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Sunday, January 06, 2013

एक बच्‍चा एक लैम्‍प:

04-जनवरी-2013 19:35 IST
स्‍कूल के दिनों को रोशन करने की एक परियोजना
विशेष लेख                                                  *मनीष देसाई**भावना गोखले
ग्रामीण परिदृश्‍य में बदलाव

पिछले दो दशकों के दौरान भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रकार के बदलाव आए हैं। वहां बेहतर सड़क संपर्क के साथ ही स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं में महत्‍वपूर्ण सुधार, साक्षरता में सुधार और हर किसी के लिए मोबाइल फोन की सुविधा देखने को मिलती हैं। किंतु बिजली की आपूर्ति में उतना सुधार देखने को नहीं मिलता है। देश के अधिकांश राज्‍यों में 12 से लेकर 14 घंटे तक बिजली नहीं मिलना एक सामान्‍य बात है। जब इतने लम्‍बे समय तक बिजली न मिले तो इससे स्‍कूल जाने वाले बच्‍चे सबसे अधिक प्रभावित होने वालों में शामिल हैं।
     बिजली नहीं रहने के कारण छात्र या तो पढ़ाई नहीं कर पाते या फिर वे मिट्टी के तेल वाले लैम्‍प की रोशनी में पढ़ाई करते हैं। यह स्थिति अच्‍छी नहीं है। बिजली की आपूर्ति में कमी होने के कारण देश के 12 करोड़ से अधिक बच्‍चे अपनी पढ़ाई के लिए मिट्टी के तेल वाले लैम्‍प पर निर्भर करते हैं। मिट्टी के तेल वाले लैम्‍प से उतनी रोशनी नहीं होती, जिससे बच्‍चे आराम से पढ़ाई कर सकें। उससे कार्बन मोनोक्‍साइड गैस भी उत्‍सर्जित होती है, जो बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए नुकसानदायक है। मिट्टी का तेल लीक होने की स्थिति में आग लगने का भी खतरा रहता है। अंतत: इसका परिणाम यह होता है कि छात्र अपनी पढ़ाई के साथ तालमेल रखने में असफल रहते हैं और जब वे उतीर्ण होते हैं, तो उनमें रोजगार के अवसरों तक पहुंचने के लिए आत्‍मविश्‍वास में कमी होती है और उनका कौशल स्‍तर भी कम होता है।
     इसलिए बच्‍चों की पढ़ाई के दौरान रोशनी की उपलब्‍धता काफी महत्‍वपूर्ण है। इसलिए हम इस समस्‍या का किस प्रकार समाधान करें ?

लेड अध्‍ययन लैम्‍प – सर्वोत्‍तम समाधान
     सभी संभव समाधानों के बीच सौर ऊर्जा पर आधारित सौर लैम्‍प सबसे सस्‍ता और सबसे त्‍वरित समाधान के रूप में दिखाई पड़ता है।
Courtesy Photo
उभरती हुई लेड रोशनी की प्रौद्योगिकी, जो एक सेमीकंडक्‍टर पर आधारित है, वह रोशनी की समस्‍या से जुड़ा एक बेहतरीन और सरल समाधान है। श्‍वेत लेड क्रांति के बल पर अब पढ़ाई के उद्देश्‍य के लिए एक उपयुक्‍त और सरल समाधान प्रस्‍तुत हो रहा है, जो एक चौथाई वाट से भी कम बिजली लेकर एक लैम्‍प की तुलना में 10 से लेकर 50 गुना अधिक रोशनी देता है।
हैदराबाद स्थित स्‍वैच्छिक संगठन – थ्राइव एनर्जी टेक्‍नोलॉजिज ने एक सौर अध्‍ययन लैम्‍प वि‍कसित किया है, जो अध्‍ययन के उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए पर्याप्‍त रोशनी प्रदान करता है। एक बार पूरा चार्ज करने पर इससे प्रतिदिन सात से आठ घंटे तक रोशनी मिलती है।
सौर लेड की विशेषताएं
*एक लैम्‍प द्वारा दो से तीन लक्‍स रोशनी की तुलना में यह लगभग 150 लक्‍स रोशनी प्रदान करता है।
*इसमें निकेल धातु वाली हाइड्राइड की बैट्री का इस्‍तेमाल होता है, जिसे 0.5 वाट वाले सोलर पैनल के जरिए अथवा ए.सी मोबाइल चार्जर या फिर सौर ऊर्जा आधारित चार्जिंग प्रणाली के जरिए चार्ज किया जा सकता है।
*इसमें विश्‍व के सर्वोत्‍तम लेड और एक उन्‍नत आईसी का इस्‍तेमाल होता है, जो कई वर्षों के इस्‍तेमाल के बाद भी निरंतर और बढि़या रोशनी देता है।
इस परियोजना से जुड़े आई.आई.टी बम्‍बई के रवि तेजवानी का कहना है – ‘सामान्‍यत: जो लैम्‍प तैयार किए जाते हैं, वे ग्रामीण पर्यावरण के लिए उतना उपयुक्‍त साबित नहीं होते। प्रौद्योगिकी और प्रक्रियाओं में नवीनता के माध्‍यम से ये लैम्‍प व्‍यापारिक तौर पर बाजार में उपलब्‍ध समकक्ष गुणवत्‍ता वाले लैम्‍पों की तुलना में 40 प्रतिशत तक किफायती हैं।’
खरगौन का प्रयोग : एक बच्‍चा एक लैम्‍प
  
