01-मार्च-2013 19:20 IST
उप-राष्ट्रपति द्वारा पुस्तक का विमोचन
'वाकिंग विद लॉयन्स: टेल्स फ्रॉम ए डिप्लोमेटिक पास्ट' का विमोचन
उपराष्ट्रपति श्री एम. हामिद अंसारी ने आज एक कार्यक्रम में भूतपूर्व केन्द्रीय विदेश मंत्री श्री के.नटवर सिंह द्वारा लिखित पुस्तक 'वाकिंग विद लॉयन्स: टेल्स फ्रॉम ए डिप्लोमेटिक पास्ट' का विमोचन किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि श्री नटवर सिंह ने अपने सभी अनुभवों को दिलचस्प तरीके से लिखा है और मुझे आशा है कि लोग इस पुस्तक को पढ़कर आनंद का अनुभव करेंगे। इस पुस्तक में लेखक ने अपने 50 प्रसंगों को एक सूत्र में पिरोया है। इस संग्रह में अनुभूति और मनोभाव का मनोरंजक वर्णन किया गया है। (PIB)***
वि.कासोटिया/इन्द्रपाल/रामकिशन-788
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Saturday, March 02, 2013
Friday, February 08, 2013
कुंभ-इलाहाबाद: पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन
Thu, Feb 7, 2013 at 3:04 PM
विमोचन हुआ संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा कुम्भ में
कुंभ-इलाहाबाद:कुंभ के पावन अवसर पर संतो के आशीर्वचन से दिल्ली के युवा लेखक राजीव गुप्ता की पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा कुम्भ में हुआ। पुस्तक विमोचन के समय मंच पर कांची कामकोटि शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, सर्वश्री अशोक सिंघल, प्रवीण भाई तोगड़िया, दिनेश जी एवं कई संत समाज के धर्माचार्य उपस्थित थे। यह पुस्तक कश्मीर-समस्या, धर्मांतरण, मंहगाई, भ्रष्टाचार, एफडीआई जैसे ज्वलंत विषयों पर राजीव गुप्ता के देश अनेक प्रसिद्ध हिन्दी अखबारों में प्रकाशित समसामयिक लेखों का संग्रह है। राजीव गुप्ता के अनुसार इस पुस्तक का उद्देश्य यह है-पिछले दिनों जयपुर मे संपन्न हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में भारत के गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिन्दे द्वारा मात्र वोट बैंक की राजनीति के चलते 'आतंकवादी' कहकर संघ पर परोक्ष रूप से कुठाराघात करने के परिणामस्वरूप करोड़ो हिन्दुओ के साथ-साथ संघ के स्वयंसेवकों की जन - भावनाएँ आहत हुई हैं। विहिप के श्री चम्पत राय ने कहा कि नि:स्वार्थ भावना से देश की सेवा करना यही संघ है। मानव की यह प्रवृत्ति अछूत कैसे हो सकती है; अत: संघ अछोत नहीं है। देश का हर युवा यह सोचने पर बाध्य है कि आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी आज देश की जनता भुखमरी, बेरोजगारी, नक्सलवाद, आतंकवाद जैसी वीभत्स समस्याओं से क्यों जूझ रही है? हर भारतीयों के लिए देश सर्वोपरि ही है तथा वैचारिक मतभेद से लोकतंत्र और मजबूत ही होता है। साथ ही उन्होने यह सवाल भी देश की जनता से पूछा है कि इससे कांग्रेस सरकार को भला आपत्ति क्यों है; साथ ही क्या स्वतंत्र भारत में कोई अपनी आवाज नहीं उठा सकता।
विनोद बंसल
मीडिया प्रमुख, दिल्ली
विहिप12:15
कुंभ-इलाहाबाद: पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन
विमोचन हुआ संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा कुम्भ में
कुंभ-इलाहाबाद:कुंभ के पावन अवसर पर संतो के आशीर्वचन से दिल्ली के युवा लेखक राजीव गुप्ता की पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन संघ प्रमुख मोहन भागवत के कर कमलों द्वारा कुम्भ में हुआ। पुस्तक विमोचन के समय मंच पर कांची कामकोटि शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती, सर्वश्री अशोक सिंघल, प्रवीण भाई तोगड़िया, दिनेश जी एवं कई संत समाज के धर्माचार्य उपस्थित थे। यह पुस्तक कश्मीर-समस्या, धर्मांतरण, मंहगाई, भ्रष्टाचार, एफडीआई जैसे ज्वलंत विषयों पर राजीव गुप्ता के देश अनेक प्रसिद्ध हिन्दी अखबारों में प्रकाशित समसामयिक लेखों का संग्रह है। राजीव गुप्ता के अनुसार इस पुस्तक का उद्देश्य यह है-पिछले दिनों जयपुर मे संपन्न हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में भारत के गृहमंत्री श्री सुशील कुमार शिन्दे द्वारा मात्र वोट बैंक की राजनीति के चलते 'आतंकवादी' कहकर संघ पर परोक्ष रूप से कुठाराघात करने के परिणामस्वरूप करोड़ो हिन्दुओ के साथ-साथ संघ के स्वयंसेवकों की जन - भावनाएँ आहत हुई हैं। विहिप के श्री चम्पत राय ने कहा कि नि:स्वार्थ भावना से देश की सेवा करना यही संघ है। मानव की यह प्रवृत्ति अछूत कैसे हो सकती है; अत: संघ अछोत नहीं है। देश का हर युवा यह सोचने पर बाध्य है कि आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी आज देश की जनता भुखमरी, बेरोजगारी, नक्सलवाद, आतंकवाद जैसी वीभत्स समस्याओं से क्यों जूझ रही है? हर भारतीयों के लिए देश सर्वोपरि ही है तथा वैचारिक मतभेद से लोकतंत्र और मजबूत ही होता है। साथ ही उन्होने यह सवाल भी देश की जनता से पूछा है कि इससे कांग्रेस सरकार को भला आपत्ति क्यों है; साथ ही क्या स्वतंत्र भारत में कोई अपनी आवाज नहीं उठा सकता।
विनोद बंसल
मीडिया प्रमुख, दिल्ली
विहिप12:15
कुंभ-इलाहाबाद: पुस्तक 'संघ अछूत है क्या ?' का विमोचन
Tuesday, February 05, 2013
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला – 2013
04-फरवरी-2013 18:38 IST
प्रकाशन के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देने पर जोर
एक सप्ताह तक चलने वाले नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला–2013 की आज यहां शुरूआत हुई। पुस्तक मेले का उद्घाटन करते हुए मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डाक्टर शशि थरूर ने कहा कि पुस्तकों, फिल्मों और कला में प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता का बढ़ना अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि जो लोग इन मुद्दों पर अलग राय रखते हैं, उन्हें इनपर प्रतिबंध लगाने की मांग करने की जगह तर्क एवं परिचर्चा करनी चाहिए। उन्होंने प्रकाशन के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
इससे पहले भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर करण सिंह ने अपने भाषण में देश में मूल्य आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का आह्वान किया, क्योंकि इससे युवाओं को सकारात्मक मूल्यों को सिखाने में मदद मिलेगी। इस अवसर पर भारत में फ्रांस के राजदूत श्री फ्रेंकोईस रिचियर ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
इस पुस्तक मेले में चीन, अमरीका, पोलैंड, तुर्की सहित लगभग 23 देश और चार अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भाग ले रहे हैं। (PIB)
वि.कासोटिया/सुधीर/सुनील -434
प्रकाशन के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देने पर जोर
एक सप्ताह तक चलने वाले नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला–2013 की आज यहां शुरूआत हुई। पुस्तक मेले का उद्घाटन करते हुए मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डाक्टर शशि थरूर ने कहा कि पुस्तकों, फिल्मों और कला में प्रतिस्पर्धी असहिष्णुता का बढ़ना अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि जो लोग इन मुद्दों पर अलग राय रखते हैं, उन्हें इनपर प्रतिबंध लगाने की मांग करने की जगह तर्क एवं परिचर्चा करनी चाहिए। उन्होंने प्रकाशन के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
इससे पहले भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर करण सिंह ने अपने भाषण में देश में मूल्य आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का आह्वान किया, क्योंकि इससे युवाओं को सकारात्मक मूल्यों को सिखाने में मदद मिलेगी। इस अवसर पर भारत में फ्रांस के राजदूत श्री फ्रेंकोईस रिचियर ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
इस पुस्तक मेले में चीन, अमरीका, पोलैंड, तुर्की सहित लगभग 23 देश और चार अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भाग ले रहे हैं। (PIB)
वि.कासोटिया/सुधीर/सुनील -434
Thursday, January 31, 2013
महात्मा गांधी:शहादत की वर्षगांठ
31-जनवरी-2013 15:11 IST
''फेथ एंड फ्रीडम: गांधी इन हिस्ट्री'' का विमोचन
हमेशा ही विशेषज्ञों और सामान्य पाठकों के बीच रुचिकर और उपयुक्त रहा है-उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति श्री एम. हामिद अंसारी ने कहा कि गांधी जी पर शैक्षणिक कार्य हमेशा ही विशेषज्ञों और सामान्य पाठकों के बीच रुचिकर और उपयुक्त रहा है। उनकी शहादत की वर्षगांठ पर इस कार्य का विमोचन अपने आप में गौरव प्रदान करता है। उन्होंने प्रो. मुशीरूल हसन द्वारा लिखी गई पुस्तक ''फेद एंड फ्रीडम: गांधी इन हिस्ट्री'' का विमोचन करने के बाद संबोधन में कहा कि गांधी जी पर लिखे सभी लेख इंसान, शिक्षक, समाज सुधारक, जन-नेता, सांप्रदायिक सद्भाव के उपदेशक, शक्तिशाली साम्राज्य के प्रतिवादी, नए तरह के राजनीतिक सक्रियतावाद के निर्माता अपने देश तथा नागरिकों की महान आत्माओं के कुछ पहलुओं पर आधारित है। प्रो. मुशीरूल हसन की पुस्तक पारंपरिक जीवनी और मानक इतिहास से परे है। यह पुस्तक विषयों के माध्यम से इतिहास के अनुसार चलती है। यह पुस्तक महात्मा गांधी के जीवन के उन पहलुओं तथा उनके द्वारा किए गए कार्य पर प्रकाश डालती है, जो हमें पता है परंतु उनका पर्याप्त विश्लेषण नहीं हो पाया है।
