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Wednesday, March 29, 2017

हम इन कलाकार बच्चियों को हर सम्भव सहयोग देंगें-पूनमप्रीत कौर

मैंने ऐसा कमाल पहले कहीं नहीं देखा-नीलम डावर 
लुधियाना: 28 मार्च 2017: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन)::
प्रकृति की कला दुनिया भर में दिखाई देती है। प्रकृति का संगीत हर पल सुना जा सकता है। प्रकृति के चमत्कार कभी भी कहीं भी देखे जा सकते हैं। इस खूबसूरत हकीकत के बावजूद बाहत कम किस्मत वाले होते हैं जिनके पास इस सुंदरता को देखने वाली आँख होती है और इस संगीत  को सुन सकने वाले कान। प्रकृति ने इस कला में दक्ष होने की क्षमता भी हर किसी को दी है लेकिन आम तौर पर लोग उम्र के आखिरी सांस तक इस का अनुभव भी नहीं कर पाते। लेनदेन, हिसाब किताब, तेरा-मेरा और अपना पराया के चक्कर में लोगों की बहुत बड़ी संख्या इस खूबसूरत अनुभूति से वंचित रह जाती है। जिसें अनुभव ही नहीं किया उसकी अभिव्यक्ति भी कैसे हो सकती है?  
कुछ सौभाग्यशाली लोग होते हैं जिनके अंदर छिपी कला का जादू जाग पड़ता है। उनके अंदर की शक्ति सक्रिय होती है। उनकी आँख प्रकृति की विभिन्नता छुपी एकता का चमत्कार को  देखने के काबिल हो जाती है। 
देवकी देवी जैन कालेज के प्रकृति प्रेमी स्टाफ ने अपनी छात्रायों में कुछ ऐसा ही सक्रिय किया है।  पढ़ाई लिखाई और ज़िन्दगी की उलझनों के चक्कर में भी हर पल आनंदित रह कर कला को कैसे व्यक्त करना है इसके गुर बताये हैं। कालेज के वार्षिक कला प्रदर्शनी में इस बात का अनुभव बहुत बार हुआ। कला प्रदर्शनी में बहुत सी बच्चियां थी जिनके हालात अलग अलग थे, चेहरे अलग अलग थे,  उन चेहरों के पीछे छिपे किसी न किसी दुःख ,दर्द और संघर्ष के भाव भी अलग अलग थे लेकिन कला की चमक उन सभी चेहरों पर थी। कला का उत्साह उन सभी के हाव भाव में था। कला की जिस ख़ुशी को ये बच्चियां महसूस कर रही थी उसका अहसास सभी की किस्मत में नहीं होता। 
जब इनके दरम्यान पीसीएस अधिकारी पूनम प्रीत कौर पहुंची तो इनकी ख़ुशी चौगुनी हो गयी। पूनमप्रीत कौर ने एक एक पेंटिंग को बहुत ही गौर से देखा। कलाकार बच्चियों का इस्तेमाल करके के अंतर्मन को महसूस किया और इनको शाबाशी दी। उन्होंने पंजाब स्क्रीन से बात करते हुए यह आश्वासन भी दिया कि इन बच्चियों को और उत्साहित करने के लिए जो बन पड़ेगा वो किया जायेगा। इन बच्चियों की कलाकृतियों को देख कर पूनम प्रीत कौर ने कहा कि इस प्रदर्शनी को देख उनको बहुत ख़ुशी हुई है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसे भविष्य में रोज़गार भी बनाया  सकता है। 
इसी तरह जानेमाने सियासी नेता सुरेंद्र डावर की धर्मंपत्नी सुश्री नीलम डावर ने भी प्रदर्शनी में पहुंच कर इन बच्चियों का उत्साह बढ़ाया। उन्हने भी एक एक कलाकृति को देख कर उसका विवरण लिया। मैडम डावर ने प्रसन्नता व्यक्त की कि इन बच्चियों ने पुराने कपड़ों और अन्य पुरानी कबाड़ चीज़ों का इस्तेमाल करके शानदार कलाकृतियां बनाई हैं। बच्चियों के इस कमाल पर  डावर ने  प्रसन्नता व्यक्त की।
इस प्रदर्शनी की संयोजक सोनिया धवन ने बताया कि कैसे उन्होंने इन बच्चियों के अंदर छुपी कला को पहचाना और इनको प्रशिक्षण दे कर इन कलाकृतियों को बनाने  प्रेरणा दी। 
कालेज की प्रबन्धन समिति के चेयरमैन श्री सुखदेव राज और प्रधान नन्द किशोर भी अपने परिवारों सहित आए हुए थे। चेयरमैन ने आये हुए मेहमानों का धन्यवाद किया और बच्चियों के साथ साथ के स्टाफ की भी प्रशंसा।  

Wednesday, November 02, 2016

एक ख़ास डॉक्टर ने दोहराया समाज सुधार का संकल्प

नाटकों के ज़रिये समाज का अँधेरा दूर करने का हिम्मतवर प्रयोग 
लुधियाना: 2 नवम्बर 2016: (पंजाब स्क्रीन ब्यूरो): 
समाज और समाज की सोच को बदलने की भावना हर किसी के मन में पैदा ही नहीं होती।  इसके लिए भी प्रकृति चुनाव करती है किसी ख़ास व्यक्ति का जिसका आत्मबल बलवान हो और जीवनशैली जन भलाई से भरी हुई। इस बार प्रकृति ने चुनाव किया है हर व्यक्ति को आंखों के दीपक देने में जुटे डॉक्टर रमेश मेहता का। डॉक्टर रमेश का मानना है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा भी मानसिक तौर पर अँधा हो चुका है। बेटियों का अपमान, भ्रूण हत्या, नशाखोरी और रेप जैसे कुकृत्य कोई समझदार व्यक्ति कर ही नहीं सकता। राह जाती लड़कियों पर तेज़ाब फेंकना, उन्हें ज़िंदा जलाना, बहु को दहेज के लिए तंग करना किसी ऐसे अंधे व्यक्ति का ही काम हो सकता है जिसे अपने स्वार्थ के सिवा कुछ और नहीं दिखता।  जो पूरी तरह सम्वेदनहीन हो चुका है जैसे कि  कोई पत्थर हो। 
इस अंधे समाज को भी आंखें देने का संकल्प डॉक्टर रमेश ने किया हाल ही में। इस मकसद के लिए वह अपने चिकित्सा औज़ारों के साथ साथ अब कलम को भी हथियार बना रहे हैं। उन्होंने मीडिया से भी इस मकसद के लिए सहयोग माँगा है। उन्होंने एक ड्रामा लिखा "पुनरजोत का विवाह" जो कि बेहद लोकप्रिय हो रहा है। अब रविवार 6 नवम्बर 2016 को इसका मंचन होगा गाँव बद्दोवाल में जहाँ बाबा जसपाल सिंह की देखरेख में भाई घनईया चैरिटेबल अस्पताल की तरफ से बहुत सी ज़रूरतमन्द लड़कियों के सामूहिक विबाह एक साथ किये जाएंगे जिनकी संख्या 100 से ऊपर भी हो सकती है।   
यह जानकारी डॉक्टर रमेश ने आज पंजाबी भवन में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में दी। इस अवसर पर इस नाटक की सह निर्देशिका सपनदीप कौर  भी अपनी टीम के साथ मौजूद थीं। सपनदीप कौर ने कहा कि जनता को जगाना अधिक महत्वपूर्ण और आवश्यक कर्तव्य है। सपनदीप कौर ने पाश की एक प्रसिद्ध कविता के कुछ अंश भी पढ़े। भाई घनईया चैरिटेबल अस्पताल की तरफ से गुरप्रीत सिंह भी विशेष तौर पर पहुंचे। 
गौरतलब है कि डॉक्टर ऐस एन सेवक की सरपरस्ती में हो रहे इस नाटक के मंचन की मांग लगातार बढ़ रही है। नवांशहर से आने वाली जागो भी इस आयोजन का विशेष आकर्षण होगी। यह जागो भ्रूण हत्या की बुराई को कम करने के लिए निकाली जा रही है। 

