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Monday, July 19, 2021

कैप्टन अमरिन्दर सिंह का N.D.A. सरकार पर गंभीर आरोप

 Monday 19th July  2021 at 10:53 PM

 NDA ने पैगासस जासूसी से किया राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता 

प्रतीकात्मक फोटो 

*सुप्रीम कोर्ट को अपने स्तर पर तुरंत संज्ञान ले 
*भारत की सुरक्षा को खतरे में डालना मुद्दा 
*भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर कार्रवाई की अपील
चंडीगढ़: 19 जुलाई 2021: (गुरजीत सिंह बिल्ला//पंजाब स्क्रीन)::
प्रतीकात्मक फोटो 
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने चोटी के राजसी नेताओं, पत्रकारों, कारोबारियों, वैज्ञानिकों, संवैधानिक अधिकारियों और दूसरे व्यक्तियों के निजी फोनों की हैकिंग की सोमवार को निंदा करते हुए कहा कि यह न सिर्फ़ व्यक्तिगत निजता पर शर्मनाक हमला है बल्कि केंद्र की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की तरफ से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जैसे संसद के अंदर और बाहर पैगासस जासूसी का मामला उजागर हुआ है, यह केंद्र सरकार की तरफ से भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली पर हैरान कर देने वाला हमला है जिसने इस घिनौनी कार्यवाही के द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता किया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी मुखबरी जो इजराइली कंपनी द्वारा केंद्र सरकार की हरी झंडी के बिना नहीं की जा सकती, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, सरकारों और संगठनों के हाथ में संवेदनशील जानकारी दे दी है जिसका भारत के खि़लाफ़ दुरुपयोग हो सकता है।
उन्होंने कहा,’’यह सिर्फ़ व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला ही नहीं बल्कि हमारे मुल्क की सुरक्षा पर भी हमला है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने और एन.डी.ए. सरकार के खि़लाफ़ कार्यवाही करने की अपील की है।’’ कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार इससे बच नहीं सकती। उन्होंने एक जघन्य पाप किया है और इनको इसकी कीमत चुकानी होगी। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि किसी को अपने लोगों के जीवन में दख़ल देने का अधिकार नहीं है, जैसे कि इस सरकार ने किया है, लोगों को अपना जीवन आज़ादी के साथ जीने दो।
मुख्यमंत्री ने इस घटनाक्रम को भाजपा के नेतृत्व वाली भारत सरकार की तरफ से सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और विरोधियों की आवाज़ दबाने वाला कदम करार दिया है। उन्होंने इस निंदनीय कृत्य के लिए केंद्र सरकार की सख़्त आलोचना करते हुए कहा कि इसने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नया निम्न स्तर तय कर दिया।
कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कहा, ’’इससे पहले विश्व के किसी भी हिस्से में किसी सरकार ने अपनी संस्थाओं और लोगों की सुरक्षा और हिफ़ाज़ात को इस ढंग के साथ दाव पर नहीं लगाया था।’’ उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि भारत को निशाना बनाने के लिए वैश्विक साजिश रची गई है जिसमें एन.डी.ए. सरकार स्पष्ट तौर पर हिस्सा बनी।

