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Thursday, March 14, 2013

मार्क्सवाद कोई जड़ दर्शन नहीं है

क्रांति के बिना दलित मुक्ति नहीं हो सकती 
दलितों की व्यापक भागीदारी के बिना भारत में क्रांति संभव नहीं
चंडीगढ़, 14 मार्च। चर्चित लेखक व विचारक डा आनन्द तेलतुंबड़े ने आज यहां कहा कि दलित मुक्ति के लिए डा. अंबेडकर के सारे प्रयोग एक ‘‘महान विफलता’’ में समाप्त हुए और जाति प्रथा के विनाश के लिए आन्दोलन को उनसे आगे जाना होगा।
‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर भकना भवन में चल रही अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के तीसरे दिन अपना वक्तव्य रखते हुए डा.तेलतुंबड़े ने कहा कि आरक्षण की नीति से आज तक सिर्फ 10 प्रतिशत दलितों को ही फायदा हुआ है। इसका एक कारण यह भी है कि डा. अंबेडकर ने आरक्षण की नीति को सही ढंग से सूत्रबद्ध नहीं किया। उन्होंने कहा कि क्रांति के बिना दलित मुक्ति नहीं हो सकती और दलितों की व्यापक भागीदारी के बिना भारत में क्रांति सम्भव नहीं।
डा. तेलतुंबड़े ने कहा कि भारत के वामपन्थियों ने मार्क्सवाद को कठमुल्लावादी तरीके से लागू किया है जिससे वे जाति समस्या को न तो ठीक से समझ सके और न ही इससे लड़ने की सही रणनीति विकसित कर सके। संगोष्ठी में प्रस्तुत आधार पत्र की बहुत सी बातों से सहमति जताते हुए भी उन्होंने कहा कि अंबेडकर, फुले या पेरियार के योगदान को खारिज करके सामाजिक क्रांति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने मार्क्सवाद का गहन अध्ययन नहीं किया था, लेकिन उनके मन में उसके प्रति गहरा आकर्षण था। हमें मार्क्स और अंबेडकर आंदोलनों को लगातार एक-दूसरे के करीब लाने के बारे में सोचना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है कि दलितों पर अत्याचार की हर घटना पर कम्युनिस्ट उनके साथ खड़े हो।
‘आह्वान’ पत्रिका के संपादक अभिनव ने डा. अंबेडकर के वैचारिक प्रेरणा स्रोत अमेरिकी दार्शनिक जॉन डेवी के विचारों की विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि वे उत्पीड़ित वर्गों की मुक्ति का कोई मुकम्मल रास्ता नहीं बताते। वे ‘एफर्मिटिव एक्शन’ के रूप में राज्य द्वारा कुछ रियायतों और कल्याणकारी कदमों से आगे नहीं जाते। यही बात हम अंबेडकर के विचारों में भी पाते हैं। आनन्द तेलतुंबड़े के वक्तव्य की अनेक बातों से असहमति व्यक्त करते हुए अभिनव ने कहा कि अंबेडकर के सभी प्रयोगों की विफलता का कारण हमें उनके दर्शन में तलाशना होगा। सामाजिक क्रांति के सिद्धांत की उपेक्षा करके अंबेडकर केवल व्यवहार के धरातल पर प्रयोग करते रहे और उनमें भी सुसंगति का अभाव था। 
