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Sunday, January 26, 2014

मानवाधिकारों की चर्चा कर रहे हैं मनीराम शर्मा अपने विशेष आलेख में

Sun, Jan 26, 2014 at 8:35 AM
उचित विश्राम व समय पर भोजनादि भी मानवाधिकार हैं
आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08/09/2010 से 10/09/2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व  लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था|  दिनांक  08/09/2010 को  श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा , श्री कनकजी  और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके  घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जोकि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता है| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने  महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े  और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह  जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया|  उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियों भी दी|  
उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया जो आगे आयकर महानिदेशक (अनुसंधान ) को भेज दिया गया | अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18/04/2011 को सुना गया| 
आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने  शिकायत में वर्णित आरोपों  दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया|  शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से  भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार , विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   
सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया  जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की  जा सकती  लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी  चाहिए|
आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08/09/2010 को प्रात: 9:30 बजे  शुरू और दिनांक 10/09/2010 को  रात्रि 9.20 बजे  पर संपन्न हुई  है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा  धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी  श्री सौरभ कुमार  ने दर्ज किया है कि उससे  खाताबहियाँ  आदि पेश  करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है| 

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 9.9.10 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के  बुनियादी मानव अधिकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता  है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए  और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए था| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा / या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानव अधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक ​​कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित  नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि  बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही  जारी रखते  हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक  मुआवजा पाने का अधिकारी  है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन  माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|


हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक स्वयम ने यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की  एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|   

Tuesday, December 03, 2013

INDIA: चुनावी राजनीति में कहाँ गुम हो गए बच्चों के हक के सवाल?

Tue, Dec 3, 2013 at 7:53 PM
An Article by the Asian Human Rights Commission                    प्रशांत कुमार दुबे
आजकल मध्यप्रदेश के चुनावी समर में कुपोषण एक बार फिर प्रमुख चुनावी मुद्दा है| बच्चों के गुमशुदा होने का मुद्दा भी राजनीतिक दलों को रिझा रहा है| बच्चों की शिक्षा वैसे आजकल चर्चा में तो नहीं है लेकिन घोषणा पत्रों और विज्ञापनों का हिस्सा जरूर बन गई है| इसे एक नजर से ऐसे भी कहा जाए कि बच्चे अभी मुख्यधारा में आ गये हैं, लेकिन वास्तव में एसा नहीं है| बच्चों पर काम करने वाले संगठनों ने अपना एक घोषणा पत्र बनाया और उसे उन्होंने राजनीतिक दलों के सुपुर्द किया| राजनीतिक दलों ने आज की कट कापी पेस्ट तकनीक को अपनाया और कई मुद्दों को अपने घोषणा पत्रों में जगह दी| इससे बच्चों के मुद्दे घोषणापत्रों में तो आ गये लेकिन वे वास्तव में हलचल नहीं मचा पा रहे हैं| सभी अपनी जगह खुश होते नजर आ रहे हैं| संस्थाएं/संगठन अपनी पीठ इस बात पर थपथपा रही हैं कि हमारे मुद्दे घोषणा पत्रों में आ गए हैं और पार्टियां भी अपनी पीठ थपथपा रही हैं कि हमने सभी वर्गों के मुद्दों को अपने घोषणा पत्रों में जगह दी है |
पिछले चुनाव 2008 को ही देखें तो हम पाते हैं कि राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में बच्चों के लिए ना तो वायदों की ही कमी थी और ना ही घोषणाओं की| पर स्थिति में बदलाव नहीं हुआ और इस बार भी कमोबेश कुपोषण एक चुनावी मुद्दा है| सवाल यह है कि क्या बच्चों की भूख और कुपोषण के सवाल घोषणा पत्रों में सजाने के लिए हैं या उनसे कोई सरोकार भी है| राष्ट्रीय पोषण संस्थान के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 51 फीसदी बच्चे कम वजन के पाए गए, इसके सीधे मायने है कि प्रदेश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। इनमें से भी 8 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित पाए गए हैं। हर साल लगभग 1,25,000 शिशु अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं| शिशु मृत्यु दर में प्रदेश पिछले 10 वर्षों से अव्वल नम्बर पर है, जबकि 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की दर भी बहुत अधिक है| 5 वर्ष तक के बच्चों में टीबी के प्रकरण भी बढते जा रहे हैं और इससे कुपोषण का सीधा सम्बन्ध है।
यही नहीं पिछले 10 वर्षों में शिक्षा के मोर्चे पर भी मध्य प्रदेश के हाल खराब है| शिक्षकों की कमी के मामले में प्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर हैशिक्षा के अधिकार कानून के मानकों के आधार पर देखा जाये तो म.प्र. में 42.03 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। बाल श्रमिकों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है लेकिन प्रदेश सरकार के पास आज तक कोई भी आंकड़े नहीं है| प्रदेश में एक और लाडलियों के पक्ष में सुर आलापे किये जा रहे हैं लेकिन दूसरी और लिंगानुपात गिर गया है| आज प्रदेश में लिगानुपात गिरकर 6 वर्ष तक की उम्र में 918 रह गया है| प्रदेश में लड़कियों के लगातार गायब होने के मामले आ रहे हैं,उन्हें बेचा जा रहा है| पिछले 10 साल में 86170 बच्चे गायब हुए हैं और उनमें से 15432 बच्चे अभी तक नहीं मिले हैं और उनमें से 75 फीसदी लडकियां हैं|
यानी बच्चों के मुद्दे तो जस के तस है बस उन्हें सजाने का काम जारी है| सत्तारूढ़ दल बच्चों को मामा बनकर लूट लेता है और विपक्ष मामा बनाकर| बच्चे जब चाहे मुद्दे बनते हैं और जब चाहे बिसार दिए जाते हैं| जब बच्चों को सहभागिता का अधिकार है तो फिर राजनैतिक दल क्यों नहीं बच्चों से पूछे कि तुम्हारी जरुरत क्या है, तुम्हारे सवाल क्या हैं? और यदि इन सवालों को हल कर दिया जाये तो फिर तुम्हारे मम्मी-पाप, भाई बहन हमें वोट करें| पर हमारा ढांचा ही ऐसा है कि बच्चे परिवार से लेकर समाज और बड़े राजनीतिक धरातलों पर भी हमेशा से किनारे कियी जाते रहे हैं| यह कहानी केवल मध्यप्रदेश की नहीं है बल्कि पूरे देश में यही राजनीतिक माहौल है| बच्चे राजनीतिक धुरी के केंद्र में नहीं हैं|
बच्चों को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जाता है क्योंकि वे मतदान नहीं कर सकते हैं| बच्चे विचार के और प्राथमिकता के केंद्र में नहीं है इसका अंदाजा केवल घोषणा पत्रों से नहीं बल्कि इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रदेश में बजट आवंटन में से केवल 15-17 फीसदी बजट ही बच्चों के लिए है| इस बजट में से भी बाल सुरक्षा पर केवल 1 प्रतिशत बजट ही है| यह बजट भी पिछले एक दो सालों में निरंतर घट रहा है| यही नहीं यदि हम विधानसभा के अंदर देखें तो हम पाते हैं कि 13वीं विधानसभा में पूछे गए कुल 2100 प्रश्नों में से बच्चों से जुड़े मुद्दों पर केवल 44 प्रश्न ही किये गए हैं| यानी यह प्रतिशत कुल प्रश्नों का 2 फीसदी ही है| इसमें से भी बाल सुरक्षा को तरजीह नहीं दी गई है, केवल 3 प्रश्न पूछे गये हैं|
इस चुनावी माहौल में अभी बीच में बाल दिवस भी गुजरा है| राजनैतिक दल चाहते तो इस दिन बच्चों के मुद्दों पर अलग से बाल संसद लगाते और उनके मुद्दों पर बात होती| लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| पर पप्पू और फेंकू के इस राजनैतिक युग में उन्हें छोटू की चिंता कहाँ ?? बाल अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते के भी इस वर्ष 24 साल पूरे हो गए हैं और यह दिन भी इसी चुनावी दंगल के बीच आया है लेकिन उस पर भी कोई बैचैनी नहीं दिखी| पूरी कायनात जिसमें कि राजनैतिक दलों के लोग भी शामिल हैं, सचिन के 24 साल के खेल पर वक्तव्य देते नहीं थक रहे हैं, वे बाल अधिकार समझौते के 24 वर्ष पूरे होने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं|
इस पूरे मसले पर मीडिया भी अलग से बच्चों के मुद्दों को देखने की पहल नहीं करती हैं| किसी भी अखबार ने इन चुनावों में अपना कोई अलग पन्ना बच्चों के मुद्दों को समर्पित नहीं किया है| ना ही किसी चेनल ने कोई बहस इन मुद्दों पर छिड़वाई| केवल दूरदर्शन ने ही इस मुद्दे पर बहस छेड़ी क्योंकि वह उसकी नैतिक बाध्यता है| नोबल पुरस्कार विजेता ग्रेबिल मिस्ट्राल ने लिखा है कि हम अनेक भूलों और गलतियों के दोषी हैं और उसमें भी हमारा सबसे बड़ा अपराध है बच्चों को उपेक्षित छोड़ देना | अफ़सोस कि यह हम आज भी कर रहे हैं|
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About the Author: Mr. Prashant Kumar Dubey is a Rights Activist working with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bhopal, Madhya Pradesh. He can be contacted at prashantd1977@gmail.com 
About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Monday, November 11, 2013