Tuesday, October 18, 2016

गुरु शंकर चटर्जी-आप हमेशां दमोह के कला जगत में बने रहेंगे

18 अक्टूबर 2016को 18:45 बजे 
आपकी मौजूदगी का अहसास हम सभी को होता रहेगा
दमोह: 18 अक्टूबर 2016: (नूतन पटेरिया): 
दमोह कला जगत का ध्रुव तारा आकाशगामी हो गया। वर्षो  वर्षो पहले बांग्लादेश से आये परिवार में जन्मे नृत्य गुरु शंकर चटर्जी किसी परिचय के मोहताज नही है। दमोह शहर ही नही सम्पूर्ण बुंदेल खण्ड में शायद ही ऐसा कोई कला मंच हो जो जिस में शंकर चटर्जी दीक्षित किये शिष्य और शिष्या न हो।
कला की हर विद्या को अपने स्पर्श से उन्होंने झंकृत और अलंकृत किया। बंगाली परिवार में जन्मे शंकर चटर्जी यह सिध्द कर दिया कि कला और मानव का धर्म और जाती नही होती कला तो मार्ग होती है मानवता की परम सत्ता की प्राप्ति का। 

जब सारा माहौल फ़िल्म और पाश्चात्य संगीत और नृत्य में खो गया हो ऐसे में इस माँ सरस्वती के वरद पुत्र ने शास्त्रीय नृत्य और संगीत की मशाल को जलाये रखा और दमोह के लगभग हर परिवार में एक सदस्य के पास यह ज्ञान की ज्योति वह सौप कर गए। जैसे ही उनकी मौत का समाचार आया कला जगत ही नही एक आम व्यक्ति भी सुबक पड़ा। कई अनेको शोक सभाए हुईं। रोते बिलखते उनके कला को समर्पित शिष्य उनके जाने का कड़वा सच सहन करने की हिम्मत जुटाते रहे। कला को सीखते नोनिहाल भी इस अनहोनी के असत्य होने की नाकाम कामना करते रहे। यह हैरानकुन था और उनके जीवन की सच्ची कला साधना का परिचायक भी की  संस्मरण सुन कर छोटे छोटे बच्चे श्रद्धांजलि सभा में ही रो पड़े।  की सम्वेदना को अपनी हेयर मौजूदगी में  पाना किसी सच्चे साधक के कारण ही सम्भव होता है। सरस्वती कला निकेतन के संस्थापक गुरू शंकर चटर्जी को संस्था की ओर से श्रद्धांजलि दी गई। बहुत से संगठनों ने उनको अपने श्रद्धा  किये। शिष्य परंपरा को निभाते हुए युक्ति उज्जैनकर, सुचिता जैन, सान्वी शिवहरे, अनुुपमा, कल्याणी, रैनी मिश्रा ने अपने गुरू को श्रद्धा सुमन समर्पित किए। इस शोक सभा में शरद मिश्रा, नारायण सिंह ठाकुर, श्याम सुंदर शुक्ला, रवि वर्मन, डॉ केदार शिवहरे, डॉ. आलोक सोनवलकर, दिलीप नामदेव, संतोश अठ्या, संजू पेंटर, आदि ने शंकर गुरू को सहज विनीत एवं शिष्यों के लिए समर्पित व्यक्तित्व बताया। बहुत से अन्य संगठनों और संस्थानों ने भी अपनी श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया। शायद सही संख्या का नुमान भी न लग सके। 
यह सब हुआ पर कभी कोई भी लहर नही आ सकती जो उनके ज्ञान रूपी सागर की भरपाई कर सके। हम नमन करते है उस सहज हंसी का जिसे हम बसन्त पंचमी में होने वाली सरस्वती पूजन में न पायेगे पर आप सदैव रहेंगे अपने शिष्य शिष्याओं में। आप हमेशां दमोह के कला जगत में बने रहेंगे।  मंचो पर जब जब प्रस्तुति देगे आप से कला सीखे आपके अपने अंश कहे जाने वाले कला प्रेमी तब तब आपकी मौजूदगी का अहसास होता रहेगा। हम आपको नही भूलेंगे और न ही वो कला निकेतन भूलेगा जिस साधारण भवन को जिले के कला और संस्कृति का केंद्र बना दिया था आपने। किसी शायर ने कहा है न जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है----!

आप अब भी हैं हमारे आसपास कला की महक का अहसास दिलाते हुए बस आप नज़र आना बन्द हो गए।
                                                                                  --दमोह से नूतन पटेरिया  

Thursday, October 13, 2016

देश भर में ज़ोरदार रहा इप्टा पर हमले का विरोध

अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए इप्टा के  आए बहुत से संगठन 
दिल्ली//लुधियाना//इंदौर: 13 अक्टूबर 2016: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):  
हमला करने वालों ने सोचा होगा बस थोड़ी सी गुंडागर्दी और इप्टा खत्म। जो लोग बचेंगे उन के दिलों में भी हमारी दहशत। फिर डरे हुए कलाकार करेंगे हमारे फाशी  इरादों की प्रशंसा। पर हमला उल्टा पड़ा। इप्टा के साथ जुड़े हुए लोग भी एक बार फिर एकजुट हो गए और जो नहीं जुड़े थे वे भी इप्टा के समर्थन में आ गए। जम्मु, रांची, भिलाई, आगरा, दिल्ली, इंदौर और आंध्रप्रदेश में कलाकारों ने अपनी  कवितायों और गीतों से बुलन्द की फाशीवाद की गुंडागर्दी के खिलाफ आवाज़। 
दिल्ली में कर्यक्रम हुआ शाम चार बजे। जन समर्थक कला संगठन अभिव्यक्ति  के हक में खुल कर आए। इनमें इप्टा दिल्ली के साथ साथ जन नाटय मंच, जनवादी लेखक संघ, जुम्बिश आर्टस, निशांत नाटय मंच, मजमा, खिलौना, प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन  सहित बहुत से संगठन और मंच इस मकसद के लिए एकजुट हुए। 
इसी तरह आगरा में भी इप्टा के हक में कलाकार खुलकर आगे आए। आगरा और आसपास के  क्षेत्रों से जुड़े लोग अपने सभी काम छोड़ कर इस विरोध दिवस में शामिल हुए। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर मंडराते खतरे के खिलाफ हर सच्चे कलाकार ने आवाज़ बुलन्द की। यहाँ भी भाषण थे, कविता थी, संगीत था और संकल्प का सागर। गुंडागर्दी के खिलाफ कलम ने मोर्चा सम्भाला। 
इंदौर वह जगह है जहाँ इस खतरे ने खुलकर अपना चेहरा दिखाया। इंदौर में भी कला और संस्कृति के क्षेत्रों सक्रिय लोग बढ़ चढ़ कर आगे आए। कलाकारों ने हमले के उस काले दिन चर्चा की। इसके जवाब में लगे इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे की चर्चा की और  जता दिया कि हम इस तरह के हमलों से डरने वाले नहीं।  साबित किया कि आम साधारण लोगों से जुड़े संगठन इस तरह डरा नहीं करते।  वे इस  तरह  कायरतापूर्ण हमलों से और मज़बूत होकर निकलते हैं। 
जम्मू में भी गूंजी इप्टा की आवाज़: युद्ध और अशांति जैसा माहौल होने के बावजूद यहाँ भी इप्टा के हक में ज़ोरदार आवाज़ गूंजी। कलाकार खुल कर सामने आए और इप्टा पर  हुए हमले का खुलकर विरोध किया। इस विरोध के बहाने दूर दूर रहने वाले कलाकार भी एक दुसरे के नज़दीक आए। देश विदेश का हर कलाकार सिद्धांत सूत्र में बंधा महसूस हुआ। इस विरोध दिवस से अहसास हुआ कि  कितनी प्यारी है हर कलाकार को अभिव्यक्ति की आज़ादी।  

