की खेती को और उत्साहित किया जा सकता है। किसानों को सब्जियां भी उगानी चाहिए, जिससे वे घर की रसोई के लिए पौष्टिक खुराक प्राप्त कर सकते हैं। किसानों को अनावश्यक खर्च न करने की अपील करते हुए खेती को और लाभपरक बनाने की अपील भी उन्होंने की। उन्हीने इस जगह प्राकृतिक महत्व को भी विस्तार से बताया और लोगों से कहा कि यहाँ के पावन जल, शुद्ध हवा और महत्वपूर्ण तत्वों से भरी इस भूमि का फायदा उठाएं।  उन्हने वो सब चीज़ें गिनवाईं जिन्हें ऊगा कर किसान अपनी आर्थिकता सुधार सकते हैं।
अध्यक्षीय भाषण में डा. बलदेव सिंह ढिल्लों, वाइस चांसलर, पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी ने कहा कि खादों का प्रयोग मिटटी और पत्ता परख आधार पर करने के से खादों की बचत होती है और झाड़ में भी वृद्धि होती है। डा. ढिल्लों ने कहा कि यूनिवर्सिटी अपनी खेती खोजों और नई तकनीकें को किसानों तक पहुंचाने के लिए कई तरीके इस्तेमाल करती है, उन में से किसान मेले किसानों तक पहुँच बनाने का सब से सफल ढंग है। यूनिवर्सिटी की तरफ से लगाए जाते यह किसान मेले सिर्फ किसानों को नयी तकनीकें तो बताते ही हैं, साथ ही वैज्ञानिकों को किसानों की मुश्किलों बारे भी जानकारी होती है और वे खेती खोज को नई दिशा प्रदान करने में भी अहम हिस्सा डालते हैं। उन्होंने नरमा कपास पट्टी में सफेद मक्खी के हमले को काबू करने के लिए सभी से मिले सहयोग के लिए बधाई दी। डा. ढिल्लों ने किसानों का इस लिए भी धन्यवाद किया कि उन के साथ मिल कर ही हम पानी के गिरते स्तर को काबू करने में, रासायनिक खादों का प्रयोग कम करने में सफल हुए हूँ। उन्होंने गुरु सेवा संस्था के बच्चों की तरफ से पेश किए नाटक की भरपूर प्रशंसा की और ऐसे साधनों को खेती प्रसार शिक्षा का हिस्सा भी बनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम में एडीसी (विकास) परमजीत सिंह ने यूनिवर्सिटी की तरफ से इस पिछड़े क्षेत्र में किए जा रहे अनुसंधानों की प्रंशसा की। इसके साथ ही उन्हने सवाल भी किया कि पड़ोसी राज्य राजस्थान की हालत भी कोई ज़्यादा अच्छी नहीं लेकिन वहां से कभी आत्महत्या की खबर नहीं आई। उन्होंने संकेतों ही संकेतों में बहुत कुछ कहा जिसे समझना बेहद ज़रूरी है क्योंकि इसे समझ कर ही हालत सुधर सकती है। उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि तेज़ी से बढ़ रहा मोबाईल का चाव घरों के धन को बर्बाद कर रहा है। परिवार के हर सदस्य ने पांच पांच मोबाईल रखे हुए हैं जिनकी ज़रूरत नहीं होती। हर मोबाईल पर कम से कम पांच सौ रूपये महीना खर्च भी आता है। सब्ज़ी मौल लेनी पद्धति है, दूध भी खरीदना पड़ता है, पढ़ाई पहले ही महंगी है इस हालात में गरीबी नहीं बढ़ेगी तो क्या होगा? उन्होंने इस बात पर कटाक्ष भी किया कि हमारे गाँवों की पंचायतें हमारे फ़ंडज़ का आयद उठाने के लिए गलियां नालियां पक्की करने की मांग से ऊपर ही नहीं उठती। उन्होंने विकास के कामों में बढ़ रही सियासत की सोच पर चिंता ज़ाहिर की। उन्होंने बहुत ही कम शब्दों में नशे से खोखले हो रहे जिस्मों को बचने और खुशहाली के पथ पर आगे बढ़ने का आह्वान भी किया। गौरतलब है कि एडीसी (विकास) परमजीत सिंह का पीएयू के साथ बहुत ही पुराना और भावुक रिश्ता भी है। उन्होंने यहीं से शिक्षा भी ली। जब वह अपनी बातें कह कर अपनी सीट पर लौटने लगे तो मंच पर मौजूद सभी वीआईपीज ने उनका अभिवादन किया। 
पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी के निदेशक खोज, डा. आरके गुम्बर ने यूनिवर्सिटी की खोज गतिविधियों के साथ जान-पहचान करवाते हुए कहा कि इस बार गेंहू की नई किस्मों पीबीडब्ल्यू 725 और 677 किसान वीरों के लिए सिफारिश की हैं, जो झाड़ देने साथ-साथ कई बीमारियों का मुकाबला भी करती हैं।

