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Friday, September 17, 2021

27 सितंबर को भारत बंद के लिए दिशा-निर्देश जारी

 17th September 2021 at 08:19 PM

दिशा-निर्देश जारी किए संयुक्त किसान मोर्चा ने 

*मोदी करेगा मंडी बंद, हम करेंगे भारत बंद: किसान मोर्चा

*आपातकालीन सेवाओं को छूट दी जाएगी-बंद शांतिपूर्ण रहेगा

*भारत बंद 27 सितंबर को सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे तक रहेगा
नई दिल्ली
: 17 सितंबर 2021: (मनप्रीत सिंह खालसा//पंजाब स्क्रीन)::
संयुक्त किसान मोर्चा ने सोमवार, 27 सितंबर 2021 को भारत बंद के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, और घटक संगठनों से समाज के सभी वर्गों के किसानों से हाथ मिलाने और बंद को पहले से प्रचारित करने की अपील की है, ताकि जनता को असुविधा न हो। बंद शांतिपूर्ण और स्वैच्छिक होगा और आपातकालीन सेवाओं को छूट  दी जाएगी। भारत बंद 27 सितंबर को सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे तक रहेगा। दिन के लिए मुख्य बैनर या थीम "किसान विरोधी मोदी सरकार के खिलाफ भारत बंद", "मोदी करेगा मंडी बंद, हम करेंगे भारत बंद" इत्यादि रहेगा। बंद 27 सितंबर 2021 को केंद्र और राज्य सरकारों के कार्यालयों, बाजारों, दुकानों और कारखानों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों, विभिन्न प्रकार के सार्वजनिक परिवहन और निजी परिवहन, सार्वजनिक कार्यों और कार्यक्रमों को बंद करने की मांग करेगा। 
हरियाणा की भाजपा-जजपा सरकार बार-बार अति किसान-विरोधी व्यवहार का प्रदर्शन करने के बाद ऐतिहासिक किसान आंदोलन को दबाने के लिए तरह-तरह के घटिया हथकंडे अपना रही है। खबर है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और उन्हें करनाल की घटनाओं सहित किसानों के विरोध प्रदर्शन से अवगत कराया। 
एसकेएम का कहना है कि अगर भाजपा को किसानों के लगातार और तेज हो रहे विरोध प्रदर्शनों की चिंता है तो उन्हें आंदोलन की जायज मांगों को पूरा करके इसका समाधान करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी नोटिस के जवाब में, हरियाणा सरकार ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राजीव अरोड़ा की अध्यक्षता में राज्य के कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक समिति का गठन किया है। 20 सितंबर 2021 को सुप्रीम कोर्ट की निर्धारित सुनवाई से पहले सोनीपत जिले के जिला मजिस्ट्रेट ने 19 सितंबर 2021 को एसकेएम नेताओं के साथ मुरथल में बैठक बुलाई है। 
एसकेएम एक बार फिर दोहराता है कि यह उनकी अपनी इच्छा से नहीं है कि लाखों किसान दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय सहित विभिन्न राज्यों की पुलिस ने उन्हें सीमाओं पर रहने के लिए मजबूर किया है। भारी बारिश और बाढ़, भीषण गर्मी और सर्दी के महीनों में किसान विपत्ति में राजमार्गों पर डटे हुए रहे हैं। किसानों के लिए वर्तमान संघर्ष उनकी आजीविका, बुनियादी संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा से जुड़ा है। आंदोलन में अब तक 600 से अधिक किसान शहीद हो चुके हैं। यह सरकार है जो अड़ी हुई है और किसानों को सीमाओं पर विरोध करने के लिए मजबूर कर रही है।