Sunday, September 04, 2016

मधुबनी में इप्टा का विशेष आयोजन 5 सितम्बर को

कला है जीवन का संग्राम--जन शक्ति को  लाल सलाम लाल सलाम
आम इन्सान के लिए  ज़िन्दगी हमेशां एक नई चुनौती बन कर सामने आई किसी न किसी नई मुसीबत की तरह। बहुत से लोग हिम्मत हार जाते।  हालात के सामने घुटने टेक देते। मौत से भी भयंकर हालात की आंख में आँख डाल कर मुस्कराना सिखाने वालों इप्टा का नाम गर्व से लिया जाता है। वह 25 मई 1943 का एक यादगारी दिन था जब मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इप्टा की स्थापना के अवसर की अध्यक्षता की और आह्वान किया, “लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग़ से काम करने वाले आओ और स्वंय को आज़ादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो”। 
 जिन की अंतरात्मा अभी भी ज़िंदा है और जाग रही है उनको प्रो. हीरेन मुखर्जी की आवाज़ आज भी सुनाई दे रही है। उनको साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी साहिब की नज़्में बार बार बुलाती हैं। उनको बलराज साहनी आज भी प्रेरणा देते हैं। 
भारतीय जननाट्य संघ (ईप्टा) मधुबनी … दिनांक 05-09-2016 को…
सभागार आर० के० कॉलेज मधुबनी में
समय 10 बजे पूर्वाहन से दिन के 03 बजे तक
शिक्षक दिवस समारोह सह मधुबनी नगर सम्मेलन करेगी…
आप सभी जो समाज के प्रति वैज्ञानिक नजरिया रखतें हैं सादर आमंत्रित है…
आप चाहें तो निमन्त्रण पत्रों पर दर्ज फोन नम्बरों पर सम्पर्क कर सकते हैं। 
निमंत्रण पत्र को बड़ा करके देखने के लिए इस तस्वीर पर क्लिक करें। 

Thursday, September 05, 2013

टीचर्स डे के उपलक्ष्य में एक कलाकार की श्रद्धा

Wed, Sep 4, 2013 at 9:18 PM
मीनिएचर आर्टिस्ट ने अपने ही अंदाज में पेश की श्रद्धा
अमृतसर: 4 सितम्बर 2013:(गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन): अध्यापक दिवस आज भी श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। स्वार्थ और शुद्ध कारोबारी नजरिये के इस दौर में भी अभी बहुत से लोग हैं जो अपने शिष्य को प्राचीन काल के गुरु की तरह ही पढ़ते हैं। बहुत से शिष्य भी हैं जो अपने अध्यापक को केवल एक टीचर नहीं बल्कि गुरु की तरह ही सम्मान देते हैं। इसकी ताज़ा मिसाल मिली अमृतसर में जहाँ हमारी मुलाक़ात हुई हरविन्द्र सिंह से। हरविन्द्र सिंह ने टीचर्स डे के मौके पर हर छात्र की तरह अपने गुरु को अपने ही अंदाज में श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं। अमृतसर के मीनिएचर आर्टिस्ट डा. हरविंदर सिंह ने अपने अपने ही विलक्ष्ण अंदाज में अपने गुरुओं को नमन किया। गुरु और चेले का समाज में अपना अलग स्थान है। आज टीचर्स डे के मौके पर हर छात्र अपने गुरु को अपने ही अंदाज में श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। इस बीच अमृतसर के मीनिएचर आर्टिस्ट डा. हरविंदर सिंह ने भी अपने ही अंदाज में अपने गुरुओं को नमन किया है। उन्होंने बताया, कि अध्यापक दिवस पर वह अपने अध्यापक को श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने करीब सौ पेंसिलों पर अपनी श्रद्धा को उकेर दिया। इन पेंसिलों की सहायता और संयोजन से उन्होंने बहुत ही आकर्षक कलाकृतियां बने हैं जिनकी एक झलक हम यहाँ भी प्र्स्त्गुत कर रहे हैं। 

Wednesday, August 14, 2013

चावल के दानों से तैयार किया भारत का नक्शा

Tue, Aug 13, 2013 at 8:32 PM
स्वतंत्रता दिवस पर पेपर आर्टिस्ट ने दिखाया अपनी कला का कमाल
अमृतसर (गजिंदर सिंह किंग//पंजाब स्क्रीन) 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था। आजादी के दिन से लेकर आज तक 15 अगस्त को देशवासी बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं। हर कोई इस दिन अपने-अपने अंगाज में लोगों को बधाई देता है, तो कोई एकता और अखंडता का संदेश देता है। इस बार स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में लोगों को बधाई देने के लिए अमृतसर के पेपर आर्टिस्ट गुरप्रीत सिंह ने अपने ही अंदाज में पेपर से देश के नक्शे को जहां तैयार किया है, वहीं उसने चावल के दानों से भी देश के नक्शे को तैयार कर लोगों को आपस में प्यार और सद्भाव से रहने का संदेश दिया। बकौल गुरप्रीत सिंह स्वतंत्रता दिवस का हमारे देशवासियों को पूरा साल इंतजार रहता है। उनके मुताबिक चावल के दानों से तैयार किए गए भारत देश के नक्शे को तैयार करने80 घंटे का समय लगा है। गुरप्रीत सिंह अब तक दुनिया के सात अजूबों के अलावा कई धार्मिक स्थलों के भी पेपर से माडल तैयार कर चुके हैं। जिस कारण उनका नाम विभिन्न रिकार्ड बुकों में भी शामिल हो चुका है।