‘एक बच्‍चा एक लैम्‍प’ नामक परियोजना दक्षिण-पश्चिम मध्‍य प्रदेश के खरगौन जिले में शुरू की गई। इसका उद्देश्‍य जिले के प्रत्‍येक 100 स्‍कूलों के सौ-सौ बच्‍चों - कुल मिलाकर 10,000 बच्‍चों, को सोलर लैम्‍प प्रदान करना है। झिरन्‍या और भगवानपुरा तहसील के 100 स्‍कूलों को भी इस योजना में शामिल किए जाने का प्रस्‍ताव है, जो सबसे अधिक पिछड़े क्षेत्रों में शामिल हैं। मुख्‍य योजना जिले में 1,00,000 लैम्‍पों का वितरण करना है।
  मध्‍य प्रदेश के खरगौन जिले को एक शीर्ष जिले के रूप में चुना गया है, क्‍योंकि 84 प्रतिशत से अधिक जनसंख्‍या गांव में निवास करती है और इसमें से 40 प्रतिशत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति श्रेणी की है। रोशनी के लिए 40 प्रतिशत से अधिक लोग मिट्टी के तेल का इस्‍तेमाल करते हैं। मध्‍य प्रदेश में प्रति व्‍यक्ति बिजली का उपभोग मात्र लगभग 330 यूनिट प्रतिवर्ष है, जबकि भारत के लिए यह 750 यूनिट है और विश्‍वभर के लिए यह औसत 2000 यूनिट है। खरगौन जिले में स्थित एजुकेशन पार्क की ओर से इस परियोजना को कार्यान्वित किया जा रहा है, जिसमें थ्राइव एनर्जी टेक्‍नोलॉजिज, हैदराबाद सहयोग कर रहा है। अब तक 4500 से भी अधिक सौर लेड लैम्‍प वितरित किए गए हैं।  इसका उद्देश्‍य सिर्फ वितरण करना है।
परियोजना की कार्य प्रणाली
 छात्रों के लिए सौर लैम्‍प की रियायती लागत केवल 200 रूपये है, हालांकि बाजार में इसकी कीमत 580 रूपये है। श्री तेजवानी का कहना है कि इन सौर लैम्‍पों को स्‍कूल के एक ही स्‍थान पर चार्ज किया जाएगा, जबकि छात्रों की पढ़ाई स्‍कूल के टैरेस में स्‍थापित एक साझा सौर पीवी मॉड्यूल के जरिए कराई जाएगी। दिन में इन लैम्‍पों को चार्ज किया जाएगा और 4 से 5 घंटे के चार्ज होने के बाद ये 2-3 दिनों तक रात के दौरान 2-3 घंटे तक रोशन प्रदान करने में सक्षम होंगे। जिन छात्रों के पास ये लैम्‍प होंगे, वे इसे घर ले जाकर रात में अपनी पढ़ाई करेंगे। जरूरत होने पर वे स्‍कूल ले जाकर इसे फिर से चार्ज कर सकेंगे।
परियोजना के लाभ    एक बार सफलतापूर्वक कार्यान्वित होने पर समाज के लिए यह परियोजना प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष रूप से लाभकारी होगी।
*10,000 छात्रों को सौर लैम्‍प मिल जाने पर इसके परिणामस्‍वरूप अध्‍ययन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 30,00,000 अतिरिक्‍त घंटे उपलब्‍ध होंगे।
*इससे माता-पिता, शिक्षकों और प्रशासकों के बीच जागरूकता आएगी और लोग अपना-अपना सौर लैम्‍प प्राप्‍त करने के लिए प्रोत्‍साहित होंगे। घर में इस्‍तेमाल के लिए एक अन्‍य घरेलू लैम्‍प का मॉडल भी उपलब्‍ध है।
*इससे मिट्टी के तेल की मांग में कमी होगी, जिसकी आपूर्ति पहले से ही कम हो रही है और इसके बदले देश के लिए बहुमूल्‍य विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
*इससे मिट्टी के तेल वाले लैम्‍पों के इस्‍तेमाल से बच्‍चों को होने वाले स्‍वास्‍थ्‍य के खतरे में भी कमी आएगी।
*इस परियोजना के क्रियान्‍वयन के परिणामस्‍वरूप प्रतिवर्ष 15,00,000 टन कार्बनडाईऑक्‍साइड के उत्‍सर्जन में भी कमी आएगी।
इस परियोजना का उद्देश्‍य मध्‍य प्रदेश के सामाजिक जीवन पर होने वाले प्रभाव को दर्शाना और सरकार को रोशनी के लिए सौर लैम्‍पों को अपनाने हेतु प्रोत्‍साहित करना है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में रोशनी के लिए सबसे अधिक किफायती समाधान है।
सौर ऊर्जा पर भारत का जोर    सरकार ने सौर ऊर्जा के महत्‍व को स्‍वीकार किया है और जवाहरलाल नेहरू राष्‍ट्रीय सौर मिशन नामक कार्यक्रम शुरू किया है। इस मिशन का तात्‍कालिक लक्ष्‍य देश में केंद्रित और विकेंद्रित - दोनों स्‍तरों पर सौर प्रौद्योगिकी को पहुंचाने के लिए एक वातावरण तैयार करने पर जोर देना है। इस क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से आई.आई.टी. बम्‍बई में राष्‍ट्रीय फोटोवोल्‍टाइक अनुसंधान और शिक्षा केंद्र (एनसीपीआरई) स्‍थापित किया गया है, ताकि आधारभूत और उन्‍नत अनुसंधान संबंधी गतिविधियां संचालित हो सके। एनसीपीआरई का उद्देश्‍य सौर पीवी को एक किफायती और प्रासंगिक प्रौद्योगिकी विकल्‍प बनाना है।  (PIB) (पसूका विशेष लेख)
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*निदेशक (मीडिया), पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई
**मीडिया और संचार अधिकारी (मीडिया), पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई


शिक्षा जगत में भी देखें 

Tuesday, March 20, 2012

आरएपीडीआरपी: ऊर्जा क्षेत्र की नई ऊंचाईयां

विशेष लेख:ऊर्जा में है विकासशील देश को विकसित देश में बदलने की क्षमता
          ऊर्जा क्षेत्र न केवल आबादी के बहुत बड़े हिस्से के जीवन पर अपने प्रभाव के कारण महत्वपूर्ण हैं बल्कि यह उद्योग,कृषि,परिवहन,स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अन्य क्षेत्रों पर भी प्रभाव डालता है। ऊर्जा विकास की एक अभिव्यक्ति है और परिवर्तन का एक माध्यम भी है। यह एक विकासशील देश को विकसित देश में बदलने की दिशा में मदद करता है।

          वैश्वीकरण की शुरूआत के बाद कार्यक्षमता और उपभोक्ता संतुष्टी पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है। सेवाओं की अदायगी में पारदर्शिता तथा विश्वसनीयता पर जोर दिये जाने के साथ ही गुणवत्ता पूर्ण सेवाओं की मांग भी बड़ी है। ऊर्जा क्षेत्र सुधार का लक्ष्य अच्छी गुणवत्ता वाली विद्युत सेवाओं की निर्बाध आपूर्ति के साथ उच्च उपभोक्ता संतुष्टि हासिल करना है। हालांकि इस क्षेत्र के सामने तमाम चुनौतियां हैं। इनमें से कुछ समस्याएं है पुराना, जर्जर और खराब वितरण नेटवर्क । विद्युत दर भी आड़े आती है चोरी और बिना मीटर की आपू्र्ति के कारण बड़ी मात्रा में आपूर्ति तथा वितरण हानि दर्ज की जाती है।

          इन समस्याओं को पार पाने के लिए और बेहतर कार्यक्षमता तथा ऊर्जा क्षेत्र की व्यावसायिक व्यवाहार्यता स्थापित करने के लिए पुनर्संगठित- त्वरित ऊर्जा विकास और सुधार कार्यक्रम (आर-एपीडीआरपी) को ऊर्जा मंत्रालय द्वारा देश में शहरी ऊर्जा वितरण क्षेत्र में सुधार के लिए केन्द्रीय क्षेत्र योजना के रूप में शुरू किया गया और इसके संचालन तथा कार्यान्वयन के लिए ऊर्जा वित्त निगम को नोडल एजेंसी की जिम्मेदारी दी गयी इस कार्यक्रम का लक्ष्य घाटा कम करने, आधारभूत आंकड़े के वास्तविक संकलन के लिए विश्वसनीय तथा स्वतः स्फूर्त प्रणाली की स्थापना और ऊर्जा उत्तरदायित्व के क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी के अनुपालन के संदर्भों में वास्तविक तथा प्रदर्शन योग्य परिणामों पर केन्द्रित है। यह कार्यक्रम 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान उपवितरण तथा वितरण नेटवर्क को समुन्नत तथा मजबूत करने और सूचना तकनीक के अनुप्रयोग के माध्यम से  घाटों को 15 प्रतिशत कम करने पर केन्द्रित है। 



