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Sunday, July 21, 2019

बैंकों के राष्ट्रीयकरण को याद किया सेमिनार में

Jul 21, 2019, 3:05 PM
मौजूदा चुनौतियों की भी विस्तृत चर्चा की गयी
लुधियाना: 21 जुलाई 2019: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
बॉक्स की पंक्तियाँ सत्याग्रह से साभार 
कहा जाता है कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले का ज़माना एक ऐसा वक़्त था जिसमें आम इंसान बैंक के अंदर झाँकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता था। बैंक में लेनदेन बड़े लोगों का ही हुआ करता था। बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने आम इंसान को बैंकों की राह दिखाई। बाद में इस राह को भी धीरे धीरे मुश्किल बना दिया गया। न्यूनतम जमा राशि की रकम में वृद्धि जारी रही। निजीकरण की तरफ झुकाव सिलसिला तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरागाँधी की हत्या के बाद आई सरकारों के समय ही शुरू हो गया था जो अब चरम पर है। लेकिन इतिहास खंगाले तो ऐसी चर्चा भी सामने आती है कि सन 1969 से पहले भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण की शुरुआत हो चुकी थी और 1980 में भी इसने अपना जलवा दिखाया।
पंजाब बैंक कर्मचारी संघ का राज्य स्तरीय सेमिनार आज 21 जुलाई 2019 को पंजाब ट्रेड सेंटर, लुधियाना में आयोजित किया गया। राज्य के सभी कोनों के 600  से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह संगोष्ठी बैंक राष्ट्रीयकरण की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित की गई थी। डॉ आर एस घुम्मन, प्रोफेसर, सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (CRRID), चंडीगढ़, डॉ अनुपमा उप्पल, अर्थशास्त्र पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला के प्रोफेसर प्रमुख वक्ता थे। कॉम पी आर मेहता, अध्यक्ष, पीबीईएफ और महासचिव, एआईपीएनबीएसएफ, कॉम एस के गौतम, महासचिव, पीबीईएफ और संयुक्त सचिव, एआईबीईए  और कॉम अमृत लाल, अध्यक्ष पीबीईएफ  और महासचिव जेसीसी, एआईबीओबीईसीसी  ने भी बैंक कर्मचारियों को संबोधित किया।