टेक्सटाइल-हौजरी मज़दूरों ने की मज़दूर पंचायत

आनंदमार्गिओं ने नकारा महासम्भूति  के अवतरण का दावा

नए साल के साथ ही हो जाएगी कयामत की शुरुआत

आनन्दमार्ग जागृति में हुई तन-मन के गहरे रहस्यों की चर्चा 

बीएसएफ ने चलाया अभियान

Friday, May 17, 2013

कलाकृतियों में असली सोने और चांदी का वर्क

08-मई-2013 16:26 IST
तंजौर और मैसूर की कलाकृतियां -विशेष लेख//आलोक देशवाल*
दक्षिण भारत के तलिनाडु राज्‍य में तंजौर (तंजावूर) के मंदिर में उकेरी गई चित्रकला को तंजौर कलाकृतियों का नाम दिया गया। शैलीगत ढंग से यह माना जाता है कि यह 16वीं शताब्‍दी में नायक शासकों के शासन के दौरान उभर कर आई। 17वीं सदी में मराठा शासन में इस कला को नया प्रोत्‍साहन और संरक्षण प्राप्‍त हुआ।मराठा शासकों के समय तंजौर  कला, वास्‍तुकला, शिक्षण, संगीत और प्रदर्शन कला के एक म‍हान केंद्र के रूप में उभर कर आया।
स्‍थानीय तौर पर पालागई (लकड़ी का तख्‍त) और पदम (चित्र) का तात्‍पर्य लकड़ी के तख्‍तों पर चित्र बनाने की पद्धति से है जो इस क्षेत्र की विशेष शैली है। ऐसा माना जाता है कि पहले इस कला को दीवारों पर बनाया जाता था और फिर उसे ऐची चीज़ों पर बनाया जाने लगा जिसे आसानी से ले जाया जा सकता हो। इन चित्रों में दृश्‍य हिंदू धर्म की वैष्‍णव और शैव परंपरा से उत्‍पन्‍न हुए हैं। हालांकि इसमें अन्‍य धर्मों और धर्मनिरपेक्ष विषयों पर भी कई चित्र मिलते हैं। इन चित्रों में दरबार के दृश्‍य और संतों तथा शासकों के चित्र शामिल हैं।
तंजौर कलाकृतियों में असली सोने और चांदी का वर्क, बहुमूल्‍य मोती, शीशे और रत्‍नों विशेष रूप से सोने का बखूबी इस्‍तेमाल होता है। देवी-देवताओं की कलाकृतियों में लाल, हरे, नीले, काले और सफेद रंगों के इस्‍तेमाल के अलावा श्री कृष्‍ण के बाल रूप की कलाकृति में संगमरमर के साथ अक्‍सर गुलाबी जबकि भगवान विष्‍णु और उनके अवतारों के चित्रों में अक्‍सर हरे रंग की झलक दिखती है।
मैसूर कलाकृति शैली महाराजा कृष्‍णराजा वदियार (1799-1868) के शासन मे दक्षिण कनार्टक में शुरू हुई। इनके शासन में संगीत, नृत्‍य, साहित्‍य और कला‍कृतियों जैसे पुरानी कलात्‍मक परंपराओं को फिर से उभारा गया। अधिकतर पारंपरिक कलाकृतियों को जीवित रखने में इस शासन को श्रेय दिया जा सकता है। दीवारों से लेकर मैसूर की शैलीगत ढंग से कपड़े, कागज़ और लकड़ी पर कलाकृतियां बनाने तक व्‍यापक कृतियों मिलती हैं।
हालांकि देखने वालों को यह कलाकृतियां अक्‍सर एक जैसी लगती हैं लेकिन दोनों की शैलियां में में अंतर है और यह अंतर इन कलाकृतियों को बनाने में इस्‍तेमाल हुई तकनीक और जिस तरह से यह प्रस्‍तुत की गईं उसमें है। तंजौर के मुकाबले मैसूर कलाकारों द्वारा अपनाई गई तकनीक में मामूली फर्क है। तंजौर में सफेदा (मक्‍खीसफेदा) का इस्‍तेमल होता है वहीं मैसूर कलाकार  स्‍वदेशी पेड़ (रेवाना चिन्‍नीहालू) के रस से निकला गंबोज (पीला) का इस्‍तेमाल करते हैं जिसे इन कलाकृतियों में एक सुनहरे रंग की झलक दिखती है। तंजौर के ‘गैसो’ कार्य के हाई रिलीफ के मुकाबले मैसूर में लो रिलीफ को वरीयता दी जाती है और तंजौर कलाकारों द्वारा अपनाए जाने वाले चांदी की परत वाली सोने की पत्‍ती के मुकाबले मैसूर में खरे सोने की पत्‍ती का इस्‍तेमाल होता है। तंजौर शैली में उपयोग हुए शीशे और रत्‍न भी मैसूर कलाकृतियां में दिखाई नहीं देते। मैसूर में तंजौर के बजाए प्राकृतिक दृश्‍य अधिक विस्‍तारपूर्वक नज़र आते हैं हालांकि दोनो शैलियों में अक्‍सर पारंपरिक  मंदिरों के पवैलियन और टावर दिखाई देते हैं।
तंजौर और मैसूर कलाकृतियां में हिंदू पुराणों, महाकाव्‍यों और पुराणों के दृश्‍य दर्शाती हैं। इन कलाकृतियां को जो अलग करता है वो है कि इसमें उत्‍तर भारत, डेक्‍कन और मैसूर के दक्षिण भागों की अलग-अलग संस्‍कृतियों की झलक । यह कलाकृतियां दीवारों/सूक्ष्‍म चित्रों, तथा लो रीलिफ की मूतिर्यों की दो भारतीय पंरपराओं के बीच की हैं।  दोनों कलाकृतियों में जैसी कि रैखिकता दिखती है वो रोशनी और शेड के जरिए तीन परिमाणिक का रूप देती है। लो रिलीफ माडलिंग- गोंद की मोटी परत, रंगों , तरीके से कटे हुए पत्‍थरों के जरिए हासिल की जाती है। कलाकृतियों को सजाने के लिए अनिवार्य रूप से सजावटी तत्‍वों का काफी इस्‍तेमाल किया जाता था जिसे ‘कोर्ट स्‍टाइल’ कहते हैं।
पारंपरिक रूप से व्‍यक्तिगत पूजा और सम्राटों को सम्‍मान देने में इस्‍तेमाल की जानी वाली मैसूर और तंजौर कला‍कृतियों ने संग्रहालय की उत्‍कृष्‍ट दुनिया में काफी देर से कदम रखा है। नई दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय संग्रहालय की तंजौर और मैसूर कलाकृतियों की नवीनीकृत दीर्घा में इन दोनों कलाकृतियों के कुछ बेहतरीन ऐतिहासक उदाहरण मिलते हैं जो परंपरा, आध्‍यात्‍म और उदार उपभेदों का भरपूर मिश्रण दर्शाते हैं।
दीर्घा में 88 कलाकृतियों शामिल हैं।  हालांकि हर कलाकृति विशिष्‍ट है लेकिन कुछ श्रेष्‍ठ  कृतियों की कोई तुलना नहीं है।
इन कलाकृतियों में उत्‍कृष्‍ट कार्य को देखकर यह आसानी से समझा जा सकता है कि दुनियाभर में इनका प्रसार कैसे हुआ।    
*उप निदेशक, पसूका नई दिल्‍ली
मीणा/इ अहमद/प्रियंका -92
पूरी सूची -08.05.2013 

