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Thursday, February 12, 2015

भारतीय इंडस्ट्री चीन की चुनौती का सामना करने में सक्षम-कुलार


पर साथ ही किया शिकवा कि साथ नहीं देती सरकारें और उनकी नीतियां 
लुधियाना में 13 से शुरू होगी भारत-पाक साईकल एक्सपो  
लुधियाना:: 12 फ़रवरी 2015: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन): 
जंग केवल सीमा पर नहीं होती। आजकल जंग आसमान में भी होती है, समुन्द्र में भी और बाज़ार में भी। काफी लम्बे समय से चीन ने जंग का मैदान बना रखा है भारत के बाज़ार को। बाज़ार पर कब्ज़ा  आर्थिकता पर कब्ज़ा और  कब्ज़े  मज़बूत बनाने के नापाक इरादे से आये दिन चीन की बनी कोई न कोई चीज़ बहुत ही आकर्षक रंग रूप लेकिन बहुत ही सस्ते भाव पर दुकानों में पहुँच जाती है। यह सौदा इतना लुभावना होता है भारत के लोग भारत की बनी चीज़ को ही खरीदना भूल जाते हैं। इस नाज़ुक समय में भी पंजाबी एक  बढ़ चढ़ कर आगे आये हैं।  भारत की खडग भुजा पंजाब और ख़ास कर लुधियाना की इंडस्ट्री चीन सहित हर विदेशी चुनौती का सामना करने में सक्षम है लेकिन सरकारें और उनकी नीतियां उनका साथ नहीं देती। यह दर्द आज व्यक्त हुआ उत्तर भारत के दिग्गज साईकल निर्माता गुरमीत सिंह कुलार के मुँह से। वह यहाँ एक पत्रकार सम्मेलन में मीडिया से बात कर रहे थे। उनके साथ पाककस्तान से आये हुए ख़ास मेहमान खुर्शीद ब्र्लास भी मौजूद थे। गौरतलब है की शुक्रवार 13 फ़रवरी से लुधियाना में भारत और पाकिस्तान में सक्रिय साईकल इंडस्ट्री की संयुक्त प्रदर्शनी शुरू हो रही है। 
गौरतलब है कि बिना एक भी गोली या बम चलाये चीन ने भारतीय इंडस्ट्री की सिट्टीपिट्टी गुम कर रखी है।  मामला मोबाईल का हो या किसी और क्षेत्र का चीन में बना सस्ता माल ग्राहकों को लगातार आकर्षित कर रहा है। लोग भारत में बने मॉल की बजाये चीन का बना माल खरीदने को पहल देते हैं क्यूंकि वह सस्ता भी है और आकर्षित भी। सस्ता भी इतना कि अगर खराब होने पर उसे कबाड़ में भी फेंक दिया जाये तो गम नहीं।  हालांकि चलने के मामले में काफी बदनामी  बावजूद हकीकत यही है चीन का माल कई बार काफी काफी समय भी चलता है। खराब होने पर कोई नयी व्यवस्था न मिलने के बावजूद लोक चीन के माल को पसंद करते हैं क्यूंकि वह खरीदने वाले की जेब पर बोझ नहीं बनता। 

चीन ने साईकल के मामले में भी यही प्रयोग करना चाहा था।  किसी न किसी वजह से वह रुकता चला आया। यहाँ का साईकल कम से कम तीन या साढ़े तीन हज़ार रुपयों से शुरू होता है। भारत का आम आदमी अभी भी साईकल पर निर्भर करता है। मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में साइकलें बहुत बड़ी संख्या में चलती हैं। इसी तरह पाकिस्तान में भी साईकल पॉपुलर है।  वहां 28 किलो का साईकल करीब साढ़े छ हज़ार रुपयों में मिलता है जबकि भारत में बना केवल 22 किलो का साईकल वहां आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

साईकल इंडस्ट्री के लिए  दोनों देश एक दुसरे के लिए बहुत बड़ी मंडी हैं।  भारत के लिए पाकिस्तान और पाकिस्तान के लिए  भारत। इस कारोबार को और उत्साहित करने के लिए 13 फ़रवरी से लुधियाना में एक साईकल एक्सपो शुरू हो रही है।  अतीत के सुनहरे अध्याय को देखते हुए इस बार भी इस प्रदर्शनी में काफी लोग आएंगे। जब इस प्रदर्शनी की घोषणा की गयी तो हमने साईकल कारोबार के दिग्गज गुरमीत सिंह कुलार से चीन की चुनौती के बारे में भी बात की। उनकी आवाज़ में जोश था लेकिन इस जोश में दर्द भी था। 
उन्होंने कहा कि हम किसी से कम नहीं लेकिन यहाँक्छा माल तक मिलने में दिक्क्त है, वैट है और कई तरह के अन्य झमेले जो चीन की इंडस्ट्री को कभी दरपेश नहीं हुए।
इस मौके पर पाकिस्तान से आये हुए खुर्शीद बलरास भी विशेष तौर पर उपस्थित रहे।  उन्होंने भी इस प्रदर्शनी की बात की। उन्होंने चीन के मुद्दे पर कहा कि किसी वक़्त चीन का बना  सामान किसी वक़्त काफी राईज़ हुआ था लेकिन अब उनकी वह डिमांड नहीं है।

