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Monday, January 21, 2019

नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार रात 8 बजे मुंबई में

शिवाजी नाट्य मंदिर में मंचित होगा मंजुल भारद्वाज का लिखा नाटक 
लुधियाना//मुम्बई: 21 जनवरी 2019: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन)::
पहले सिनेमा--फिर फ़िल्में और उसके बाद केबल का प्रचलन। तकनीकी विकास के इस दौर ने सबसे बुरा असर डाला मंच की कला पर। नाटकों का का मंचन कम से कम होता चला गया। नाटक को आंदोलन का रूप देने वाले "इप्टा" जैसे संगठन गुमनामी के दायरे में सिमटते चले गए। उनका अस्तित्व केवल उनके राष्ट्रिय आयोजनों या उन पर होने वाले हमलों की खबरों से ही महसूस होता। तकरीबन तकरीबन यही हाल "जन नाटय मंच" का भी हुआ। सुबह से लेकर रात केवल दाल रोटी  उलझा दिए गए समाज में सबसे अधिक शिकार बने नाटकों की दुनिया के कलाकार, लेखक, निदेशक और अन्य तकनीकी स्टाफ के सदस्य। राजनैतिक दलों के शिकंजे ने भी नाटकों के अभियान को लुप्त जैसा ही कर दिया।  इक्का दुक्का कलाकारों ने नाटकों केमाभियाँ को जीवंत रखने की कोशिश भी की लेकिन उन्हें दर्शक नहीं मिले। ऐसे में उभर कर सामने आए मंजुल भारद्धाज। कुछ बातों का संकल्प- की तीखी आलोचना भी लेकिन साथ ही साथ रंगमंच को फिर से हर दिल तक ले जाने का प्रयास भी।  इसी प्रयास के अंतर्गत हो रहा है "राजगति" का मंचन।   
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” अभ्यासक एवम् शुभचिन्तक आयोजित नाटक “राजगति” 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे “शिवाजी नाट्य मंदिर” दादर(पश्चिम), मुंबई में मंचित होगा! सुप्रसिद्ध रंग चिन्तक मंजुल भारद्धाज लिखित और निर्देशित नाटक “राजगति” समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
मंचन का विवरण इस प्रकार है:
कब : 23 जनवरी,2019,बुधवार  रात 8 बजे
कहाँ : “शिवाजी नाट्य मंदिर”, दादर(पश्चिम), मुंबई
कलाकार:अश्विनी नांदेडकर, योगिनी चौक, सायली पावसकर, कोमल खामकर, तुषार म्हस्के,स्वाति वाघ,हृषिकेश पाटिल,प्रियंका काम्बले,प्रसाद खामकर और सचिन गाडेकर।
अवधि :120 मिनट
नाटक 'राजगति', : “नाटक राजगति ‘सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति’ की गति है. राजनीति को पवित्र नीति मानता है.राजनीति गंदी नहीं है के भ्रम को तोड़कर राजनीति में जन सहभागिता की अपील करता है. ‘मेरा राजनीति से क्या लेना देना’ आम जन की इस अवधारणा को दिशा देता. आम जन लोकतन्त्र का प्रहरी है. प्रहरी है तो आम जन का सीधे सीधे राजनीति से सम्बन्ध है.समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना जगाता है,जिससे आत्महीनता के भाव को ध्वस्त कर ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।“
नाटक “राजगति” क्यों ?
हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ ‘एक पल विचार करें ... की क्या वाकई राजनीति ‘गंदी’ है ..या हम उसमें सहभाग नहीं लेकर उसे ‘गंदा’ बना रहे हैं हम सब अपेक्षा करते हैं की ‘गांधी , भगत सिंह , सावित्री और लक्ष्मी बाई’ इस देश में पैदा तो हों पर मेरे घर में नहीं ... आओ इस पर मनन करें और ‘राजनैतिक व्यवस्था’ को शुद्ध और सार्थक बनाएं ! समता,न्याय,मानवता और संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ‘राजनैतिक परिदृश्य’ को बदलने की चेतना को जगाएं ,ताकि आत्महीनता का भाव ध्वस्त हो और ‘आत्मबल’ से प्रेरित ‘राजनैतिक नेतृत्व’ का निर्माण हो।
पंजाब में नाटय को समर्पित कुछ विशेष लोग 
“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन विगत 26 वर्षों से फाशीवादी शक्तियों से जूझ रहा है। भूमंडलीकरण और फाशीवादी ताकतें ‘स्वराज और समता’ के विचार को ध्वस्त कर समाज में विकार पैदा करती हैं जिससे पूरा समाज ‘आत्महीनता’ से ग्रसित होकर हिंसा से लैस हो जाता है. हिंसा मानवता को नष्ट करती है और मनुष्य में ‘इंसानियत’ का भाव जगाती है कला. कला जो मनुष्य को मनुष्यता का बोध कराए...कला जो मनुष्य को इंसान बनाए! “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”... एक चौथाई सदी यानी 26 वर्षों से सतत सरकारी, गैर सरकारी, कॉर्पोरेटफंडिंग या किसी भी देशी विदेशी अनुदान से परे. सरकार के 300 से 1000 करोड़ के अनुमानित संस्कृति संवर्धन बजट के बरक्स ‘दर्शक’ सहभागिता पर खड़ा है हमारा रंग आन्दोलन.. मुंबई से मणिपुर तक!
लेखक –निर्देशक : रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज रंग दर्शन थिएटर ऑफ रेलेवेंस' के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता हैं, जो राष्ट्रीय चुनौतियों को न सिर्फ स्वीकार करते हैं, बल्कि अपने नाट्य सिद्धांत "थिएटर आफ रेलेवेंस" के माध्यम से वह राष्ट्रीय एजेंडा भी तय करते हैं।  अब तक 28 से अधिक नाटकों का लेखन—निर्देशन तथा अभिनेता के रूप में 16000 से ज्यादा बार राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं!
दर्शक सहयोग और सहभागिता से आयोजित इस मंचन में आपके सक्रिय सहयोग और सहभागिता की अपेक्षा !
अच्छा हो यदि इस नाटक का मंचन देश के सभी भागों में हो सके। इस मकसद के लिए स्थानीय नाटय मंडलियों को एक प्रोफेशनल सोच सामने रखते हुए आगे आना हगा तांकि नाटय  मंडलियों के कलाकारों का आवश्यक खर्चा भी निकल सके। 
लुधियाना में डाक्टर अरुण मित्रा, पत्रकार एम एस भाटिया, मैडम सपनदीप कौर, त्रिलोचन सिंह और इप्टा से जुड़े पुराने कलाकार प्रदीप शर्मा भी सक्रिय  हैं।  चंडीगढ़-मोहाली में प्रगतिशील लेखक कंवर, अमन भोगल, संजीवन सिंह, रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला में इंद्रजीत रूपोवालिया, मोगा में विक्की माहेश्वरी सहित बहुत से लोग सक्रिय हैं। अच्छा हो एक ज़ोरदार हल्ला जन विरोधी साज़िशों पर बोला जा सके। शायद सआदत हसन मंटो और सफदर हाशमी की अंतरात्मा को इससे शांति मिल सके।