Saturday, May 04, 2013

स्‍पीक मैके-

01-मई-2013 20:55 IST
पारंपरि‍क भारतीय शास्‍त्रीय संगीत और संस्‍कृति के उत्‍थान का महत्‍वपूर्ण अंतरराष्‍ट्रीय मंच
विशेष लेख                                                               किरण सेठ*
                                                                                                                 Courtesy Photo
‘’ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (आईआईटी), खड़गपुर में अध्‍ययन के बाद मैं पीएचडी करने के लिए न्‍यूयार्क के कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय गया था। उन्‍हीं दिनों, ब्रुकलिन अकादमी ऑफ म्‍युजिक, न्‍यूयार्क में मुझे ध्रुपद गायन सुनने का मौका मिला। उस गायन ने जैसे मेरे मन के तारों को झंकृत कर दिया। गायक कलाकार थे - उस्‍ताद नसीर अमीयुद्दीन डागर और उस्‍ताद फरीदूद्दीन डागर। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी संस्‍कृति से कितना दूर हूं’’ यह कथन है किरण सेठ का जो हमारे देश के अधिकतर युवाओं की भी कहानी है। प्रतिस्‍पर्धा के इस युग में हमारा युवा वर्ग कई मायनों में वंचित रह जाता है।
‘’वर्ष 1976 में देश लौटकर मैंने दिल्‍ली के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (आईआईटी) में अध्‍यापन शुरू किया। युवाओं को अपनी संस्‍कृति से जोड़ने के लिए मैं दिलो-जान से जुट गया। अगले ही साल मैंने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया।‘’
पिछले 35 वर्षों के दौरान कई लोग साथ जुड़ते चले गए और आज स्पिक मैके भारत के 400 शहरों और 50 विदेशी शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन कर चुका है। पर्यटन मंत्रालय के सहयोग से भारतीय प्रबंधन संस्‍थान कोलकाता में आगामी 20 मई -26 मई, 2013 के बीच पहले अंतरराष्‍ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। इसका उदघाटन राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी करेंगे।
इस सम्मेलन के दौरान श्रीमती गिरिजा देवी, प्रोफेसर टी.एन. कृष्‍णन, पंडित बिरजू महाराज, विद्वान टी.वी.शंकरनारायणन, पंडित शिव कुमार शर्मा, श्रीमती अंजलि इला मेनन, पांडवानी गायिका श्रीमती तीजन बाई के साथ कई और जाने माने कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। यही नहीं इस सम्‍मेलन के दौरान देश भर से आए स्‍कूलों और कॉलेजों के 1500 विद्यार्थी भारत की प्राचीन आश्रम प्रथा से रूबरू होंगे।
नादभेद नामक कार्यक्रम के माध्‍यम से अखिल भारतीय स्‍तर पर एक शास्‍त्रीय संगीत प्रतिस्‍पर्धा का आयोजन किये जाने की भी योजना है। यह आयोजन स्पिक मैके और दूरदर्शन के संयुक्त तत्वाधान में होगा। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत को समर्पित एक गौरवशाली रियलिटी शो होगा जिसमें कर्नाटक संगीत और हिन्दुस्तानी शैली के गायन और वाद्य यंत्रों की सुंदर प्रस्तुति होगी। इसका एकमात्र उद्देश्य युवाओं में हमारी समृद्ध संगीत परंपरा का प्रचार-प्रसार करना है।
इस कार्यक्रम के दौरान 6 श्रेणियों में पुरस्‍कार प्रदान किए जाएंगे। पंडित भीमसेन जोशी युवा पुरस्‍कार (हिंदुस्‍तानी संगीत), पंडित रविशंकर युवा पुरस्‍कार (हिंदुस्‍तानी वाद्य), उस्‍ताद अल्‍ला रक्‍खा युवा पुरस्‍कार (हिंदुस्‍तानी उपवादक), श्रीमती एम एस सुब्‍बुलक्ष्‍मी युवा पुरस्‍कार (कर्नाटिक गायन), विदवान शेख चिन्‍ना मौलाना युवा पुरस्‍कार (कर्नाटिक वाद्य), विदवान पालघाट मणिअय्यर युवा पुरस्‍कार (कर्नाटिक उपवादक)। प्रत्‍येक श्रेणी के अंतर्गत्‍विजेता को 5 लाख रूपये का नकद पुरस्‍कार प्रदान किया जाएगा। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर फाइनल में आने वाले कलाकारों के अलावा प्रोत्‍साहन के तौर पर 10 हजार रूपये का पुरस्‍कार भी प्रदान किया जाएगा।
भारतीय संगीत कला और संस्‍कृति की धारा हमारे देश के साथ-साथ पूरे विश्‍व को समृद्ध कर रही है। हमारे युवा वर्ग को भी स्पिक मैके के बदौलत अपनी संस्‍कृति के साथ परिचित होने का एक बेहतरीन मंच मिला है।

*लेखक को कला क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा ‘पदम श्री’ पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया है।
वि.कासोटिया/संजीव/रत्‍नावली/रीता/चित्रदेव/मलिक/श्‍याम - 88

Monday, January 21, 2013

स्तास नामिन और "दस अवतार"


भारतीय संस्कृति और कला से मोहित हैं-स्तास नामिन
                                                           कोलाज व्यास आफ रशिया 
कई दशक पूर्व जाने माने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की जानी मानी शख्सीयत राज कपूर साहिब की एक फिल्म का एक गीत बहुत लोक प्रिय हुआ था 
मेरा जूता है जापानी 
ये पतलून इंगलिस्तानी 
सर पे लाल टोपी रूसी 
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी 
फिल्म श्री420 के इस गीत को लिखा था शैलेन्द्र ने और संगीत दिया था शंकर-जयकिशन ने।  गीत संगीत की दुनिया में एक यादगारी छाप छोड़ने वाले जनाब मुकेश साहिब की आवाज़ में जब गीत  दुनिया के सामने आया तो सबके दिल में उतर गया।  आज भी लोग इसे  गुनगुनाते अक्सर सुने जा सकते हैं। इस गीत की  भावना को इतनी मुद्दत के बाद याद दिलाया है रेडियो रूस ने अपनी एक खबर में। खबर है स्तास नामिन और "दस अवतार" की।  रेडियो रूस के मुताबिक स्तास नामिन-एक प्रसिद्ध रूसी रॉक संगीतकार, कलाकार, फोटोग्राफर और थिएटर तथा फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने भारतीय विषय पर एक नाटक तैयार करने का संकल्प किया है। स्तास नामिन का कहना है कि वह भारतीय संस्कृति और कला से मोहित हैं। स्तास नामिन ने कहा-

आप यह सुकर हैरान होंगे कि मुझे भारत से प्यार विगत शताब्दी के आठवें दशक में तब हुआ जब मैंने "बीटल्स" का संगीत सुना। बाद में मैं प्रामाणिक भारतीय कला के संपर्क में आया। तब हमारे देश में भारत से कई संगीत कलाकार आए थे। भारत के परंपरागत वाद्ययंत्रों की सुंदरता और विशिष्टता ने मेरा मन मोह लिया। मैं उन भारतीय संगीत कलाकारों से मिला और भारतीय वाद्ययंत्रों के बारे में जानकारी हासिल की। सितार का तो में दीवाना हो गया और मैंने संकल्प किया कि भारत जाकर सितार वादन की शिक्षा पाऊँगा।

भारत जाने से पहले स्तास नामिन और उसकी संगीत मंडली ने लगभग आधी दुनिया की यात्राएँ कीं और अपने कई दिलचस्प कार्यक्रम प्रस्तुत किए। उन्होंने अस्सी के दशक में मास्को में आयोजित नशीले पदार्थों के विरुद्ध एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय रॉक संगीत त्योहार में भाग लिया था। उसके बाद उन्होंने विभिन्न देशों के संगीतकारों के साथ मिलकर ब्रिटेन के कई नगरों में अपने संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वह कुछ समय के लिए अमरीका में भी रहे। वहाँ वह संगीत संस्कृति का ज्ञान हासिल करने के प्रयास करते रहे। वहाँ ही उन्होंने सितार ख़रीदा और भारतीय संगीतकारों से सितार वादन सीखना शुरू किया। उसके बाद उन्होंने सितार के साथ अपने संगीत कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू किया और इस साल उन्होंने भारत का दर्शन भी किया। वहाँ उन्होंने भारत के बारे में कुछ दस्तावेज़ी फिल्में बनाईं। उनमें से एक फिल्म वाराणसी और वहाँ आनेवाले तीर्थयात्रियों के बारे में है। स्तास नामिन की यह फिल्म हाल ही में मास्को स्थित भारत के सांस्कृतिक केंद्र में दिखाई गई जो दर्शकों को बहुत पसंद आई। इस फ़िलाम के लिए संगीत भी स्तास नामिन ने स्वयं ही रचा है।

मास्को में स्तास नामिन का अपना एक थीएटर भी है। इस थीएटर में रूसी चैम्बर संगीत, रॉक ओपेरा और संगीत नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसा लगता है कि यह रूसी फिल्म निर्माता और संगीतकार अपने थिएटर को एक नया रंग देना चाहते हैं। स्तास नामिन ने बताया कि अपने थीएटर में एक भारतीय महाकाव्य पर आधारित संगीत नाटक प्रस्तुत करने की उनकी योजना है। उन्होंने कहा-

हमारे नए संगीत नाटक का नाम होगा- "दस अवतार"। यह भगवान विष्णु के विभिन्न अवतार धारण करने की कहानी होगी जिसका वर्णन प्राचीन पुराणों में किया गया है। यह एक संगीत और नृत्य प्रस्तुति होगी। इसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य होगा। हम रूसी दर्शकों को भारतीय महाकाव्य की विलक्षण झलकियाँ दिखानी चाहते हैं ताकि दर्शक अद्वितीय भारतीय कला और संस्कृति की मूल परंपराओं को अच्छी तरह से समझ सकें।

स्तास नामिन के संगीत नाटक "दस अवतार" में भाग लेने के लिए भारतीय संगीत कलाकारों को आमंत्रित किया गया है और इसमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूसी कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा। उम्मीद है कि यह संगीत नाटक अगले वर्ष के पूर्वार्ध में प्रस्तुत किया जाएगा।(
रेडियो रूस से साभार)
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Thursday, February 09, 2012

