01-फरवरी-2013 15:23 IST
आज इस सेवा बल के पास 77 पोत और 56 विमान
रक्षा पर विशेष लेख *हामिद हुसैन
भारतीय तटरक्षक 01 फरवरी, 2013 को अपनी 36वीं वर्षगांठ मना रहा है। अपनी स्थापना के बाद से यह सेवा एक बहुआयामी और एक उत्साहपूर्ण बल के रूप में यह उभरी है जो बहु-भूमिका वाले पोतों और विमानों की तैनाती कर हर समय भारत के समुद्री क्षेत्रों की चौकसी करता है।
भारतीय नौ-सेना के दो फ्रिगेट और सीमा शुल्क विभाग के 5 नावों की मामूली सूची से शुरूआत कर आज इस सेवा बल के पास 77 पोत और 56 विमान हैं। गत वर्ष के दौरान एक प्रदूषण नियंत्रण पोत, 6 गश्ती पोत, 4 वायु कुशन पोत, 2 इंटरसेप्टर नौकाएं शामिल की गई हैं। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय मुख्यालय (एनई) की स्थापना तथा 8 सीजी स्टेशन का सक्रियण, सक्रियण/3 सीजी स्टेशनों की शुरूआत की योजना 2013 के प्रारंभ में की गई है।
भारतीय तटरक्षक आज तीव्र विस्तार की राह पर है। इसमें आधुनिक स्तर के पोत, नौकाएं और विमान का निर्माण विभिन्न शिपयार्ड/ सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम में किया जा रहा है और भविष्य में तटरक्षक अकादमी की स्थापना की जाएगी। तटरक्षक के संगठनात्मक ढाँचे में 5 क्षेत्रीय मुख्यालय, 12 जिला मुख्यालय, 42 स्टेशन तथा सभी भारतीय तटों पर 15 एयर यूनिट कार्य कर रहे हैं।
श्रम शक्ति की दृष्टि से इस सेवा ने सामान्य ड्यूटी में महिला अधिकारियों के लिए अल्प सेवा नियुक्ति की शुरूआत, मेधावी अधीनस्थ अधिकारियों को विभागीय पदोन्नति और विशेष नियुक्ति अभियान चलाकर अपने श्रम शक्ति में विस्तार किया है।
बृहत विशेष आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) और तट रक्षा पर सतत निगरानी के लिए औसतन 20 पोत और 8-10 विमान तैनात किए गए है। भारतीय तटरक्षक ने तटीय निगरानी नेटवर्क (सीएसएन) की भी स्थापना की है जिसमें तटीय निगरानी रडार नेटवर्क और 46 सुदूर स्थलों पर इलेक्ट्रो ऑप्टीक सेंसर शामिल है। इन सेंसरों में 36 मुख्य क्षेत्र में, 6 लक्ष्यद्वीप समूह और 4 अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में लगाएं गए हैं।
भारतीय तटरक्षक द्वारा तट के आस-पास के गाँवों में नियमित समुदाय संपर्क कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य मछली पकड़ने वाले समुदायों को मौजूदा सुरक्षा स्थितियों के बारे में जागरूक करने के साथ-साथ खुफिया जानकारी जुटाने के लिए उन्हें सतर्क रखना है। इसके अतिरिक्त गत वर्षों के दौरान भारतीय तट रक्षक ने 20 तटीय सुरक्षा अभ्यास और 21 तटीय सुरक्षा अभियान चलाया है।
भारतीय तटरक्षक द्वारा हर समय भारतीय खोज और बचाव क्षेत्रों में समुद्री जांच और बचाव किया जाता है। इस कठिन परिस्थिति में साहस दिखाते हुए पिछले वर्ष तटरक्षरक ने 204 लोगों की जान बचाई है। इस अवधि के दौरान भारतीय तटरक्षक द्वारा कुल 30 चिकित्सा बचाव किए गए।
भारतीय तटरक्षक ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान स्थापित की है। सहयोग समझौता/ ज्ञापन के तहत संस्थागत यात्राएं नियमित की जाती हैं। 12वीं भारत-जापान तटरक्षक उच्च स्तरीय बैठक जापान के टोक्यो में जनवरी, 2013 में की गई। अक्तूबर, 2012 में नई दिल्ली में 8वां एशियाई तटरक्षक प्रमुखों का सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन काफी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसे पहली बार भारत में आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त, भारत-पाकिस्तान संयुक्त कार्य समूह बैठक का आयोजन पहली बार नई दिल्ली में जुलाई, 2012 में किया गया।
भारतीय तटरक्षक लगातार अपना विस्तार कर रहा है और जिससे इसकी क्षमता में और विकास हो रहा है। सक्षम और पेशेवर अधिकारियों द्वारा आधुनिक पोतों और विमानों का संचालन किया जा रहा है जो देश सेवा और समुद्री सुरक्षा में कार्य कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते है। वर्ष 2013 के लिए भारतीय तटरक्षक का शीर्षक है 'समुद्री सुरक्षा पर केंद्रित लक्ष्य'। यह शीर्षक इस सेवा की प्रतिबद्धता और संकल्प को प्रदर्शित करता है जो इसके आदर्श वाक्य 'वयम् रक्षाम:' में प्रतिबिम्बित है जिसका अर्थ है 'हम रक्षा करते है'। (PIB) (पसूका)