अब देखना है कि दोनों देशों  मिल कर चीन के विकराल ड्रैगन का सामना कर पाते हैं या नहीं हैं? कल 13 फ़रवरी से शुरू होने वाली प्रदर्शनी से उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे इस कारोबार को नए आयाम मिलेंगे।

Friday, August 08, 2014

मशीन में बाज़ू कटी तो बाज़ू डंप में और महिला नौकरी से बाहर

क्या होगा इस सिस्टम में गरीब इन्सान का?
लुधियाना: 8 अगस्त 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
पति का देहांत हुआ तो माहेश्वरी की ज़िन्दगी में अँधेरा छा गया। एक एक कदम--एक एक दिन नयी से नयी चुनौती लेकर सामने आता पर उसने हिम्मत न हारी। उसने ठान लिया  कि अपनी तीनों बच्चियों को उसने पिता का दुलार भी देना है और पढ़ा लिखा कर एक अच्छा इंसान भी बनाना है। इसके लिए सबसे पहले चाहिए था पैसा जो उसके पास नहीं था। उसने लुधियाना में शेरपुर की एक फैक्ट्री में काम शुरू किया। उसे दिन भर साइकल की एक मशीन पर बैठना पड़ता लेकिन मशीन वक़्त आने पर खराब होती चली गयी। उसने फोरमैन से भी कहा और फैक्ट्री के मालिक से भी लेकिन किसी ने ध्यान न दिया। एक दिन उसकी बाज़ू उस मशीन में फंस गयी और झट से कट कर दूर जा गिरी। दर्द और सदमे के मारे वह बेहोश हो गयी। उसे एक निजी अस्पताल में लेजाया गया। करीब २४ घंटे तक उसका इलाज वहां चला और फिर उसे ईएसआई अस्पताल पहुंचा दिया गया। चार दिन उसे वहां रखा गया और फिर कहीं ओर शिफ्ट कर दिया गया। वहां से छुट्टी मिली तो उस पर दुःख का एक और पहाड़ टूट पड़ा। उए पता चला कि मालिक ने उसे नौकरी से हटा दिया है। उसने मालिक के पाँव पकड़े---बहुत रोई कि अब वह अपाहिज बन कर कहाँ जाये लेकिन मालिक के कानों पर जूं  तक नहीं सरकी। इसी बीच उसकी कटी हुई बाज़ू एक डंप से बरामद हुई। उसे इसका पता अख़बार पढ़ कर चला। वह मालिक के पास व्ही गयी और पुलिस के पास भी लेकिन पता चला कि पुलिस ने उसकी बाज़ू को लावारिस समझ कर सिवल अस्पताल में सौंप दिया जहाँ उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

एक कटी हुई बाज़ू मिलने पर भी उसकी जाँच पड़ताल नहीं की गयी। अब वह अपने देवर के साथ सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही है कि उसे इन्साफ दिलाया जाये। उसने मुआवज़े में दस लाख रुपयों की मांग की है। अब उसे क्या मिलता है इसका पता तो वक़्त आने पर ही लग सकेगा पर स्वतंत्रता दिवस के दिनों में उसे मिला यह दर्द देश और समाज पर कई सवाल खड़े करता है। आखिर कब तक चलेगा गरीबों के साथ यह सब? क्या स्वतंत्रता केवल अमीरों के लिए आई थी? क्या गरीब लोग यूँही कुत्ते की मौत मरते रहेंगे? अगर यह सब इसी तरह चलेगा तो नई क्रांति को आने से कोई नहीं रोक सकेगा। उसकी आहट बहुत करीब है। वह किसी भी वक़्त दस्तक दे सकती है।
आइये कामना करें कि वो दुनिया जल्द बने जिसकी कामना करते हुए साहिर लुधियानवी साहिब ने लिखा था---
वो सुबह कभी तो आएगी
फ़ाक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी
जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी
वो सुबह कभी तो आएगी 


माहेश्वरी देवी का मोबाईल नंबर है--94174 69488 और पता है:--गली नंबर-5,  मुस्लिम कालोनी, शेरपुर, लुधियाना। 