उन्होंने बताया कि प्रो. मुशीरूल हसन का ध्यान गांधी जी के विचार तथा कार्य के दो विशिष्ट पहलुओं के विश्लेषण पर केंद्रित है। पहला उनकी ''काँग्रेसी मुसलमानों के साथ जटिल तथा अस्थिर संबंध जोकि एक अपेक्षाकृत अज्ञात प्रजाति और जिन कारणों से उन्होंने लीग के दावे यानी पाकिस्तान का चयन किया'' और दूसरा ''गांधी जी का दक्षिण एशिया में स्पष्टता और समझदारी से इस्लाम और मुस्लिम समुदाय की समझ की व्याख्या करना' (PIB)
***गांधी जी पर शैक्षणिक कार्य
Monday, February 27, 2012
इंडिया रेफरेंस एनुअल-2012 का विमोचन
56वां संस्करण:प्रथम स्तर में अंग्रेजी और हिन्दी में 67000 प्रतिलिपियां मुद्रित
सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री श्री चौधरी मोहन जटुआ ने आज ‘’इंडिया रेफरेंस एनुअल 2012’’ और ‘’भारत 2012’’ का विमोचन किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में श्री जटुआ ने कहा कि यह राज्यों और संघ शासित प्रदेशों, संवैधानिक संशोधनों और विभिन्न क्षेत्रों में की गई उपलब्धियों की सूचनाओं का एक व्यापक संग्रह है। मंत्री महोदय ने उच्चस्तरीय रेफरेंस एनुअल को तैयार करने और इस तरह के एक उच्चस्तरीय प्रकाशन को सामने लाकर सुधार की एक समृद्ध परंपरा बनाने के लिए प्रकाशन विभाग और अनुसंधान संदर्भ एवं प्रशिक्षण विभाग को बधाइयां दीं। श्री जटुआ ने यह महसूस किया कि इस प्रकाशन के वार्षिक मुद्रण में पिछले वर्षों के मुकाबले तेजी से वृद्धि हुई है। इस वर्ष के प्रथम स्तर में अंग्रेजी और हिन्दी में 67000 प्रतिलिपियां मुद्रित की गईं हैं। मंत्री महोदय ने कहा कि भारत और विदेशों में लोगों को इस प्रतिष्ठित प्रकाशन के विपणन के लिए प्रकाशन विभाग को अधिक प्रयास करने चाहिए।
इस अवसर पर अपने संबोधन में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री उदय कुमार वर्मा ने कहा कि प्रकाशन विभाग को प्रकाशन की पहुंच को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग के प्रयास करने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अगले वर्ष के लिए मीडिया इकाई को पुस्तक को तीन प्रारूपों जैसे मुद्रित प्रारूप, सीडी और इलेक्ट्रॉनिक संस्करण के तौर पर सामने लाने का प्रयास करना चाहिए। सचिव महोदय ने कहा कि प्रभाग को मुद्रित प्रतिलिपियों की संख्या बढा़ने और उत्पाद के बेहतर विपणन को सुनिश्चित करने के प्रयास भी करने चाहिए।
इंडिया-2012 प्रकाशन विभाग द्वारा संपादित, प्रकाशित और विपणन किया गया रेफरेंस एनुअल का एक नवीनतम और व्यापक संस्करण है। मंत्रालय का अनुसंधान, संदर्भ और प्रशिक्षण विभाग (आरआरएंडटीडी) वार्षिक पुस्तकों के लिए मूल सामग्री का संग्रह करता है। इस सामग्री को केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों, राज्य सरकारों, संघ शासित प्रदेशों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों और स्वायत्त निकायों से एकत्रित किया जाता है।
इस वार्षिक प्रकाशन में ग्रामीण, शहरी विकास, उ़द्योग और बुनियादी ढांचे, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कला और संस्कृति, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, रक्षा, शिक्षा और जन-संचार के क्षेत्रों में देश की प्रगति का एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रकाशन 56वां संस्करण है। {पीआईबी} [27-फरवरी-2012 19:59 IST]
सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री श्री चौधरी मोहन जटुआ ने आज ‘’इंडिया रेफरेंस एनुअल 2012’’ और ‘’भारत 2012’’ का विमोचन किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में श्री जटुआ ने कहा कि यह राज्यों और संघ शासित प्रदेशों, संवैधानिक संशोधनों और विभिन्न क्षेत्रों में की गई उपलब्धियों की सूचनाओं का एक व्यापक संग्रह है। मंत्री महोदय ने उच्चस्तरीय रेफरेंस एनुअल को तैयार करने और इस तरह के एक उच्चस्तरीय प्रकाशन को सामने लाकर सुधार की एक समृद्ध परंपरा बनाने के लिए प्रकाशन विभाग और अनुसंधान संदर्भ एवं प्रशिक्षण विभाग को बधाइयां दीं। श्री जटुआ ने यह महसूस किया कि इस प्रकाशन के वार्षिक मुद्रण में पिछले वर्षों के मुकाबले तेजी से वृद्धि हुई है। इस वर्ष के प्रथम स्तर में अंग्रेजी और हिन्दी में 67000 प्रतिलिपियां मुद्रित की गईं हैं। मंत्री महोदय ने कहा कि भारत और विदेशों में लोगों को इस प्रतिष्ठित प्रकाशन के विपणन के लिए प्रकाशन विभाग को अधिक प्रयास करने चाहिए।
इस अवसर पर अपने संबोधन में, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री उदय कुमार वर्मा ने कहा कि प्रकाशन विभाग को प्रकाशन की पहुंच को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग के प्रयास करने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अगले वर्ष के लिए मीडिया इकाई को पुस्तक को तीन प्रारूपों जैसे मुद्रित प्रारूप, सीडी और इलेक्ट्रॉनिक संस्करण के तौर पर सामने लाने का प्रयास करना चाहिए। सचिव महोदय ने कहा कि प्रभाग को मुद्रित प्रतिलिपियों की संख्या बढा़ने और उत्पाद के बेहतर विपणन को सुनिश्चित करने के प्रयास भी करने चाहिए।
इंडिया-2012 प्रकाशन विभाग द्वारा संपादित, प्रकाशित और विपणन किया गया रेफरेंस एनुअल का एक नवीनतम और व्यापक संस्करण है। मंत्रालय का अनुसंधान, संदर्भ और प्रशिक्षण विभाग (आरआरएंडटीडी) वार्षिक पुस्तकों के लिए मूल सामग्री का संग्रह करता है। इस सामग्री को केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों, राज्य सरकारों, संघ शासित प्रदेशों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों और स्वायत्त निकायों से एकत्रित किया जाता है।
इस वार्षिक प्रकाशन में ग्रामीण, शहरी विकास, उ़द्योग और बुनियादी ढांचे, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कला और संस्कृति, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, रक्षा, शिक्षा और जन-संचार के क्षेत्रों में देश की प्रगति का एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाता है। यह प्रकाशन 56वां संस्करण है। {पीआईबी} [27-फरवरी-2012 19:59 IST]
Wednesday, November 23, 2011
विशेष पुस्तक का विमोचन 24 को
आयोजन में प्रमुख वक्ता होंगें श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी
समाजनीति समीक्षण केंद्र की ओर से एक महत्वपूर्ण पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है.
भारत की अनुसूचित जनजातियाँ : धर्मानुसार जनसांख्यिकी एवं प्रतिनिधित्व
(Schedule Tribes of India : Religious Demography and Representation) नाम की इस पुस्तिक का विमोचन २४ नवम्बर को दिल्ली में किया जा रहा है.
इस पुस्तक का लोकार्पण समारोह 24 नवम्बर 2011 , बृहस्पतिवार को सायं 5 .30 बजे को दीनदयाल शोध संस्थान, झंडेवालान विस्तार, दिल्लीआयोजित किया जा रहा है. इस एथिहैस्क मौके पर आप भी सदर सादर आमंत्रित हैं !
वनवासी कल्याण आश्रम अध्यक्ष के मीडिया विभाग की ओर से माननीय भाई राजीव गुप्ता ने बताया कि कार्यक्रम कि अध्यक्षता लोक सभा के उपसभापति श्री करिया मुंडा करेंगे.जबकि प्रमुख वक्ता होंगें श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी. इस शुभ अवसर पर श्री जूएल ओराम एवं श्री दिलीप सिंह भूरिया
भी विशेष अतिथि के रूप में शामिल होंगें.
नोट : पंचकुइयां मार्ग से दीनदयाल शोध संस्थान आते हुए मुख्य मार्ग पर बायीं ओर से सार्वजानिक पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है !
समाजनीति समीक्षण केंद्र की ओर से एक महत्वपूर्ण पुस्तिका का प्रकाशन किया गया है.
भारत की अनुसूचित जनजातियाँ : धर्मानुसार जनसांख्यिकी एवं प्रतिनिधित्व
(Schedule Tribes of India : Religious Demography and Representation) नाम की इस पुस्तिक का विमोचन २४ नवम्बर को दिल्ली में किया जा रहा है.
इस पुस्तक का लोकार्पण समारोह 24 नवम्बर 2011 , बृहस्पतिवार को सायं 5 .30 बजे को दीनदयाल शोध संस्थान, झंडेवालान विस्तार, दिल्लीआयोजित किया जा रहा है. इस एथिहैस्क मौके पर आप भी सदर सादर आमंत्रित हैं !
वनवासी कल्याण आश्रम अध्यक्ष के मीडिया विभाग की ओर से माननीय भाई राजीव गुप्ता ने बताया कि कार्यक्रम कि अध्यक्षता लोक सभा के उपसभापति श्री करिया मुंडा करेंगे.जबकि प्रमुख वक्ता होंगें श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी. इस शुभ अवसर पर श्री जूएल ओराम एवं श्री दिलीप सिंह भूरिया
भी विशेष अतिथि के रूप में शामिल होंगें.
नोट : पंचकुइयां मार्ग से दीनदयाल शोध संस्थान आते हुए मुख्य मार्ग पर बायीं ओर से सार्वजानिक पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है !
Tuesday, October 18, 2011
समीक्षा//बंद कमरा//अलका सैनी
"बंद कमरा" उपन्यास का हिंदी अनुवाद दिनेश माली जी का सर्वश्रेष्ठ अनुवाद है . सरोजिनी साहू जी के उड़िया उपन्यास "गंभीरी घर" के हमारी मातृ भाषा हिंदी के इतने खूबसूरत अनुवाद को हम तक पहुंचाने का सारा श्रेय जाने माने प्रकाशक "राज पाल एंड संज" को जाता है जिन्होंने दिनेश जी की काबलियत को पहचाना . इससे पहले भी राज पाल एंड संज से उनका अनूदित कहानी संग्रह " रेप तथा अन्य कहानियाँ 'छप चुका है . दिनेश जी के अनुवाद की एक- एक पंक्ति और ख़ास कर कविताएँ तो भावनाओं से इस तरह से ओत प्रोत हैं जैसे एक- एक शब्द उन्होंने उपन्यास को महसूस करके लिखा है .