*एपीआरओ (रक्षा) भारतीय तटरक्षक ने समुद्री सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया
मीणा/आनंद/लक्ष्मी - 33
पूरी सूची - 01.02.2013
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Sunday, February 03, 2013
खादी और ग्राम उदयोग आयोग द्वारा रोजगार सृजन
01-फरवरी-2013 16:06 IST
ग्राम उद्योग और शिल्प ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण भाग
विशेष लेख//(एमएसएमई)
खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार है। उद्योगों का विकास साधारण चरखे में प्रतिबिंबत किया गया है। महात्मा गांधी की प्रेरणा के अधीन भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संघर्ष ने ग्रामीण उद्योगों के संरक्षण, सुरक्षा और प्रोत्साहन के लिए सहगामी संघर्ष का रूप लिया। मिलों द्वारा तैयार किए गए सस्ते उत्पादों की असमान प्रतिस्पर्द्धा ने ग्रामीण दस्तकारों और शिल्पकारों के रोजगार और आजीविका के लिए खतरा पैदा कर दिया।
गांधी जी ने जीवन शैली और उपभोग में सादेपन को प्राथमिकता दी। भारतीय विकास के लिए गांधीवादी रणनीति अतिरिक्त जनशक्ति के विशाल प्रयोग और उत्पादन प्रक्रियाओं में उसकी सक्रिय भागीदारी से संबद्ध थी। गांधीवादी मुहावरे में कुटीर और ग्राम उद्योग जीवन शैली के लिए समर्थन ढांचे का प्रतिनिधित्व करते हैं। गांधी जी ने इस विचार का जोरदार समर्थन किया था कि ग्राम उद्योग और शिल्प ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण भाग हैं और आत्मनिर्भर ग्राम के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए उसका जोरदार संरक्षण किया जाना चाहिए। वास्तव में, यह ब्रिटिश उद्योग के अतिक्रमण के प्रति रक्षा कवच के रूप में प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण था।
असली भारत गांवों में रहता है। भारत की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्रोत है और यह कुटीर उद्योग द्वारा समर्थित है, जिसने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को काफी हद तक संरक्षित रखने का काम किया है।
खादी और ग्राम उद्योग आयोग देश में रोजगार पैदा करने की प्रमुख योजनाओं को कार्यान्वित कर रहा है। यह क्षेत्र 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान 16.07 लाख लोगों को रोजगार प्रदान कर सका है।
प्रधानमंत्री की रोजगार गारंटी कार्यक्रम योजना (पीएमईजीपी) देश में सूक्ष्म उद्यमों के जरिए रोजगार के अवसर पैदा करने का एक प्रमुख कारक रहा है। यह ऋण-संबद्ध सब्सिडी कार्यक्रम है, जिसमें सामान्य वर्ग के लाभार्थी ग्रामीण क्षेत्रों में परियोजना लागत के 25 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 15 प्रतिशत की सब्सिडी मार्जिन राशि प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा विशेष वर्गों यथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलाएं, भूतपूर्व सैनिक, शारीरिक रूप से विकलांग, पूर्वोत्तर क्षेत्र, पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों से संबंध रखने वाले लाभार्थियों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सब्सिडी की मार्जिन राशि 35 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत है। विनिर्माण क्षेत्र में परियोजना की सर्वाधिक राशि 25 लाख रूपये और सेवा क्षेत्र में दस लाख रूपये है।
इस योजना की बेरोजगार लोगों में और प्रमुख कार्यान्वयन भागीदार यथा बैंकों, विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू कश्मीर राज्य में उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया रही है। वर्ष 2011-12 के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए निर्धारित मार्जिन राशि 80 करोड़ रूपये रखी गई थी लेकिन 31 मार्च 2012 तक वास्तविक वितरण एक सौ एक करोड़ रूपये यानी लक्ष्य का 126 प्रतिशत के आंकड़े तक पहुंच गया है।