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) ने सरकार के फैसले के मद्देनजर, पूरे सप्ताह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की रक्षा करने के लिये पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करके का निर्णय लिया। बैंकिंग सुधारों के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विनिवेश और निजीकरण की नीतियां, स्थिति का जायजा लेने के लिए और हमारे राष्ट्र के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के योगदान का मूल्यांकन करने के लिए, यह सेमिनार राज्य स्तर पर आयोजित किया गया। 
कमरेड एस के गौतम, महासचिव, ने सेमिनार का एजेंडा रखते हुए बताया कि यह उच्च स्तर पर बैंकिंग उद्योग की प्रगति और देश के विकास का मूल्यांकन करने का समय है। बैंकों की शाखायें राष्ट्रीयकरण करने के समय केवल 8200 थी जो अब 90765 है। ग्रामीण और अर्ध शहरी शाखाएँ पहले से मौजूद नहीं थीं, लेकिन अब 54872 हैं, प्राथमिकता क्षेत्र के ऋण नहीं दिए गए थे और अब 40% हैं। जमा केवल 5000 करोड़ रुपये थे और अब 127 लाख करोड़ रुपये हैं, ऋण केवल 3500 करोड़ रुपये थे, लेकिन अब 85 लाख करोड़ रुपये हैं। हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और इन्फ्रा संरचना का विकास केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का परिणाम था। दुर्भाग्य से, इन प्रशंसनीय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को मजबूत करने के बजाय, वर्तमान दिन के एजेंडे में बैंकों के निजीकरण और समामेलन जैसे बैंकिंग सुधारों को आगे बढ़ाना है।
कामरेड पी आर मेहता, अध्यक्ष ने अपने संबोधन में बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को विनिवेश के माध्यम से बड़े कॉरपोरेट को सौंपने का लक्ष्य है, जो बैंकों में खराब ऋण और भारी घाटे के लिए खुद जिम्मेदार हैं। लाभ का निजीकरण और नुकसान का राष्ट्रीयकरण कॉर्पोरेट नीति है। बैंक बड़े कारोबारियों के चंगुल में आते जा रहे हैं। हमारे बैंक कॉरपोरेट डिफाल्टरों की वजह से हुए नुकसान और रिकॉर्ड नुकसान से बने हैं। बैंक राष्ट्र के होते हैं। पैसा लोगों का है। इसलिए हमारा नारा है: 'लोगों के कल्याण के लिए लोगों का पैसा और कॉर्पोरेट लूट के लिए नहीं।' बैंकिंग सुधारों के सभी प्रतिगामी प्रयासों का विरोध करने और हमारे बैंकों को मजबूत करने वाली नीतियों के लिए लड़ने के लिए हर तंत्रिका को तनाव देना हमारा देशभक्ति कर्तव्य है।
प्रख्यात प्रोफेसर डॉ आर एस घुम्मन ने अपने प्रमुख नोट संबोधन में बैंकों के राष्ट्रीयकरण को बैंकिंग स्वतंत्रता कहा, जिसने न केवल उत्पादक उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक धन को चैनलाइज किया, बल्कि लोगों को धन उधारदाताओं के चंगुल से बाहर आने के लिए सशक्त बनाया। भारी उद्योग, सड़क, बिजली, रेलवे, संचार आदि सहित इंफ्रा संरचना का विकास केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ ही संभव था। केवल  यूएस फाइनेंशियल क्राइसिस के प्रभाव के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रभाव नहीं पड़ा। इसलिए पीएसबी के सार्वजनिक चरित्र में कमजोर पड़ने से हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और समावेशी विकास और विकास के खिलाफ जाएगा।
डॉ अनुपमा उप्पल ने अपने संबोधन में पंजाब बैंक कर्मचारी महासंघ को संगोष्ठी आयोजित करने के लिए बधाई दी क्योंकि बैंकों के राष्ट्रीयकरण की रक्षा के लिए जन जागरूकता पैदा करने के लिए उच्च समय है। राष्ट्र के विकास में पीएसबी के योगदान का बचाव केवल सार्वजनिक समर्थन जुटाकर किया जा सकता है जो सर्वोत्तम ग्राहक सेवा के साथ संभव हो सकता है। निजी बैंक केवल चयनात्मक और लाभदायक व्यवसाय कर रहे हैं,   जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्राथमिकता क्षेत्र में अग्रिम और बड़े पैमाने पर बैंकिंग कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रीयकृत बैंकों को हमारे राष्ट्र के विकास के लिए होना चाहिए।
कामरेड अमृत लाल ने संबोधित करते हुए कहा कि विलय और समामेलन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बंद करने के लिए और कदम हैं, जबकि सरकार का कहना है कि विलय बड़े बैंकों का निर्माण करना है। एसोसिएट बैंक के विलय के बाद भारतीय स्टेट बैंक की 7000 शाखाएँ बंद हो गई हैं और हजारों कर्मचारियों को समेकन के नाम पर वीआरएस दिया गया है। बैंक ऑफ बड़ौदा में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी, फिर बड़े बैंक कैसे बनाए जाएंगे? बैंकों का विलय निजीकरण की दिशा में एक और कदम है, इसलिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण को परिभाषित करना आवश्यक है।
कामरेड आरके वालिया, सीनियर उपाध्यक्ष, कामरेड रूप लाल मेहरा, कामरेड रवि राजदान, कामरेड पवन जिंदल, उपाध्यक्ष, कामरेड दलीप पाठक, संयुक्त महासचिव, कामरेड नरेश गौड़, कामरेड राजेश वर्मा, कामरेड के सी सरीन, उप महासचिव, कामरेड नरेश वैद, कामरेड जगदीश राय, कामरेड हरविंदर सिंह, संयुक्त सचिव,  कामरेड संजीव पराशर, कोषाध्यक्ष, कामरेड लवलीन कुमार, कामरेड दिनेश कुमार, कामरेड राम लाल,  कामरेड आर के जौली, सहायक सचिव  और अन्य प्रमुख नेता पंजाब बैंक कर्मचारी महासंघ भी सेमिनार में उपस्थित थे। 