एसकेएम 24 सितंबर 2021 को स्कीम वर्कर की अखिल भारतीय हड़ताल को सक्रिय समर्थन देता है, जिसमें आंगनवाड़ी, आशा, एमडीएम, एनसीएलपी, एसएसए, एनएचएम कार्यकर्ताओं की भागीदारी होगी। ये श्रमिक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और सेवाओं के निजीकरण को रोकने और चार श्रम संहिताओं को वापस लेने के अलावा न्यूनतम मजदूरी के प्रावधान के साथ श्रमिकों के रूप में अपनी सेवाओं को नियमित करने की मांग कर रहे हैं। 
एसकेएम यह मानता है कि देश के दूरदराज के हिस्सों में भी पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, बच्चों की देखभाल और शिक्षा की बुनियादी सेवाएं देने वाले इन योजना कार्यकर्ताओं, जिसमें ज्यादातर महिलाएं हैं, का शोषण किया जा रहा है और उन्हें भरण-पोषण भत्ता भी नहीं मिलता है। ये श्रमजीवी अपनी जान जोखिम में डालकर कोविड महामारी से लड़ने में सबसे आगे रहे हैं। एसकेएम इन लाखों श्रमिकों को बधाई देता है, और 24 सितंबर के लिए नियोजित उनकी ऐतिहासिक अखिल भारतीय हड़ताल के प्रति पूर्ण एकजुटता व्यक्त करता है।
ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार पूरे राज्य में किसान आंदोलन को मिल रहे जनसमर्थन से घबरा रही है। किसानों के आंदोलन का मुकाबला करने के लिए उत्तर प्रदेश भाजपा द्वारा किया जा रहा किसान सम्मेलन राज्य के उन किसानों को मूर्ख नहीं बना पाएगा, जो यह समझ चुके हैं कि भाजपा मूल रूप से किसान विरोधी है। उत्तर प्रदेश के किसान मोदी सरकार द्वारा थोपे गए 3 काले कानूनों को रद्द करने और सभी किसानों के लिए गारंटीकृत लाभकारी एमएसपी सुनिश्चित करने वाले कानून के लिए बड़ी संख्या में आगे बढ़ रहे हैं । विभिन्न राज्यों में चल रहे आंदोलन को मजबूत करने और 27 सितंबर को भारत बंद को सफल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किसानों की लामबंदी हो रही है। राजस्थान के सीकर में अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में कल "रोष प्रदर्शन" के रूप में किसानों की एक बड़ी सभा हुई। इस बीच महाराष्ट्र के नंदुरबार में शुरू हुई शेतकारी संवाद यात्रा आज धुले जिले से होते हुए नासिक के मुलर पहुंची।
27 सितंबर के बंद की योजना बनाने के लिए 20 सितंबर को मुंबई में राज्य स्तरीय तैयारी बैठक है। वहीं 20 सितबर को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में किसान मजदूर महापंचायत का आयोजन होगा। 22 सितंबर को उत्तराखंड के रुड़की के लक्सर में किसान महापंचायत होगी ।
22 सितंबर से किसान टिकरी और सिंघू विरोध स्थलों पर 5 दिवसीय कबड्डी लीग टूर्नामेंट का आयोजन करेंगे। विभिन्न राज्यों की टीमों के भाग लेने और   नकद पुरस्कारों को जीतने के लिए उम्दा प्रदर्शन की उम्मीद है।
आज समाज सुधारक और "द्रविड़ आंदोलन के जनक" पेरियार ईवी रामासामी की जयंती देश भर में विभिन्न कार्यक्रमों और कार्यक्रमों के माध्यम से मनाई जा रही है। उनका आत्म-सम्मान आंदोलन और उनका जाति और पितृसत्ता के खिलाफ सफल सामाजिक न्याय संघर्ष, वर्तमान पीढ़ी के भारतीयों के लिए भी एक गहरी प्रेरणा है।
अलग-अलग जगहों पर भाजपा और सहयोगी दलों के नेताओं के खिलाफ स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन जारी है। कल पंजाब के जालंधर में भाजपा नेता एचएस कहलों को ऐसे ही एक विरोध का सामना करना पड़ा। हरियाणा के पानीपत में जजपा के अध्यक्ष अजय चौटाला को उनके विरोध में इकट्ठा हुए किसानों की एक बड़ी सभा द्वारा काले झंडे के विरोध का सामना करना पड़ा। पुलिस ने कई किसानों को हिरासत में लिया गया और बाद में रिहा कर दिया।  27 सितंबर के भारत बंद के लिए दिशा-निर्देश जारी 