समूह विकास के लिए परम्परागत उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए धन उपलब्ध कराने की योजना ने भी परम्परागत उद्योगों को पुनर्जीवित करने और दस्तकारों की मजदूरी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस योजना के अधीन पूर्वोत्तर क्षेत्र में दो खादी, 11 ग्राम उद्योग और दो कॉयर समूहों को चालू किया गया है। इसके लिए उन्हें संवर्धित उपकरण, सामान्य सुविधा केंद्र, कारोबार विकास सेवाएं, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और डिजाइन तथा विपणन सुविधाएं प्रदान की गई हैं।
केवीआईसी की नई योजनाएं
केवीआईसी को केवीआई उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए वाणिज्य मंत्रालय द्वारा निर्यात प्रोत्साहन परिषद का मानद दर्जा प्रदान किया गया है। यह केवीआई क्षेत्र के लिए निर्यात के अवसर पैदा करने का एक बड़ा प्रयास सिद्ध होगा।
केवीआईसी ने डिजाइन और फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में व्यावसायिक विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिए मुंबई स्थित निफ्ट के साथ संपर्क स्थापित किए हैं और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। निफ्ट, केवीआईसी की डिजाइन सैल गठित करने में सहायता करेगा जिसे बाजार में बिक्री के वास्ते वस्त्र तैयार करने के लिए खादी संस्थाओं द्वारा प्रयोग में लाया जाएगा।
निर्यात को बढ़ावा देने के लिए केवीआईसी भारतीय विदेश व्यापार संस्था के साथ समझौता ज्ञापन के तौर-तरीकों पर काम कर रहा है, जो केवीआई संस्थाओं और इकाईयों की निर्यात के क्षेत्र में क्षमता निर्माण में व्यावसायिक विशेषज्ञता लाएगा और खादी एवं ग्राम उद्योग क्षेत्र के लिए निर्यात के बाजार भी तैयार करेगा।
केवीआईसी द्वारा इस क्षेत्र में उत्पादित खादी और ग्राम उद्योग की वस्तुओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए बंगलुरू, गुवाहाटी और नगालैंड में कई खादी प्लाजा बनाये जा रहे हैं।
क्षेत्र/राज्य से बाहर प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र, जम्मू कश्मीर, अंडमान निकोबार बोर्ड की इकाईयों और खादी एवं ग्राम उद्योग संस्थाओं के दस्तकारों और बुनकरों आदि की यात्रा, ठहरने और भोजन के लिए अनुदान सहायता देने के विशेष पैकेज शुरू किए गए हैं। यह इन क्षेत्रों की संस्थाओं और इकाईयों को प्रमुख प्रदर्शिनयों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे वे अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ा सकेंगे और उनमें व्यावहारिकता भी ला सकेंगे।
प्रारंभ
वर्ष 2012-13 के दौरान ब्रैंड प्रोत्साहन, उत्पाद विकास, विभागीय बिक्री केंद्रों की सुव्यवस्था, सरकारी आपूर्तियों और निर्यात के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह व्यावसायिक एजेंसियों जैसे आईआईएफटी, सीआईआई, निफ्ट आदि के सहयोग से प्राप्त किया जाएगा। इसके अलावा देश और विदेश में प्रदर्शनियों, क्रय-विक्रय मेलों, कार्यशालाओं, गोष्ठियों और प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि का भी आयोजन किया जाएगा।
· अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और क्रय-विक्रय मेलों में भागीदारी के जरिए निर्यात बाजार को बढ़ावा देना। केवीआई उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए केवीआई संस्थाओं और प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी कार्यक्रमों के जरिए निर्यात बाजार को प्रोत्साहित करना।
· निर्यातोन्मुख केवीआई संस्थाओं और आरईजीपी/पीएमईजीपी इकाईयों के निर्यात संघों को बढ़ावा देना। यह निर्यात को बढ़ावा देने और निर्यात योग्य इकाईयों की सहायता में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
· एशियाई विकास बैंक की सहायता से बाजारों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें केवीआईसी के साथ भागीदार के रूप में निजी क्षेत्र की संस्थाओं का चयन किया जाएगा, जो पूरे देश में बड़े पैमाने पर कारोबार करेंगे।
केवीआईसी के कार्य निष्पादन का विहंगम दृष्टिपात
***
*सूक्ष्म, लघु और मझौला उद्यम मंत्रालय से साभार