इससे पहले किसानों व अतिथियों का स्वागत करते पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रसार शिक्षा डा. राजिन्दर सिंह सिद्धु ने कहा खेती के साथ जुड़ी समस्याएं लगातार गंभीर हो रहीं है, जिनके प्रति जागरूक होना लाभदायक मी है इस लिए इन मसलों को सही दिशा में यूनिवर्सिटी की सिफारिशों की ओर ध्यान देने की जरूरत है, किसानों को इस मेले में से नए विकसित ज्ञान के लिए खेती साहित्य, शहद और अन्य उपयोगी चीज़ों को भी ले कर जाना चाहिए।
इस अवसर पर संगीतमय सांस्कृतिक कार्यक्रम के ज़रिये जहाँ पंजाब की संस्कृति और टप्पे-बोलियों को याद किया गया वह समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी एक लघु नाटिका के मंचन से कॉमेडी के रंग में बेनकाब किया गया। 

Monday, August 03, 2015

असली नायक कौन? गांधी या शहीद भगत सिंह

सोशल मीडिया पर लगातार जारी है इतिहास को लेकर चर्चा
जब वक़्त चलता है तो समय के चक्र के साथ बहुत कुछ घटित होता है जिसे भूलाने की कोशिशें होती हैं, बदलने के प्रयास होते हैं।  अगर  महान लोग खुद ये चिंता न करें तो उनके चाहने वाले ऐसा करते हैं कि  लोग असली मुद्दे भूल जाएं। कुछ ऐसा ही हुआ हमारे अपने देश के इतिहास में। सोशल मीडिया पर एक रचना पोस्ट हुई है गांधी जी और उनकी भूमिका को लेकर। उनकी "महानताएं" गिनवाती इस रचना को आप खुद ही पढ़ लीजिये। इसे पोस्ट किया है-- Loin (97794 51307) ने इंडिया लाईव 24 टीवी चैनल ग्रुप में आज अर्थात 3 अगस्त को सायं 6:12 पर।

GANDHI JI MAHAN 👎👎👎👎👎😡😡😡😡
 😕 Mahanta no.1 ...
शहीदे आजम भगतसिंह को
फांसी दिए जाने पर अहिंसा
के महान पुजारी गांधी ने कहा था....
😞‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के
बदले अपनी आजादी नहीं
चाहिए।’’ और आगे कहा...

‘‘भगतसिंह की पूजा से देश
को बहुत हानि हुई और हो
रही है । वहीं (फांसी) इसका
परिणाम गुंडागर्दी का पतन है

😒फांसी शीघ्र दे दी जाए
ताकि 30 मार्च से करांची में
होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में
कोई बाधा न आवे ।”

🔥अर्थात् गांधी की परिभाषा
में किसी को फांसी देना हिंसा
नहीं थी ।

😕 Mahanta no.2 ....
इसी प्रकार एक ओर महान्
क्रान्तिकारी जतिनदास को
जब आगरा में अंग्रेजों ने
शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब गांधी को
उनके पार्थिक शरीर पर माला
चढ़ाने को कहा गया तो
उन्होंने साफ इनकार कर दिया

😓अर्थात् उस नौजवान द्वारा
खुद को देश के लिए कुर्बान
करने पर भी गांधी के दिल में किसी प्रकार की दया और
सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे
हमारे अहिंसावादी गांधी ।

😕 Mahanta no.3 ...
जब सन् 1937 में कांग्रेस
अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा
मनोनीत सीतारमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने
कहा...

😙यदि रमैया चुनाव हार गया
तो वे राजनीति छोड़ देंगे
लेकिन उन्होंने अपने मरने
तक राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए
थे।

😕 Mahanta no.4 ....
इसी प्रकार गांधी ने कहा था,
“पाकिस्तान उनकी लाश पर
बनेगा” लेकिन पाकिस्तान
उनके समर्थन से ही बना ।
ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी ।

😕 Mahanta no.5 ...
इससे भी बढ़कर गांधी और
कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में
अंग्रेजों का समर्थन किया तो
फिर क्या लड़ाई में हिंसा थी
या लड्डू बंट रहे थे ?
पाठक स्वयं बतलाएं ?