सरोजिनी साहू जी एक नारीवादी लेखिका हैं . इस उपन्यास में उन्होंने बहुत ही खूबी से औरत के मन की छुपी हुई भावनाओं को व्यक्त किया है कि कैसे शादी के बाद कदम- कदम पर औरत कभी बीवी ,कभी बहू और कभी माँ बनकर अपने आप की बलि देती चुप चाप सब सहती रहती है . यह उपन्यास विवाह उपरान्त एक औरत के मन में प्रेम की इच्छा के तहत उठती हुई तरंगो को दर्शाता है परन्तु आज के समाज में भी इसे आलोचना की दृष्टि से देखा जा सकता है . भारतीय समाज में जहाँ शादी एक ऐसा बंधन माना जाता है जिसमे औरत पर परोक्ष रूप से तो अंकुश माना जाता ही है एवं उसके मन, उसकी भावनाओं पर भी अंकुश लगा दिया जाता है . अगर कोई औरत अपने पति से वह प्यार नहीं पा सकती जिसको पाना हर औरत चाहती है तो उसका मन किस प्रकार विचलित रहता है जिसके बारे में कई बार वह खुद भी नहीं जान पाती . जैसे कुछ साल पहले करण जोहर फिल्म निर्देशक की फिल्म "कभी अलविदा ना कहना" काफी आलोचनाओं का शिकार हुई . आज के युग में भी शादी के बाद के प्यार को काफी संकीर्ण नजरों से देखा जाता है इसलिए काफी कम लोगों ने इस विषय पर फिल्म बनाने या लिखने की हिम्मत जुटाई . और यह आज के समाज में एक प्रश्न चिन्ह भी छोड़ता है कि एक औरत के लिए कहाँ तक जायज है अपनी इच्छाओं का दमन करना ? पर समय काफी तेजी से बदल रहा है . अगर शादी के बाद पति- पत्नी एक दूसरे से संतुष्ट नहीं तो क्या उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए . प्यार के बिना किसी रिश्ते को घसीटना तो एक समझौता ही कहलाता है. लेखिका ने इस विषय को काफी बेबाकी से लिखा है कि प्यार किसी भी बंधन फिर चाहे वो विवाह का हो, देश का हो, धर्म का हो या जाति का हो किसी को नहीं मानता. हमारे धार्मिक इतिहास में भी श्री कृष्ण जी का रुक्मणी के साथ विवाह होने के उपरान्त भी राधा से प्रेम दिखाया है. लेखिका ने एक जगह पर नायिका के मन की स्थिति दर्शाई है जहाँ वह मन ही मन अपने पति से कहती है कि "बेबी" जैसे छोटे से शब्द के संबोधन में कितना अपार प्रेम और दो जहान का सुख समाया है जिसे उसका पति नहीं जान पाता और ना ही वह उसे अपने मन की बात खुल कर कभी कह पाती है. लेखिका ने इस उपन्यास में यही दिखाने की कोशिश की है कि औरत कितनी भावुक और संवेदन शील होती है. प्रेम एक बहुत ही पवित्र बंधन है जो कि दो आत्माओं का मिलन होता है और जिस्म की परिभाषा से काफी ऊपर उठ जाता है. मीरा ने विवाह उपरान्त कृष्ण जी से प्रेम किया था और जब प्यार असीम हो जाता है तो भक्ति का रूप ले लेता है. उपन्यास में भी यही दिखाया गया है कि नायक जो कि बहुत सी औरतों को भोग चुका होता है नायिका के अपने जीवन में आने से अपने अन्दर एक अजीब सा बदलाव महसूस करता है जबकि वो दोनों कभी मिले नहीं होते और वह नायिका को अपनी देवी मानने लगता है. यही तो प्रेम की परकाष्ठा मानी जाती है जबकि आजकल लोगों ने प्रेम को जिस्म तक सीमित करके प्रेम का स्तर नीचे गिरा दिया है. ऐसे उपन्यास से आभास होता है कि प्रेम कितना अद्भुत होता है उसका अहसास इंसान को किस कदर हजारों मील दूर से भी महसूस होता है . इस उपन्यास को पढ़ते- पढ़ते मुझे मनु भंडारी जी की कहानियाँ याद आ गई जिन्होंने प्यार के बारे में काफी गहराई से लिखा है. इनकी कहानियाँ "यह सच है" , "स्त्री सुबोधिनी" , "एक बार और" में उन्होंने औरत को काफी भावुक प्रवृति की दिखाया है और प्यार को पाने के लिए वह किसी भी हद तक चली जाती हैं. उन्होंने आदमी का रूप काफी नकारात्मक दिखाया है कि औरत काफी बार आदमी के हाथों इस्तेमाल होती है और बेवकूफ बन जाती है. यहाँ उन्होंने शादी शुदा आदमी के स्वार्थ को दिखाया है कि आदमी प्यार तो करना जानता है पर उसमे इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह अपनी शादी को दाव पर लगा कर किसी औरत को जिसे वो प्यार करने का दम भरता है अपनाने की हिम्मत नहीं रखता. औरत जबकि प्यार के लिए काफी खतरा उठा लेती है वहीँ आदमी काफी प्रैक्टीकल होते हैं जो कि प्यार भी काफी नाप तोल कर करते है.
इसके विपरीत इस उपन्यास में लेखिका ने एक शादी शुदा आदमी के आध्यात्मिक, अद्भुत प्रेम को दिखाया है और एक शादी शुदा औरत भी उस प्रेम को पाकर अपने आप को एक अलग ही दुनिया में महसूस करती है क्योंकि अगर उसे विवाह उपरान्त पूरा प्यार नहीं मिलता तो प्यार पाने के लिए वह किस कदर नदी की तरह बहती चली जाती है. --अलका सैनी
Written By : Sarojini Sahoo
translated by Dinesh kumar Mali
Price : INR 150/-
Format : Paperback
ISBN : 978 81 7028 954 8
सरोजिनी साहू जी एक नारीवादी लेखिका हैं . इस उपन्यास में उन्होंने बहुत ही खूबी से औरत के मन की छुपी हुई भावनाओं को व्यक्त किया है कि कैसे शादी के बाद कदम- कदम पर औरत कभी बीवी ,कभी बहू और कभी माँ बनकर अपने आप की बलि देती चुप चाप सब सहती रहती है . यह उपन्यास विवाह उपरान्त एक औरत के मन में प्रेम की इच्छा के तहत उठती हुई तरंगो को दर्शाता है परन्तु आज के समाज में भी इसे आलोचना की दृष्टि से देखा जा सकता है . भारतीय समाज में जहाँ शादी एक ऐसा बंधन माना जाता है जिसमे औरत पर परोक्ष रूप से तो अंकुश माना जाता ही है एवं उसके मन, उसकी भावनाओं पर भी अंकुश लगा दिया जाता है . अगर कोई औरत अपने पति से वह प्यार नहीं पा सकती जिसको पाना हर औरत चाहती है तो उसका मन किस प्रकार विचलित रहता है जिसके बारे में कई बार वह खुद भी नहीं जान पाती . जैसे कुछ साल पहले करण जोहर फिल्म निर्देशक की फिल्म "कभी अलविदा ना कहना" काफी आलोचनाओं का शिकार हुई . आज के युग में भी शादी के बाद के प्यार को काफी संकीर्ण नजरों से देखा जाता है इसलिए काफी कम लोगों ने इस विषय पर फिल्म बनाने या लिखने की हिम्मत जुटाई . और यह आज के समाज में एक प्रश्न चिन्ह भी छोड़ता है कि एक औरत के लिए कहाँ तक जायज है अपनी इच्छाओं का दमन करना ? पर समय काफी तेजी से बदल रहा है . अगर शादी के बाद पति- पत्नी एक दूसरे से संतुष्ट नहीं तो क्या उन्हें दूसरा मौका नहीं मिलना चाहिए . प्यार के बिना किसी रिश्ते को घसीटना तो एक समझौता ही कहलाता है. लेखिका ने इस विषय को काफी बेबाकी से लिखा है कि प्यार किसी भी बंधन फिर चाहे वो विवाह का हो, देश का हो, धर्म का हो या जाति का हो किसी को नहीं मानता. हमारे धार्मिक इतिहास में भी श्री कृष्ण जी का रुक्मणी के साथ विवाह होने के उपरान्त भी राधा से प्रेम दिखाया है. लेखिका ने एक जगह पर नायिका के मन की स्थिति दर्शाई है जहाँ वह मन ही मन अपने पति से कहती है कि "बेबी" जैसे छोटे से शब्द के संबोधन में कितना अपार प्रेम और दो जहान का सुख समाया है जिसे उसका पति नहीं जान पाता और ना ही वह उसे अपने मन की बात खुल कर कभी कह पाती है. लेखिका ने इस उपन्यास में यही दिखाने की कोशिश की है कि औरत कितनी भावुक और संवेदन शील होती है. प्रेम एक बहुत ही पवित्र बंधन है जो कि दो आत्माओं का मिलन होता है और जिस्म की परिभाषा से काफी ऊपर उठ जाता है. मीरा ने विवाह उपरान्त कृष्ण जी से प्रेम किया था और जब प्यार असीम हो जाता है तो भक्ति का रूप ले लेता है. उपन्यास में भी यही दिखाया गया है कि नायक जो कि बहुत सी औरतों को भोग चुका होता है नायिका के अपने जीवन में आने से अपने अन्दर एक अजीब सा बदलाव महसूस करता है जबकि वो दोनों कभी मिले नहीं होते और वह नायिका को अपनी देवी मानने लगता है. यही तो प्रेम की परकाष्ठा मानी जाती है जबकि आजकल लोगों ने प्रेम को जिस्म तक सीमित करके प्रेम का स्तर नीचे गिरा दिया है. ऐसे उपन्यास से आभास होता है कि प्रेम कितना अद्भुत होता है उसका अहसास इंसान को किस कदर हजारों मील दूर से भी महसूस होता है . इस उपन्यास को पढ़ते- पढ़ते मुझे मनु भंडारी जी की कहानियाँ याद आ गई जिन्होंने प्यार के बारे में काफी गहराई से लिखा है. इनकी कहानियाँ "यह सच है" , "स्त्री सुबोधिनी" , "एक बार और" में उन्होंने औरत को काफी भावुक प्रवृति की दिखाया है और प्यार को पाने के लिए वह किसी भी हद तक चली जाती हैं. उन्होंने आदमी का रूप काफी नकारात्मक दिखाया है कि औरत काफी बार आदमी के हाथों इस्तेमाल होती है और बेवकूफ बन जाती है. यहाँ उन्होंने शादी शुदा आदमी के स्वार्थ को दिखाया है कि आदमी प्यार तो करना जानता है पर उसमे इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह अपनी शादी को दाव पर लगा कर किसी औरत को जिसे वो प्यार करने का दम भरता है अपनाने की हिम्मत नहीं रखता. औरत जबकि प्यार के लिए काफी खतरा उठा लेती है वहीँ आदमी काफी प्रैक्टीकल होते हैं जो कि प्यार भी काफी नाप तोल कर करते है.