आया था रोज़ी रोटी कमाने लेकिन जान से भी हाथ धो बैठा

वेतन मांगने पर हुई पिटाई से गई जान:मामला दर्ज           Update:11 Nov 2013 at 11:00
तस्वीर में ऊपर वारदात  के बाद फैक्ट्री का बंद दरवाज़ा और दूसरी तरफ सदमे की हालत में मृतक नवयुवक  सोनू की मामी दीपा और  नीचे मीडिया को जानकारी देते हुए सोनू का मामा सिकंदर यादव और साथ ही आप देख रहे हैं मृतक सोनू का चेहरा (Photo:Rector Kathuria)
लुधियाना : 11 नवंबर 2013: (रेकटर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन): रविवार को लोग काम से छुट्टी करके आराम करते हैं या फिर मौज मस्ती लेकिन सोनू नाम का एक नवयुवक काम की जगह पर हुई वहिशियाना पिटाई के कारण जान से हाथ धो बैठा। उसका कसूर केवल यह था कि उसने छुट्टी का दिन होने के कारण काम भी किया था और काम के बाद अपनी तीन महीने की तनखाह भी मांग ली थी। ये पैसे उसने अपने घर जाकर अपने माँ बाप को देने थे और बताना था कि अब मैं कमाने लायक हो गया हूँ इसलिए अब रोटी की  चिंता मत करें।   रोज़ी रोटी की तलाश  उसे बिहार से उठा कर पंजाब ले आई थी।  लुधियाना की एक फेक्ट्री में वह दिन भर काम करता और रात को अपने मामा के यहाँ चला जाता। जब पिटाई होने की खबर उसकें साथियों ने उसके मामा मामी को जा कर दी तो वे दोनों भी उसे छुड़ाने के लिए वहाँ फेक्ट्री में चले गए। वहाँ जा कर देखा कि फेक्ट्री का मालिक और कुछ और लोग उसे बेतहाशा पीटे जा रहे हैं। छुड़वाने की कोशिश करने पर उन लोगों ने मामा मामी कि भी पिटाई कर दी। मामी चोट और सदमे से बुरी हालत में है।  वह मुआवज़ा नहीं मौत के बदले मौत मांग रही है।
इसी बीच पुलिस ने इस सारे मामले  की पुष्टि करते हुए बताया कि दस नवंबर को ही दफा 302/34 के अंतर्गत फैक्ट्री मालिक  सिंह और मारपीट में  साथ वाले लोगों के खिलाफ मुकदमा  नंबर 169  दर्ज कर लिया गया था।

Monday, March 11, 2013

INDIA: (मनरेगा 3)// सचिन कुमार जैन

An Article by the Asian Human Rights Commission
केन्द्रीय नियमों के आधार पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना का क्रियान्वयन  