😕 Mahanta no.6 ...
गांधी ने अपने जीवन में तीन
आन्दोलन (सत्याग्रह) चलाए
और तीनों को ही बीच में
वापिस ले लिया गया फिर भी
लोग कहते हैं कि आजादी
गांधी ने दिलवाई ।

😕 Mahanta no.7 ....
इससे भी बढ़कर जब देश के
महान सपूत उधमसिंह ने
इंग्लैण्ड में माईकल डायर को
मारा तो गांधी ने उन्हें पागल
कहा इसलिए नीरद चौधरी ने
गांधी को दुनियां का सबसे
बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है

😕 Mahanta no.8 ....
इस आजादी के बारे में इतिहासकार CR मजूमदार
लिखते हैं “भारत की आजादी
का सेहरा गांधी के सिर बांधना
सच्चाई से मजाक होगा ।

😃यह कहना कि सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी। इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन क्रान्तिकारियों का
अपमान है जिन्होंने देश की
आजादी के लिए अपना खून बहाया ।”

😜यदि चरखों से ही आजादी की रक्षा सम्भव होती है तो बार्डर पर टैंकों की जगह चरखे क्यों नहीं रखवा दिए
जाते ...........??

🙏अगर आप सहमत है तो इसकी सच्चाई "शेयर " कर
देश के सामने उजागर करें ।
जय हिन्द
कुछ बातें और:
🙏शहीदे आज़म भगत सिंह को फांसी कि सजा सुनाई
जा चुकी थी , इसके कारण हुतात्मा चंद्रशेखर आज़ाद
काफी परेशान और चिंतित हो गए।

💂भगत सिंह की फांसी को रोकने के लिए आज़ाद ने ब्रिटिश सरकार पर दवाब
बनाने का फैसला लिया इसके
लिए आज़ाद ने गांधी से मिलने का वक्त माँगा लेकिन
गांधी ने कहा कि वो किसी भी
उग्रवादी से नहीं मिल सकते।

😢गांधी जानते थे कि अगर भगतसिंह और आज़ाद जैसे
क्रन्तिकारी और ज्यादा दिन
जीवित रह गए तो वो युवाओं
के हीरो बन जायेंगे। ऐसी स्थिति में गांधी को पूछनेवाला
कोई ना रहता।

🙏हमने आपको कई बार बताया है कि किस तरह गांधी
ने भगत सिंह को मरवाने के
लिए एक दिन पहले फांसी
दिलवाई।

😞खैर हम फिर से आज़ाद
की  व्याख्या पर आते है। गांधी से वक्त ना मिल पाने का बाद आज़ाद ने नेहरू से मिलने का फैसला लिया , 27 फरवरी 1931 के दिन आज़ाद ने नेहरू से मुलाकात की। ठीक
इसी दिन आज़ाद ने नेहरू के सामने भगत सिंह की फांसी
को रोकने कि विनती की।

😢बैठक में आज़ाद ने पूरी
तैयारी के साथ भगत सिंह को
बचाने का सफल प्लान रख दिया। जिसे देखकर नेहरू
हक्का -बक्का रह गया क्यूंकि इस प्लान के तहत भगत सिंह
को आसानी से बचाया जा सकता था।

👉नेहरू ने आज़ाद को मदद देने से साफ़ मना कर दिया इस पर आज़ाद नाराज हो गए और नेहरू से जोरदार बहस हो गई फिर आज़ाद नाराज होकर अपनी साइकिल पर सवार होकर अल्फ्रेड पार्क कि होकर निकल गए।

😢पार्क में कुछ देर बैठने के बाद ही आज़ाद को पोलिस ने
चारो तरफ से घेर लिया। पोलिस पूरी तैयारी के साथ आई थी जेसे उसे मालूम हो कि आज़ाद पार्क में ही मौजूद है।

😛आखरी साँस और आखरी गोली तक वो जाबांज अंग्रेजो के हाथ नहीं लगा ,आज़ाद की
पिस्तौल में जब तक गोलियाँ  बाकि थी तब तक कोई अंग्रेज उनके करीब नहीं आ सका।

🇮🇳आखिरकार आज़ाद जीवन
भरा आज़ाद ही रहा और उस ने आज़ादी में ही वीर गति को प्राप्त किया।