Wednesday, December 28, 2016

सभी बैंकों को दी गई नई करेंसी का ब्यौरा सार्वजनिक किये जाने की मांग


Wed, Dec 28, 2016 at 3:26 PM
विमुद्रीकरण योजना से हुईं समस्यायों को लेकर बैंक कर्मी हुए गंभीर  
कहा: उठें और विरोध करें-आन्दोलनात्मक कार्यक्रम लागू करें
लुधियाना: 28 दिसम्बर 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):   और तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें 
बैंक मुलाज़िमों ने नोटबन्दी के खिलाफ अब अपना आंदोलन तेज़ कर दिया है। इस से पैदा हुई समस्यायों को छुपाने के लिए अब बैंक मुलाज़िमों और आम जनता को आपस में लड़ाने की साज़िश रची गई है। बैंक मुलाज़िमों का कहना है कि हम इस नापाक साज़िश को कामयाब नहीं होने देंगें। इन मुलाज़िम नेतायों ने ज़ोरदररोश प्रदर्शन के बाद मांग की कि निजी बैंकों और सार्वजनिक बैंकों को उपलब्ध कराई गई नई करेंसी का ब्यौरा जनता के सामने रखा जाये तांकि पूरा सच लोगों के सामने आ सके। 
मुद्दे और मांगें                      और तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें 
• सभी बैंकों और शाखाओं में पर्याप्त नकदी भेजा जाना सुनिशित किया जाये
• बिना किसी और देरी के सभी एटीएम को चालू किया जाये
• बैंकों को नकदी आपूर्ति में भेदभाव बन्द किया जाये
• बैंकों को नकदी की आपूर्ति में पारदर्शिता सुनिशिचत की जाये
• भारी पैमाने में नई करेंसी नोटों जो कुछ बड़े लोगों के पास प्राप्त हुए हैं पर सीबीआई की जांच की घोषणा की जाये क्योंकि शाखाओं में नकदी का अकाल है
• जनसामान्य, बैंक ग्राहकों और बैंक के उन स्टाफ को जिन्होंने हाल के विमुद्रीकरण कांड के कारण अपनी जान से हाथ गंवाया है, उनके परिवारों को क्षतिपूर्ति की जाये
विरोध कार्यक्रम                                 और तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें 
29 दिसंबर 2016  हमारी सभी यूनियनों द्वारा वित्त मंत्री, भारत सरकार को संबोधित पत्र
2 जनवरी 2017 बैज धारण करना
3 जनवरी 2017आरबीआई अथवा सभी प्रादेशिक राजधानियों और प्रमुख केन्द्रों में बैंक के सम्मुख धरना
आल इण्डिया बैंक इम्पलाईज़ एसोसिएशन एंव आल इण्डिया बैंक आफिसर्स एसोसिएशन के आहवान पर पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई) ने आज स्टेट बैंक आफ पटियाला, अंचलिक कार्यालय, मिल्लर गंज, लुधियाना के सामने जोरदार प्रदर्शन किया ।  कामरेड अशोक मल्हन, उप प्रधान एंव कामरेड राजेश वर्मा, उप प्रधान,पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना) ने बैंक कर्मचारियों को संबोधित किया । कामरेड प्रवीण मोदगिल, उप प्रधान एंव पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना) के अन्य नेता भी इस विरोध रैली में उपस्थित रहे । 