नियमों के प्रभाव–2 फरवरी 2006 को जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून लागू किया गया था, तब यह अहसास तो था कि इस क़ानून को लागू करना आसान न होगा. कारण था एक बहुत बुनियादी किन्तु जवाबदेय व्यवस्था की गैर-मौजूदगी. सोच बहुत महत्वाकांक्षी थी. कुछ लोग इस क्रांतिकारी भी मानते थे, क्योंकि इस दौर में जबकि राज्य नागरिकों के प्रति अपने मूल कर्तव्यों से विमुख हो रहा था, तब सरकार ग्रामीणों को 100 दिन के रोज़गार की कानूनी गारंटी देने का क़ानून बना रही थी. जन संस्थाओं और लोक अधिकार संगठनों ने इसमें बहुत रचनात्मक और सक्रीय भूमिका निभाई थी. अगर आप स्वतंत्र भारत में बने तमाम कानूनों की भाषा के नज़रिए से पढ़ें तो हमारा दावा है कि इस क़ानून और इसकी मार्ग निर्देशिका की भाषा सबसे सरल और स्पष्ट मानी जा सकेगी. यह एक मांग आधारित कार्यक्रम है, यानी लोग काम मांगेंगे तो उन्हे काम का अधिकार मिलेगा; परन्तु शुरुआत में काम मांगने, पावती देने जैसे नियमों पर ज्यादा ठोस काम नही हुआ क्योंकि सरकार मान रही थी यदि इस प्रावधान का पालन किया तो शायद एक भी ग्रामीण काम का हक़ मांगने न आएगा क्योंकि भारत की व्यव्स्था से यदि सबसे ज्यादा कोई नाउम्मीद हुआ है, तो इस देश के गाँव के लोग! वर्ष 2009 तक अनुभवों पर नज़र रखी गयी. सबसे सामान्य आंकलन यही निकल कर आया कि इस नए रोज़गार क़ानून में क्रियान्वयन के सन्दर्भ में व्यवस्था में नीति बनाने वाले तंत्र से लेकर अफसरान और जनप्रतिनिधि तक कोई जवाबदेय नही रहा है. तब 2009-10 से इस क़ानून को नियम के नज़रिए से लागू करने की कोशिशें शुरू हुई. यही वह समय भी था जब नीति बनाने वालों और देश की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले यह तर्क देने लगे थे कि हम 30-40 हज़ार करोड़ रूपए नाली में फेंक रहे हैं. अब चुनौती थी मनरेगा को एक व्यवस्था के तहत लाना.
आज की स्थिति में जब नियमों को लागू करने की बात हो रही है तो पता चल रह है कि हमारे यहाँ सरकार में वित्तीय आडिट की व्यवस्था नही है. केंद्र सरकार का नियम है कि जिलों को नई किश्त तभी जारी की जायेगी जब वे अपने पास उपलब्ध पूर्व की किश्तों का 60 फ़ीसदी हिस्सा खर्च कर लेंगे और इतनी ही कामों की जानकारी सूचना प्रबंधन प्रणाली (एम्आईएस) में दर्ज कर देंगे. भारत सरकार की वेबसाईट पर मंडला जिले की जानकारियों को अपलोड करने के लिये इंटरनेट की 100 मेगा बाईट प्रति सेकेण्ड की गति चाहिए होती है, जो मंडला को न मिल पायी और वह एम्आईएस में जानकारी दर्ज करने में पिछड़ता गया.
कामों का पूरा होना – मनरेगा के तहत शुरू हुए काम क्या अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सके? हम यह देख चुके हैं कि एक वित्तीय वर्ष में शुरू किया गए काम दूसरे या तीसरे वित्तीय वर्ष में जाकर पूरे हो रहे हैं, जिनसे ग्रामसभा समुदाय के स्तर पर निगरानी नहीं हो पा रही है. भारत सरकार ने निर्देशित किया है कि पूर्व ने शुरू किये गए कामों को पहले पूरा किया जाए और उनके पूर्णता प्रमाणपत्र जारी किये जाएँ. किसी भी काम के पूर्ण प्रमाणपत्र तभी जारी किये जा सकते हैं जब वे भौतिक रूप से पूरे हो जाएँ और मजदूरी का पूरा भुगतान हो जाए. लालपुर में इस साल 5 काम भौतिक रूप से पूरे हो चुके हैं, पर उनमे मजदूरी का भुगतान शेष हैं, जिससे उन्हे पूर्णता प्रमाणपत्र जारी न किया जा सकेगा. इसी तरह चूंकि जिले में लगभग आठ लाख मानव दिवसों की मजदूरी का भुगतान शेष है, इसलिए भारत सरकार का यह नियम व्यवस्था को पटरी पर आने से रोकने वाला है. मनरेगा एम्आईएस के मुताबिक मंडला में वर्ष 2008-09 में 67.78 प्रतिशत और 2011-12 में 67 प्रतिशत काम पूर्ण हुए थे. ताज़ा साल में यानी 13 जनवरी 2013 तक केवल 35.8 प्रतिशत काम की पूर्ण हुए हैं. बीजाडांडी में इस साल केवल 14.28 प्रतिशत और निवास में 13.22 प्रतिशत काम ही पूर्ण हुए हैं. मवाई विकासखंड में एक भी काम पूरा नही हुआ. मध्यप्रदेश की स्थिति मंडला की स्थिति अलग नही है. वर्ष 2008-09 में मध्यप्रदेश में 75 फ़ीसदी काम पूरे हो गए थे, वर्ष 2011-12 में 48 प्रतिशत काम पूरे हुए और इस साल स्थिति और नीचे आ गयी. इस साल 25 प्रतिशत काम ही पूरे हुए. यदि भारत सरकार कामों के पूरा होने की शर्त पर कायम रहती है तो मध्यप्रदेश का आर्थिक संकट बरकरार रहने वाला लगता है.
वित्तीय आडिट की व्यवस्था – केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा के तहत जारी की गयी राशि का पूरा उपयोग किया गया या नहीं, यह स्वतंत्र वित्तीय आडिट से स्पष्ट होता है. भारत सरकार इस पक्ष पर अब सख्त है कि हर पंचायत का नियमित आडिट हो, परन्तु इस व्यवस्था को एक सही आकार लेना अभी शेष है. लालपुर और लावर मुडिया पंचायतों के सामने संकट यह है कि वे खुद तो अपने खर्चे का वित्तीय आडिट नहीं करवा सकती हैं. आडिट एजेंसियों के बारे में राज्य स्तर पर निर्णय लिया जाता है. वर्ष 2011-12 के आडिट के लिये राज्य सरकार ने आडिटर का चयन ही अक्तूबर 2012 मे किया, जबकि नियम अनुसार 30 सितम्बर तक आडिट की रिपोर्ट अनिवार्य रूप से भारत सरकार को प्रेषित कर दी जाना चाहिए थी. परिणाम स्वरुप केंद्र सरकार से जरूरी राशि मिलने में बाधा आने लगी. आज मंडला जिले में सरकार को 9 लाख मानव दिवसों की लगभग 10 करोड़ रूपए की मजदूरी और लगभग 10 करोड़ रूपए के सामग्री के बिलों का भुगतान करना है, परन्तु उन्हे यह राशि नहीं मिल रही है. बडवानी जिले में आडिट का काम 17 सितम्बर को शुरू किया गया. वहां 106 पंचायतें ऐसी थी, जिनका वर्ष 2006 से किसी न किसी वर्ष आडिट ही लंबित था. वहां वन विभाग ने मनरेगा से बजट लिया पर चार साल तक आडिट नही करवाया. अब चूंकि मध्यप्रदेश में इस योजना के तहत आडिट की परंपरा ही विकसित नही हो पायी इसलिए वर्ष 2006-07 से अब तक 5000 पंचायतों के अलग-अलग वर्षों के आडिट नही हो पाए. इसी दौर में पंचायतों के अलावा अन्य क्रियान्वयन एजेंसियों, जैसे वन विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग आदि ने मनरेगा का बजट तो ले लिया पर 4-4 सालों से आडिट नहीं करवाए. ये एजेंसियां भी सामाजिक अंकेक्षण से दायरे से लगभग बाहर ही हैं. इससे लगभग 500 करोड़ रूपए की राशि का अधिकृत हिसाब ही नहीं मिल पा रहा है. ताज़ा स्थितियों में यह विश्लेषण करने की जरूरत भी है कि हम नियमों के मुताबिक़ केवल ढांचे बनाने पर ध्यान केन्द्रित न करें. हम योजना के बेहतर क्रियान्वयन की कोशिश के दौरान आ रही दिक्कतों का सही विश्लेषण करें. उन्हें केवल शासकीय कार्यालय तक सीमित रखेंगे तो ग्राम सभा के सदस्यों को कभी पता नही चल पायेगा कि समस्या के कारण क्या हैं? और सरकार–समाज के बीच अविश्वास की खाई बढती जायेगी. नियम बनाने और उन्हे लागू करने का काम भी लोगों की सहभागिता से ही होना चाहिए.
*This is the third article in an article series confronting with the issues plaguing the implementation of MNREGA in India.
About the Author: Mr. Sachin Kumar Jain is a development journalist, researcher associated with the Right to Food Campaign in India and works with Vikas Samvad, AHRC's partner organisation in Bophal, Madhya Pradesh. The author could be contacted atsachin.vikassamvad@gmail.com Telephone: 00 91 9977704847
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About AHRC: The Asian Human Rights Commission is a regional non-governmental organisation that monitors human rights in Asia, documents violations and advocates for justice and institutional reform to ensure the protection and promotion of these rights. The Hong Kong-based group was founded in 1984.