अभिनव ने कहा कि दलित पहचान को कायम करने और उनके अन्दर चेतना और गरिमा का भाव जगाने में डा. अंबेडकर की भूमिका को स्वीकारने के साथ ही उनके राजनीतिक-आर्थिक-दार्शनिक विचारों की आलोचना हमें प्रस्तुत करनी होगी।
आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर और प्रसिद्ध साहित्यकार लाल्टू ने कहा कि मार्क्सवाद कोई जड़ दर्शन नहीं है, बल्कि नये-नये विचारों से सहमत होता है। मार्क्सवादियों को भी ज्ञानप्राप्ति की अनेक पद्धतियों का प्रयोग करना चाहिए और एक ही पद्धति पर स्थिर नहीं रहना चाहिए। प्रोफेसर सेवा सिंह ने कहा कि अंबेडकर का मूल्याकंन सही इतिहास बोध के साथ किया जाना चाहिए। साथ ही इस्लाम पर अंबेडकर के विचारों की भी पड़ताल करने की जरूरत है। 
पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर ने डा. तेलतुंबड़े द्वारा कम्युनिस्टों की आलोचना के कई बिन्दुओं पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत के कम्युनिस्टों के पास 1951 तक क्रांति का कोई विस्तृत कार्यक्रम ही नहीं था, ऐसे में जाति के सवाल पर भी किसी सुव्यवस्थित दृष्टि की उम्मीद करना गलत होगा। लेकिन देश के हर हिस्से में कम्युनिस्टों ने सबसे आगे बढ़कर दलितों-पिछड़ों के सम्मान की लड़ाई लड़ी और अकूत कुर्बानियां दीं।
  आज संगोष्ठी में दो अन्य पेपर पढ़ें गये जिन पर चर्चा जारी है। ‘संहति’ की ओर से असित दास ने ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किया, जबकि पीडीएफआई, दिल्ली के अर्जुन प्रसाद सिंह का पेपर ‘भारत में जाति का सवाल और समाधान के रास्ते’ उनकी अनुपस्थित में तपीश मेंदोला ने प्रस्तुत किया।
आधार पत्र तथा अन्य पेपरों पर जारी बहस में यूसीपीएम माओवादी के वरिष्ठ नेता नीनू चापागाई, सिरसा से आए कश्मीर सिंह, देहरादून से आए जितेन्द्र भारती, लखनऊ के रोहित राजोरा व सूर्य कुमार यादव, लुधियाना के डा.ॅ अमृत, दिशा छात्र संगठन के सन्नी, वाराणसी के राकेश कुमार आदि ने विचार व्यक्त किए।
सत्र की अध्यक्षता नेपाल राष्ट्रीय दलित मुक्ति मोर्चा के अध्ययक्ष तिलक परिहार, ज्ञान प्रसार समाज के संचालक डा.हरिश तथा डा.अमृत पाल ने किया। संचालन का दायित्व सत्यम ने निभाया।