जारी है मासूमों पर पैसे वालों का दमन

14 वर्षीय बालक पर 55 जैकेट  चोरी करने का आरोप
कुंदन अपनी माँ  रेणु के साथ डीसी आफिस के सामने 
लुधियाना: 8 अगस्त 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
स्वतंत्रता दिवस आने वाला है लेकिन दबे हुए गरीब लोग अभी भी उसी तरह दुखी हैं जैसे विदेशी शासन में थे। उनकी सुनवाई नहीं होती, उन्हें इंसान नहीं समझा जाता और इस दमन के बावजूद अगर कोई आवाज़ उठाने की हिम्मत कर ले तो उस पर कोई झूठा आरोप लगा कर उसे फंसाने में कोई कस्र नहीं छोड़ी जाती। इस का ताज़ा मामला सामने आया लुधियाना में। हम आपके सामने रख रहे हैं दो अलग अलग घटनाएं। इनमें एक बच्चा है और दूसरी एक महिला है।
कामरेड हरि सिंह साहनी के साथ कुंदन और उसका परिवार 
मासूम कुंदन जिसकी अभी पढ़ने की उम्र है।  कुंदन जिसकी अभी खेलने की उम्र है। छोटा सा बालक जिसे अभी तक कपड़े पहनने की तमीज़ भी नहीं आई होगी उस पर आरोप लगा दिया गया कि उसने दूकान से 55 जैकटें चोरी की हैं। दिलचस्प बात है कि 55 जैकटों का वज़न वह उठा ही नहीं सकता। लेकिन उस से यह आरोप कबूल भी करवा लिया गया। इस कबूलनामे की रेकार्डिंग भी कर ली गई। उस का कसूर पता क्या था? उसने दुकान में अक्सर आने वाले कुछ युवकों को देखा था जो चोरी से माल ले जा रहे थे। उसने देख लिया तो वे उसे ही धमकाने लगे। सहमे हुए कुंदन ने सारी बात दुकान के मालिक को बताई। दूकान मालिक शाम के जश्न में डूबा हुआ था।चोरी हो रही है यह बात सुनकर भी नहीं उठा। कहने लगा अगर सामान उठा रहे हैं तो उन्हें रोको। भला एक बच्चा हट्टे कट्टे चोर उचक्कों को कैसे रोकता? नतीजा वही हुआ की चोरी करने वालों ने उलटे उसे ही फंसा दिया। इस आरोप को कबूल करवाने के लिए उस पर दबाव बनाया गया।  उसके साथ मारपीट की गई। उस पर उल्टा छुरा रख कर उसे जान से मारने की धमकी दी गई। बेचारा 14 बरस का कुंदन अपने मालिक की हर बात मानता चला गया। उसे मारपीट से बचने का यही आसान तरीका लगा। जब घर में बात खुली तो उसकी मान उस दिन को कोसने लगी जब वह करीब दस दिन पूर्व रोज़ी रोटी के चक्कर में लुधियाना आये थे। परिवार के लोग पुलिस के पीछे गए तो वहां शुरू हुआ वही पुराना चक्कर कि यह इलाका हमारे थाने में नहीं आता। थानों सीमा ढूँढ़ते ढूँढ़ते यह परिवार जब यह परिवार हताश हो गया तो  जुड़ा हैबोवाल में ही रहने वाले कामरेड हरि सिंह साहनी से।
कामरेड ने चेतावनी दी है की अगर उसे इन्साफ नहीं मिला तो कमिश्नर का घेराव किया जायेगा।  हम इस बच्चे को यूँही लावारिस नहीं छोड़ेंगे। सारे मामले की जानकारी गृह मंत्री पंजाब, डीजीपी और पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग को भी भेज दी गई है।
दूसरे वाले महिला के मामले की चर्चा हम अलग पोस्ट में कर रहे हैं।
 इस तरह के हालात  देख कर फिर याद आते हैं साहिर लुधियानवी साहिब और इनकी रचना----
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी
कुंदन  के परिवार से सम्पर्क के लिए मोबाईल नंबर है: 99156 57953 और पता है: रेनू देवी पत्नी संभु साह, प्लाट नंबर-6484, गली नंबर-2, तरसेम कालोनी, जस्सियां रोड, हैबोवाल कलां, लुधियाना 