Monday, February 01, 2021

साज़िशों के बावजूद चढ़दीकला में है किसान आंदोलन

गोदी मीडिया को भी निरंतर मुँहतोड़ उत्तर दे रहे हैं समता जैसे लोग 


सिंघू बॉर्डर से
:1 फरवरी 2021: 
(विशेष इनपुट जसप्रीत समता की पंजाब स्क्रीन के लिए  ख़ास तस्वीरें)::

जसप्रीत कौर समता 
इस समय देश और दुनिया की नज़रें सिंघू बॉर्डर पर हैं। सियासत की चालाकियों और सत्ता के दमन के भरे कदम्पों का सामना करने वाले किसानों  अब यह उनकी कर्मभूमि बन चुका है। संघर्षों का नया इतिहास लोयखा जा रहा है सिंघू बॉर्डर पर। इस स्थान को  लगातार ऐतिहासिक बनता जा। अन्य जन संघर्षों की तरह इस बार किसान आंदोलन ने भी  इस संघर्ष लोगों को जहाँ  योद्धा   बनाया है वहीं  उन्हें  मीडिया जैसी ज़िम्मेदारियाँ भी सीखा दी हैं।  को संभालने वालों में युवा वर्ग भी शामिल है और वृद्ध लोग भी। आंधी हो या तूफ़ान।  बारिश हो या ओलों का ज़ोर लेकिन लुधियाना के कामरेड सुरिंदर सिंह हर हाल में आंदोलन की निश्चित जगह पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हैं। कामरेड सुरिंदर की ज़िंदगी हर प्रमुख जनसंघर्ष की गवाह रही है। उनका परिवार भी इसी तरह जन आंदोलनों के लिए समर्पित रहता है। मुश्किलों के  दौर में भी पूरी तरह प्रतिबद्ध रहता है। जब तक इस धरती पर अन्याय का खात्मा नहीं होता तब तक इसी तरह जुटे रहने की कसम खाई है शायद इस परिवार ने कि हम लगातार संघर्ष  करते रहेंगे। इसी  परिवार की युवा सदस्य है जसप्रीत कौर समता। ज़िंदगी को हर कदम पर एक जंग मानने वाली समता कभी टिकरी बॉर्डर पर होती है, कभी संघु बॉर्डर पर और कभी ज़ीरकपुर या चंडीगढ़ में।  हाथ में कैमरा या मोबाईल और नज़र आंदोलन पर। जन आंदोलनों  की रिपोर्टिंग का यह जनअंदाज़ भी एक नया इतिहास  रच रहा है। इससे जनपत्रकारिता और मज़बूत होगी। 

एक एक उतराव चढ़ाव को  गंभीरता से नोट करती समता बताती है कि सत्ता की खतरनाक साज़िशों के बावजूद आंदोलन कर रहे किसान पूरी तरह चढ़दीकला में हैं। सड़कों पर लगाए गए बड़े बड़े कील और साथ ही बनाई गई सीमेंट की दीवारें उनके हौंसलों को पस्त नहीं कर सकीं। किसानों के इस आंदोलन की बिजली काटने और इंटरनेट बंद करने जैसी हरकतें हमारे विरोध में खड़े कॉर्पोरेट के दलालों के चेहरों को ही बेनकाब कर रही है। 

समता की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों के आंदोलन में वृद्ध किसानों की आवाजाई के लिए किसानों ने बाकायदा ऑटो रिक्शा भी रखे हैं। लंगर भी अटूट चल रहा है। शायद सत्ता और बीजेपी के लोग इस लंगर के राशन की सप्लाई काटना चाह रहे हैं। अगर उनके मंसूबे इस तरह के घटिया स्तर तक पहुँच चुके हैं तो भी उनको नाकामी   मिलेगी।  जीत हमारे ही होनी है। जीतेंगे किसान ही। कॉर्पोरेट के दलालों का हर ज़ोर ज़ुल्म किसान आंदोलन को मज़बूत करेगा। 

 
इसी बीच गाजीपुर बॉर्डर पर हर नए दिन के साथ लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा हरियाणा से भी बड़ी संख्या में किसान यहां पहुंच रहे हैं।  इससे ट्रैफिक की समस्या और गंभीर होती जा रही है।सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के  पर पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर को भी पूरी तरह से सील कर दिया है। सोमवार को दिल्ली मेरठ हाइवे से किसी को भी बॉर्डर की ओर नहीं आने दिया गया। इससे यातायात ठप हो गया है और लोगों को घंटो जाम से जूझना पड़ा। यह समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती  जा रही है। 

