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Sunday, November 06, 2016

सवालों से किसे नफ़रत हो सकती है? !!

Sunday:6 November 2016 at 10:04 PM
क्या जवाब देने वालों के पास कोई जवाब नहीं है?
सवाल करने की संस्कृति से किसे नफरत हो सकती है? क्या जवाब देने वालों के पास कोई जवाब नहीं है? जिसके पास जवाब नहीं होता, वही सवाल से चिढ़ता है। वहीं हिंसा और मारपीट पर उतर आता है। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि अथारिटी से सवाल नहीं होना चाहिए। यह सिर्फ एक बात नहीं है बल्कि ये आम जनता को चेतावनी है। उसकी हैसियत बताने का प्रयास है कि हम अथारिटी हैं और आप कुछ नहीं हैं। हम जो कहेंगे आप वही मानेंगे। सरकार के जो मंत्री ये बात कहते हैं, वो भूल जाते हैं कि सवाल पूछ पूछ कर ही उन्होंने सत्ता हासिल की है। अगर तब की सरकारें भी यही कहती तो इस देश में कभी सत्ता परिवर्तन ही नहीं होता। जिससे बेख़ौफ़ होकर कुर्सी पर गुंडे अपराधी बैठ जाते।अक्सर सत्ता से जुड़े लोग ही क्यों कहते हैं कि कुछ भी पूछने की आज़ादी हो गई है। तो क्या सरकार से पूछकर पूछना होगा? आप कभी भी देख लीजिए, बहुत आज़ादी हो गई टाइप की धमकी वही देते हैं जिनकी निष्ठा उस वक्त के सरकार के प्रति होती है। ऐसे लोग सत्ता के प्रतिनिधि गुंडे होते हैं।
सवाल पूछने से ही लोकतंत्र गतिशील रहता है। अब तो यह कहा जाने लगा है कि लगातार असंतोष और सवाल व्यक्त करने से विकास बाधित होता है। इसका मतलब है, हुक्मरानों ने इशारा कर दिया है कि वे अब किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। हम जवाब नहीं देंगे। ऐसी बातें सुनकर किसी को भी डरना चाहिए। अगर विकास पर सवाल नहीं होगा तो क्या होगा? क्या इस बात की गारंटी आप किसी नेता या सरकार की ले सकते हैं कि वो जो करेगी, कभी ग़लत नहीं करेगी। अगर दस हज़ार करोड़ के ठेके में दलाली हो गई तब तो सवाल पूछने पर सरकार जेल में डाल देगी कि आप विकास के विरोधी हैं। विकास सवालों से पर नहीं है। इसलिए भी नहीं है कि दुनिया में विकास का कोई भी मॉडल ऐसा नहीं है जिसमें हज़ार कमियाँ नहीं है।
क्या आपने सरकार और विकास का कोई ऐसा मॉडल देखा है, सुना है, पढ़ा है जिसमें सवाल पूछना मना होता है क्योंकि वह सरकार कोई ग़लती करती ही नहीं है। उसके विकास के मॉडल में कोई ग़रीब नहीं होता है। उसके विकास के मॉडल में कोई किसान आत्महत्या नहीं करता है। उसके मॉडल में सबका सस्ता इलाज होता है। मेरी जानकारी में दुनिया में ऐसा कोई मॉडल नहीं है। ऐसी कोई सरकार नहीं है।
सवालों को लेकर असहनशीलता बढ़ती जा रही है। इसके कारण बहुत साफ है। दुनिया के तमाम मॉडल फ़ेल हो चुके हैं। एक या दो फीसदी लोगों के पास पूरी दुनिया की आधी से ज़्यादा संपत्ति आ गई है। भारत में भी चंद लोगों के पास आधी से अधिक आबादी के बराबर संपत्ति आ गई है। सरकारों के नुमाइंदे इन्हीं चंद लोगों के संपर्क में रहते हैं। बल्कि इनकी मदद के बग़ैर अब राजनीति मुमकिन नहीं है। आप देखते ही होंगे कि चुनाव आते ही प्रचार में कितना बेशुमार पैसा खर्च होता है। राजनीति को ईंवेंट मैनेजमेंट बना दिया जाता है। प्रेस भी इस प्रक्रिया का साथी हो गया है।
इसके बावजूद पत्रकारों का बड़ा हिस्सा इनसे अलग बचा हुआ है। वो नए नए संसाधनों से सवाल पूछने का विकल्प बनाने का प्रयास कर रहा है। प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर पूरी दुनिया में बहस हो रही है। कारपोरेट और सरकार देनों मिलकर प्रेस का गला दबा रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है कि जनता अब पूछने वाली है कि सिर्फ दो प्रतिशत आबादी के पास सत्तर फीसदी आबादी का पैसा कहाँ से आ गया है। क्यों वे भूखे मरने लगे हैं। ज़ाहिर है सवाल पूछने की गुज़ाइश ही एकमात्र ख़तरा है। इसलिए उसे दबाने का प्रयास चल रहा है। ताकि आम लोग भूख, रोटी और रोज़गार से जुड़े सवाल न कर सके। हाल ही में पंजाब के एक किसान ने पांच साल के अपने बेटे को सीने से लगाकर नहर में छलाँग लगा दी। उस पर दस लाख का क़र्ज़ा था। वो क्यों नहर में कूद गया क्योंकि कोई उसके लिए सवाल उठाने वाला नहीं था ? कोई उसकी बात सुनने वाला नहीं था।
इसलिए प्रेस की आज़ादी की रक्षा करना पत्रकार से ज़्यादा नागरिक का सवाल है। आप हमारे रक्षक हैं। सरकारों को लगता है कि ख़ूब प्रचार कर जनता को अपना गुलाम बना लिया है। यह जनता वही सुनेगी जो वे कहेगी। पूरी दुनिया में नेता इसी तरह की भाषा बोल रहे हैं। उन्हें लगता है कि जनता प्रेस के ख़िलाफ़ है। प्रेस में कई कमियाँ हो सकती हैं लेकिन जनता की तरफ से सवाल पूछने का अधिकार कोई नहीं छिन सकता है। जनता ही पूछ बैठेगी कि हुजूर क्या बात है कि आपको सवाल पसंद नहीं है।
पत्रकार डरेगा, नहीं लिखेगा तो नुक़सान नागरिक का ही होगा। सरकारों को दमन बढ़ जायेगा। गुलाम प्रेस नागरिकों का दम घोंट देगा। इसलिए सवाल पूछने के माहौल का समर्थन कीजिये। जो भी इसके ख़िलाफ़ है उसे लोकतंत्र के दुश्मन के रूप में समझिये। एक देशभक्ति यह भी है कि हम जनता की रक्षा के लिए सवाल करें। सवाल करने से ही राष्ट्रीय सुरक्षा मज़बूत होती है। जवाब मिलने से ही लोग सुरक्षित महसूस करते हैं। अगर जवाब नहीं मिलेगा तो जनता असुरक्षित महसूस करेगी। जनता असुरक्षित रहेगी तो राष्ट्र सुरक्षित नहीं हो सकता है। सीमा पर जवान हमारी रक्षा करते हैं ताकि सीमा के भीतर पत्रकार सरकारों से सवाल कर नागरिकों की रक्षा करते हैं। इसलिए पत्रकार को क़लम का सिपाही कहा गया है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को जनता का सेवक कहा जाता है। हम सवाल पूछने वाले सिपाही हैं ताकि सेवक जनता से बेवफ़ाई न करे।