Thursday, January 24, 2013

लगभग 7.56 मिलियन लोगों को रोजगार

24-जनवरी-2013 13:08 IST
विशेष लेख:राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि करता रेशम उद्योग
वस्त्र
रेशम भारतीयों की जिंदगी और संस्कृति में घुला-मिला है। रेशम उत्पादन में भारत का समृद्ध और व्यापक इतिहास रहा है और रेशम के व्यापार का इतिहास 15वीं सदी से चला आ रहा है। रेशम के व्यापार के लिए प्रचलित सभी पांचों प्रकार के रेशम- मल्बेरी, उष्णकटिबंधीय तसार, शाहबलूत तसार, इरी और मुगा भारत की विशिष्टता है। इनमें से सुनहरा मुगा भारत की अनूठी विशिष्टता है। भारत के परंपरागत और सांस्कृतिक घरेलू बाजार और रेशम वस्त्रों की उत्कृष्ट विविधता की वजह से भारत रेशम उद्योग में अग्रणी स्थान रखता है।
  पिछले छह दशकों में भारतीय रेशम उद्योग ने प्रभावी वृद्धि दर्ज की है। केन्द्रीय और राज्य की एजेंसियों द्वारा कार्यान्वित योजनाओं और हजारों समर्पित लोगों के अथक प्रयास इस संदर्भ में काफी मददगार रहे हैं।  उदाहरण के लिए मल्टीवोल्टीन संकर की प्राचीन परंपरा का स्थान मल्टीवोल्टीन एक्सबाइवोल्टीन और बाइवोल्टीन संकर रेशम ने ले लिया है। रेशम उद्योग ने कच्चे रेशम के उत्पादन में तीव्र विकास किया है।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में रेशम उद्योग
  रेशम उद्योग भारत के ग्रामीण और कस्बों के क्षेत्रों में लगभग 7.56 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करता है। इनमें से अधिकतर कामगर समाज के आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग से संबंध रखते हैं जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। इसके ज़रिए मुख्य तौर पर लाभ से वंचित समूह यानि महिलाओं, अजा, अजजा और अल्पसंख्यकों और अन्य सीमांत समूहों को रोजगार और आय कमाने का मौका मिलता है। इसके अलावा रेशम उद्योग से संबंधित 60 प्रतिशत गतिविधियां ग्रामीण  महिलाओँ द्वारा सुचारू की जाती हैं। लगभग 7.56 मिलियन लोग रेशम उद्योग और इसकी विभिन्न गतिविधियों में संलग्न हैं।
भारतीय रेशम
  विश्व में रेशम उत्पादन के 14.57 प्रतिशत भाग के साथ भारत दुनिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बडा रेशम उत्पपपपादक है। वर्ष 2011-12 के दौरान भारत ने लगभग 23230 एम. टन का उत्पादन किया है जिसमें 18395 एम. टन मल्बेरी रेशम और 4835 एम. टन वान्या रेशम शेमिल है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में मल्बेरी रेशम का मुख्य तौर पर उत्पादन किया जाता है। भारत दुनिया में कच्चे रेशम का सबसे बडा उपभोक्ता है। कच्चे रेशम का उपभोग (लगभग 28,733 एमटी) इसके उत्पादन से धिक होता है इसलिए अतिरिक्त मांग जो कि लगभग 5,700 एमटी रेशम की है, की पूर्ति मुख्य तौर पर चीन से आयात द्वारा की जाती है।
  इरी, तसार और मुगा रेशम की अन्य प्रजातियां हैं जिनका उत्पादन भारत में किया जाता है। इन्हें समग्र तौर पर वान्या रेशम (अथवा जंगली रेशम) कहा जाता है क्योंकि ये मुख्य तौर पर वन के उत्पाद होते हैं। तसार रेशम प्रमुख रुप से झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्यप्रदेश और ओडिशा में उत्पादित किया जाता है इसके अलावा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में छोटे स्तर पर इसका उत्पादन होता है। उप हिमालयी राज्यों जैसे मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम और मेघालय में शाहबलूत तसार का उत्पादन किया जाता है। इरी रेशम गैर-मल्बेरी रेशम उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ है और मुख्य तौर पर पूर्वोत्तर राज्यों के पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है इसके अलावा बिहार, पं. बंगाल और ओडिशा राज्यों में भी यह पाया जाता है। सुनहले रेशम के नाम से जाने जाना वाला मुगा रेशम विशिष्ट तौर पर असम में पाया जाता है और ब्रह्मपुत्र घाटी में यह फैला हुआ है।
निर्यात
  2010-11 के दौरान निर्यात आय में 2009-10 के मुकाबले मामूली रुप से एक प्रतिशत की कमी हुई। हालांकि 2011-12 के दौरान अनंतिम निर्यात आय ने 2010-11 के मुकाबले 20.21 प्रतिशत की कमी दर्शाई। वैश्विक मंदी, आर्थिक संकट और डॉलर के मुकाबले बारतीय रुपए में गिरावट के कारण तथा उच्च उत्पादन लाग और चीन से कडी प्रतिस्पर्धा की वजह से पिछले तीन वर्षों के दौरान निर्यात आय प्रभावित हुआ है।
अनुसंधान औऱ विकास