रामकिंकर बैज- एक सिंहावलोकन

वह एक प्रतिष्ठित मूर्तिकार के साथ एक चित्रका और ग्राफिक आर्टिस्ट भी थे
संस्कृति और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री कुमारी सैलजा ने आज आधुनिक भारत के सर्वोत्कृष्ट कलाकारों में से एक रामकिंकर बैज की संपूर्ण सिंहावलोकन प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। वह न केवल एक प्रतिष्ठित मूर्तिकार थे बल्कि एक चित्रकार और ग्राफिक आर्टिस्ट भी थे। राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (एनजीएमए) में प्रस्तुत इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर के. एस. राधाकृष्णन हैं, जिन्होंने रामकिंकर बैज से शिक्षा प्राप्त की है। समारोह में उपस्थित प्रो. के. जी. सुब्रमण्यम और प्रो. ए. रामचंद्रन इस प्रक्रिया में उनके सलाहकर रहे। इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय में सचिव श्री जवाहर सिरकार भी मौजूद थे। 
इस अवसर पर बोलते हुए मंत्री महोदया ने कहा कि, ‘श्री रामकिंकर बैज आधुनिक भारतीय मूर्तिकारों की प्रमुख शख्सियतों में से एक थे। स्थानीय और मौजूदा संदर्भों में अच्छी पकड़ के साथ वह अपने विषयों में आधुनिकतावादी थे। उनके काम में यूरोपीय कला और उनके भीतर अंतर-निहित भारतीय बोध का अच्छा तालमेल था।’
रामकिंकर बैज (1906-1980) का जन्म पश्चिम बंगाल के बांकुरा में एक आर्थिक और सामाजिक रुप से विपन्न परिवार में हुआ। अपने दृढ़ संकल्प से वह भारतीय कला के प्रतिष्ठित प्रारंभिक आधुनिक कलाकारों में से एक बने। भारतीय कला में उनके अतुल्य योगदान के लिए वर्ष 1970 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। रामकिंकर जी की स्मारकीय शिल्पकृतियों ने सार्वजनिक कला में अपना एक अलग प्रतिमान स्थापित किया। उनकी कला यात्रा के छह दशकों की लगभग 350 महत्वपूर्ण चित्रकृतियों, रेखाचित्रों, ग्राफिकों और मूर्ति संग्रह इस प्रदर्शनी में शामिल है। इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर के. एस. राधाकृष्णन ने कहा कि –‘मेरी इस प्रदर्शनी का उद्देश्य रामकिंकर बैज के जीवन के उन क्षणों को प्रस्तुत करना है जिसमें उन्होंने उनसे पहले काम करने वाले, उनके साथ काम करने वाले और उनके बाद काम करने वालों से सामंजस्य स्थापित किया।’

इस सिंहावलोकन प्रदर्शनी के अवसर पर एनजीएमए को कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशनों को प्रस्तुत करते हुए गर्व का अनुभव हो रहा है। इन प्रकाशनों में- दिल्ली आर्ट गैलरी के गठजोड़ के साथ प्रस्तुत प्रो. आर. सिवा कुमार रचित ‘रामकिंकर बैज’, नियोगी बुक्स के गठजोड़ में मूल रुप से श्री सोमेन्द्राथ बंदापाध्याय द्वारा रचित और सुश्री भासवती घोष द्वारा अनूदित ‘माई डेज विथ रामकिंकर’, मुसुई आर्ट फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत और आकार प्रकार तथा नव्या गैलरी द्वारा समर्थित श्री के. एस. राधाकृष्णन कृत ‘रामकिंकर्स यक्ष यक्षी’ और मुसुई आर्ट फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत तथा श्री जॉनी एम. एल. द्वारा रचित ‘रामकिंकर स्ट्रेट फ्रॉम माई हार्ट’ शामिल हैं।

इन उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के अतिरिक्त एनजीएमए द्वारा रामकिंकर पर दो व्यापक पुस्तकों का प्रकाशन भी किया जा रहा है जिसमें एक व्यक्ति और कलाकार के रुप में रामकिंकर के संपूर्ण जीवन की बानगी है। ये प्रकाशन हैं:-प्रो. के. जी. सुब्रमण्यम कृत ‘रामकिंकर एंड हिज वर्क्स’ और प्रो. ए. रामचंद्रन रचित ‘द मैन एंड द आर्टिस्ट’। एनजीएमए द्वारा रामकिंकर बैज के जलरंगो, तैल और ग्राफिक कामों से प्रेरित तीन पोर्टफोलियों की भी प्रस्तुति की गई है।

राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय के निदेशक प्रो. राजीव लोचन ने कहा कि-यह प्रदर्शनी उस महान और सृजनात्मक व्यक्तित्व के जीवन को प्रकाशित करती है जो एक फकीर और घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने काम के जरिए जीवन से विशाल कलाकार व्यक्तित्व और सृजनात्मक प्रतिभा को प्रतिबिंबित किया है।

कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले कलाकारों की जीवनकालिक उपलब्धियों का प्रदर्शन का प्रयास करने के हिस्से के रुप में यह राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय द्वारा आयोजित नौंवी सिंहावलोकन प्रदर्शनी है।

इस प्रदर्शनी का आयोजन मुंबई और बैंगलुरु स्थित क्षेत्रीय केन्द्रों में भी किया जाएगा।
 
(पी.आई.बी.).08-फरवरी-2012 20:21 IST                  ***

Tuesday, January 24, 2012

धूमधाम से हुआ पूर्वोत्‍तर संस्‍कृति केंद्र का उद्घाटन

संस्‍कृति मंत्रालय कला संस्‍कृति को बढ़ावा संरक्षण देने को प्रतिबद्ध
कुमारी सैलजा ने किया पूर्वोत्‍तर क्षेत्र के साथ वायदा
केंद्रीय संस्‍कृति मंत्री ने यह बताया कि उनका मंत्रालय पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की सम्‍पन्‍न, विविध तथा अनोखी कला एवं संस्‍कृति को बढ़ावा तथा संरक्षण देने को अत्‍यंत महत्‍व देता है। उन्‍होंने यह बात पूर्वोत्‍तर संस्‍कृति केंद्र के उद्घाटन अवसर के दौरान कही। क्षेत्र की सांस्‍कृतिक परंपराओं की सुरक्षा के भाग के रूप में संगीत नाटक अकादमी ने पूर्वोत्‍तर केंद्र शिलांग में गठित किया है। इसने गुवाहाटी में सत्रिया केंद्र गठित किया है, जो असम की सत्रिया परंपरा के बारे में देखभाल करता है। 

उन्‍होंने यह भी बताया कि दीमापुर में पूर्वोत्‍तर आंचलिक सांस्‍कृतिक केंद्र थियेटर रूपांतरित योजना को लागू कर रहा है। इसके अंतर्गत पूर्वोत्‍तर क्षेत्रों में थियेटरों की सुरक्षा और इनके लिए सहायता दी जाती है। मंत्री महोदया ने यह भी बताया कि नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा पूर्वोत्‍तर नाट्य समारोह अलग से आयोजित करता है, जिसमें प्रतिष्ठित निर्देशकों के नाटक तथा पूर्वोत्‍तर की प्रमुख परंपराओं को दर्शाया जाता है। (तस्वीर व विवरण: पत्र सूचना कार्यालय) 

Monday, January 16, 2012

डिजाइन क्‍लीनिक योजना–अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

 विशेष लेख    गुणवत्‍ता सुधारने के लिए डिजाइन का इस्‍तेमाल
डिजाइन क्‍लीनिक योजना क्‍या है ?
    