इसके विपरीत इस उपन्यास में लेखिका ने एक शादी शुदा आदमी के आध्यात्मिक, अद्भुत प्रेम को दिखाया है और एक शादी शुदा औरत भी उस प्रेम को पाकर अपने आप को एक अलग ही दुनिया में महसूस करती है क्योंकि अगर उसे विवाह उपरान्त पूरा प्यार नहीं मिलता तो प्यार पाने के लिए वह किस कदर नदी की तरह बहती चली जाती है. --अलका सैनी
Written By : Sarojini Sahoo
translated by Dinesh kumar Mali
Price : INR 150/-
Format : Paperback
ISBN : 978 81 7028 954 8
Sunday, October 16, 2011
राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित करता है उपन्यास ‘बंद कमरा’
'राष्ट्र समूह वाचक नहीं, बल्कि व्यक्ति वाचक'
पुस्तक समीक्षा अनुवादक:दिनेश कुमार माली
पुस्तक समीक्षा अनुवादक:दिनेश कुमार माली

‘बंद कमरा’ उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं।“एक लम्बे अरसे से डॉ. सरोजिनी साहू ओड़िया साहित्य में अपनी सृजनशीलता के लिए पाठकों में चर्चा का विषय रही हैं। सप्रतिभ भाषा-शैली, कथ्य-संप्रेषण और नवीन चेतना-स्तर के कारण वह अपने समसामायिक साहित्यकारों में एक अलग पहचान रखती है। आपका ओडिया उपन्यास ‘गंभीरी घर’ (हिंदी में ‘बंद कमरा ‘) ओडिशा की प्रसिद्ध ‘गल्प-पत्रिका’ के पूजा-अंक में प्रकाशित होते ही ओडिया -पाठकों में चर्चा का एक जबरदस्त विषय बना। पहले की तरह डॉ.सरोजिनी की हर रचनाओं की तरह यह उपन्यास भी आकर्षण का केन्द्र बना। भले ही, कुछ पाठकों में लेखिका के व्यक्तव्य की स्मार्टनेस नागवार गुजरी, मगर अनेक पाठकों ने न केवल इसे सहर्ष स्वीकार किया,बल्कि इस उपन्यास को पढ़कर भावाभिभूत भी हुए.
लेखिका की कहानियों और उपन्यासों में ऎसी ही जादुई विलक्षणता है, जो पाठकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है। कुछ पाठकों ने उपन्यासकार को उसका खुद एक पात्र समझने की गलती की , मगर यह सार्वभौमिक सत्य है, किसी उपन्यास की सफलता इस बात पर निर्भर करती है जहां पाठकों ने उसके अन्दर किन्हीं छिपी हुई सत्य-संवेदनाओं को अपने भीतर अनुभव किया हो।
क्या यह उपन्यास वास्तव में केवल प्रेम पर आधारित उपन्यास है ? क्या लेखिका हिंदु प्रेमिका और मुस्लिम प्रेमी के बारे में अपनी बात रखना चाहती है या भारतीय नारी और पाकिस्तानी पुरुष का अंतरजाल के माध्यम से विकसित हुई यह प्रेम-कहानी को दर्शाना चाहती है ?
कुछ ओडिया पाठक इसे यौन-स्वतंत्रता से संबंधित उपन्यास मानते हैं, जबकि इन सारी चीजों से ऊपर उठकर ‘गंभीरी घर’ का कथ्य और कथानक की व्यापकता और ज्यादा विशाल हो जाती है। इस उपन्यास में व्यक्ति की निसंगता, विशेष रूप से भारतीय नारी की आधुनिक जीवन -धारा में अकेलेपन और रिक्तता की बातें दर्शाई गई है। इस उपन्यास में राष्ट्र की ‘संज्ञा’ को भी परिभाषित किया गया है,व्यक्ति और राष्ट्र के बीच उत्पन्न हुए द्वन्द-प्रसंगों का भी उल्लेख किया गया है। उपन्यास की मुख्य नायिका कूकी के एक ओर है पतिऔर दूसरी तरफ प्रेमी; पति अनिकेत और प्रेमी शफीक। पति की दुनिया में घर-गृहस्थी मानो संवेदनहीन और पत्थर बन चुकी हो, और प्रेमी शफीक की काल्पनिक दुनिया का कहना ही क्या ! शफीक को देखा तक नहीं कूकी ने, स्पर्श करना तो बहुत दूर की बात। शायद इसलिए शफीक के लिए उसके हृदय में उसको पाने की व्याकुलता स्वाभाविक है। परंतु उसकी पहुँच से परे है शफीक का आकाश।बाहर से प्रेम प्रदर्शन नहीं करने वाला दंभी अनिकेत कूकी को प्यार नहीं करता था, ऐसी बात नहीं थी। सभी के सामने कूकी को अपने शरीर के प्रति लापरवाही बरतने से नाराज होकर कूकी पर हाथ उठाने के पीछे भी कहीं न कहीं उसकी प्रेम की भावना छिपी हुई थी। इसी तरह वह कूकी की तबीयत खराब हो जाने पर रात रात जगकर उसकी सेवा करता था । इन दो परस्पर विरोधी पुरुष-व्यक्तित्वों को लेखिका ने अनिकेत के माध्यम से बहुत ही निपुणता से वर्णन किया है। उपन्यास के अंत में अनिकेत की विदेश-यात्रा के समय पाठक देखेंगे, अनिकेत और कूकी में घनिष्ठ प्रेम है।
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| दिनेश कुमार माली |
क्या यही है भारतीय नारी की नियति ? हमारी समाज-व्यवस्था, हमारी जीवनचर्या, हमारे संस्कार नारी को अलग कर देते हैं । आधुनिकता, शिक्षा-दीक्षा, संविधान सम्मत समस्त अधिकार होते हुए भी एक नारी अपने प्रेमी और पति से दोनो से विच्छिन्न होकर रह जाती है। वह कैदी है, वह खुद ही अपने को कैद कर लेती है संवेदनशील मातृत्व की सलाखों के पीछे घर नामक चारदीवारी के अंदर। इस विच्छिन्नता बोध को प्रतीक है ‘गंभीरी घर’।
ट्रेजेडी उपन्यास होते हुए भी प्रेम के प्रति आस्थाबोध पाठकों को नजर आएगा। प्रेम के प्रति लेखिका का दृष्टिकोण प्रचलित धारणाओं से उठकर स्वतंत्र रूप में है। पति अनिकेत के प्रेम और प्रेमी शफीक के प्रेम में जो अंतर है, उसे लेखिका ने बड़े से सूक्ष्म ढंग से प्रस्तुत किया है। अनिकेत के प्रेम में है प्रज्ञा और शफीक के प्रेम में आवेग और रोमांच का बाहुल्य ।
एक स्त्री का निश्चल प्यार पाकर एक पर्वटेड कामुक आदमी क्रमशः परफेक्टशन की ओर अग्रसर होता है। स्वयं को यौनता से पृथक करते हुए प्रेम पथ पर बढता जाता है। उसे नारी का शरीर और आकर्षित नहीं करता है। रूखसाना उसके लिए देवी है, इसलिए कूकी के भीतर वह रूखसाना को देखता है।
कट्टरपंथ , धार्मिक-बंधन, देश, राजनैतिक, भौगोलिक सीमाओं से ऊपर है रूखसाना की स्थिति। इसलिए शफीक कहता है, मेरा कोई अपना देश नहीं है, कलाकार के लिए कोई एक विशेष देश नहीं होता है। उसके पास होते हैं केवल प्रेम के नैसर्गिक संबंध।
इस उपन्यास में कूकी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर लेखिका ने अपने सक्षम लेखन का परिचय दिया है। कुमारी-साधना, ओशों की सम्भोग से समाधि वाली साधना, रागानुराग भक्ति-मार्ग में कूकी विश्वास नहीं रखती थी। वह कहती थी, “शफीक, नहीं, मैं ओशो के दिखाए मार्ग में तुम्हें सहयोग नहीं कर पाऊँगी। मैं अति साधारण औरत हूँ। मेरी आशा और आकांक्षाएं सभी साधारण सी है। मैंअपने प्रेमी से केवल प्रेम की उम्मीद करती हूँ। जीवन जीने की खुराक चाहती हूँ। मुझे किसी भी साधना से क्या लेना-देना ? मुझे मोक्ष प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं है। मैं ‘नेरात्मा’बनकर बैठी रहूंगी और तुम व्याकुल शबर की तरह मेरे पास भागे दौड़े आओगे।”
पिकासो के ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ तस्वीर के जरिए लेखिका ने कूकी के अपराध-बोध को दिखाया है। ‘ला कुक्कू मेगनिफिक’ का मतलब होता है, जिस पति की पत्नी अन्य पुरूषों के साथ प्रेम करती है। वह तस्वीर बहुत ही गजब खूबसूरत थी। उस तस्वीर में एक नंगी औरत पहिए वाली गाड़ी में टांगों को उठाकर एक के ऊपर दूसरे को रखकर सोई हुई है। टांगों के भीतर से उसके यौनांग साफ़ दिखाई पड़ता है। एक नग्न पुरुष उस पहिए वाली गाड़ी को खींच रहा है। छुपकर कुछ नंगे लोग उस दृश्य को देख रहे हैं और उस तस्वीर के बायी ओर एक फ्रॉक पहने लड़की हाथ में चाबुक लिए खड़ी है। अपराध-बोध की सुंदर व्याख्या लेखिका और पिकासो की जुगलबंदी इस उपन्यास को एक विशिष्ट दर्जा प्रदान करती है।
इस उपन्यास में राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लेखिका पाठकों के सम्मुख कुछ सवालों के जरिये हकीकत को उकेरती है ,इराक के ऊपर अमेरिका का आक्रमण किसकी इच्छा से हुआ था जार्ज बुश या अमेरिका की ? गर्बाचोव न होते तो पेरेस्त्रोइका संभव हो पाती क्या रूस में ? इन बातों से यह जाहिर होता है राष्ट्र नामक किसी भी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। शासक से राष्ट्र कभी बड़ा नहीं हो पाता है। शासक के मूड़ और मर्जी से परिचालित होता है एक विशाल लोकतान्त्रिक संस्था, जिसमे करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हुई होती है, इसलिए राष्ट्र और व्यक्ति के संघर्ष हमेशा व्यक्ति व्यक्ति के निजी संघर्ष से उत्पन्न होते हैं। लंदन बम ब्लास्ट में शफीक के गिरफ्तार होने के पीछे आतंकवाद कोई कारण नहीं है, वह तो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं रखता था, वह तो इस बात को मानता था कि उसका कोई देश नहीं है, वह कट्टरपंथियों का विरोध भी करता था। वह गिरफ्तार हुआ तो केवल एक छोटे से कारण की वजह से। तबुस्सम और मिल्टरी ऑफिसर के आपसी वैमनस्य और मतभेद से। इस नितांत व्यक्तिगत घटना को एक अंतराष्ट्रीय रूप देकर उसे गिरफ्तार किया गया था।