मीणा/क्वात्रा/सोनिका–34
पूरी-सूची 01.02.2013
ग्राम उद्योग और शिल्प ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण भाग
विशेष लेख//(एमएसएमई)
खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार है। उद्योगों का विकास साधारण चरखे में प्रतिबिंबत किया गया है। महात्मा गांधी की प्रेरणा के अधीन भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संघर्ष ने ग्रामीण उद्योगों के संरक्षण, सुरक्षा और प्रोत्साहन के लिए सहगामी संघर्ष का रूप लिया। मिलों द्वारा तैयार किए गए सस्ते उत्पादों की असमान प्रतिस्पर्द्धा ने ग्रामीण दस्तकारों और शिल्पकारों के रोजगार और आजीविका के लिए खतरा पैदा कर दिया।
गांधी जी ने जीवन शैली और उपभोग में सादेपन को प्राथमिकता दी। भारतीय विकास के लिए गांधीवादी रणनीति अतिरिक्त जनशक्ति के विशाल प्रयोग और उत्पादन प्रक्रियाओं में उसकी सक्रिय भागीदारी से संबद्ध थी। गांधीवादी मुहावरे में कुटीर और ग्राम उद्योग जीवन शैली के लिए समर्थन ढांचे का प्रतिनिधित्व करते हैं। गांधी जी ने इस विचार का जोरदार समर्थन किया था कि ग्राम उद्योग और शिल्प ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण भाग हैं और आत्मनिर्भर ग्राम के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए उसका जोरदार संरक्षण किया जाना चाहिए। वास्तव में, यह ब्रिटिश उद्योग के अतिक्रमण के प्रति रक्षा कवच के रूप में प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण था।
असली भारत गांवों में रहता है। भारत की ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्रोत है और यह कुटीर उद्योग द्वारा समर्थित है, जिसने भारत की सांस्कृतिक धरोहर को काफी हद तक संरक्षित रखने का काम किया है।
खादी और ग्राम उद्योग आयोग देश में रोजगार पैदा करने की प्रमुख योजनाओं को कार्यान्वित कर रहा है। यह क्षेत्र 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान 16.07 लाख लोगों को रोजगार प्रदान कर सका है।
प्रधानमंत्री की रोजगार गारंटी कार्यक्रम योजना (पीएमईजीपी) देश में सूक्ष्म उद्यमों के जरिए रोजगार के अवसर पैदा करने का एक प्रमुख कारक रहा है। यह ऋण-संबद्ध सब्सिडी कार्यक्रम है, जिसमें सामान्य वर्ग के लाभार्थी ग्रामीण क्षेत्रों में परियोजना लागत के 25 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 15 प्रतिशत की सब्सिडी मार्जिन राशि प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा विशेष वर्गों यथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक, महिलाएं, भूतपूर्व सैनिक, शारीरिक रूप से विकलांग, पूर्वोत्तर क्षेत्र, पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों से संबंध रखने वाले लाभार्थियों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सब्सिडी की मार्जिन राशि 35 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत है। विनिर्माण क्षेत्र में परियोजना की सर्वाधिक राशि 25 लाख रूपये और सेवा क्षेत्र में दस लाख रूपये है।
इस योजना की बेरोजगार लोगों में और प्रमुख कार्यान्वयन भागीदार यथा बैंकों, विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू कश्मीर राज्य में उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया रही है। वर्ष 2011-12 के दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए निर्धारित मार्जिन राशि 80 करोड़ रूपये रखी गई थी लेकिन 31 मार्च 2012 तक वास्तविक वितरण एक सौ एक करोड़ रूपये यानी लक्ष्य का 126 प्रतिशत के आंकड़े तक पहुंच गया है।
समूह विकास के लिए परम्परागत उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए धन उपलब्ध कराने की योजना ने भी परम्परागत उद्योगों को पुनर्जीवित करने और दस्तकारों की मजदूरी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस योजना के अधीन पूर्वोत्तर क्षेत्र में दो खादी, 11 ग्राम उद्योग और दो कॉयर समूहों को चालू किया गया है। इसके लिए उन्हें संवर्धित उपकरण, सामान्य सुविधा केंद्र, कारोबार विकास सेवाएं, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और डिजाइन तथा विपणन सुविधाएं प्रदान की गई हैं।