Wednesday, March 06, 2013

मनरेगा 2: कुछ कठोर सीखें//सचिन कुमार जैन

An Article in Hindi by the Asian Human Rights Commission India:
नियोजन यानी योजना और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा 2)
Courtesy Photo: Punjab Kesari
केवल अपेक्षा ही नहीं थी बल्कि उम्मीद भी थी कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना न केवल गाँव के लोगों को रोज़गार का अधिकार देगी, बल्कि हमारी चरमराती शासन व्यवस्था (गवर्नेंस) को भी एक ठोस आधार देगी. यही वह क़ानून भी है, जिसने गाँव को यह अधिकार दिया कि वे अपनी योजना और बजट बनाएंगे, वे अधोसंरचनात्मक विकास की अपनी खुद की प्राथमिकताएं तय करेंगे, निगरानी करेंगे कि 
तय योजना के मुताबिक़ काम हो, किसी के अधिकार का हनन न हो, भेदभाव न हो. पहली बार सामाजिक अंकेषण को कानूनी रूप दिया गया. पर मंडला जिले की लावर मुडिया पंचायत के अनुभव हमें कुछ कठोर सीखें दे रहे हैं. वर्ष 2011-12 और वर्ष 2012-13 में इस पंचायत ने 364 जाब कार्डधारियों के आधार पर 56-56 लाख रूपए का बजट बनाया और योजना तय की, परन्तु इन दोनों ही वर्षों में यह पंचायत 20 से 22 लाख रूपए की राशि ही खर्च कर पायी और आधे से ज्यादा काम अधूरे रहे. यह विश्लेषण नहीं किया गया कि आखिर योजना बनाने में कहीं कोई गड़बड़ी है या क्रियान्वयन में. और इसके बाद भी वर्ष 2013-14 के लिये जो नई योजना बनायी गयी है उसका बजट है 80 लाख रूपए.

हम जानते हैं कि लावर मुडिया सरीखी हज़ारों पंचायतों के बजट के आधार पर ही देश का आर्थिक नियोजन होता है, और जब पंचायतें स्वीकृत बजट में से 45 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च कर पायें तब यह अनुमान लगाना आसान है कि राष्ट्रीय बजट के स्तर पर इसके क्या विसंगतिपूर्ण प्रभाव हो सकते हैं. मैं यह कतई नही कहना चाहता हूँ कि पंचायतों और ग्राम सभा की नियोजन पद्धति में कोई लाइलाज खोट है, परन्तु यह सवाल जरूर है कि मनरेगा को लागू होने के आठ साल बाद भी क्या हम पंचायतों और ग्राम सभा को नियोजन की क्षमता से वाकिफ नही करा पाए हैं. मध्यप्रदेश ने वर्ष 2012-13 के लिये यह आंकलन किया था कि 1960 लाख मानव दिवस श्रम पैदा किया जाएगा. राज्य योजना के मुताबिक दिसम्बर 2012 तक यानी 9 माह में 1486 लाख मानव दिवस श्रम पैदा किया जाना था, वास्तविक स्थिति के मुताबिक दिसंबर 2012 तक कुल 760 लाख मानव दिवस श्रम ही पैदा किया जा सका है.