लेखिका ने इस उपन्यास में आतंकवाद के मलभूत कारणों को जानने की कोशिश की है। अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों को हटाने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में आतंकवादियों का प्रशिक्षण प्रदान किया था। इस्लाम की सुरक्षा के नाम पर ,जेहाद के नाम पर, विश्व के हर प्रांत से मुसलमानों को एकत्रित कर गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया था, अस्त्र-शस्त्र बांटे थे। वहीं से शुरू होता है आतंकवाद का बीजारोपण। रूसी सैनिकों ने अफगानिस्तान से हट जाने के बाद अमेरिका भी वहां से हट गया था, क्योंकि वह अप्रत्क्षतः अपने मकसद में सफल हो गया था । वहां से हटते समय छोड़ गया था अस्त्र-शस्त्रों की भरमार खेंपें और उनके ट्रेनिंग कैंप। रह गए थे सिर्फ तालिबानी और जेहादी। उन्होंने कुवैत जैसे भोलेभाले देश को एनजीओ के माध्यम से मुफ्त शिक्षा का प्रलोभन दिखाकर कई कौमी मदरसे खोलें । जहाँ छोटे-छोटे बच्चे धीरे-धीरे मानवीय बंबों और आत्मघाती दस्तों में बदल गए।इस तरह इस उपन्यास में घरेलू आतंकवाद से वैश्विक आतंकवाद के संभावित कारणों का अच्छे ठंग से ताना बना बुना गया है ।
लेखिका ने इसलिए लिखा है,“पूछो, पूछो , अमेरिका को पूछो, अफगानिस्तान से रूस को हटाने के लिए जो हथियार तैयार किए थे, और हृदयहीन रोबोट बनाए थे, अब वे कहाँ जाएंगे ? कहाँ गाडेंगे इतने हथियार ? कैसे भूलेंगे तालिम के वे दिन ? गोला, बारूद, हथियारतो हमेशा खून मांगता है। मांगता है जीवन।”
इसलिए आतंकवाद जितना धर्म आश्रित नहीं होता है, उससे ज्यादा रष्ट्र आश्रित होता है। संभवत अमेरिका का शीत-युद्ध राजनीति लादेन का सृष्टा है। इसलिए लेखिका के उस उपन्यास में अन्तरंग प्रेम के साथ साथ कई बारीक दार्शनिक पहलूओं का जिक्र हैं।
‘रेप तथा अन्य कहानियां’ (2011 ) के बाद राजपाल एंड साँस ने सरोजिनी साहू के चर्चित उपन्यास ‘( अंग्रेजी : ‘The Dark Abode’/ ओडिया ‘गंभीरी घर’) ’ का हिंदी अनुवाद ‘बंद कमरा‘ शीर्षक से प्रकाशित किया है.यह उपन्यास पहले से ही मलयालम में ‘इरुंडा कुदरमा’ तथा बंगला में’ मिथ्या गेरोस्थाली’ शीर्षक से केरल तथा बंगला देश से प्रकाशित हो चुकी है. इस उपन्यास का ऑनलाइन क्रय हेतु राजपाल एंड साँस पर जाएँ) (परिकल्पना से साभार)
Sunday, September 11, 2011
मस्ती के साथ साथ सावधान भी करती है पूनम की कविता
बहुत पहले जब छत पर सीमेंट बजरी की टैंकीयों का चलन काफी महंगा और बोझिल लगने लगा था तो एक कम्पनी आई थी प्लास्टिक की टंकी ले कर और विज्ञापन आता था अरे भई अब तो सिंटेक्स का जमाना है....अब उसी की याद आ रही है कहना चाहता हूं कि अब तो आतंकवाद का ज़माना है....किसी भी गली के मोड़ पर गोली चल सकती है, किसी भी बाज़ार के चौराहे पर बम फट सकता है...भारत हो या पाकिस्तान, रूस हो या अमेरिका....हर तरफ एक सा सहम, एक सा डर, एक सी तबाही, एक सा खून, एक सी लाशें, एक सा विरलाप, वही दर्द..., फिर हर बार एक से ब्यान........आतंक के इस काले भ्यावह दौर ने दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है, जीवन की शैली को बदल दिया है....अब गली से गुजरता कोई भला आगुन्तक देख कर भी लगता है कहीं वह कोई खतरनाक आतंकवादी न हो....! अब घर या दफ्तर के दरवाजे के सामने खड़ा कोई अन्जान व्यक्ति देख कर मन में अतिथि देवो भव. की भावना नहीं आती....कुछ और ही शक होता...कुछ अजीब से ख्याल मन में आते हैं.....एक डर, एक घुटन, एक सहम... इस भयानक काली रात की सुबह होती नज़र नहीं आती.पर पूनम मतलब पूनम मटिया निकली है एक मशाल थाम कर. हाथ में मोहब्बत की मशाल और होठों पे आज भी वही गीत....
जोत से जोत जलाते चलो...
प्रेम की गंगा बहाते चलो.....!
वह याद दिलाती है उन भले दिनों की जब लोग रात को भी निशचिंत हो कर गलियों में सोते थे....एक बड़े परिवार की तरह. दिन हो या रात, पूरी गली, पूरा मोहल्ला, पूरा इलाका किसी बड़े घर के आँगन सा लगता....अपना अपना सा. बहुत ही सुरक्षित सा....! अब वे दिन कहां......!
बहुत कुछ बदल गया. हर पल बदलती इस दुनिया में पूनम भी वही तो नहीं रह सकती थी. वह भी बदली लेकिन यह बदलाहट बहुत ही अलग थी. बिलकुल उसी तरह जैसे कहते हैं न रंग लाती है हिना पत्थर पे घिस जाने के बाद.
वह हालात की चक्की में पिसी, संघर्ष की धुप में जली, मोहब्बत और विरह की आग में तड्पी. दिल्ली के करोल बाग़ में एक मध्य वर्गीय परिवार में जन्म, दो कमरों के छोटे से मकान में लालन पालन, खेल कूद और फिर एक बड़ा सा घर. सिर्फ घर ही नहीं पूनम की सारी दुनिया ही बहुत बड़ी हो गयी है. पांच भाई बहनों का वह बचपन का प्यार अब पूरी दुनिया को अपने रंग में रंग रहा है.
अब वह राजन इकबाल, रानू और गुलशन नंदा की जगह रोबिब कुक, इरविन वेल्स और सिडनी शेल्दन को पढती है. पेंटिंग के साथ अब वह कविता भी कहती है. नाटिकाएं भी लिखती है. उनका मंचन खुद भी करती है और दूसरों को भी ऐसा करना सिखाती है. पूनम की दुनिया अब बहुत बड़ी हो गयी है. वहां शायद सब कुछ है. हर रंग, हर ख़ुशी, हर महक लेकिन दो बातों के लिए वहां कोई स्थान नहीं रखा गया. एक तो नफरत और दूसरा अपने दोस्तों को भूल जाना. वह अपने दोस्तों को न तो भूलती है और न हो दोस्तों को कभी ऐसा करने देती है. आप अगर कहीं खो गए या किसी गम में घिर गए तो अचानक आप दस्तक सुनेंगे पूनम की. वह इतना अपनत्व और स्नेह से आपको आवाज़ देती है कि सारी परेशानी दूर हो जाती है और आप फिर से ज़िन्दगी जीने के लिए एक नयी ऊर्जा जुटा लेते हैं.
आपको यह जादूई आवाज़ उसके प्रथम काव्य संग्रह स्वप्न श्रृंगार से भी सुन सकती है जिसे प्रकाशित किया है लेखक परिषद अबोहर ने. पत्रकार मित्र प्रवीन कथूरिया और लेखक परिषद के अध्यक्ष राज सदोष ने इस पुस्तक के प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए दिन रात एक किये रखा. वे इसकी सफलता के लिए बधाई के पात्र हैं.
इस काव्य संग्रह में महकते फूलों का भी जिक्र है, काँटों के दर्द का भी, ख़्वाबों का भी, उनकी ताबीरों का भी, मोहब्बत का भी और विरह की तड़प का भी. प्रेम प्यार और सुन्दरता की बातों में मग्न हो कर पूनम उन लोगों को नहीं भूली जिनके सपने अक्सर ही टूट हया करते हैं.उसे आम इन्सान का दर्द भी तड़पाता है. रिक्शावाले को सलाम करते हुए वह एक कविता के अंत में कहती है :
आज श्रमिक दिवस पर करती हूं इन्हें मैं नमस्कार;
जो मजदूर करते हैं हमारे सा काम अनथक लगातार.
उसे चिलचिलाती धुप में काम करती महिला का दर्द भी अपना अपना लगता है. उसे देख कर कर उसकी हिम्मत को नमन करते हुए वह कहती है:
झुलसायी है काया
पर
न आलस की तनिक भी छाया.....!
जगह जगह जमीं के लिए संघर्ष पर किसान का साथ देते हुए वह कहती है:
जाती है ज़मीन जब कोडियों के दाम
नाम होता है विकास का
बे मौत मारा जाता है बेचारा किसान
शायद पूनम मन ही मन जानती है कि अगर यह शोषण नहीं रुका तो यह आक्रोश जमा होता होता एक दिन बारूद बनेगा और आतंकी संगठन इसका आसानी से फायदा उठा लेंगें. इस लिए वह सावधान करती है कि रोक दो इस अन्याय को. मत करो विकास के नाम पर विनाश.
निसंदेह पूनम के पास प्रतिभा तो जन्म जात थी पर इस उड़ान को पंख और शक्ति देने में पूनम जी के पति नरेश मटिया ने जो कुछ किया उसके बिना शायद यह सम्भव ही नहीं होता. इस लिए अब यह भी कहा जा सकता है कि हर सफल महिला के पीछे किसी पुरुष का हाथ होता है...!..... क्यूं आपका क्या ख्याल है.....होता है न.....?