केवीआईसी की नई योजनाएं
केवीआईसी को केवीआई उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए वाणिज्य मंत्रालय द्वारा निर्यात प्रोत्साहन परिषद का मानद दर्जा प्रदान किया गया है। यह केवीआई क्षेत्र के लिए निर्यात के अवसर पैदा करने का एक बड़ा प्रयास सिद्ध होगा।
केवीआईसी ने डिजाइन और फैशन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में व्यावसायिक विशेषज्ञता का लाभ उठाने के लिए मुंबई स्थित निफ्ट के साथ संपर्क स्थापित किए हैं और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। निफ्ट, केवीआईसी की डिजाइन सैल गठित करने में सहायता करेगा जिसे बाजार में बिक्री के वास्ते वस्त्र तैयार करने के लिए खादी संस्थाओं द्वारा प्रयोग में लाया जाएगा।
निर्यात को बढ़ावा देने के लिए केवीआईसी भारतीय विदेश व्यापार संस्था के साथ समझौता ज्ञापन के तौर-तरीकों पर काम कर रहा है, जो केवीआई संस्थाओं और इकाईयों की निर्यात के क्षेत्र में क्षमता निर्माण में व्यावसायिक विशेषज्ञता लाएगा और खादी एवं ग्राम उद्योग क्षेत्र के लिए निर्यात के बाजार भी तैयार करेगा।
केवीआईसी द्वारा इस क्षेत्र में उत्पादित खादी और ग्राम उद्योग की वस्तुओं की बिक्री को बढ़ावा देने के लिए बंगलुरू, गुवाहाटी और नगालैंड में कई खादी प्लाजा बनाये जा रहे हैं।
क्षेत्र/राज्य से बाहर प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र, जम्मू कश्मीर, अंडमान निकोबार बोर्ड की इकाईयों और खादी एवं ग्राम उद्योग संस्थाओं के दस्तकारों और बुनकरों आदि की यात्रा, ठहरने और भोजन के लिए अनुदान सहायता देने के विशेष पैकेज शुरू किए गए हैं। यह इन क्षेत्रों की संस्थाओं और इकाईयों को प्रमुख प्रदर्शिनयों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे वे अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ा सकेंगे और उनमें व्यावहारिकता भी ला सकेंगे।
प्रारंभ
वर्ष 2012-13 के दौरान ब्रैंड प्रोत्साहन, उत्पाद विकास, विभागीय बिक्री केंद्रों की सुव्यवस्था, सरकारी आपूर्तियों और निर्यात के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह व्यावसायिक एजेंसियों जैसे आईआईएफटी, सीआईआई, निफ्ट आदि के सहयोग से प्राप्त किया जाएगा। इसके अलावा देश और विदेश में प्रदर्शनियों, क्रय-विक्रय मेलों, कार्यशालाओं, गोष्ठियों और प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि का भी आयोजन किया जाएगा।
· अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और क्रय-विक्रय मेलों में भागीदारी के जरिए निर्यात बाजार को बढ़ावा देना। केवीआई उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए केवीआई संस्थाओं और प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी कार्यक्रमों के जरिए निर्यात बाजार को प्रोत्साहित करना।
· निर्यातोन्मुख केवीआई संस्थाओं और आरईजीपी/पीएमईजीपी इकाईयों के निर्यात संघों को बढ़ावा देना। यह निर्यात को बढ़ावा देने और निर्यात योग्य इकाईयों की सहायता में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
· एशियाई विकास बैंक की सहायता से बाजारों को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें केवीआईसी के साथ भागीदार के रूप में निजी क्षेत्र की संस्थाओं का चयन किया जाएगा, जो पूरे देश में बड़े पैमाने पर कारोबार करेंगे।
केवीआईसी के कार्य निष्पादन का विहंगम दृष्टिपात
ब्यौरा
|
2010-11
|
2011-12
|
उत्पादन (करोड़ रूपये में)
|
रूपये 19,871.86
|
21,852.00
|
बिक्री (करोड़ रूपये में)
|
रूपये 25,792.99
|
26,797.13
|
रोजगार
(लाखों में )
|
113.80
|
119.10
|
(पसूका लेख)
***
PIB feature***
*सूक्ष्म, लघु और मझौला उद्यम मंत्रालय से साभार
मीणा/क्वात्रा/सोनिका–34
पूरी-सूची 01.02.2013
Sunday, January 15, 2012
छोटे शहरों के मेलों से उम्मीदें और आकांक्षाएं
मेला शुरू होते ही बिक जाता है बहुत सा माल*विद्या भूषण अरोड़ा