राष्‍ट्रीय डिजाइन संस्‍थान (एनआईडी) ने डिजाइन क्‍लीनिक योजना तैयार की है। इसका उद्देश्‍य सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उपक्रमों में उनके उत्‍पादों, विधियों, संचालन सेवाओं और व्‍यापार की गुणवत्‍ता सुधारने के लिए डिजाइन का इस्‍तेमाल करते हुए, डिजाइन से जुड़ी सोच, दर्शन और इस्‍तेमाल से जुड़े कार्यों को आसान बनाया है।    इस योजना के उद्देश्यों में एम.एस.एम.ई. क्‍लस्‍टरों और डिजाइन विशेषज्ञता को एक साझे मंच पर लाना है, ताकि डिजाइन से जुड़ी समस्‍याओं का शीघ्र समाधान हो सके।

एम.एस.एम.ई के अधीन क्‍या-क्‍या हैं ?कोई विनिर्माण/सेवा उपक्रम जो सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उपक्रम विकास (एम.एस.एम.ई. डी) अधिनियम, 2006 के अधीन निर्धारित और एम.एस.एम.ई. के अधीन समय-समय पर अधिसूचित विनिर्माण/सेवा उपक्रमों के लिए संयंत्र और मशीन/उपकरण में निवेश के लिए निर्धारित सीमा पर आधारित हो। यह योजना डीसी एमएसएमई द्वारा मान्‍य कलस्‍टरों/औद्योगिक कलस्‍टरों के भीतर लगे उपक्रमों पर भी लागू है।

डिजाइन की प्रासंगिकता क्‍या है और यह एमएसएमई की मदद कैसे करता है ?
डिजाइन, अभिनवता और विकास-दैनिक इस्‍तेमाल के लिए उन्‍नत और विविधतापूर्ण उत्‍पादों के लिए आपस में संबंधित हैं। डिजाइन से जुड़े समाधानों और विधियों के इस्‍तेमाल से एमएसएमई को उत्‍पादकता बढ़ाने, लागत घटाने और उत्‍पादों की स्‍वीकार्यता के संदर्भ में मदद मिलती है। एक अभिनव विषय के रूप में डिजाइन एमएसएमई को प्रतिस्‍पर्धी बाजार में सतत विकास तथा नए व्‍यापारिक अवसर उपलब्‍ध कराने में मददगार है।

डिजाइन क्‍लीनिक योजना के व्‍यापक क्षेत्र क्‍या हैं ?
एमएसएमई की डिजाइन विशेषज्ञता के लिए योजना वितरण हेतु निम्‍नलिखित तीन प्रारूपों का इस्‍तेमाल किया जाता है :1. एमएसएमई क्लस्‍टरों के डिजाइनों  को प्रचारित करने के लिए डिजाइन जागरूकता सेमिनार
2. डिजाइन जागरूकता कार्यक्रम में शामिल है :
·         समुचित डिजाइन कार्य नीतियों को विकसित करने के लिए एमएसएमई क्लस्‍टरों का डिजाइन आवश्‍यकता मूल्‍यांकन सर्वेक्षण और
·         डिजाइन क्‍लीनिक कार्यशाला के माध्‍यम से डिजाइन समस्‍याओं के लिए तत्‍क्षण परामर्श देकर क्लस्‍टरों की डिजाइन संबंधी जरूरतों को पूरा करना
3. एमएसएमई की जरूरतों के अनुसार डिजाइन परामर्शी परियोजनाओं के माध्‍यम से एमएसएमई की डिजाइन संबंधी विशेष जरूरतों को पूरा करना।


    डिजाइन जागरूकता सेमीनार क्‍या है ? इसे कैसे आयोजित करे ?
    एमएसएमई क्लस्‍टर संघों की ओर से डिजाइन विशेषज्ञों – अन्‍य विशेषज्ञों के साथ अपने सदस्‍यों का संपर्क कायम करने के उद्देश्‍य से ऐसे सेमीनार आयोजित किए जाते हैं। इसमें भाग लेने वालों को डिजाइन प्रक्रिया और डिजाइन के लाभों के बारे में जानकारी देकर एमएसएमई क्लस्‍टरों में डिजाइन को प्रचारित किया जाता है। यह सेमीनार एक दिन का होता है, जिसमें प्रतियोगियों को योजना और डिजाइन जागरूकता के बारे में जानकारी दी जाती है, जो क्लस्‍टरों की डिजाइन संबंधी जरूरतों के लिए मामलों से जुड़े अध्‍ययनों और बेहतर डिजाइन परंपराओं तथा डिजाइन रणनीति के माध्‍यम से किया जाता है।
    डिजाइन जागरूकता सेमीनार आयोजित करने के लिए संबंधित एमएसएमई क्लस्‍टर संघ संकाय/विषय विशेषज्ञ सेवाओं के लिए निर्धारित प्रपत्र में डिजाइन क्‍लीनिक योजना के साथ पंजीकरण करा सकते हैं। सेमीनार पर आने वाली लागत को पूरा करने के लिए इस योजना से संघ को अधिकतम 60 हजार रूपये वित्‍तीय सहायता दी जाएगी।    



डिजाइन जागरूकता कार्यक्रम क्‍या है ?
    डिजाइन जागरूकता कार्यक्रम में शामिल है :क. क्लस्‍टरों का डिजाइन आवश्‍यकता मूल्यांकन सर्वेक्षण और
ख. सामान्‍य रूप से डिजाइन से जुड़ी समस्‍याओं और कलस्‍टरों की जरूरतों के लिए तत्‍काल समाधान उपलब्‍ध कराना


(क) मूल्‍यांकन सर्वेक्षण की जरूरत क्‍यों ?
    क्लस्‍टर की डिजाइन संबंधी जरूरतों और डिजाइन संबंधी समस्‍याओं को समझने के क्रम में विशेषज्ञ डिजाइनर एक सघन डिजाइन अनुसंधान संचालित करते हैं, ताकि वार्तालाप शिक्षण, मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के माध्‍यम से कलस्‍टरों में डिजाइन शामिल करने के लिए मौजूदा परिदृश्‍य और अवसरों का एक रेखाचित्र तैयार किया जा सके। क्लस्‍टर की डिजाइन संबंधी सामान्‍य जरूरतों को पूरा करने और निम्‍नलिखित डिजाइन क्‍लीनिक कार्यशाला में डिजाइन से जुड़े समाधानों को तैयार करने के लिए यह एक आधार के रूप में कार्य करता है।

(ख) एमएसएमई को डिजाइन क्‍लीनिक कार्यशाला से लाभ किस प्रकार मिलता है ?    विशेषज्ञ डिजाइन द्वारा संचालित वार्तालाप कार्यशाला में कलस्‍टर के सदस्‍य समस्‍याओं के समाधान की सृजनात्‍मक तकनीक – डिजाइन प्रक्रिया सीखते हैं, ताकि वे अवसरों का लाभ ले सके और समाधान तैयार कर सके। वार्तालाप और कार्यशाला की गतिविधियों के माध्‍यम से समाधान उपलब्‍ध होते हैं। यह कार्यशाला क्लस्‍टरों की जरूरतों और आवश्‍यकता मूल्‍यांकन सर्वेक्षण के अधीन शामिल इकाइयों की संख्‍या के आधार पर एक से पाँच दिनों की हो सकती है।

(ग) एक डिजाइन जागरूकता कार्यक्रम का प्रबंधन कैसे करना है और एमएसएमई के लिए वित्‍तीय और सहायता मिल सकती हैं?  या तो क्‍लस्‍टर डिजाइन जागरूकता सम्‍मेलन को संचालित करने वाले डिजाइन विशेषज्ञ से सीधे संपर्क कर सकते हैं अथवा योजना के अंतर्गत सहायता के लिए एक प्रस्‍ताव पर कार्य के लिए योजना के पैनल में शामिल डिजाइनरों में से एक का चयन कर सकते हैं और एसोसिएशन के साथ एक समझौता कर सकते हैं।
  इस योजना के तहत एसोसिएशन को तीन लाख रुपये तक की सीमा तक के वास्‍तविक खर्च के 75 प्रतिशत की प्रतिपूर्ति की जाती है और शेष खर्चों को या तो एसोसिएशन द्वारा स्‍वयं वहन करना होता है अथवा समूह के सहभागी सदस्‍य से योगदानों के माध्‍यम से अथवा सेंसरशिप के माध्‍यम से अदा किया जाता है।