Thursday, August 25, 2011
रेप तथा अन्य कहानियाँ//समीक्षा // अलका सैनी
जाने माने प्रकाशक "राज पाल एंड संज "द्वारा प्रकाशित पुस्तक "रेप तथा अन्य कहानियाँ "दिनेश कुमार माली द्वारा हिंदी भाषा में अनूदित प्रसिद्द उड़िया लेखिका सरोजिनी साहू का कहानी संग्रह है .दिनेश जी के हिंदी अनुवाद की ख़ास बात ये है कि किसी भी कहानी को पढने पर ये नहीं लगता कि यह उड़िया भाषा से हिंदी में अनुवाद है बल्कि बिल्कुल मूल रचना जान पड़ती है . दिनेश जी एक पुरुष होने के बावजूद जिस तरह एक औरत के मनोभावों और भावनाओं को समझते हुए उसे जिस तरह पन्नों पर उकेरते है वो वाकिया में काबिले तारीफ़ है . उनकी इसी दक्षता को पहचानते हुए यह पुस्तक दिल्ली के जाने माने प्रकाशक ' राज पाल एंड संज' ने हाथ में ली . मुझे यहाँ यह कहने में बिल्कुल गुरेज नहीं है कि उनकी कहानियों के इस भावना परिपूर्ण अनुवाद को पढ़ते हुए ही मैंने अपने अंतर्मन में झांकते हुए अपनी खुद की कहानियाँ लिखने की भी प्रेरणा पाई.
इस तरह लेखिका के इस कहानी सग्रह की हर एक कहानी औरत के मन और उसकी भावनाओं के हर एक पहलु को उजागर करती है . औरत अलग- अलग परिस्थितियों में किस तरह इतनी गहराई में सोचती है इसको लेखिका ने बखूबी दर्शाया है . औरत जब नौकरी करती है तब किस- किस तरह के हालात उसे झेलने पड़ते है बच्चों और पति में वह किस तरह ताल मेल बिठाती है या फिर जब वो माँ बनने वाली होती है तो किस तरह की हालत को झेलती है . इस कहानी सग्रह में औरत के हर रूप माँ , बेटी , बहन , पत्नी बन कर किस तरह की परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है ये सब पढ़ने का मौका मिलता है. यहाँ तक कि लेखिका ने औरत के मन में प्रेम और सैक्स को लेकर छुपी हुई अधूरी भावनाओं और इच्छाओं को बहुत ही निडरता से लिखा है जो कि हर औरत के मन के किसी कोने में छुपी होती है परन्तु कई बार उसे घर की जिम्मेवारियां निभाते- निभाते खुद भी अपनी भावनाओं के बारे में पता नहीं चल पाता . इस उड़िया भाषा के कहानी सग्रह को हमारी मातर भाषा में इतनी खूबसूरती से हमारे समक्ष प्रस्तुत करने का सारा श्रेय दिनेश कुमार माली जी को जाता है जिससे भारत के ही नहीं अपितु पूरी दुनिया के भारतीय इसे पढ़ कर औरत की भावनाओं के करीब पहुँच सकते है . .अलका सैनी
इस पुस्तक में लेखिका ने एक औरत के मन के भीतर गहराई में छुपी हुई विभिन्न भावनाओं और संवेदनाओं को बहुत ही सरलता से अपनी कहानियों में अंकित किया है . औरत मन से अत्यंत ही संवेदनशील और भावुक होती है इसलिए एक ही परिस्थिति को वह किस तरह पुरुष की अपेक्षा सूक्ष्म निरीक्षण करती है यही उनकी कहानी बलात्कृता में दर्शाया गया है . औरत अपनी भावनाओं के कारण हर पक्ष के अत्यंत ही गोपनीय पहलुओं तक पहुँच जाती है .
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| डाक्टर सरोजिनी साहू |
कहानी रेप जो कि पुस्तक का शीर्षक भी है में औरत के मन की दबी हुई भावनाएं किस तरह सपनों का रूप धारण कर लेती है जबकि सपने का पात्र कहीं भी वास्तविकता में औरत के मन से मेल नहीं खाता है . जिस बेबाकी से लेखिका ने इस कहानी को लिखा है उस हद तक शायद ही कोई पति अपनी पत्नी के इस तरह के सपने को भी बर्दाश्त नहीं कर सकता हकीकत में तो दूर की बात है. हमारे समाज में अभी तक यही देखने में आता है कि पुरुष अपनी आजादी को हकीकत में भी जिस तरह भी इस्तेमाल करे परन्तु औरत के मन में आए किसी भाव को भी वह कबूल नहीं कर सकता .
दुःख अपरिमित में एक छोटी लड़की में घर के माहौल में भेदभाव के वातावरण के कारण उसकी मन स्थिति इतनी विकृत हो जाती है कि वह हर समय डर के साए में रहती है इसलिए खुद को नई मुसीबत में घिरा पाती है .
कहानी चौखट में एक जवान लड़की के मन के भावो को दर्शाया गया है कि घर में बाप और भाइयों के रौब दार व्यवहार के घुटन भरे माहौल से छुटकारा पाने के लिए वह किस तरह से छटपटाती है . इसी कशमकश में वह भविष्य की अनिश्चितता को भी ना विचारते हुए एक लड़के के साथ भाग कर प्रेम विवाह कर लेती है उस समय उसे सिर्फ अपनी माँ की बेबसी का ध्यान आता है .
कहानी गैरेज में किस तरह एक औरत जो कि गृहणी है अपने घर के गैरेज को लेकर अपनी काम वाली के साथ मिलकर आए दिन तरह- तरह के सपने बुनती है . इस कहानी में लेखिका ने घर में रहने वाली औरतों के मन की भावो को दर्शाया है कि वह कुछ करना चाहते हुए भी कई बार कुछ नहीं कर पाती और इसी अधूरेपन में अंत तक विचरती रहती है .
| अलका सैनी |
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| दिनेश कुमार माली |
कहानी संग्रह: रेप तथा अन्य कहानियाँ
कहानीकार: सरोजिनी साहू
अनुवादक: दिनेश कुमार माली
प्रकाशक: राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली -11006
प्रथम संस्करण: 2011
ISBN: 978-81-7028-921-0
पृष्ठ संख्या: 175, पेपर बैक
मूल्य: एक सौ पचहत्तर रुपये
कहानीकार: सरोजिनी साहू
अनुवादक: दिनेश कुमार माली
प्रकाशक: राजपाल एंड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली -11006
प्रथम संस्करण: 2011
ISBN: 978-81-7028-921-0
पृष्ठ संख्या: 175, पेपर बैक
मूल्य: एक सौ पचहत्तर रुपये
Tuesday, April 26, 2011
पूनम की कविता का एक और नया रंग
बात खूबसूरती की चले, यादगारी फोटोग्राफी की या फिर कविता की....पूनम मटिया का नाम एकदम जहन में आ जाता है. ख्याल की उडान इतनी ऊंची की बस कुछ मत पूछो. इस उड़ान के साथ उड़ कर धरती पर वापिस आते आते वक्त लग जाता है. रचना में बात इतनी गहरी की इंसान सोचता ही रह जाये. सातों समुन्द्रों कि गहराई कम लगने लगती है. उस पर शब्दों का चयन और बात कहने का सलीका इतना खूबसूरत कि .....बस सब कुछ दिल=ओ=दिमाग पर खुद-ब-खुद उकर जाता है. हर कविता के साथ एक शानदार तस्वीर इतना चुन कर लगाई जाती है कि ऐसे लगता है जैसे यह तस्वीर और कविता दोनों एक दुसरे के लिए बने हैं. अगर आपने पूनम को पढ़ा है तो यह सब आपने भी महसूस किया होगा. आप को उनकी कविता कैसी लगी अवश्य बताएं.यहाँ उनकी कवितायों का नया रंग भी दिया जा रहा है. आपको यह रंग कैसा लगा अवश्य बताएं.हमेशां की तरह इस बार भी आपके विचारों की इंतजार बनी रहेगी.--रेक्टर कथूरिया
1.कहाँ जा रहे हैं
किन गलियों में आश्न्ना तलाश रहे हैं
किसे फ़िक्र है
हर तरफ धुंआ hii dhuaan है
हाथ को हाथ मालूम नहीं देता
तो शितिज की किसे खबर है
बढ़ रहे बस भीड़ संग
अपनी किसे फिकर है
क्या हो रहा है 'आज'
'कल' में क्या बदा है
क्यों सोचे ए-इंसा
मौज कर ,पंख फैला
बे खौफ उड़ना भी इक कला है
2.
दिल रोता है
पर लब मुस्कुराते हैं
ये आंसू भी अजीब शय हैं
जब रोकना चाहो
न जाने क्यों बेतरतीब बह जाते हैं
3.
ये मौसम की खामोशियाँ
आवाज़ सिर्फ तेरी-मेरी साँसों की
यादों के गहराते साये
पर मुस्कान मेरी ने सभी हैं छिपाए
4.