Saturday, September 29, 2018

अवैध संबंधों की इजाजत देना खतरनाक: शाही इमाम पंजाब

Sep 29, 2018, 12:43 PM
भारतीय संस्कृति और धर्म हरगिज़ इसकी इजाज़त नहीं देते
जामा मस्जिद ने खुल कर कहा:पति-पत्नी एक दूसरे के सार्थी 
लुधियाना: 29 सितंबर 2018 (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
पति-पत्नी के संबंधों और उनकी पवित्रता की बचने के लिए जामा मस्जिद ने खुल कर स्टैंड ले लिए है। हाल ही में आये फैसले को आड़े हाथों लेते हए शाही इमाम ने भारतीय संस्कृति की याद भी दिलाई है। यहां एक विशेष मीडिया मीट में पत्रकारों से उन्होंने इस संबंध में विस्तार से चर्चा की। 
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 को असंवैधानिक बताते हुए पति पत्नी के रिश्ते की व्याख्या करते हुए जो कहा है कि महिला पति की सम्पत्ति नहीं, यह व्याख्या भारतीय संस्कृति से मेल नहीं खाती, यह बात आज यहां ऐतिहासिक जामा मस्जिद लुधियाना में पत्रकार सम्मेलन को संबोधित करते हुए शाही इमाम पंजाब मौलाना हबीब उर रहमान सानी लुधियानवी ने कही। शाही इमाम ने कहा की पति पत्नी एक दूसरे के सार्थी हैं दोनों का एक दूसरे पर विश्वास ही घर की शांति और पूंजी है जिससे यह दोनों हर मुश्किल का मुकाबला दृढ़ता से करते हैं। उन्होने कहा कि  भारतीय संस्कृति और धर्म हरगिज़ इसकी इजाज़त नहीं देते, इसलिए सर्वोच्य न्यालय को इस पर दोबारा विचार करना चाहिए। उन्होंने ने कहा कि इस फैसले से देश में महिलाओं की पीड़ा और बढऩे वाली है, शाही इमाम मौलाना हबीब ने कहा कि अंग्रेजी सम्राजी सरकार की गुलामी से देश को स्वतंत्र कराने के लिए कुर्बानी इसलिए नहीं दी थी कि पश्चिम की सभ्यता को आदेश के जरिए थोपने की कोशिश की जाए। शाही इमाम ने सभी धर्मो के उच्च गुरुओं से भी अपील की है कि इस फैसले को बदलने के लिए सरकार को कहें। शाही इमाम ने कहा की देश में कानून बनाना संसद का काम है सर्वोच्य न्यालय को तीन तलाक के कानून की तरह इसको भी संसद में विचार के बाद कानून बनाने के लिए कहना चाहिए था, उन्होंने कहा कि ऐसी सभी धाराओं को बदलने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर जनता की भी राय लेनी चाहिए। उन्होंने ने कहा कि हैरत है कि एक तरफ यह कहा जाता है कि तीन तलाक नहीं दी जा सकती और दूसरी ओर शादी शुदा जोड़ों को अवैध संबंध बनाने की इजाजत दी जा रही है। एक सवाल का जवाब देते हुए शाही इमाम ने कहा कि मस्जिद और नमाजियों का रिश्ता अटूट है इस पर बहस की कोई जरुरत नहीं। इस अवसर पर नायब शाही इमाम मौलाना उसमान रहमानी लुधियानवी, मुफ्ती जमालुदीन, कारी इब्राहिम, मौलाना महबूब आलम, शाह नवाज अहमद और शाही इमाम के मुख्य सचिव मुहम्मद मुस्तकीम आदि मौजूद थे।

Thursday, September 27, 2018

अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है

व्याभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए
नयी दिल्ली: 27 सितंबर 2018: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो):: 
सम्बन्धों के मामले में स्वछंदता और स्वतन्त्रता चाहने वालों के लिए लिए शायद यह खबर खुशखबरी लेकर आई है। अब व्याभिचार शायद अधिकार बन गया है। जो स्वदेशी, संस्कृति और समाजिक बन्धनों से अभी भी प्रेम करते हैं उनके लिए शायद यह दुखद होगा। व्याभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को ‘‘पतियों की संपत्ति’’ बना दिया था। इस सम्पति से याद आ रही है प्रोफेसर मोहन सिंह जी की एक कविता-"जायदाद"। कहा जाता है अपनी यह रचना उन्होंने जानीमानी लेखिका अमृता प्रीतम पर लिखी थी जिसे वह मन ही मन चाहते थे।चना की आरम्भिक पंक्तियों का उल्लेख यहाँ आवश्यक लग रहा है जिनका हिंदी अनुवाद है: 
दरवाज़े पर चुप खड़ी थी जायदाद
पास मालिक उसका
सामने आशिक उसका---
इस काव्य रचना में दरवाजे में खड़ी महिला का मालिक अर्थात पति उसके कंधे को पकड़ कर कहता है -
मेरी है यह सम्पति 
मैं हूँ मालिक इसका
मनु का कानून भी मेरी तरफ
वक्त की सरकार भी मेरी तरफ
पैसे की छनकार भी मेरी तरफ
धर्म लोकाचार भी मेरी तरफ
दिल नहीं तो न सही---------
लगता है प्रोफेसर मोहन सिंह की "तड़प" और उनके "दिल की आवाज़" सुन ली गई है। हालांकि उनकी काव्य रचना का मकसद व्याभिचार कभी न रहा होगा लेकिन समाज ने इसे व्याभिचार ही सोचा होगा। इस समस्या पर बहुत सी फ़िल्में बनी---बहुत सी रचनाएँ लिखी गयीं--तिकोने-चिकोने प्यार ने बहुत से घर बर्बाद कर दिए और बहुत सी जिंदगियां इसी तरह समाप्त हो गयीं जिनके सपनो में कोई और था लेकिन बाहों में कोई और। 
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया। फैसला ऐतिहासिक है। समाज के एक बड़े हिस्से में यह सब कुछ आम हो ही चूका था। बहुत सी हत्याएं-बहुत सी खुदकुशियां इसी मुद्दे को लेकर एक आम सी बात बन चकी थीं। अब व्याभिचार समानता का अधिकार बनने जा रहा है। 
शीर्ष अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार तथा महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया। 
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर. एफ. नरिमन, न्यायमूर्ति ए. एम.खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने एकमत से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है।