गौरतलब है कि गणतंत्र दिवस के दिन किसान रैली के दौरान हुई हिंसा के बाद से ही गाजीपुर बॉर्डर पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। बैरिकेडिंग को तो बाकायदा वैल्डिंग कर जोड़ दिया गया है। किसानों के धरनास्थल की तरफ आने-जाने का रास्ते पूरी तरह से ब्लॉक है। इन्हें और रोकने के तरीके सरकार के इरादों का संकेत दे रहे। हैं। पुलिस और आपात सेवाओं से जुड़े लोगों के अलावा किसी को भी दिल्ली के रास्ते बॉर्डर तक नहीं जाने दिया जा रहा है। पुलिस ने गाजीपुर बॉर्डर पर पक्की बैरिकेडिंग कर दी है, उसके बाद से इस रूट खुलने की संभावना भी पूरी तरह खत्म हो गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में भी लोगों को जाम से जूझना पड़ सकता है। सरकार के इन "प्रबंधों" को देख  कर लगता है कि सरकार किसान आंदोलन का का हल जल्द निकालने के मूड में नहीं। दूसरी तरफ किसान संगठन भी लम्बी लड़ाई के लिए तैयार हैं। इस लिए किसानों ने भी अपनी तैयारियां  लम्बे संघर्षों को सामने रख कर  की हैं।  इस बार किसानों का आंदोलन निरंतर चले आ रहे हर अन्याय और शोषण का समापन करने के लिए भी दृढ़  संकल्प क्यूंकि कृषि के तीनों नए कानूनों से  किसानों का यह  शोषण और लूट अपनी  चरमसीमा पर पहुंच जाते। शोषण और अन्याय के अतीत की चर्चा भी जल्द होगी। 


 


Friday, January 29, 2021

पुलिस ने मेडिकल टीमों को भी बनाया निशाना

 Friday: 29th January 2021 at 3:21 PM 

  डाक्टरों ने लिया 26 जनवरी को हुए इस हमले का गंभीर नोटिस  


सिंघू  बॉर्डर से लौट कर IDPD की टीम
: 29 जनवरी 2021: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::

पोष का महीना। शीत लहर का ज़ोर। बर्फीली हवाओं से बार बार छिड़ती कंपकंपी। रजाई में सर्दी कम नहीं होती। उस माहौल में लगातार दो महीनों से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए खुली सड़कों पर बैठे किसान। खुद को  किसानों का हितैषी बताने वाली सरकार और इस सरकार में भागीदार लोगों ने शीट लहर की इस ठंडक को कभी महसूस ही नहीं किया बल्कि किसानों को पिकनिक मनाते हुए बताया। ऐसी निष्ठुर और असंवेदनशील स्थिति में इस दर्द को महसूस किया डाक्टर अरुण मित्रा और उनके साथियों ने। इन्हीं किसानों के स्वास्थ्य की चिंता को ले कर इंडियन डाकटरज़ फॉर पीस एंड डिवेलपमेंट अर्थात IDPD की एक विशेष टीम तैयार हुई। इसी टीम ने दिल्ली की इन सीमाओं पर बैठे किसानों के स्वास्थ्य की जांच करने के मकसद से कई मेडिकल कैंप लगाए। इस बार 26 जनवरी गणतंत्र दिवस को भी इस टीम ने दवाओं का भंडार ले कर दिल्ली की तरफ कूच किया। किसानों की खराब हो रही सेहत की सभी समस्यायों की चिंता इनके ज़हन में थी। खुद की पॉकेट और अपने साथियों के सहयोग से आवश्यक फंड भी जुटाया गया तब कहीं जा कर मेडिकल कैंप के आयोजन का काम फिर से शुरू हुआ। इन टीमों ने अपनी सभी स्वास्थ्य सेवाएं साथ ले कर गणतंत्र दिवस को किसानों के साथ साथ मार्च भी किया। 

इस टीम ने लुधियाना लौट कर 29 जनवरी को मीडिया के कुछ लोगों से भी अनौपचारिक भेंट की और उन्हें बताया कि समस्या तब शुरू हुई जब पुलिस ने रुट प्लान की सहमति वाले रास्तों को अचानक बदलने की घोषणा की। पूर्व निश्चित उन रास्तों पर रुकावटें खड़ी कीं और दूसरी तरफ कुछ अन्य रास्ते खोल दिए। नतीजतन गुंडागर्दी करने वाले मुठ्ठीभर लोगों का मिशन आसान हो गया। पुलिस चाहती तो इस सारी  साज़िशाना शरारत को रोका जा सकता था। साफ़ ज़ाहिर है कि पुलिस ने जानबूझ कर सारी शरारत और गुंडागर्दी को नज़रअंदाज़ किया। 

दूसरी तरफ किसानों का मार्च इतना शांतिपूर्ण था कि इसका जादू देखने वाला था। दिल्ली के स्थानीय लोगों ने इन शांतिपूर्ण किसानों पर फूलों की वर्षा की। शायद इसी सौहार्द को देख कर वो सियासतदान बोखला गए है और लगातार किसानों के विशाल और व्यापक विरोध को भी अनदेखा कर रहे हैं। कारपोरेट का समर्थन करने वाले ये लोग वास्तव में कृषि  कानूनों को लागू करने की हठधर्मी पर अड़े हुए हैं। कितने किसानों की जान जा चुकी है इसकी इस सत्ता को कोई फ़िक्र नहीं। शायद किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करना इस सत्ता का मुख्य मकसद बन गया है। 