वक्त जो बीता जाएगा वापस न आएगा
उसके साथ हमारा भी कुछ पीछे छूट जाएगा
बेहतर है छूटे वही जो खुशगवार न था
था मेरा ही पर उनको गवारा न था
वक्त ले चले हमें उस ओर
जहां धुंध के साये न हो
दर्द के आंसू और आत्मग्लानी न हो
खुला और अंतहीन आकाश हो
स्वछन्द उड़ने की आस हो
हया के रंग सजीले हों
पर जोश-ए-जूनून की कमी न हो
. --पूनम मटिया
Saturday, January 22, 2011
डाक्टर सरोजिनी साहू की नयी किताब
उड़िया और अंग्रेजी में नाम कमाने के बाद अब डाक्टर सरोजिनी साहू हिंदी पाठकों के दिल-ओ-दिमाग पर भी लगातार छाती जा रही है.ज़िन्दगी के दर्द, ज़िन्दगी की मजबूरियां, ज़िन्दगी के सपने और उन पर गरीबी का कफ़न...इन सब की चर्चा बेबाकी और सादगी से करने वाली डाक्टर सरोजिनी साहू के उपन्यास पक्षी-वास का जादू अभी चढ़ ही रहा था कि अब उनकी एक नयी किताब आई है रेप तथा अन्य कहानियां.उनकी इस पुस्तक को भी हिंदी के रंग में रंगा है जानेमाने अनुवादक दिनेश कुमार माली ने जो खुद भी ओडीसा की संस्कृति और उड़िया भाषा से भलिभांत अवगत हैं. माली जब अनुवाद करते हैं तो लगता है कि रचना की रूह में उतर कर करते हैं जिसका परिणाम होता है रचना भाषा का नया लबादा ओड़ कर भी अपने मूल सार और सुन्दरता को पहले की तरह ही सहेजे रहती है. डाक्टर सरोजिनी साहू की इस नयी पुस्तक का बेहद सुंदर प्रकाशन किया है राजधानी दिल्ली से हिंदी जगत के जाने माने प्रकाशक राज पाल एंड सन्ज ने.इसके पेपर बैक एडीशन की कीमत है 175/- रूपये.इससे पूर्व पक्षी-वास भी हिंदी पाठकों में बहित लोकप्रिय हुआ है. उनकी पुस्तक के अंश जल्द ही आपके सामने रखे जायेंगे. --रेक्टर कथूरिया Monday, January 03, 2011
वास्तव में विद्रोह की एक कविता है उपन्यास पक्षी-वास
जब इस किताब के बारे में पहली बार सुना तो बहुत ही उत्सुकता हुई. जी चाहा अभी पढ़ लूं. पर न तो जेब में पैसे थे और न ही किसी बुक स्टाल पर जा कर दुबारा उधार करने की हिम्मत. पहले का उधार ही इतना देरी से चुकता किया कि अब डर था कहीं वह इनकार न कर दे. इस डर के बावजूद भी कुछ नजदीकी मित्रों की दुकान पर देखा पर यह किताब नहीं मिल सकी. यह किताब कैसे मिली यह एक अलग लेकिन यादगारी कहानी है जिसकी चर्चा फिर कभी सही फिलहाल इतना ही कि यह किताब बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है. बिना किसी विचारधारा की बात किये यह किताब कैसे समाज को लगे दीमक का पता देती है यह इसे पढ़ कर ही जाना जा सकता है. इसकी शुरुआत धीमी गति से होती है और इसका इशारा भी तो उस घातक विष की ओर ही है जो बहुत ही धीमी गति से शुरू होती पर सब कुछ निगल जाती है. हो सकता है आपको इस में बहुत कुछ और भी दिखाई दे.
हम विकास के चाहे कितने ही दावे करें लेकिन हकीकत तो बहुत दुखद है. हम जिस देश को महान कहते नहीं थकते उसमें लोग गरीबी के कारण तड़प रहे हैं, तिल तिल कर के मर रहे हैं, पेट की आग बुझाने के लिए एक दूसरे से छिन्न भिन्न हो कर बिखर रहे हैं. ऐसा ही एक भारतीय परिवार है. गमों के सागर में डूब रही सरसी और दुखों के पहाड़ तले दबे उसके गरीब पति अंतरा का; जिनके सभी बच्चे रोटी की तलाश में निकले तो फिर कभी नहीं लौटे. उसी तरह जैसे चिड़िया के बच्चे कभी नहीं लौटते.जब एक दिन एक बच्चे की खबर आती भी है तो गमों का एक नया दरिया लेकर. देखिये ज़रा चार में से एक बच्चे के लौटने की एक झलक.
अंत में जीप लौट आई थी गाँव में.....तुरंत कई पुलिस वाले जीप से उतरे. दो सिपाहीयों ने जीप में पड़ी हुई लाश को निकाल कर ऐसे फेंका जैसे शिकार कर लाये हुए किसी एक जंगली सूअर या सांभर हिरण को.....पुलिस वाला चिल्ला कर कह रहा था,
"इसको पहचानो."
"ये तुम्हारे गाँव का लड़का है या नहीं ?"
" किसका बेटा है ?" ..... ......
पुलिस अंतरा से पूछने लगी,"ये तुम्हारा लड़का ?"
" जी "
"तुम्हारा बेटा नक्सल में शामिल हुआ था ?"
अंतर चुप रहा.
पुलिस धमकी भरे स्वर में कहने लगी, साला फोरेस्ट गार्ड को मारने के लिए आया था तेरा बेटा. चलो तुम गाड़ी में बैठो. धुल उड़ाते चली गयी पुलिस की गाड़ी. अंतरा को भी साथ ले गयी.
गांव की चौपाल में बैठी थी सरसी.एकदम गुमसुम. आंखों में आंसू भी नहीं. गांव की चौपाल में सन्नाटा छ गया था. लोग अपने अपने घर चले गए थे. अंदर से सभी ने दरवाज़े बंद कर दिए थे. मातम का माहौल छा गया था गांव में. थम सा गया था गांव.
आखिर कौन था यह फोरेस्ट गार्ड ? इसकी एक झलक मिलती है नीचे के वार्तालाप से जब जिस्म बेचने को मजबूर हुई परबा को उसकी एक पड़ोसन आ कर कहती है...रे परबा, तुम्हारे गांव बिजी गुड़ा से एक और लड़की यहां पहुंची है. वह तुम्हारे बारे में जानती है. झुमरी की बात सुन कर परबा धक सी रह गयी.
"सच बोल रही हो, झुमरी, फिर किसका कपाल फूटा हमारे गांव में ?"
उत्सुकता को दबा नहीं पायी और भागने लगी परबा नीचे वाली खोली की तरफ. खोली नके बाहर बैठी थी कुंद. कुंद को देख कर परबा को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन खिसकती नज़र आई... बोली..
"तू तो मेरी भाभी बनती....तू कैसे आ गयी इस नर्क में ?"
इन दोनों को इस नर्क में पहुंचाने का ज़िम्मेदार था वह फोरेस्ट गार्ड जिसकी इस करतूत के बारे में कुछ ही दिन पूर्व अपनी प्रेमिका/मंगेतर कुंद से सुन चुका था उसी बदनाम बस्ती में जा कर और वादा भी करके आया, "मैं रामचन्द्र हूं तेरा यहां से उद्धार करूंगा लेकिन छुपते छुपाते नहीं रावन को मारने के बाद ही." लेकिन हुआ उल्ट. यह राम ही मारा गया और सीता का उद्धार नहीं हो पाया. बदनसीब परबा भी तो इसी नक्सल की बहन है जो एक दिन मूसलाधार बारिश में निकल पड़ी थी घर से बाहर. घर की कच्ची दीवार गिर चुकी थी, मां बीमार थी, पिता थक हार कर खाली हाथ लौट आया था...और अब परबा निकली थी कि शायद कहीं कोई साग भाजी मिल जाये. देखो एक झलक...परबा को लगा कि ऐसे बुरे समय में उसका छोटा भाई ही मदद कर पायेगा. दुखी दरिद्रों को दुःख ऐ उबारने के लिए ही तो नक्सल में शामिल हुआ था. पूरे छह दिन हो गएपर घर में चूल्हा नहीं जला. भाई को पता चलने पर कुछ व्यवस्था ज़रूर करवा देगा...फिर जंगल है ही कितना दूर / दो कोस से भी कम ही होगा. वह अपने भाई से ज़रूर मिलेगी.
लेकिन जंगल में पहुंच कर वह फंस जाती है फोरेस्ट गार्ड के चंगुल में और अपनी इज्जत तार तार हो जाने के बाद फिर घर नहीं लौटी. पहुंच जाती है वेश्यायों की बस्ती में.यह उपन्यास बहुत सी दूसरी समस्यायों का भी ज़िक्र करता है...उनकी जड़ों को कुरेदता है जो गरीबी, शोषण और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के कारण पैदा हो रही हैं. इन समस्यायों में धर्म परिवर्तन, अवैध कटाई के कारण मैदान बन रहे जंगल और गाँवों कस्बों में हो रहे काले धंधों का चित्रण भी शामिल है. धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर ईसाइयत को गाली देना आसान है, हो हल्ला मचाना भी आसान है..पर देखो हकीकत की एक झलक जो तमाचा मारती है धर्म के ऐसे ठेकेदारों पर.
....इन्हीं दो चाकलेट की खातिर मैं गांव छोड़ने को राज़ी हो गया था. जिस दिन इमानुअल साहिब की बीवी मेरी मां को बोली," दे दे इस बच्चे को मुझे दे दे, मैं इसे आदमी बना दूँगी.
....."सवेरे सवेरे बाप बोला," जाने दो उसे यहां तो एक वक्त का खाना मिलता है तो एक वक्त का फाका पड़ता है. मिशन में रहेगा तो डाल भात कहा कर जीवन जी लेगा....दोनों वक्त का खाना तो मेरे बेटे को मिलेगा."
...."मां की गोद में से खींच कर बाप ले गया मुझे जबरदस्ती और मैं साहिब की गाड़ी में बैठा दिया..." इसके साथ ही देखो एक और कड़वी हकीकत की झलक....."घर के बोझ ने बेटे को उम्रदराज़ बना दिया था घर के बोझ से मुक्त हो कर बाप बेटे की तरह किशोर हो गया था." ....यह उपन्यास वास्तव में विद्रोह की एक कविता है. समस्यायों की जड़ों को कुरेदने के साथ साथ यह नक्सल लहर पर भी सवाल करता है. इसके बारे में और जानकारी के लिए यहां क्लिक करें. आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं. --रेक्टर कथूरिया
सरोजिनी साहू की कवितायें
सरोजिनी साहू की कहानियां
बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है नावल पक्षी-वास
एक पत्र मारिशियस से
हम विकास के चाहे कितने ही दावे करें लेकिन हकीकत तो बहुत दुखद है. हम जिस देश को महान कहते नहीं थकते उसमें लोग गरीबी के कारण तड़प रहे हैं, तिल तिल कर के मर रहे हैं, पेट की आग बुझाने के लिए एक दूसरे से छिन्न भिन्न हो कर बिखर रहे हैं. ऐसा ही एक भारतीय परिवार है. गमों के सागर में डूब रही सरसी और दुखों के पहाड़ तले दबे उसके गरीब पति अंतरा का; जिनके सभी बच्चे रोटी की तलाश में निकले तो फिर कभी नहीं लौटे. उसी तरह जैसे चिड़िया के बच्चे कभी नहीं लौटते.जब एक दिन एक बच्चे की खबर आती भी है तो गमों का एक नया दरिया लेकर. देखिये ज़रा चार में से एक बच्चे के लौटने की एक झलक.
अंत में जीप लौट आई थी गाँव में.....तुरंत कई पुलिस वाले जीप से उतरे. दो सिपाहीयों ने जीप में पड़ी हुई लाश को निकाल कर ऐसे फेंका जैसे शिकार कर लाये हुए किसी एक जंगली सूअर या सांभर हिरण को.....पुलिस वाला चिल्ला कर कह रहा था,"इसको पहचानो."
"ये तुम्हारे गाँव का लड़का है या नहीं ?"