एमएसएमई पेशेवर डिजाइन सहायता कैसे प्राप्‍त कर सकती हैं?यह योजना एमएसएमई इकाइयों की विशेष डिजाइन विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए डिजाइनर सहायता और वित्‍तीय सहायता प्रदान करती है। डिजाइन पेशेवर अपने विशिष्‍ट क्षेत्रों में एमएसएमई के साथ करीब से कार्य करने की आशा रखते हैं ताकि वे डिजाइन समाधान, डिजाइन विवरण और सुझाए गए डिजाइन उपायों को विकसित करने के लिए अथवा नए उत्‍पादों के विकास अथवा वर्तमान उत्‍पादों/सेवाओं की गुणवत्‍ता और बाजार उपलब्‍धता में सुधार और विभिन्‍न उत्‍पादों एवं डिजाइन के माध्‍यम से विभिन्‍न उत्‍पादों और सेवाओं की अवधारणा को विकसित कर सकें।
यह योजना एक-एकल/तीन एमएसएमई के समूह के लिए नौ लाख रुपये तक और चार अथवा अधिक एमएसएमई के समूह के लिए 15 लाख रुपये तक की सीमा वाली डिजाइन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए इनमें होने वाले वास्‍तविक व्‍यय के 60 प्रतिशत तक वित्‍तीय सहायता प्रदान करती है, जिसमें डिजाइनरों के शुल्‍क और व्‍यय, माल लागत और प्रारूप लागत शामिल है।

डिजाइन परियोजना प्रस्‍ताव को कौन बनाता है और इसका प्रारूप क्‍या होता है?
डिजाइन परियोजना प्रस्‍तावों को डिजाइन विशेषज्ञ और एमएसएमई इकाईयों द्वारा संयुक्‍त रूप से तैयार किया जाता है, जो डिजाइन समस्‍या कार्यक्षेत्र, प्रयोजन और अपेक्षित डिजाइन विवरण से संबंधित होते हैं। एमएसएमई इकाई डिजाइन विशेषज्ञ को बजट विवरणों के साथ डिजाइन परियोजना प्रस्‍ताव को बनाने के कार्य को भी सौंप सकती है और योजना के अंतर्गत सहायता के लिए भेजने से पूर्व इसकी अनुमति दे सकती है।
छात्र डिजाइन परियोजनाओं के लिए, एमएसएमई डिजाइन से जुड़ी समस्‍याओं के अध्‍ययन के लिए अंतिम वर्ष के डिजाइन छात्रों की सेवाओं पर उनका प्रारूप तैयार कर सकती है। छात्र एमएसएमई डिजाइन जरूरतों के लिए डिप्‍लोमा, लेख आदि पर काम करेंगे। यह किसी संकाय निर्देशक के साथ छात्रों के लिए कक्षा परियोजना भी हो सकती है। एमएसएमई बजट विवरणों के साथ परियोजना प्रस्‍ताव तैयार करने के लिए एक छात्र की सेवाएं ले सकती है और इसे ही स्‍वीकृति के लिए डिजाइन क्‍लीनिक योजना के लिए आगे बढ़ा सकती है। विकल्‍प के तौर पर, छात्र आवश्‍यक बजट सहायता के साथ एक परियोजना प्रस्‍ताव विकसित कर सकते हैं और इसे ही उस चयनित एमएसएमई को सौंप सकते हैं जो स्‍वीकृति के लिए वास्‍तविक लागतों का 75 फीसदी वहन करने पर सहमत हो।
    डिजाइन परियोजना के दोनों प्रस्‍तावों में दिए गए विवरण से डिजाइन की खास-खास बाते स्‍पष्‍ट हो जानी चाहिए और यह भी जाहिर होना चाहिए कि इस डिजाइन से एमएसएमई को क्‍या लाभ होंगे।

डिजाइन परियोजना प्रस्‍तावों पर अनुमोदन प्राप्‍त करने की प्रक्रिया क्‍या है ?
·         डिजाइन परियोजना प्रस्‍ताव जब मानक प्रारूप में स्‍वीकार कर लिया जाता है तो उसकी प्राथमिक जांच होती है। इस दौरान एमएसएमई/सबंधित डिजाइनर की ओर से आवश्‍यक या छूट गए विवरण मंगाये जाते हैं।
·         प्रस्‍ताव की दो/तीन स्‍वतंत्र डिजाइनर जांच करते हैं। इसमें यह देखा जाता है कि परियोजना एमएसएमई के अनुरूप है कि नहीं, योजना के अंतर्गत आता है कि नहीं, प्रस्‍ताव से एमएसएमई को अपने उत्‍पादों/ सेवाओं की गुणवत्‍ता सुधारने में सहायक है या नहीं। इस जांच में खर्च के आकलन की भी जांच होती है।
·         स्‍वतंत्र डिजाइन विशेषज्ञों की टिप्‍पणी के साथ ये प्रस्‍ताव परियोजना आकलन पैनल(पीएपी) के सामने रखे जाते हैं। पैनल ऐसे सभी प्रस्‍तावों की जांच करता है और कुछ चुने हुए प्रस्‍तावों को मंजूरी के लिए परियोजना निगरानी और सलाहकार समिति के समक्ष रखता हैं। अवलोकन/ स्‍पष्‍टीकरण के मामले में इन प्रस्‍तावों को वापस एमएसएमई/ संबंधित डिजाइनर के पास संशोधन/ स्‍पष्‍टीकरण/ पुनरीक्षण के लिए भेजा जाता है और आवश्‍यक सूचना मिलने के बाद इन प्रस्तावों को फिर से परियोजना आकलन पैनल के समक्ष रखा जाता है।
·         जब डिजाइन परियोजना को मंजूरी मिल जाती है तो इसे एमएसएमई/ संबंधित डिजाइनर के पास एमएसएम इकाई/डिजाइनर/एनआईडी के बीच त्रिपक्षीय समझौता संपन्‍न कराने के लिए भेजा जाता है। इसके बाद एमएसएमई/ डिजानर प्रस्‍ताव पर काम शुरू कर सकते हैं।
·         इस योजना के अंतर्गत वित्‍तीय मदद त्रिपक्षीय समझौते के अनुसार एमएसएमर्इ द्वारा जारी अथवा अपने हिस्‍से की 40 फीसदी रकम खर्च करने और उसका बिल जमा करने के बाद तय चरणों में होता है।  डिजाइन क्‍लीनिक योजना का 60 फीसदी हिस्‍सा सीधे डिजाइनर को जारी करना हो तो डिजाइनर को 40 फीसदी हिस्‍सा भुगतान करने के सबूत के साथ डिजाइन  क्‍लीनिक योजना को एक आवेदन देना होगा।
·         जरूरत महसूस होने पर आकलन पैनल/एनआईडी डिजाइन परियोजना की कार्यप्रगति की भी जांच कर सकता। परियोजना को दी जाने वाली वित्‍तीय मदद की अगली किस्‍त का जारी होना इनकी जांच/आकलन और रिपोर्ट पर निर्भर करता है।
·         वित्‍तीय मदद की अंतरिम किस्‍त परियोजना के सफल समापन और एमएसएमई को इसका नमूना देने और डिजाइन क्‍लीनिक योजना के पास सभी कागजात जमा करने के बाद ही जारी की जायेगी।