लालपुर के तिन्सई गाँव की कहानी कह रही है सरकार व्यवस्था बना रही है, पर लोगों का व्यवस्था में से विश्वास टूट रहा है. यहाँ की निगरानी समिति से सदस्य और दमखम से बात कहने वाले शंकर सिंह मरावी कहते हैं हम गाँव के लोगों ने कई बार एक साथ बैठ कर रेडियो पर यह सुना है कि भारत सरकार ने हमारे गाँव के लोगों को रोज़गार की गारंटी दी है. हम मांग करेंगे तो 15 दिन में रोज़गार मिलेगा और काम करने के 15 दिन के अन्दर हमे अपने काम की मजदूरी मिल जायेगी. हमने आठ महीने पहले 15 दिन का काम किया था, इसकी मजदूरी आठ महीने बाद मिली. यह भी आसानी से न मिली, 15 बार तो पंचायत के चक्कर लगाए, चार बार जनपद आफिस गए. कलेक्टर को 3 कागज़ भेजे. ये कौन सी गारंटी है? अब तो यही लगता है सरकार की गारंटी की बात झूठी है और अच्छा तो यही है कि किसी ठेकेदार के यहाँ काम करें, अस्सी रूपए ही मिलते हैं पर शाम को मिल तो जाते हैं. तीन गाँव की पंचायत है लालपुर. आमतौर पर हम मानते हैं कि पंचायतों के सरपंच इस कार्यक्रम में भ्रष्टाचार का पलीता लगा रहे हैं. उन्होने अपने घर भर लिये हैं और गाँव के स्तर पर बनी पंचायती राज व्यवस्था के प्रति बनी उम्मीदों को तोड़ कर रख दिया है. यहाँ का एक व्यापक विश्लेषण बताता है कि पंचायती राज व्यवस्था को सरपंचों ने नहीं हमारी राज्य व्यवस्था और अफसरशाही ने भी गहरा आघात पंहुचाया है.

लालपुर के सरपंच मदन सिंह वरकडे अपनी पंचायत की जानकारी सामने रखते हुए बताते हैं कि इस पंचायत को वर्ष 2010-11 में मनरेगा के तहत 100 कामों की स्वीकृति मिली थी, इनमे से उन्होने 52 काम उसी वर्ष पूरे किये और 48 काम वर्ष 2011-12 में आकर पूरे हुए. इन कामों के मजदूरी करने वालों की मजदूरी का पूरा भुगतान जनवरी 2013 में जाकर हो पाया. वर्ष 2012-13 के लिये 25 कामों की तकनीकी स्वीकृति जारी की गयी पर 15 जनवरी 2013 तक यानी वितीय वर्ष के लगभग ख़त्म होने तकin कामों की राशि जारी ही नहीं हुई थी. पहले तो मदन सिंह कहते हैं कि चूंकि मजदूर काम पर नही आ रहे हैं इसलिए उसी वित्तीय वर्ष में काम पूरी नहीं हो पाए, पर शंकर सिंह मरावी इस तर्क का विरोध करते हुए कहते हैं कि मजदूरी का भुगतान ही नहीं होता है तो गरीब आदिवासी काम पर क्यों आयेंगे? एक योजना जिसके तहत 371 जाबकार्ड धारी इस पंचायत को इस साल लेबर बजट के मान से 81 लाख रूपए का बजट प्राप्त हो सकता था, पर कोई राशि जारी न हो सकी. वर्ष 2011 में यहाँ एक जाबकार्डधारी को औसतन 30 दिन का ही रोज़गार मिला. अगले साल यानी 2012 में यह कम होकर 15 दिन के स्तर पर आ गया. यह तो बीमारी के लक्षण हैं जो हमें पंचायत के स्तर पर नज़र आ रहे हैं. बीमारी का कारण कहीं और है.

आज की स्थिति में हमें लालपुर और लावर मुडिया पंचायतों का अध्ययन करने की कोशिश की. एक आम व्यक्ति के नज़रिए से यहाँ की वार्षिक कार्ययोजना और वार्षिक योजना की प्लानिंग बिलकुल अस्पष्ट और घालमेल वाली नज़र आती है. मनरेगा के तहत वर्ष 2010-11 की योजना में यहाँ 100 काम तय किये गए और 60 लाख रूपए का बजट बनाया गया. इनमे से आधे काम पूरे नही हुए तो उन्हे अगले वर्ष यानी 2011-12 की कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया और बजट बना 70 लाख रूपए का. साफ़ तौर पर यदि हम यह कहें कि इन दो सालों में लालपुर पंचायत को 1.30 करोड़ रूपए मिले तो क्या यह सही होगा? नही, बिलकुल नही! सच तो यह है कि इन्होने कुल 40 लाख रूपए ही खर्च किये. पंचायतों के स्तर पर उपलब्ध दस्तावेजों का कोई भी अपने स्तर पर अकेले अध्ययन नही कर सकता है, जब तक कि उस पंचायत के सरपंच-सचिव, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, लेखापाल और कार्यपालन यंत्री और जिला कार्यक्रम अधिकारी से पूरा स्पष्टीकरण न मिले; जो कि ग्राम सभा को मिलना लगभग असंभव होता है. जरूरत इस बात की है कि एक बहुत ही स्पष्ट प्रारूप में कार्ययोजना, बजट आवंटन और व्यय की जानकारी गाँव को उपलब्ध हो. चूंकि इसे बहुत ही तकनीकी काम बना दिया गया है, इसलिए ग्रामसभा अकेले कभी भी सामजिक अंकेक्षण नही कर सकती है; क्योंकि उसे किसी व्याख्या के लिये सरपंच-सचिव और जनपद के अधिकारियों पर ही निर्भर रहना होगा.

इसका मतलब साफ़ है कि गांव में योजना बनाने से लेकर निर्धारित समय में मजदूरी के भुगतान से जुड़े कानूनी प्रावधान लागू ही नहीं हो पा रहे हैं. अब भारत सरकार के निर्देश हैं कि सभी काम पूरे किये जाएँ और उनके पूर्णता प्रमाणपत्र जारी किये जाएँ तभी मांग के मुताबिक़ राशि का आवंटन होगा. लालपुर और लावर मुडिया को देख कर तो लगता है कि अभी व्यवस्था को पटरी पर आने में बहुत वक्त लगने वाला है. बेहतर होगा कि नए नियमों के सन्दर्भ में जमीनी वास्तविकताओं का अध्ययन किया जाए. 