मामला केवल एक छूट देता ही लकिन लग रहा है। लेकिन इसका दूर तक जाने वाला है। बहुत सी पेचीदगियां सामने आने वाली हैं। संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया है। यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरूष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गयी थी। "अन्याय और असमानता" के खिलाफ लगे गई गुहार "समानता" की इतनी बड़ी सौगात लेकर आयेगी इसकी तो कल्पना भी नहीं थी। 
सोचना होगा विवाह को सात जन्मों का बंधन और समाज के स्थायित्व का आधार मानने वाले वर्ग के मन कें क्या क्या चल रहा होगा?
व्यभिचार को प्राचीन अवशेष करार देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव जीवन के सम्मानजनक अस्तित्व के लिए स्वायत्ता स्वभाविक है और धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है।
याद करना होगा रामायण और महाभारत का युग जब स्वयम्बर के ज़रिये महिला को अपनी पसंद का वर चुनने का अधिकार होता था। अब यह "अधिकार" विवाह के बाद भी जारी रहेगा। शायद शादी के सात वचनों में आठवां वचन यह भी लिया जायेगा कि पतिदेव अब अपनी पत्नी को अपनी सम्पति समझने की भूल नहीं करेंगे। 
हालांकि प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा कि व्याभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए लेकिन इसे अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा और इसे विवाह खत्म करने तथा तलाक लेने का आधार माना जाएगा। घरों को तोड़ने के लिये कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता। इस  बात के बावजूद उन क्लबों की हकीकत नहीं बदल जाएगी जहाँ कारों की चाबियों के ज़रिये पत्नियों का तबादला बहुत पहले से होता आ रहा है। "शादी" भी बनी रहती है और "मौज मस्ती की स्वतन्त्रता" भी चलती रहती है। 
भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरूष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा। इस अपराध के लिये पुरूष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था। 
इस सम्बन्ध में शाइन की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 497 का प्रावधान पुरूषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 :समता के अधिकारः , 15 : धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहींः और अनुच्छेद 21:दैहिक स्वतंत्रता का अधिकारः का उल्लंघन होता है। इस याचिका पर हुए फैसले ने एक नया इतिहास रचा है। 
न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने अपने फैसले में कहा है कि विवाह के खिलाफ अपराध से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198 को हम असंवैधानिक घोषित करते हैं। अब अदालतों में लटक रहे ऐसे मामलों पर क्या असर पड़ेगा यह देखना अभी बाकी है। जो लोग सजा काट रहे हैं उनका पक्ष भी सामने आना है। 
न्यायमूर्ति नरिमन ने धारा 497 को पुरातनकालीन बताते हुए प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति खानविलकर के फैसले से सहमति जतायी। उन्होंने कहा कि दंडात्मक प्रावधान समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है। वहीं न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 महिला के सम्मान को नष्ट करती है और महिलाओं को गरिमा से वंचित करती है।
गौरतलब है कि इस पीठ में शामिल एकमात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इस प्रावधान को बनाए रखने के पक्ष में कोई तर्क नहीं है। अपनी और न्यायमूर्ति खानविलकर की ओर से फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि व्यभिचार महिला की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाती है और व्यभिचार चीन, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपराध नहीं है।
उन्होंने कहा कि संभव है कि व्यभिचार खराब शादी का कारण नहीं हो, बल्कि संभव है कि शादी में असंतोष होने का नतीजा हो। बात बहुत गहरी और वजनदार है। न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि महिला के साथ असमान व्यवहार संविधान के कोप को आमंत्रित करता है। उन्होंने कहा कि समानता संविधान का शासकीय मानदंड है।
संविधान पीठ ने कहा कि संविधान की खूबसूरती यह है कि उसमें ‘‘मैं, मेरा और तुम’’ शामिल हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं के साथ असमानता पूर्ण व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है और अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है।’ शायद प्रोफेसर मोहन सिंह की काव्य रचना में उठी आवाज़ अब रंग लायी है। 
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि धारा 497 जिस प्रकार महिलाओं के साथ व्यवहार करता है, यह स्पष्ट रूप से मनमाना है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं हो सकता है जो घर को बर्बाद करे परंतु व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए।
न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहा कि धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया जाये क्योंकि व्यभिचार स्पष्ट रूप से मनमाना है। इस सम्बन्ध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि व्यभिचार को विवाह विच्छेद के लिये दीवानी स्वरूप का गलत कृत्य माना जा सकता है। अब देखना है समाज इसे कैसे लेता है और समाज पर इसके क्या प्रभाव पड़ते हैं। 