💨अब अक्ल का अँधा भी समझ सकता है कि नेहरु के घर से बहस करके निकल कर
पार्क में 15 मिनट अंदर भारी
पोलिस बल आज़ाद को पकड़ने के लिए बिना नेहरू की गद्दारी के नहीं पहुँचा जा सकता था । 

😳नेहरू ने पोलिस को खबर दी कि आज़ाद इस वक्त पार्क में है और कुछ देर वहीं रुकने वाला है। साथ ही कहा कि
आज़ाद को जिन्दा पकड़ने कि भूल ना करें नहीं तो भगतसिंह की तरफ मामला बढ़ सकता है।

😰लेकिन फिर भी कांग्रेस की सरकार ने नेहरू को किताबो में बच्चो का क्रन्तिकारी चाचा नेहरू बना दिया और आज भी किताबो में आज़ाद को "उग्रवादी" लिखा जाता है। 
😡लेकिन आज सच को सामने लाकर उस जाँबाज को आखरी सलाम देना चाहते हो तो इस पोस्ट को शेयर करके सच्चाई को सभी के सामने लाने में मदद करें!!!

Wednesday, October 08, 2014

एक बार इस राह पे मारना सौ जन्मों के सामान है

देख के वीरों की क़ुरबानी अपना दिल भी डोला-मेरा रंग दे बसंती चोला-
आज ही के दिन दिनांक 7 अक्टूबर 1930 को लाहौर कांड का फैसला सुनाया गया था ।
शहीद - ए - आजम भगत सिंह जी,
शहीद सुखदेव जी,
शहीद राजगुरु जी, 
को सांङर्स की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी ।

और 8 साथियों को
1 - बटुकेश्वर दत्त जी
2 - शिव वर्मा जी
3 - जय देव कपूर जी
4 - विजय कुमार सिन्हा जी
5 - शहीद महावीर सिंह जी
6 - गयाप्रसाद जी
7 - किशोरी लाल जी
8 - कवलनाथ तिवारी जी

को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

कुंदनलाल जी को 7 साल का कारावास की सजा
सुनाई गई थी ।

और...

प्रेम दत्त जी को 5 साल का कारावास की सजा सुनाई गई थी ।

बाकी तीन साथियों को सरकारी गवाह बनने पर सजा से मुक्त कर दिया गया था ।

जितेंद्रनाथ सान्याल
अजय घोष
देश राज
 — 

  • Kranti Kumar Katiyar J.n.sanyal,ajoy ghosh,deshraj ko koi sabut na milne par riha kiya gaya.ye teeno sarkari gawah nahi the. Please correct it......@ i am son of dr.gaya prasad ( transporation for life) . Thanks.
    10 hrs · Edited · Like · 4
  • Jagmohan Singh Here are the young revolutionaries who challanged the British imperialism and shaked it to its roots. They were sentenced for waging war against british king.
    10 hrs · Unlike · 4
  • Arpan Sanyal Yes i too agreed with Kranti Kumar Katiyar ji.. plz update the information Admin

Monday, March 25, 2013

.........ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी

भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक ?
From: Harpreet Singh ਹਰਪ੍ਰੀਤ ਸਿੰਘ
मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह
को फांसी के तख्ते पर ले जाने
वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू
की गवाही थी ।
यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर
मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने
पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें
ब्रिटेन के विनाश के बदले
अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा,
‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और
हो रही है । वहीं इसका परिणाम
गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए
ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस
अधिवेशन में कोई बाधा न आवे । ” अर्थात्
गांधी की परिभाषा में
किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।
इसी प्रकार एक ओर महान्
क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में
अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे
और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर
माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार
कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश
के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में
किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी,
ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी ।
जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए
नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत
सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने
कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे
राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक
राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए
थे। इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान
उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके
समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी ।
इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध
में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में
हिंसा थी या लड्डू बंट रहे थे ? पाठक स्वयं
बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन
(सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में
वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं
कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।
इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने
इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने
उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने
गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल
पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे में
इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत
की आजादी का सेहरा गांधी के सिर
बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने
सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत
बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए
गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन
सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश
की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।”
जो मित्र सहमत हों वो कृपया लाइक और शेयर
अवश्य करें और जो मित्र सहमत
ना हो वो कृपया टिप्पणी करने का कष्ट ना करें ।
धन्यवाद
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