--सचिन कुमार जैन

Saturday, January 12, 2013

आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Fri, Jan 11, 2013 at 11:03 PM
खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे नरेन्द्र
तस्वीर ओशो टीचिंग से साभार 
11 सितम्बर, 1893 ई. को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन मे भारत का परचम लहराने वाले स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. मे कलकत्ते (कोलकाता) के शिमलापल्ली नामक मोहल्ले के निवासी श्री विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के घर हुआ. बचपन का इनका नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था तथा ये अपने माता-पिता की छठ्वी संतान थे. बच्चो की प्राथमिक पाठशाला माता की गोद ही होती है और उस पाठशाला मे अध्यापन उसकी माता द्वारा ही किया जाता है. माता की उस शिक्षा का प्रभाव बच्चे के मस्तिष्क पर अजीवन रहता है. इस बात को नरेन्द्रनाथ की माँ भलिभाँति जानतीं थी. अत: उन्होने नरेन्द्रनाथ को सुसंस्कारित करने मे कोई कसर नही छोडी. वे नरेन्द्रनाथ को बाल्यवस्था से ही रामायण और महाभारत की कथाये सुनाया करती थी. अगर कोई साधु उनके द्वार पर भिक्षा माँगने आ जाता तो नरेन्द्रनाथ की माँ नरेन्द्रनाथ को साथ मे लेकर उस साधु का यथोचित सेवा-सत्कार कर अपने सामर्थ्यानुसार उन्हे भिक्षा देती थी. माँ के इस कृत्य ने नरेन्द्रनाथ के मन पर अमिट छाप छोडी. पढाई मे प्रखर होने के साथ – साथ ये खेलकूद और संगीत गायन मे भी प्रखर एवम सिद्धहस्त थे. गायन कला के चलते ही नवम्बर, 1881 को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर पर इनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई. नरेन्द्रनाथ की गायन कला से प्रभावित होकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने इन्हे दक्षिणेश्वर आने का निमंत्रण दिया और कालांतर मे नरेन्द्रनाथ उनके शिष्य बने. परंतु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को नरेन्द्रनाथ ने अपना गुरु तब तक नही माना जब तक उन्होने उनकी उत्कंठा के चलते उनका भगवान से साक्षात्कार नही करवा दिया.  
नारी चिंतन
न्यूयार्क मे भाषण देते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि जबतक वहाँ का समाज स्त्री-पुरुष के भेद को भुलाकर प्रत्येक मानव मे मानवता का दर्शन नही करता और यह नही सोचता कि स्त्री-पुरुष दोनो एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी है तबतक वहाँ की स्त्रियो का वास्तविक रूप से उत्थान नही हो सकता. मात्र बौद्धिक और अक्षर ज्ञान से ही मानव का कल्याण संभव नही है. अपितु मानव – कल्याण हेतु बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के साथ – साथ उसकी अध्यात्मकिता और नीतिमत्ता की उन्नति भी अत्यंत आवश्यक है. भारत की नारियाँ भले ही बौद्धिक और अक्षर ज्ञान के स्तर पर अमेरिका की नारियो से पीछे हो परंतु वे सदैव अपने शील की रक्षा के साथ-साथ एक चरित्रवान जीवनायपन करते हुए अपने पवित्र आचार-विचार और हृदय की पवित्रता के माध्यम से अध्यात्म के सहारे मानव-कल्याण के पथ पर अग्रेसित होती है. स्वामी जी ने अपने भाषण मे वहाँ के प्रेमाचार के विषय पर कहा कि अगर वे विवाहेच्छुक होते तो अमेरिका के अन्य नवयुवको की भाँति सैकडो बार प्रेमाचार के आडम्बर की अपेक्षा बिना किसी आडम्बर के किसी एक के प्रियपात्र बन चुके होते है. अमेरिका मे बढते तलाको की संख्या पर चिंतित होकर उन्होने वहाँ बताया कि भारतीय समाज मे यह सर्व-शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक स्त्री-पुरुष अपने पति-पत्नी के अलावा अन्य सभी को मातृवत-पुत्रवत की नजर से देखे. अमेरिका मे स्त्री भोगवादी मानसिकता के केन्द्र-बिन्दु मे वास करती है परंतु भारत मे स्त्री सदैव से पूज्या रही है. इसी भारतीय-चिंतन के चलते भारत मे तलाको की संख्या अमेरिका के अपेक्षाकृत नगण्य है. 
  व्यक्तित्व विकास

राजीव गुप्ता-9811558925
व्यक्तित्व विकास की शिक्षा पर स्वामी जी का मानना था कि व्यक्ति का व्यक्तित्व असरदार होना चाहिये. व्यक्ति जिसके भी सम्पर्क मे आये उस पर उसके ग़ुणो की, उसकी बुद्धि की तथा उसके आचरण का जबरदस्त हो यह हर व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिये क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्थान दो-तिहाई भाग मे होता है और मात्र एक-तिहाई भाग मे ही बुद्धि और उसके कहे हुए शब्द का स्थान रहता है. हमारा कर्म हमारे व्यक्तित्व का बाह्य अभिव्यक्ति मात्र ही है. अत: हमारी सम्पूर्ण शिक्षा और सारे अध्ययनो का एकमेव लक्ष्य हमारे व्यक्तित्व को गढते हुए उसे और अनवरत निखारना ही है. व्यक्तित्व की महत्ता हम इसी बात से लगा सकते है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व जिस पर भी पडता है उसे कार्यशील बना देता है. व्यक्तित्व पर एक उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने यहाँ तक कहा कि दार्शनिक मात्र बुद्धि पर असर करता है अपितु एक धर्मसंस्थापको का असर सम्पूर्ण समाज पर पडता है जिससे सारा देश तक हिल जाता है. मनुष्य को पूर्णता को प्राप्त होना ही उसके जीवन उद्देश्य होना चाहिये. मनुष्य मे अच्छी – बुरी स्वभाविकत: दोनो वृत्तियाँ होती है. समयानुसार व्यक्ति द्वारा उसके अन्दर की बुराईयो को कम करने की कोशिश करना ही उसे पूर्णता की ओर अग्रसित करता है.
शिक्षा
शिकागो से भारत वापस लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया. स्वामी विवेकानन्द ने एक सभा मे शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का आधार धर्म होना चाहिये और उसका केन्द्र बिन्दु “चरित्र-निर्माण” ही होना चाहिये. धर्म से उनका तात्पर्य मात्र पूजा-पद्धति ही नही था अपितु “जीवन जीने की कला” था जिसकी पुष्टि उन्होने विचार-शक्ति का महत्व, कर्म का परिणाम और भाग्य के निर्माण इत्यादि जैसे विभिन्न विषयो पर अपने विचार रखकर किया. स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि हम जैसे सोचते है वैसे ही बन जाते है क्योंकि विचार सजीव होते है परिणामत: वाणी की अपेक्षाकृत उनका अधिकतम प्रभाव सदैव हमारे जीवन पर पडता रहता है. अत: हमे अपने विचारो के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिये.

स्वामी विवेकानन्द शिक्षा हेतु किसी भी प्रकार के दंड देने के विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था कि जिस प्रकार प्रताडित करके गधे को घोडा नही बनाया जा सकता उसी प्रकार किसी भी प्रकार की प्रताडना से हम उसे अक्षर ज्ञान तो दे सकते है पर हम उसे शिक्षित नही बना सकते. इसलिये उन्होने शिक्षित बनाने हेतु ठोक-प्रणाली का खुलकर विरोध किया और उनका मानना था कि  शिक्षा के माध्यम से मानसिक बल, चरित्र-निर्माण और बुद्धि का विकास होता है, इतना ही नही “मन की एकाग्रता” ही शिक्षा का सार है और शिक्षा के माध्यम से मिले सारे प्रशिक्षणो का उद्देश्य व्यक्ति-विकास ही है.