अपने हस्तनिर्मित जूते और चप्पलों के लिए बड़ी दुकान लेकर सूक्ष्म उद्यमी अशोक चवाड़े अब बहुत खुश हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम (एनएससीएफडीसी) से छह साल पहले लिए एक लाख रुपए के कर्ज की मदद से चवाड़े ने बड़ी दुकान ली और चमड़े की बेहतर ट्रिमिंग के लिए नई रापी मशीन भी खरीदी। इस मदद से वह पहले की तुलना में ज्यादा फुटवियर बना पा रहे हैं। उनके लिए कहीं ज्यादा संतोषजनक तथ्य यह है कि एनएससीएफडीसी से मिले इस कर्ज की शर्तें बेहद आसान हैं। इस कर्ज को 20 सालों में लौटाना है। इंटरमीडिएट पास अशोक महाराष्ट्र के नागपुर जिले के छोटे परंतु सुंदर शहर रामटेक से हैं। यहां की आबादी 50 हजार से भी कम है। यहां स्थित अनेक मंदिरों को देखने यहां अच्छी संख्या में पर्यटक आते हैं। अपने कारोबार के विस्तार के बारे में चवाड़े कहते हैं, ‘‘यदि उचित कोशिश हो तो इस शहर में अच्छी पर्यटन क्षमता है।’’ इनके फुटवियर 100 से 600 रुपए के दायरे में होने के चलते ये इसे बड़ी संख्या में बनाते हैं।
भारत निर्माण के तहत कार्यान्वित की जा रही विकास योजनाओं के प्रदर्शन के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित जनसूचना अभियान के अंतर्गत रामटेक में लगाए गए स्टॉल पर अशोक चवाड़े ने अपने उत्पादों को प्रस्तुत किया। राज्य सरकार या संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित की जा रही केंद्रीय योजनाओं के अन्य लाभान्वितों ने भी चवाड़े का साथ दिया।
उदाहरणार्थ, नागपुर के निकट के ही एक छोटे से शहर नगरधाम की एक महिला उद्यमी ने इस तीन-दिवसीय मेले में लाए चमड़े के अपने सभी थैलों को मेला शुरू होने के कुछ ही घंटों में बेच दिया। अब वह तेजी से तिरपाल या अन्य सामग्रियों से बने थैलों का कारोबार कर रही है। गांवों के गरीबों को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित कर उन्हें स्वरोजगार मुहैया कराने वाले एकीकृत कार्यक्रम स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत नगरधाम में गठित रानी लक्ष्मी महिला बचत गुट की सदस्य करुणा अनंत पौनिकर इसके बारे में बड़े आत्मविश्वास से बताती हैं। करुणा को इस योजना के बारे में पंचायत समिति की सहयोगिनी नन्दा खड़से से जानकारी मिली, जिसने उसे स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और अपना उद्यम शुरू करने को प्रोत्साहित किया। संकोची स्वभाव की करुणा ने अपने इस मार्गदर्शक के कहने पर 10 हजार रुपए का छोटा कर्ज लेकर वॉशिंग पाउडर, फिनाइल आदि बनाना शुरू किया। उसे जल्द ही इस छोटे उद्यम की क्षमता का अहसास हो गया और उसने 60 हजार रुपए के दूसरे ऋण से अपने उद्यम के उत्पादों का विस्तार किया। उसने तरह-तरह के थैले बनाने वाली एक छोटी इकाई की स्थापना की। अब उसके यहां आठ से दस महिलाएं अनुबंध पर थैले और अन्य उत्पाद बनाती हैं।
हालांकि इस मेले की अन्य भागीदार रेणुका बिदकर, अशोक चावड़े और करुणा अनंत पौनिकर से बहुत अलग है, 39 साल की रेणुका पोलियोग्रस्त हैं और उन्हें चलने के लिए व्हीलचेयर की जरूरत पड़ती है। लेकिन अपनी अक्षमता को उसने किसी तरह बाधक नहीं बनने दिया। उसने जीवन की बड़ी चुनौतियों को स्वीकार किया और कारोबार में सफलता हासिल की। राष्ट्रीय विकलांगता वित्त विकास निगम (एनएचएफडीसी) से छोटा कर्ज लेकर उसने मोमबत्तियां, अगरबत्तियां, चॉक, तरल साबुन, सॉफ्ट खिलौने आदि बनाना शुरू किया। रेणुका ने जल्द ही अपना लोन चुका दिया। यही नहीं, उसने लोगों की भर्ती कर अपने उद्यम का विस्तार किया। उसने अपने उद्यम में जहां तक संभव हो सका विकलांगों को मौका दिया। रेणुका अब विकलांगों के उत्थान के लिए एक संस्था भी चलाती है और उन्हें रोजगार दिलाने में मदद या स्वरोजगार के लिए मार्गदर्शन देती है। रेणुका विश्वास से कहती है, ‘‘अब मेरे जीवन का वृहत उद्देश्य अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी करने में अक्षम रहने वाले विकलांगों की मदद करना है।’’