  केन्द्रीय रेशम बोर्ड का देश भर में क्षेत्रीय रेशम उत्पादन अनुसंधान स्टेशनों और अनुसंधान केन्द्रों के साथ नेटवर्क है जिससे इस उद्योग को समर्थन के लिए आवश्यक अनुसंधान और विकास मुहैया किया जा सके। उत्पादन को बढ़ाने के लिए केन्द्रीय रेशम बोर्ड के अनुसंधान और विकास संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों के बीच लोकप्रिय बनाया जा रहा है। कच्चे रेशम का उत्पादन 87.84 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (2007-08) से 90.90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (2011-12) हो गया है।
बीज सहयोग
  गुणवत्ता पूर्ण रेशम कीट बीज के उत्पादन के अलावा मूल बीज सामग्री की आपूर्ति करना सीएसबी का उत्तरदायित्व है। इस कार्यक्रम के तहत किसानों को तकनीकी और कार्य स्तर पर प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराया जाता है। राज्यों को मूल बीज आपूर्ति करने वाले मूल बीज फार्मों की श्रृंखला सीएसबी के पास है। इसका व्यवसायिक बीज उत्पादन केन्द्र किसानों को व्यापारिक रेशम कीट बीज की आपूर्ति करने में राज्यों के प्रयासों को आगे बढ़ाता है।
केन्द्रीय रेशम बोर्ड द्वारा कार्यान्वित रेशम उत्पादन विकास कार्यक्रम
  केन्द्रीय रेशम बोर्ड वर्तमान में उत्प्रेरक विकास कार्यक्रमों को लागू कर रहा है जिसके तहत रेशम उत्पदान के विकास के लिए बहुत सी केन्द्र प्रायोजित योजनाओं को राज्य सरकार के सहयोग से चलाया जा रहा है। उत्प्रेरक विकास कार्यक्रम के तहत सरकार ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान 821.74 करोड़ रुपए का व्यय किया है। इस कार्यक्रम के तहत कृषि अवसंरचना का विकास, गुणवत्ता आधारित कीटों और धागों की खरीद आदि शामिल है।
  मुख्य तौर पर तीन क्षेत्रों बीज, कीट तथा इसके बाद के क्षेत्रों के लिए सीडीपी वर्तमान में विभिन्न पैकेजों को कार्यान्वति कर रही है ताकि किसानों, कीट पालकों और बुनकरों सभछी को ग्यारहवीं योजना के लक्ष्य और उद्देश्य का लाभ प्राप्त हो सके।
संकुल विकास कार्यक्रम
  केन्द्रीय रेशम बोर्ड ने राज्यों के समन्वय के साथ 45 पूर्व-कीट और 5 बाद के मॉडल रेशम उत्पादक संकुलों का सह-आयोजन किया है। इसका उद्देश्य संकुल आधार पर रेशम उत्पादन को बढ़ावा देना है। इसका प्रमुख लक्ष्य एक सिलसिलेवार रुप में नवीनतम प्रैद्योगिकी का हस्तांतरण है।
  ग्यारहवीं योजना अवधि (मार्च-2012 तक) के दौरान सीएसबी ने उत्प्रेरक विकास कार्यक्रमों के तहत 16 राज्यों के लिए 52.11 करोड़रुपएकी राशि जारी की। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन से नई तकनीकों को अपनाने में तेजी के साथ ही किसानों के ज्ञान, फसल स्थितरता, उत्पादन और उत्पादकता तथा किसानों के आय स्तर में भी तेजी आई।
रेशम का निशान (सिल्क मार्क)
रेशम मूल्य-श्रृंखला के उपभोक्ताओं और हितधारकों के हितों की रक्षा के लिए वस्त्र मंत्रालय ने जून-2004 में "सिल्क मार्क" की एक विशिष्ट पहल की। सिल्क मार्क का लेबल इस बात की पुष्टि करता है कि जिस उत्पाद पर यह निशान लगा है वह असली रेशम का बना है जिसे वस्त्र मंत्रालयत के केन्द्रीय रेशम बोर्ड द्वारा संवर्धित सिल्क मार्क ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया द्वारा प्रस्तुत किया गया है। यह रेशम के मूल, मध्यवर्ती अथवा पूरे हो चुके उत्पादों पर लगाया जा सकता है जिसमें धागे, साडी , कपड़े, कालीन आदि शामिल है।
  इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं और इसके विशेषज्ञों के हितों की रक्षा करना है। जून-2004 में इसकी शुरुआत के बाद से 2150 से भी अधिक सदस्य इस संगठन में शामिल हुए हैं जिसमें से 1800 से अधिक अधिकृत उपयोगकर्ता हैं। लगभग 1.60 करोड़ रेशम निशान वाले उत्पाद उपभोक्तोँ के लाभ के लिए बाजार में पहुंच चुके हैं। उपभोक्ताओं के बीच अपनी पहचान बनाने के सात ही यह रेशम उद्योग में भी अपना भरोसा जगा रहा है। "सिल्क मार्क" को प्रोत्साहन देने के लिए लगातार चलाई जा रही गतिविधियों की वजह से  भारतीय रेशम उपभोक्ता अच्छी चीज के लिए और अधिक खोज करने लगे हैं जिससे असली रेशम उत्पादों की मांग आऩे वाले दिनों में बढ़ने वाली है। इसके अलावा सिल्क मार्क ऑर्गेनाइजेशन द्वारा देश भर में उपभोक्ताओं और व्यापारियों के लिए जागरुकता कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।          (पसूका फीचर)
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* वस्त्र मंत्रालय के केन्द्रीय रेशम बोर्ड से प्राप्त जानकारी के आधार पर
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मीणा/विजयलक्ष्मी-24