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए फैडेरेशन के नेताओं ने कहा कि 50 दिन से ऊपर बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों को कार्य के असाधरण द्बाव और मानसिक तनाव के अन्तर्गत रहना पड़ा है जोकि विमुद्रीकरण योजना को लागू करने के दौरान उन पर लद गया । जबकि हर कोई अपेक्षा कर रहा था कि चीजें सुधर जायेंगी और तय हो जायेंगी, नई समस्यायें उठ खड़ी हुईं और कर्मचारियों और अधिकारियों को निरन्तर ग्राहकों और जनता का प्रवाह झेलना पड़ा । यद्दपि आरबीआई बार-बार बयान दे रहा है कि बैंकों को पर्याप्त नकदी आपूर्ति की जा रही है, वास्तविक रुप से हम सभी कि पता है कि आरबीआई की ओर से बैंकों को नकदी की आपूर्ति में भारी कमी है । नकदी की कम आपूर्ति के कारण, बहुत से पुर्नसंयोजित एटीएम अधिकतर समय तक नकदीरहित रहे हैं । परिणामस्वरुप ग्राहकों को शाखा परिसर में नकदी आहरण के लिए प्रेरित कर रहा है जिससे शाखाओं में द्बाव बढ़ रहा है । इन सभी से यह जाहिर हो गया है कि यह सब कुछ बिना किसी तैयारी के किया गया ।  
प्रारम्भिक दिनों में उनके द्वारा किये गये असाधारण कार्य जोकि योजना के शुरुआती किनों में था, कार्य के घण्टों से बहुत देर तक शाम और रात्रि, कई बार मध्य रात्रि तक काम किया है, उसकी उचित क्षतिपूर्ति करने में टालमटोल दुख पैदा कर रहा है क्योंकि उन्होंने अपने सामान्य कार्य के घण्टों से अधिक कार्य किया है । विभिन्न बैंकों में विभिन्न दिशानिर्देश दिये गये हैं किन्तु उन्हें वो क्षतिपूर्ति भी नहीं दी जा रही है, जोकि द्विपक्षीय समझौते में अर्न्तनिहित है । अधिकारियों के मामले में भी, क्षतिपूर्ति एकरुप और सार्वभौम नहीं है । क्यों सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और उन्हें पर्याप्त मात्रा में नकदी नहीं दी जा रही ? आरबीआई की कार्यप्रणाली पारदर्शी क्यों नहीं है ? क्यों बैंक यह सुनिशिचत करने में असमर्थ है कि सभी एटीएम कार्य करें । कितने लम्बे समय तक यह एटीएम पुर्नसंयोजित हो सकेंगें ? 
क्या यह कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए अनुचित है कि वह न्यायोचित और उचित क्षतिपूर्ति की मांग करें अपने देर तक बैठने और रात्रि तक कार्य निपटाने के लिए ? हमने पहले ही सभी मुख्य केन्द्रों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित किये हैं एंव रिजर्व बैंक के लोकल अधिकारियों को स्मरण पत्र दिये हैं । रिजर्व बैंक द्वारा अभी भी कोई कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं और जन्ता एंव बैंक के स्टाफ की निरंतर समस्यायें बढ़ रही हैं । इसीलिए हमने विरोध करने का निर्णय लिया है । 
कुछ धनवान लोंगों के पास करंसी मिलने पर शक बैंक कर्मचारियों पर किया जा रहा है । ऐसा कुछ संभव नहीं हो सकता क्योंकि इतनी बड़ी मात्रा में धन निकालाने के लिए क्म्पूटर भी इज़ाजत नहीं देता । इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसे सभी मामलों की सीबीआई द्वारा जांच करवाई जाये ।      
उप प्रधान अशोक मल्हन ने इस अवसर पर कहा कि नोटबन्दी से पैदाहुईन समस्यायों से ध्यान हटाने के लिए बैंक कर्मियों और जनता को आपस में लड़ाने की साजिश नाकाम करना अब आवश्यक हो गया है। इस लिए लोगों को जागरूक होना चाहिए। और तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें 
कुछ लोगों ने यह भी सवाल किया कि निजी बैंकों और सार्वजनिक बैंकों को उपलब्ध कराई गई नई करेंसी का ब्यौरा जनता के सामने रखा जाना चाहिए। और तस्वीरें देखने के लिए यहां क्लिक करें 