लगातार बढ़ रहा है एनडीटीव इंडिया पर बैन का विरोध

शब्दों पर पाबन्दी के इस मुद्दे पर एकजुट हुए अधिकतर संगठन
एनडीटीवी इंडिया पर एक दिवसीय बैन के खिलाफ विरोध जारी है। आपातकाल और सेंसरशिप को कोसने वालों ने खुद इंदिरागांधी के कदम को जायज़ थर दिया है। अनुमान लगाइये अगर आपातकाल लगा तो पाबन्दियाँ कैसी होंगीं। 

युवा पत्रकार महासंघ की तरफ से उबैद कुरैशी ने अपना विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा हम इसके खिलाफ हैं। *प्रेस क्लब ऑफ इंडिया,महिला प्रेस क्लब ,एडिटर्स ब्रॉडकास्टर्स एसोसियेशन,एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया* अरुणाचल से लेकर मुम्बई तक

विरोध। *दिल्ली प्रेस क्लब से लेकर नेशनल मीडिया कान्फेडरशन* के हर सदस्य का विरोध *आल इन्डिया स्माल नयूज़ पेपर रिपोर्टर* से लेकर *अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा मुहिम पीएमजे* का एनडीटिवी के समर्थन मे विरोध फ्रीडम फार फ्री प्रेस कि आजादी के लिये *अखिल भारतीय विरोध वुमन जर्नलिस्ट एसोसियेशन* का विरोध
*कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विरोध*
अगर ये आपातकाल नही है और राष्ट्रवाद है फिर *इंदिरा गांधी* द्वारा लगाया आपातकाल का विरोध क्यों?
उनकी और उनके समर्थकों के नज़र में भी राष्ट्रवाद ही था।
अपनी बोलने लिखने सवाल करने कि अभिव्यक्ती कि आजादी के लिये अपने संगठनो का नाम लिख कर विरोध जताना सीखिये !!

एनडीटीवी पर पाबंदी के खिलाफ भोपाल के पत्रकार आगे आये हैं। पत्रकारों ने एक सुर में इस बैन को ग़लत बताया और इसे लिखने बोलने लिखने सवाल करने कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ माना। क़रीब डेढ सौ से ज्यादा पत्रकारों ने बैठक की और तय किया कि सरकार के इस क़दम के खिलाफ नौ नवंबर तक काली पट्टी बाँधकर काम करेंगे।

*अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति* ने भी कहा कि वह इस आदेश का पुरजोर विरोध करती है।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया,महिला प्रेस क्लब ,एडिटर्स ब्रॉडकास्टर्स एसोसियेशन,एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया अरुणाचल से लेकर मुम्बई तक विरोध।
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विरोध की बात इसलिए नहीं कि क्योंकि राष्ट्रवादियों को आपत्ति हो जाती।
अगर ये आपातकाल नही है और राष्ट्रवाद है फिर इंदिरा गांधी द्वारा लगाया आपातकाल का विरोध क्यों?

उनकी और उनके समर्थकों के नज़र में भी राष्ट्रवाद ही था।

*अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति* इस आदेश का पुरजोर विरोध करती है।
*श्री सैयद महमूद अली चिश्ती* 
राष्ट्रीय संरक्षक ABPSS
*श्री जिग्नेश कालावाड़िया*
राष्ट्रीय अध्यक्ष ABPSS
*श्री नितिन सिन्हा*
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ABPSS
*श्री महफूज़ खान*
राष्ट्रीय महासचिव ABPSS
*श्री राकेश प्रताप सिंह परिहार* 
राष्ट्रीय सचिव ABPSS
*श्री अमित गौतम* 
प्रदेश संयोजक छत्तीसगढ़ ABPSS
*श्री गोविन्द शर्मा (गौर)*
प्रदेश अध्यक्ष छत्तीसगढ़ ABPSS