खत्‍म होते कश्‍मीरी रेशम उद्योग का पुनर्रूद्धार

Monday, January 14, 2013

माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश?

साइबर युद्ध का ख़तरा-अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से
वर्ष 2013 में दुनिया भर में साइबर हमलों की संख्या में बड़ी तेज़गति से वृद्धि होगी। कुछ ख़ास ठिकानों पर ऐसे हमले किए जाएंगे और सरकारी एजेंसियों पर विशाल पैमाने के हमले भी होंगे। यह निष्कर्ष एंटीवायरस निगम "कैसपेर्स्की लैब" के विशेषज्ञों ने निकाला है। अमरीकी खुफिया सेवाओं ने भविष्यवाणी की है कि आनेवाले 20 वर्षों में वैश्विक साइबर युद्ध शुरू हो जाएगा।

"कैसपेर्स्की लैब" के विश्लेषकों के मुताबिक, अगले साल कई सरकारी संस्थानों और व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों की निजी कंपनियों की गोपनीय जानकारी की चोरी बड़े पैमाने पर होने लगेगी। सामाजिक सेवाओं और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों पर साइबर हमले अक्सर होने की सम्भावना है।

गूगल और फेसबुक जैसी बड़ी बड़ी नेटवर्क कंपनियों के पास भारी मात्रा में ऑनलाइन जानकारी हासल करने की क्षमता होगी। इसके अलावा, संचार प्रौद्योगिकी के विकास की तेज़गति की बदौलत देशों की सरकारों का अपने नागरिकों पर असीम नियंत्रण हो जाएगा। लेकिन इन देशों के नागरिकों के पास भी अपनी सरकारों को चुनौतियाँ देने के कई अवसर मौजूद होंगे।

वर्तमान में, सूचना प्रौद्योगिकी हमारे समाज के सूचना क्षेत्र के विकास के संदर्भ में एक बड़ा ख़तरा बनती जा रही है। इस संबंध में रूस के सूचना सुरक्षा संघ के अध्यक्ष गेन्नादी येमेलियानोव ने रेडियो रूस को बताया –

ऐसा ख़तरा इसलिए बढ़ता जाएगा क्योंकि इस ख़तरे का एक टाइमबम फिट कर दिया जा चुका है। यदि हम समय पर पर्याप्त सुरक्षा उपाये नहीं करेंगे तो यह बम ज़रूर फटेगा और बड़े विनाश का कारण बनेगा। जब हम सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग के इतने ज्यादा आदी हो जाएंगे कि इसके बिना जीवन ही असंभव हो जाएगा तब पूरी दुनिया के लिए बहुत-सी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। ज़रा सोचिए, इस सूचना प्रौद्योगिकी ने अचानक ही काम करना बंद कर दिया है। अब आप क्या करेंगे? पूरा जीवन ठप्प। आप ज़रा कल्पना कीजिए कि सभी स्थानों पर बिजली गुल हो गई है। सारा काम ठप्प। वित्तीय और आर्थिक कारणों से भी ऐसा ख़तरा पैदा हो सकता है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी को अच्छी तरह से समझने वाले एक बहुत अच्छे दिमाग़ की ही ज़रूरत होगी।

अमरीकी खुफिया सेवाओं ने अपने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद को एक रिपोर्ट भेजी है जिसमें अमरीका के लिए मौजूदा साइबर हमलों के ख़तरों की समीक्षा की गई है। इसमें कहा गया है कि इस क्षेत्र में अमरीका के लिए सबसे बड़ा ख़तरा चीन से ही पैदा होगा। लॉस एंजिल्स टाइम्स में छपी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस, फ्रांस, इज़राइल और दुनिया के कुछ अन्य देश भी साइबर जासूसी करते हैं लेकिन वे उतना विश्वासघात नहीं करेंगे जितना कि चीन कर सकता है। कम से कम रूस ऐसा नहीं कर रहा है। वह अपने व्यापारियों के लाभ के लिए अमरीकी कंपनियों की जानकारियां चुराने की कोशिशें नहीं कर रहा है।