Friday, May 06, 2016

मां के अंतिम संस्कार के लिए सहारा प्रमुख को 4 सप्ताह की पैरोल

चार हफ्तों के दौरान भी जारी रहेगी सादा वर्दी में निगरानी  
बहुत पहले जानेमाने पंजाबी  सुरजीत पात्र ने लिखा था- 
जो बदेशां ''च रुलदे ने रोटी लई 
ओह जड़ों देस पर्तणगे अपने कदी! 
जां तां सेकनगे मां  दे सिवे  दी अगन,
ते जां कबरां दे रुख हेठ जा बैहनगे। 
आज इन पंक्तियों की याद आ रही है सहारा इंडिया प्रमुख सुब्रत रॉय की हालत देख कर। हो सकता है उन्होंने बहुत सा धन कमा लिया हो लेकिन अनमोल धन वह खो बैठे हैं। जब उनकी मां ने इस दुनिया से विदा ली वह उसके पास नहीं बैठे सके।  आखिरी इच्छा भी नहीं पूछ सके। उन्हें अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए चार सप्ताह की पैरोल मिली है। जेल से आरजी रिहाई। इन जेलों में ऐसे बहुत से दर्द दफन हैं।
जेल के संबंध में कभी साहिर लुधियानवी साहिब ने लिखा था--
जेलों के बिना जब दुनिया की  जाएगी 
वह सुबह कभी तो आएगी।  वो सुबह कभी तो आएगी। भी लगातार बढ़ती रही। 
लेकिन जेलों के आकार और जेलों की संख्या में वृद्धि होती चली गई। सुरक्षा बलों के साथ जुर्म की दर और मुजरिमों की  बढ़ती चली गई। सहारा इंडिया प्रमुख सुब्रत रॉय को सुप्रीम कोर्ट ने 4 सप्ताह परोल दे दी है। इससे पहले सुब्रत ने अंतरिम जमानत के लिए अदालत में अपील कर दी थी। जिस पर दो बजे सुनवाई होनी थी। गौरतलब है कि सुब्रत ने पेरोल अ पनी मां छवि राय के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मांगा है जिनका निधन शुक्रवार की सुबह लखनऊ में हो गया था। उनके दिल पर क्या गुज़र रही होगी इसका  लगाना लथिं नहीं है लेकिन एक मां की और उस  पर एक बेटे की पैरोल पर यह रिहाई एक बार फिर पूंजीवाद की बुराइयों को सामने लाते हुए बताती है कि कैसे यह सिस्टम हमें अपनी संवेदनाअों से दूर ले जाता है। हमारे हाथ में केवल पैसा रह जाता है लेकिन हम अपनों को खो बैठते हैं। पूँजीवाद पूँजी वहीं लोगों के साथ साथ उनको भी अपना  डालता है जो सारी सारी उम्र  तरीका प्रयोग करके पूँजी एकत्र करने में लगा देते हैं।  
गौरतलब है कि निवेशकों के पैसे न वापस करने की वजह से सुब्रत राय 4 मार्च 2014 से ही तिहाड़ जेल में बंद है। सुब्रत को यह पैरोल मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने दी है, जिसकी मांग सुब्रत की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने की थी। पैरोल के चार हफ्तों के दौरान सादी वर्दी में सिपाही उनकी निगरानी करेंगे। सुब्रत 2 साल बाद पहली बार जेल से बाहर आए हैं।