दीपक वारकड़े इस मेले में आने वाले आकस्मिक आगंतुक नहीं थे। वह अपने घर के नजदीक अपना कॅरियर शुरू करने के लिए मदद की तलाश में मेले में आए थे। उसने हाल ही में अपने घर रामटेक से हजारों मील दूर मध्यप्रदेश के एक शहर में 4,000 रुपए प्रतिमाह की नौकरी छोड़ दी है। डोमिसाइल प्रमाणपत्र न होने के चलते किसी राज्य प्रायोजित व्यावसायिक कोर्स में अनुसूचित कोटे से नामांकन पाने में विफल रहे दीपक भी इस मेले में मौजूद थे। वह यहां ऋण के लिए जरूरी पात्रता या व्यावसायिक प्रशिक्षण के बारे में जानकारी लेने आए थे। वह कहते हैं, ‘‘डोमिसाइल प्रमाणपत्र पाना बहुत मुश्किल काम है।’’ दीपक से जब कहा गया कि कॅरियर गाइडेंस के लिए उसे किसी सिफारिश की जरूरत नहीं होगी तो वह थोड़े सशंकित थे, पर कई स्टॉलों पर बातचीत करने के बाद वे शायद संतुष्ट होकर लौटे।
कृत्रिम अंग निर्माण निगम (अलिमको) के सहायक उत्पादन केंद्र ने भी इस मेले में अपना स्टॉल लगाया था। इसके स्टॉल पर तकनीशियन और सलाहकार कृत्रिम अंगों के संबंध में विकलांगों या उनके अभिभावकों को सलाह दे रहे थे। प्रोस्थेटिक एंड ऑर्थोटिक इंजीनियर आर. एस. दास जरूरतमंदों की समस्याओं को समझते हुए उन्हें आवश्यक सलाह दे रहे थे।
भारत निर्माण या अन्य कार्यक्रमों से जुड़ी विकास योजनाओं के बारे में सूचना देने के लिए बैंकों सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों के प्रतिनिधि इस मेले में मौजूद थे, जो स्टॉल पर आए आगंतुकों की समस्याओं के उत्साहपूर्वक समाधान में व्यस्त दीखे। आगंतुकों ने भी स्टॉल पर मौजूद सूचना पुस्तिकाओं को चाव से पढ़ा और उसे एकत्र किया। पूरा माहौल उत्साह और उम्मीद से सराबोर प्रतीत हुआ। कोई भी इन गरीबों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करना और उन्हें सशक्त बनाना चाहेगा, ताकि ये सभी भारत उत्थान के अभियान में शामिल हो सकें। (18-फरवरी-2011) ----------
*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली में उपनिदेशक (एमएंडसी) हैं। ये हाल ही में रामटेक (महाराष्ट्र) में आयोजित जनसूचना अभियान से लौटे हैं।

अपने हस्तनिर्मित जूते और चप्पलों के लिए बड़ी दुकान लेकर सूक्ष्म उद्यमी अशोक चवाड़े अब बहुत खुश हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम (एनएससीएफडीसी) से छह साल पहले लिए एक लाख रुपए के कर्ज की मदद से चवाड़े ने बड़ी दुकान ली और चमड़े की बेहतर ट्रिमिंग के लिए नई रापी मशीन भी खरीदी। इस मदद से वह पहले की तुलना में ज्यादा फुटवियर बना पा रहे हैं। उनके लिए कहीं ज्यादा संतोषजनक तथ्य यह है कि एनएससीएफडीसी से मिले इस कर्ज की शर्तें बेहद आसान हैं। इस कर्ज को 20 सालों में लौटाना है। इंटरमीडिएट पास अशोक महाराष्ट्र के नागपुर जिले के छोटे परंतु सुंदर शहर रामटेक से हैं। यहां की आबादी 50 हजार से भी कम है। यहां स्थित अनेक मंदिरों को देखने यहां अच्छी संख्या में पर्यटक आते हैं। अपने कारोबार के विस्तार के बारे में चवाड़े कहते हैं, ‘‘यदि उचित कोशिश हो तो इस शहर में अच्छी पर्यटन क्षमता है।’’ इनके फुटवियर 100 से 600 रुपए के दायरे में होने के चलते ये इसे बड़ी संख्या में बनाते हैं।भारत निर्माण के तहत कार्यान्वित की जा रही विकास योजनाओं के प्रदर्शन के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित जनसूचना अभियान के अंतर्गत रामटेक में लगाए गए स्टॉल पर अशोक चवाड़े ने अपने उत्पादों को प्रस्तुत किया। राज्य सरकार या संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित की जा रही केंद्रीय योजनाओं के अन्य लाभान्वितों ने भी चवाड़े का साथ दिया।