हैरानी की बात है कि लाल क़िला सिंघू बॉर्डर से 20 किलोमीटर दूर है लेकिन वहां हुड़दंग करने वाले तत्व इतनी आसानी से कैसे पहुँच गए? इतने लम्बे समय तक शरारती तत्व वहां अपनी मनमानी करते रहे। सारा गोदी मीडिया किसानों की मुख्य  परेड को नज़रअंदाज़ करते हुआ इन मुठ्ठीभर लोगों को "नायक" की तरह बार बार  दिखलाता रहा। 

इस गोदी मीडिया ने किसानों की मुख्यधारा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए जानबूझ कर इस तथ्य को छुपाया कि इस मुख्यधारा वाले शांतिपूर्ण किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान न तो किसी वाहन की तोड़फोड़ हुई, न ही किसी वाहन को टक्कर मारी गई, न ही किसी से गालीगलौच हुआ और न ही किसी के साथ मारपीट हुई। शायद यही कारण था कि दिल्ली के लोगों ने इतने प्रेम से किसानों को सुस्वागतम कहा कि किसान भी हैरान रह गए। उनके ह्रदय गदगद हो गए। किसानों की शांतिपूर्ण सफलता से उन लोगों के सीने पर सांप लेटने लगे जो कारपोरेट घरानों के साथ अपनी दोस्ती निभाने के लिए किसानों के विरोध को दबाने में अपनी पूरी ताक़त लगाए हुए हैं।  

पुलिस ने जिन शांतिपूर्ण किसानों पर अपनी बर्बरता दिखाई उनका इलाज करते हुए डाक्टरों की टीम ने देखा कि उन्हें बुरी तरह पुलिस ने अपना निशाना बनाया। लाठीचार्ज और अश्रुगैस के अटैक में उनके हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। उनकी आँखों को बुरी तरह नुक्सान पहुंचा। एक मरीज़ पर तो वाहन भी चढ़ा दिया गया। कई मरीज़ों की हड्डियां टूट गयीं। कई अन्यों को भी गंभीर चोटें आईं। 

डाक्टरों का कहना है कि पुलिस ने डाक्टरों की टीम को भी नहीं बख्शा।  डाक्टरों पर भी ओर आज़माई की गई। डाक्टर सवैमान की टीम को पुलिस ने उस वक़्त अपना निशाना बनाया जब वह अपनी टीम के साथ घायल हुए मरीज़ों को डाक्टरी सहायता प्रदान कर रहे थे। इसी तरह सिंघू बॉर्डर पर एम्बुलेंस की भी तोड़फोड़ की गई। जब डाक्टर बलबीर सिंह अपने किसी मरीज़ को मिलने जा रहे थे तो उन्हें धक्का दे कर गिराने से भी गुरेज़ नहीं किया गया। गौरतलब है कि दिल्ली के बॉर्डरों पर गई इस टीम में डाक्टर अरुण मित्रा के साथ डा. गगनदीप सिंह, डा. बलबीर सिंह, डा. मोनिका धवन, डा. परम सैनी, डा. एस एस  सिद्धू, डा. सूरज ढिल्लों, डा. गुरवीर सिंह, डा. राजन सिद्धू, कुलदीप सिंह, आनोद कुमार,स्वरूप सिंह, अमनिंदर सिंह भी शामिल रहे।   शहीद करतार सिंह सराभा डेंटल कालेज और अस्पताल के स्टाफ ने घायलों की सेवा और उपचार के लिए ट्रैक्टर मार्च के दौरान सख्त मेहनत की। 

डाक्टरों की टीम ने बताया कि लगातार दो महीनों से बॉर्डरों पर बैठे इन किसानों की स्वास्थ्य समस्याएं और बढ़ने की आशंका है। इसके साथ ही डाक्टरों की इस टीम ने प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण लेकिन पूरी तरह सतर्क रहने की भी अपील की। 

Friday, January 01, 2021

कंवर ग्रेवाल ने सिंघु बॉर्डर पर ही यूं सादगी से मनाया जन्मदिन

  संघर्षों में जुटे कलाकारों का जीवन भी अब यही हो गया  


सिंघु बॉर्डर
: 1 जनवरी 2020: (पंजाब स्क्रीन डेस्क):: 

भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थक चाहे कुछ भी कहे जाए, बेशक कितना ही धुंआधार प्रचार करते जाए फिर भी लोग जिस किसान आंदोलन की जिस सच्चाई को खुद आंखों से दिल्ली जा कर देख आए हैं या देखने वालों की बातों  रहे  असलियत ही उनके दिलों पर एक छाप बन कर बैठ चुकी है। सारा देश ही नहीं पूरी दुनिया अब तो किसानों के साथ होती जा रही है। हर देश का कारपोरेट घराना अंदर ही अंदर चुनौती को महसूस कर रहा  है। 

इस पोस्ट के साथ आप जिस तस्वीर को देख  तस्वीर जानेमाने लोकप्रिय गायक कंवर ग्रेवाल की है। तस्वीर में उनके साथ बैठे हैं उनके साथी और प्रसिद्ध कलाकार हर्फ़ चीमा।किसान आंदोलन  कर छाये हुए कंवर ग्रेवाल अर्थात सूफी गायक कंवर ग्रेवाल बाई का आज जन्मदिन है। इसके बावजूद न तो कंवर ग्रेवाल ने न ही आंदोलन का मोर्चा छोड़ा और न ही।  बेहद सादगी से वहीँ पर मनलिया जन्मदिन।  है संघर्षों  लोगों लाईफ स्टाईल। बार था कि सादगी ही सबसे बड़ा  गहना लेकिन आज एक बार फिर देख भी लिया। आज की यह फ़ोटो भी सिंघु बॉर्डर पर ही कहीं क्लिक की गई है। इसे क्लिक किया उनके ही  किसी दोस्त या साथी ने और साथ ही शेयर भी किया। शेयर होती होती यह तस्वीर आई गुरदेव सिंह मठारू साहिब के पास और उन्होंने  जानकारी को आगे फ़ैलाने में सहयोग दिया।   

उल्लेखनीय है कि कंवर ग्रेवाल के गाये गीतों में "ऐलान" और "जवानी ज़िंदाबाद" तो  बहुत ही हिट हुए। ऐलान तो बच्चे की जुबां पर गया। जो लोग किसान आंदोलन  का चेहरा बन कर उभरे हैं उनमें एक कंवर ग्रेवाल भी है।  

Saturday, December 19, 2020

अब शिक्षा क्षेत्र भी किसान आंदोलन की तरफ

  लायलपुर खालसा कॉलेज जालंधर ने दिए किसान आंदोलन को 2. 51 लाख रूपये  


जालंधर: 19 दिसंबर 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो)::

शिक्षा क्षेत्र का बहुत बड़ा हिस्सा अब किसान आंदोलन का साथ दे रहा है। बहुत से प्रोफेसर, बहुत से छात्र और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए बहुत से रिटायर्ड अधिकारी भी किसानों का समर्थन करने दिल्ली पहुंच रहे हैं। युवाओं के साथ साथ बड़ी उम्र के लोग भी भी इस राह पर सक्रिय हैं। 

जालंधर के बहुत ही पुराने और लोकप्रिय शिक्षा संस्थान लायलपुर खालसा कॉलेज ने तो दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन के लिए 2.51 लाख रुपये की सहायता भी दी है। 

इस फंड को बाकायदा एक शुभकार्य की भावना से एकत्र किया गया। शनिवार को कॉलेज के समूह टीचिंग एवं नॉन टीचिंग स्टाफ, विद्यार्थियों और पीसीसीटीयू ने साझे तौर पर 2.51 लाख रुपये की सहायता खालसा एड को सौंपी है। प्रिंसिपल डॉ. गुरपिंदर सिंह समरा ने कहा कि कॉलेज हमेशा ही समाज और देश की सेवा के लिए तैयार रहता है। विद्यार्थियों ने केंद्र सरकार से अपील की है कि अन्नदाता की आवाज सुनते हुए कृषि कानूनों को रद्द कर देना चाहिए। इस मौके पर पीसीसीटीयू के प्रधान डॉ. एसएस बैंस, सचिव डॉ. बलदेव सिंह, प्रो. गगनदीप सिंह, डॉ. सुरिंद्रपाल मंड, डॉ. पलविंदर सिंह, राणा रलहन, पीए सुरिंदर कुमार चलोत्रा मौजूद थे। इस कार्य की प्रशन्सा भी तेज़ी से हो रही है।