जाति प्रश्न और मार्क्सवाद:चौथी अरविंद स्मृति संगोष्ठी

दलित मुक्ति के प्रश्न को वर्ग-संघर्ष से जोड़ना होगा
चंडीगढ़, 13 मार्च। ‘‘जाति व्यवस्था और दलित उत्पीड़न के समूल नाश के लिए हमें इस सवाल का उत्तर ढूंढना ही होगा कि रैडिकल दलित राजनीति और अंबेडकर सहित नये-पूराने दलित विचारकों के पास दलित मुक्ति की परियोजना क्या है और उसके अमली रूप क्या है।’’ जाति प्रश्न और मार्क्सवाद विषय पर यहां चल रही चौथी अरविंद स्मृति संगोष्ठी में यह बात उभर कर सामने आई। संगोष्ठी में चर्चा के लिए प्रस्तुत आधार पत्र में कहा गया है कि आरक्षण और कानूनी रियायतों से दलित उत्पीड़न और उनकी अपमानजनक सामाजिक स्थिति का खात्मा संभव नहीं है।
भारत में बहुलांश दलित आबादी सर्वहारा है, मगर आज सर्वहारा आबादी का बहुलांश दलित नहीं है। ऐसे में जातिगत आधार पर सिर्फ दलितों की लामबंदी उनकी वास्तविक मुक्ति या जाति उन्मूलन की मंजिल तक हमें नहीं पहंुचा सकती। आधार पत्र में कहा गया है कि जाति केवल ऊपरी ढांचे का भाग नहीं, बल्कि आर्थिक मूलाधार का भी हिस्सा है और इसलिए उत्पादन संबंधों को क्रांतिकारी तरीके से बदले बिना इसे समस्या को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता।
अरविंद मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान की ओर से आधार पत्र प्रस्तुत करते हुए सत्यम ने कहा कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ने की प्रक्रिया में यदि जाति का प्रश्न कम्युनिस्टों के एजेंडा में नहीं होगा तो सबसे गरीब-शोषित आबादी जातिगत भेदभाव और जातिवादी नेताओं के जाल में उलझी रह जायेगी। क्रांतिकारी संगठनों द्वारा जातीय आधार पर संगठन बनाना गलत है लेकिन उन्हें जाति उन्मूलन मंच बनाकर इस घृणित प्रथा के विरुद्ध अवश्य लड़ना चाहिए।
आधार पत्र में जाति व्यवस्था के इतिहास की विस्तृत चर्चा के साथ ही इस प्रश्न पर अंबेडकर, फुले, पेरियार के विचारों तथा पहचान की राजनीति की मार्क्सवादी विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। पेपर में कहा गया है कि अंबेडकर ने दलित चेतना को ऊपर उठाने में ऐतिहासिक भूमिका निभायी लेकिन दलित मुक्ति का कोई व्यावहारिक रास्ता पेश नहीं किया। दलित मुक्ति की समाजवादी परियोजना को विस्तार से प्रस्तुत करने के साथ ही जाति के प्रश्न पर प्रचार और संघर्ष का फौरी कार्यक्रम भी दिया गया।
इस बात पर विशेष बल दिया गया कि कम्युनिस्टों को अपने निजी आचरण और व्यवहार में जाति और धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं मानने को सख्ती से लागू करना होगा।
आधार पत्र पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए नेपाल राष्ट्रीय दलित मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष तिलक परिहार ने कहा कि दलित मुक्ति के प्रश्न को वर्ग संघर्ष से जोड़ना होगा। उन्होंने एशिया के स्तर पर जाति-विरोधी मंच गठित करने का प्रस्ताव दिया।
पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के अंबेडकर सेंटर के निदेशक प्रो. मंजीत सिंह ने कहा कि पूंजीवाद ने जाति व्यवस्था को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत बनाया है और आज हमारे सामने एक पूंजीवादी जाति व्यवस्था मौजूद है।
पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविन्दर ने अपने वक्तव्य में इस सोच को गलत बताया कि जाति प्रश्न को न समझ पाने के कारण ही भारत में वामपन्थी आन्दोलन विफल रहा। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्टों की वैचारिक कमियों के कारण वे भारतीय समाज को ठीक से समझ नहीं सके, फिर भी दलितों के अधिकार और सम्मान के लिए लड़ने और कुर्बानी देने में वे सबसे आगे रहे हैं।
दिल्ली से आये ‘आह्वान’ के संपादक अभिनव ने पहचान की राजनीति और सबआल्टर्न विचारों की विस्तृत आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहा कि वर्ग संघर्ष का रास्ता छोड़ चुकी कम्युनिस्ट पार्टियों के कुकर्मों के लिए सभी क्रांतिकारियों को दोषी ठहराना गलत है।
सोशल साइंस स्टडीज सेंटर, कोलकाता के डॉ. प्रस्कन्वा सिन्हाराय ने कहा कि दलितों के भीतर की अलग-अलग पहचानों को देखा जाना जरूरी है। जाति आज एक आर्थिक प्रवर्ग है और केवल आरक्षण से दलितों की बराबरी नहीं आ सकती।
रिबब्लिकन पैंथर्स, मुंबई, यूसीपीआई के गोपाल सिंह, बामसेफ के हरिहरण सांप्ले, चंडीगढ़ के एडवोकेट शमशेर सिंह, संगरूर से आये संदीप आदि ने भी चर्चा में हिस्सा लिया।
अध्यक्ष मण्डल की ओर से डॉ. सुखदेव ने भी बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया। अध्यक्ष मण्डल के अन्य सदस्य चिंतन विचार मंच, पटना के देवाशीष बरात तथा कात्यायनी थे।
- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करेंः
कात्यायनी - 09936650658, सत्यम - 09910462009, नमिता (चंडीगढ़) - 9780724125

भारतीय समाज की मुक्ति जातिप्रश्न को हल किये बिना संभव नहीं!

‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ पर पांच दिवसीय संगोष्ठी

मैं अन्तिम साँस तक ज़ि‍न्‍दगी की जंग लड़ूँगी

Tuesday, March 12, 2013

चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी चंडीगढ में शुरू

भारतीय समाज की मुक्ति जातिप्रश्न को हल किये बिना संभव नहीं!
चंडीगढ़, 12 मार्च। चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी में ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर आज यहां भकना भवन में देशभर से आये बुद्धिजयों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा और विचार-मन्थन शुरू हुआ जो अगले चार दिनों तक जारी रहेगा।
संगोष्ठी की शुरुआत में ही यह बात स्पष्ट रूप से रेखांकित की गयी कि भारतीय समाज को शोषण से मुक्त करने की कोई भी परियोजना जाति प्रश्न को छोड़कर नहीं बनायी जा सकती। इस पांच दिवसीय संगोष्ठी में पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार आदि राज्यों से आये इतिहासकार, समाजशास्त्री, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता तथा संस्कृतिकर्मी भाग ले रहे हैं। इनके अलावा नेपाल की दोनों प्रमुख पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी संगोष्ठी में भाग ले रहे हैं तथा ब्रिटेन और जर्मनी के बुद्धिजीवी भी भाग लेंगे।
उद्घाटन सत्र में अरविन्द मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान की ओर से सत्यम ने कहा कि संगोष्ठी में मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के संबंध, डॉ अंबेडकर के राजनीतिक विचारों, जातिप्रश्न की मार्क्सवादी समझ, जातिप्रश्न के इतिहासलेखन, जातिप्रश्न और दलित साहित्य एवं सौंदर्यशास्त्र जैसे सवालों पर खुलकर चर्चा की जायेगी ताकि सामाजिक बदलाव की लड़ाई के अवरोधों को दूर किया जा सके। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में क्रांतिकारी मार्क्सवादी खेमे के बीच यांत्रिक सोच में बदलाव  आया है और दलितवादी खेमे के बीच भी अंबेडकर के विचारों की सीमाओं को लेकर उठ रहे हैं।
सत्यम ने कहा कि मार्क्सवाद और अंबेडकरवाद के बीच समन्वय कराने के प्रयास तथा सबआल्टर्न एवं पहचान की राजनीति आजकल काफी चलन में है। इनका मार्क्सवादी दृष्टि से विश्लेषण जरूरी है।
अरविन्द स्मृति न्यास की मुख्य न्यासी मीनाक्षी ने बताया कि का. अरविन्द की स्मृति में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के किसी महत्वपूर्ण विषय पर प्रतिवर्ष राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। अरविंद मार्क्सवादी अध्ययन संस्थान कम्युनिस्ट आंदोलन के वैचारिक और व्यावहारिक पहलुओं पर शोध तथा अध्ययन के लिए स्थापित किया गया है।
संगोष्ठी में आये अतिथियोें का स्वागत करते हुए पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के संपादक सुखविंदर ने कहा कि पंजाब में वामपंथी आंदोलन का एक विशेष इतिहास रहा है और यहां जातिप्रश्न भी विशिष्ट रूप में मौजूद है। यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हर सवाल पर इतना महत्वपूर्ण आयोजन चंडीगढ में किया जा रहा है।
उद्घाटन सत्र की अध्ययक्षता एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्येरो सदस्य एवं प्रसिद्ध साहित्य आलोचक निनु चपागाई, मुंबई की वरिष्ठ टेªड यूनियनकर्मी दीप्ति, अरविंद स्मृति न्यास की मीनाक्षी तथा ‘आह्वान’ पत्रिका के संपादक अभिनव ने की। संचालन कवयित्री कात्यायनी ने किया।
कार्यक्रम की शुरूआत का. अरविंद को श्रद्धांजति के साथ हुई। विहान सांस्कृति मंच की टीन ने क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किये।
संगोष्ठी में इस विषय के विभिन्न आयामों पर कुल 14 आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे। संगोष्ठी का आधार आलेख ‘जाति प्रश्न और उसका समाधानः एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण’ के अलावा पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के सम्पादक सुखविन्दर ‘अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति’ पर, ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव ‘जाति का इतिहासलेखन’ पर, ‘वर्ग, जाति और अस्मितावादी राजनीति’ पर  दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी, ‘पश्चिम बंगाल में जाति और राजनीति’ पर सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज, कोलकाता के प्रस्कण्वा सिन्हारे, ‘मार्क्सवादी परंपराओं में जाति और सेक्स’ पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डा. राजर्षि दासगुप्ता, ‘मार्क्सवाद और जाति प्रश्न’ पर दिल्ली के शोधकर्ता और ऐक्टिविस्ट असित दास, पहचान की राजनीति पर बी.आर. अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशांत गुप्ता, मार्क्स(वाद) तथा अम्बेडकर(वाद) की साझा प्रासंगिकता पर पंजाब के सुखदेव सिंह जनागल तथा जाति व पहचान की राजनीति की सीमाओं पर ‘जाति विरोधी आंदोलन’ के जयप्रकाश पेपर प्रस्तुत करेंगे।
इसके अलावा सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब की ओर से भारत में जाति के विषय में एक पृष्ठभूमि पत्र संगोष्ठी में प्रस्तुत किया जाएगा। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सांस्कृतिक विभाग के प्रभारी निनु चपागाईं ‘दलित समस्या और सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आलेख प्रस्तुत करेंगे तथा श्रमिक मुक्ति दल (डेमोक्रेटिक), पुणे के डा. अनंत फड़के की ओर से ‘जातिवादी पदसोपानक्रम के भौतिक आधार के उन्मूलन के कार्यक्रम’ पर आलेख प्रस्तुत किया जाएगा। ग्लासगो विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड के प्रो. पॉल कॉकशॉट इंटरनेट लिंक के द्वारा अपनी प्रस्तुति देंगे और उनका आलेख ‘डा. अम्बेडकर या डा. मार्क्स’ प्रस्तुत किया जाएगा।

- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास
अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करेंः
कात्यायनी - 09936650658, सत्यम - 9910462009, नमिता (चंडीगढ़) - 9780724125
 चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी चंडीगढ में शुरू

Monday, March 11, 2013

चौथी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी 12 मार्च से चण्डीगढ़ में

‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ पर पांच दिवसीय संगोष्ठी
देशभर से आये विद्वानों और कार्यकर्ताओं के अलावा विदेशों से भी भागीदारी होगी
चंडीगढ़, 10 मार्च। ‘जाति प्रश्न और मार्क्सवाद’ विषय पर 12 मार्च से चंडीगढ़ में शुरू हो रही पांच दिवसीय संगोष्ठी में भारत में सामाजिक परिवर्तन से जुड़े इस अत्यंत महत्वपूर्ण साल पर गहन चर्चा होगी। संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों के प्रसिद्ध विद्वानों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ ही विदेशों से भी इस विषय पर काम करने वाले विद्वान भागीदारी करेंगे। 
बाबा सोहनसिंह भकना भवन (सेक्टर 29 डी, चंडीगढ़) में 12 से 16 मार्च तक चलने वाली संगोष्ठी के आयोजक ‘अरविन्द स्मृति न्यास’ की मुख्य न्यासी मीनाक्षी ने बताया कि जाति प्रश्न के तमाम पहलुओं को लेकर इतनी व्यापक और गहन चर्चा संभवतया पहली बार आयोजित की जा रही है। ख़ासतौर पर वामपंथी आंदोलन और मार्क्सवाद के साथ जाति के प्रश्न को जोड़कर इतने व्यापक फलक पर पहले कभी विचार नहीं किया गया है। 
संगोष्ठी में इस विषय के विभिन्न आयामों पर कुल 14 आलेख प्रस्तुत किये जायेंगे। संगोष्ठी का आधार आलेख ‘जाति प्रश्न और उसका समाधानः एक मार्क्सवादी दृष्टिकोण’ के अलावा पंजाबी पत्रिका ‘प्रतिबद्ध’ के सम्पादक सुखविन्दर ‘अम्बेडकरवाद और दलित मुक्ति’ पर, ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव ‘जाति का इतिहासलेखन’ पर, ‘वर्ग, जाति और अस्मितावादी राजनीति’ पर  दिल्ली विश्वविद्यालय की शिवानी, ‘पश्चिम बंगाल में जाति और राजनीति’ पर सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज, कोलकाता के प्रस्कण्वा सिन्हारे, ‘मार्क्सवादी परंपराओं में जाति और सेक्स’ पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डा. राजर्षि दासगुप्ता, ‘मार्क्सवाद और जाति प्रश्न’ पर दिल्ली के शोधकर्ता और ऐक्टिविस्ट असित दास, पहचान की राजनीति पर बी.आर. अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशांत गुप्ता, मार्क्स(वाद) तथा अम्बेडकर(वाद) की साझा प्रासंगिकता पर पंजाब के सुखदेव सिंह जनागल तथा जाति व पहचान की राजनीति की सीमाओं पर ‘जाति विरोधी आंदोलन’ के जयप्रकाश पेपर प्रस्तुत करेंगे।
इसके अलावा सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब की ओर से भारत में जाति के विषय में एक पृष्ठभूमि पत्र संगोष्ठी में प्रस्तुत किया जाएगा। एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सांस्कृतिक विभाग के प्रभारी निनु चपागाईं ‘दलित समस्या और सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आलेख प्रस्तुत करेंगे तथा श्रमिक मुक्ति दल (डेमोक्रेटिक), पुणे के डा. अनंत फड़के की ओर से ‘जातिवादी पदसोपानक्रम के भौतिक आधार के उन्मूलन के कार्यक्रम’ पर आलेख प्रस्तुत किया जाएगा। ग्लासगो विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड के प्रो. पॉल कॉकशॉट इंटरनेट लिंक के द्वारा अपनी प्रस्तुति देंगे और उनका आलेख ‘डा. अम्बेडकर या डा. मार्क्स’ प्रस्तुत किया जाएगा।