किसी भी देश की उन्नति मे वहाँ के शिक्षित-प्रतिशत की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है. क्योंकि देश की उन्नति का अनुपात और जन-समुदाय के शिक्षित का अनुपात सदैव परस्पर निर्भर होते है. भारतवर्ष के पिछडेपन का एक प्रमुख कारण यह भी है कि कुछ चन्द लोगो ने शिक्षा पर अपना आधिपत्य जमा रखा है. गाँवो मे शिक्षा-रूपी दीपक का प्रकाश अभी भी धूमिल ही है. अत: यदि किसी अभाववश विद्यालय मे विद्यार्थी न पहुँच पाये तो विद्यालय को स्वयम उन अभावाग्रस्त विद्यार्थियो के पास पहुँचकर उनकी मातृभाषा मे ही उन्हे शिक्षा देनी चाहिये. इसके साथ- साथ शिक्षा मे संस्कृत जैसी उत्कृष्ट भाषा का स्थान विशिष्ट होना चाहिये. संस्कृत भाषा मात्र वेदो-उपनिषदो की भाषा बनकर न रहकर जाय अत: इसके प्रचार-प्रसार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा पर केवल ब्राह्मण विशेष का अधिकार न होकर अपितु सभी सभी लोगो का समान अधिकार है. शिक्षा का अंतिम लक्ष्य यही है कि वह व्यक्ति को स्वामी बनाये परिणामत: वह सदैव एक स्वामी की तरह कार्य करे न कि किसी भी प्रकार के गुलाम की तरह.
-राजीव गुप्ता (9811558925
आज के दौर मे विवेकानन्द की प्रासंगिकता//राजीव गुप्ता

Monday, April 09, 2012

मांगन गया सो मर गया....!