       इस योजना की शुरूआत 2000-01 में सरकार द्वारा लाये गये त्वरित विद्युत आपूर्ति कार्यक्रम (एपीडीपी) से मानी जा सकती है। उस समय राज्य विद्युत बोर्डों की खराब माली हालत के कारण बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा था। एपीडीपी का लक्ष्य (1) पुराने ताप और जल विद्युत संयत्रों के नवीकरण तथा आधुनिकीकरण, जीवन विस्तार, समुन्नयन और (2) वितरण परिक्षेत्रों में मीटरिंग तथा ऊर्जा दायित्व निर्धारण के साथ ही उप वितरण और वितरण नेटवर्कों (33 किलोवोल्ट या 66 किलोवोल्ट) को समुन्नत और मजबूत करना था। 2002-03 में एपीडीपी का नाम बदलकर त्वरित ऊर्जा विकास एवं सुधार कार्यक्रम एपीडीआरपी रखा गया। एपीडीआरपी का दायरा एपीडीपी से बड़ा है। इसका लक्ष्य राजस्व संग्रह बढ़ाना, कुल तकनीकी और व्यवसायिक घाटे को कम करना, ग्राहक संतुष्टि में सुधार और विद्युत आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार लाना है।    2008 में आरएपीडीआरपी को केन्द्रीय क्षेत्र योजना के तौर पर 51,577 करोड़ रुपये के योजना आकार के साथ शुरू किया गया इसका मुख्य लक्ष्य कुल व्यावसायिक और तकनीकी घाटे में कमी के वास्तविक प्रदर्शन योग्य परिणाम लाना था। इस योजना के तहत परियोजनाओं को दो हिस्सों में संचालित किया गया।

          भाग-अ : यह परियोजना क्षेत्र में उपभोक्ता सूचकांक, भौगोलिक सूचना प्रणाली मानचित्रण, वितरण ट्रांसफार्मरों और फीडरों की मीटरिंग तथा सभी वितरण ट्रांसफार्मरों और फीडरों के स्वचालित आंकड़े संग्रह समेत आधारभूत आंकड़ा संकलन के लिए काम करता है।

          स्वीकृत परियोजनाओं को शत-प्रतिशत निधियां सरकार से ऋण के तौर पर उपलब्ध कराई गयी हैं। प्रणाली की स्थापना निधि स्वीकृति के तीन वर्ष के भीतर पूरी हो जाने और स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा इसके सत्यापन के बाद इस ऋण को अनुदान में बदल दिया जाता है।

          भाग-ब: इसका मुख्य लक्ष्य घाटे मे सतत कमी लाना है। इसमें 11 हजार वोल्ट के उप केन्द्रों तथा ट्रांसफार्मरों और ट्रांसफार्मर केन्द्रों के नवीकरण, आधुनिकीकरण  और सुदृढीकरण, 11 हजार वोल्ट और इससे कम स्तर की लाइनों के पुनर्संचालन, भार-विभाजन, फीडर विभाजन, फार नियंत्रण, हाई वोल्टेज वितरण प्रणाली, सघन क्षेत्रों में हवाई तार बिछाने, पुराने इलेक्ट्रोमेग्नेटिक मीटरों के नये सुरक्षित मीटरों से परिवर्तन, केपिसीटर बैंक और सचल सेवा केन्द्रों की स्थापना जैसे लक्ष्य शामिल हैं।


          आरएपीडीआरपी के सफल कार्यान्वयन से ऊर्जा क्षेत्र आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त्र होगा। ऊर्जा क्षेत्र में वि‍त्‍तीय सुदृढ़ता के लि‍ए मीटरिंग प्रणाली के अच्छे प्रबंधन और करीब निगरानी, ससमहय और सही-सही बिलिंग, समय पर संग्रह, बेहतर ग्राहक सेवा और वि‍श्‍वसनीय वि‍द्युत आपूर्ति‍की आवश्‍यकता है। कुल व्‍यावसायि‍क और तकनीकी घाटों को कम करने तथा स्‍मार्ट ग्रि‍ड के कार्यान्‍वयन के लि‍ए आरएपीजीडीआरपी के दोनों ही भागों का सही कार्यान्‍वयन बहुत ही महत्‍वपूर्ण है। (पीआईबी फीचर) 15-मार्च-2012 20:57 IST