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में होने वाली चर्चा में प्रसिद्ध लेखक व चिंतक आनंद तेलतुंबड़े, प्रसिद्ध साहित्यकार व जेएनयू के प्रो. तुलसीराम, विख्यात समाजशास्त्री प्रो.सतीश देशपांडे, प्रसिद्ध लेखिका प्रो. (श्रीमती) विमल थोराट, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो.पी.के. विजयन एवं डा. सरोज गिरि, प्रसिद्ध कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता कात्यायनी, पीडीएफआई के अर्जुन प्रसाद सिंह, सीपीएन (एम) के वरिष्ठ सदस्य तिलक परिहार, नेपाली कवि एवं एक्जिटविस्ट संगीत श्रोता, नागपुर से नामदेव लाघवे, दिल्ली से डा. श्यामबिहारी राय तथा आदित्य नारायण सिंह, कोलकाता से अनंत आचार्य, रिपब्लिकन पैंथर्स, मुंबई से उत्तमराव जागीरदार व शरद गायकवाड, हिमाचल प्रदेश से हरगोपाल सिंह, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय से प्रो. मनजीत सिंह, जेएनयू से प्रो. चमनलाल, पंजाबी लेखक संतोख सिंह विरदी, मुंबई के पत्रकार विजय प्रकाश सिंह, लेखक अरविन्द शेष तथा जर्मनी के कलाकार एवं वाम सामाजिक कार्यकर्ता योहानेस पॉल रैठर आदि प्रमुख रूप से भाग लेंगे। इसके अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा एवं महाराष्ट्र के विभिन्न ग्रुपों एवं जनसंगठनों के प्रतिनिधि, लेखक-पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता संगोष्ठी में हिस्सा लेंगे।
सुश्री मीनाक्षी ने कहा कि जाति प्रश्न, विशेषकर दलित प्रश्न आज भी भारतीय समाज का एक ऐसा जीवन्त-ज्वलन्त प्रश्न है, जिसे हल करने की प्रक्रिया के बिना व्यापक मेहनतकश अवाम की एकजुटता और उनकी मुक्ति-परियोजना की सपफलता की कल्पना नहीं की जा सकती। इस प्रश्न पर लम्बे समय से संगोष्ठियाँ-परिचर्चाएँ होती रही हैं लेकिन इस गम्भीर ऐतिहासिक प्रश्न के हर पहलू पर गम्भीर शोध और पूर्वाग्रह-मुक्त लम्बी बहसों का अभाव रहा है। इस संगोष्ठी का मकसद इसी कमी को पूरा करना है।
‘दायित्वबोध’ पत्रिका के सम्पादक तथा प्रखर वामपन्थी क्रान्तिकारी कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी दिवंगत का. अरविन्द की स्मृति में अरविन्द स्मृति न्यास की ओर से होने वाली हर वर्ष भारत में सामाजिक बदलाव से जुड़े किसी अहम सवाल पर संगोष्ठी का आयोजन किया जाता है। पहली दो संगोष्ठियां दिल्ली व गोरखपुर में मज़दूर आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर हुई थीं जबकि तीसरी संगोष्ठी भारत में जनवादी अधिकार आंदोलन के सवाल पर लखनऊ में आयोजित की गई थी। इसी क्रम में चौथी संगोष्ठी के पंजाब में आयोजन का एक विशेष महत्व भी है क्योंकि यहां वामपंथी आंदोलन और जाति के प्रश्न का अपना विशिष्ट इतिहास रहा है। सुश्री मीनाक्षी ने विश्वास व्यक्त किया कि पंजाब के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता तथा विद्वान सेमिनार में होने वाले विचार-विमर्श में खुलकर हिस्सा लेंगे और विचारोत्तेजक बहस-मुबाहसे की पहले की तीन संगोष्ठियों की परम्परा को चंडीगढ़ में नया आयाम मिलेगा। 
- मीनाक्षी (प्रबन्ध न्यासी), आनन्द सिंह (सचिव)
अरविन्द स्मृति न्यास

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