इस बीच, दिसंबर माह की शुरूआत में साइबर रक्षा पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मंच साइबर सुरक्षा एशिया- 2012 के भागीदार इस बात पर सहमत हुए थे कि सूचना प्रौद्योगिकी की दुनिया की मुख्य समस्या यह है कि दुनिया की सरकारें अभी तक यह तय नहीं कर पाई हैः साइबर-आतंकवाद क्या चीज़ है? कुछ देशों की सरकारें साइबर युद्ध के लिए सबसे प्रभावकारी मालवेयर का विकास कर रही हैं। लेकिन कोई भी सरकार यह गारंटी नहीं दे सकती हैं कि ये मालवेयर और वायरस आतंकवादियों के लिए भी उपलब्ध नहीं हो सकेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आतंकवादी गिरोह इन मालवेयरों और वायरसों का खूब इस्तेमाल करेंगे। इसलिए कहा जा सकता है कि आज भी दुनिया के कई देशों के लिए अपने ही साइबर संजाल में फंसने का बड़ा भारी ख़तरा बना हुआ है। माउस से एक ही “क्लिक” करने से पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता है। (
रेडियो रूस से साभार)
13.12.2012, 16:32         
साइबर युद्ध का ख़तरा

Saturday, January 21, 2012

उन्नति के पथ पर अग्रसर

राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र-आर के श्रीवास्तव*
राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र (एनसीडीपीडी) की स्थापना 1999 में भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) द्वारा की गई थी। राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र बोर्ड का प्रतिनिधित्व प्रतिष्ठित निर्यातक, नीति-निर्धारक और व्यापार तथा उद्योग के प्रतिष्ठित व्यक्ति करते हैं। भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) एनसीडीपीडी के पदेन अध्यक्ष होते हैं। यह केन्द्र सदस्य आधारित संस्था है जो प्रमुख तौर पर हस्तशिल्प क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। डिजाइन/उत्पाद विकास और प्रौद्योगिकी के कार्यक्षेत्रों में ठोस माल क्षेत्र के अंतर को पूरा करने के उद्देश्य के साथ इसकी शुरुआत की गई थी। समूहों के लिए पैन इंडिया आधार पर डिजाइन और उत्पाद विकास गतिविधियों को पूरा करने के लिए यह केन्द्र विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के करीबी सानिध्य में कार्य करता है। इस केन्द्र के तहत बहुत सारे राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय डिजाइनर विशेषीकृत डिजाइन/उत्पाद सेवाओं की संपूर्ण श्रेणी प्रदान करने के लिए कार्यरत है।
सेवाएं डिजाइन और उत्पाद विकास, प्रदर्शनी डिजाइन, ग्राफिक-डिजाइन और पैकेज डिजाइन जैसे कई क्षेत्रों में यह केन्द्र अपनी सेवाएं प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त एनसीडीपीडी सतत आपूर्ति प्रबंधन श्रृंखला का सृजन भी करता है। एनसीडीपीडी में गुणवत्ता और प्रौद्योगिकी उन्नयन के साथ ही डिजाइनरों की मदद से डिजाइनों को उत्पादों में तब्दील भी किया जाता है। डिजाइन केन्द्रों, उत्पाद केन्द्रों/संकुलों पर डिजाइन बैंक की स्थापना के जरिए एनसीडीपीडी ढांचागत सहयोग प्रदान करता है। डिजाइन और उत्पाद विकास को बढ़ावा देने के लिए यह औद्योगिक समूहों को शुरु से अंत तक डिजाइन सेवाएं प्रदान करता है। इस केन्द्र में बडे पैमाने पर उत्पादन के लिए मूलभूत कार्यों में मशीनीकरण के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध है।

उद्देश्यः- निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति करना एनसीडीपीडी का लक्ष्य है

·      अंतर-राष्ट्रीय खरीदारों की बदलती हुई पसंद और डिजाइन अवधारणाओं को पूरा करना।

·         हस्तशिल्प निर्यातक समुदाय को डिजाइनों के बारे में बदलते हुए प्रचलन और आगे आने वाले बदलावों के संबंध में नियमित तौर पर समय-समय पर जानकारी उपलब्ध कराना।

·         भारतीय डिजाइनों की विशिष्टता का सृजन और इसे सुदृढ़ बनाना

·         प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली आधुनिक तकनीकों के बदलते वैश्विक परिदृश्य के बारे में अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराना।

·         उत्पाद विकास और उन्नयन गुणवत्ता को समर्थन देना।

क्षमता/कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन

     एनसीडीपीडी को मानव संसाधन विकास कार्यक्रम की क्षमता/कौशल विकास के उन्नयन का जिम्मा सौंपा गया है ताकि वैश्विक बाज़ार खास तौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रतिस्पर्धी बाज़ार में मुकाबला किया जा सके। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं :-

·         कुल 500 कार्यक्रमों का संचालन किया गया।

·         पिछले दो वर्षों में 11,000 कारीगरों/शिल्पकारों को प्रशिक्षित किया गया।

·         पूर्वोत्तर क्षेत्र सहित समूचे भारत में 30 से भी अधिक शिल्प संकुलों को समाविष्ट किया गया।