Sunday, August 11, 2013

राष्ट्रपति के आदेश का पालन हो

Sun, Aug 11, 2013 at 4:09 PM
उच्चतम न्यायालय में दी जाये हिन्दी में भी कार्य करने की अनुमति 
नई दिल्ली मे हुआ अधिवक्ता परिषद का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन
नई दिल्ली: 11 अगस्त 2013 (राजीव गुप्ता*) विधि शिक्षा और न्याय क्षेत्र में भारतीय भाषाओं की उपयोगिता एवं आवश्यकताओं को रेखांकित करने के उद्देश्य से शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने नई दिल्ली मे दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया.  पहले दिन के इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी. एस. सिरपुरकर ने कहा कि देश मे भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिये. उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोगों को भी एक – दूसरे की भाषा का न केवल सम्मान करना चाहिये अपितु उसे अंगीकार भी करना चाहिये. इसी तरह संस्कृत भाषी कवियों व लेखकों को अपनी बात सरल भाषा में ही व्यक्त करना चाहिये. दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रतियोगिता आयोग के सदस्य एस.एन. धींगरा ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थिति में भाषा को यदि व्यवसाय और रोजगार से जोड दिया जाय तो भाषा का विकास और इसकी उपयोगिता नि:सन्देह संभव है.   अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता डी. भरत कुमार ने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक अधिकार है कि वह अपना वाद और बहस अपनी मातृभाषा में करे. अपनी भाषा में न्याय की गुहार लगाना अनुच्छेद 19 का ही भाग है, जो प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. दूसरे दिन के कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और भारत सरकार के पूर्व सचिव बृज किशोर शर्मा ने कहा कि हिन्दी भारत की राष्ट्र्भाषा है और इसमें किसी भी प्रकार कभी भी कोई मतांतर नही रहा. जो मतांतर रहा वह केवल अंको के प्रयोग को लेकर रहा और कालंतर में निर्णय द्वारा आंग्ल लिपि के अंतर्राष्ट्रीय मानको को स्वीकृत किया गया और वही अनुच्छेद 343 में स्थान पाया. किसी भी अधिनियम के राजभाषा में अनुवाद को अधिकृत अधिनियम मानने हेतु संसद में 1972 में ही अधिनियम पारित कर दिया था, तभी से अधिकृत अनुवाद किसी भी राज्य की राजभाषा में सन्दर्भ हेतु प्रयोग किये जा सकते है. राजभाषा में विधि – पुस्तकों के हेतु उन्होनें कहा कि दंड प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, संपत्ति हस्तांतरण आदि की पुस्तकें हिन्दी एवं सभी राजभाषाओं में उपलब्ध हैं लेकिन संविधान पर हिन्दी में टीका 1950 से लगातार केवल “बसु” की ही उपलब्ध हैं क्योंकि संवैधानिक विषय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में विमर्श किये जाते है जहाँ की अधिकृत भाषा अंग्रेजी है. विधि आयोग के सदस्य बी.एन.त्रिपाठी ने कहा कि भाषा का स्वरूप सर्वप्रथम “बोली” से होता है तथा फिर शब्द व लिपि जुडती है. ऐसे में आज हिन्दी एवं राजभाषाओं को सही शब्दों से समृद्ध करना एक सतत प्रयास एवं प्रक्रिया है जिसके लिये राजभाषाओं में विधि शब्द कोषों की नितांत आवश्यकता है. साथ ही वें स्वयं सरकारी स्तर पर मातृभाषा के विषय को आगे बढायेंगे. शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के मीडिया प्रभारी राजीव गुप्ता ने बताया कि इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देश के अनेक राज्यों के उच्च-न्यायालयों के अधिवक्ता इस दो दिवसीय कार्यक्रम में भाग लिया.

समापन समारोह में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी ने सभा को बताया कि इस दो दिवसीय कार्यक्रम में निम्नलिखित निर्णय लिये गयें हैं :

विधि और न्याय के क्षेत्र में भारतीय के राष्ट्रीय परिसंवाद में में सर्वसम्मति से केन्द्र सरकार से मांग की गई कि -

1.      अंग्रेजी के प्रयोग पर रोक लगाकर केन्द्र में  हिन्दी और राज्यों में उनकी राजभाषा में कारगर कदम उठाये जाय.