Friday, July 29, 2016

जनविरोधी बैंकिंग सुधारों का नाश हो--हड़ताली बैंक मुलाज़िमों का श्राप

भारी बारिश भी नहीं रोक पायी बैंक मुलाज़िमों का जोश 
लुधियाना; 29 जुलाई 2016:(पंजाब स्क्रीन ब्यूरो);
यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स के आहवान पर, एक मिलीयन बैंक कर्मचारी एवं अधिकारी आज जनविरोधी बैंकिंग सुधारों के विरुद्ध एक दिवसीय अखिल भारतीय हड़्ताल पर हैं । निर्णय के अनुसार, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स (लुधियाना इकाई) ने केनरा बैक, भारत नगर चौंक, लुधियाना के सामने जोरदार प्रदर्शन किया । कामरेड नरेश गौड़, संचालक, यूनाईटेड फारम आफ बैंक यूनियन्स, कामरेड पवन ठाकुर, प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई), कामरेड संजय शर्मा, उप प्रधान, आल इण्डिया बैंक आफिसर्स कन्फैडेरेशन, लुधियाना अंचल, कामरेड जे पी कालड़ा, प्रधान, स्टेट बैंक आफ इण्डिया आफिसर्स एसोसिएशन, कामरेड इकवाल सिंह, सहायक महा सचिव, स्टेट बैंक आफ इण्डिया स्टाफ एसोसिएशन, कामरेड डी पी मौड़, महा सचिव, ज्वाईंट काउंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स ने बैंक कर्मचारियों एवं अधिकारियों को संबोधित किया । इस अवसर पर कामरेड अशोक मल्हन, कामरेड राजेश वर्मा, उप प्रधान, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन (लुधियाना इकाई) एवं कामरेड प्रवीण मोदगिल, संचालक, वूमैन सैल, पंजाब बैंक इम्पलाईज़ फैडेरेशन भी उपस्थित रहे ।     

बैंक कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कामरेड नरेश गौड़ ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि सरकार  बैंकिंग सुधार उपायों को एक प्रकार से अथवा दूसरे रुप में आगे बढाना चाहती है इसके पीछे मौलिक विचार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग को कमजो़र करना तथा छिन्न-भिन्न कर देना है और निजी क्षेत्र की बैंकिंग को बढ़ावा देना है हम निरन्तर ऐसी योजनाओं से लड़्ते रहे हैं हमने संघन अभियान, आन्दोलन, संघर्ष और हड़ताली कार्यवाहियाँ इस सभी उपायों के विरुद्ध खड़ी की है हम वास्तविक रुप से गर्व अनुभव कर सकते हैं कि इस सभी लगातार प्रयासों के कारण जिस गति से इन सुधार कार्यक्रमों का प्रस्ताव लागू करने के लिए किया गया था उस पैमाने पर नहीं लागू हो सके किन्तु हम जानते हैं कि सरकार अपने पंजों के बल अपनी कार्यसूची को किसी भी प्रकार लागू करने के लिए खड़ी है
सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय के लिए भी घोषणा की है पहले ही आरबीआई ने काँर्पोरेट एवं औद्दोगिक घरानों को लाईसैंस देने की योजना की घोषणा की है आरबीआई ने इससे आगे लघु निजी बैंकों और भुगतान बैंकों की स्थापना के लिए भी दिशानिर्देश जारी कर दिये हैं अत: यह हमारे बैंकिंग क्षेत्र को अधिक से अधिक निजी हाथों में देने का एक ठोस प्रयास है  बैंकिंग उद्दोग में हमें पहले ही पता है कि सरकार अपने कथित सुधारों के निरंतर प्रयास आगे बढ़ा रही है, जिसकी कार्य सूची में प्राथमिकता के आधार पर बैंकों का निजीकरण सुदृढ़ीकरण और विलय आदि है । अधिक से अधिक निजी पूंजी और सीधे विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया  जा रहा है । क्षेत्रिय ग्रामीण बैंकों के निजीकरण का प्रयस चल रहा है और इस संदर्भ में हमारी यूनियनों के विरोध के बावजूद संसद में इस संदर्भ में विधेयक पारित कर दिया गया है । प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों में (पीएसी) समेटे जाने के खतरे में है । शहरी साहकारी बैंक लाईसेंस समाप्त किये जाने के खतरे   में हैं। निजी क्षेत्र के कार्यकारियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों में थोपा जा रहा है । बिना किसी ढांचागत सुविधा और कर्मचारियों के बढाए सरकारी नीतियों को सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों पर थोपा जा रहा है । बैंक अधिकारियों को काम के नियमित घंटों से वंचित किया जा रहा है । स्थाई और नियमित कार्यों को ठेका आधार पर आउट्सोर्स किया जा रहा है और ठेका कर्मचारियों का शोषण किया जा रहा है । सरकार अपनी कार्य सूची पर आगे बढ़ रही है और श्रम संगठनों से बिना समुचित विचार विमर्श किये बिना श्रम कानूनों को संशोधित करेगी ।      

बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों के नाम पर, बैंकों के निजीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं जिससे कि उन्हें निजी कार्पोरेटों के हाथों सौंपा जा सके जिससे वह जनता की बहुमूल्य बचत को और लूट सकें । बैंकों के एकीकरण का प्रयास, उन्हें बड़ा बनाने और उन्हें वैश्वीकृत करने का है जबकि बैंकों का विस्तार और जन सामान्य तक उनकी पहुंच बढाना अधिक आवशयक था ।  पहले ही हमारे बैंक खराब ऋणों की खतरनाक वृद्धि के कारण लहूलुहान हैं, कार्पोरेटों तथा बड़े व्यवसायियों के जानबूझकर चूक करने के कारण ऐसा है । अपराधियों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने और ऋणों की वसूली के स्थान पर, प्रयास किये जा रहे हैं कि उन्हीं चूककर्ताओं को बैंक सौंप दिये जायें । यह बहुत ही स्पष्ट है कि उनके बैंकिंग सुधारों की सभी बातें और विलय तथा एकीकरण के प्रस्ताव केवल एक हथकण्डा और खेल का तरीका है जिससे कि लोगों का ध्यान इस बड़े पैमाने पर बैंकों के खराब ऋणों से हटाया जा सके ।  हमारे देश की आवश्यकता एक सुदृढ़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं न कि अनावशयक रुप से बड़े बैंक जिनका वैशिवक आकार हो । हमारे देश की आवश्यकता बैंकिंग के विस्तार की है न कि बैंकों का एकीकरण और जनता के लिए बैंकिंग सेवाओं का संकोचन की । खराब ऋणों की चिन्ताजनक वृद्धि जो कि लगभग 13 लाख करोड़ तक पहुंच गये हैं पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए । कठोर कदम उठाकर उस धन को वापस लेने के प्रयास किये जाने चाहिए न कि हड़बड़ी में प्रावधानों, बट्टे खाते डालने, सीडीआर तथा एसडीआर के माध्यम से ढकने के ।

यदि ऋण खराब रुप से मंजूर किये गये हैं, सम्बंधित कार्यकारियों पर कार्यवाही की जानी चाहिए । यदि कर्जदारों ने बैंक को छला है, तो चूककर्ता के विरुद्ध फौज़दारी मामला लागू करना चाहिए ।  खराब ऋणों के लिए प्रावधान करना, तुलन पत्र को साफ सुथरा बनाना और बैंकों को फिर घाटा देने लायक बना देना समस्या का समाधान नहीं है । यह स्पष्ट है, ये सभी बड़े खराब ऋणों के लिए जवाबदेही से बचने केलिए केवल बंटाने की रणनीति है । किंगफिशर माल्या हिम्शिला का केवल शिखर है । बैंकों में खराब ऋणों के सागर में बहुत अधिक शार्क हैं । क्यों चूककर्ताओं की सूची उनके द्वारा प्रकाशित नहीं की जा रही है? क्यों आपराधिक कार्यवाही जानबूझकर कार्पोरेट चूककर्ताओं पर नहीं की जा रही है? क्यों उन सभी के साथ मखमली व्यवहार किया जा रहा है? क्यों इन चूककर्ता कम्पनियों में इक्विटी निवेश के रुप में खराब ऋणों को बदलने के प्रयास हैं । क्या यह सरकार की कार्पोरेट शासन प्रणाली तथा सुशासन प्रणाली नीति है? आडीबीआई बैंक में, 10 वर्ष पूर्व, लगभग रुपए 9000  करोड़् के खराब ॠण उनकी किताबों से बाहर कर दिये गये । अब पुन: रुपए 19000 करोड़ के खराब ऋण हैं । इन खराब ऋणों की वसूली की कार्यवाही करने के स्थान पर, सरकार बैंक का निजीकरण कर उन्हीं निजी क्षेत्र के हाथों में बेच देना चाहती है जो कि आईडीबीआई बैंक में इन सारी तादाद चूक के लिए जिम्मेदार हैं।