·         समूचे भारत में 200 से भी अधिक संकायों/स्रोत संपन्न व्यक्तियों के साथ गठजोड़।

·         अच्छी तरह से संरचित पाठ्यक्रम

·         एक से पांच के पैमाने पर कार्यक्रम को 4.5 अंक प्रदान किया गया।

भारतीय उपमहाद्वीप में सतत रोज़गार के लिए भारत और बांग्लादेश के बीच पटसन (जूट) क्षेत्र में सहमति-ज्ञापन पर हस्ताक्षर
   पटसन क्षेत्र में उत्पाद और डिजाइन विकास द्वारा भारत तथा बांग्लादेश में सतत मूल्य आधारित रोजगार को बढ़ावा देने के लिए एनसीडीपीडी ने इस वर्ष यूएनटीएडी के तहत बांग्लादेश में अंतर-राष्ट्रीय जूट स्टडी ग्रुप (आईजेएसजी) के साथ गठजोड और समन्वय किया। इस सहमति ज्ञापन से पटसन से संबंधित कार्यशालाओं, बैठकों और प्रकाशनों आदि के द्वारा सतत रोज़गार और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए दोनों देशों के बीच अनुसंधान और डिजाइन गठजोड़ गतिविधियों को बल मिलेगा। इस सहमति ज्ञापन के जरिए जूट से संबंधित विविध उत्पाद क्षेत्रों के उद्यमियों, निर्यातकों तथा कारीगरों आदि के लिए आईजीएसजे नवीन/आकर्षक डिजाइनों और उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रमों आदि में सहयोग देगा तथा एनसीडीपीडी जूट के क्षेत्र में संयुक्त गतिविधियों के विकास और क्रियान्वयन के लिए डिजाइनरों और विशेषज्ञों को उपलब्ध कराएगा।

भारत-अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भागीदारी
  14-27 नवंबर के बीच आयोजित भारत अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले के लिए इस वर्ष का विषय था- "इंडियन हैंडिक्राफ्ट- द मैदिक ऑफ द गिफ्टेड हैंड्स"। इसे ध्यान में रखते हुए एनसीडीपीडी ने अंतर-राष्ट्रीय व्यापार मेले में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए थीम पैवेलियन की स्थापना की। इसके तहत वैश्विक फलक पर भारतीय हस्तशिल्प की विस्तृत श्रृंखला की प्रस्तुति की गई। इस प्रदर्शनी के ज़रिए हस्तशिल्पियों/कारीगरों और छोटे निर्माताओं को अपने लिए बेहतर बाजार संबंधों का निर्माण करने में मदद मिली। एनसीडीपीडी के पैवेलियन की ओर प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोग आकर्षित हुए।।


गणतंत्र दिवस परेड-2012 में झांकी का प्रस्तुतिकरण
   भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तहत विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) कार्यालय द्वारा एनसीडीपीडी को गणतंत्र दिवस परेड-2012 में हस्तशिल्प पर झांकी प्रस्तुत करने के लिए केन्द्रीय एजेंसी के रुप में नियुक्त किया गया है। झांकी के लिए चयनित विषय "प्राचीन से नवीनः भारतीय वस्त्र और हस्तशिल्प क्षेत्र में विकास" है।

भविष्य के लिए रणनीतियां
·         नवीन उत्पाद श्रृंखला
Ø      सौ से भी अधिक नवीन उत्पाद श्रृंखला को प्रस्तुत करना।

Ø      स्थापित उत्पाद समूहों को नवीन बाज़ारों में शुरु करना।

·         उत्पाद श्रृंखला में विविधता लाना

Ø   सजावटी उपकरणों के रुप में भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देना

Ø   गिफ्ट के रुप में हस्तशिल्प की अवधारणा को बढ़ावा देना

Ø   डिजाइन की प्रमुखता के साथ अभिनव उत्पाद समूह

·         गुणवत्ता में सुधार लाना

Ø   वैधानिक आवश्यकताएं/फैक्टरी अनुपालन/सामाजिक अंकेक्षण/प्रमाणपत्रों

Ø   परीक्षण और फैक्टरी प्रमाणन/क्रय-विक्रय और समर्थन सेवाएं

           एनसीडीपीडी कारीगरों और शिल्पकारों की कौशल क्षमता/विकास के लिए प्रतिबद्ध है और आने वाले समय में भी यह सिलसिला अनवरत जारी रहेगा। साथ ही भारतीय हस्तशिल्प में डिजाइन और उत्पाद विकास के नवीन आयामों को विकसित करने की प्रक्रिया जारी रहेगी।

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*लेखक राष्ट्रीय डिजाइन और उत्पाद विकास केन्द्र में कार्यकारी निदेशक हैं
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