2.      मध्य प्रदेश, रजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार (इनके विभाजन स्वरूप उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ) में उच्च न्यायालयों मे हिन्दी के प्रयोग की अनुमति है. इसी प्रकार देश के सभी अन्य राज्यों में उनके उच्च न्यायालयों के कामकाज की भाषा राजभाषा बनायी जाय.

3.      राष्ट्रपति के आदेशानुसार उच्चतम न्यायालय में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी में कार्य करने की भी अनुमति दी जाय.

4.      देश के सभी राज्यों की विधि संबंधी सभी परीक्षाओं तथा न्यायिक सेवा का माध्यम अंग्रेजी के अलावा हिन्दी और प्रादेशिक भाषाएँ बनायी जाय.

5.      राष्ट्रीय विधि संस्थानो एवं विश्वविद्यालयों में विधि पाठयक्रमों का माध्यम हिन्दी और भारतीय भाषाएँ हो.

6.      सभी न्यायालयों में सभी कार्य राजभाषाओं में हो.

7.      सभी विधान सभाओं में विधि बनाने का कार्य मूलत: राज्य की राजभाषा में हो.

8.      सभी राज्यों में राजभाषा कार्यांवयन समिति का गठन हों.

*राजीव गुप्ता जाने माने युवा पत्रकार भी हैं और इस संगठन/संस्थान के मीडिया प्रभारी भी--उनकी रचनाएं अक्सर पंजाब स्क्रीन और अन्य सहयोगी ऑनलाईन पत्रिकायों में भी अक्सर छपती रहती हैं फोन पर बात करने के लिए उनका सम्पर्क नम्बर है  09811558925

उद्देश्य:भारतीय भाषाओं की उपयोगिता एवं आवश्यकताओं को रेखांकित करना 

Thursday, August 08, 2013

पाकिस्तान स्थित गुरुधामों की जमीनों संबंधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Wed, Aug 7, 2013 at 9:39 PM
 एसजीपीसी ने किया फैसले का स्वागत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू कराना पाकिस्तान सरकार के बस की बात नहीं -सुरिंदर कोछड़
इतिहासकार सुरिंदर कोछड़                                            सभी तस्वीरें:-गजिंद्र सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन 
      एसजीपीसी सचिव त्रिलोचन सिंह                                                    सभी तस्वीरें:-गजिंद्र सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन 
                            एसजीपीसी सदस्य बीबी किरनजोत कौर                               सभी तस्वीरें:-गजिंद्र सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन 
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन)पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चौधरी की ओर से पाकिस्तान स्थित गुरुधामों की जमीनों को बेचने पर लगाई गई पाबंदी और बेची गई जमीनों का मुआवजा गुरुद्वारा कमेटियों को देने के फैसले का एसजीपीसी की ओर से स्वागत किया गया है। एसजीपीसी सचिव त्रिलोचन सिंह और एसजीपीसी सदस्य बीबी किरनजोत कौर ने कहा, कि इस फैसले से पूरी सिख कौम ने राहत की सांस ली है। उन्होंने बताया कि अब तक वक्फ बोर्ड ही जमीनों को बेचता रहा है। लेकिन इस फैसले के बाद न सिर्फ जमीनों पर कब्जे होना और उनकी नाजायज बिक्री होना रुक जाएगा, बल्कि बिकी हुई जमीनों का मुआवजा भी मिलेगा। उन्होंने इस फैसले के लिए पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चौधरी का धन्यवाद किया है।
     वहीं, इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ ने भी पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत तो किया है, लेकिन साथ ही उन्होंने कहा, कि इस फैसले का कोई असर नहीं होगा। उन्होंने कहा, कि पाकिस्तान में लैंड माफिया काफी मजबूत है। उन्होंने बताया, कि एक पाकिस्तानी युवक ने वहां के गुरुद्वारा साहिब पर हुए कब्जे की वीडियो यूट्यूब पर अपलोड की थी। जिसका खामियाजा उसे दो दिन पूर्व भुगतना पड़ा। उन्होंने कहा, कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लागू कराना पाकिस्तान सरकार के बस की बात नहीं है।