" किसका बेटा है ?" ..... ......
पुलिस अंतरा से पूछने लगी,"ये तुम्हारा लड़का ?"
" जी "
"तुम्हारा बेटा नक्सल में शामिल हुआ था ?"
अंतर चुप रहा.
पुलिस धमकी भरे स्वर में कहने लगी, साला फोरेस्ट गार्ड को मारने के लिए आया था तेरा बेटा. चलो तुम गाड़ी में बैठो. धुल उड़ाते चली गयी पुलिस की गाड़ी. अंतरा को भी साथ ले गयी.
गांव की चौपाल में बैठी थी सरसी.एकदम गुमसुम. आंखों में आंसू भी नहीं. गांव की चौपाल में सन्नाटा छ गया था. लोग अपने अपने घर चले गए थे. अंदर से सभी ने दरवाज़े बंद कर दिए थे. मातम का माहौल छा गया था गांव में. थम सा गया था गांव.
आखिर कौन था यह फोरेस्ट गार्ड ? इसकी एक झलक मिलती है नीचे के वार्तालाप से जब जिस्म बेचने को मजबूर हुई परबा को उसकी एक पड़ोसन आ कर कहती है...रे परबा, तुम्हारे गांव बिजी गुड़ा से एक और लड़की यहां पहुंची है. वह तुम्हारे बारे में जानती है. झुमरी की बात सुन कर परबा धक सी रह गयी.
"सच बोल रही हो, झुमरी, फिर किसका कपाल फूटा हमारे गांव में ?"
उत्सुकता को दबा नहीं पायी और भागने लगी परबा नीचे वाली खोली की तरफ. खोली नके बाहर बैठी थी कुंद. कुंद को देख कर परबा को अपने पाँव के नीचे की ज़मीन खिसकती नज़र आई... बोली..
"तू तो मेरी भाभी बनती....तू कैसे आ गयी इस नर्क में ?"
इन दोनों को इस नर्क में पहुंचाने का ज़िम्मेदार था वह फोरेस्ट गार्ड जिसकी इस करतूत के बारे में कुछ ही दिन पूर्व अपनी प्रेमिका/मंगेतर कुंद से सुन चुका था उसी बदनाम बस्ती में जा कर और वादा भी करके आया, "मैं रामचन्द्र हूं तेरा यहां से उद्धार करूंगा लेकिन छुपते छुपाते नहीं रावन को मारने के बाद ही." लेकिन हुआ उल्ट. यह राम ही मारा गया और सीता का उद्धार नहीं हो पाया. बदनसीब परबा भी तो इसी नक्सल की बहन है जो एक दिन मूसलाधार बारिश में निकल पड़ी थी घर से बाहर. घर की कच्ची दीवार गिर चुकी थी, मां बीमार थी, पिता थक हार कर खाली हाथ लौट आया था...और अब परबा निकली थी कि शायद कहीं कोई साग भाजी मिल जाये. देखो एक झलक...परबा को लगा कि ऐसे बुरे समय में उसका छोटा भाई ही मदद कर पायेगा. दुखी दरिद्रों को दुःख ऐ उबारने के लिए ही तो नक्सल में शामिल हुआ था. पूरे छह दिन हो गएपर घर में चूल्हा नहीं जला. भाई को पता चलने पर कुछ व्यवस्था ज़रूर करवा देगा...फिर जंगल है ही कितना दूर / दो कोस से भी कम ही होगा. वह अपने भाई से ज़रूर मिलेगी.
लेकिन जंगल में पहुंच कर वह फंस जाती है फोरेस्ट गार्ड के चंगुल में और अपनी इज्जत तार तार हो जाने के बाद फिर घर नहीं लौटी. पहुंच जाती है वेश्यायों की बस्ती में.यह उपन्यास बहुत सी दूसरी समस्यायों का भी ज़िक्र करता है...उनकी जड़ों को कुरेदता है जो गरीबी, शोषण और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के कारण पैदा हो रही हैं. इन समस्यायों में धर्म परिवर्तन, अवैध कटाई के कारण मैदान बन रहे जंगल और गाँवों कस्बों में हो रहे काले धंधों का चित्रण भी शामिल है. धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर ईसाइयत को गाली देना आसान है, हो हल्ला मचाना भी आसान है..पर देखो हकीकत की एक झलक जो तमाचा मारती है धर्म के ऐसे ठेकेदारों पर.
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जीने की लड़ाई का मंच |
....."सवेरे सवेरे बाप बोला," जाने दो उसे यहां तो एक वक्त का खाना मिलता है तो एक वक्त का फाका पड़ता है. मिशन में रहेगा तो डाल भात कहा कर जीवन जी लेगा....दोनों वक्त का खाना तो मेरे बेटे को मिलेगा."
...."मां की गोद में से खींच कर बाप ले गया मुझे जबरदस्ती और मैं साहिब की गाड़ी में बैठा दिया..." इसके साथ ही देखो एक और कड़वी हकीकत की झलक....."घर के बोझ ने बेटे को उम्रदराज़ बना दिया था घर के बोझ से मुक्त हो कर बाप बेटे की तरह किशोर हो गया था." ....यह उपन्यास वास्तव में विद्रोह की एक कविता है. समस्यायों की जड़ों को कुरेदने के साथ साथ यह नक्सल लहर पर भी सवाल करता है. इसके बारे में और जानकारी के लिए यहां क्लिक करें. आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य बताएं. --रेक्टर कथूरिया
ਬਹੁਤ ਹੀ ਡੂੰਘੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦਾ ਹੈ ਸਰੋਜਨੀ ਸਾਹੂ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਵਲ
सरोजिनी साहू की कवितायें
सरोजिनी साहू की कहानियां
बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है नावल पक्षी-वास
एक पत्र मारिशियस से
Saturday, December 04, 2010
एक पत्र मारिशियस से
कभी कभी कुछ अजीब बातें होती हैं. दरवाज़ों पर दीवारें बन जाती हैं और दीवारों पर दरवाज़े. कुछ ऐसा ही हुआ मारिशियस में रह रही जानीमानी कलमकारा मधु गुजधर के मामले में. उन्होंने पंजाब स्क्रीन में एक पोस्ट पढ़ी जो जानीमानी लेखिका सरोजिनी साहू के नावल पक्षी वास पर थी. वास्तव में यह एक समीक्षा थी जिसे चण्डीगढ़ में रह रही अलका सैनी ने लिखा था. इस ऊड़िया उपन्यास का हिन्दी अनुवाद किया है राजस्थान के दिनेश कुमार माली ने. जार इत्तिफाक देखिए कि ओडीसा, पंजाब, राजस्थान और मारिशियस के कलमकार तो इस रचना पर दूर दूर से एक हो गए पर जब इस पर कुछ विचार भेजने की बात आई तो कोई तकनीकी उल्झन आड़े आने लगी. मधु जी ने पूरा दिन प्रयास किया पर बात नहीं बन पाई. आखिर उन्होंने यह कोमेंट सीधा मुझे पोस्ट कर दिया. मैने इसे अपने ईमेल में देखा तो मुझे लगा कि इसका स्थान केवल कोमेंट बाकस में नहीं है. उसे ज्यों का त्यूँ उसी तरह यहाँ दिया जा रहा है. लीजिये आप भी पढ़िए मधु जी का पत्र. --रेक्टर कथूरिया
Posted on Sat, Dec 4, 2010 at 9:54 AM
आदरणीय कथूरिया जी,
आदरणीय कथूरिया जी,
पंजाब स्क्रीन के इस मंच से आप ने सरोजिनी साहू जी के एक उपन्यास 'पक्षी -वास 'पर प्रकाश डालते हुए अपने लेख को शीर्षक दिया है "बहुत कुछ सोचने को मजबूर करता है 'पक्षी-वास' | मैं यहाँ कहना चाहूंगी की ये इतना उचित शीर्षक दिया है आप ने सरोजिनी साहू जी के इस उपन्यास के बारे में और सच तो ये है की न सिर्फ "पक्षी-वास" वरन सरोजिनी जी की कलम से उभरी हर रचना "बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है"| मैंने उन्हें पढ़ा है...बहुत बार पढ़ा है और हर बार उन की रचनाओं से एक नयी अनुभूति प्राप्त की है | उन की हर रचना इतनी हिर्दय्ग्राही होती है की उन रचनाओं के चरित्र फिर कभी भुलाए नहीं भूलते| दूसरी बात जो मुझे सरोजिनी जी बहुत पसंद है और जिस के लिए मैं उन का मान भी करती हूँ वो ये की उन्होंने सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक मूल्यों को सदा अपने लेखन में साथ रखा|उन की रचनाओं का सौन्दर्य का एक पक्ष ये भी है की उन के सब चरित्र बहुत अपने से लगते हैं | लगता है की आप उन से मिल चुके हैं ,कुछ समय उन के साथ जी चुके हैं |यधपि महिला कथाकारों को पढना सदा से मेरे लिए एक आत्म तृप्ति का अनुभव रहा तथापि सरोजिनी साहू जी को पढना एक अद्भुत अनुभूति रही है | यहाँ मारीशस के "महात्मा गाँधी संस्थान" के विशाल पुस्तकालय में तथा "इंदिरा गाँधी संस्कृत केंद्र "के पुस्तकालय में उन की कुछ पुस्तकें भी प्राप्त हैं |दुर्भाग्यवश अभी तक मुझे 'पक्षी-वास' को पढने का सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ है लेकिन इस बार अपनी भारत यात्रा के दौरान में इस उपन्यास को अवश्य खरीद कर लाऊंगी| मैं बहुत आभारी हूँ आदरणीय 'दिनेश कुमार माली जी "की जिन्होंने हिंदी ट्रांसलेशन कर के सरोजिनी जी की रचनाओं को हिंदी भाषी लोगों तक पहुचाया | ये उन्होंने इतनी महानत से एक ऐसा पवित्र कार्य किया है जिस के लिए मैं उन का नमन करती हूँ| जो लोग दिनेश जी की लगन के परिणाम स्वरुप नेट पर सरोजिनी साहू जी की रचनाओं का आनंद लेना चाहें उन के लिए ये लिंक प्रस्तुत कर रही हूँ. मैं यहाँ आप को भी विशेष रूप से धन्यवाद देती हूँ की आप इतने अच्छे लोगों को , विषयों को ,कार्यशालाओं को पंजाब स्क्रीन के मंच पर लाकर हमें उन से अवगत करवाते हैं | वर्ना तो हम 'कूप -मंडूक' ही बने रहते| साहित्य सेवा में सलंग्न सभी साहित्य प्रेमियों को मेरा नमन ........मधु गजाधर
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