Showing posts with label Domestic Working Women. Show all posts
Showing posts with label Domestic Working Women. Show all posts

Thursday, January 07, 2021

न्यायपालिका की निष्पक्षता पर आस्था और गहरी हुई

Thursday:7th January 2021 at 2:09 PM
न्यायपालिका को सलाम एस एल हरदेनिया की  तरफ से 

अभी हाल ही में पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों के सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे निर्णय दिए हैं जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर आस्था और गहरी हुई है।

पाकिस्तान में कुछ दिन पहले  साम्प्रादायिक तत्वों ने वहां एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। उनकी इस हरकत पर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने सख्त अफसोस जाहिर किया और कहा कि उस मंदिर का पुननिर्माण किया जाए और मंदिर पुननिर्माण पर होने वाले खर्च को उनसे वसूला जाए जिन्होंने उसे तोड़ा है।

यह उल्लेखनीय है कि पिछले 30 दिसंबर को खेबर प्रांत के कारक जिले में स्थित इस मंदिर को एक भीड़ ने तोड़ दिया। भीड़ का नेतृत्व एक तथाकथित धार्मिक नेता कर रहे थे। मंदिर के ध्वस्त करने की घटना का संज्ञान स्वयं पाकिस्तान के मुख्य न्यायधीश गुलजार अहमद ने लिया और प्रांत के मुख्य सचिव, पुलिस के मुखिया तथा अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को आदेश दिया कि वे सब घटना स्थल का निरीक्षण करें और एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दें। घटना की सुनवाई करते हुए तीन सदस्यों वाली बेंच की अध्यक्षता करते हुए मुख्य न्यायधीश ने लगातार आक्रोश प्रकट करते हुए कहा कि मंदिर के पास पुलिस चौकी होने के बावजूद मंदिर कैसे तोड़ा जा सका? उन्होंने प्रांत के पुलिस प्रमुख से जानना चाहा कि यह गंभीर असफलता कैसे हुई। उन्होंने यह भी जानना चाहा कि पुलिस के गुप्तचरों को मंदिर तोड़ने की साजिश का पहले से पता क्यों नहीं लग पाया।   

पुलिस के मुखिया सना उल्ला अब्बासी ने बताया कि 92 पुलिसकर्मी जो उस समय ड्यूटी पर थे उनको निलंबित कर दिया गया है और घटना में शामिल 100 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस पर मुख्य न्यायधीश ने कहा कि अकेले गिरफ्तारी से कुछ नही होता है। इस घटना से दुनिया के सामने पाकिस्तान का सिर शर्म से झुक गया है।

मुख्य न्यायधीश ने अधिकारियों को आदेश दिया कि पाकिस्तान में जहां भी मंदिरों के आसपास अतिक्रमण है उन्हें तुरंत हटाया जाए और उन अधिकारियों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही की जाए जो अतिक्रमण नही हटाते हैं। मुख्य न्यायधीश ने पुनः आदेश दिया कि आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाएं और पुननिर्माण का कार्य तुरंत चालू किया जाए और समय सीमा में उसे पूरा किया जाए। साथ ही उस मौलवी से भी पैसे वसूले जाएं जिसके नेतृत्व में भीड़ ने मंदिर तोड़ा था।

यहां स्मरण दिलाना प्रासंगिक होगा कि बाबरी मस्जिद के ध्वस्त की घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने घोषणा की थी कि बाबरी मस्जिद फिर से बनाई जाएगी। परंतु यह वायदा पूरा नही किया गया। आशा है कि पाकिस्तान में ऐसा नही होगा।

घर के हर छोटे बड़े काम को संभालती महिलाएं-Pexels फोटो 
इसी तरह हमारे सुप्रीम कोर्ट को भी सलाम जिसने समाज में महिलाओं को प्रतिष्ठा और दबदबे को बढ़ाया है। यह रूढ़ीवादी सोच है कि जो महिलाएं घर में रहती हैं, वे काम नही करती। इसे बदलना चाहिए। महिलाएं घरों में पुरूषों के मुकाबले अधिक काम करती है। यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने वाहन दुर्घटना के एक मामले में मुआवजा राशि बढ़ाते हुए की। दरअसल, दिल्ली के एक दंपती की सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उसकी दो बेटियों ने मुआवजा मांगा। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह 40 लाख रू. मुआवजा दे। कंपनी ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने महिला के गृहिणी होने के कारण आय का न्यूनतम निर्धारण करते हुए मुआवजा घटाकर 22 लाख कर दिया। फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एनवी. रमना, एस अब्दुल नजीर और सूर्यकांत ने मुआवजा तय करते समय बच्चियों की मां द्वारा गृहिणी के रूप में किए जाने वाले काम को तरजीह दी। साथ ही मुआवजा राशि 22 लाख से बढ़ाकर 33 लाख रूपय कर दी। जस्टिस रमना ने अलग से लिखे फैसले में कहा कि महिलाओं का घरेलू कार्यों में समर्पित समय और प्रयास पुरूषों की तुलना में अधिक होता है। गृहिणी भोजन बनाती हैं, किराना और जरूरी सामान खरीदती हैं। बच्चों को देखभाल से लेकर घर की सजावट, मरम्मत और रखरखाव का काम करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो महिलाएं खेती में बुवाई, कटाई फसलों की रोपाई और मवेशियों की देखभाल भी करती हैं। उनके काम को कम महत्वपूर्ण नही आंका जा सकता। इसलिए गृहणी की काल्पनिक आय का निर्धारण करना अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है। कानून व न्यायालय गृहिणियों के श्रम, सेवाओं और बलिदान के मूल्य में विश्वास करते हैं। यह कानूनन इस विचार की स्वीकृति है कि भले ही महिलाएं घरेलू काम अवैतनिक करती हैं, लेकिन उनके काम का परिवार के आर्थिक विकास में योगदान होता है। वे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देती हैं। इस अहम तथ्य के बावजूद गृहिणियों को पारंपरिक रूप से आर्थिक विश्लेषण से दूर रखा गया है। हमारा दायित्व है कि अंतराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप इस मानसिकता में बदलाव किया जाए।

        ---एल. एस. हरदेनिया