उदाहरणार्थ, नागपुर के निकट के ही एक छोटे से शहर नगरधाम की एक महिला उद्यमी ने इस तीन-दिवसीय मेले में लाए चमड़े के अपने सभी थैलों को मेला शुरू होने के कुछ ही घंटों में बेच दिया। अब वह तेजी से तिरपाल या अन्य सामग्रियों से बने थैलों का कारोबार कर रही है। गांवों के गरीबों को स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में संगठित कर उन्हें स्वरोजगार मुहैया कराने वाले एकीकृत कार्यक्रम स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत नगरधाम में गठित रानी लक्ष्मी महिला बचत गुट की सदस्य करुणा अनंत पौनिकर इसके बारे में बड़े आत्मविश्वास से बताती हैं। करुणा को इस योजना के बारे में पंचायत समिति की सहयोगिनी नन्दा खड़से से जानकारी मिली, जिसने उसे स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और अपना उद्यम शुरू करने को प्रोत्साहित किया। संकोची स्वभाव की करुणा ने अपने इस मार्गदर्शक के कहने पर 10 हजार रुपए का छोटा कर्ज लेकर वॉशिंग पाउडर, फिनाइल आदि बनाना शुरू किया। उसे जल्द ही इस छोटे उद्यम की क्षमता का अहसास हो गया और उसने 60 हजार रुपए के दूसरे ऋण से अपने उद्यम के उत्पादों का विस्तार किया। उसने तरह-तरह के थैले बनाने वाली एक छोटी इकाई की स्थापना की। अब उसके यहां आठ से दस महिलाएं अनुबंध पर थैले और अन्य उत्पाद बनाती हैं।
हालांकि इस मेले की अन्य भागीदार रेणुका बिदकर, अशोक चावड़े और करुणा अनंत पौनिकर से बहुत अलग है, 39 साल की रेणुका पोलियोग्रस्त हैं और उन्हें चलने के लिए व्हीलचेयर की जरूरत पड़ती है। लेकिन अपनी अक्षमता को उसने किसी तरह बाधक नहीं बनने दिया। उसने जीवन की बड़ी चुनौतियों को स्वीकार किया और कारोबार में सफलता हासिल की। राष्ट्रीय विकलांगता वित्त विकास निगम (एनएचएफडीसी) से छोटा कर्ज लेकर उसने मोमबत्तियां, अगरबत्तियां, चॉक, तरल साबुन, सॉफ्ट खिलौने आदि बनाना शुरू किया। रेणुका ने जल्द ही अपना लोन चुका दिया। यही नहीं, उसने लोगों की भर्ती कर अपने उद्यम का विस्तार किया। उसने अपने उद्यम में जहां तक संभव हो सका विकलांगों को मौका दिया। रेणुका अब विकलांगों के उत्थान के लिए एक संस्था भी चलाती है और उन्हें रोजगार दिलाने में मदद या स्वरोजगार के लिए मार्गदर्शन देती है। रेणुका विश्वास से कहती है, ‘‘अब मेरे जीवन का वृहत उद्देश्य अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी करने में अक्षम रहने वाले विकलांगों की मदद करना है।’’
दीपक वारकड़े इस मेले में आने वाले आकस्मिक आगंतुक नहीं थे। वह अपने घर के नजदीक अपना कॅरियर शुरू करने के लिए मदद की तलाश में मेले में आए थे। उसने हाल ही में अपने घर रामटेक से हजारों मील दूर मध्यप्रदेश के एक शहर में 4,000 रुपए प्रतिमाह की नौकरी छोड़ दी है। डोमिसाइल प्रमाणपत्र न होने के चलते किसी राज्य प्रायोजित व्यावसायिक कोर्स में अनुसूचित कोटे से नामांकन पाने में विफल रहे दीपक भी इस मेले में मौजूद थे। वह यहां ऋण के लिए जरूरी पात्रता या व्यावसायिक प्रशिक्षण के बारे में जानकारी लेने आए थे। वह कहते हैं, ‘‘डोमिसाइल प्रमाणपत्र पाना बहुत मुश्किल काम है।’’ दीपक से जब कहा गया कि कॅरियर गाइडेंस के लिए उसे किसी सिफारिश की जरूरत नहीं होगी तो वह थोड़े सशंकित थे, पर कई स्टॉलों पर बातचीत करने के बाद वे शायद संतुष्ट होकर लौटे।
कृत्रिम अंग निर्माण निगम (अलिमको) के सहायक उत्पादन केंद्र ने भी इस मेले में अपना स्टॉल लगाया था। इसके स्टॉल पर तकनीशियन और सलाहकार कृत्रिम अंगों के संबंध में विकलांगों या उनके अभिभावकों को सलाह दे रहे थे। प्रोस्थेटिक एंड ऑर्थोटिक इंजीनियर आर. एस. दास जरूरतमंदों की समस्याओं को समझते हुए उन्हें आवश्यक सलाह दे रहे थे।
भारत निर्माण या अन्य कार्यक्रमों से जुड़ी विकास योजनाओं के बारे में सूचना देने के लिए बैंकों सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों के प्रतिनिधि इस मेले में मौजूद थे, जो स्टॉल पर आए आगंतुकों की समस्याओं के उत्साहपूर्वक समाधान में व्यस्त दीखे। आगंतुकों ने भी स्टॉल पर मौजूद सूचना पुस्तिकाओं को चाव से पढ़ा और उसे एकत्र किया। पूरा माहौल उत्साह और उम्मीद से सराबोर प्रतीत हुआ। कोई भी इन गरीबों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करना और उन्हें सशक्त बनाना चाहेगा, ताकि ये सभी भारत उत्थान के अभियान में शामिल हो सकें। (18-फरवरी-2011) ----------
*लेखक पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली में उपनिदेशक (एमएंडसी) हैं। ये हाल ही में रामटेक (महाराष्ट्र) में आयोजित जनसूचना अभियान से लौटे हैं।
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