पर मिलिए श्री जगदीश बजाब से जिन्होंने दूसरों के लिए यह मौत भी स्वीकारी 
माननीय श्री विजय चोपड़ा जी के साथ एक कार्यक्रम में जनाब जगदीश बजाज व अन्य 
रेल गाडी तेज़ी से अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही थी. रात गहराने लगी तो थके टूटे मुसाफिर भी सोने की तैयारी करने लगे.  उस डिब्बे में एक जोड़ी भी थी जिसमें पुरुष को बहुत ही जल्द गहरी नींद आ गयी थी. उसके साथ सफ़र कर रही महिला यात्री की आँखों में भी नींद अपना रंग दिखाने लगी. इतने में ही एक टिकट चैकर आया और उसने उस महिला से टिकट माँगा. महिला यात्री पुरुष के कंधे को झंक्झौरते हुए जोर से बोली जीजा जी जीजा जी. पुरुष हडबडा कर उठा और बोला क्या बात है. महिला ने चैकर की तरफ इशारा किया और कहा टिकट..! पुरुष कोई रेलवे मुलाजिम था, उसने झट से अपनी जेब में से एक पास निकाला और चैकर के हवाले कर दिया. पास देख कर चैकर बोला श्रीमान इस पास पर आप अपनी पत्नी के साथ तो सफ़र कर सकते हैं लेकिन साली के साथ नहीं. पुरुष यात्री ने टिकट चैकर की ने सारी बात समझ कर उसे पूरे विस्तार से समझाया कि जब उसकी पहली पत्नी का देहांत हुआ तो परिवार वालों ने मेरी दूसरी  शादी  उसीकी बहन के साथ कर साथ कर दी जो रिश्ते में मेरी साली ही लगती थी. इस तरह मेरी यह प्यारी सी साली मेरी पत्नी बन गयी पर मुझे जीजा जी कहने की आदत इसे अब तक पड़ी हुयी है सो यह अब भी मुझे जीजा जी ही कहती है. यह कहानी सुनाते हुए उस बुज़ुर्ग के चेहरे पर एक नयी चमक, होठों पर कुछ  रूमानी सी मुस्कान और आँखों में हल्की सी शरारत आ गयी. कहने लगे मुझे भी बस आदत सी पड़ी हुयी है....छूटती ही नहीं...मैंने पूछा कैसी आदत...तो कहने लगे...यही...मांगने की आदत....बस मुझे पता चल जाये कि इसकी जेब में पैसे हैं...फिर मैं उन्हें निकलवा ही लेता हूँ.... कई बार इस आदत को छोड़ना चाहा छोड़ना चाहा पर यह आदत जाती ही नहीं. साथ ही वह ये भी बताते हैं कि मांगना आसान नहीं होता. सब कि औरत बन के रहना पड़ता है. हजारों झमेले सामने आते हैं. कई बार ऐसा होता है कि लोग सब के सामने रसीद बुक से पर्ची तो कटवा लेते हैं पर पैसे दिए बिना चले जाते हैं. उस हिसाब को सम्भालना, फिर उनके चक्कर लगाना और उनसे पैसे निकलवाना...सब बहुत मुश्किल है पर मैं करता हूँ.गौर तलब है कि अब तो इस आदत के कारण ही उनके बहुत से किस्से कहानियां भी अख़बारों में भी छप चुके. टीवी चैनलों पर उनके प्रोग्राम भी दिखाए जा चुके लेकिन यह आदत कभी कम नहीं हुयी. वह इस वृद्ध अवस्था में भी सक्रिय हैं.
एक बार यह बुज़ुर्ग एक विशेष आग्रह पर महाराष्ट्र में रोटरी क्लब के एक कार्यक्रम में गए. बहुत जोर देने पर जब बोलने लगे तो वहां भी कहने लगे देखिये मुझे सब अनपढ़ समझते हैं लेकिन मैंने पीएचडी की हुयी है. वास्तव में यह एक ऐसा कार्यक्रम थ जिसमें सवाल जवाब भी साथ साथ हो रहे थे. सो इस वृद्ध व्यक्ति से भी सम्मान सहित सवाल किया गया कि आपने किस विषय में पीएचडी की है. वहां भी जनाब बिना किसी झिझक के जवाब देते हुए बोले जी मांगने में. मैं मांगने में एक्सपर्ट हूँ.  इसके बाद जैसे ही उन्होंने मांगने का कारण और लम्बे समय से चल रहा अपना  मिशन बताया तो वहां नोटों की बरसात होने लागिओ और देखते ही देखते  इस वृद्ध की झोली भर गयी. 
मेरी मुराद है लुधियाना के जानेमाने धार्मिक व्यक्ति जनाब जगदीश बजाज से जो गरीब बच्चों को पढाने के साथ साथ गरीब विधवा महिलायों को हर महीने राशन भी वितरित करते हैं.  गरीब लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कम्प्यूटर, सिलाई, कढाई और ब्यूटी पार्लर चलाने जैसे कई और प्रोजेक्ट भी चलाते हैं. यह सब होता है लुधियाना के सुभानी बिल्डिंग चोंक में स्थित ज्ञान स्थल मन्दिर में. इस चौंक  की कई इमारतों में फैले इस मन्दिर को इस तरह की मजबूती देने में जगदीश बजाज ने अपनी उम्र का एक बहुत सा हिस्सा इस तरफ लगा दिया.
मैंने एक बार पूछा बजाज साहिब लोग इस उम्र में आराम करते हैं और आप सारा सारा दिन काम. सुबह 9 नजे से लेकर मन्दिर के कार्यालय में बैठना दुखी लोगों के दुःख सुननाऔर फिर उनके कष्ट हरने के लिए मांगने के लिए निकल पड़ना. इस मिशन को लेकर फेसबुक जैसे मंच का इस्तेमाल भी बाखूबी करना...आखिर यह लगन आपको कहाँ से लगी. बजाज साहिब का चेहरा कुछ गंम्भीर हो गया.उनकी आँखें कहीं दूर अतीत में झाँकने लगीं. बस कुछ ही पलों का अंतराल और फिर बोले बात बहुत पुरानी है. हमने एक जागरण रखा था. मैं पंजाब केसरी पत्र समूह के मुख्य सम्पादक विजय चोपड़ा जी के पास गया और उन्हें निवेदन किया कि आप इस जागरण में मुख्य मेहमान बन कर आने की कृपा करें. उनके पास वक्त नहीं था और मैं उन्हें बार बार वक्त निकलने  के लिए विनती कर रहा था. इतने में ही दो महिलाएं वहां आयीं और विजय जी ने अपने किसी कर्मचारी को इशारा किया की इन्हें आटे की दो थैलियाँ  दे दो. इसके साथ ही विजय जी मुझे मुखातिब हो कर बोले अगर आप इस तरह का कोई काम करें तो मैं सुरक्षा का खतरा उठा कर भी वक्त ज़रूर निकालूँगा. मैंने उन औरतों का दर्द सुना तो मुझे अहसास हुआ कि यह काम कितना आवश्यक है.  मैंने तुरंत हाँ कर दी. इस तरह सितम्बर 1991 से केवल 51  विधवा महिलायों को राशन की राहत देने से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है. आज  यहाँ से राहत पाने वाली महिलायों की संख्या 51 से बढ़ कर 900 के आंकड़े को भी पार कर चुकी है.बहुत से नाम अभी प्रतीक्षा सूची में हैं.सन 2000 में यहाँ लडकियों को कम्प्यूटर सिखाने, सिलाई-कढाई सिखाने और ब्यूटी पार्लर चलाने जैसे काम भी सिखाये जा रहे हैं तांकि वे आत्म निर्भर हो सकें. 
अपने इस मिशन के लिए कई बार उन्हें इम्तिहान की घड़ियाँ  भी देखनी पड़ी. सन 2006 की 26  अप्रैल को उनकी धर्म पत्नी शांति देवी का हार्ट अटैक के कारण देहांत हो गया. रस्म क्रिया की तारीख भी आठ मई की निकली और विधवा महिलायों को राशन वितरित करने की तारीख भी पहले से ही आठ मई घोषित थी.दुःख और संकट की इस घड़ी में भी जगदीश बजाज ने कर्तव्य को नहीं भुलाया. क्रिया आठ की जगह छह मई को ही करली गई पर राहत के इस कार्यक्रम में कोई तबदीली नहीं की गयी. फिर सन 2010 में३० दिसम्बर के दिन उनकी एक बहू का देहांत हो गया. उस समय भी रस्म क्रिया  ८ जनवरी को आती थी लेकिन इस रस्म को भी दो दिन पूर्व अर्थात ६ जनवरी को ही पोर कर लिया गया ता कि आठ जनवरी को होने वाले र्स्शन वितरण कार्यक्रम में कोई भी तबदीली न हो.  मैंने कहा आप कैसे इंसान हैं...अपने परिवारिक सदस्य को अंतिम विदा कहने के लिए एक आध कार्यक्रम भी इध उधर नहीं कर सकते....मेरी बात सुन कर उन्होंने एक लम्बा सांस लिया और बोले मैं नहीं चाहता था कि जो इंसान इस दुनिय से चला गया उसका दिन मनाते समय कोई बद दुया दे या फिर यह कहे कि इस मौत ने तो हमारा काम चौपट कर दिया.
दुनियादारी  का इतना लिहाज़  और दुखी लोगों से इतनी गहरी सम्वेदना रखने वाले जगदीश बजाज का जन्म हुआ था १० अक्टूबर १९३५ को कामरेड राम किशन के पडोस में पड़ते एक मकान में. यह मकान कोट ईसे शाह में था. झंग का यह इलाका अब पाकिस्तान में है. सं 1947 में जब हालात बिगड़े तो इस परिवार को भी पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. कभी अमृतसर, कभी जालंधर और कभी कहीं. गर्दिश के दिन थे. आखिर 1950 में लुधियाना में आ गये. तब से लेकर यहीं पर कर्म योग की साधना  में लगे हुए हैं. सरकारी नौकरी से अपना काम और फिर अपने काम से जन सेवा का यज्ञ. आज इस यज्ञ में योगदान देने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है और इससे राहत लेने वालों की संख्या भी. ज्ञान स्थल मन्दिर अब मानव सेवा संस्थान के तौर पर स्थापित हो चूका है. यहाँ सभी धर्मों के लोग बिना किसी भेद भाव के आते हैं.  अगर आप भी यहाँ आना चाहें तो आपका स्वागत है. आप कभी यहाँ आ सकते हैं.  --रेक्टर कथूरिया

ਬੇਬਸ ਜਿੰਦਗੀਆਂ ਨੂੰ ਨਵੀਂ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇਣ ਵਿੱਚ ਸਰਗਰਮ ਜਗਦੀਸ਼ ਬਜਾਜ



दूसरों के लिए बार बार मरने वाला महान इन्सान: जगदीश बजाज


मांगना और दुःख के मारे ज़रूरतमंद लोगों में बाँट देना